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  • अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    नयन और आरुषि का मिलना किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। पहली मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने आर्ट्स फैकल्टी की कैंटीन में हुई थी, जब पहली बरसात ने जून की तपती गर्मी को अचानक ठंडक में बदल दिया था। आरुषि अपनी किताबों और बिखरे हुए नोट्स को समेटने की हड़बड़ी में थी, और नयन, एक शांत, गंभीर चेहरा लिए, वहीं कोने की मेज पर बैठा उसे देख रहा था।
    “माफ़ करना, मेरा छाता आज धोखा दे गया,” आरुषि ने भीगे बालों से पानी झटकते हुए कहा।
    नयन ने बिना कुछ कहे, अपना जैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। “भीग जाओगी।”
    वह जैकेट, जिसकी महक में मिट्टी की सोंधी खुशबू और उसकी अपनी एक हल्की सी सिगरेट की गंध मिली हुई थी, आरुषि के लिए पहला तोहफ़ा था। वह जैकेट नयन की तरह ही था,  बाहर से रूखा, पर अंदर से बेहद गर्म और सुरक्षा देने वाला।
    धीरे धीरे वह एक छोटी मुलाक़ात कब दोस्ती में बदली और दोस्ती कब इश्क़ की एक गहरी नदी में, उन्हें पता ही नहीं चला। उनका रोमांस किताबों के पन्नों, देर रात की कॉफ़ी और दिल्ली की सर्द रातों में गर्माहट देने वाली लंबी ड्राइव में पनपा। आरुषि को नयन की खामोशियाँ पढ़ना आता था, और नयन को आरुषि की आँखों में छिपे हर सपने को साकार करना था।

    नयन की उंगलियां जब आरुषि के उलझे बालों को सुलझाती थीं, तो उस स्पर्श में सदियों का इकरार होता था। उनका प्रेम सिर्फ शब्दों का मोहताज नहीं था, वह एक-दूसरे की रूह में उतर चुका था। हर चुंबन, हर आलिंगन एक वादा था, हमेशा साथ रहने का।

    एक रात, इंडिया गेट पर, मद्धम रोशनी के बीच, नयन ने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लेकर भींच लिया था।
    “तुम मेरी हो, आरुषि। आख़िरी साँस तक।”
    आरुषि ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थीं, जैसे उसने ब्रह्मांड के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया हो।

    लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह उनकी प्रेम कहानी में एक मोड़ आना बाकी था, जो किसी भी प्रेम कहानी को पूरा नहीं होने देता।
    नयन एक मध्यवर्गीय परिवार से था, पर महत्वाकांक्षाएँ पहाड़ जितनी ऊँची थीं। उसके पिता का सपना था कि वह सिविल सर्विसेज़ में जाए। और नयन भी आरुषि के परिवार की तरह तथा अन्य लोंगों की तरह जानता था कि सरकारी नौकरी ही समाज में उनकी प्रेम कहानी को स्वीकार्यता दिला सकती है।
    “एक साल, बस एक साल और, आरुषि,” नयन ने उसे समझाते हुए कहा था, जब आरुषि ने उसे रोज़ मिलने से मना करने पर शिकायत की थी, तो नयन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला, बस इस एक साल के बाद तुम्हें वो सब दूँगा जिसका तुम सपना देखती हो, एक सुरक्षित भविष्य, एक छोटा-सा घर, और हर पल मेरा साथ।

    वह एक साल, इंतज़ार और विरह का है। उनका रोमांस अब फ़ोन कॉल्स, चोरी-छिपे की मुलाक़ातों और ख़त में सिमट गया था।
    परीक्षा की तैयारी चरम पर थी, और तभी किस्मत ने अपना क्रूर खेल खेला। नयन के पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा। परिवार की सारी जमापूंजी इलाज में लग गई, और नयन को अपनी पढ़ाई छोड़कर, परिवार को संभालने के लिए एक छोटी-सी निजी कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी।
    टूट गए सारे वादे, बिखर गए सारे सपने।
    कुछ दिनों तक जब आरुषि की बातचीत और कोई संपर्क नयन से नही हुआ,  तो अचानक एक दोपहर, आरुषि, नयन के पुराने कमरे में पहुँची। कमरा खाली था, सिर्फ़ कोने में रखी किताबों पर धूल जमी थी। नयन उसे यह सब बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था, उसने बस एक छोटा-सा संदेश छोड़ा था:
    आरुषि, मैं टूट गया हूँ। मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे सकता जिसका तुम हक़ रखती हो। मेरा प्रेम स्वार्थी नहीं है कि मैं तुम्हें भी अपने साथ इस अंधेरे में खींच लूँ। मुझे भूल जाना। यह हमारे इश्क़ का दर्दनाक अंत है।”

    नयन के उस एकतरफ़ा फ़ैसले ने आरुषि को अंदर तक झकझोर दिया। वह रोई, चिल्लाई, पर नयन का  कुछ भी पता नहीं चला। नयन यह जानता था कि आरुषि के परिवार वाले कभी एक असफल और आर्थिक रूप से टूटे हुए लड़के से उसकी शादी नहीं करेंगे। इसलिए उसने खुद को दूर करके, अपनी मोहब्बत को एक तरह से बलिदान कर दिया था।

    धीरे धीरे देखते देखते कब पांच साल गुज़र गए, किसी को पता भी नही चला।
    आरुषि की शादी एक सफल व्यवसायी से हो चुकी थी। अब उसके पास ऐशो-आराम के लिए सब कुछ था, बंगला, गाड़ी, ऐशो-आराम। पर उसकी आँखों में नयन का इंतज़ार आज भी ज़िंदा था। वह आज भी हर बारिश में नयन के जैकेट की महक खोजती थी।
    उसकी ज़िंदगी में रोमांस था, पर इश्क़ नहीं। उसका पति उसे बहुत प्यार करता था, पर वह स्पर्श, वह जुड़ाव जो नयन की नज़रों में था, उसे वह कहीं नहीं मिला।
    एक रात, बारिश ज़ोरों पर थी। आरुषि अपने बेडरूम की बालकनी में खड़ी थी, आँखें मूँदकर। उसके मन में नयन के साथ बिताई गई हर अंतरंग मुलाक़ात, हर मीठी शरारत घूम रही थी। उसे याद आया, कैसे नयन उसे पहली बार अपने सीने से लगाया था और कैसे उनके होंठ एक कसक भरी चाहत में मिले थे।
    आरुषि ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी नज़रों के सामने नयन का चेहरा घूम गया, एक दर्द भरा प्रेम, एक अनसुलझा बंधन। उसके दिल में एक टीस उठी।

    संयोगवश उसी शहर में, नयन ने भी खुद को अपने परिवार के लिए संभाला था। वह एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाता था, जो ठीक-ठाक चल जाती थी। वह भी एक खालीपन में जी रहा था। उसका सबसे बड़ा डर था कि वह आरुषि को किसी और के साथ खुश देखेगा। पर जब उसने दूर से आरुषि को एक बार अपनी कार में देखा, तो उसकी आँखों की उदासी ने नयन को बता दिया कि आरुषि अभी भी उसी अधूरी मोहब्बत के पिंजरे में कैद है।
    नयन ने हर शाम एक डायरी लिखी, जिसमें वह आरुषि को अपनी ज़िंदगी के हर पल का हिसाब देता था।
    आज मैंने तुम्हारे पसंदीदा फूल देखे।
    आज चाय बनाते हुए तुम्हारा ख़याल आया।
    आज बारिश हुई, और मुझे तुम्हारा भीगा हुआ चेहरा याद आया।
    यह डायरी, उसके लिए आरुषि से रोज़ बात करने का ज़रिया थी। उसका प्रेम अब भी ज़िंदा था, पर सिर्फ़ कागज़ों पर।

    छठे साल, एक कला प्रदर्शनी में, किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मिला दिया।
    आरुषि, अपने पति के साथ, एक पेंटिंग के सामने खड़ी थी, जिसका शीर्षक था, इंतज़ार का साया’। उस पेंटिंग में, एक लड़की दूर क्षितिज को देख रही थी, और उसके साये में एक धुंधला-सा पुरुष का चेहरा छिपा था।
    जब आरुषि ने पलटा, तो उसके सामने नयन खड़ा था। समय थम गया। पाँच सालों का दर्द, विरह, और प्रेम उनकी आँखों में भर आया।
    नयन का शरीर पहले से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था, पर उसकी आँखें आज भी वही थीं, गहरी और आरुषि के लिए अटूट प्रेम से भरी।
    “आरुषि…” नयन की आवाज़ काँपी।
    “नयन…” आरुषि ने केवल इतना कहा, और उसके होंठ काँपने लगे।
    आरुषि के पति ने नयन को देखा, पर उन्हें लगा कि वह कोई पुराना सहपाठी है। उन्होंने सम्मानपूर्वक हाथ मिलाया और थोड़ी देर में उन्हें अकेला छोड़ दिया।
    वे दोनों गैलरी के शांत कोने में बैठ गए।
    “तुमने क्यों किया ऐसा, नयन?” आरुषि की आवाज़ में पाँच सालों का दर्द था। “तुमने क्यों मान लिया कि मेरा प्यार इतना कमज़ोर है कि वह तुम्हारी मुश्किलों को नहीं सह पाएगा?”
    नयन ने उदास नज़रों से उसे देखा। “मैं स्वार्थी नहीं बन सकता था, आरुषि। मैं तुम्हें अंधेरे और अभाव की ज़िंदगी नहीं देना चाहता था। मेरा प्रेम आज भी उतना ही सच्चा है, पर मैं तुम्हें यह सब देने के बाद तुम्हारे सपनों को मरते हुए नहीं देख पाता।”
    उस शाम, वे घंटों बातें करते रहे। उन्होंने अपने अधूरे प्रेम के हर मोड़ को छुआ। उनका प्रेम, जो कभी शारीरिक आलिंगनों में व्यक्त होता था, आज सिर्फ़ आत्मिक जुड़ाव में सिमट गया था।
    आरुषि ने नयन का हाथ पकड़ा। वह स्पर्श आज भी उतना ही सुरक्षित और अपनापन देने वाला था।
    “हम अब भी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, नयन।”
    नयन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ, करते हैं। पर अब यह प्यार हमारा नहीं रहा, यह बस एक दर्द भरी याद है।”
    नयन ने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई डायरी निकाली। “यह तुम्हारी अमानत है। इसमें हमारे हर अधूरे पल का हिसाब है।”
    “क्या अब हम…?” आरुषि ने हिम्मत करके पूछा।
    नयन ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी मुस्कुराहट में केवल पीड़ा थी।
    “हम हमेशा एक-दूसरे के रहेंगे, आरुषि, पर अब केवल सपनों में। तुम्हारी ज़िंदगी में अब एक सफ़र है जिसे तुम्हें पूरा करना है। और मेरी ज़िंदगी… मेरी ज़िंदगी तो उसी दिन खत्म हो गई थी जब मैंने तुम्हें खोने का फ़ैसला किया था।”
    आरुषि ने वह डायरी ले ली। वह डायरी नहीं थी, वह उनके इश्क़ का मज़ार था।
    नयन उठा। यह उनकी अंतिम, और सबसे दर्द भरी मुलाक़ात थी। उसने आरुषि के माथे को धीरे से छुआ, बिना कोई चुंबन दिए, बिना कोई आलिंगन दिए। यह स्पर्श, किसी भी गहरे शारीरिक मिलन से ज़्यादा पवित्र और गहरा था, क्योंकि इसमें केवल त्याग और निस्वार्थ प्रेम था।
    “ख़ुश रहना, आरुषि। तुम जहाँ हो, ख़ुश रहना।”
    “और तुम?”
    “मैं? मैं हमेशा तुम्हारा हूँ।”
    नयन मुड़ा और भीड़ में कहीं खो गया। आरुषि वहीं खड़ी रही। उसके पास प्रेम की सबसे बड़ी निशानी थी, वह अधूरी डायरी।
    आज भी, आरुषि अपने आलीशान घर में रात की तन्हाई में उस डायरी के पन्ने पढ़ती है। वह जानती है कि उसका पति उसे भौतिक सुख दे सकता है, पर उसकी रूह हमेशा नयन की रहेगी।
    उनकी मोहब्बत अधूरी रही, पर उनका इश्क़ अमर हो गया, एक मीठा, दर्द भरा एहसास जो हर साँस के साथ ज़िंदा रहता है।
    समाप्त
    पढ़ने के लिए धन्यवाद।
    यह कहानी आपको कैसी लगी? आपकी समीक्षा का इंतज़ार रहेगा। यदि आपको यह कहानी छू गई हो, तो मुझे प्रोत्साहन में एक ❤️ या ✨ स्टीकर भेजकर मेरा उत्साहवर्धन ज़रूर करें!

     

  • 💞💞प्यार का नशा… पार्ट 7💞💞

    💞💞प्यार का नशा… पार्ट 7💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    लोकेशन, ” रिशाल अग्निहोत्री फॉर्मेहाउस,”

    रिशाल अपनी कार में, ” चलो अंदर!!

    अमानत, ” ये क्या बतमीजी है आपकी, ” आप अमीर है तो क्या कुछ भी करेंगे मेने कहा न मे कहीं नहीं जाने वाली और मेरे भाई को आपने कहा छोड़ा है बताये कहा है मेरा व्योम? “

    रिशाल अग्निहोत्री, ” वही बोल रहा हु, ” चुपचाप जो बोल रहा हु वो करोगी तो तुम्हारा भाई ठीक रहेगा वरना तुम सोच भी नहीं सकती मे उसकी साथ क्या कर सकता हु वो अब मेरे आदमी के अंदर मे है मे जब चहु उसे ऊपर पंहुचा सकता हु?? और तुम अच्छे से जानती हो मे ऐसा जरूर कर सकता हु? “

    अमानत के आँखों मे आंसू आ जाते है ये सब सुन कर आखिर रिशाल ऐसा कर क्यों रहा है क्या दुश्मनी थी उसकी अमानत से ये अमानत को समझ ही नहीं आ रहा था? “

    रिशाल अग्निहोत्री, ” लगता है तुम ऐसे नहीं मानोगी मुझे तुम्हे सबूत दिखाना ही होगा या फिर कुछ कर के बताना ही होगा की मे कुछ भी कर सकता हु? “

    रिशाल न अपने शर्ट के पॉकेट से फोन निकला और अपने आदमी को कॉल कर कहा व्योम का वीडियो उतर कर भेजो ओर हाँ मेरे ऑडर का इंतजार karna तभी उसे कुछ करना तब तक के लिए उसे कुछ सांस और ले लेने दो!!

    कुछ ही देर मे रिशाल के फ़ोन पर एक वीडियो आता है जो रिशाल अमानत को दिखा कहता है, ये देखो ये रहा तुम्हारा भाई जो अभी स्विंप्लू के आगे बैठा है मेरे आदमी बस मेरे ऑडर का इंतजार कर रहे है मेरे हाँ कहते है ही ये तुम्हारे भाई को धक्का दे देंगे और फिर वो पानी के अंदर…. और जहा तक मुझे पता है सायद तिम्हारे भाई को स्विंग करना नहीं आता है क्यों सही कहा न मेने??

    अमानत आपमें भाई को देख डर जाती है क्युकी ये बात सच थी की उसे स्विंग नहीं आता था,

    अमानत, ” व्योम…. व्योम् हट जा वहा से क्या कर रहा है वहा पर हट जा… देखो तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे मेरे भाई को छोड़ दो उसने क्या ही बिगड़ा है तुम्हरा मेरे भाई को बक्श दो तुम जो बोलोगे वो करुँगी मे पर मेरे भाई को छोड़ दो pls..!!!

    रिशाल अग्निहोत्री, ” तो ये हुई न बात अब बानी हो तुम असली बहन.. चलो अभी के लिए तो तुमने अपने भाई की जान बचा ली अब बस देखना है की और कितने देर बचा पाती हो.. मेरी जान अब चलो अंदर जाओ मे अभी आता है कार पार्क कर के फिर मे तुम्हे बताता हु की आगे करना क्या है….!!!!

    अमानत को तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की ये उसकी साथ हो क्या रहा है आखिर ये सब क्यों.. ये है कौन जो उसकी साथ ऐसा सब कर रहा है इसकी तो कोई दुश्मनी भी नहीं है अचानक कहीं से आकर मेरे साथ ये बर्ताव क्यों कर रहा है मेरा व्योम सही तो होगा न मेरी जान है वो उसकी बिना तो मे जीने का सोच भी नहीं सकती क्या करू कैसे बचाऊ खुद के भाई को… माँ पापा आप ही कुछ रास्ता दिखाई??? “”!!!!

    .. to be continue…

  • टी प्वाइंट का चक्कर

    टी प्वाइंट का चक्कर

    पढ़ने का समय : 8 मिनट ” मिस्टर भाटी कॉम यू ऑन द स्टेज ”

    बोलकर प्रोफेसर दयानन्द, प्रोफेसर विश्वनाथ भाटी का स्वगत किए थे। पहले सभी प्रोफेसर्स को बारी बारी से बोलना था। लास्ट में सभी बच्चों को प्रिंसिपल मैम संबोधन करने वाली थीं।

    प्रोफेसर भाटी अपने जगह से उठकर माइक के पास आते हैं।और बोलते हैं।

    ” जय श्री कृष्ण बच्चो ”

    स्टूडेंटस के भीड़ भी एक साथ बोलते हैं।

    ” जय श्री कृष्ण”

    प्रोफेसर भाटी आगे बोलना स्टार्ट किए थे।

    ” तो मेरे बच्चों,जैसा की आपको बताया गया है।अभी अभी आप सब को प्रोफेसर दयानन्द सर बता रहे थे। की भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिन मनाने के बारे में, हमारे कॉलेज ने फैसला लिया है। कि अपने कॉलेज में उस दिन पुजा पाठ भजन सांस्कृतिक कार्यक्रम  और श्री कृष्ण रचित लीलाओं का नाट्य  प्रदर्शन कर दिखाया जाना है। जिसमें आप सब लोग भी सहभागी बनेंगे। आप लोग वह लीला मंचन देख और सुन कर श्री कृष्ण के लीलाओं को आप अपने जिवन में उतारेंगे और उनके द्वारा दिए गए उपदेशों को अपने दोस्तों मित्रों के साथ शेयर करेंगे। इन्ही बातों के साथ हम अपनी  वानी को विराम देते हैं। धन्यवाद बच्चों।”

    इसी के साथ एक बार फिर तालियों के गर गड़गड़ाहट से पुरा मीटिंग हॉल गुंज उठता है। अब फिर से माइक प्रोफेसर दयानन्द जी के हांथ में थे। और वो फिर से बोलना स्टार्ट कर चुके थे।

    ” हां तो बच्चो, अभी आप लोग प्रोफेसर भाटी को सुन रहे थे। मुझे आशा नहीं उम्मीद है कि ,आप सभी उनके बताए बातों पर गौड़ करेंगे।”

    सभी स्टूडेंट्स के तरफ देखते हुए पुछते हैं।

    ” उनके बातों पर गौड़ करेंगे ना बच्चों?”

    सभी स्टूडेंट्स एक साथ बोलते हैं।

    “जी सर।”

    फिर प्रोफ़ेसर दयानन्द बोलते हैं।

    ” अब मैं आप लोगों के बीच, प्रोफेसर शास्त्री आयेंगे और अपनी बात को रखेंगे।”

    एक बार फिर सारा हॉल तालियों से गुंज उठता है। प्रोफेसर शास्त्री जी आते हैं। और अपने हांथ में  माइक लेकर बोलना स्टार्ट कर देते हैं।

    इधर शीला चांदनी राधा और रूपा कमल को लिए मीटिंग हॉल के रास्ते पर चल रहे होते हैं। सभी सहेलियों के चेहरे पर चिन्ता की लकीर साफ झलक रही थी। सभी के मन में खुशी भी थी की अब सब कुछ नोर्मल हो गयी थी। या प्रिंसिपल मैम से मिलने के बाद सब कुछ ठीक हो जाने वाली  थी। कमल के हाल की बात करें तो, उसका हाल बिल्कुल भी ठीक नहीं था। वो तो यही सोच सोच कर घबरा रहा था। की जब उसे प्रिंसिपल मैम के पास लेकर जाया जायेगा, तो फिर क्या होगा उसके साथ। उसको सारा कॉलेज के सामने बदनामी उसके दोस्तों के बीच में बेइज्जती उसके मम्मी पापा के बदनामी की बहुत चिंता होने लगी थी। भाई जब तुम्हे ये सब की चिन्ता थी। तो पहले ना सोचना था, की हम ये सब कर्म ना करें।जिससे हमारी इतनी बदनामी हो। उस टाइम तो बहुत बड़ा हिरो बन रहा था। की मेरे बढ़कर कोई हिरो है हीं नही इस दुनियां में,जब कर्म किया है तो फल भी तो मिलेगा। लेकिन उसके दिमाग में एक खुराफात आइडिया भी आता है। कि इन सब से अपने आप को छुड़ा कर भाग जायें। कहते हैं ना, जब काल सर पे नाचने लगता है।तो बुद्धी का विनाश हो जाता है। यही सब कमल के साथ अभी हो रहा था। शीला और चांदनी कमल को पकड़े हुए चल रहे हैं। की तभी एका एक जोरदार झटके के साथ,कमल दोनो से अपना हांथ झटक कर  छुड़ा लेता है। और जोर से दोनो को धक्का दे कर गिरा देता हैं। और भागने लगता है।

    ” पकड़ो राधा उसे ”

    चांदनी जो कमल के धक्के खा कर सड़क पर गिरी थी। जोर से बोली थी ।

    ” पकड़ो पकड़ो भागने ना पाये।”

    शीला भी नीचे पड़े पड़े हीं बोली थी। रूपा और राधा जो थोड़ा पिछे पिछे चल रही थी। कमल को भागते हुए देखी तो उसे दौड़कर पकड़ना चाहा पर उसे भी कमल झटक कर  भाग गया था। शीला उठकर खड़ी हो गई थी। चांदनी भी उठ गई थी।

    ” चलो दौड़कर पकड़ते हैं। कितना दूर भागेगा।”

    शीला बोली और दौड़ने लगी

    ” चोट लगा है उसे, ज्यादा तेज नहीं भाग सकता है। हम पकड़ लेंगे उसे।”

    चांदनी दौड़ते हुए बोली थी। राधा और रूपा भी कमल को पकड़ने के लिए सरपट दौड़ने लगी थी।

    ” इस बार पकड़ाया तो  छोडूंगी नहीं उसे, बीना हांथ पांव तोड़े।”

    रूपा गुस्से में दांत पीस कर जोर से बोली थी।

    ” यह सब मेरी वजह से हुआ है। हमने ध्यान नहीं दिया उसपर और वो भाग गया।”

    राधा अपने आप को ब्लेम करते हुए रूआंसी आवाज में बोली थी।

    ” तुम्हे खुदको कोसने की कोई जरूरत नही है राधा, इसमें हम सब की गलती है।”

    शीला राधा से बोली थी।

    ” हां दीदी ठीक कह रहीं है। आप अपने आप को दोशी नहीं मानिए।”

    बोल कर रूपा भी राधा को समझाने की कोशिश कर रही थी। बेचारा कमल ज्यादा दूर तक नहीं भाग पाया था। भागते भागते एक बिल्डिंग के पीछे दीवार से सटकर जोर जोर से सांस ले रहा था।कमल अपने पीछे चारो लड़कियों को दौड़ते हुए देख लिया था। यही सोचकर वो सभी लड़कियों के ध्यान डायवर्ट करने के लिए छुप गया था। ये सभी सहेलियां भी कमल का पीछा करते हुए उसके पीछे भाग रही थी। तभी शीला के पैर सड़क किनारे रखे एक पत्थर के टुकड़े से टकरा जाती है। वो गिर जाती है। ये देखकर सभी रूक जाती है। पर शीला उन लोगो को रूकने से मना करती है।

    ” तुम लोग मेरी फ़िक्र मत करो और उसे दौड़ कर पकड़ो, नहीं तो वो भाग जायेगा।”

    शीला अपना दर्द बर्दास्त करने के प्रयास करते हुए कराह कर बोली थी।

    ” नहीं दीदी तुम्हें चोट लगी है। और ऐसे मे…”

    चांदनी अभी अपनी  बात पूरी कर पाती इससे पहले हीं चांदनी के बात को बीच मे से हीं काटते हुए शीला बोली।

    ” नही मेरी छोड़ो तुम लोग और उसे पकड़ो तुम लोग नही तो वो भाग जायेगा।”

    ” दीदी आपको तो…”

    राधा भी अपनी बात पूरी नहीं कर पायी थी। कि शीला की चीखती हुई आवाज सभी के कानों में पड़ती है।

    ” उसे पकड़ना जरूरी है। मेरी चोट को नहीं।”

    तीनो सहेली समझ चुकी थी। की उसे क्या करना है। और वो सभी चल पड़े थे वे करने। समय भी देखिए ना कैसा खेल खेलता है ।शीला को चोट वहीं जाकर लगी थी। जिस बिल्डिंग के पीछे कमल छीपा था। वो बात अलग थी की वो अकेली थी। और चोटिल भी हो गयी थी। चांदनी राधा और रूपा दुबारा से दौड़ने लगी थी ! कमल इन लोगों को दौड़ते हुए आगे जाते हुए देख रहा था। वो सोच रहा था कि ये लोग दूर चले जायेंगे। तो हम निकल कर दुसरे रास्ते से कॉलेज से बाहर भाग जायेंगे। कहते हैं ना जो होता है अच्छे के लिए होता है। शीला वहीं थी जहां कमल छुपा हुआ था ।

    इधर चांदनी रूपा राधा भागते भागते दूर निकल गयी थी। और एक जगह पर जाकर तीनो सहेलियां रूक गयी थी। हुआ ये था की दौड़ते दौड़ते उन लोगों को एक टी प्वाइंट मिल गया था। वहां पर तीन रास्ता जा रहा था। एक रास्ते से तो वो तीनो आई हीं थी। और एक रास्ता इधर जा रहा था । तो दूसरा रास्ता उधर इसी लिए तीनो वही रूक गयी थी। की वो कौन रास्ते में जाये पता नहीं कमल कौन से रास्ते से भागा होगा और वो कौन रास्ता पकड़े यही कंफ्यूजन में तीनो सहेलियां वहीं रूक गयी थी।

    ” अब किधर जायें दीदी ?”

    राधा कंफ्यूज होते हुए चांदनी से पूछी थी।

    ” यहां पर कोई है भी नहीं, जिससे पूछ सकें की क्या कमल को देखा है।”

    रूपा भी चांदनी से बोली थी।

    ” कोई दिमाग लगाना पड़ेगा।”

    चांदनी दोनो के आंखों में झांकते हुए बोली थी।

    ” पर कैसे”

    थोड़ी देर सोचने के बाद चांदनी बोली थी कि।

    ”  हम कमल को अलग अलग ढूंढेंगे।  राधा तुम उस साइड जाओगी मैं इस तरफ जाती हूं। और रूपा तुम दीदी के पास जाओगी उन्हे चोट लगी हैं। तुम उनका ख्याल रखोगी।”

    ” पर दीदी आप लोग अकेले कैसे कमल को पकड़ोगी कही वो आप लोगों को?”

    रूपा बोलते बोलते रूक गयी थी।

    राधा बोली

    ” एक आइडिया है दीदी।”

    ” क्या आईडिया है। जल्दी बोलो।”

    राधा के तरफ देखते हुए चांदनी बोली थी। सही टाइम पर दिमाग भी सही चलता है सही लोगों का।

    ” हमलोग मोबाइल मे ग्रुप बना लेते है। सभी चारो सहेलियों को ग्रुप कॉल करना है। जिसे भी कमल दिखेगा वो कॉल करेगी और बतायेगी फिर हम लोग जल्दी से वहां पहुंच जायेंगे।”

    राधा अपनी पूरी प्लानिंग बताई थी।

    ” पर शीला दीदी को तो पता हीं नही है। ये बात तो वो कैसे कर पायेंगी कॉल।”

    रूपा बोली और दोनो को आशचर्य से देखने लगी थी।

    ” दीदी के पास तुम जा रही हो, तो तुम करोगी कॉल अगर तुन्हें कमल दिखा तो।”

    ” राधा तुम ग्रुप बनाओ जल्दी से टाइम नही है।”

    चांदनी दोनो को ऑर्डर देते हुए बोली थी। कुछ हीं देर में राधा मोबाइल में टाइप करके ग्रुप बना लेती है।

    ” बन गया दीदी ग्रुप।”

    .राधा चांदनी से बोली थी।

    ” ठीक है ओके तो तुम जाओ उधर।”

    चांदनी राधा को हांथ से एक तरफ इशारा करते हुए बोली थी। और बात आगे बढाते हुए फिर बोली

    ” मैं इधर जा रही हूं। और रूपा तुम दीदी के पास जाओ जल्दी से।”

    राधा और चांदनी एक साथ बोली थी।

    ” ठीक है दीदी मैं जा रही हूं।”

    रूपा बोलती है।और सभी अपने अपने रास्ते चल दिए थे।

    पढिए आगे कि कहानी अगले भाग में……प्यार एक अहसास…..

  • 💞💞प्यार का नशा पार्ट 6💞💞

    💞💞प्यार का नशा पार्ट 6💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    अब आगे,

    व्योम को इतना ख्याल नहीं रहता है कु वो बिच सड़क पर aa गया है और तभी एक रज रफ़्तार से आती हुई कार जो व्योम के बिलकुल नजदीक आ रही थी वो हॉर्न बजती है पर व्योम को सुनाई नहीं देता है क्युकी उसका ध्यान कहीं और ही रहता है |”

    अमानत जैसे ही पीछे मुर देखती है उसकी हाथो से सामान छूट कर नीचर गिर जाता है और वो भागती हुई व्योम के पास जाती है और उसे खींच कर साइड करते हुए उस कार वाले को सुनाने लगती है,

    कुछ आगे जाकर वो कार भी रुक जाती है,

    अमानत, ” तू ठीक है न व्योम ये ज्या कर रहा है अभी तुझे किछ हो जाता तो मे क्या करती अपना ख्याल रखना चाहिए न, तभी कार उन दोनों के सामने आ जाती है और उससे बाहर आते है Ra….

    अमानत खरी हो जाती है, रिशाल अग्निहोत्री को देख उसे उस बिच पर हुई बातें याद आ जाती है, अपर आज उसकी गलती थी इसीलिए वो बिना कुछ सोचे समझें Ra को काफ़ी कुछ कहती है.. आज उसके भाई का सवाल था वो चुप कैसे रह सकती थी, देखते ही देखते काफ़ी भीड़ जमा हो जाती है, और सभी रिशाल अग्निहोत्री को एक आम लड़की से बात सुनता हूआ देख हस देते है |”

    रिशाल अग्निहोत्री जो अमानत से माफ़ी मांगने की सोच रहा था इस इंसिडेंट के बाद वो अमानत से बेहद नफरत करने लगता है आखिर अमानत न उसे सबके सामने बेज्जत जो किया, वो अमानत से बदला लेने का सोच कहता है,

    रिशाल अग्निहोत्री, ” मुझे माफ कर दो गलती से हो गया, पर मे इसीलिए भरपाई करना चाहता हु, तुम दोनों मेरे साथ चलो मे तुम्हे कहीं ले जाना चाहता हु |”

    अमानत, ” कहा ले जाना है हमें कहीं नहीं जाना आप जेसो के साथ जिसे बस अपने पेसो का रोब दिखाना आता है खड़ूस…

    रिशाल अग्निहोत्री अपने gusse को काबू मे कर व्योम को और फिर उसकी बहन को कार मे बिठा कर जबरदस्ती ही ले जाता है |”

    अमानत, ” ये क्या मज़ाक लगा रखा है आपने आप हमारे साथ जबरदस्ती केसव कर सकते है एक तो गलती करते है ऊपर से उतना एगो….

    रिशाल कुछ नहीं कहता है और कुछ दुरी पर एक अच्छे से हॉस्टल मे व्योम का एडमिशन करवा देता है जहा व्योम को वो भेज कर अपने फार्महाउस मे कार जाकर रोक अमानत को उतार देता है,

    अमानत -” ये सब क्या है मेरा भाई …. आपने उसे कहा छोड़ दिया है ये सबा क्या कर रहे है आप?? “

    क्या करेगा रिशाल अमानत के साथ??

    आखिर रिशाल न क्यों किया व्योम और अमानत को अलग अलग??

    क्या Ra के मन मे चल रहा है कोई और ही सवाल क्या अमानत कर पायेगी Ra का सामना?? 

    आज के लिए बस इतना ही, कल फिर मिलेंगे कहानी के एक नए भाग के साथ, तब तक अपना ख्याल रखिये | आगे का कहानी जानने के लिए आपलोग इसलिए कहानी को आगे पढ़ते रहे और अपना सपोर्ट देते रहे.. 🙂

  • अबके बरस..💘💘

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    वाराणसी की गलियों में बारिश का अपना ही संगीत होता है—भीगी हुई मिट्टी की खुशबू, मंदिरों की घंटियों में घुलती बूंदों की लय, और गंगा के किनारे बहती ठंडी हवा। उसी शहर में, उसी बारिश के मौसम में, एक अधूरी प्रेम कहानी हर साल जन्म लेती थी… और हर साल अधूरी ही रह जाती थी।

     

    आरव को बारिश से प्यार था, लेकिन उससे भी ज़्यादा उस लड़की से, जो हर बरसात में अचानक उसकी जिंदगी में आ जाती थी—नैना।

     

    पहली बार वह उसे पाँच साल पहले सावन की पहली बारिश में मिला था। आरव अस्सी घाट पर भीगता हुआ खड़ा था, तभी उसने देखा—सफेद सलवार में एक लड़की, हाथों में चूड़ियाँ, बालों से टपकती बूंदें, और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान। वह जैसे बारिश को महसूस नहीं कर रही थी, बल्कि बारिश उसके अंदर उतर रही थी।

     

    “तुम भीग क्यों रहे हो?” नैना ने पूछा था।

     

    आरव ने हंसते हुए जवाब दिया था, “क्योंकि बारिश रुकने का इंतजार करना मुझे पसंद नहीं।”

     

    “और मुझे बारिश में खो जाना पसंद है,” उसने कहा था।

     

    उस दिन दोनों घंटों साथ बैठे रहे। बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं। जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। लेकिन शाम ढलते-ढलते, जब आरव ने उसका नंबर माँगा, नैना मुस्कुरा कर चली गई। बस इतना कहा—“अगर किस्मत हुई, तो अगले बरस मिलेंगे।”

     

    आरव को लगा था यह बस एक अजीब सी मुलाकात थी, जो खत्म हो गई। लेकिन अगले साल, ठीक उसी दिन, उसी जगह… नैना फिर मिल गई।

     

    “तुम आ गए,” उसने कहा।

     

    “तुम भी,” आरव ने जवाब दिया।

     

    उस दिन भी वही हुआ—लंबी बातें, हंसी, चाय, और फिर विदाई। कोई नंबर नहीं, कोई वादा नहीं। बस एक उम्मीद—“अबके बरस फिर मिलेंगे।”

     

    इस तरह चार साल बीत गए। हर साल सावन में वे मिलते, प्यार थोड़ा और गहरा होता, लेकिन कभी किसी ने इज़हार नहीं किया। जैसे दोनों को डर हो कि इज़हार करते ही यह जादू खत्म हो जाएगा।

     

    लेकिन पाँचवें साल कुछ बदल गया था।

     

    इस बार आरव ने तय कर लिया था—वह नैना को जाने नहीं देगा। वह उसे बताएगा कि वह उससे प्यार करता है, कि वह हर साल सिर्फ उसी के लिए जीता है, कि उसकी जिंदगी अब इन बरसाती मुलाकातों से कहीं ज़्यादा चाहती है।

     

    सावन की पहली बारिश हुई, और आरव अस्सी घाट पर पहले से खड़ा था। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। हर आती-जाती लड़की में उसे नैना दिख रही थी। लेकिन वह नहीं आई।

     

    घंटे बीत गए। बारिश तेज़ हो गई। घाट खाली होने लगा। आरव का दिल टूटने लगा।

     

    “शायद इस बार किस्मत नहीं थी…” उसने खुद से कहा।

     

    वह जाने ही वाला था कि पीछे से वही आवाज़ आई—“इतनी जल्दी हार मान गए?”

     

    आरव पलटा। नैना थी। भीगी हुई, मुस्कुराती हुई… लेकिन इस बार उसकी आँखों में कुछ अलग था—जैसे कोई दर्द, कोई झिझक।

     

    “तुम आई क्यों नहीं?” आरव ने शिकायत की।

     

    “आई तो हूँ,” उसने धीरे से कहा, “बस थोड़ी देर हो गई।”

     

    दोनों फिर साथ बैठे। लेकिन इस बार बातचीत में वो पुरानी हल्कापन नहीं था। कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा हवा में तैर रहा था।

     

    आखिरकार, आरव ने हिम्मत जुटाई—“नैना, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    “मत कहो,” उसने तुरंत कहा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कह दिया, तो शायद हम फिर कभी नहीं मिल पाएंगे।”

     

    आरव चुप हो गया। “क्या मतलब?”

     

    नैना ने गहरी सांस ली। “हर साल मैं यहाँ इसलिए आती थी क्योंकि मुझे लगता था कि कुछ चीजें अधूरी ही खूबसूरत होती हैं। अगर हम इन्हें पूरा करने की कोशिश करेंगे, तो ये टूट जाएंगी।”

     

    “लेकिन मैं अधूरा नहीं रहना चाहता,” आरव ने कहा। “मैं तुम्हारे साथ पूरा होना चाहता हूँ।”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए। “तुम समझ नहीं रहे…”

     

    “तो समझाओ,” आरव ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। “इस बार मैं तुम्हें ऐसे नहीं जाने दूंगा।”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद, नैना ने कहा—“मैं हर साल इसलिए आती थी क्योंकि मैं खुद से भाग रही थी। मेरी शादी तय हो चुकी थी… पाँच साल पहले ही।”

     

    आरव का दिल जैसे थम गया। “क्या?”

     

    “हाँ,” नैना ने सिर झुका लिया। “मैं हर साल यहाँ आती थी, क्योंकि तुम्हारे साथ वो जिंदगी जी पाती थी, जो मेरी नहीं थी।”

     

    “और अब?” आरव ने कांपती आवाज़ में पूछा।

     

    “अब मेरी शादी अगले महीने है,” उसने कहा।

     

    बारिश और तेज़ हो गई। जैसे आसमान भी इस कहानी का दर्द महसूस कर रहा हो।

     

    आरव ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से बोला—“क्या तुम खुश हो?”

     

    नैना चुप रही।

     

    “सच-सच बताओ,” आरव ने ज़ोर दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। “नहीं।”

     

    “तो फिर ये शादी क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि मैंने कभी हिम्मत नहीं की,” उसने कहा। “मैंने कभी अपने दिल की नहीं सुनी।”

     

    आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। “तो अब सुनो। अबके बरस, हम इस कहानी को अधूरा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है,” नैना ने कहा।

     

    “कुछ भी आसान नहीं होता,” आरव मुस्कुराया, “लेकिन प्यार अगर सच्चा हो, तो रास्ते खुद बन जाते हैं।”

     

    उस रात, दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं। डर, उम्मीदें, सपने—सब कुछ सामने रख दिया। और पहली बार, उन्होंने अपने प्यार को नाम दिया।

     

    अगले कुछ दिन कठिन थे। नैना ने अपने परिवार से बात की। आँसू, गुस्सा, सवाल—सब कुछ हुआ। लेकिन इस बार, वह पीछे नहीं हटी।

     

    “मैं अपनी जिंदगी खुद चुनना चाहती हूँ,” उसने दृढ़ता से कहा।

     

    आरव भी उसके साथ खड़ा रहा। हर मुश्किल में, हर डर में।

     

    और फिर, एक दिन… सब बदल गया।

     

    नैना के परिवार ने आखिरकार उसकी बात मान ली। शायद उन्होंने उसकी आँखों में सच्चाई देख ली थी, या शायद उन्होंने समझ लिया था कि प्यार को रोका नहीं जा सकता।

     

    सावन की आखिरी बारिश थी। अस्सी घाट फिर भीग रहा था। लेकिन इस बार, कहानी अलग थी।

     

    नैना लाल साड़ी में थी, और आरव उसके सामने खड़ा था—हाथों में वरमाला।

     

    “तो अबके बरस…?” आरव ने मुस्कुराते हुए पूछा।

     

    “अबके बरस,” नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “हमेशा के लिए।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। बारिश उनके चारों ओर नाच रही थी, जैसे आशीर्वाद दे रही हो।

     

    “तुम्हें पता है,” आरव ने धीरे से कहा, “मुझे हमेशा लगता था कि बारिश हमें मिलाने के लिए आती है।”

     

    “और अब?” नैना ने पूछा।

     

    “अब लगता है,” उसने उसका हाथ थामते हुए कहा, “बारिश हमारी कहानी का हिस्सा बन गई है।”

     

    नैना मुस्कुरा दी। “शायद इसलिए, क्योंकि हमने इस बार उसे अधूरा नहीं छोड़ा।”

     

    गंगा के किनारे, बारिश की बूंदों के बीच, दो दिल आखिरकार एक हो गए।

     

    और उस दिन के बाद, हर सावन सिर्फ एक मौसम नहीं रहा—वह उनकी प्रेम कहानी का उत्सव बन गया।

     

    अबके बरस, उन्होंने सिर्फ एक-दूसरे को नहीं पाया… बल्कि अपनी पूरी जिंदगी पा ली।

  • 💞💞प्यार का नशा.. 💞💞पार्ट 5

    💞💞प्यार का नशा.. 💞💞पार्ट 5

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    अमानत, ” नहीं अंकल ऐसा मत कहिये मे आपका एक एक रुपया दे दूंगी बस कुछ समय और दे दीजिये मुझे बस काम मिलने ही वाला है आप मेरी बात को समझने की कोशिश कीजिये, आप यहाँ से निकाल देंगे तो मे कहा जाउंगी pls अंकल ऐसा मत करिये!”

    मकान मलिक, ” मे तो ऐसा ही करूँगा बहुत झेल लोया तुम दोनों का नतक अब अभी के अभी निकलो मेरे घर से पेसो की तो उम्मीद ही नहीं है तुम फातिचरों से निकलो मेरे घर से,

        ये कहते हुए मकान मालिक अपन कुछ गुंडों को घर खाली करवाने का इशारा करता है,

    अमानत बार बार हाथ जोरती है की उसे कुछ समय दे दे वो कुछ न कुछ कर लेगी उसे जॉब मिल जायेगा पर उसकी एक भी नहीं सुनी जाती है,

    आखिर मे अमानत और उसकी छोटे से भाई व्योम लो सामान के साथ बाहर फेक दिया जाता है और वाह से जाने लो कह दिया जाता है,

    अमानत के पास और कोई भी ऑप्शन नहीं रहता है तो उसे जाना ही परता है पर कहा जाय क्या करें उसे कुछ भी समझ नहीं आता है, वो अपने भाई के सामने ये सब नहीं दिखा सकती थी इसीलिए वो कहती है की वो इससे भी अच्छे घर मे जाएगी और सब ठीक हो जायेगा व्योम को सब कुछ दिलवाने का उसका जो सपना था वो एक ही पल मे टूट जाता है |”

    बिच सरक पर चलते हुए उसके भाई को प्यास लग जाती है, अमानत के पास बोटोल नहीं रहता है जिस कारण ओ परेशान हो जाती है और यहाँ वहा ढूंढती है, तभी उसे एक ठेले वाला दिखाई देता है और वो उससे पानी लेके अपने भाई व्योन को पिलाती है |”

    अमानत, ” तू ठीक है न व्योम? “

    व्योम, ” हाँ दीदी मे ठीक हु आप जब तक हो मुझे क्या होगा पर मे आपके लिए बोझ सा हो गया हु न आपको मेरे लिए कितना परेशान होना परता है न पता नहीं मे कब आपकी मदद के लिए बनूँगा सायद अंकल न सही कहते है मे न कामचोर हु तभी तो मे आपके दूँखों का कारण बन गया हु |”

    अमानत, ” नहीं नहीं व्योम ऐसा कुछ भी नहीं है तू ये सब मत सोच देख भगवान जब एक दरवाजा बंद करते है न तो उन्होंने पहले ही दूसरा दरवाजा सोच रखा होता है, तू देखना सब सही हो जायेगा तू बस अपने मन से न ये सबा वहम निकल दे समझ!”

    व्योम, ” आप सच कह रही है दीदी!”

    अमानत, ” तो ज्या तेरी बहन क्या तुझसे झूठ कहेगी भला!!

    अमानत अपने भाई को समझा देती है पर उसे खुद कुछ समझ नहीं आता है की आखिर अब करें क्या,

    अमानत, ” अच्छा रुक तू यही पर मे तेरे लिए कुछ खाने को लाती हु तुझे भूख लग गया होगा न,

    व्योम दीदी की बात पर सर हिला देता है क्युकी उसे सच मे भूख लग गयी थी, अमानत जैसे ही कुछ खाने को लाने के लिए ठेले के पास जाती है की तभी व्योम की नजर सड़क पर परी एक बेलून पर जाता है और वो उसे लेने के लिए बिच सड़क पर चला जाता है |”

    … to be continue…

  • विडियो सबूत

    विडियो सबूत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक फैसला जिसमें सबकी सहमति होती है। जानेंगे इस भाग में उस फैसले की रहस्य चलिए चलें कहानी की ओर…
    ” अब इसके साथ बहस करने का कोई फायदा नहीं है दीदी, अब इसको प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलना चाहिए।”
    राधा सख्त होते हुए कठोर आवाज में बोली थी।
    ” हां इसे अब प्रिंसिपल मैम के पास हीं लेकर चलते हैं। अब वही इसके साथ जो भी करना होगा करेंगे।”
    शीला भी राधा के बात से सहमत होते हुए बोली थी। चार सहेलियों में दो के स्वभाव कड़क, तो दो के सरल व सॉफ्ट जैसा की हम लोगों ने देखा की कैसे रूपा और चांदनी बात बात पे हमेशा एक्शन व अटैक मोड में रहती थी। तो वहीं शीला और राधा का सॉफ्ट व नॉर्मल बिहेवियर रही है। रूपा और चांदनी को अगर फ्री छोड़ दिया जाए, तो वो दोनो कमल के हलक से जान निकाल ले।
    ” इसे ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं दीदी, इसने हमलोगों को बहुत हर्ट किया है दीदी।”
    रूपा के पैर रह रह कर फड़फड़ा जाती थी। जिसको रूपा कमल के पीठ और उसके कंधे पर अपनी लात मार कर शांत कर लेती थी।रूपा कमल के रीढ़ के हड्डियों पर अपनी लात की चोट जमाते हुए बोली थी।
    ” हां दीदी, रूपा ठिक कह रही है। इसे हम ऐसे हीं नहीं छोड़ सकते हैं। इसको एक ऐसी सजा दे देते हैं। कि जिसे ये ज़िन्दगी भर याद रखेगा, हमेशा दिमाग में रहेगा की किसी लड़की से पाला पड़ा था। और ये अपने जिवन में कभी भी किसी भी लड़की के तरफ अपनी आंख उठा कर नही देखेगा। और अपनी गंदी नजर किसी लड़की पर डालने से पहले हजार बार सोचेगा।”
    चांदनी अपनी लहजा सख्त रखते हुए सभी को देखकर बोली थी।
    ” मैं तो कहती हूं। इसके हांथ पैर तोड़ देते हैं।”
    रूपा गुस्से में आकर जोर से बोली थी। और कमल को लात मारकर गिरा दी थी। कमल जब हांथ पैर टूटने का बात सुना, तो उसका रूह कांप गया। वो अपने मन में बिना हांथ और बिना पैर के उसके जीवन कैसा होगा इमेजिन करने लगा था। की वो बिना पैर के चल फीर कैसे सकेगा, और बिना हांथ के खाना कैसे खा सकेगा या फीर कोई भी काम कैसे कर सकेगा। यही सब सोच कर उसका मन विचलीत हो रहा था। वो चाह रहा था की जल्द से जल्द यह मेटर उसके जिंदगी से खत्म हो जाए। सबने अपने तरफ से अपनी अपनी बात रख दी थी। अब सबकी नजर शीला पर हीं जा कर रूक गयी थी। क्योंकी फैसला उसे हीं करनी थी। सभी दोस्तों में सबसे बड़ी भी वही थी, और राधा चांदनी रूपा तीनो भी शीला के कोई भी बात या उसके लिए कोई भी फैसले को ना हीं कोई भी मना कर ती थी। और ना हीं कोई भी चुनौती देती थी।शीला जो भी स्टेन्ड लेगी उसे सभी को माननी पड़ेगी। ऐसा नही है की शीला की बात मानना इन सब की मजबूरी थी। बल्की ये सभी के दिल में शीला के लिये इज्जत और सम्मान थे। और विस्वास थे, की हमारी दीदी हमारे लिए कभी कुछ गलत नहीं करेंगे,या कुछ गलत होने देंगे। कोई भी रिश्ता एक दुसरे के इज्जत सम्मान देने विस्वास करने और एक दुसरे के फैसले में साथ देने से हीं रिश्ता सही और सुचारू रूप से चलती है।
    ” अब क्या किया जाए।”
    चांदनी अपनी बात पुरी भी नहीं की थी। की बीच में हीं चांदनी की बात काटते हुए कमल बोला
    ” मुझे माफ करदो।”
    और बोलते हुए चांदनी के पैर पर गीर कर नाक रगड़ने लगा था। जोर जोर से रोने लगा था। कमल के आंखों से आंसू के धार भी बहने लगा था।
    ” ठीक है तो, इसे लेकर प्रिंसिपल मैम के पास चलते हैं।
    शीला सभी के तरफ देखकर बोली थी।
    ” ठीक है दीदी, चलते हैं।”
    एक साथ तीनो सहेली बोलती है। और रूपा कमल को बाल पकर कर घसीटते हुए ले जाने की कोशिश करती है। बल्कि कुछ दूर घसीट भी देती है।
    पर चांदनी और शीला उसे ऐसा नहीं करने के लिए इशारे से रोकती है। और दोनो कमल के एक एक बांह पकर कर खड़ा होने में कमल का मदद करती है। और दोनो साइड से दोनो लड़की उसके दोनो बांह पकड़े हुए आगे बढ़ जाती है। उसके पिछे पिछे राधा और रूपा भी चल पड़ती है। शीला की पलटन मीटिंग हॉल के तरफ चल पड़ी थी। शीला को फैसला लेनी थी वह फैसला वो ले चुकी थी। उसके फैसले में उसके तीनो सहेलियों का भी समर्थन मिल चुकी थी।क्लास रूम से सभी बाहर जा चुके थे।
    मीटिंग हॉल
    मीटिंग हॉल में चहल पहल तेज हो गए थे ! सभी स्टूडेंट्स और सभी टीचर्स भी अपने अपने जगह लेकर बैठ चुके थे। प्रिंसिपल मैम भी स्टेज पर आ चुकी थी। मीटिंग की कार्यवाही भी सुरू हो गयी थी।
    उस में से एक टीचर मंच संचालन कर रहे थे। जिनका नाम था। प्रोफेसर दया नन्द। वे बारी बारी से प्रोफेसरों को माइक से आमंत्रीत कर रहे थे। और जिस प्रोफेसर के नाम वो माइक से अनाउंस करते थे। वो आकर अपना वक्तव्य देते थे।
    ” तो बच्चों, जैसा की आपको बताया गया है। की इस   बार होने वाले भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव हमारे अपने कॉलेज में धूम धाम से मनाया जाएगा। जिसमे तैयारी हम सभी टीचर्स के साथ साथ आप सभी स्टूडेंट्स को भी करनी है।”
    प्रोफेसर दयानन्द मंच से माइक पर बोल रहे थे। यह बात सुनकर नीचे स्टूडेंट के बीच भी काना फूसी स्टार्ट हो गयी थी।
    ” ये क्या बात हुई, इतनी सी बात बताने के लिए इतना बड़ा अरेंजमेंट किया गया है। ये बात तो सभी के क्लास रूम में भी तो बता सकते थे।”
    नीचे बैठे स्टूडेंट में से एक स्टूडेंट बोला था।
    ” हां, इसमें नई बात कौनसी है। कृष्ण जी का तो जन्मोत्सव तो हर साल मनाया जाता है। हमारे कॉलेज में नया क्या बोल दिया इन्होने।”
    एक दुसरे स्टूडेंट ने पहले स्टूडेंट के तरफ देखकर जवाब देते हुए बोला था।
    ” नया बस यही है की, कॉलेज में ईस बार मनाया जायेगा। सुना नही तुमने।”
    पहले स्टूडेंट बोलकर दूसरे स्टूडेंट को देख कर हंसने लगा था। साथ में और भी स्टूडेंट्स भी हंसने लगे थे।
    ” इस बार क्या, हर बार तो मनाया गया है। हमारे कॉलेज में कृष्ण जन्मोत्सव।”
    एक लड़की सभी के तरफ देखते हुए बोली थी।
    ” लेकिन दयानन्द सर ने इस बार बोले हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?”
    एक और लड़की बोल पड़ी थी। सभी लोग तरह तरह के बाते कर रहे थे। इसी बीच मंच से माइक पर अनाउंस होता है।
    ” अब मैं प्रोफेसर भाटी से आग्रह करूंगा। की वो माइक पर आयेंगे और भगवान श्री कृष्ण के जिवन लीला के बारे में हम लोगों को बतायेंगे और मानव जिवन में श्री कृष्ण के उपदेश की क्या भुमिका है।आयेंगे और हमें समझायेंगे। मिस्टर भाटी कॉम ऑन ऑफ द स्टेज। बच्चो जोरदार तालियों से सर का स्वागत करेंगे।”
    प्रोफेसर दयानन्द माइक हांथ मे लिए बोल रहे होते हैं।
    आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में….प्यार एक अहसास

  • मित्र…

    मित्र…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जिसका जैसा “चरित्र” होता है

    उसका वैसा ही “मित्र” होता है

    ”शुद्धता” होती है “विचारों” में

    “आदमी” कब “पवित्र”होता है

    फूलो में भी कीड़े पाये जाते हैं..,

    पत्थरों में भी हीरे पाये जाते हैं..

    बुराई को छोड़कर

    अच्छाई देखिये तो सही..,

    नर में भी नारायण पाये जाते हैं..

    मैं आप के साथ हूँ, ये मेरा भाग्य है

    पर आप मेरे साथ है, यह मेरा सौभाग्य है मित्र… ✍️✍️

  • सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

    सुना है बहुत ख़ुश है वो किसी और से मिलके…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट
    🎧 कहानी सुनें

    🎧 इस कहानी को सुनें

    अर्ज किया है,,

    बिछड़े हुए लोग जब बुरे दौर से मिलेंगे 

    दर्द जब भी मिलेंगे चारों ओर से मिलेंगे!!

    सुना है बहुत खुश है वो किसी ओर से मिल कर 

    आग तो तब लगेगी जब हम किसी ओर से मिलेंगे… 😎😎

  • मर क्यों नहीं जाते हो…??

    मर क्यों नहीं जाते हो…??

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    आखिर कह ही डाला उसने

     एक दिन…..

    इस कदर टूटे हो बिखर क्यो 

    नही जाती हो…..??

    कब तक निभाओगे ये 

    दर्द भरी जिंदगी…..??

    किसी रात खामोशी से मर

     क्यो नही जाती हो……?? 😭😭