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  • Part 2 मित्रता की पहली परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 2 — गुरुकुल के दिन और मित्रता की पहली परीक्षा

     

    गुरुकुल में कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी।

     

    अब ऐसा शायद ही कोई दिन गुजरता, जब दोनों एक साथ न दिखाई दें। सुबह सूरज निकलने से पहले उठना हो, नदी से जल भरकर लाना हो, आश्रम की सफाई करनी हो या गुरु सांदीपनि के सामने बैठकर शिक्षा ग्रहण करनी हो—दोनों हर काम साथ करते थे।

     

    हालाँकि दोनों के स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

     

    सुदामा शांत और गंभीर था। वह हर बात को सोच-समझकर करता था। उसे नियमों का पालन करना पसंद था। दूसरी ओर कृष्ण हर काम में मुस्कान ढूँढ लेते थे। उनके भीतर एक अलग ही चंचलता थी। लेकिन जब बात किसी अपने की आती, तो वही चंचल कृष्ण सबसे अधिक गंभीर हो जाते थे।

     

    एक सुबह सुदामा नदी से जल भरकर लौट रहा था। उसके हाथ में मिट्टी का घड़ा था। रास्ता थोड़ा फिसलन भरा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वह संभलते-संभलते जमीन पर गिर गया।

     

    घड़ा उसके हाथ से छूटकर टूट गया।

     

    सुदामा कुछ क्षण वहीं बैठा रह गया।

     

    उसे घड़े के टूटने का दुख कम था, लेकिन उसे डर था कि अब उसे आश्रम लौटकर क्या कहना होगा।

     

    तभी पीछे से कृष्ण की आवाज आई।

     

    “सुदामा!”

     

    सुदामा ने मुड़कर देखा। कृष्ण दौड़ते हुए उसके पास आ रहे थे।

     

    “तुम ठीक तो हो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ।”

     

    कृष्ण ने टूटे हुए घड़े की ओर देखा।

     

    “और यह?”

     

    “यह ठीक नहीं है,” सुदामा ने उदास होकर कहा।

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    सुदामा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं, मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर हँसी आ रही है। तुम ऐसे परेशान हो जैसे पूरे आश्रम का जल समाप्त हो गया हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “गुरु माता ने मुझे घड़ा संभालकर लाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तो चलो, नया घड़ा लेते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “अगर किसी ने पूछा कि पुराना घड़ा कैसे टूटा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तो सच बता देना।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता।”

     

    कृष्ण का चेहरा शांत हो गया।

     

    उन्होंने कहा, “सुदामा, सच बोलने के बाद मिलने वाली डाँट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन झूठ बोलने का बोझ मन पर बहुत समय तक रहता है।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    उसे लगा जैसे कृष्ण उससे उम्र में छोटे नहीं, बल्कि बहुत अधिक समझदार हों।

     

    दोनों वापस आश्रम आए और गुरु माता को सब बता दिया।

     

    गुरु माता ने पहले सुदामा को ध्यान से देखा, फिर कृष्ण को।

     

    “तुम दोनों ने सच बताया, इसलिए मैं नाराज़ नहीं हूँ। अगली बार सावधान रहना।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    आश्रम से बाहर आते ही कृष्ण ने कहा, “देखा? मैंने कहा था ना, सच बोलने से मन हल्का हो जाता है।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “लेकिन तुमने मुझे पहले ही डराना क्यों शुरू कर दिया था?”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “मैंने कब डराया?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे तुम सब कुछ पहले से जानते हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।

     

    “अगर मैं सब कुछ जानता होता, तो तुम्हारा घड़ा टूटने से पहले तुम्हें रोक देता।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उस दिन के बाद सुदामा ने महसूस किया कि कृष्ण केवल उसके मित्र नहीं थे। वह उसके जीवन में एक ऐसे साथी बनते जा रहे थे, जिनसे वह अपनी हर बात कह सकता था।

     

    लेकिन गुरुकुल का जीवन केवल हँसी और खेल का नाम नहीं था।

     

    वहाँ हर दिन कुछ नया सीखना पड़ता था।

     

    एक दिन गुरु सांदीपनि सभी शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे।

     

    उन्होंने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका धन, शक्ति या परिवार नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी पहचान उसके कर्म होते हैं।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, अगर कोई व्यक्ति बहुत गरीब हो, तो क्या लोग उसे हमेशा छोटा समझेंगे?”

     

    सुदामा अचानक चुप हो गया।

     

    उसे लगा जैसे यह प्रश्न उसके अपने मन का हो।

     

    गुरु सांदीपनि ने उत्तर दिया, “गरीबी किसी मनुष्य को छोटा नहीं बनाती। छोटा मनुष्य तब बनता है, जब उसके विचार छोटे हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा ने नजरें नीचे कर लीं।

     

    पाठ समाप्त होने के बाद कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम कुछ सोच रहे हो?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम जब भी दुखी होते हो, यही कहते हो।”

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “कृष्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम दोनों बहुत अलग हैं?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किस बात में?”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हारा परिवार बड़ा है। लोग तुम्हें प्रेम करते हैं। और मैं…”

     

    वह रुक गया।

     

    कृष्ण ने कहा, “और तुम मेरे मित्र हो।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में कौन बड़ा और कौन छोटा होता है?”

     

    सुदामा कुछ नहीं बोला।

     

    कृष्ण आगे बोले, “अगर तुम्हारे पास धन नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है। तुम्हारे पास एक सच्चा मन है, ज्ञान पाने की इच्छा है और अपने मित्र के लिए प्रेम है। क्या यह कम है?”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “तुम्हारी बातें सुनकर सब आसान लगने लगता है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “तो फिर तुम रोज मुझसे बातें किया करो।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    कुछ दिन बाद गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर चिंता थी।

     

    “आश्रम के लिए कुछ सूखी लकड़ियों की आवश्यकता है। जंगल से लकड़ियाँ लानी होंगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “हम दोनों जाएँगे।”

     

    सुदामा ने भी सिर हिला दिया।

     

    गुरु माता ने कहा, “जंगल थोड़ा दूर है। समय पर लौट आना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “चिंता मत कीजिए, माता।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि जब भी कृष्ण कहते हैं कि चिंता मत कीजिए, तब कुछ न कुछ जरूर होने वाला होता है।

     

    दोनों सुबह-सुबह जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते भर कृष्ण बातें करते रहे।

     

    कभी किसी पक्षी की आवाज की नकल करते, कभी पेड़ पर लगे फलों को देखकर अनुमान लगाते कि कौन सा फल मीठा होगा।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, हम लकड़ियाँ लेने जा रहे हैं या घूमने?”

     

    कृष्ण ने कहा, “दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं।”

     

    “लेकिन गुरु माता ने कहा था कि जल्दी लौटना है।”

     

    “तो जल्दी लौटेंगे।”

     

    “तुम्हारे लिए जल्दी का मतलब क्या है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जब तुम परेशान होने लगो।”

     

    सुदामा ने सिर पकड़ लिया।

     

    जंगल पहुँचने के बाद दोनों सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ ही समय में उनके पास काफी लकड़ियाँ हो गईं।

     

    सुदामा ने कहा, “अब चलें?”

     

    कृष्ण ने कहा, “बस थोड़ी और।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने यही बात आधा समय पहले भी कही थी।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी आसमान में अचानक काले बादल छा गए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, मुझे लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कुछ ही क्षणों में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों ने लकड़ियों को एक साथ बाँधा और पेड़ों के बीच सुरक्षित जगह ढूँढने लगे।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कुछ समय बाद दोनों को एहसास हुआ कि वे आश्रम का रास्ता भूल चुके हैं।

     

    सुदामा घबरा गया।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने कहा, “कुछ नहीं होगा।”

     

    “लेकिन हमें रास्ता नहीं पता।”

     

    “तो रास्ता ढूँढेंगे।”

     

    “और अगर रात हो गई?”

     

    “तो सुबह होने तक इंतजार करेंगे।”

     

    “और अगर कोई जंगली जानवर आ गया?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम एक ही बार में इतनी सारी चिंताएँ कहाँ से ढूँढ लेते हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “क्योंकि तुम बिल्कुल चिंता नहीं करते।”

     

    कृष्ण कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले, “सुदामा, चिंता और सावधानी में अंतर होता है। सावधान रहना जरूरी है, लेकिन हर समय डरते रहना हमें कमजोर कर देता है।”

     

    बारिश लगातार हो रही थी।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा काँपने लगा।

     

    कृष्ण ने अपनी ओर का कपड़ा उसके कंधों पर रख दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, तुम्हें ठंड लगेगी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मित्रता में हिसाब नहीं रखा जाता।”

     

    सुदामा कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली और उनके ऊपर की कुछ सूखी शाखाएँ टूटकर नीचे गिर गईं।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    अब जंगल और भी डरावना लगने लगा।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “कृष्ण, मुझे डर लग रहा है।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    धीरे-धीरे शाम होने लगी।

     

    आसमान अंधेरा हो गया।

     

    आश्रम में गुरु सांदीपनि और गुरु माता दोनों चिंतित थे।

     

    “दोनों अभी तक लौटे नहीं,” गुरु माता ने कहा।

     

    गुरु सांदीपनि ने कुछ शिष्यों को बुलाया।

     

    “तुम लोग उन्हें खोजने जाओ।”

     

    उधर जंगल में कृष्ण और सुदामा एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    सुदामा ने अपना सिर पेड़ से टिकाया।

     

    “अगर हम आज वापस नहीं पहुँचे तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हम पहुँचेंगे।”

     

    “तुम्हें इतना विश्वास कैसे है?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम मेरे साथ हो।”

     

    सुदामा की आँखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कुछ देर बाद उसने कहा, “और मैं इसलिए नहीं डर रहा क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो फिर हम दोनों ठीक हैं।”

     

    रात बीतती रही।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।

     

    सुबह होने के कुछ समय बाद आश्रम के शिष्यों की आवाज सुनाई दी।

     

    “कृष्ण! सुदामा!”

     

    सुदामा तुरंत खड़ा हो गया।

     

    “वे हमें ढूँढ रहे हैं!”

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि स्वयं वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने दोनों को देखा।

     

    “तुम दोनों ठीक हो?”

     

    कृष्ण और सुदामा ने एक साथ सिर हिलाया।

     

    गुरु सांदीपनि ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “तुम दोनों पूरी रात यहाँ रहे?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    गुरु ने पूछा, “डर नहीं लगा?”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराकर कहा, “लगा था… लेकिन मैं अकेला नहीं था।”

     

    कृष्ण ने भी सुदामा की ओर देखा।

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    उस दिन आश्रम लौटते समय सुदामा के मन में एक बात हमेशा के लिए बस गई।

     

    जीवन में कितनी भी कठिन राह क्यों न हो…

     

    अगर साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो डर आधा हो जाता है।

     

    लेकिन सुदामा नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में उसकी और कृष्ण की मित्रता को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।

     

    एक ऐसी घटना…

     

    जिसे वर्षों बाद भी सुदामा भूल नहीं पाएगा।

     

    और शायद वही घटना उनके बीच की मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर देगी।

     

    क्रमशः…

  • श्री कृष्ण ओर सुदामा की मित्रता की कहानी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अध्याय 1 — दो मित्रों की पहली मुलाकात

    बहुत समय पहले की बात है। भारत की धरती पर अनेक छोटे-बड़े राज्य बसे हुए थे। उन्हीं दिनों दो ऐसे बालक थे, जिनकी जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। एक ओर थे द्वारका के भावी नायक, वसुदेव और देवकी के पुत्र श्री कृष्ण, जिनका बचपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता था। दूसरी ओर था एक साधारण ब्राह्मण बालक—सुदामा।

     

    सुदामा का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास धन-दौलत नहीं थी, न ही सुंदर वस्त्र और न ही कोई बड़ा घर। लेकिन उसके पास एक बहुत बड़ी चीज थी—ज्ञान पाने की इच्छा और एक सच्चा, निर्मल हृदय।

     

    जब सुदामा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माता-पिता ने सोचा कि उसे शिक्षा के लिए एक अच्छे गुरु के आश्रम में भेजना चाहिए। उस समय गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ बच्चों को जीवन जीना, मेहनत करना, बड़ों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना भी सिखाया जाता था।

     

    इसलिए एक दिन सुदामा अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर गुरु सांदीपनि के आश्रम की ओर चल पड़ा।

     

    उसके पास सामान के नाम पर बहुत कम चीजें थीं। एक छोटा सा कपड़े का थैला, पहनने के लिए साधारण वस्त्र और मन में ज्ञान पाने का सपना।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचा।

     

    आश्रम प्रकृति के बीच बसा हुआ था। वहाँ अनेक बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कोई जल भर रहा था, कोई लकड़ियाँ ला रहा था और कोई गुरु के सामने बैठकर पाठ सीख रहा था।

     

    सुदामा ने आश्रम में प्रवेश किया और गुरु सांदीपनि के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए।

     

    “गुरुदेव, मैं आपके पास शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि ने उस दुबले-पतले बालक को ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है, पुत्र?”

     

    “सुदामा।”

     

    “और तुम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हो?”

     

    सुदामा ने बिना देर किए उत्तर दिया, “ताकि मैं ज्ञानवान बन सकूँ और जीवन में सही मार्ग पर चल सकूँ।”

     

    गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

     

    “ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं मिलता, सुदामा। ज्ञान पाने के लिए मन को भी सच्चा रखना पड़ता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं प्रयास करूँगा, गुरुदेव।”

     

    उसी दिन सुदामा को आश्रम में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    उस शाम वह अपने नए स्थान को समझने की कोशिश कर रहा था। बहुत से बालक आपस में पहले से मित्र थे। कोई खेल रहा था, कोई बातें कर रहा था। सुदामा थोड़ा संकोची स्वभाव का था। वह चुपचाप एक पेड़ के पास बैठ गया।

     

    तभी उसके पास एक बालक आया।

     

    उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी आँखों में शरारत भी थी और एक अजीब सी अपनापन भी।

     

    उसने सुदामा के पास बैठते हुए पूछा, “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “नाम?”

     

    “सुदामा।”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    “मैं कृष्ण हूँ।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम भी आज ही आए हो?”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “नहीं, लेकिन हर दिन नया ही लगता है।”

     

    सुदामा को उसका उत्तर समझ नहीं आया, लेकिन वह मुस्कुरा दिया।

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने सुदामा के कपड़ों की ओर देखा। वे साधारण और पुराने थे। सुदामा को लगा कि शायद अब यह बालक भी उसका मजाक उड़ाएगा, जैसे कई बच्चे कभी-कभी करते थे।

     

    लेकिन कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपने पास रखा फल निकालकर सुदामा की ओर बढ़ाया।

     

    “भूख लगी है?”

     

    सुदामा ने संकोच से कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें नहीं चाहिए तो मैं अकेले खा लूँगा। लेकिन फिर मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

     

    सुदामा उनकी बात सुनकर हँस पड़ा।

     

    “तुम अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत चुप रहते हो,” कृष्ण ने तुरंत कहा।

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    शायद उसी छोटी सी हँसी के साथ एक ऐसी मित्रता की शुरुआत हुई, जो समय के साथ और गहरी होने वाली थी।

     

    अगले दिन से दोनों का साथ बढ़ने लगा।

     

    सुबह जल्दी उठना, नदी से जल लाना, आश्रम की सफाई करना, गुरु के पास बैठकर शिक्षा लेना—धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ करने लगे।

     

    कृष्ण किसी भी काम को बोझ की तरह नहीं लेते थे।

     

    एक दिन गुरु माता ने सभी बालकों से कहा कि आश्रम के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ लेकर आनी हैं।

     

    कई बालक अपने-अपने साथियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा से कहा, “चलो, हम भी चलते हैं।”

     

    सुदामा ने लकड़ियाँ बाँधने के लिए रस्सी उठाई और दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में कृष्ण कभी पेड़ों को देखते, कभी पक्षियों की आवाज सुनते और कभी कोई मजेदार बात कह देते।

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हर समय इतने खुश कैसे रहते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि दुख आने से पहले ही अगर हम दुखी हो जाएँ, तो खुशी कब मिलेगी?”

     

    सुदामा कुछ देर तक उस बात को सोचता रहा।

     

    जंगल पहुँचकर दोनों लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

     

    कुछ समय बाद अचानक आसमान में बादल घिर आए।

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    सुदामा ने चिंतित होकर कहा, “कृष्ण, हमें जल्दी वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    सुदामा ने अपने छोटे से कपड़े के थैले को सीने से लगा लिया।

     

    कृष्ण ने पूछा, “उसमें क्या है?”

     

    सुदामा थोड़ा घबरा गया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने शरारत से कहा, “कुछ नहीं है तो इतनी मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है?”

     

    सुदामा चुप रहा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “अच्छा, ठीक है। मत बताओ।”

     

    कुछ देर बाद सुदामा ने धीरे से कहा, “मेरी माँ ने रास्ते के लिए थोड़े से चने दिए हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो हम दोनों मिलकर खाएँगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन ये बहुत कम हैं।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    सुदामा ने थैले से चने निकाले और दोनों ने उन्हें बाँटकर खा लिया।

     

    उस दिन पहली बार सुदामा ने महसूस किया कि उसके सामने बैठा यह मित्र दूसरे लोगों से अलग है।

     

    कृष्ण ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि वह गरीब क्यों है।

     

    कभी उसके कपड़ों पर हँसे नहीं।

     

    कभी यह नहीं कहा कि उसके पास क्या नहीं है।

     

    वह बस उसके साथ रहते थे।

     

    बारिश कम हुई तो दोनों आश्रम लौट आए।

     

    लेकिन आश्रम पहुँचने पर पता चला कि गुरु माता चिंतित थीं।

     

    “तुम दोनों कहाँ रह गए थे?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    “माता, जंगल में बारिश आ गई थी।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “गलती मेरी है। मैं रास्ते में बातें करता रहा और हमें देर हो गई।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे पता था कि कृष्ण ऐसा क्यों कह रहे हैं।

     

    वह अपने मित्र को डाँट से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “नहीं, माता। गलती हम दोनों की है।”

     

    गुरु माता ने दोनों को देखा।

     

    फिर मुस्कुराते हुए कहा, “मित्रता में एक-दूसरे का साथ देना अच्छी बात है, लेकिन सच्चाई से दूर नहीं जाना चाहिए।”

     

    दोनों ने सिर झुका दिया।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण उसके पास ही लेटे हुए थे।

     

    सुदामा ने धीरे से पूछा, “कृष्ण?”

     

    “हूँ?”

     

    “अगर एक दिन हम दोनों अलग हो गए तो?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “सच्चे मित्र पास रहने से मित्र नहीं होते, सुदामा। अगर मन में प्रेम और विश्वास हो, तो दूरी भी मित्रता को अलग नहीं कर सकती।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मत भूलना।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैं भी नहीं भूलूँगा।”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में जीवन दोनों को कितनी दूर ले जाएगा।

     

    उसे यह भी नहीं पता था कि एक दिन यही कृष्ण एक महान राजा के रूप में पहचाने जाएँगे और वह स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताएगा।

     

    लेकिन उस समय…

     

    वे दोनों केवल दो बालक थे।

     

    एक साधारण ब्राह्मण पुत्र।

     

    और दूसरा उसका प्यारा मित्र कृष्ण।

     

    अगली सुबह सूर्य की किरणों के साथ दोनों फिर से आश्रम के कार्यों में लग गए।

     

    उन्हें नहीं पता था कि उनकी मित्रता की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि दोनों को एक ऐसा कार्य सौंपने वाले थे, जो उनकी दोस्ती को और गहरा कर देगा।

     

    और उस दिन सुदामा को पहली बार समझ आएगा कि कृष्ण केवल एक अच्छे मित्र ही नहीं…

     

    बल्कि एक ऐसे साथी हैं, जो हर कठिन समय में उसका हाथ थामकर खड़े रहेंगे।

     

    क्रमशः…

  • श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग = 1 “जिस दिन नंदलाल ने गोकुल में कदम रखा”

    🌸 एक ऐसी शुरुआत, जहाँ जन्म लेता है सिर्फ़ एक बालक नहीं… बल्कि पूरी दुनिया का विश्वास! 🌸

    गोकुल की उस सुबह में कुछ अलग ही बात थी। सूरज रोज़ की तरह ही निकला था, यमुना की लहरें भी रोज़ की तरह ही बह रही थीं, गायों की घंटियाँ भी वही मधुर संगीत सुना रही थीं, लेकिन फिर भी वातावरण में एक अनजानी-सी खुशी तैर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी बहुत बड़े उत्सव की तैयारी कर रही हो। पेड़ों पर बैठे पक्षी बिना किसी कारण चहचहा रहे थे, फूल अपनी खुशबू पहले से कहीं अधिक बिखेर रहे थे और यमुना का जल भी जैसे आज कुछ ज्यादा ही शांत था। किसी को पता नहीं था कि आज से संसार की एक ऐसी कथा शुरू होने वाली है। जिसे युगों-युगों तक प्रेम, भक्ति और धर्म के नाम से याद किया जाएगा। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के जीवन की सबसे कठिन रात चल रही थी। कंस का अत्याचार अपनी सीमा पार कर चुका था। देवकी की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक अद्भुत विश्वास भी था। उन्हें पता था कि उनके गर्भ में पल रहा बालक साधारण नहीं है। वही बालक कंस के अत्याचार का अंत करने वाला था। आधी रात का समय हुआ। चारों ओर घना अंधकार था। अचानक जेल की कोठरी दिव्य प्रकाश से भर उठी। देवकी और वसुदेव ने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान श्रीहरि का दिव्य रूप प्रकट हुआ है। उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जिसे देखकर भय भी जैसे अपना रास्ता भूल जाए। भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे उन्हें लेकर गोकुल जाएँ और वहाँ नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस लौट आएँ। वसुदेव ने अपने नवजात पुत्र को टोकरी में रखा और जैसे ही जेल से बाहर निकलने का प्रयास किया, चमत्कार होने लगे। जिन दरवाजों पर भारी पहरे थे, वे अपने आप खुलते चले गए। पहरेदार गहरी नींद में सो गए। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय भी उस बालक के मार्ग में झुक गया हो। वसुदेव अपने सिर पर नन्हे कृष्ण को लेकर यमुना की ओर बढ़े। उस रात बारिश बहुत तेज़ थी। बादल गरज रहे थे और बिजली आकाश को चीर रही थी। वसुदेव के कदम डगमगा रहे थे, लेकिन उनके मन में केवल एक ही बात थी।

     

    “मुझे अपने लाल को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।” जैसे ही वे यमुना के पास पहुँचे, नदी उफान पर थी। वसुदेव ने कृष्ण को और मजबूती से थाम लिया और धीरे-धीरे पानी में उतर गए। तभी एक अद्भुत दृश्य हुआ। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बाल कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। बारिश की बूंदें कृष्ण तक पहुँचने से पहले ही उस दिव्य छत्र पर गिरने लगीं। यमुना भी जैसे अपने आराध्य को पहचान गई। उसका जल धीरे-धीरे शांत होने लगा। वसुदेव आगे बढ़ते गए और अंततः गोकुल पहुँच गए। वहाँ नंद बाबा के घर सब लोग गहरी नींद में थे। वसुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा माता के पास सुलाया और वहाँ जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर वापस मथुरा लौट गए। किसी को पता तक नहीं चला कि उसी रात गोकुल की धरती पर स्वयं प्रेम ने जन्म लिया है। सुबह होते ही गोकुल में अचानक शंख, नगाड़े और ढोल बजने लगे। नंद बाबा के घर पुत्र जन्म की खबर फैल चुकी थी। “नंद के घर आनंद भयो!” की आवाज़ हर गली में गूँज उठी। गोपियाँ अपने घरों से दौड़ती हुई नंद भवन की ओर आने लगीं। किसी के हाथ में दही था।

     

     

    किसी के हाथ में मक्खन, कोई फूल लेकर आई थी तो कोई बालक के लिए नए वस्त्र। यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लेकर बस निहारती ही रह गईं। उनके लिए संसार में उस समय सबसे सुंदर कोई था तो वह उनका नन्हा कान्हा था। बाल कृष्ण की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। यशोदा ने प्यार से उनके माथे को चूमा और कहा, “मेरे लाल, तू हमेशा ऐसे ही मुस्कुराता रहना।” उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वे अपना बेटा समझकर गोद में झुला रही हैं, वही आने वाले समय में लाखों दिलों का सहारा बनने वाला है। गोकुल में उत्सव शुरू हो गया। नंद बाबा ने पूरे गाँव में मिठाइयाँ बँटवाईं। गोप-ग्वाल बालक नाचने लगे। गोपियाँ गीत गाने लगीं। हर तरफ़ रंग, फूल और खुशियाँ थीं। लेकिन इसी खुशी के बीच मथुरा में कंस को जैसे किसी अनहोनी का एहसास हो गया। उसे खबर मिली कि देवकी के घर आठवीं संतान का जन्म हो चुका है। कंस तुरंत जेल की ओर दौड़ा। उसके चेहरे पर क्रोध था। उसने नवजात कन्या को देखा और उसे समाप्त करने के लिए उसे ऊपर उठाया। लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट हो गई। उसने कंस को चेतावनी दी कि “जिससे तू डरता है, वह जन्म ले चुका है और वह तेरे अंत का कारण बनेगा।” कंस के चेहरे का रंग उड़ गया। अब उसका डर और भी बढ़ गया। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे गोकुल और आसपास के सभी गाँवों में जन्मे नवजात बालकों पर नज़र रखें। उधर गोकुल में कृष्ण की बाल लीलाएँ शुरू हो चुकी थीं। कोई उन्हें नंदलाल कहता। 

     

    कोई कान्हा, कोई माखनचोर, तो कोई लड्डू गोपाल। यशोदा मैया का पूरा संसार ही अपने कान्हा के इर्द-गिर्द घूमने लगा। कृष्ण धीरे-धीरे बड़े होने लगे। उनकी शरारतें पूरे गोकुल में प्रसिद्ध होने लगीं। कभी वे किसी के घर से माखन चुरा लेते, कभी गोपियों की मटकी छिपा देते, कभी ग्वाल-बालों के साथ मिलकर ऐसी शरारत करते कि पूरा गाँव हँसने लगता। एक दिन कई गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास पहुँचीं। “मैया! आपका कान्हा हमारे घर से माखन चुरा ले जाता है।” यशोदा ने कृष्ण को देखा और पूछा, “कान्हा, तूने माखन चुराया?” कृष्ण ने मासूमियत से सिर हिलाया, “नहीं मैया!” एक गोपी तुरंत बोली, “मैया, इसके मुँह पर माखन लगा है!” कृष्ण ने तुरंत अपना मुँह पोंछा और बोले, “मैया, ये तो बिल्ली ने लगाया होगा!” यह सुनते ही सब गोपियाँ हँस पड़ीं। यशोदा भी अपनी हँसी रोक नहीं पाईं। लेकिन कान्हा की शरारत यहीं नहीं रुकी। अगले दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी थी। ग्वाल-बाल एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते गए और सबसे ऊपर कृष्ण जा पहुँचे। उन्होंने मटकी उतारी और सबको माखन बाँट दिया। कुछ माखन बंदरों को भी खिला दिया। तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

     

    “कान्हा!” कृष्ण ने पलटकर देखा। सामने यशोदा मैया खड़ी थीं। सब ग्वाल-बाल भाग गए, लेकिन कृष्ण वहीं खड़े रहे। यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “आज तो तुझे पकड़ ही लिया।” कृष्ण ने मासूम बनकर कहा, “मैया, मैंने क्या किया?” यशोदा बोलीं, “माखन चोरी!” कृष्ण मुस्कुराकर बोले, “मैया, माखन तो आपका है, मैं भी तो आपका हूँ… फिर चोरी कैसी?” यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने दिखावे के लिए डाँटते हुए कहा, “बहुत बातें बनाने लगे हो!” कृष्ण की आँखों में शरारत चमकी। वह भागने लगे और यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं। पूरा गोकुल इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगा। लेकिन कृष्ण की हर लीला के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य छिपा था। वे सिर्फ़ माखन नहीं चुराते थे, वे तो अपने भक्तों के हृदय चुरा लेते थे। उनका बचपन जितना मासूम था, उतना ही अद्भुत भी। गोकुल के लोगों को अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके बीच पल रहा यह नन्हा बालक आगे चलकर कितनी बड़ी-बड़ी लीलाएँ करने वाला है। एक दिन गोकुल के बच्चों ने कृष्ण से शिकायत की कि उन्होंने मिट्टी खाई है। वे दौड़कर यशोदा मैया के पास गए और बोले, “मैया! कान्हा ने मिट्टी खाई है।” यशोदा ने कृष्ण से पूछा, “क्या तूने मिट्टी खाई?” कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं मैया, मैंने कुछ नहीं खाया।” लेकिन बच्चों ने ज़ोर देकर कहा, “हमने अपनी आँखों से देखा है!” यशोदा ने कहा, “कान्हा, मुँह खोल!” कृष्ण ने धीरे से अपना मुँह खोला। और तभी यशोदा मैया स्तब्ध रह गईं। उन्हें कृष्ण के मुँह में मिट्टी नहीं, बल्कि पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। आकाश, चंद्रमा, सूर्य, पर्वत, नदियाँ, धरती—सब कुछ उसी छोटे-से मुँह में दिखाई दे रहा था। यशोदा की आँखें आश्चर्य से भर गईं। एक पल के लिए उन्हें लगा कि उनका कान्हा कोई साधारण बालक नहीं है। लेकिन अगले ही क्षण ममता ने उनके सारे विचारों पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। कृष्ण ने अपनी नन्ही बाहों से माँ को पकड़ लिया। उस क्षण भगवान और भक्त के बीच का सबसे सुंदर रिश्ता दिखाई दे रहा था। जहाँ भगवान स्वयं माँ के प्रेम के आगे बालक बन जाते हैं। उधर कंस को लगातार कृष्ण के जीवित होने की चिंता सताने लगी थी। उसने कई असुरों को गोकुल भेजना शुरू किया। उसका उद्देश्य केवल एक था। कृष्ण को किसी भी तरह समाप्त करना। लेकिन हर बार कृष्ण अपनी बाल लीला से उस संकट को टाल देते। गोकुल वालों को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि उनके कान्हा में कोई दिव्य शक्ति है। फिर भी उनके लिए वह भगवान से पहले उनका अपना था। नंद का लाल, यशोदा का कान्हा, ग्वाल-बालों का मित्र और गोपियों की आँखों का तारा। शाम होते ही जब कृष्ण गायों के साथ लौटते, तो पूरा गोकुल उनकी बाँसुरी की धुन सुनने के लिए जैसे ठहर जाता। उनकी बाँसुरी की आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि पशु-पक्षी तक शांत हो जाते। यमुना की लहरें धीरे-धीरे बहने लगतीं और पेड़ भी जैसे उस संगीत को सुनने के लिए झुक जाते। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। गोकुल की गलियों में अभी बहुत-सी लीलाएँ बाकी थीं। कंस की साजिशें बढ़ने वाली थीं। कृष्ण के सामने नए-नए संकट आने वाले थे।

     

     

    पूतना का आगमन होने वाला था, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का सामना होने वाला था, और फिर एक दिन पूरा गोकुल उस लीला का साक्षी बनने वाला था जिसने कृष्ण को केवल नंदलाल नहीं, बल्कि गोकुल का रक्षक बना दिया। उस रात यशोदा मैया ने कान्हा को अपने पास सुलाया। कृष्ण गहरी नींद में मुस्कुरा रहे थे। यशोदा ने उनके बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, “मेरे लाल, तुझे किसी की नज़र न लगे।” कृष्ण ने आँखें बंद किए हुए ही जैसे मुस्कुराकर माँ को जवाब दिया। बाहर चाँदनी गोकुल पर बिखरी थी और दूर कहीं बाँसुरी की बहुत हल्की धुन सुनाई दे रही थी। किसी को पता नहीं था कि आने वाली सुबह गोकुल के लिए एक नई परीक्षा लेकर आने वाली है। क्योंकि अब कंस का पहला बड़ा दूत गोकुल की ओर बढ़ चुका था… और उसका निशाना था—नन्हा कान्हा। 🦚💙✨

     

     

    • श्वेता अग्रवाल ✍️💐
  • इश्क में बावरी

    इश्क में बावरी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    इश्क़ में बावरी

     

    हम तेरे इश्क़ में बावरी हो गए,

    तुझसे दूर जाना था हमें,

    पर तेरी मोहब्बत में ही दीवानी हो गए।

     

    सोचा था तुझसे दूरी बना लेंगे,

    तेरी यादों को दिल से मिटा देंगे,

    पर ना जाने कब तेरे इश्क़ में

    खुद को ही भूल गए…

    और तेरे होकर रह गए। ❤️🥀

  • पानी सा मेरा मन

    पानी सा मेरा मन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    पानी सा मेरा मन है…

    हर लहर के साथ बहती हूँ।

    जब शांत हो जाती हूँ,

    तो खुद को खुद में ही समेट लेती हूँ।

  • जिसे मैने पहली बार राखी बांधी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    जिसे मैंने पहली बार राखी बांधी

    अनुष्का को बचपन से रक्षाबंधन का त्योहार बहुत पसंद था।

     

    रक्षाबंधन आने से कई दिन पहले ही वह बाजार जाने की जिद करने लगती थी।

     

    “माँ, इस बार सबसे सुंदर राखी लूंगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर कहतीं,

     

    “इतनी तैयारी किसके लिए?”

     

    अनुष्का तुरंत जवाब देती,

     

    “मेरे भाई के लिए।”

     

    उसका बड़ा भाई रवि उससे चार साल बड़ा था।

     

    दोनों बचपन से बहुत करीब थे।

     

    रवि उसे चिढ़ाता था।

     

    उसकी चीजें छिपा देता था।

     

    कभी उसके बाल खींच देता था।

     

    और फिर जब अनुष्का रोती, तो सबसे पहले वही उसे चुप कराता।

     

    रक्षाबंधन के दिन अनुष्का हमेशा कहती,

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    रवि मजाक करता,

     

    “पहले गिफ्ट बताओ।”

     

    अनुष्का गुस्सा होकर कहती,

     

    “पहले राखी।”

     

    रवि हंसकर हाथ आगे कर देता।

     

    सालों तक यही चलता रहा।

     

    लेकिन समय के साथ दोनों बड़े हो गए।

     

    रवि काम के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।

     

    अनुष्का पढ़ाई करने लगी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर दोनों मिलते जरूर थे।

     

    अगर मिलना संभव न होता तो वीडियो कॉल पर बात करते।

     

    रवि हमेशा कहता,

     

    “राखी बांधना जरूरी है, चाहे सामने हो या दूर।”

     

    अनुष्का कहती,

     

    “आपके बिना त्योहार अधूरा लगता है।”

     

    एक साल रक्षाबंधन से कुछ महीने पहले रवि को दूसरे देश में एक बड़ा काम मिल गया।

     

    वह बहुत दूर चला गया।

     

    जाने से पहले उसने अनुष्का से कहा,

     

    “इस बार शायद राखी पर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    अनुष्का ने नाराज होकर कहा,

     

    “तो मैं भेज दूंगी।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “जरूर भेजना।”

     

    लेकिन उस साल परिस्थितियां ऐसी बनीं कि रवि समय पर बात भी नहीं कर पाया।

     

    उसका काम बहुत व्यस्त था और संपर्क करना मुश्किल हो रहा था।

     

    अनुष्का हर दिन इंतजार करती।

     

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले उसने फोन किया।

     

    कॉल नहीं लगी।

     

    उसने संदेश भेजा।

     

    जवाब नहीं आया।

     

    अगले दिन सुबह वह जल्दी उठ गई।

     

    उसने राखी की थाली सजाई।

     

    लेकिन सामने भाई नहीं था।

     

    उसने वीडियो कॉल की कोशिश की।

     

    फिर भी बात नहीं हुई।

     

    अनुष्का की आंखें भर आईं।

     

    माँ ने उसके पास आकर कहा,

     

    “उदास मत हो बेटा, बात हो जाएगी।”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे रक्षाबंधन है ही नहीं।”

     

    माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “त्योहार सिर्फ साथ बैठने से नहीं, दिल से भी मनाए जाते हैं।”

     

    अनुष्का ने राखी वापस डिब्बे में रखने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    तभी दरवाजे पर किसी ने आवाज दी।

     

    “मैडम… माफ कीजिए।”

     

    अनुष्का बाहर आई।

     

    सामने एक युवक खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पर्स था।

     

    “ये शायद आपका है।”

     

    अनुष्का ने देखा।

     

    वह माँ का पर्स था।

     

    “अरे! ये आपको कहां मिला?”

     

    युवक ने बताया कि पर्स रास्ते में गिर गया था और अंदर मिले एक पते के आधार पर वह लौटाने आया था।

     

    माँ ने उसे धन्यवाद दिया।

     

    “अंदर आओ बेटा, कम से कम चाय पीकर जाना।”

     

    युवक ने पहले मना किया।

     

    लेकिन माँ के बार-बार कहने पर वह अंदर आ गया।

     

    उसका नाम आर्यन था।

     

    बातों-बातों में माँ ने कहा,

     

    “आज रक्षाबंधन है, इसलिए बेटी थोड़ी उदास है।”

     

    आर्यन ने अनुष्का की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    अनुष्का ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “भाई बहुत दूर है।”

     

    आर्यन चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं समझ सकता हूं।”

     

    अनुष्का ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मेरी कोई बहन नहीं है।”

     

    यह सुनकर अनुष्का कुछ पल चुप रही।

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो आज से अनुष्का तुम्हारी बहन।”

     

    आर्यन थोड़ा असहज होकर हंस पड़ा।

     

    “ऐसे रिश्ते बन जाते हैं क्या?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “कुछ रिश्ते बनने के लिए सालों की जरूरत नहीं होती।”

     

    अनुष्का चुपचाप राखी की थाली की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “आपको राखी बंधवाने में कोई परेशानी तो नहीं?”

     

    आर्यन ने उसकी तरफ देखा।

     

    शायद वह भी पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा था।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ आगे कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    अनुष्का ने राखी उठाई।

     

    लेकिन राखी बांधने से पहले रुक गई।

     

    उसके मन में आया—

     

    क्या किसी अनजान इंसान को भाई कहना इतना आसान है?

     

    फिर उसने आर्यन की आंखों में देखा।

     

    वह बिल्कुल चुप था।

     

    जैसे उसके मन में भी कोई पुरानी कमी हो।

     

    अनुष्का ने धीरे से राखी बांध दी।

     

    “अब आप मेरे भाई हो।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “इतनी जल्दी फैसला?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं अच्छा भाई नहीं निकला?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “तो डांट दूंगी।”

     

    सब हंस पड़े।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “हर बहन यही बोलती है?”

     

    “नहीं, मुझे सच में कुछ नहीं चाहिए।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तो एक वादा।”

     

    “कैसा?”

     

    “जब भी कभी जरूरत हो, मुझे फोन करना।”

     

    अनुष्का ने मजाक में कहा,

     

    “और आप उठाओगे?”

     

    आर्यन हंस पड़ा।

     

    “कोशिश करूंगा।”

     

    उस दिन के बाद दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए।

     

    अनुष्का को लगा शायद यह रिश्ता सिर्फ उसी दिन तक था।

     

    लेकिन शाम को उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “घर पहुंच गया, बहन।”

     

    अनुष्का मुस्कुराई।

     

    कुछ दिनों बाद—

     

    “पढ़ाई कैसी चल रही है?”

     

    फिर—

     

    “माँ की तबीयत ठीक है?”

     

    फिर—

     

    “कोई परेशानी हो तो बताना।”

     

    धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं।

     

    रवि जब विदेश से वापस आया, तो अनुष्का ने उत्साह से कहा,

     

    “भैया, आपको किसी से मिलवाना है।”

     

    रवि ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे दूसरे भाई से।”

     

    रवि हंस पड़ा।

     

    “वाह! मैं कुछ महीने बाहर क्या गया, मेरी जगह भर दी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “जगह कोई नहीं भर सकता।”

     

    फिर वह मुस्कुराई।

     

    “बस दिल बड़ा हो गया।”

     

    जब रवि की मुलाकात आर्यन से हुई तो वह पहले थोड़ा हैरान हुआ।

     

    लेकिन फिर उसने कहा,

     

    “मेरी बहन को परेशान मत करना।”

     

    आर्यन ने हंसते हुए जवाब दिया,

     

    “आपकी बहन पहले से ही मुझे परेशान कर रही है।”

     

    अनुष्का ने दोनों को गुस्से से देखा।

     

    “आप दोनों दोस्त मत बन जाना।”

     

    दोनों भाई हंस पड़े।

     

    अगले साल रक्षाबंधन आया।

     

    इस बार अनुष्का के सामने दो हाथ थे।

     

    एक उसके बचपन के भाई रवि का।

     

    दूसरा उस भाई का, जिसे उसने एक साल पहले पहली बार राखी बांधी थी।

     

    अनुष्का ने पहले रवि को राखी बांधी।

     

    फिर आर्यन की तरफ देखा।

     

    आर्यन ने हाथ आगे करते हुए कहा,

     

    “इस बार भी राखी बांधोगी या रिश्ता खत्म?”

     

    अनुष्का ने तुरंत कहा,

     

    “भाई से रिश्ता खत्म नहीं होता।”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अच्छा।”

     

    अनुष्का ने उसे राखी बांधी।

     

    माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।

     

    उनकी आंखें नम थीं।

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “माँ, उस दिन अगर पर्स नहीं गिरता तो?”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो शायद एक रिश्ता नहीं मिलता।”

     

    अनुष्का ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    उस दिन उसे समझ आया—

     

    रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।

     

    कुछ रिश्ते भरोसे से बनते हैं।

     

    कुछ अपनापन देखकर।

     

    और कुछ रिश्ते…

     

    बस एक राखी के धागे से दिल में जगह बना लेते हैं।

     

    उस साल अनुष्का ने महसूस किया कि उसका रक्षाबंधन पहले से कहीं ज्यादा खास था।

     

    क्योंकि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास दो ऐसे लोग थे, जिन्हें वह दिल से अपना कह सकती थी।

     

    रवि ने हंसते हुए कहा,

     

    “अब गिफ्ट किससे पहले लेगी?”

     

    अनुष्का ने कहा,

     

    “दोनों से।”

     

    आर्यन बोला,

     

    “लो, असली बहन अब सामने आई।”

     

    अनुष्का हंस पड़ी।

     

    घर फिर से हंसी से भर गया।

     

    उसने अपनी दोनों भाइयों की कलाई पर बंधी राखियों को देखा।

     

    एक रिश्ता उसे जन्म से मिला था।

     

    दूसरा उसे रक्षाबंधन के दिन मिला था।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—

     

    अपनापन।

     

    और अनुष्का ने उसी दिन मन ही मन सोचा—

     

    कभी-कभी भगवान हमें रिश्ते चुनने का मौका भी देता है।

     

    बस उन्हें पहचानने के लिए…

     

    दिल का दरवाजा खुला होना चाहिए।

     

    उसकी पहली राखी, जो उस साल अधूरी लग रही थी…

     

    आखिर में उसकी जिंदगी की सबसे यादगार राखी बन गई।

  • हर साल राखी भेजती रही

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    हर साल राखी भेजती रही, पर भाई ने कभी जवाब नहीं दिया

     

    रक्षाबंधन आने में अभी पांच दिन बाकी थे।

     

    मीरा बाजार में राखियां देख रही थी।

     

    उसकी नजर एक साधारण-सी लाल और सुनहरे धागे वाली राखी पर जाकर रुक गई।

     

    उसने दुकानदार से कहा,

     

    “भैया, ये वाली दे दीजिए।”

     

    दुकानदार ने पूछा,

     

    “बस एक?”

     

    मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां, बस एक ही भाई है।”

     

    राखी हाथ में लेते ही उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    पिछले आठ सालों से वह हर रक्षाबंधन पर अपने भाई अभिषेक को राखी भेजती थी।

     

    लेकिन पिछले आठ सालों में अभिषेक ने उसे कभी फोन करके यह नहीं कहा था—

     

    “राखी मिल गई।”

     

    न कोई गिफ्ट।

     

    न कोई वीडियो कॉल।

     

    न कोई लंबी बात।

     

    बस कभी-कभी दो शब्दों का एक संदेश आता था—

     

    “Thanks.”

     

    और कई बार वह भी नहीं।

     

    मीरा के दोस्तों को यह बात समझ नहीं आती थी।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा था,

     

    “जब तुम्हारा भाई इतना दूर-दूर रहता है तो तुम हर साल राखी क्यों भेजती हो?”

     

    मीरा ने कहा था,

     

    “क्योंकि वो मेरा भाई है।”

     

    “लेकिन उसे तो फर्क ही नहीं पड़ता।”

     

    मीरा कुछ सेकंड चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “शायद पड़ता हो।”

     

    उसकी सहेली हंस पड़ी।

     

    “तुझे खुद नहीं पता।”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    सच तो यह था कि कभी-कभी उसे भी बुरा लगता था।

     

    बहुत बुरा।

     

    बचपन में अभिषेक और मीरा बहुत करीब थे।

     

    अभिषेक उससे छह साल बड़ा था।

     

    जब मीरा छोटी थी, वह उसके पीछे-पीछे घूमती रहती।

     

    “भैया, मुझे भी साइकिल चलानी है।”

     

    “गिर जाएगी।”

     

    “तो आप पकड़ लेना।”

     

    “तू बहुत परेशान करती है।”

     

    फिर भी अभिषेक घंटों उसके पीछे साइकिल पकड़कर दौड़ता रहता।

     

    मीरा को स्कूल में कोई डांट देता तो वह घर आकर सबसे पहले भाई को बताती।

     

    अभिषेक हमेशा कहता,

     

    “रो मत, मैं हूं ना।”

     

    लेकिन समय के साथ सब बदल गया।

     

    अभिषेक पढ़ाई और काम के लिए दूसरे शहर चला गया।

     

    धीरे-धीरे फोन कम हो गए।

     

    फिर बातें कम हो गईं।

     

    और फिर जैसे दोनों की जिंदगी अपनी-अपनी दिशा में चल पड़ी।

     

    फिर भी हर साल मीरा राखी भेजती रही।

     

    इस बार उसने राखी के साथ एक छोटा-सा पत्र भी लिखा।

     

    उसने लिखा—

     

    “भैया, इस बार भी राखी भेज रही हूं। पता नहीं आपको पसंद आएगी या नहीं। हर साल सोचती हूं कि शायद इस बार आप फोन करेंगे। लेकिन अगर नहीं भी किया तो कोई बात नहीं। बस राखी संभालकर रख लेना।”

     

    पत्र लिखते-लिखते उसकी आंखें भर आईं।

     

    फिर उसने आखिरी लाइन लिखी—

     

    “आप चाहे जितने दूर हो जाओ, मेरे लिए हमेशा वही रहोगे जो बचपन में कहते थे—मैं हूं ना।”

     

    उसने लिफाफा बंद कर दिया।

     

    रक्षाबंधन आ गया।

     

    सुबह से ही मीरा का मन बेचैन था।

     

    वह बार-बार मोबाइल देखती।

     

    कोई कॉल नहीं।

     

    दोपहर हुई।

     

    कोई संदेश नहीं।

     

    शाम हो गई।

     

    अब भी कुछ नहीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    माँ ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अभिषेक का इंतजार कर रही है?”

     

    मीरा ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन उसकी आंखें सच बता रही थीं।

     

    रात को उसने खुद को समझाया।

     

    “हर साल ऐसा ही होता है। इस बार इतना सोचने की क्या जरूरत है?”

     

    उसने मोबाइल एक तरफ रख दिया।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    मीरा ने सोचा शायद कोई पड़ोसी होगा।

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    और सामने…

     

    अभिषेक खड़ा था।

     

    कुछ सेकंड तक मीरा को विश्वास ही नहीं हुआ।

     

    “भैया?”

     

    अभिषेक हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अंदर नहीं बुलाएगी?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आप… यहां?”

     

    वह कुछ कहे बिना भाई के गले लग गई।

     

    कई सालों की शिकायतें उस एक पल में जैसे बाहर आ गईं।

     

    अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “इतना रोएगी तो पड़ोसी सोचेंगे मैंने कुछ किया है।”

     

    मीरा रोते-रोते हंस पड़ी।

     

    माँ भी बाहर आ गईं।

     

    “अभिषेक!”

     

    वह माँ के पैर छूने लगा।

     

    घर में अचानक खुशी लौट आई।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने पूछा,

     

    “लेकिन आप आए कैसे? आपने बताया भी नहीं।”

     

    अभिषेक ने अपना बैग खोला।

     

    उसने अंदर से एक डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने खोला।

     

    और वह हैरान रह गई।

     

    अंदर…

     

    राखियां थीं।

     

    बहुत सारी राखियां।

     

    लाल।

     

    पीली।

     

    हरी।

     

    साधारण।

     

    रंगीन।

     

    पुरानी।

     

    नई।

     

    मीरा ने एक-एक करके उन्हें देखा।

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “ये सब…?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तेरी भेजी हुई हैं।”

     

    मीरा ने धीरे से पूछा,

     

    “सभी?”

     

    “एक भी नहीं फेंकी।”

     

    मीरा कुछ बोल नहीं पाई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “तू सोचती थी मुझे फर्क नहीं पड़ता?”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “आपने कभी बताया नहीं।”

     

    अभिषेक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मुझसे गलतियां हुई हैं।”

     

    मीरा उसकी तरफ देखने लगी।

     

    “जब मैं घर से दूर गया, मुझे लगा काम खत्म करके आराम से बात करूंगा।”

     

    वह हल्का-सा हंसा।

     

    “लेकिन काम कभी खत्म ही नहीं हुआ।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हर साल राखी आती थी। मैं उसे खोलता था। बांधता था।”

     

    “फिर फोन क्यों नहीं किया?”

     

    इस सवाल पर अभिषेक की आंखें झुक गईं।

     

    “शायद आदत खराब हो गई।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “एक फोन करने की?”

     

    “हां।”

     

    फिर वह गंभीर होकर बोला,

     

    “हम अक्सर सोचते रहते हैं कि अपनों से बात बाद में कर लेंगे।”

     

    मीरा ध्यान से सुन रही थी।

     

    “लेकिन बाद में करते-करते कई साल निकल जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज धीमी हो गई।

     

    “और फिर एक दिन पता चलता है कि अपने हमसे दूर नहीं गए थे… हम खुद उनसे दूर होते गए।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    अभिषेक ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    वह वही पत्र था जो मीरा ने राखी के साथ भेजा था।

     

    “ये भी मिला।”

     

    मीरा ने शर्म से कहा,

     

    “पढ़ लिया?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “कई बार।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    अभिषेक बोला,

     

    “उस आखिरी लाइन ने मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर किया।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “बचपन में मैं तुझे ये बात कहता था।”

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लेकिन बड़ा होकर खुद ही गायब हो गया।”

     

    मीरा की आंखों से फिर आंसू निकल आए।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “इस बार सोचा कि सिर्फ ‘Thanks’ लिखकर बात खत्म नहीं करूंगा।”

     

    मीरा ने हल्के से कहा,

     

    “तो?”

     

    “इस बार राखी खुद बंधवाने आऊंगा।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    वह तुरंत अंदर गई और पूजा की थाली लेकर आई।

     

    अभिषेक उसके सामने बैठ गया।

     

    मीरा ने तिलक लगाया।

     

    राखी उठाई।

     

    लेकिन इस बार उसका हाथ कांप नहीं रहा था।

     

    उसने धीरे से भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “अब क्या मांगोगी?”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “गिफ्ट नहीं चाहिए?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “लेकिन इस बार मैं गिफ्ट देने के लिए तैयार होकर आया हूं।”

     

    मीरा ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “एक वादा।”

     

    मीरा की आंखें उसकी तरफ उठ गईं।

     

    “कैसा वादा?”

     

    अभिषेक ने अपना मोबाइल निकाला।

     

    उसमें एक नया अलार्म लगा था।

     

    हर रविवार शाम सात बजे।

     

    नाम लिखा था—

     

    “मीरा को फोन करना।”

     

    मीरा हंस पड़ी।

     

    “इसके लिए अलार्म लगाना पड़ेगा?”

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कुछ रिश्ते इतने जरूरी होते हैं कि उन्हें किस्मत और व्यस्तता के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो हर रविवार फोन करोगे?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर भूल गए?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “तो अलार्म याद दिला देगा।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अभिषेक ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “ये याद दिलाएगी।”

     

    अभिषेक कुछ सेकंड तक अपनी कलाई को देखता रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे।

     

    बचपन की।

     

    स्कूल की।

     

    पुरानी शरारतों की।

     

    उन दिनों की, जिन्हें दोनों ने अपनी जिंदगी की जल्दी में कहीं पीछे छोड़ दिया था।

     

    सुबह जब अभिषेक वापस जाने लगा, मीरा ने पूछा,

     

    “भैया?”

     

    “हां?”

     

    “अगली राखी पर फिर आओगे?”

     

    अभिषेक मुस्कुराया।

     

    “अगर तू भेजेगी तो।”

     

    मीरा ने कहा,

     

    “नहीं भेजूंगी।”

     

    अभिषेक हैरान हुआ।

     

    “क्यों?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद आकर बांधूंगी।”

     

    अभिषेक हंस पड़ा।

     

    “फिर ठीक है।”

     

    दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    अभिषेक ने कहा,

     

    “मीरा।”

     

    “हां?”

     

    “अब भी वही कह सकता हूं।”

     

    मीरा की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    अभिषेक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं हूं ना।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    और इस बार उसे उन शब्दों पर कोई शक नहीं था।

     

    क्योंकि कभी-कभी प्यार खत्म नहीं होता।

     

    बस लोग उसे जताना भूल जाते हैं।

     

    और कभी-कभी एक छोटी-सी राखी…

     

    सालों की दूरी को याद दिला देती है कि रिश्ता अभी भी वहीं है।

     

    बस किसी एक को…

     

    दरवाजा खोलकर कहना होता है—

     

    “मैं आ गया।”

  • राखी के साथ मिला अधूरा पत्र

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    राखी के साथ मिला भाई का अधूरा पत्र

    रक्षाबंधन से एक दिन पहले काव्या अपने पुराने घर लौटी थी।

     

    लगभग तीन साल बाद।

     

    घर का दरवाजा खोलते ही उसे वही पुरानी खुशबू महसूस हुई। दीवारों पर लगी तस्वीरें, आंगन में रखा पुराना झूला और कोने में रखा लकड़ी का संदूक—सब कुछ वैसा ही था।

     

    बस एक चीज बदल गई थी।

     

    घर पहले जितना शोर वाला नहीं रहा था।

     

    क्योंकि काव्या और उसके बड़े भाई रोहन के बीच पिछले तीन साल से ठीक से बात नहीं हुई थी।

     

    एक ही शहर में रहने के बावजूद दोनों जैसे एक-दूसरे के लिए अजनबी बन गए थे।

     

    माँ ने उसे देखकर कहा,

     

    “आ गई बेटा?”

     

    काव्या ने धीरे से माँ को गले लगाया।

     

    “हां माँ।”

     

    माँ की आंखों में खुशी थी।

     

    “तूने कहा था इस बार नहीं आएगी।”

     

    काव्या ने नजरें झुका लीं।

     

    “सोचा… राखी है।”

     

    माँ समझ गईं कि वह किसके लिए आई है।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “रोहन से बात करेगी?”

     

    काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रोहन अपने कमरे में था।

     

    काव्या चाहती थी कि वह बाहर आए।

     

    उससे कुछ कहे।

     

    कम से कम इतना ही बोले—

     

    “आ गई?”

     

    लेकिन कई घंटे बीत गए।

     

    रोहन बाहर नहीं आया।

     

    काव्या को गुस्सा आने लगा।

     

    “हमेशा की तरह।”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    शाम को काव्या अपने पुराने कमरे में गई।

     

    वहां सब कुछ लगभग वैसा ही था।

     

    पुरानी किताबें।

     

    कॉलेज की कुछ तस्वीरें।

     

    एक कोने में रखा लकड़ी का डिब्बा।

     

    काव्या ने उसे खोला।

     

    अंदर उसकी बचपन की चीजें थीं।

     

    पुराने कार्ड।

     

    कुछ तस्वीरें।

     

    और एक सफेद लिफाफा।

     

    लिफाफे पर उसका नाम लिखा था—

     

    “काव्या के लिए।”

     

    उसने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह रोहन की लिखावट थी।

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    लिफाफा पुराना था।

     

    उस पर धूल की हल्की परत थी।

     

    उसने धीरे से खोलना शुरू किया।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    लेकिन पत्र अधूरा था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “काव्या, मुझे नहीं पता कि तू मुझसे कब तक नाराज रहेगी। लेकिन अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

     

    उसके बाद कागज खाली था।

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    उसे तीन साल पुराना वह दिन याद आ गया।

     

    उस दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।

     

    काव्या को दूसरे शहर में नौकरी मिली थी।

     

    वह बहुत खुश थी।

     

    लेकिन रोहन ने कहा था,

     

    “तू इतनी दूर अकेली नहीं जाएगी।”

     

    काव्या को लगा कि भाई उस पर भरोसा नहीं करता।

     

    उसने गुस्से में कहा,

     

    “आपको हमेशा मेरी जिंदगी कंट्रोल करनी होती है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “मैं सिर्फ चिंता कर रहा हूं।”

     

    “मुझे आपकी चिंता नहीं चाहिए।”

     

    ये शब्द रोहन को बहुत बुरे लगे थे।

     

    उसने गुस्से में कहा,

     

    “ठीक है, जो करना है कर।”

     

    काव्या चली गई।

     

    और उसके बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ती चली गई।

     

    फोन कम हुए।

     

    बातें बंद हुईं।

     

    फिर सिर्फ त्योहारों पर औपचारिक संदेश आने लगे।

     

    “हैप्पी रक्षाबंधन।”

     

    बस इतना।

     

    काव्या पत्र को हाथ में लिए माँ के पास गई।

     

    “माँ, ये पत्र?”

     

    माँ का चेहरा बदल गया।

     

    “तुझे कहां मिला?”

     

    “मेरे कमरे में।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “रोहन ने लिखा था।”

     

    “लेकिन पूरा क्यों नहीं किया?”

     

    माँ की आंखें नम हो गईं।

     

    “उस दिन तुम दोनों का झगड़ा हुआ था।”

     

    काव्या चुप हो गई।

     

    माँ बोलीं,

     

    “उसके बाद वह कई बार तुझे फोन करना चाहता था।”

     

    “तो किया क्यों नहीं?”

     

    “शायद उसे लगा कि तू बात नहीं करना चाहती।”

     

    काव्या ने पत्र को देखा।

     

    “माँ, उसने ये अधूरा क्यों छोड़ दिया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “क्योंकि कभी-कभी इंसान को शब्द नहीं मिलते।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सकी।

     

    उसे याद आने लगा कि बचपन में रोहन कैसा था।

     

    जब वह स्कूल जाने से डरती थी तो रोहन उसका बैग उठाता था।

     

    जब उसे गणित नहीं आती थी तो घंटों बैठकर पढ़ाता था।

     

    जब कोई उसे परेशान करता तो सबसे पहले रोहन खड़ा होता।

     

    और फिर वह एक दिन…

     

    एक ही झगड़े में उसे अपना दुश्मन समझ बैठी थी।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    काव्या ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    उसने माँ से पूछा,

     

    “रोहन उठ गया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “हां, बाहर बैठा है।”

     

    काव्या के कदम रुक गए।

     

    दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    वह थाली लेकर बाहर गई।

     

    रोहन सोफे पर बैठा था।

     

    उसकी नजर काव्या पर पड़ी।

     

    दोनों कुछ सेकंड तक चुप रहे।

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “राखी बांधेगी?”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    वह उसके सामने बैठ गई।

     

    तिलक लगाया।

     

    राखी उठाई।

     

    लेकिन उसका हाथ कांप रहा था।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे एक पत्र मिला।”

     

    रोहन का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सा पत्र?”

     

    काव्या ने अपने बैग से वह पत्र निकाला।

     

    रोहन उसे देखते ही चुप हो गया।

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “आपने इसे पूरा क्यों नहीं लिखा?”

     

    रोहन ने नजरें झुका लीं।

     

    “अब उस बात को छोड़ दे।”

     

    “नहीं।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आज जवाब चाहिए।”

     

    रोहन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “लेकिन उसके बाद…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “मुझे डर लगने लगा था।”

     

    काव्या हैरान हुई।

     

    “मुझसे?”

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “तुझे खोने से।”

     

    काव्या की आंखें भर आईं।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “तू दूर जा रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कहूं कि मुझे तेरी चिंता है।”

     

    “तो आपने गुस्सा क्यों किया?”

     

    रोहन हल्का-सा हंस पड़ा।

     

    “क्योंकि मैं समझदार भाई नहीं हूं।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “और मैं भी समझदार बहन नहीं थी।”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर काव्या ने पूछा,

     

    “पत्र पूरा करोगे?”

     

    रोहन ने उसे देखा।

     

    “अभी?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    रोहन ने पत्र हाथ में लिया।

     

    उसके आखिरी शब्द पढ़े—

     

    “अगर कभी ये पत्र पढ़े तो बस इतना समझ लेना कि…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर काव्या की आंखों में देखकर बोला,

     

    “…मैं तुझसे कभी नाराज नहीं था। मैं बस ये नहीं जानता था कि तुझे अपनी जिंदगी में कैसे रोकूं, बिना तेरी उड़ान रोके।”

     

    काव्या रो पड़ी।

     

    उसने राखी नीचे रख दी और भाई के गले लग गई।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “अरे, राखी तो बांध।”

     

    काव्या रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “पहले पांच मिनट ऐसे ही रहने दो।”

     

    माँ दूर खड़ी रो रही थीं।

     

    कुछ देर बाद काव्या फिर भाई के सामने बैठी।

     

    उसने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    फिर कहा,

     

    “इस बार मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    काव्या ने अधूरा पत्र उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे संभालकर रखिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि जब भी हम फिर से बेवकूफी में नाराज हों…”

     

    रोहन हंस पड़ा।

     

    “तो?”

     

    “तो इसे पढ़ लें।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “और अगर फिर भी गुस्सा रहा?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “तो तू राखी लेकर आ जाना।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “हर समस्या का इलाज राखी?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “हमारे लिए तो हां।”

     

    उस दिन दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।

     

    तीन साल बाद घर में फिर से वही शोर था।

     

    माँ बार-बार दोनों को देख रही थीं।

     

    उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि तीन साल की चुप्पी एक राखी के दिन खत्म हो सकती है।

     

    शाम को काव्या वापस जाने लगी।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “कब आएगी?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “फोन करूंगी।”

     

    रोहन ने तुरंत कहा,

     

    “फोन मत करना।”

     

    काव्या हैरान हुई।

     

    “क्यों?”

     

    रोहन मुस्कुराया।

     

    “सीधे आ जाना।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “ठीक है।”

     

    फिर उसने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    वह साधारण-सी थी।

     

    लेकिन इस बार उस राखी ने सिर्फ एक वादा नहीं बांधा था।

     

    उसने तीन साल की नाराजगी खोल दी थी।

     

    घर से बाहर निकलते समय काव्या ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    रोहन दरवाजे पर खड़ा था।

     

    काव्या ने हाथ हिलाया।

     

    रोहन ने कहा,

     

    “काव्या!”

     

    “क्या?”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “पत्र पूरा हो गया।”

     

    काव्या की आंखें नम हो गईं।

     

    वह मुस्कुराई और बोली,

     

    “हां भैया।”

     

    उस दिन काव्या को समझ आया कि—

     

    कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं, बस बातों के बीच चुप्पी जमा हो जाती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    उसे हटाने के लिए बस एक राखी, एक गले लगना और कुछ सच्चे शब्द काफी होते हैं।

     

    क्योंकि रक्षाबंधन सिर्फ कलाई पर धागा बांधने का दिन नहीं है।

     

    यह उन रिश्तों को फिर से जोड़ने का दिन भी है, जिनमें प्यार तो होता है… लेकिन बातें अधूरी रह जाती हैं।

  • रक्षाबंधन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन की सुबह कबीर अपने कमरे में बैठा पुरानी फाइलों को देख रहा था।

     

    बाहर से उसकी छोटी बहन सिया की आवाज आई—

     

    “भैया! जल्दी बाहर आओ, राखी बांधनी है।”

     

    कबीर ने जल्दी से फाइल बंद कर दी।

     

    “आ रहा हूं।”

     

    सिया पूजा की थाली लेकर बैठी थी। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह शरारती मुस्कान थी।

     

    “आज भी देर से आए।”

     

    कबीर ने हंसते हुए कहा,

     

    “अरे मैडम, भाई हूं आपका, कोई स्कूल का बच्चा नहीं।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो आप हमेशा बच्चे ही रहोगे।”

     

    कबीर बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, मिठाई खिलाई और उसकी कलाई पर सुंदर-सी राखी बांध दी।

     

    फिर वह तुरंत बोली,

     

    “अब गिफ्ट दो।”

     

    कबीर ने जेब से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला।

     

    “लो।”

     

    सिया ने खोला।

     

    उसमें पैसे थे।

     

    सिया ने लिफाफा वापस कर दिया।

     

    “नहीं चाहिए।”

     

    कबीर हैरान हुआ।

     

    “हर साल तो गिफ्ट के पीछे पड़ जाती है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “इस बार मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

     

    “तबियत तो ठीक है?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “बिल्कुल।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “फिर क्या बात है?”

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “इस बार गिफ्ट मैं दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “मुझे?”

     

    “हां।”

     

    “और क्या देगी?”

     

    सिया उठकर अपने कमरे में गई।

     

    कुछ देर बाद वह एक बड़ा-सा लिफाफा लेकर आई।

     

    उसने कबीर के हाथ में रखा।

     

    “खोलो।”

     

    कबीर ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    उन्हें पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।

     

    वह कुछ देर तक चुप रहा।

     

    फिर उसने सिया की तरफ देखा।

     

    “ये कहां से मिले?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “घर में।”

     

    कबीर के हाथ कांपने लगे।

     

    वे कागज उसके पुराने कॉलेज एडमिशन के थे।

     

    कई साल पहले कबीर को संगीत की पढ़ाई के लिए एक बड़े संस्थान में दाखिला मिला था।

     

    वह बचपन से गायक बनना चाहता था।

     

    उसे गाना बहुत पसंद था।

     

    स्कूल के हर कार्यक्रम में वह हिस्सा लेता।

     

    जब भी घर में कोई मेहमान आता, सिया तुरंत कहती—

     

    “भैया, गाना सुनाओ ना।”

     

    कबीर हंसकर कहता,

     

    “तू मेरी मैनेजर है क्या?”

     

    सिया गर्व से कहती,

     

    “हां।”

     

    लेकिन वह सपना कभी पूरा नहीं हुआ।

     

    उसी समय पिता का काम बंद हो गया था।

     

    घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई।

     

    सिया की पढ़ाई भी चल रही थी।

     

    कबीर ने बिना किसी से ज्यादा बात किए अपना दाखिला छोड़ दिया।

     

    वह नौकरी करने लगा।

     

    कुछ सालों में पिता की हालत सुधरी, सिया ने पढ़ाई पूरी की और नौकरी करने लगी।

     

    लेकिन कबीर ने फिर कभी अपने सपने की बात नहीं की।

     

    वह कहता,

     

    “अब ये सब बचपन की बातें हैं।”

     

    सिया को हमेशा लगता था कि भाई ने सच में अपने सपने भुला दिए हैं।

     

    लेकिन एक दिन उसने कबीर को कमरे में अकेले पुराने गाने सुनते देखा।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    और वह धीरे-धीरे गुनगुना रहा था।

     

    सिया वहीं रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    सपना खत्म नहीं हुआ था। बस भाई ने उसे छिपा दिया था।

     

    उसने चुपचाप कबीर के पुराने कागज ढूंढे।

     

    और महीनों तक जानकारी जुटाती रही।

     

    उसने एक स्थानीय संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में पता किया।

     

    आवेदन किया।

     

    कबीर की पुरानी रिकॉर्डिंग ढूंढी।

     

    उसकी अनुमति के बिना कुछ भी अंतिम नहीं किया, लेकिन जरूरी जानकारी के लिए पिता से मदद ली।

     

    और आखिरकार…

     

    कबीर का चयन एक विशेष संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए हो गया।

     

    सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “भैया, लिफाफे में आगे का कागज भी देखो।”

     

    कबीर ने दूसरा पत्र निकाला।

     

    उसमें चयन की जानकारी थी।

     

    उसने धीरे से पढ़ा।

     

    फिर दोबारा पढ़ा।

     

    “सिया…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “आपका राखी का गिफ्ट।”

     

    कबीर ने तुरंत कागज वापस कर दिए।

     

    “नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “मैं अब ये नहीं कर सकता।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    “बहुत देर हो गई।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “किसके लिए?”

     

    “सपनों के लिए।”

     

    सिया का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “भैया, सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।”

     

    कबीर हल्का-सा हंस पड़ा।

     

    “तू बहुत बड़ी बातें करने लगी है।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि आपने छोटी बहन को बड़ा होने दिया।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपको याद है, जब मैं स्कूल में रो रही थी कि मुझे आगे पढ़ने नहीं जाना?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “आपने कहा था—डर के कारण अपने सपने मत छोड़ना।”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    “आज वही बात आपको वापस कर रही हूं।”

     

    कबीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “लेकिन घर?”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “घर संभाल लेंगे।”

     

    “पैसे?”

     

    “मैं हूं।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “हर बार सिर्फ भाई ही क्यों कहे—मैं हूं ना?”

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आज मुझे कहने दो।”

     

    कबीर कुछ नहीं बोल पाया।

     

    सिया ने उसके हाथ पकड़ लिए।

     

    “भैया, आपने मेरी पढ़ाई के लिए अपना सपना छोड़ा था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “मैंने अपनी मर्जी से किया था।”

     

    “हां।”

     

    “तू बोझ नहीं थी।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    सिया की आवाज कांपने लगी।

     

    “लेकिन अब मुझे अपने भाई को देखकर ये नहीं सोचना कि उसने मेरे लिए कुछ अधूरा छोड़ दिया।”

     

    कबीर की आंखें भर आईं।

     

    वह बोला,

     

    “मैंने कभी तुझसे ये उम्मीद नहीं रखी।”

     

    सिया ने कहा,

     

    “ये आपकी उम्मीद नहीं है।”

     

    उसने उसकी राखी वाली कलाई को देखा।

     

    “ये मेरी राखी का वादा है।”

     

    कुछ देर तक कमरे में बिल्कुल शांति थी।

     

    फिर कबीर ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर मैं असफल हो गया तो?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “तो फिर कोशिश करोगे।”

     

    “और अगर लोग हंसेंगे?”

     

    “तो मैं भी हंस दूंगी।”

     

    कबीर हंस पड़ा।

     

    “बहुत अच्छी बहन है तू।”

     

    सिया ने तुरंत कहा,

     

    “अब पता चला?”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन कबीर की आंखों में अब भी आंसू थे।

     

    वह उठकर अपने कमरे में गया।

     

    कुछ देर बाद वह हाथ में एक पुराना माइक लेकर आया।

     

    वह खिलौने जैसा छोटा माइक था।

     

    सिया ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “ये अभी तक रखा है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तूने दिया था।”

     

    सिया को याद आया।

     

    बचपन में उसने अपनी गुल्लक तोड़कर कबीर के लिए वह माइक खरीदा था।

     

    तब कबीर ने कहा था—

     

    “जब मैं बड़ा गायक बनूंगा, तो पहला गाना तुझे सुनाऊंगा।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    “आपने अपना वादा भूल गए थे।”

     

    कबीर ने माइक की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “शायद नहीं।”

     

    सिया ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद मुझे याद दिलाने के लिए आज की राखी का इंतजार था।”

     

    कुछ महीनों बाद कबीर ने संगीत की ट्रेनिंग शुरू कर दी।

     

    शुरुआत आसान नहीं थी।

     

    काम और ट्रेनिंग साथ संभालनी पड़ती थी।

     

    कभी वह थक जाता।

     

    कभी कहता,

     

    “छोड़ देता हूं।”

     

    तब सिया कहती,

     

    “राखी देखो।”

     

    कबीर अपनी कलाई की तरफ देखता।

     

    “हर बार यही कहेगी?”

     

    “हां।”

     

    “कब तक?”

     

    “जब तक आप खुद अपने सपने से भागना बंद नहीं कर देते।”

     

    धीरे-धीरे कबीर फिर से बदलने लगा।

     

    उसकी आवाज में पहले जैसा आत्मविश्वास लौट आया।

     

    वह छोटे कार्यक्रमों में गाने लगा।

     

    एक दिन उसने घर आकर कहा,

     

    “सिया!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आज मुझे पहला भुगतान मिला।”

     

    सिया दौड़कर उसके पास आई।

     

    “सच?”

     

    कबीर ने पैसे उसकी तरफ बढ़ाए।

     

    “तेरा गिफ्ट।”

     

    सिया ने तुरंत मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “वही सुनना है जो आपने बचपन में कहा था।”

     

    कबीर समझ गया।

     

    उसने कहा,

     

    “पहला गाना?”

     

    सिया ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तैयार हो मैनेजर?”

     

    सिया हंस पड़ी।

     

    “हमेशा।”

     

    कुछ दिनों बाद घर की छत पर दोनों बैठे थे।

     

    सिया ने वही पुराना खिलौना माइक उसके हाथ में दिया।

     

    “लो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये अब भी संभालकर रखा है?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था, एक दिन इसकी जरूरत पड़ेगी।”

     

    कबीर ने गाना शुरू किया।

     

    वह कोई बड़ा मंच नहीं था।

     

    न सामने हजारों लोग थे।

     

    बस एक बहन थी।

     

    और उसका भाई था।

     

    गाना खत्म हुआ तो सिया की आंखें नम थीं।

     

    उसने कहा,

     

    “भैया, आज मेरा राखी का गिफ्ट पूरा हुआ।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कैसे?”

     

    सिया ने कहा,

     

    “क्योंकि इस बार आपने मुझे कुछ खरीदा हुआ नहीं दिया।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “तो क्या दिया?”

     

    सिया ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छूते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे मेरा वही पुराना भाई वापस दे दिया, जिसके पास सपने थे।”

     

    कबीर की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस दिन दोनों को समझ आया कि रक्षाबंधन सिर्फ रक्षा का त्योहार नहीं है।

     

    कभी-कभी एक बहन भी अपने भाई के सपनों की रक्षा करती है।

     

    और कभी…

     

    राखी का सबसे बड़ा गिफ्ट कोई चीज नहीं होती।

     

    वह किसी अपने को फिर से खुद पर विश्वास करना सिखाना होता है।

  • रक्षाबंधन का दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन का दिन था।

     

    घर में सुबह से ही हलचल थी। माँ रसोई में मिठाई तैयार कर रही थीं और रिया अपने कमरे में बैठी राखी की थाली सजा रही थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

     

    उसकी सहेली ने सुबह ही उसे अपनी राखी का गिफ्ट दिखाया था।

     

    महंगा फोन।

     

    नई घड़ी।

     

    कपड़े।

     

    और भी बहुत कुछ।

     

    रिया ने बस मुस्कुराकर कहा था,

     

    “बहुत अच्छा है।”

     

    लेकिन उसके मन में एक पुरानी बात फिर से आ गई।

     

    उसके भाई आरव ने उसे कभी राखी पर कोई गिफ्ट नहीं दिया था।

     

    कभी चॉकलेट नहीं।

     

    कभी कोई कपड़ा नहीं।

     

    कभी कोई खास चीज नहीं।

     

    रिया बचपन से हर साल उसे राखी बांधती थी और आरव बस इतना कहता था,

     

    “धन्यवाद, छोटी।”

     

    फिर चला जाता।

     

    रिया को यह बात हमेशा चुभती थी।

     

    वह सोचती थी,

     

    “शायद भैया को मेरी उतनी परवाह नहीं है।”

     

    उस दिन भी आरव सुबह से घर पर नहीं था।

     

    रिया ने माँ से पूछा,

     

    “भैया कहां गए हैं?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “काम से बाहर गए हैं।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “आज के दिन भी?”

     

    माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रिया की सहेलियों ने अपनी तस्वीरें भेजनी शुरू कर दीं।

     

    किसी ने लिखा—

     

    “मेरे भाई ने मुझे सरप्राइज दिया!”

     

    किसी ने लिखा—

     

    “बेस्ट भाई!”

     

    रिया ने मोबाइल बंद कर दिया।

     

    उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    वह धीरे से बोली,

     

    “सबके भाई ऐसे होते हैं… बस मेरे नहीं।”

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने सुन लिया।

     

    “ऐसा क्यों कह रही है?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि सच है।”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तेरे भैया तुझसे बहुत प्यार करते हैं।”

     

    रिया हंस पड़ी।

     

    “कैसा प्यार, माँ?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    रिया ने कहा,

     

    “उन्होंने कभी मुझे महसूस ही नहीं होने दिया।”

     

    “हर कोई प्यार एक जैसा नहीं दिखाता बेटा।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “लेकिन कभी तो दिखाना चाहिए।”

     

    शाम होने लगी।

     

    आरव अभी तक घर नहीं आया था।

     

    रिया ने राखी की थाली एक तरफ रख दी।

     

    “अब नहीं बांधूंगी।”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “जब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता तो मुझे क्यों पड़े?”

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया तेजी से बाहर आई।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    उसके कपड़े धूल से भरे थे।

     

    चेहरे पर थकान थी।

     

    हाथ में कोई गिफ्ट नहीं था।

     

    रिया ने उसे देखकर मुंह फेर लिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “आपको क्या फर्क पड़ता है?”

     

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    “फर्क पड़ता है।”

     

    रिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    आरव ने जवाब नहीं दिया।

     

    रिया ने गुस्से में कहा,

     

    “आपको कभी कुछ देना नहीं होता। कभी कोई गिफ्ट नहीं। कभी कोई सरप्राइज नहीं।”

     

    आरव शांत खड़ा रहा।

     

    रिया की आवाज भर आई।

     

    “मैं आपकी बहन हूं या बस राखी बांधने वाली कोई लड़की?”

     

    यह सुनकर माँ की आंखें भर आईं।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “रिया, पहले राखी बांध दे।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव पहली बार थोड़ा गंभीर हुआ।

     

    “प्लीज।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    माँ ने थाली उसकी तरफ बढ़ाई।

     

    रिया ने बिना कुछ बोले तिलक लगाया और राखी बांध दी।

     

    आरव ने अपनी कलाई को कुछ देर देखा।

     

    फिर अपनी जेब से एक पुराना-सा कागज निकाला।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने वह कागज उसके हाथ में रख दिया।

     

    रिया ने पढ़ा।

     

    वह एक कोचिंग संस्थान की फीस की रसीद थी।

     

    रिया हैरान हुई।

     

    “ये मेरी कोचिंग की फीस है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन ये तो पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    रिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    आरव बोला,

     

    “पापा की दुकान में उस समय बहुत परेशानी थी।”

     

    रिया का चेहरा बदल गया।

     

    “तो फीस किसने दी?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    रिया ने रसीद पर नाम देखा।

     

    आरव शर्मा।

     

    रिया के हाथ कांपने लगे।

     

    “आपने?”

     

    आरव ने हल्की आवाज में कहा,

     

    “हां।”

     

    रिया को याद आया कि उस साल आरव ने नया फोन खरीदने की बहुत इच्छा जताई थी।

     

    लेकिन उसने कभी नहीं खरीदा।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि आपको फोन पसंद नहीं आया।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “झूठ बोला था।”

     

    रिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    आरव ने जेब से एक और कागज निकाला।

     

    यह उसकी कॉलेज की फीस की रसीद थी।

     

    फिर एक और।

     

    उसकी किताबों की।

     

    उसके प्रतियोगी फॉर्म की।

     

    रिया अब कुछ बोल नहीं पा रही थी।

     

    “ये सब… आपने किया?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तू पढ़ना चाहती थी।”

     

    “लेकिन आप?”

     

    “मैं काम कर रहा था।”

     

    रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    आरव ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू ये कभी महसूस न करे कि तेरी पढ़ाई किसी पर बोझ है।”

     

    रिया रो पड़ी।

     

    उसे अचानक पिछले कई साल याद आने लगे।

     

    हर बार जब उसे किसी चीज की जरूरत होती, माँ कहतीं—

     

    “देखते हैं।”

     

    और कुछ दिनों बाद वह चीज उसके पास होती।

     

    रिया सोचती थी घर में सब सामान्य है।

     

    उसे नहीं पता था कि उसका भाई उसके लिए अपनी जरूरतें पीछे करता रहा।

     

    रिया ने रोते हुए कहा,

     

    “लेकिन राखी पर आपने मुझे कभी गिफ्ट नहीं दिया।”

     

    आरव ने पहली बार हल्के से हंसकर कहा,

     

    “इसका जवाब मेरे पास है।”

     

    वह अंदर गया।

     

    कुछ देर बाद एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आया।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “खोल।”

     

    रिया ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर बहुत सारी छोटी-छोटी चीजें थीं।

     

    एक बचपन की तस्वीर।

     

    उसकी टूटी हुई पेंसिल का छोटा हिस्सा।

     

    एक पुराना हेयर क्लिप।

     

    स्कूल की एक छोटी फोटो।

     

    रिया की बनाई हुई राखियां।

     

    हर साल की।

     

    रिया हैरान होकर बैठ गई।

     

    “आपने ये सब संभालकर रखा?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मैं गिफ्ट खरीदने में अच्छा नहीं हूं।”

     

    रिया हल्का-सा हंस पड़ी।

     

    “तो?”

     

    “लेकिन चीजें संभालकर रखने में अच्छा हूं।”

     

    रिया ने डिब्बे में रखी राखियों को छुआ।

     

    हर साल की राखी।

     

    किसी का धागा टूट चुका था।

     

    किसी का रंग फीका पड़ गया था।

     

    लेकिन आरव ने एक भी नहीं फेंकी थी।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “भैया, आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि आप ये सब रखते हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तूने कभी पूछा नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने पूछा था… कि आप मुझसे प्यार करते हो या नहीं।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तब मैं क्या बोला था?”

     

    रिया को याद आया।

     

    वह शायद दस साल की थी।

     

    उसने गुस्से में पूछा था,

     

    “भैया, आप मुझे प्यार करते हो?”

     

    आरव ने जवाब दिया था—

     

    “बहुत सवाल करती है।”

     

    उस समय रिया रो पड़ी थी।

     

    आज आरव ने कहा,

     

    “मुझे उस समय कहना चाहिए था।”

     

    रिया की आंखें भर आईं।

     

    “तो आज कहो।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    रिया ने फिर कहा,

     

    “आज साफ-साफ कहो।”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां रिया।”

     

    उसकी आवाज धीमी थी।

     

    “मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं।”

     

    रिया फूटकर रो पड़ी।

     

    वह अपने भाई के गले लग गई।

     

    आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आप बहुत बुरे हो।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “अब क्या कर दिया?”

     

    “पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “तूने फिर पूछा नहीं।”

     

    रिया ने पीछे हटकर कहा,

     

    “अब पूछूंगी भी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब पता है।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    रिया ने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    आरव ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर-सी घड़ी थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि हर रक्षाबंधन पर सिर्फ भाई ही नहीं देता।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    रिया ने कहा,

     

    “इस बार मेरी बारी है।”

     

    आरव की आंखें नम हो गईं।

     

    रिया ने उसकी पुरानी राखियों वाले डिब्बे को देखते हुए कहा,

     

    “भैया, आप गिफ्ट देना नहीं जानते थे…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    रिया मुस्कुराई।

     

    “आपने मुझे सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है—बिना बताए हमेशा मेरे साथ रहना।”

     

    उस दिन रिया को कोई महंगा फोन नहीं मिला।

     

    न कोई चमकदार गिफ्ट।

     

    लेकिन उसे एक ऐसा सच मिल गया, जो किसी भी तोहफे से ज्यादा कीमती था।

     

    उसे समझ आ गया कि—

     

    हर प्यार बोलकर नहीं दिखाया जाता।

     

    कुछ लोग हमें “आई लव यू” नहीं कहते।

     

    वे हमारी फीस भरते हैं।

     

    हमारी जरूरतें पूरी करते हैं।

     

    हमारी छोटी-छोटी बातें याद रखते हैं।

     

    और हमारी बांधी हुई राखियां सालों तक संभालकर रखते हैं।

     

    उस शाम रिया ने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।

     

    उसे आखिरकार अपना रक्षाबंधन का गिफ्ट मिल गया था।

     

    एक ऐसा भाई, जिसने शायद कभी प्यार के बड़े-बड़े शब्द नहीं बोले… लेकिन अपनी हर छोटी-बड़ी चीज में बहन के लिए प्यार छिपाकर रखा।