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  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 12 — ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला)

     

     

     

    वृंदावन में उस दिन भी वही चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें वन के हरे-भरे पत्तों पर पड़ रही थीं। यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं। कदंब के वृक्षों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे। हवा में फूलों की सुगंध घुली हुई थी।

     

    और वृंदावन के एक खुले मैदान में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों और बछड़ों के साथ खेल रहे थे।

     

    कृष्ण के हाथ में आज बाँसुरी नहीं थी। वह कभी किसी मित्र के कंधे पर हाथ रख देते, कभी किसी बछड़े को पुकारते और कभी अचानक दौड़कर किसी को पकड़ लेते।

     

    उनके चारों ओर आनंद ही आनंद था।

     

    किसी के हाथ में दही की पोटली थी, किसी के पास फल थे और कोई अपनी छोटी-सी गठरी खोलकर सबको भोजन बाँट रहा था।

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “देखो, आज हम सब अपना भोजन साथ-साथ करेंगे।”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “लेकिन कन्हैया, तुम फिर मेरा माखन मत चुराना।”

     

    कृष्ण ने तुरंत भोला चेहरा बनाकर कहा,

     

    “मैं? मैं तो कभी किसी का माखन नहीं चुराता।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    “झूठे कन्हैया!”

     

    कृष्ण भी हँसने लगे।

     

    वृंदावन का यह दृश्य जितना सरल था, उतना ही दिव्य भी।

     

    क्योंकि उन साधारण-से दिखने वाले बालकों के बीच स्वयं परम सत्ता बालक बनकर बैठी थी।

     

    उधर, बहुत दूर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी अपने दिव्य आसन पर विराजमान थे।

     

    सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने अनेक लोकों को देखा था। उन्होंने असंख्य जीवों की उत्पत्ति देखी थी। देवताओं, ऋषियों और महान योगियों को देखा था।

     

    लेकिन इन दिनों उनका मन बार-बार वृंदावन की ओर जा रहा था।

     

    उनके सामने एक प्रश्न था।

     

    “वह छोटा-सा कृष्ण आखिर कौन है?”

     

    देवताओं से उन्हें उसके अद्भुत कार्यों का समाचार मिल चुका था।

     

    कभी उसने पूतना जैसी भयानक राक्षसी का अंत कर दिया।

     

    कभी शकटासुर का उद्धार किया।

     

    कभी तृणावर्त के भयंकर तूफान से भी नहीं डरा।

     

    और अब तो ऐसी बात भी सुनने में आई थी कि उस बालक के मुख के भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया था।

     

    ब्रह्मा जी सोचने लगे—

     

    “क्या यह सचमुच कोई साधारण बालक है?”

     

    उनके मन में जिज्ञासा बढ़ती गई।

     

    लेकिन उसी जिज्ञासा के साथ एक सूक्ष्म-सा अहंकार भी उनके भीतर जन्म लेने लगा।

     

    “मैं सृष्टि का रचयिता हूँ। मैं वेदों का ज्ञाता हूँ। मैंने अनेक दिव्य शक्तियों को देखा है। यदि यह बालक वास्तव में परम शक्ति है, तो मुझे इसकी लीला को समझने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए?”

     

    यही विचार धीरे-धीरे उनके मन में घर करने लगा।

     

    और फिर ब्रह्मा जी ने निश्चय किया कि वह स्वयं कृष्ण की लीला को परखेंगे।

     

    इधर वृंदावन में दोपहर हो चुकी थी।

     

    ग्वाल-बाल और कृष्ण यमुना के किनारे बैठकर भोजन करने लगे।

     

    किसी के पास रोटी थी, किसी के पास दही, किसी के पास फल और किसी के पास थोड़ा-सा माखन।

     

    कृष्ण बीच में बैठे थे।

     

    वह कभी किसी की रोटी का टुकड़ा उठा लेते, कभी किसी को अपने हाथ से माखन खिला देते।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कन्हैया, तुम मेरे फल मत लेना।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे पास बस यही एक है।”

     

    कृष्ण ने अपना फल उसकी ओर बढ़ा दिया।

     

    “तो तुम मेरा ले लो।”

     

    बालक की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, बिल्कुल।”

     

    कृष्ण का प्रेम ऐसा ही था।

     

    वह बाँटने में आनंद पाते थे।

     

    तभी अचानक कुछ बछड़े वहाँ से दूर जाने लगे।

     

    एक ग्वाल-बाल ने कहा,

     

    “अरे! बछड़े उधर चले गए।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “तुम लोग भोजन करो। मैं उन्हें लेकर आता हूँ।”

     

    कृष्ण उठे और बछड़ों के पीछे चल पड़े।

     

    उसी क्षण ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य शक्ति से एक अद्भुत लीला रची।

     

    उन्होंने सभी बछड़ों को एक स्थान पर ले जाकर अदृश्य कर दिया।

     

    फिर कुछ ही समय बाद उन्होंने ग्वाल-बालों को भी उसी प्रकार अपनी माया से छिपा दिया।

     

    अब मैदान खाली था।

     

    न बछड़े थे।

     

    न ग्वाल-बाल।

     

    केवल कृष्ण वहाँ खड़े थे।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    उनके मुख पर हल्की मुस्कान थी।

     

    वह समझ गए।

     

    “तो ब्रह्मा जी मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं।”

     

    कृष्ण ने आकाश की ओर देखा।

     

    उनकी मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “ठीक है।”

     

    उन्होंने मन ही मन कहा—

     

    “यदि यही आपकी इच्छा है, तो आपकी लीला भी पूरी हो जाए।”

     

    कृष्ण ने उसी क्षण स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट कर लिया।

     

    हर बछड़ा पहले जैसा हो गया।

     

    हर ग्वाल-बाल भी पहले जैसा दिखाई देने लगा।

     

    किसी के चेहरे पर वही मुस्कान थी।

     

    किसी के हाथ में वही भोजन था।

     

    किसी की आवाज वही थी।

     

    किसी की चाल वही थी।

     

    यहाँ तक कि उनके माता-पिता को भी तनिक संदेह नहीं हुआ।

     

    वृंदावन में किसी को पता ही नहीं चला कि असली बछड़े और ग्वाल-बाल तो ब्रह्मा जी की माया में छिपे हुए हैं।

     

    कृष्ण ने स्वयं हर बछड़े का रूप धारण कर लिया।

     

    स्वयं हर ग्वाल-बाल का रूप धारण कर लिया।

     

    वह हर घर में पुत्र बनकर पहुँच गए।

     

    हर माँ ने अपने बच्चे को पहले की तरह गले लगाया।

     

    लेकिन उस दिन एक अद्भुत परिवर्तन हुआ।

     

    वृंदावन की माताओं का अपने बच्चों के प्रति प्रेम अचानक पहले से भी अधिक बढ़ गया।

     

    वे अपने पुत्रों को देखकर बार-बार उन्हें गले लगातीं।

     

    उन्हें लगता—

     

    “आज न जाने क्यों मेरा लाल पहले से भी अधिक प्यारा लग रहा है।”

     

    गायें भी अपने बछड़ों को देखकर असाधारण प्रेम से भर उठीं।

     

    वे उन्हें चाटतीं, पुकारतीं और बार-बार अपने पास बुलातीं।

     

    क्योंकि अब वे केवल बछड़े नहीं थे।

     

    वे स्वयं कृष्ण थे।

     

    समय बीतता गया।

     

    ब्रह्मा जी को लगा कि उनकी योजना सफल हो गई है।

     

    वह कुछ समय बाद यह देखने के लिए लौटे कि कृष्ण क्या कर रहे हैं।

     

    लेकिन जैसे ही उन्होंने वृंदावन की ओर देखा, उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

     

    “यह क्या?”

     

    उन्होंने देखा—

     

    सभी ग्वाल-बाल पहले की तरह कृष्ण के साथ खेल रहे हैं।

     

    सभी बछड़े भी वहीं हैं।

     

    कृष्ण के साथ भोजन कर रहे हैं।

     

    दौड़ रहे हैं।

     

    हँस रहे हैं।

     

    ब्रह्मा जी चकित रह गए।

     

    “लेकिन मैंने तो इन्हें छिपा दिया था!”

     

    उन्होंने तुरंत उस स्थान की ओर देखा जहाँ उन्होंने असली ग्वाल-बालों और बछड़ों को रखा था।

     

    वहाँ वे सभी वैसे ही मौजूद थे।

     

    ब्रह्मा जी स्तब्ध रह गए।

     

    एक ओर वे ग्वाल-बाल और बछड़े, जिन्हें उन्होंने छिपाया था।

     

    दूसरी ओर वृंदावन में वही ग्वाल-बाल और बछड़े कृष्ण के साथ खेल रहे थे।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    ब्रह्मा जी की बुद्धि चकराने लगी।

     

    उन्होंने ध्यान से देखा।

     

    तभी उन्हें एक और अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

     

    वृंदावन में जितने भी ग्वाल-बाल और बछड़े थे, उनके भीतर उन्हें दिव्य प्रकाश दिखाई देने लगा।

     

    एक-एक करके हर बालक का रूप बदलने लगा।

     

    हर बछड़े का रूप बदलने लगा।

     

    और देखते ही देखते उन्हें हर रूप में वही चार भुजाओं वाले भगवान दिखाई देने लगे।

     

    हर दिशा में वही दिव्य स्वरूप।

     

    हर बालक में वही परम सत्ता।

     

    हर बछड़े में वही अनंत भगवान।

     

    ब्रह्मा जी की आँखें खुली की खुली रह गईं।

     

    उनके भीतर का अहंकार जैसे टूटने लगा।

     

    जिस कृष्ण को वह एक छोटा-सा बालक समझ रहे थे, वही अनंत रूपों में उनके सामने उपस्थित था।

     

    जिस शक्ति को वे अपनी बुद्धि से समझना चाहते थे, वही शक्ति उनके सामने अनगिनत रूपों में खेल रही थी।

     

    ब्रह्मा जी के पास अब कोई शब्द नहीं था।

     

    उन्होंने समझ लिया—

     

    “यह मेरी परीक्षा नहीं है। यह तो मेरी ही परीक्षा हो रही थी।”

     

    कृष्ण की माया के सामने सृष्टि का रचयिता भी स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा था।

     

    ब्रह्मा जी का सिर झुक गया।

     

    उनका अभिमान समाप्त हो चुका था।

     

    वह धीरे-धीरे कृष्ण के पास पहुँचे।

     

    अब कृष्ण फिर वही छोटे-से बालक के रूप में खड़े थे।

     

    हाथ में भोजन का कौर।

     

    चेहरे पर वही मधुर मुस्कान।

     

    आँखों में वही बालपन।

     

    जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    ब्रह्मा जी ने कृष्ण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “प्रभु… मुझे क्षमा कीजिए।”

     

    कृष्ण शांत भाव से उन्हें देखते रहे।

     

    ब्रह्मा जी बोले,

     

    “मैंने अपने ज्ञान पर अभिमान किया। मैंने सोचा कि मैं आपकी लीला को समझ सकता हूँ। मैंने आपकी परीक्षा लेने का प्रयास किया। लेकिन मैं भूल गया कि जिस शक्ति से यह पूरा ब्रह्मांड बना है, उसे मेरी बुद्धि कैसे समझ सकती है?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कोई कठोर शब्द नहीं कहा।

     

    यही तो उनकी करुणा थी।

     

    वह भक्त की भूल देखते थे, लेकिन उसके हृदय का पश्चात्ताप भी देखते थे।

     

    ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “प्रभु, आप सचमुच अद्भुत हैं। आप बालक बनकर खेलते हैं, फिर भी आपके भीतर अनंत लोक समाए हुए हैं। आप अपने भक्तों के लिए स्वयं को छोटा कर लेते हैं, लेकिन आपके स्वरूप की कोई सीमा नहीं।”

     

    कृष्ण ने उन्हें अपनी करुणामयी दृष्टि से देखा।

     

    और तभी ब्रह्मा जी की माया समाप्त हो गई।

     

    ग्वाल-बाल और बछड़े अपने वास्तविक समय में लौट आए।

     

    उनके लिए तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

     

    उन्हें पता तक नहीं चला कि उनके साथ क्या हुआ।

     

    वे उसी प्रकार कृष्ण के साथ खेलते रहे।

     

    कृष्ण ने एक ग्वाल-बाल से कहा,

     

    “चलो, अब घर चलें। मैया इंतजार कर रही होंगी।”

     

    बालक बोला,

     

    “हाँ कन्हैया, लेकिन पहले तुम मेरे साथ दौड़ लगाओ।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “अच्छा, चलो!”

     

    और दोनों दौड़ पड़े।

     

    ब्रह्मा जी दूर खड़े इस दृश्य को देखते रहे।

     

    उनके लिए यह दृश्य अब पहले जैसा नहीं था।

     

    उन्हें अब उस बालक में केवल बालक नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    उन्हें उसमें वह अनंत सत्ता दिखाई दे रही थी, जो कभी यशोदा की गोद में खेलती है, कभी ग्वाल-बालों के साथ भोजन करती है और कभी पूरी सृष्टि को अपनी लीला में समेट लेती है।

     

    ब्रह्मा जी ने मन ही मन प्रणाम किया और अपने लोक की ओर लौट गए।

     

    वृंदावन में शाम उतरने लगी।

     

    गायों के झुंड धीरे-धीरे वापस लौट रहे थे।

     

    उनके पीछे-पीछे ग्वाल-बाल आ रहे थे।

     

    सबसे आगे कृष्ण थे।

     

    उनके होंठों पर मधुर मुस्कान थी।

     

    यमुना की लहरें जैसे उनके चरणों का स्वागत कर रही थीं।

     

    लेकिन वृंदावन की कथा में अब एक नया अध्याय आने वाला था।

     

    कृष्ण की बाल-लीलाएँ अब केवल ग्वाल-बालों और बछड़ों तक सीमित नहीं रहने वाली थीं।

     

    यमुना के जल में एक भयंकर संकट छिपा हुआ था।

     

    उस जल में रहने वाला एक विशाल और विषैला नाग पूरे क्षेत्र को भयभीत कर रहा था।

     

    उसका नाम था—

     

    कालिय।

     

    उसके विष से यमुना का जल दूषित हो चुका था।

     

    पक्षी उसके ऊपर से उड़ते-उड़ते गिर पड़ते।

     

    पशु उस जल के पास जाने से डरते।

     

    वृंदावन के लोगों के मन में भय था।

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस दिन नंदलाल की दृष्टि उस विषैले जल पर पड़ेगी, उस दिन स्वयं कालिय नाग का अहंकार चूर होने वाला है।

     

    और फिर वृंदावन देखेगा एक ऐसी लीला…

     

    जिसमें नन्हा-सा कृष्ण यमुना में छलाँग लगाएगा…

     

    विशाल कालिय नाग से सामना करेगा…

     

    और उसके फनों पर नृत्य करके पूरे संसार को यह संदेश देगा कि—

     

    जहाँ कृष्ण के चरण पड़ जाते हैं, वहाँ विष भी अमृत बन जाता है।

     

    आने वाले भाग में कथा पहुँचेगी यमुना के उसी विषैले तट पर…

     

    जहाँ नंदलाल करेंगे—

     

    “कालिय नाग का दमन।”

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    (भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार)

     

     

     

    वृंदावन की वह सुबह कुछ अलग ही थी।आकाश पर हल्के-हल्के बादल तैर रहे थे। यमुना का जल सूर्य की सुनहरी किरणों को अपने भीतर समेटकर ऐसा चमक रहा था, मानो किसी ने नीले आकाश पर चाँदी की चादर बिछा दी हो। वन में खिले कदंब और तमाल के फूलों की सुगंध हवा में घुली हुई थी। कहीं कोयल कू-कू कर रही थी, तो कहीं रंग-बिरंगे पक्षी वृक्षों की डालियों पर बैठकर अपनी मधुर बोली से वातावरण को आनंदित कर रहे थे।

     

    और उसी मनोहर वृंदावन में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ खेल रहे थे।

     

    कन्हैया के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, जिसे देखकर कोई भी अपना मन हार बैठे।

     

    आज उनके हाथ में न कोई माखन की मटकी थी, न कोई बाँसुरी। आज तो बस खेल ही खेल था।

     

    बलराम जी और दूसरे ग्वाल-बाल कभी दौड़ लगाते, कभी एक-दूसरे को पकड़ने का प्रयास करते और कभी पेड़ों के पीछे छिपकर कृष्ण को ढूँढ़ने का नाटक करते।

     

    कृष्ण कभी किसी को पकड़ लेते तो कभी जान-बूझकर उसके हाथ से निकल जाते।

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “कन्हैया! आज तुम हमसे बच नहीं पाओगे। आज तो हम तुम्हें पकड़कर ही रहेंगे।”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा,

     

    “अच्छा! तो पहले पकड़कर तो दिखाओ।”

     

    इतना कहकर कृष्ण दौड़ पड़े।

     

    सारे ग्वाल-बाल उनके पीछे भागे।

     

    कभी कृष्ण आगे होते, कभी पीछे मुड़कर सबको चिढ़ाते।

     

    “आओ-आओ! पकड़ो मुझे!”

     

    ग्वाल-बाल हँसते हुए उनके पीछे दौड़ते रहे।

     

    दौड़ते-दौड़ते सब वृंदावन के एक ऐसे स्थान पर पहुँच गए जहाँ मिट्टी कुछ नरम थी। वहाँ वर्षा के कारण धरती पर हल्की नमी थी और कुछ जगहों पर मिट्टी के छोटे-छोटे ढेले बने हुए थे।

     

    कृष्ण अचानक वहीं रुक गए।

     

    उनकी दृष्टि उस मिट्टी पर पड़ी।

     

    कन्हैया के मन में न जाने क्या आया।

     

    उन्होंने नीचे झुककर मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा उठा लिया।

     

    एक ग्वाल-बाल ने उन्हें देख लिया।

     

    वह चिल्लाया,

     

    “अरे! कन्हैया मिट्टी खा रहा है!”

     

    बस फिर क्या था।

     

    सभी ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए।

     

    “कृष्ण ने मिट्टी खाई!”

     

    “हाँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है!”

     

    “चलो, मैया को बताते हैं!”

     

    कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।

     

    “मैंने मिट्टी नहीं खाई।”

     

    एक ग्वाल-बाल बोला,

     

    “झूठ बोल रहे हो कन्हैया! हमने देखा है।”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर कहा,

     

    “तुम लोगों ने गलत देखा होगा।”

     

    बलराम जी भी वहाँ खड़े मुस्कुरा रहे थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैया से पूछ लेना, फिर पता चल जाएगा।”

     

    कृष्ण ने बलराम की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में जैसे विनती थी—

     

    “दाऊ, तुम तो मेरे भाई हो!”

     

    बलराम हँस पड़े।

     

    “मैं क्या करूँ कन्हैया? सच तो सच है।”

     

    अब ग्वाल-बालों ने निश्चय कर लिया कि वे यशोदा मैया के पास जाकर सारी बात बताएँगे।

     

    कुछ ही देर में वे दौड़ते हुए नंद भवन पहुँचे।

     

    यशोदा मैया उस समय घर के काम में लगी थीं। उनके हाथों में माखन लगा हुआ था और पास ही दही की मटकी रखी थी।

     

    तभी ग्वाल-बालों की आवाज सुनाई दी—

     

    “मैया! मैया!”

     

    यशोदा ने पलटकर देखा।

     

    सारे बच्चे एक साथ खड़े थे।

     

    मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ लाला? ऐसे क्यों दौड़ते हुए आए हो?”

     

    एक ग्वाल-बाल ने तुरंत शिकायत कर दी—

     

    “मैया! कन्हैया ने मिट्टी खाई है!”

     

    दूसरा बोला,

     

    “हाँ मैया, हमने देखा है।”

     

    तीसरा बोला,

     

    “बहुत सारी मिट्टी खाई है!”

     

    यशोदा मैया का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उन्होंने पूछा,

     

    “कन्हैया ने मिट्टी खाई?”

     

    सबने एक साथ सिर हिला दिया।

     

    “हाँ मैया!”

     

    यशोदा मैया ने गहरी साँस ली।

     

    “अच्छा, तो आज अपने नटखट लाल की खबर लेनी पड़ेगी।”

     

    वह तुरंत कृष्ण को ढूँढ़ने चल पड़ीं।

     

    थोड़ी दूर पर कृष्ण अपने मित्रों के साथ खड़े थे।

     

    जैसे ही उन्होंने मैया को आते देखा, उनकी शरारती आँखों में एक पल के लिए चिंता झलक गई।

     

    यशोदा मैया ने पास आकर कहा,

     

    “कन्हैया!”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “जी मैया?”

     

    “तुमने मिट्टी खाई है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “इन सबने झूठ बोला है?”

     

    कृष्ण ने अपने मित्रों की ओर देखा।

     

    फिर बोले,

     

    “हाँ मैया। ये सब मुझे परेशान कर रहे हैं।”

     

    यशोदा ने बलराम की ओर देखा।

     

    “दाऊ, तुम बताओ। क्या कन्हैया ने मिट्टी खाई?”

     

    बलराम कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मैया… कन्हैया ने मिट्टी उठाई तो थी।”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    “तो फिर?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “मैया, मैंने मिट्टी नहीं खाई। मैंने तो बस उसे देखा था।”

     

    ग्वाल-बाल हँस पड़े।

     

    एक बोला,

     

    “मैया! कन्हैया झूठ बोल रहे हैं।”

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अच्छा! बहुत हो गई तुम्हारी शरारत। मुँह खोलो।”

     

    कृष्ण पीछे हटने लगे।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “मुँह खोलो!”

     

    “मैया, मैंने सच में मिट्टी नहीं खाई।”

     

    “तो फिर डर किस बात का है?”

     

    कृष्ण चुप हो गए।

     

    यशोदा मैया ने थोड़ा कठोर स्वर में कहा,

     

    “कन्हैया, मुँह खोलो।”

     

    कृष्ण ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोल दिया।

     

    और फिर…

     

    जो दृश्य यशोदा मैया ने देखा, उसे देखकर उनकी आँखें स्थिर हो गईं।

     

    कृष्ण के छोटे-से मुख के भीतर उन्हें मिट्टी का कोई कण दिखाई नहीं दिया।

     

    वहाँ तो कुछ और ही था।

     

    कुछ ऐसा, जिसकी कल्पना कोई साधारण मनुष्य नहीं कर सकता।

     

    यशोदा मैया ने देखा—

     

    मानो कृष्ण के मुख के भीतर पूरा आकाश समाया हुआ हो।

     

    सूर्य दिखाई दे रहा था।

     

    चंद्रमा दिखाई दे रहा था।

     

    असंख्य तारे चमक रहे थे।

     

    पर्वत थे।

     

    नदियाँ थीं।

     

    समुद्र थे।

     

    वन थे।

     

    नगर थे।

     

    गाँव थे।

     

    पृथ्वी थी।

     

    और उस पृथ्वी पर असंख्य जीव-जंतु दिखाई दे रहे थे।

     

    उन्होंने यमुना को भी देखा।

     

    वृंदावन को भी देखा।

     

    नंद भवन को भी देखा।

     

    और…

     

    उन्होंने स्वयं को भी देखा।

     

    वही यशोदा मैया कृष्ण के सामने खड़ी थीं।

     

    और उनके सामने कृष्ण खड़े थे।

     

    लेकिन उस कृष्ण के मुख के भीतर फिर वही संसार दिखाई दे रहा था।

     

    एक और वृंदावन।

     

    एक और यशोदा।

     

    एक और कृष्ण।

     

    और उस दूसरे कृष्ण के मुख में फिर वही संसार!

     

    यशोदा मैया का हृदय जैसे थम गया।

     

    उनकी आँखें फैल गईं।

     

    वह कुछ समझ नहीं पा रही थीं।

     

    “यह… यह क्या है?”

     

    उनके मन में अनेक प्रश्न उठने लगे।

     

    “क्या मैं स्वप्न देख रही हूँ?”

     

    उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल बाद फिर खोलीं।

     

    दृश्य वही था।

     

    कृष्ण का मुख खुला था और उसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ था।

     

    यशोदा मैया के मन में अचानक एक विचार आया—

     

    “क्या मेरा यह नन्हा-सा लाल वही परम शक्ति है, जिसकी चर्चा ऋषि-मुनि करते हैं?”

     

    लेकिन अगले ही क्षण उनके हृदय ने उस विचार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

     

    “नहीं… यह मेरा कन्हैया है।”

     

    वही कन्हैया जो सुबह उठते ही मेरे आँचल को पकड़ लेता है।

     

    वही कन्हैया जो भूख लगने पर मुझे पुकारता है।

     

    वही कन्हैया जो माखन चुराकर भागता है।

     

    वही कन्हैया जो मेरी डाँट सुनकर मासूम चेहरा बना लेता है।

     

    भला वह स्वयं भगवान कैसे हो सकता है?

     

    यशोदा की आँखों में आँसू भर आए।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में अब शरारत नहीं थी।

     

    बस वही निश्छल बालपन था।

     

    “मैया…”

     

    यशोदा जैसे नींद से जागीं।

     

    उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    उनके हृदय में उमड़ते प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “मेरा लाल…”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी बाँहें मैया के गले में डाल दीं।

     

    उस क्षण यशोदा को न ब्रह्मांड दिखाई दिया, न अनंत आकाश, न कोई दिव्य शक्ति।

     

    उन्हें केवल अपना पुत्र दिखाई दिया।

     

    उनका नंदलाल।

     

    उनका लाड़ला।

     

    उनकी आँखों का तारा।

     

    और यही तो उस लीला की सबसे अद्भुत बात थी।

     

    जिस परम सत्ता को बड़े-बड़े योगी ध्यान में खोजते हैं, जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनि वर्षों तक तप करते हैं, वही अनंत सत्ता यशोदा की गोद में एक छोटे बालक की तरह बैठी थी।

     

    परंतु कृष्ण की माया भी अद्भुत थी।

     

    कुछ ही क्षणों में यशोदा मैया का मन फिर सामान्य होने लगा।

     

    उन्हें लगा जैसे अभी जो कुछ उन्होंने देखा, वह शायद किसी दिव्य भ्रम के समान था।

     

    उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “चलो, अब घर चलो। बहुत शरारत हो गई।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैया, मुझे भूख लगी है।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी तो मिट्टी खाई थी, अब भूख भी लग गई?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “मैंने मिट्टी कहाँ खाई थी मैया?”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    फिर सब खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि अभी-अभी जिस बालक के मुख में उन्होंने अनंत ब्रह्मांड देखा था, वही कुछ ही देर में फिर किसी नई शरारत के लिए तैयार होने वाला है।

     

    वृंदावन में दिन ढलने लगा।

     

    सूर्य पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चला।

     

    गायों के गले में बँधी घंटियाँ मधुर स्वर में बजने लगीं।

     

    ग्वाल-बाल अपने-अपने घर लौटने लगे।

     

    कृष्ण भी मैया की उँगली पकड़कर नंद भवन की ओर चल पड़े।

     

    लेकिन उस दिन के बाद वृंदावन की हवा में जैसे कोई अनकहा रहस्य तैरने लगा।

     

    कन्हैया केवल नंद-यशोदा के पुत्र नहीं थे।

     

    उनके छोटे-से शरीर में अनंत संसार छिपा था।

     

    उनकी बाल मुस्कान में ऐसी शक्ति थी, जिसे कोई समझ नहीं सकता था।

     

    और उनकी हर शरारत के पीछे कोई न कोई दिव्य रहस्य छिपा हुआ था।

     

    परंतु यह रहस्य केवल यशोदा मैया तक सीमित नहीं रहने वाला था।

     

    दूर ब्रह्मलोक में एक महान देवता भी कृष्ण की इन अद्भुत लीलाओं को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे।

     

    ब्रह्मा जी के मन में एक प्रश्न उठने लगा—

     

    “क्या वास्तव में यह वही परम तत्व है, जिसे वेद खोजते हैं?”

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “यदि यह बालक सचमुच स्वयं परमेश्वर है, तो इसकी लीला की सीमा क्या है?”

     

    और यही प्रश्न आगे चलकर एक ऐसी अद्भुत घटना का कारण बनने वाला था, जिसमें स्वयं ब्रह्मा जी भी कृष्ण की माया के सामने चकित हो जाएँगे।

     

    वह कृष्ण की ऐसी लीला होगी, जिसमें समय ठहर जाएगा…

     

    ग्वाल-बालों का रूप बदल जाएगा…

     

    बछड़ों का रूप बदल जाएगा…

     

    और स्वयं ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास होगा।

     

    लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा—

     

    जब स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी कृष्ण की परीक्षा लेने का प्रयास करेंगे, तब नंदलाल उन्हें क्या उत्तर देंगे?

     

    वृंदावन की धूल में छिपा वह रहस्य अब ब्रह्मलोक तक पहुँच चुका था…

     

    और अगले भाग में आरंभ होगी—

     

    “ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला”।

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ)

     

     

     

     

    यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार की अद्भुत घटना को कुछ दिन बीत चुके थे।गोकुल में अभी भी उस दिन की चर्चा होती थी। कोई कहता कि नंदलाल ने अपनी छोटी-सी शक्ति से इतने विशाल वृक्ष गिरा दिए, तो कोई कहता कि उन वृक्षों में कोई दिव्य रहस्य छिपा था।

     

    लेकिन कृष्ण को इन बातों से कोई मतलब नहीं था।

     

    उनके लिए जीवन का हर दिन एक नया खेल था।

     

    सुबह होते ही उनकी आँखों में शरारत की चमक आ जाती।

     

    गायों की घंटियाँ सुनते ही वे आँगन की ओर दौड़ते।

     

    अपने सखाओं की आवाज सुनते ही खेल के लिए निकल पड़ते।

     

    और जब उनकी मधुर हँसी गोकुल की गलियों में गूँजती, तो लगता जैसे स्वयं आनंद ने बालक का रूप धारण कर लिया हो।

     

    उस दिन भी सुबह कुछ ऐसा ही हुआ।

     

    वन जाने की तैयारी

     

    सूरज अभी पूरी तरह ऊपर नहीं आया था।

     

    आकाश पर हल्की सुनहरी आभा थी।

     

    नंदभवन के बाहर गायें और बछड़े खड़े थे।

     

    ग्वाल-बाल एक-एक करके वहाँ इकट्ठे होने लगे।

     

    श्रीदामा ने आवाज लगाई,

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    सुभल भी बोला,

     

    “आज बहुत दूर तक जाएँगे।”

     

    कृष्ण घर के भीतर से दौड़ते हुए बाहर आए।

     

    उनके हाथ में छोटी-सी बाँसुरी थी।

     

    कमर पर पीतांबर बँधा था।

     

    बालों में मोरपंख सजा था।

     

    चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखते ही कहा,

     

    “कान्हा, इतनी सुबह कहाँ जाने की तैयारी है?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मैया, हम गायों को चराने वन में जाएँगे।”

     

    यशोदा मैया ने थोड़ा चिंतित होकर कहा,

     

    “बहुत दूर मत जाना।”

     

    “नहीं जाऊँगा।”

     

    “अपने सखाओं से दूर मत होना।”

     

    “नहीं होऊँगा।”

     

    “और किसी शरारत में मत पड़ना।”

     

    कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखकर कहा,

     

    “मैया, मैं तो कभी शरारत करता ही नहीं।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अब तुम मुझे भी अपनी बातों से बहकाने लगे?”

     

    कृष्ण दौड़कर मैया से लिपट गए।

     

    मैया ने उनके माथे पर हाथ फेरा।

     

    “सावधान रहना बेटा।”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    फिर अपने सखाओं के साथ चल पड़े।

     

    गोकुल से वृंदावन की ओर

     

    ग्वाल-बालों का छोटा-सा समूह गायों और बछड़ों के साथ आगे बढ़ रहा था।

     

    किसी के हाथ में बाँसुरी थी।

     

    किसी के हाथ में छोटी लकड़ी।

     

    कोई रास्ते में पत्थर उछाल रहा था।

     

    कोई गायों को नाम लेकर पुकार रहा था।

     

    और सबसे आगे कृष्ण चल रहे थे।

     

    उनके पीछे-पीछे उनकी गायें चल रही थीं।

     

    कृष्ण कभी पीछे मुड़कर देखते और कहते,

     

    “सब साथ चलो!”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा, आज हम नदी के पास चलेंगे।”

     

    सुभल बोला,

     

    “नदी के पास जाकर खेलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हाँ! और फिर देखते हैं कौन सबसे तेज दौड़ सकता है।”

     

    एक बालक बोला,

     

    “मैं तुमसे तेज दौड़ूँगा।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “पहले पकड़कर तो दिखाओ।”

     

    और बस!

     

    दौड़ शुरू हो गई।

     

    कुछ बच्चे आगे।

     

    कुछ पीछे।

     

    गायें इधर-उधर।

     

    बछड़े उछलते-कूदते।

     

    और कृष्ण सबके बीच हँसते हुए दौड़ रहे थे।

     

    वन की सुंदरता

     

    कुछ दूर जाकर वे एक सुंदर वन में पहुँचे।

     

    चारों ओर हरियाली थी।

     

    ऊँचे-ऊँचे वृक्ष।

     

    लताओं से ढकी डालियाँ।

     

    रंग-बिरंगे फूल।

     

    भौरों की गुनगुनाहट।

     

    पक्षियों का मधुर कलरव।

     

    ठंडी हवा।

     

    और पास ही बहती यमुना की निर्मल धारा।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में प्रसन्नता भर गई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “देखो सखाओं! कितना सुंदर है हमारा वन।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “हाँ कान्हा! यहाँ तो मन करता है कि हम रोज आएँ।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो रोज आना।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    खेलों की शुरुआत

     

    गायें घास चरने लगीं।

     

    बछड़े इधर-उधर दौड़ने लगे।

     

    ग्वाल-बालों ने अपना खेल शुरू कर दिया।

     

    कभी वे एक-दूसरे के पीछे दौड़ते।

     

    कभी पेड़ की छाया में बैठकर बातें करते।

     

    कभी गेंद की तरह मिट्टी का गोला बनाकर खेलते।

     

    कभी कोई अपनी बाँसुरी बजाता और बाकी बच्चे उसकी नकल करते।

     

    कृष्ण सबके साथ ऐसे घुल-मिल जाते जैसे वे उनके मित्र ही नहीं, बल्कि उनके बीच के सबसे साधारण बालक हों।

     

    एक दिन श्रीदामा ने कहा,

     

    “कान्हा, आज हम देखते हैं कि कौन सबसे ऊँचे पेड़ तक चढ़ सकता है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    सब बच्चे पेड़ की ओर दौड़े।

     

    कोई एक शाखा तक पहुँचा।

     

    कोई दूसरी तक।

     

    कृष्ण तो देखते ही देखते ऊपर पहुँच गए।

     

    श्रीदामा ने नीचे से कहा,

     

    “कान्हा! तुम तो बहुत तेज हो।”

     

    कृष्ण हँसे।

     

    “अभी तो खेल शुरू हुआ है।”

     

    वे ऊपर से कुछ पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगे।

     

    सभी बच्चे उन्हें पकड़ने लगे।

     

    फिर किसी ने कहा,

     

    “अब देखते हैं कौन सबसे पहले नीचे उतरता है!”

     

    सब नीचे उतरने लगे।

     

    कुछ फिसले।

     

    कुछ हँसे।

     

    और कुछ गिरते-गिरते बच गए।

     

    कृष्ण सबसे पहले नीचे पहुँच गए।

     

    सभी बोले,

     

    “कान्हा जीत गए!”

     

    कृष्ण हँसकर बोले,

     

    “जीत तो हम सबकी हुई।”

     

    भोजन का समय

     

    दोपहर होने लगी।

     

    सूरज थोड़ा तेज हो गया।

     

    गायें छाया में बैठ गईं।

     

    ग्वाल-बाल भी एक बड़े वृक्ष के नीचे बैठ गए।

     

    सब अपने-अपने घर से लाया हुआ भोजन निकालने लगे।

     

    किसी के पास रोटी थी।

     

    किसी के पास दही।

     

    किसी के पास फल।

     

    किसी के पास गुड़।

     

    कृष्ण ने अपना भोजन खोला।

     

    उनके पास मैया ने प्रेम से माखन और रोटी रखी थी।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, तुम्हारे पास क्या है?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “माखन।”

     

    सभी बच्चे तुरंत कृष्ण के पास आ गए।

     

    “हमें भी दो।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने माखन सबमें बाँटना शुरू कर दिया।

     

    किसी को थोड़ा अधिक।

     

    किसी को थोड़ा कम।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कान्हा, मुझे ज्यादा दो।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं सबसे ज्यादा भूखा हूँ।”

     

    कृष्ण ने उसे थोड़ा और दे दिया।

     

    दूसरा बोला,

     

    “मुझे भी!”

     

    फिर तीसरा।

     

    कुछ ही देर में कृष्ण का अपना माखन लगभग समाप्त हो गया।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “अब तुम क्या खाओगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम सबके साथ खाऊँगा।”

     

    उन्होंने सबके भोजन में से थोड़ा-थोड़ा लेकर खाना शुरू कर दिया।

     

    सभी मित्र हँसने लगे।

     

    बाँसुरी की मधुर धुन

     

    भोजन के बाद सभी बच्चे कुछ देर विश्राम करने लगे।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    हवा धीरे-धीरे बह रही थी।

     

    कृष्ण ने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    उन्होंने आँखें बंद कीं।

     

    और बाँसुरी पर एक मधुर धुन छेड़ दी।

     

    मधुर… मधुर…

     

    जैसे ही बाँसुरी की धुन वन में फैली, वातावरण बदल गया।

     

    पक्षी चुप हो गए।

     

    जैसे वे भी उस धुन को सुनना चाहते हों।

     

    हवा मानो कुछ क्षणों के लिए ठहर गई।

     

    गायों ने अपना चरना रोक दिया।

     

    बछड़े कृष्ण की ओर देखने लगे।

     

    ग्वाल-बाल मंत्रमुग्ध होकर कृष्ण को देखने लगे।

     

    श्रीदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कान्हा, तुम्हारी बाँसुरी में ऐसा क्या है?”

     

    कृष्ण ने हँसकर पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “इसे सुनते ही सब शांत हो जाते हैं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “शायद बाँसुरी सबको मित्र बनाना जानती है।”

     

    सुभल बोला,

     

    “नहीं कान्हा। बात बाँसुरी की नहीं, तुम्हारी है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    एक नया खेल

     

    थोड़ी देर बाद कृष्ण ने कहा,

     

    “चलो, अब एक खेल खेलते हैं।”

     

    सब तैयार हो गए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हम दो दल बनाएँगे।”

     

    एक दल का नेतृत्व श्रीदामा करेगा।

     

    दूसरे का मैं करूँगा।

     

    फिर दोनों दलों के बीच दौड़ की प्रतियोगिता होगी।

     

    सभी बच्चे उत्साहित हो गए।

     

    “हाँ!”

     

    “चलो!”

     

    “आज देखते हैं कौन जीतता है।”

     

    दौड़ शुरू हुई।

     

    एक ओर श्रीदामा।

     

    दूसरी ओर कृष्ण।

     

    बच्चे उनके पीछे।

     

    कभी कोई आगे निकलता।

     

    कभी कोई पीछे।

     

    कृष्ण जानबूझकर थोड़ा धीमे हो जाते ताकि उनके मित्र आगे निकल जाएँ।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! तुम जानबूझकर हार रहे हो!”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “हारना भी तो एक खेल है।”

     

    अंत में सभी बच्चे एक साथ लक्ष्य तक पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “देखा! कोई हारा नहीं।”

     

    गायों के साथ कान्हा

     

    खेलते-खेलते कृष्ण को अपनी गायों की चिंता हुई।

     

    वे उठे और उन्हें ढूँढ़ने लगे।

     

    “सुभल, देखो हमारी गायें कहाँ हैं।”

     

    सुभल ने दूर इशारा किया।

     

    “वहाँ हैं।”

     

    कृष्ण उनके पास गए।

     

    एक गाय कृष्ण को देखते ही उनके पास आ गई।

     

    कृष्ण ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम यहाँ हो?”

     

    गाय ने जैसे प्रेम से उनकी ओर देखा।

     

    कृष्ण ने उसके गले को सहलाया।

     

    गाय के बछड़े भी कृष्ण के पास आ गए।

     

    कृष्ण उन्हें पुचकारने लगे।

     

    ग्वाल-बाल यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    श्रीदामा ने कहा,

     

    “कान्हा, तुम्हें गायें बहुत पसंद हैं।”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “गायें हमें प्रेम देती हैं। हमें भी उनका ध्यान रखना चाहिए।”

     

    उन्होंने सभी बछड़ों को एक साथ किया।

     

    फिर सबको धीरे-धीरे आगे ले जाने लगे।

     

    वन में अचानक एक विचित्र आवाज

     

    दिन धीरे-धीरे ढलने लगा था।

     

    सूरज पश्चिम की ओर झुकने लगा।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “अब हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    सभी बालक अपनी गायों को इकट्ठा करने लगे।

     

    तभी दूर से एक अजीब-सी आवाज सुनाई दी।

     

    गूँऽऽऽ…

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “यह कैसी आवाज है?”

     

    सुभल बोला,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कृष्ण ने भी ध्यान से उस दिशा में देखा।

     

    फिर दूसरी आवाज आई।

     

    इस बार कुछ अधिक भारी।

     

    घुर्रर्र…

     

    ग्वाल-बालों के चेहरे पर चिंता आ गई।

     

    एक बालक बोला,

     

    “कहीं कोई जंगली जानवर तो नहीं?”

     

    दूसरा बोला,

     

    “चलो यहाँ से।”

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “डरो मत। सब मेरे पास रहो।”

     

    सभी बच्चे कृष्ण के पास आ गए।

     

    गायें भी कुछ बेचैन होने लगीं।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    उनकी आवाज में ऐसा विश्वास था कि बच्चों का डर थोड़ा कम हो गया।

     

    लेकिन तभी झाड़ियों के पीछे कुछ हिला।

     

    पत्तियाँ जोर-जोर से काँपने लगीं।

     

    कृष्ण ने अपने सखाओं को पीछे रहने का संकेत किया।

     

    कुछ क्षणों तक सब शांत रहा।

     

    फिर अचानक झाड़ियों से एक विशाल आकृति बाहर आई।

     

    ग्वाल-बालों की आँखें फैल गईं।

     

    कुछ बच्चे डरकर पीछे हट गए।

     

    किसी ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मैं हूँ। डरो मत।”

     

    लेकिन वह आकृति धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी।

     

    उसका रूप भयावह था।

     

    गायें पीछे हटने लगीं।

     

    पक्षी उड़ गए।

     

    वन का वातावरण अचानक बदल गया।

     

    जहाँ कुछ क्षण पहले हँसी गूँज रही थी, वहाँ अब भय का सन्नाटा था।

     

    कृष्ण ने अपने सखाओं की ओर देखा।

     

    “सब यहीं रहो।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा, तुम अकेले मत जाना!”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं अकेला कहाँ हूँ? तुम सबका प्रेम मेरे साथ है।”

     

    यह कहकर कृष्ण उस रहस्यमयी आकृति की ओर बढ़ने लगे।

     

    उनके कदम छोटे थे।

     

    लेकिन उनके चेहरे पर तनिक भी भय नहीं था।

     

    सभी ग्वाल-बाल साँस रोककर उन्हें देखते रहे।

     

    और तभी…

     

    उस रहस्यमयी जीव ने अपना विशाल मुँह खोल दिया।

     

    ग्वाल-बाल भय से चिल्ला उठे—

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण उस विशाल आकृति के सामने खड़े थे।

     

    लेकिन किसी को पता नहीं था कि वह कौन था और क्यों उनके मार्ग में आया था।

     

    उस दिन की बाल-क्रीड़ा अब एक ऐसी घटना में बदलने वाली थी, जिसमें कृष्ण की अद्भुत शक्ति फिर से प्रकट होने वाली थी।

     

    अगली कड़ी में—

     

    भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार

     

    कान्हा की बाल-लीलाओं का एक और अद्भुत प्रसंग सामने आएगा। एक दिन खेलते-खेलते कृष्ण के सखाओं ने यशोदा मैया से शिकायत कर दी कि कान्हा ने माटी खा ली है।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—

     

    “कान्हा, तुमने माटी खाई है?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से मना कर दिया।

     

    लेकिन जब मैया ने कहा—

     

    “अच्छा, अपना मुँह खोलो।”

     

    तब जो दृश्य यशोदा मैया की आँखों के सामने प्रकट हुआ, उसे देखकर उनका पूरा संसार जैसे थम गया।

     

    आखिर कृष्ण के छोटे-से मुँह के भीतर ऐसा क्या दिखाई दिया था?

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार)

     

     

     

    गोकुल में उस दिन की सुबह अब धीरे-धीरे दोपहर की ओर बढ़ रही थी।नंदभवन के आँगन में यशोदा मैया अपने काम में व्यस्त थीं। कुछ देर पहले तक उनके नन्हे कान्हा की शरारतों से पूरा घर गूँज रहा था। मटकी टूट चुकी थी, दही आँगन में फैल चुका था और अंत में यशोदा मैया ने अपने नटखट लाल को एक भारी लकड़ी की ओखली से बाँध दिया था।

     

    मैया को लगा था कि अब कान्हा कुछ देर शांत बैठेंगे।

     

    लेकिन वे यह भूल गई थीं कि उनका कान्हा साधारण बालक नहीं था।

     

    वह तो ऐसा बालक था, जिसके लिए पूरा संसार भी खेल का मैदान था।

     

    कृष्ण ओखली से बँधे हुए चुपचाप बैठे थे।

     

    उनकी छोटी-छोटी आँखें कभी मैया की ओर जातीं, कभी आँगन की ओर और कभी सामने खड़े दो विशाल वृक्षों पर टिक जातीं।

     

    वे दोनों वृक्ष बहुत पुराने थे।

     

    इतने विशाल कि उनकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं।

     

    गोकुल के बच्चों के लिए वे दोनों वृक्ष किसी पहाड़ से कम नहीं थे।

     

    उनके नीचे अक्सर पक्षी बैठते।

     

    गोपियाँ वहाँ से गुजरतीं।

     

    ग्वाल-बाल कभी उनके आसपास खेलते।

     

    लेकिन आज उन वृक्षों के सामने स्वयं नंदलाल खड़े थे।

     

    रस्सी से बँधे हुए।

     

    ओखली पीछे।

     

    और आँखों में शरारत की चमक।

     

    कान्हा ने मन में कुछ ठाना

     

    कृष्ण ने धीरे से ओखली को देखा।

     

    उन्होंने एक बार उसे खींचा।

     

    ओखली थोड़ी-सी आगे सरकी।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    उन्होंने फिर जोर लगाया।

     

    ओखली कुछ और आगे बढ़ी।

     

    अब कृष्ण की आँखों में उत्साह था।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैरों को जमीन पर जमाया और पूरी शक्ति से आगे बढ़ने लगे।

     

    ओखली उनके पीछे घिसटती जा रही थी।

     

    घुर्र… घुर्र…

     

    मिट्टी पर ओखली के घिसटने की आवाज आने लगी।

     

    पास खेल रहे कुछ बालकों ने यह देखा तो वे दौड़कर कृष्ण के पास आ गए।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वहाँ।”

     

    उन्होंने दोनों वृक्षों की ओर इशारा किया।

     

    सुभल ने आश्चर्य से कहा,

     

    “लेकिन तुम तो बँधे हुए हो!”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा,

     

    “बँधा हूँ… लेकिन चल तो सकता हूँ।”

     

    सभी बालक हँस पड़े।

     

    एक बालक बोला,

     

    “यशोदा मैया ने कहा है कि तुम कहीं मत जाना।”

     

    कृष्ण ने मासूम चेहरा बनाकर कहा,

     

    “मैं कहाँ जा रहा हूँ? मैं तो बस खेल रहा हूँ।”

     

    सभी सखा कृष्ण के पीछे-पीछे चलने लगे।

     

    दो विशाल वृक्ष

     

    कृष्ण अब उन दोनों वृक्षों के बिल्कुल पास पहुँच चुके थे।

     

    दोनों वृक्ष इतने पास-पास खड़े थे कि उनके बीच से एक बालक निकल सकता था, लेकिन ओखली थोड़ी चौड़ी थी।

     

    कृष्ण ने वृक्षों को देखा।

     

    फिर ओखली को।

     

    फिर वृक्षों के बीच की जगह को।

     

    उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आई।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “अगर मैं यहाँ से निकल जाऊँ तो?”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    ओखली वृक्षों के बीच फँस गई।

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    ओखली अटक चुकी थी।

     

    सुभल बोला,

     

    “कान्हा! अब क्या करोगे?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “अब इसे निकालेंगे।”

     

    उन्होंने रस्सी को पकड़ा।

     

    फिर जोर लगाया।

     

    ओखली नहीं हिली।

     

    कृष्ण ने फिर जोर लगाया।

     

    पेड़ों की जड़ें जैसे हिलने लगीं।

     

    ग्वाल-बालों की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! धीरे!”

     

    लेकिन कृष्ण ने जैसे कुछ और ही ठान लिया था।

     

    उन्होंने फिर अपने छोटे-से शरीर में पूरी शक्ति लगाई।

     

    और तभी—

     

    चर्रर्र…!

     

    एक अजीब-सी आवाज हुई।

     

    वृक्षों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    पत्ते तेज़ी से काँपने लगे।

     

    पक्षी घबराकर उड़ गए।

     

    ग्वाल-बाल पीछे हट गए।

     

    कृष्ण ने रस्सी खींची।

     

    और अगले ही क्षण—

     

    धड़ाम!!!

     

    दोनों विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े।

     

    गोकुल की धरती काँप उठी।

     

    धूल का बादल चारों ओर फैल गया।

     

    पक्षी आकाश में उड़ने लगे।

     

    बच्चे डरकर इधर-उधर भागे।

     

    और कुछ ही क्षणों में वहाँ एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

     

    जहाँ अभी दो विशाल वृक्ष खड़े थे, वहाँ अब धरती पर उनके तने पड़े थे।

     

    कृष्ण अपनी ओखली के साथ उनके बीच खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर वही प्यारी-सी मुस्कान थी।

     

    गोकुल में मची हलचल

     

    वृक्षों के गिरने की आवाज इतनी तेज थी कि नंदभवन तक पहुँच गई।

     

    यशोदा मैया घबरा गईं।

     

    उन्होंने तुरंत बाहर आकर पूछा,

     

    “यह कैसी आवाज हुई?”

     

    एक गोपी दौड़ती हुई आई।

     

    “मैया! मैया! जल्दी चलिए!”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कान्हा…!”

     

    कृष्ण का नाम सुनते ही यशोदा मैया का हृदय धड़क उठा।

     

    “क्या हुआ मेरे कान्हा को?”

     

    गोपी ने कहा,

     

    “वे उन बड़े वृक्षों के पास थे।”

     

    यशोदा मैया बिना कुछ सोचे दौड़ पड़ीं।

     

    उनके पीछे कई गोपियाँ और गोकुलवासी भी चल पड़े।

     

    जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा—

     

    दोनों विशाल वृक्ष धरती पर पड़े थे।

     

    और उनके बीच उनका कान्हा ओखली से बँधा हुआ बैठा था।

     

    यशोदा मैया दौड़कर कृष्ण के पास पहुँचीं।

     

    “कान्हा!”

     

    उन्होंने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    “बेटा, तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    यशोदा मैया ने उन्हें चारों ओर से देखा।

     

    उनके हाथ देखे।

     

    पैर देखे।

     

    चेहरा देखा।

     

    कहीं कोई चोट नहीं थी।

     

    उन्होंने राहत की साँस ली।

     

    फिर बोलीं,

     

    “तुम यहाँ कैसे आए?”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से कहा,

     

    “मैया, मैं तो यहीं बैठा था।”

     

    एक गोपी हँसते हुए बोली,

     

    “मैया, आपका कान्हा यहीं बैठा था… लेकिन वृक्ष स्वयं चलकर गिर गए!”

     

    सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या था।

     

    रहस्य गहरा था

     

    गोकुल के बड़े-बुजुर्ग उन वृक्षों को देखकर हैरान थे।

     

    इतने विशाल वृक्ष…

     

    एक साथ कैसे गिर सकते थे?

     

    वह भी बिना किसी आँधी या तूफान के?

     

    नंदबाबा भी वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने वृक्षों को देखा।

     

    फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर पूछा,

     

    “यह कैसे हुआ?”

     

    किसी के पास उत्तर नहीं था।

     

    श्रीदामा आगे आया।

     

    उसने कहा,

     

    “बाबा, कान्हा ओखली खींचते हुए वृक्षों के बीच चला गया था।”

     

    नंदबाबा ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “फिर ओखली अटक गई।”

     

    “और?”

     

    “फिर कान्हा ने उसे खींचा।”

     

    “फिर?”

     

    श्रीदामा ने दोनों हाथ फैलाकर कहा,

     

    “फिर दोनों पेड़ गिर गए!”

     

    गोकुलवासी आश्चर्य से कृष्ण को देखने लगे।

     

    इतना छोटा बालक…

     

    और इतने विशाल वृक्ष?

     

    लेकिन कृष्ण तो बिल्कुल सामान्य बालक की तरह यशोदा मैया की गोद में बैठे थे।

     

    उनके हाथ में अभी भी माखन का थोड़ा-सा निशान लगा था।

     

    उनके बाल बिखरे हुए थे।

     

    चेहरे पर भोली मुस्कान थी।

     

    उन्हें देखकर कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था कि कुछ क्षण पहले उनके कारण दो विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े थे।

     

    वृक्षों से निकले दो दिव्य पुरुष

     

    लेकिन असली रहस्य अभी सामने आना बाकी था।

     

    अचानक वहाँ एक दिव्य प्रकाश फैलने लगा।

     

    गोकुलवासियों ने देखा कि गिरे हुए दोनों वृक्षों के स्थान से दो अत्यंत तेजस्वी पुरुष प्रकट हो रहे हैं।

     

    उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

     

    वे साधारण मनुष्य नहीं लग रहे थे।

     

    उनके वस्त्र चमक रहे थे।

     

    उनके चेहरे पर तेज था।

     

    सभी गोकुलवासी आश्चर्य से पीछे हट गए।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को और कसकर अपनी गोद में पकड़ लिया।

     

    लेकिन कृष्ण शांत थे।

     

    दोनों दिव्य पुरुष सीधे कृष्ण के सामने आए।

     

    उन्होंने हाथ जोड़ लिए।

     

    उनकी आँखों में भक्ति और कृतज्ञता थी।

     

    गोकुलवासियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

     

    वे सोच रहे थे—

     

    “ये कौन हैं?”

     

    तभी उनमें से एक ने कृष्ण के चरणों की ओर झुककर प्रणाम किया।

     

    और बोला,

     

    “प्रभु! आपकी कृपा से आज हमारा उद्धार हुआ।”

     

    यशोदा मैया यह सुनकर और भी आश्चर्यचकित हो गईं।

     

    “प्रभु?”

     

    उन्होंने अपने कान्हा की ओर देखा।

     

    कृष्ण तो उनकी गोद में बैठे थे।

     

    उनके पैरों में धूल लगी थी।

     

    लेकिन वे दिव्य पुरुष उन्हें भगवान कहकर प्रणाम कर रहे थे।

     

    नलकूबर और मणिग्रीव की कथा

     

    वे दोनों दिव्य पुरुष वास्तव में कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे।

     

    कभी वे अत्यंत धनवान और शक्तिशाली थे।

     

    धन और ऐश्वर्य के कारण उनके भीतर अहंकार आ गया था।

     

    एक बार वे अपनी शक्ति और संपत्ति के मद में इतने डूब गए कि उन्होंने महान ऋषि नारद का भी सम्मान नहीं किया।

     

    ऋषि नारद ने उनके भीतर छिपे अहंकार को देखा।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “इनका अहंकार इनके लिए ही विनाश का कारण बनेगा। इन्हें ऐसा जीवन मिलना चाहिए जिसमें इन्हें अपने कर्मों पर विचार करने का अवसर मिले।”

     

    ऋषि ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप दिया।

     

    लेकिन वह शाप वास्तव में उनके लिए वरदान बन गया।

     

    क्योंकि ऋषि नारद ने यह भी कहा था कि जब स्वयं भगवान कृष्ण उन्हें स्पर्श करेंगे, तब उनका उद्धार होगा।

     

    इसलिए वे दोनों लंबे समय तक वृक्ष के रूप में खड़े रहे।

     

    ऋतुएँ बदलती रहीं।

     

    वर्षा आई।

     

    गर्मी आई।

     

    सर्दी आई।

     

    पक्षियों ने उनके ऊपर घोंसले बनाए।

     

    गोकुल के बच्चे उनके नीचे खेलते रहे।

     

    लेकिन वे दोनों प्रतीक्षा करते रहे—

     

    उस क्षण की प्रतीक्षा, जब नंदलाल उनके पास आएँगे।

     

    और आज वह क्षण आ चुका था।

     

    प्रभु के सामने पश्चाताप

     

    नलकूबर ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “हे प्रभु! हमें अपने धन और शक्ति का इतना अहंकार हो गया था कि हम धर्म और विनम्रता को भूल गए थे।”

     

    मणिग्रीव ने कहा,

     

    “ऋषि नारद का शाप हमारे लिए दंड नहीं, कृपा बन गया। उनके कारण हमें आपके दर्शन प्राप्त हुए।”

     

    दोनों ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हे नंदलाल! आपने हमें इस वृक्ष रूपी बंधन से मुक्त कर दिया। हम आपकी कृपा को कभी नहीं भूलेंगे।”

     

    कृष्ण उन्हें देखकर मुस्कुराए।

     

    उनके छोटे-से चेहरे पर ऐसी करुणा थी, जैसे वे सब कुछ पहले से जानते हों।

     

    फिर दोनों दिव्य पुरुषों ने कृष्ण को प्रणाम किया।

     

    और देखते ही देखते उनका दिव्य प्रकाश आकाश की ओर उठने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में वे दोनों वहाँ से अदृश्य हो गए।

     

    गोकुलवासी स्तब्ध थे

     

    कुछ समय तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    सबके मन में एक ही प्रश्न था—

     

    “हमारे कान्हा आखिर हैं कौन?”

     

    लेकिन यशोदा मैया के लिए उस समय ये प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं था।

     

    उनके लिए तो उनका कान्हा केवल उनका बेटा था।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और बोलीं,

     

    “बस बहुत हो गया! आज के बाद तुम मेरी नजरों से दूर नहीं जाओगे।”

     

    कृष्ण मैया के गले से लग गए।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “मैया, अब रस्सी खोलोगी?”

     

    यशोदा मैया ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “हाँ बेटा।”

     

    उन्होंने रस्सी खोल दी।

     

    कृष्ण आज़ाद हो गए।

     

    लेकिन जैसे ही वे जमीन पर उतरे, उनके चेहरे पर फिर वही शरारती मुस्कान लौट आई।

     

    श्रीदामा ने धीरे से कहा,

     

    “कान्हा, आज तो तुमने दो पेड़ गिरा दिए।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा,

     

    “मैंने नहीं गिराए।”

     

    “तो किसने गिराए?”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें घुमाईं।

     

    “शायद हवा ने।”

     

    सभी ग्वाल-बाल हँस पड़े।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को फिर अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “बस! अब कोई और शरारत नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    लेकिन उनके मन में तो अगली लीला पहले ही जन्म ले चुकी थी।

     

    लीला का रहस्य

     

    उस दिन गोकुल में देर तक इसी घटना की चर्चा होती रही।

     

    कोई कहता,

     

    “कृष्ण ने पेड़ गिराए।”

     

    कोई कहता,

     

    “यह कोई दिव्य घटना थी।”

     

    कोई कहता,

     

    “इन वृक्षों में कोई रहस्य जरूर था।”

     

    लेकिन कृष्ण?

     

    वे तो शाम होते-होते अपने सखाओं के साथ फिर खेलने निकल गए।

     

    जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    उनके लिए यह सब खेल था।

     

    लेकिन भक्तों के लिए यह संदेश था—

     

    अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, भगवान की कृपा उसे मिटा सकती है।

     

    और प्रेम की बात तो सबसे अद्भुत थी।

     

    जिस कृष्ण को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँध दिया था, वही कृष्ण दो विशाल वृक्षों में बँधी दिव्य आत्माओं को मुक्त करने वाले बन गए।

     

    एक ओर वे अपनी मैया के लिए नन्हे बालक थे।

     

    दूसरी ओर वे समस्त संसार के लिए उद्धारकर्ता।

     

    यही तो नंदलाल की बाल-लीला की अद्भुतता थी।

     

    शाम का समय

     

    सूरज धीरे-धीरे अस्त होने लगा।

     

    गोकुल के आकाश में लालिमा फैल गई।

     

    गायें चरकर वापस लौट रही थीं।

     

    गोपियाँ अपने घरों के बाहर दीप जलाने लगीं।

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलकर लौटे।

     

    यशोदा मैया द्वार पर खड़ी उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    कृष्ण दौड़कर मैया के पास आए।

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “आ गए मेरे लाल?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    मैया ने पूछा,

     

    “आज फिर कोई शरारत तो नहीं की?”

     

    कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    मैया ने उनकी आँखों में देखा।

     

    फिर मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारी आँखें बता रही हैं कि तुम कुछ सोच रहे हो।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैया, कल बताऊँगा।”

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    बस मैया के कंधे पर सिर रख दिया।

     

    लेकिन उस रात गोकुल को क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ ऐसी क्रीड़ा करने वाले हैं, जिसमें उनकी हँसी, उनकी बाँसुरी, गायों की घंटियाँ और वृंदावन की हरियाली एक साथ मिलकर ऐसा मधुर दृश्य बनाएँगी, जिसे देखकर देवता भी मोहित हो जाएँगे।

     

    और इसी के साथ नंदलाल की बाल-लीलाएँ एक नए रंग में प्रवेश करने वाली थीं।

     

    अगली कड़ी में—

     

    भाग 10 — ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की क्रीड़ाएँ

     

    जहाँ कान्हा अपने सखाओं के साथ गायों और बछड़ों को लेकर वन की ओर जाएँगे। वहाँ खेल, हँसी, दौड़ और बाल-सुलभ शरारतों के बीच कृष्ण अपने मित्रों के साथ ऐसी मधुर लीला करेंगे कि पूरा वृंदावन आनंद से भर उठेगा।

     

    लेकिन उस वन में एक ऐसी घटना भी होने वाली थी, जो कृष्ण के सखाओं को कुछ समय के लिए भयभीत कर देगी…

     

    आखिर वन में ऐसा क्या होने वाला था?

     

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  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

    (भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा)

     

     

     

     

    गोकुल में उस दिन सुबह से ही एक अलग-सी चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें नंदभवन के आँगन में फैल रही थीं। गायों की घंटियों की मधुर आवाज वातावरण में गूँज रही थी। बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे और गोकुल की गलियों में गोपियाँ अपने-अपने घरों के काम में व्यस्त थीं।

     

    लेकिन नंदभवन के भीतर यशोदा मैया एक विशेष काम में लगी हुई थीं।

     

    वे स्वयं अपने हाथों से दही मथ रही थीं।

     

    मटकी में दही घूम रहा था और मथनी की आवाज पूरे आँगन में मधुर लय पैदा कर रही थी।

     

    यशोदा मैया के होंठों पर धीरे-धीरे एक गीत था।

     

    वह गीत किसी देवता के लिए नहीं था।

     

    वह गीत उनके अपने लाल के लिए था।

     

    उनका मन बार-बार उसी नन्हे कान्हा की ओर जा रहा था।

     

    वे सोच रही थीं—

     

    “मेरा लाल अब कितना बड़ा हो गया है। दिनभर गोकुल में दौड़ता रहता है। कभी किसी के घर से माखन चुरा लाता है, कभी मटकी फोड़ देता है, कभी बंदरों को माखन खिला देता है। न जाने कब सुधरेगा मेरा कान्हा!”

     

    यह सोचते-सोचते उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्हें क्या पता था कि उनका वही नटखट लाल आज फिर ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर पूरा गोकुल हँसेगा और स्वयं यशोदा मैया को उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा।

     

    कान्हा को भी चाहिए था मैया का प्रेम

     

    कृष्ण उस समय आँगन में खेल रहे थे।

     

    कभी मिट्टी में अपनी छोटी-सी लकड़ी घुमाते।

     

    कभी किसी बछड़े के पीछे भागते।

     

    कभी अपने सखाओं को आवाज लगाते।

     

    लेकिन थोड़ी ही देर में उन्हें अपनी मैया की याद आने लगी।

     

    वे धीरे-धीरे चलकर यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    मैया दही मथने में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    फिर मटकी की ओर देखा।

     

    फिर मैया की गोद की ओर।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ मेरे लाल?”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “गोद में लो।”

     

    यशोदा मैया ने मथनी रोक दी।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    कान्हा मैया के गले से लग गए।

     

    यशोदा मैया ने उनके बालों को सहलाते हुए पूछा,

     

    “क्या हुआ? आज इतनी जल्दी मैया की याद आ गई?”

     

    कृष्ण कुछ नहीं बोले।

     

    बस मैया से लिपटे रहे।

     

    यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

     

    फिर बोलीं,

     

    “अच्छा, बताओ क्या चाहिए?”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया की ओर देखा।

     

    “माखन।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अभी तो दही मथ रही हूँ।”

     

    “मुझे अभी चाहिए।”

     

    “थोड़ा इंतजार करो।”

     

    कृष्ण ने मुँह फुला लिया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कान्हा, तुम बहुत जिद्दी हो गए हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आप मुझे माखन दे दो, मैं जिद नहीं करूँगा।”

     

    मैया बोलीं,

     

    “अच्छा, पहले बैठो।”

     

    कृष्ण मैया की गोद में बैठ गए।

     

    लेकिन तभी बाहर से किसी बछड़े की आवाज आई।

     

    कृष्ण ने उस ओर देखा।

     

    फिर मैया की गोद से उतरने लगे।

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कहाँ जा रहे हो?”

     

    कृष्ण बोले,

     

    “बाहर।”

     

    “पहले माखन तो खा लो।”

     

    कृष्ण फिर बैठ गए।

     

    यशोदा मैया ने माखन निकाला और अपने हाथ से कृष्ण को खिलाने लगीं।

     

    कृष्ण बड़े आनंद से माखन खाने लगे।

     

    लेकिन तभी…

     

    चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा।

     

    यशोदा मैया ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने कृष्ण को नीचे बैठाया और कहा,

     

    “बेटा, तुम यहीं बैठो। मैया अभी आती है।”

     

    और वे दूध बचाने के लिए रसोई की ओर चली गईं।

     

    कान्हा का रूठना

     

    कृष्ण ने मैया को जाते हुए देखा।

     

    उनके हाथ में अभी माखन लगा था।

     

    वे कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी नाराजगी दिखाई दी।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “मैया मुझे छोड़कर दूध बचाने चली गईं!”

     

    उनका नन्हा-सा मन अपनी माँ का पूरा ध्यान चाहता था।

     

    उन्होंने पास रखी मटकी की ओर देखा।

     

    फिर एक छोटी-सी लकड़ी उठाई।

     

    और मटकी पर हल्के से प्रहार किया।

     

    ठक!

     

    मटकी में दरार आ गई।

     

    फिर एक और प्रहार।

     

    ठक!

     

    और मटकी टूट गई।

     

    दही और माखन नीचे गिरने लगा।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    फिर मुस्कुराए।

     

    उन्होंने माखन उठाया और खाने लगे।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने अपने सखाओं को भी बुला लिया।

     

    बंदर भी आ गए।

     

    अब आँगन में फिर वही पुरानी शरारत शुरू हो गई।

     

    यशोदा मैया ने देखा

     

    कुछ देर बाद यशोदा मैया वापस आईं।

     

    उन्होंने देखा कि जिस मटकी को उन्होंने बड़े प्रेम से तैयार किया था, वह टूटी पड़ी है।

     

    दही पूरे फर्श पर फैला हुआ है।

     

    और उनका कान्हा?

     

    वह पास ही बैठा माखन खा रहा है।

     

    यशोदा मैया ने पहले कुछ क्षणों तक उसे देखा।

     

    फिर उनकी आँखों में हल्का क्रोध आ गया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    मैया को देखते ही समझ गए कि आज स्थिति गंभीर है।

     

    उन्होंने तुरंत उठकर भागना शुरू कर दिया।

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “रुको!”

     

    लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

     

    वे आँगन से बाहर भागे।

     

    माँ और पुत्र की दौड़

     

    कृष्ण आगे।

     

    यशोदा मैया पीछे।

     

    कृष्ण कभी दाएँ जाते, कभी बाएँ।

     

    कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।

     

    कभी किसी गाय के पीछे।

     

    कभी अचानक मुड़कर मैया की ओर देखते और हँस देते।

     

    यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण फिसलकर निकल जाते।

     

    उनके पैरों में बंधी छोटी-छोटी पायल छन-छन कर रही थीं।

     

    उनके घुँघराले बाल माथे पर आ गए थे।

     

    वे हँसते हुए भाग रहे थे।

     

    यशोदा मैया भी दौड़ते-दौड़ते थकने लगीं।

     

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

     

    आखिरकार एक क्षण ऐसा आया जब कृष्ण पीछे हटते-हटते एक कोने में पहुँच गए।

     

    अब आगे जाने का रास्ता नहीं था।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास पहुँचीं।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    उनकी आँखों में अब थोड़ी चिंता थी।

     

    मैया ने कहा,

     

    “क्यों रे नटखट! बहुत दौड़ा लिया अपनी मैया को?”

     

    कृष्ण ने धीरे से सिर झुका लिया।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    कृष्ण अब मैया की बाँहों में थे।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैया, अब नहीं करूँगा।”

     

    मैया बोलीं,

     

    “हर बार यही कहते हो।”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “फिर वही शरारत करते हो।”

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा मैया का मन पिघलने लगा।

     

    लेकिन आज वे केवल प्यार करके छोड़ देना नहीं चाहती थीं।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”

     

    कृष्ण को बाँधने का विचार

     

    आँगन में एक बड़ी-सी लकड़ी की ओखली रखी थी।

     

    यशोदा मैया ने सोचा कि कृष्ण को कुछ देर इसी के पास बैठा देती हैं, ताकि वह फिर कोई शरारत न करे।

     

    उन्होंने एक रस्सी उठाई।

     

    कृष्ण ने रस्सी देखी तो उनकी आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “मैया, यह क्या है?”

     

    “तुम्हें बाँधूँगी।”

     

    कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “मुझे?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम बहुत शरारत करते हो।”

     

    कृष्ण ने तुरंत दोनों हाथ जोड़ दिए।

     

    “मैया, नहीं।”

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “आज नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    मैया ने रस्सी से उन्हें ओखली के पास बाँधने का प्रयास किया।

     

    लेकिन जैसे ही उन्होंने रस्सी बाँधी—

     

    वह छोटी पड़ गई।

     

    यशोदा मैया ने सोचा—

     

    “अरे! यह रस्सी तो छोटी है।”

     

    उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ दी।

     

    फिर बाँधने लगीं।

     

    लेकिन फिर भी रस्सी थोड़ी छोटी पड़ गई।

     

    मैया ने तीसरी रस्सी जोड़ी।

     

    फिर भी वही स्थिति।

     

    यशोदा मैया आश्चर्य में पड़ गईं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “यह कैसे हो रहा है?”

     

    कृष्ण चुपचाप मैया को देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    गोपियाँ भी आ गईं

     

    इतने में पास की कुछ गोपियाँ वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने देखा कि यशोदा मैया अपने कान्हा को बाँधने की कोशिश कर रही हैं।

     

    एक गोपी ने हँसते हुए कहा,

     

    “मैया, हमने तो पहले ही कहा था कि आपका कान्हा बहुत नटखट है।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “लेकिन आज तो लगता है रस्सी भी हार गई।”

     

    तीसरी बोली,

     

    “कान्हा को बाँधना इतना आसान नहीं है।”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “तुम लोग हँसो मत। जरा मेरी सहायता करो।”

     

    गोपियों ने दूसरी रस्सी ला दी।

     

    मैया ने उसे जोड़ दिया।

     

    फिर कोशिश की।

     

    फिर भी रस्सी छोटी।

     

    अब यशोदा मैया को थोड़ा आश्चर्य होने लगा।

     

    उन्होंने कृष्ण की ओर देखा।

     

    “कान्हा, तुम इतने बड़े कब हो गए?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    मैया ने फिर प्रयास किया।

     

    एक और रस्सी जोड़ी।

     

    अब भी वही स्थिति।

     

    गोपियाँ आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    किसी ने कहा,

     

    “मैया, यह तो बड़ी अद्भुत बात है।”

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “अद्भुत-वद्भुत कुछ नहीं। मेरा बच्चा है। बस रस्सी छोटी पड़ रही है।”

     

    उन्होंने फिर रस्सी बढ़ाई।

     

    लेकिन हर बार रस्सी बाँधने पर दो अंगुल की कमी रह जाती।

     

    मैया के माथे पर पसीना आने लगा।

     

    वे थक चुकी थीं।

     

    लेकिन उनके मन में अपने लाल के लिए दृढ़ता थी।

     

    वात्सल्य के आगे झुक गए भगवान

     

    कृष्ण अपनी मैया को देख रहे थे।

     

    वे देख रहे थे कि मैया कितनी मेहनत कर रही हैं।

     

    उनके माथे पर पसीने की बूँदें थीं।

     

    बाल थोड़े बिखर गए थे।

     

    लेकिन वे अपने पुत्र को बाँधने के लिए लगातार प्रयास कर रही थीं।

     

    कृष्ण के हृदय में अपनी मैया के प्रति प्रेम उमड़ आया।

     

    वे तो स्वयं अनंत थे।

     

    जिन्हें कोई बाँध नहीं सकता।

     

    लेकिन आज एक माँ का प्रेम उन्हें बाँधने के लिए तैयार था।

     

    कृष्ण ने सोचा—

     

    “मेरी मैया थक गई हैं। उनका प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा बंधन है।”

     

    और तभी…

     

    जब यशोदा मैया ने फिर से रस्सी बाँधी—

     

    इस बार रस्सी पूरी हो गई।

     

    मैया ने आश्चर्य से देखा।

     

    कृष्ण अब ओखली से बँधे थे।

     

    गोपियाँ प्रसन्न हो गईं।

     

    यशोदा मैया ने राहत की साँस ली।

     

    उन्होंने कृष्ण के माथे से पसीना पोंछा।

     

    और बोलीं,

     

    “अब बैठो यहाँ। थोड़ी देर शांति से रहो।”

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा।

     

    उनके चेहरे पर कोई क्रोध नहीं था।

     

    बल्कि एक प्यारी-सी मुस्कान थी।

     

    जैसे वे कह रहे हों—

     

    “मैया, तुम्हारे प्रेम ने मुझे बाँध लिया।”

     

    नाम पड़ा — दामोदर

     

    कृष्ण का पेट रस्सी से बँधा था।

     

    इसी कारण आगे चलकर उन्हें दामोदर नाम से भी पुकारा गया।

     

    लेकिन यह केवल रस्सी का बंधन नहीं था।

     

    यह एक माँ के प्रेम का बंधन था।

     

    ऐसा प्रेम, जिसके सामने स्वयं भगवान भी अपने अनंत स्वरूप को भूलकर बालक बन जाते हैं।

     

    यशोदा मैया अपने काम में वापस चली गईं।

     

    उन्हें लगा कि अब कान्हा कुछ देर शांति से बैठेंगे।

     

    लेकिन…

     

    क्या सचमुच कान्हा इतनी आसानी से शांत बैठने वाले थे?

     

    कृष्ण ने ओखली की ओर देखा।

     

    फिर सामने की ओर।

     

    थोड़ी दूरी पर दो बहुत बड़े वृक्ष खड़े थे।

     

    वे ऊँचे थे।

     

    बहुत पुराने थे।

     

    कृष्ण उन्हें कुछ देर तक देखते रहे।

     

    फिर उनकी आँखों में वही पुरानी शरारती चमक लौट आई।

     

    उन्होंने ओखली को देखा।

     

    फिर वृक्षों को।

     

    और धीरे से मुस्कुराए।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे हाथों से ओखली को खींचने की कोशिश की।

     

    ओखली थोड़ी-सी हिली।

     

    कृष्ण ने फिर खींचा।

     

    ओखली आगे बढ़ी।

     

    वे मुस्कुराए।

     

    फिर एक बार और जोर लगाया।

     

    ओखली घिसटती हुई वृक्षों की ओर बढ़ने लगी।

     

    गोकुल में किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह नन्हा-सा बालक अब ऐसी लीला करने वाला है, जिसे देखकर सबकी आँखें आश्चर्य से खुली रह जाएँगी।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे उन दोनों विशाल वृक्षों के बीच पहुँचने लगे।

     

    ओखली पीछे से उनके साथ घिसट रही थी।

     

    फिर कृष्ण ने एक बार जोर लगाया।

     

    और…

     

    धरती काँप उठी।

     

    1. दोनों विशाल वृक्ष हिलने लगे।

     

    गोकुलवासियों को समझ ही नहीं आया कि अचानक यह कैसी आवाज हुई।

     

    यशोदा मैया भी चौंककर बाहर देखने लगीं।

     

    उनकी आँखों के सामने जो दृश्य था, उसे देखकर वे स्तब्ध रह गईं।

     

    आखिर उन दोनों विशाल वृक्षों के भीतर ऐसा क्या रहस्य छिपा था?

     

    और क्यों नन्हे कान्हा अपनी ओखली को लेकर उन्हीं वृक्षों के बीच जा रहे थे?

     

    अगली कड़ी में जानिए—

     

    भाग 9 — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार……✍️✍️

     

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत)

     

     

     

    गोकुल की सुबह हमेशा की तरह बहुत सुंदर थी।सूरज की हल्की सुनहरी किरणें नंदबाबा के आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ मधुर स्वर में बज रही थीं। कहीं बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे, तो कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथ रही थीं।

     

    लेकिन उस सुबह नंदभवन में कुछ अलग ही होने वाला था।

     

    क्योंकि नंदलाल के मन में एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    पिछली कथा में आपने देखा था कि कृष्ण माखन चुराने के लिए गोकुल की गोपियों के घर-घर जाते थे। कभी वे अपने सखाओं की सहायता से ऊँची मटकी तक पहुँचते, कभी माखन बंदरों को खिला देते और कभी पकड़े जाने पर इतनी भोली मुस्कान देते कि शिकायत करने आई गोपियों का सारा क्रोध ही गायब हो जाता।

     

    लेकिन उस दिन यशोदा मैया ने मन में ठान लिया था—

     

    “आज मैं अपने कान्हा को माखन की मटकी के पास भी नहीं जाने दूँगी।”

     

    उन्होंने सुबह-सुबह ही घर की सारी मटकियाँ सँभालकर रख दी थीं।

     

    कुछ मटकियाँ ऊँची जगह पर रखीं।

     

    कुछ को कपड़े से ढक दिया।

     

    और एक बड़ी मटकी को उन्होंने अपने पास ही रख लिया।

     

    उसमें ताजा दही जमा था और ऊपर मलाई की मोटी परत तैर रही थी।

     

    कृष्ण की नजर उस मटकी पर पड़ते ही उनकी आँखों में चमक आ गई।

     

    वे कुछ देर तक चुपचाप मटकी को देखते रहे।

     

    फिर मैया की ओर देखा।

     

    मैया अपने काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर मन ही मन कहा—

     

    “आज तो इस मटकी का माखन मुझे ही खाना है।”

     

    कान्हा की योजना

     

    कृष्ण धीरे-धीरे अपने सखाओं के पास पहुँचे।

     

    श्रीदामा और सुभल पहले से ही आँगन के बाहर खेल रहे थे।

     

    कृष्ण ने उन्हें इशारे से बुलाया।

     

    “इधर आओ।”

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “आज एक बहुत जरूरी काम है।”

     

    सुभल ने आँखें बड़ी करके पूछा,

     

    “कैसा काम?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर इशारा किया।

     

    “वह देख रहे हो?”

     

    दोनों ने मटकी की ओर देखा।

     

    श्रीदामा तुरंत समझ गया।

     

    “माखन?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    सुभल बोला,

     

    “लेकिन कान्हा, यशोदा मैया तो यहीं हैं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “इसीलिए तो योजना बनानी पड़ेगी।”

     

    तीनों कुछ देर सोचने लगे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “पहले तुम दोनों मैया का ध्यान दूसरी ओर लगाओ।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “और तुम?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर देखते हुए कहा,

     

    “मैं अपना काम करूँगा।”

     

    दोनों सखा हँस पड़े।

     

    मैया का ध्यान भटकाना

     

    श्रीदामा और सुभल यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    श्रीदामा ने कहा,

     

    “मैया!”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “हमने बाहर एक बहुत सुंदर बछड़ा देखा है।”

     

    सुभल तुरंत बोला,

     

    “मैया, वह तो कान्हा के पीछे-पीछे आ रहा है।”

     

    यशोदा मैया ने बाहर देखने के लिए अपना ध्यान दूसरी ओर किया।

     

    बस!

     

    यही तो कृष्ण चाहते थे।

     

    उन्होंने तुरंत मटकी के पास जाकर उसे देखा।

     

    मटकी काफी भारी थी।

     

    कृष्ण ने पहले उसे उठाने की कोशिश की।

     

    लेकिन वे अभी छोटे थे।

     

    मटकी हिली तक नहीं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    फिर पास पड़ी एक छोटी-सी लकड़ी की चौकी को खींचकर मटकी के नीचे रखा।

     

    उसके ऊपर चढ़े।

     

    फिर भी मटकी तक हाथ पूरी तरह नहीं पहुँच रहा था।

     

    कृष्ण ने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ ऊपर किया।

     

    उँगलियाँ मटकी के किनारे तक पहुँचीं।

     

    उन्होंने उसे थोड़ा अपनी ओर खींचा।

     

    मटकी हल्के से हिली।

     

    कृष्ण के चेहरे पर खुशी छा गई।

     

    उन्होंने दोनों हाथों से उसे पकड़ लिया।

     

    लेकिन तभी—

     

    छन्न!

     

    मटकी थोड़ा और झुकी।

     

    कृष्ण ने उसे संभालने की कोशिश की।

     

    लेकिन मटकी भारी थी।

     

    और फिर—

     

    धड़ाम!

     

    मटकी नीचे गिर पड़ी।

     

    मटकी टूट गई।

     

    दही और माखन आँगन में फैल गया।

     

    कुछ क्षणों के लिए पूरा आँगन शांत हो गया।

     

    कृष्ण वहीं खड़े रहे।

     

    उनकी आँखें टूटे हुए बर्तन पर थीं।

     

    फिर उन्होंने अपने हाथों को देखा।

     

    फिर आँगन में फैले माखन को।

     

    उनके चेहरे पर पहले थोड़ी चिंता आई।

     

    लेकिन अगले ही क्षण उनके होंठों पर शरारती मुस्कान लौट आई।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “अब माखन छिपेगा कहाँ?”

     

    सखाओं की हँसी

     

    श्रीदामा और सुभल दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने टूटी मटकी देखी तो दोनों हँसने लगे।

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “कान्हा! आज तो मैया तुम्हें जरूर डाँटेंगी।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “डाँटेंगी तो डाँटेंगी। पहले माखन खा लेते हैं।”

     

    सुभल ने पूछा,

     

    “इतना सारा?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “हमारे लिए, तुम्हारे लिए और बंदरों के लिए भी।”

     

    तीनों बालक माखन खाने लगे।

     

    कुछ माखन हाथों में।

     

    कुछ मुँह पर।

     

    कुछ कपड़ों पर।

     

    कृष्ण ने थोड़ा माखन उठाकर श्रीदामा के गाल पर लगा दिया।

     

    श्रीदामा ने भी बदले में कृष्ण के गाल पर माखन लगा दिया।

     

    अब दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे।

     

    कृष्ण की हँसी पूरे आँगन में गूँजने लगी।

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उनकी यह हँसी अब ज्यादा देर तक छिपी नहीं रहने वाली थी।

     

    यशोदा मैया ने देखा दृश्य

     

    यशोदा मैया वापस आँगन में आईं।

     

    उन्होंने देखा—

     

    मटकी टूटी हुई।

     

    दही पूरे फर्श पर फैला हुआ।

     

    माखन इधर-उधर बिखरा हुआ।

     

    और बीच में उनका कान्हा!

     

    कृष्ण के गाल पर माखन लगा था।

     

    हाथ माखन से सने थे।

     

    और वे अपने सखाओं के साथ खिलखिलाकर हँस रहे थे।

     

    यशोदा मैया कुछ क्षणों तक उन्हें देखती रहीं।

     

    फिर उन्होंने थोड़ा कठोर स्वर बनाया।

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण की हँसी अचानक रुक गई।

     

    उन्होंने धीरे से मैया की ओर देखा।

     

    मैया के चेहरे पर हल्का-सा क्रोध था।

     

    कृष्ण समझ गए—

     

    अब मुसीबत आ गई है।

     

    वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।

     

    यशोदा मैया बोलीं,

     

    “रुको!”

     

    कृष्ण रुक गए।

     

    “यह मटकी किसने तोड़ी?”

     

    कृष्ण ने नीचे देखा।

     

    फिर धीरे से बोले,

     

    “मैया…”

     

    “हाँ?”

     

    “मटकी स्वयं गिर गई।”

     

    यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “स्वयं?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो चौकी किसने रखी?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “उसके ऊपर कौन चढ़ा था?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “और माखन किसने खाया?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “बंदरों ने।”

     

    यशोदा मैया ने उनकी ओर देखा।

     

    फिर उनके मुँह पर लगा माखन देखा।

     

    उनके हाथों पर लगा माखन देखा।

     

    और फिर मुस्कुराकर बोलीं,

     

    “अच्छा! तो बंदर तुम्हारे मुँह में माखन लगा गए?”

     

    कृष्ण समझ गए कि अब कोई बहाना काम नहीं करेगा।

     

    वे धीरे-धीरे पीछे हटे।

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “कान्हा, आज तुम बच नहीं सकते।”

     

    कृष्ण ने एक पल मैया को देखा।

     

    फिर अचानक—

     

    दौड़ पड़े!

     

    शुरू हुई कान्हा की दौड़

     

    कृष्ण आँगन से बाहर भागे।

     

    यशोदा मैया भी उनके पीछे दौड़ीं।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कृष्ण हँसते हुए बोले,

     

    “मैया, पकड़ लो!”

     

    यशोदा मैया ने कहा,

     

    “आज तो पकड़कर ही रहूँगी!”

     

    कृष्ण कभी दाएँ भागते, कभी बाएँ।

     

    कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।

     

    फिर अचानक दूसरी ओर निकल जाते।

     

    यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण उनकी पकड़ से निकल जाते।

     

    गोकुल की कुछ गोपियाँ यह दृश्य देख रही थीं।

     

    वे मुस्कुराने लगीं।

     

    एक गोपी ने दूसरी से कहा,

     

    “देखो, आज यशोदा मैया के हाथ भी कान्हा नहीं आ रहे।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “हमने तो पहले ही कहा था, तुम्हारा कान्हा बहुत नटखट है।”

     

    तीसरी हँसते हुए बोली,

     

    “आज मटकी भी टूट गई और मैया का धैर्य भी।”

     

    यशोदा मैया ने उनकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “आप लोग हँसिए मत! अगर पकड़ में आ गया तो आज इसकी सारी शरारत निकाल दूँगी।”

     

    लेकिन कृष्ण यह सुनते ही और तेज भागने लगे।

     

    नंदलाल की मुस्कान

     

    कृष्ण की पायल छन-छन करती हुई बज रही थी।

     

    उनके घुँघराले बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें चमक रही थीं।

     

    लेकिन चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने आखिर उन्हें एक कोने में घेर लिया।

     

    कृष्ण ने पीछे देखा।

     

    एक ओर दीवार।

     

    दूसरी ओर मैया।

     

    अब भागने का रास्ता नहीं था।

     

    यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास आईं।

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया…”

     

    “क्या?”

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    “क्या नहीं करोगे?”

     

    कृष्ण ने थोड़ा सोचकर कहा,

     

    “मटकी नहीं तोड़ूँगा।”

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “माखन चुराओगे?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    मैया ने कहा,

     

    “बोलो!”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर आप अपने हाथ से खिलाएँगी तो नहीं चुराऊँगा।”

     

    यशोदा मैया के चेहरे का कठोर भाव फिर पिघल गया।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।

     

    उनके गाल पर हाथ फेरा।

     

    “तुम मुझे बहुत परेशान करते हो, कान्हा।”

     

    कृष्ण ने मैया के गले से लगकर कहा,

     

    “लेकिन मैया, आप मुझे प्यार भी तो बहुत करती हो।”

     

    यशोदा मैया की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कृष्ण को चूम लिया।

     

    “हाँ बेटा… बहुत प्यार करती हूँ।”

     

    गोपियों की हँसी

     

    इतने में कुछ गोपियाँ वहाँ पहुँच गईं।

     

    एक गोपी बोली,

     

    “मैया, आज तो आपका कान्हा सचमुच पकड़ा गया।”

     

    दूसरी बोली,

     

    “और माखन भी गया, मटकी भी गई।”

     

    तीसरी ने हँसते हुए कहा,

     

    “अब देखना, कल फिर किसी के घर यही लीला होगी।”

     

    कृष्ण ने उनकी बात सुन ली।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैंने कहा न, अब माखन नहीं चुराऊँगा।”

     

    गोपियाँ बोलीं,

     

    “सच?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    फिर धीरे से बोले,

     

    “लेकिन अगर आप लोग स्वयं बुलाएँगी तो?”

     

    सब गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    यशोदा मैया भी मुस्कुरा उठीं।

     

    गोकुल में फैल गया कान्हा का नाम

     

    उस दिन के बाद कृष्ण की मटकी फोड़ने वाली शरारत पूरे गोकुल में प्रसिद्ध हो गई।

     

    अब जब भी किसी घर में मटकी थोड़ी ऊँचाई पर रखी जाती, गोपी मुस्कुराकर कहती—

     

    “कहीं कान्हा आ न जाए।”

     

    कोई माखन छिपाता।

     

    कोई मटकी बाँधकर रखता।

     

    कोई दरवाजा बंद कर देता।

     

    लेकिन मन में सबकी यही इच्छा रहती—

     

    काश! कान्हा हमारे घर भी आए।

     

    क्योंकि कान्हा की शरारतों में भी प्रेम था।

     

    उनकी चोरी में भी अपनापन था।

     

    उनकी हँसी में ऐसा जादू था कि जिसे एक बार सुन लिया, वह उसे बार-बार सुनना चाहता था।

     

    गोकुल की गोपियाँ शिकायत तो करतीं, लेकिन जब कई दिनों तक कृष्ण उनके घर नहीं जाते, तो वे स्वयं कहने लगतीं—

     

    “आजकल हमारा कान्हा हमारे घर क्यों नहीं आता?”

     

    यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।

     

    वे माखन नहीं चुराते थे।

     

    वे तो अपने भक्तों के हृदय में बसे प्रेम को चुराते थे।

     

    लेकिन यशोदा मैया ने कुछ और सोच लिया था…

     

    उस शाम जब सब शांत हो गया, यशोदा मैया कृष्ण को अपने पास बैठाकर समझा रही थीं।

     

    “कान्हा, तुम अब बड़े हो रहे हो। इतनी शरारत करना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    “मैया, मैं तो छोटा हूँ।”

     

    “अच्छा? सुबह इतनी बड़ी मटकी कौन तोड़ रहा था?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    “गोपियों के घर माखन कौन चुराता है?”

     

    कृष्ण फिर चुप।

     

    “बंदरों को माखन कौन खिलाता है?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा,

     

    “मैं।”

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    लेकिन उस दिन उनके मन में एक विचार आया।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “यह बालक बहुत नटखट हो गया है। इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”

     

    उन्हें क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण की एक और ऐसी शरारत सामने आने वाली है, जो आज की मटकी फोड़ने वाली लीला से भी अधिक अद्भुत होगी।

     

    अगली सुबह यशोदा मैया घर के काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण चुपचाप खेल रहे थे।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद घर से एक आवाज आई—

     

    छनन्…!

     

    फिर दूसरी आवाज—

     

    धड़ाम!

     

    यशोदा मैया ने चौंककर पीछे देखा।

     

    उनकी आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “कान्हा!”

     

    लेकिन इस बार कृष्ण केवल माखन की मटकी के पास नहीं थे।

     

    उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया था कि यशोदा मैया को उन्हें रोकने के लिए स्वयं उनके पीछे दौड़ना पड़ा।

     

    और फिर…

     

    एक माँ अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए दौड़ रही थी, जबकि पूरा गोकुल उस अद्भुत दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन क्या यशोदा मैया इस बार कृष्ण को पकड़ पाएँगी?

     

    और यदि पकड़ लिया…

     

    तो क्या होगा उस नन्हे माखनचोर का?

     

    यही जानेंगे अगली कड़ी में।

     

    भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा

     

    जहाँ नटखट कान्हा की शरारत देखकर यशोदा मैया उन्हें पकड़ लेंगी और पहली बार उन्हें अनुशासन सिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन कृष्ण को बाँधने की उनकी कोशिश बार-बार क्यों असफल होगी?

     

    आखिर उस नन्हे बालक को एक साधारण-सी रस्सी बाँध क्यों नहीं पाएगी?

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    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

     

    (भाग 6 — माखनचोर नंदलाल)

     

     

     

     

    गोकुल की गलियों में उन दिनों एक ही नाम हर किसी की जुबान पर था—कान्हा।

     

    जिस घर में उनका नाम लिया जाता, वहाँ जैसे अपने आप मुस्कान खिल उठती। कोई उन्हें नंदबाबा का लाड़ला कहता, कोई यशोदा मैया का नटखट लाल, तो कोई उन्हें गोकुल का सबसे बड़ा शरारती बालक बताता।

     

    लेकिन गोकुल की गोपियों के लिए कान्हा की एक और पहचान बन चुकी थी—

     

    माखनचोर!

     

    हाँ, वही नन्हा-सा कृष्ण, जिसकी मुस्कान देखकर बड़े-बड़े क्रोधी भी अपना गुस्सा भूल जाते थे, अब गोकुल की गोपियों की मटकी से माखन चुराने लगा था।

     

    और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि कृष्ण को केवल माखन खाने में ही आनंद नहीं आता था।

     

    उन्हें आनंद आता था—

     

    माखन चुराने में!

     

    सुबह का समय था। गोकुल की गलियों में गायों की घंटियों की मधुर आवाज सुनाई दे रही थी। कहीं कोई गोपी आँगन में झाड़ू लगा रही थी, कहीं कोई दूध दुह रही थी और कहीं मटकी में दही मथने की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    यशोदा मैया भी अपने आँगन में बैठी थीं। उनके सामने बड़ी-सी मटकी रखी थी और वे प्रेम से दही मथ रही थीं।

     

    दही मथते हुए उनके मन में अपने कान्हा का ही ध्यान था।

     

    वे धीरे-धीरे मुस्कुरातीं और फिर सोचने लगतीं—

     

    “न जाने मेरा लाल इस समय कहाँ खेल रहा होगा?”

     

    उन्हें क्या पता था कि उनका वही लाल उस समय कुछ ऐसी योजना बना रहा था, जिसके कारण थोड़ी ही देर में पूरे गोकुल में हँसी और शिकायतों की लहर दौड़ने वाली थी।

     

    कान्हा की नई योजना

     

    कृष्ण अपने कुछ सखा बालकों के साथ एक पेड़ के पीछे छिपे हुए थे।

     

    उनके साथ थे—श्रीदामा, सुभल और कुछ अन्य ग्वाल-बाल।

     

    कृष्ण ने धीरे से अपने साथियों की ओर देखा और आँखों ही आँखों में कुछ संकेत किया।

     

    श्रीदामा ने पूछा,

     

    “कान्हा, आज कहाँ चलना है?”

     

    कृष्ण ने होंठों पर शरारती मुस्कान लाते हुए कहा,

     

    “आज हम उस घर में चलेंगे जहाँ सबसे स्वादिष्ट माखन मिलता है।”

     

    सुभल ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “लेकिन कान्हा, वहाँ तो माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी रहती है। हम पहुँचेंगे कैसे?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “जहाँ प्रेम हो, वहाँ रास्ता अपने आप बन जाता है।”

     

    श्रीदामा बोला,

     

    “और जहाँ माखन हो?”

     

    कृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया,

     

    “वहाँ तो मैं स्वयं रास्ता बना देता हूँ!”

     

    सभी बालक खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा। किसी को पता नहीं था कि वे कहाँ जा रहे हैं।

     

    फिर वे दबे पाँव एक गोपी के घर की ओर बढ़ चले।

     

    उस गोपी ने कई दिनों से अपनी मटकी का माखन कृष्ण से बचाकर रखा था।

     

    वह रोज अपने घर की मटकी को ऊँचाई पर टाँग देती और सोचती—

     

    “आज तो देखती हूँ, मेरा माखन कौन चुराता है!”

     

    उसे विश्वास था कि इतनी ऊँचाई पर रखी मटकी तक कृष्ण नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन वह कृष्ण को अभी अच्छी तरह पहचान नहीं पाई थी।

     

    माखन की खोज

     

    कृष्ण अपने सखाओं के साथ घर के भीतर पहुँचे।

     

    सबसे पहले उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    एक कोने में दूध की मटकी थी।

     

    दूसरे कोने में दही रखा था।

     

    लेकिन कृष्ण की दृष्टि सीधे उस मटकी पर जाकर टिक गई, जिसमें सफेद, मुलायम और सुगंधित माखन भरा था।

     

    कृष्ण की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “यही है!”

     

    श्रीदामा ने ऊपर देखा।

     

    मटकी सचमुच बहुत ऊँचाई पर टंगी थी।

     

    वह बोला,

     

    “कान्हा, अब?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अब तुम सब मेरी सहायता करो।”

     

    एक के ऊपर एक बालक खड़े होने लगे।

     

    सबसे नीचे एक बालक।

     

    उसके ऊपर दूसरा।

     

    फिर तीसरा।

     

    और सबसे ऊपर स्वयं कृष्ण।

     

    कृष्ण ने अपना हाथ ऊपर बढ़ाया।

     

    लेकिन मटकी अभी भी थोड़ी दूर थी।

     

    उन्होंने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ और ऊपर किया।

     

    फिर भी मटकी नहीं मिली।

     

    सभी बालक हँसी रोककर कृष्ण को देख रहे थे।

     

    कृष्ण ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं, फिर हल्की-सी छलाँग लगाई।

     

    उनकी उँगलियाँ मटकी तक पहुँच गईं।

     

    मटकी हल्के से हिली।

     

    सभी बालक घबरा गए।

     

    “कान्हा! धीरे!”

     

    लेकिन कृष्ण के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी।

     

    उन्होंने मटकी को थोड़ा नीचे खींचा और जैसे ही वह उनके हाथ में आई, उनकी आँखों में आनंद भर गया।

     

    माखन देखकर कृष्ण का चेहरा खिल उठा।

     

    उन्होंने पहले थोड़ा-सा माखन स्वयं खाया।

     

    फिर श्रीदामा को दिया।

     

    फिर सुभल को।

     

    और देखते ही देखते सभी बालक माखन खाने लगे।

     

    लेकिन कृष्ण की शरारत यहीं समाप्त नहीं हुई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अरे! अकेले हम ही क्यों खाएँ? हमारे बंदर मित्र कहाँ हैं?”

     

    कृष्ण और उनके बंदर मित्र

     

    कृष्ण को बंदरों से बहुत प्रेम था।

     

    उन्होंने माखन का एक बड़ा हिस्सा लेकर आँगन में बैठे बंदरों को बुलाया।

     

    “आओ! आओ! तुम्हारे लिए भी माखन है।”

     

    बंदर उछलते-कूदते कृष्ण के पास आ गए।

     

    कृष्ण उन्हें अपने हाथों से माखन खिलाने लगे।

     

    एक बंदर ने उनके हाथ से माखन लिया।

     

    दूसरा उनके कंधे पर चढ़ गया।

     

    तीसरा उनके पास बैठकर माखन खाने लगा।

     

    कृष्ण हँसते जा रहे थे।

     

    उनके सखा भी हँस रहे थे।

     

    कुछ ही देर में घर की स्थिति ऐसी हो गई कि कहीं माखन गिरा था, कहीं दही फैल गया था और कहीं बंदर मटकी के पास बैठकर मुँह चाट रहे थे।

     

    तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई।

     

    सब बालक चौंक गए।

     

    “गोपी आ रही है!”

     

    श्रीदामा ने कहा।

     

    कृष्ण ने तुरंत इधर-उधर देखा।

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    लेकिन छिपने की जगह कहाँ थी?

     

    कोई अनाज के पीछे छिप गया।

     

    कोई दरवाजे के पीछे।

     

    कोई मटकी के पास।

     

    और कृष्ण?

     

    वे तो ऐसे खड़े हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    गोपी अंदर आई।

     

    उसने जैसे ही अपना घर देखा, उसकी आँखें फैल गईं।

     

    माखन यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ था।

     

    मटकी आधी खाली थी।

     

    बंदर मुँह पर माखन लगाए बैठे थे।

     

    और बीच में कृष्ण खड़े थे।

     

    गोपी ने दोनों हाथ कमर पर रखे और बोली,

     

    “कान्हा!”

     

    कृष्ण ने मासूम बनकर उसकी ओर देखा।

     

    “जी?”

     

    “यह सब किसने किया?”

     

    कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    गोपी ने माखन से सने उनके हाथों की ओर देखा।

     

    फिर उनके होंठों पर लगे माखन को देखा।

     

    फिर बोली,

     

    “तुम्हें नहीं पता?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “शायद माखन स्वयं मेरे पास आ गया होगा।”

     

    गोपी हँसी रोक नहीं पाई।

     

    लेकिन फिर उसे अपनी मटकी याद आ गई।

     

    वह बोली,

     

    “अच्छा! तो माखन स्वयं मटकी से निकलकर तुम्हारे मुँह में भी चला गया?”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “हाँ, मैया!”

     

    गोपी ने कहा,

     

    “मैं तुम्हारी मैया नहीं हूँ!”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो फिर आप इतनी चिंता क्यों करती हैं?”

     

    गोपी का क्रोध जैसे पल भर में पिघल गया।

     

    लेकिन वह कृष्ण को यूँ ही जाने भी नहीं देना चाहती थी।

     

    उसने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो, आज तुम्हारी शिकायत यशोदा मैया से करूँगी।”

     

    कृष्ण ने तुरंत अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

     

    “नहीं! मैया से मत कहना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैया मुझे डाँटेंगी।”

     

    गोपी बोली,

     

    “आज तो डाँट पड़ेगी ही।”

     

    कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसकी ओर देखा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराए।

     

    “अगर मैं आपको थोड़ा-सा माखन और दे दूँ तो?”

     

    गोपी फिर हँस पड़ी।

     

    “नहीं! आज मैं नहीं मानूँगी।”

     

    लेकिन मन ही मन वह भी सोच रही थी—

     

    “यह बालक है ही इतना प्यारा कि इससे नाराज़ कैसे रहा जाए?”

     

    गोकुल में शिकायतों की कतार

     

    यह तो केवल एक घर की बात थी।

     

    गोकुल में कई गोपियों के घरों में यही हाल था।

     

    कहीं मटकी खाली।

     

    कहीं दही फर्श पर।

     

    कहीं माखन बंदरों को खिला दिया गया।

     

    और कहीं कृष्ण ने माखन खाकर मटकी के पास अपनी छोटी-सी हथेली के निशान छोड़ दिए।

     

    धीरे-धीरे गोपियाँ एक-दूसरे के घर पहुँचने लगीं।

     

    एक बोली,

     

    “आज फिर मेरे घर से माखन गायब!”

     

    दूसरी बोली,

     

    “मेरे घर में तो मटकी इतनी ऊँचाई पर रखी थी, फिर भी कान्हा पहुँच गया!”

     

    तीसरी बोली,

     

    “मेरे घर में तो उसने पहले माखन खाया और फिर बंदरों को बाँट दिया।”

     

    चौथी हँसते हुए बोली,

     

    “मेरे घर में तो माखन चुराने के बाद वह मुझे ही समझाने लगा कि माखन उसे स्वयं बुला रहा था!”

     

    सब गोपियाँ कृष्ण की शिकायत करने के लिए यशोदा मैया के पास जाने लगीं।

     

    लेकिन उनके चेहरों पर गुस्से से अधिक प्रेम था।

     

    यशोदा मैया के सामने शिकायत

     

    यशोदा मैया उस समय अपने आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण अभी वहाँ नहीं पहुँचे थे।

     

    अचानक कई गोपियाँ एक साथ आ गईं।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “अरे बहनों! क्या हुआ?”

     

    एक गोपी बोली,

     

    “मैया! अपने लाल को समझाइए।”

     

    यशोदा मैया ने चिंतित होकर पूछा,

     

    “क्या किया मेरे कान्हा ने?”

     

    दूसरी गोपी बोली,

     

    “क्या नहीं किया, यह पूछिए!”

     

    तीसरी बोली,

     

    “हमारे घरों का माखन चुरा-चुराकर खाता है।”

     

    चौथी बोली,

     

    “और अकेला नहीं खाता।”

     

    यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “बंदरों को भी खिलाता है!”

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण की ओर से सफाई देते हुए कहा,

     

    “अरे, वह तो अभी छोटा है। शायद भूख लगती होगी।”

     

    गोपियाँ बोलीं,

     

    “भूख लगती है तो हमारे घर आकर माँग ले। हम माखन दे देंगे।”

     

    एक गोपी ने कहा,

     

    “लेकिन नहीं! वह चोरी करके ही खाएगा।”

     

    दूसरी हँसते हुए बोली,

     

    “और जब हम पकड़ लें तो ऐसी मुस्कान देगा कि हमारा सारा गुस्सा गायब हो जाएगा।”

     

    यशोदा मैया भी हँसने लगीं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “अच्छा, आज मैं उसे खूब समझाऊँगी।”

     

    तभी पीछे से एक मधुर आवाज आई—

     

    “मैया!”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ पीछे मुड़ीं।

     

    कृष्ण वहाँ खड़े थे।

     

    उनके चेहरे पर भोली-सी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “कान्हा, इधर आओ।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे मैया के पास आए।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “तुमने इन सबके घरों से माखन चुराया?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं!”

     

    गोपियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।

     

    यशोदा मैया ने पूछा,

     

    “तो फिर माखन किसने चुराया?”

     

    कृष्ण ने थोड़ा सोचा।

     

    फिर बोले,

     

    “मैया, मुझे लगता है कि… बंदरों ने चुराया होगा।”

     

    गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “अच्छा! तो बंदर माखन खाते हैं और तुम्हारे मुँह पर लगा देते हैं?”

     

    कृष्ण मुस्कुराने लगे।

     

    मैया ने उनके गाल पर हाथ फेरा।

     

    उनकी आँखों में ममता थी।

     

    वे अपने लाल को डाँटना चाहती थीं, लेकिन उसकी भोली मुस्कान देखकर उनका हृदय पिघल गया।

     

    फिर भी उन्होंने प्रेम से कहा,

     

    “कान्हा, दूसरों के घर से माखन नहीं चुराना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने मासूमियत से पूछा,

     

    “लेकिन मैया, अगर वे मुझे माखन दे दें तो?”

     

    “तो खा लेना।”

     

    “और अगर न दें?”

     

    यशोदा मैया कुछ क्षण चुप रहीं।

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराए।

     

    मैया समझ गईं कि उनका कान्हा अपनी शरारत छोड़ने वाला नहीं है।

     

    माखन से भी मीठा प्रेम

     

    उस दिन के बाद गोकुल की गोपियाँ अपनी मटकी और भी ऊँचाई पर रखने लगीं।

     

    लेकिन कृष्ण के लिए ऊँचाई कोई बाधा नहीं थी।

     

    कभी वे सखाओं की सहायता लेते।

     

    कभी किसी छोटी चौकी को खिसकाकर उसके ऊपर चढ़ जाते।

     

    कभी रस्सी पकड़ लेते।

     

    और कभी तो ऐसा लगता जैसे मटकी स्वयं झुककर कृष्ण के हाथों में आ गई हो।

     

    लेकिन कृष्ण केवल माखन नहीं चुराते थे।

     

    वे तो गोकुलवासियों के हृदय चुराते थे।

     

    जिस घर में वे जाते, वहाँ हँसी छोड़ आते।

     

    जिसके घर से माखन लेते, उसे प्रेम दे जाते।

     

    और जिन गोपियों को लगता कि कृष्ण ने उनके घर की मटकी खाली कर दी, वे कुछ ही देर बाद यही सोचतीं—

     

    “काश! हमारा कान्हा फिर आए।”

     

    क्योंकि सच तो यह था कि उन्हें माखन के जाने का दुख नहीं था।

     

    उन्हें तो कृष्ण के चले जाने का दुख था।

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नई चर्चा थी—

     

    “कान्हा कब आएगा?”

     

    कोई माखन छिपाता था ताकि कृष्ण उसे ढूँढ़ें।

     

    कोई जान-बूझकर मटकी नीचे रख देता था।

     

    और कोई तो अपने घर के बाहर तक माखन की कटोरी रख देता था।

     

    कृष्ण सब समझते थे।

     

    वे मुस्कुराते हुए कहते,

     

    “तुम लोग मुझे चोर बनाना चाहती हो?”

     

    गोपियाँ कहतीं,

     

    “हाँ कान्हा! क्योंकि तुम्हारे हाथों से हमारा माखन जाए तो हमें कोई शिकायत नहीं।”

     

    कृष्ण हँस पड़ते।

     

    एक दिन कुछ अलग हुआ…

     

    लेकिन एक दिन कृष्ण की शरारत कुछ अधिक बढ़ गई।

     

    उस दिन यशोदा मैया ने सोचा कि आज वे अपने कान्हा को स्वयं माखन खिलाएँगी।

     

    उन्होंने बड़े प्रेम से माखन निकाला।

     

    एक छोटी कटोरी में रखा।

     

    और कृष्ण को पुकारा—

     

    “कान्हा! आओ बेटा, आज मैया तुम्हें अपने हाथों से माखन खिलाएगी।”

     

    कृष्ण दौड़ते हुए आए।

     

    मैया ने उन्हें अपने पास बैठाया।

     

    माखन का पहला निवाला उनके मुँह में रखा।

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    मैया ने दूसरा निवाला खिलाया।

     

    तभी बाहर से उनके सखाओं की आवाज आई—

     

    “कान्हा! चलो!”

     

    कृष्ण ने तुरंत मैया की ओर देखा।

     

    मैया ने कहा,

     

    “पहले माखन खा लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “फिर खेलने जाने दोगी?”

     

    “हाँ।”

     

    कृष्ण ने जल्दी-जल्दी माखन खाना शुरू किया।

     

    लेकिन उनके मन में एक और शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    उन्होंने मैया की ओर देखा…

     

    फिर मटकी की ओर…

     

    फिर आँगन में रखी दूसरी मटकी की ओर।

     

    उनकी आँखों में चमक थी।

     

    मैया ने उस चमक को देख लिया।

     

    “कान्हा… तुम कुछ सोच रहे हो न?”

     

    कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “सच?”

     

    “बिल्कुल सच।”

     

    यशोदा मैया मुस्कुराईं।

     

    उन्हें क्या पता था कि अगले ही पल उनका नन्हा कान्हा ऐसी शरारत करने वाला है, जिसके कारण केवल गोकुल की गोपियाँ ही नहीं, स्वयं यशोदा मैया भी परेशान हो उठेंगी।

     

    और इस बार बात केवल माखन चुराने तक नहीं रहने वाली थी…

     

    क्योंकि कृष्ण की नजर अब एक ऐसी मटकी पर थी, जिसे यशोदा मैया ने स्वयं बहुत सँभालकर रखा था।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़े।

     

    उनके कदम छोटे थे…

     

    लेकिन शरारत बहुत बड़ी।

     

    आखिर उस मटकी में ऐसा क्या था?

     

    और क्या कृष्ण इस बार भी अपनी शरारत में सफल हो पाएँगे?

     

    जानिए अगली कड़ी में—

     

    भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत

     

    जहाँ कान्हा की एक छोटी-सी शरारत पूरे गोकुल में हँसी का कारण बन जाएगी और यशोदा मैया को पहली बार अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ना पड़ेगा…|

     

    BE CONTINUE….✍️✍️

  • महल के द्वार पर सुदामा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    अध्याय 8 — महल के द्वार पर सुदामा और कृष्ण तक पहुँची खबर

     

    द्वारका के विशाल महल के सामने सुदामा चुपचाप खड़े थे।

     

    उनकी आँखें महल के ऊँचे द्वार पर टिकी थीं।

     

    वर्षों पहले जिस कृष्ण के साथ उन्होंने गुरुकुल की छोटी सी कुटिया में बैठकर भोजन किया था, आज वही कृष्ण इस विशाल राजमहल में रहते थे।

     

    सुदामा के मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे थे।

     

    पहरेदार अब भी उन्हें देख रहा था।

     

    उसने फिर पूछा,

     

    “तुमने कहा कि तुम कृष्ण से मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने सिर झुकाकर कहा,

     

    “हाँ।”

     

    “क्या तुम्हारे पास कोई संदेश है?”

     

    सुदामा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर मुस्कुराकर बोले,

     

    “संदेश?”

     

    पहरेदार ने कहा,

     

    “हाँ। द्वारकाधीश से मिलने हर व्यक्ति सीधे अंदर नहीं जा सकता।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी सी पोटली को हाथ में कसकर पकड़ लिया।

     

    “मेरे पास कोई संदेश नहीं है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “बस उनसे कहना कि उनका पुराना मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है।”

     

    पहरेदार ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    उनमें से एक को शायद विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने पूछा,

     

    “तुम सच में उनके मित्र हो?”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिए।

     

    “यह बात अब वही बता सकते हैं।”

     

    पहरेदार ने कुछ क्षण उन्हें देखा।

     

    सुदामा के कपड़े साधारण थे। पैरों में यात्रा की धूल थी। कंधे पर पुराना थैला था और हाथ में छोटी सी पोटली।

     

    उनका रूप किसी बड़े व्यक्ति जैसा नहीं था।

     

    लेकिन उनकी आँखों में ऐसा अपनापन था, जिसे देखकर पहरेदार भी कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    आखिरकार उसने कहा,

     

    “ठहरो। मैं भीतर जाकर सूचना देता हूँ।”

     

    पहरेदार अंदर चला गया।

     

    सुदामा वहीं खड़े रहे।

     

    उनका दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    अब तक वह रास्ते भर कृष्ण से मिलने की कल्पना करते आए थे।

     

    लेकिन अब जब वह महल के सामने खड़े थे, तो अचानक उनके मन में संकोच भर गया।

     

    उन्होंने मन ही मन कहा,

     

    “कृष्ण… अगर तुमने मुझे पहचान लिया तो?”

     

    फिर उनके मन में दूसरा विचार आया—

     

    “और अगर नहीं पहचाना तो?”

     

    यह विचार आते ही उनका चेहरा उदास हो गया।

     

    उन्होंने तुरंत स्वयं को समझाया,

     

    “नहीं। वह कृष्ण हैं। मेरे मित्र हैं। वह मुझे जरूर पहचानेंगे।”

     

    उधर महल के भीतर कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    उनके सामने कई लोग अपनी समस्याएँ लेकर उपस्थित थे।

     

    कृष्ण सबकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।

     

    तभी एक सेवक तेजी से अंदर आया।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महाराज…”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “कहो।”

     

    सेवक कुछ पल झिझका।

     

    “महल के द्वार पर एक व्यक्ति आपसे मिलने आया है।”

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “उन्होंने अपना नाम सुदामा बताया है।”

     

    बस…

     

    इतना सुनना था कि कृष्ण जैसे एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गए।

     

    उनके चेहरे पर जो गंभीरता थी, वह अचानक गायब हो गई।

     

    आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।

     

    उन्होंने दोबारा पूछा,

     

    “क्या कहा तुमने?”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “सुदामा।”

     

    कृष्ण तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए।

     

    पास बैठे लोग हैरान रह गए।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरा सुदामा?”

     

    सेवक ने सिर झुका दिया।

     

    “जी।”

     

    कृष्ण के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसी वर्षों से किसी ने नहीं देखी थी।

     

    उन्हें अचानक गुरुकुल का वह छोटा सा आँगन याद आ गया।

     

    उन्हें सुदामा की आवाज याद आई।

     

    वह दिन याद आया जब दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    वह बारिश याद आई, जिसमें दोनों भीगते हुए भी हँस रहे थे।

     

    उन्हें वह विदाई याद आई, जब सुदामा ने पूछा था—

     

    “क्या तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    कृष्ण की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने बिना एक पल गँवाए कहा,

     

    “उन्हें यहीं लेकर आओ।”

     

    सेवक ने कहा,

     

    “जी महाराज।”

     

    लेकिन कृष्ण तुरंत आगे बढ़े।

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी ओर देखने लगे।

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “उन्हें लाने की जरूरत नहीं।”

     

    उन्होंने स्वयं महल के द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए।

     

    सेवक और अन्य लोग उनके पीछे चल पड़े।

     

    उधर सुदामा अभी भी महल के बाहर खड़े थे।

     

    उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अंदर से क्या उत्तर आएगा।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि महल के भीतर से बहुत से लोग उनकी ओर आ रहे हैं।

     

    सुदामा ने सोचा,

     

    “शायद अब मुझे अंदर बुलाया जाएगा।”

     

    लेकिन तभी भीड़ के बीच उन्हें एक परिचित चेहरा दिखाई दिया।

     

    उनके कदम वहीं रुक गए।

     

    वह चेहरा…

     

    वह मुस्कान…

     

    वह आँखें…

     

    सुदामा की साँस जैसे थम गई।

     

    “कृष्ण…”

     

    उनके मुँह से बस इतना ही निकला।

     

    कृष्ण भी उन्हें देखते ही रुक गए।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    समय जैसे ठहर गया था।

     

    सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    कृष्ण की आँखें भी नम थीं।

     

    फिर कृष्ण अचानक आगे बढ़े।

     

    उन्होंने सुदामा को अपने गले से लगा लिया।

     

    सुदामा कुछ क्षण तक बिल्कुल शांत रहे।

     

    फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “सुदामा!”

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    वर्षों की दूरी उस एक आलिंगन में समाप्त हो गई।

     

    महल के आसपास खड़े लोग यह दृश्य देखकर स्तब्ध थे।

     

    किसी ने शायद पहली बार देखा था कि उनका राजा किसी साधारण वस्त्र पहने व्यक्ति से इतनी आत्मीयता से मिल रहा है।

     

    कृष्ण ने सुदामा के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आने में इतनी देर क्यों कर दी?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “तुमने भी तो कभी बुलाया नहीं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तो क्या मित्रों के बीच बुलावा भेजना पड़ता है?”

     

    सुदामा भी मुस्कुरा दिए।

     

    “मुझे लगा… तुम्हारा जीवन बदल गया होगा।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा,

     

    “जीवन बदला है, सुदामा। मित्रता नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    कृष्ण ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम बहुत बदल गए हो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम भी।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “लेकिन तुम मुझे पहचान गए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे नहीं पहचानता?”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा,

     

    “तो फिर गुरुकुल वाली बात सच निकली।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “कौन सी?”

     

    “कि सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं होती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    कृष्ण ने सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “अंदर।”

     

    सुदामा अचानक रुक गए।

     

    उन्होंने महल की ओर देखा।

     

    “मैं?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “हाँ, तुम।”

     

    सुदामा झिझकते हुए बोले,

     

    “कृष्ण, मैं ऐसे ही…”

     

    कृष्ण ने उनकी बात पूरी नहीं होने दी।

     

    “जैसे आए हो, वैसे ही मेरे साथ चलो।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “लेकिन लोग क्या सोचेंगे?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “लोगों को सोचने दो।”

     

    फिर उन्होंने सुदामा का हाथ पकड़ा और स्वयं उन्हें महल के अंदर ले गए।

     

    महल के भीतर कदम रखते ही सुदामा ने चारों ओर देखा।

     

    सब कुछ बहुत भव्य था।

     

    लेकिन कृष्ण के लिए वह सब जैसे कुछ भी नहीं था।

     

    उनके लिए उस समय सबसे कीमती चीज सामने खड़ी थी—

     

    उनका मित्र।

     

    कृष्ण उन्हें एक कक्ष में ले गए।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने सुदामा को आसन पर बैठाया।

     

    सुदामा तुरंत उठने लगे।

     

    “नहीं कृष्ण, मैं यहाँ कैसे…”

     

    कृष्ण ने उन्हें बैठाते हुए कहा,

     

    “आज तुम मेरे अतिथि नहीं हो।”

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “आज तुम मेरे पुराने मित्र हो। और पुराने मित्रों को औपचारिकता की जरूरत नहीं होती।”

     

    सुदामा बैठ गए।

     

    कृष्ण स्वयं उनके सामने बैठ गए।

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “बताओ, गुरुकुल के बाद क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “इतने वर्षों की बातें एक साथ कैसे बताऊँ?”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “आज हमारे पास समय ही समय है।”

     

    सुदामा ने अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया।

     

    गाँव।

     

    घर।

     

    परिवार।

     

    बच्चे।

     

    छोटी-छोटी खुशियाँ।

     

    और संघर्ष।

     

    कृष्ण ध्यान से सुनते रहे।

     

    उन्होंने बीच में एक बार भी सुदामा को रोका नहीं।

     

    फिर कृष्ण ने पूछा,

     

    “और तुम्हें मेरी याद आई?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्या तुम सच में यह पूछ रहे हो?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “मैं तो बस सुनना चाहता हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “हर बार जब जीवन कठिन हुआ।”

     

    कृष्ण की मुस्कान कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उनके मित्र ने बहुत कुछ सहा है।

     

    लेकिन कृष्ण ने कोई प्रश्न नहीं किया।

     

    उन्होंने बस सुदामा का हाथ पकड़ लिया।

     

    फिर उनकी नजर सुदामा की छोटी सी पोटली पर पड़ी।

     

    कृष्ण ने शरारत से पूछा,

     

    “यह क्या है?”

     

    सुदामा तुरंत पोटली को पीछे करने लगे।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “इतने वर्षों बाद मिले हो और अब भी मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”

     

    सुदामा ने हँसते हुए कहा,

     

    “यह बहुत साधारण चीज है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सुदामा चुप हो गए।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे दिखाओ।”

     

    सुदामा झिझकते रहे।

     

    आखिरकार उन्होंने वह छोटी पोटली कृष्ण के हाथ में दे दी।

     

    कृष्ण ने उसे खोला।

     

    अंदर थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    कृष्ण की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “सुदामा…”

     

    सुदामा शर्माते हुए बोले,

     

    “बहुत थोड़ा है।”

     

    कृष्ण ने कहा,

     

    “मेरे लिए तो यह संसार की सबसे बड़ी भेंट है।”

     

    उन्होंने चिवड़ा अपने हाथ में लिया।

     

    एक मुट्ठी खाई।

     

    उनके चेहरे पर वही बचपन वाली खुशी थी।

     

    सुदामा उन्हें देखता रहा।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    कृष्ण ने पूछा,

     

    “रो क्यों रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे लग रहा है कि इतने वर्षों बाद भी मेरा कृष्ण वैसा ही है।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और मुझे लग रहा है कि मेरा सुदामा भी वैसा ही है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    लेकिन उस मिलन के पीछे सुदामा के मन में एक बात अब भी छिपी थी।

     

    वह कृष्ण से कुछ माँगने नहीं आया था।

     

    लेकिन उसके घर की स्थिति…

     

    उसके परिवार की परेशानी…

     

    सब उसके मन में था।

     

    कृष्ण शायद यह बात समझ चुके थे।

     

    उन्होंने सुदामा की आँखों में देखकर धीरे से पूछा,

     

    “सुदामा, तुम मेरे पास केवल मिलने आए हो… या तुम्हारे मन में कोई और बात भी है?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसने कृष्ण की ओर देखा।

     

    और पहली बार उसे लगा…

     

    शायद उसे अपने मित्र से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं।

     

    कृष्ण पहले से सब समझ चुके थे।

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    भाग 5 — माखनचोर नंदलाल: जब कान्हा ने गोकुल में मचा दी धूम

     

     

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नया नाम बहुत तेजी से प्रसिद्ध हो रहा था।

     

    वह नाम था—

     

    माखनचोर कन्हैया।

     

    लेकिन यह नाम किसी ने प्रेम से रखा था या शिकायत करते हुए, यह कहना कठिन था।

     

    क्योंकि गोकुल की गोपियों के घरों में जब भी कोई माखन की मटकी खाली मिलती, तो सबसे पहले सबकी निगाहें नंद बाबा के घर की ओर उठतीं।

     

    और वहाँ क्या मिलता?

     

    एक नन्हा-सा बालक।

     

    घुँघराले बाल।

     

    माथे पर छोटी-सी लट।

     

    आँखों में शरारत।

     

    होंठों पर मुस्कान।

     

    और चेहरे पर ऐसा भाव—

     

    मानो उसने कुछ किया ही न हो।

     

    वह थे हमारे नंदलाल।

     

    श्रीकृष्ण।

     

    —

     

    माखन से कृष्ण का प्रेम

     

    यशोदा मैया प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर घर के काम में लग जाती थीं।

     

    गायों का दूध दुहा जाता।

     

    दूध को उबाला जाता।

     

    फिर उससे दही जमाया जाता।

     

    और अगले दिन सुबह यशोदा मैया बड़े प्रेम से दही मथकर उसमें से सफेद-सफेद माखन निकालतीं।

     

    माखन को देखकर कृष्ण की आँखें चमक उठतीं।

     

    जब वे बहुत छोटे थे, तब बस दूर से माखन को देखते थे।

     

    लेकिन अब तो घुटनों के बल चलना सीख चुके थे।

     

    इसलिए माखन उनके लिए केवल देखने की वस्तु नहीं रह गया था।

     

    वह उनके लिए अधिकार की वस्तु बन चुका था।

     

    एक दिन यशोदा मैया माखन निकाल रही थीं।

     

    कृष्ण पास में बैठे उन्हें ध्यान से देख रहे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या देख रहे हो लाला?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “माखन चाहिए?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी देती हूँ।”

     

    उन्होंने एक छोटी-सी कटोरी में माखन निकाला और कृष्ण को दे दिया।

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से कटोरी पकड़ ली।

     

    पहले थोड़ा-सा माखन खाया।

     

    फिर मैया की ओर देखा।

     

    फिर थोड़ा और खाया।

     

    और फिर पूरी कटोरी खाली कर दी।

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “बस भी कर! इतना माखन खाएगा तो पेट दुखेगा।”

     

    कृष्ण ने कटोरी आगे बढ़ा दी।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत हुई है।”

     

    —

     

    कृष्ण को अपना माखन क्यों पसंद नहीं था?

     

    गोकुल की एक विचित्र बात थी।

     

    हर घर में माखन था।

     

    कृष्ण को जब भी माखन चाहिए होता, यशोदा मैया उन्हें माखन दे देतीं।

     

    फिर भी कृष्ण को दूसरे घरों का माखन अधिक प्रिय था।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने कृष्ण से पूछा—

     

    “लाला, मेरे घर का माखन अच्छा नहीं लगता क्या?”

     

    कृष्ण ने तुरंत सिर हिला दिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तो फिर पड़ोस की गोपी के घर क्यों जाते हो?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    यशोदा ने उनकी आँखों में देखा।

     

    “अच्छा! अब समझी। तुम्हें माखन से ज्यादा चोरी करना पसंद है।”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    —

     

    पहली बड़ी चोरी

     

    एक सुबह यशोदा मैया किसी काम से बाहर गई थीं।

     

    कृष्ण ने देखा कि घर में माखन की मटकी ऊपर टँगी हुई है।

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर अपने छोटे-छोटे हाथों की ओर देखा।

     

    फिर आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    उन्होंने सोचा—

     

    “आज तो अवसर अच्छा है।”

     

    लेकिन मटकी बहुत ऊँचाई पर थी।

     

    कृष्ण अकेले उसे नहीं पहुँच सकते थे।

     

    तभी उन्हें अपने ग्वाल-बाल मित्र दिखाई दिए।

     

    कृष्ण ने उन्हें संकेत किया।

     

    सब बच्चे पास आए।

     

    एक बोला—

     

    “क्या हुआ कन्हैया?”

     

    कृष्ण ने मटकी की ओर उँगली की।

     

    बच्चे समझ गए।

     

    एक ने कहा—

     

    “माखन?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

     

    अब योजना बननी शुरू हुई।

     

    सबसे पहले एक बालक नीचे बैठा।

     

    उसके ऊपर दूसरा।

     

    फिर उसके ऊपर तीसरा।

     

    और सबसे ऊपर चढ़े—

     

    कन्हैया।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी पकड़ ली।

     

    लेकिन मटकी बहुत कसकर बाँधी गई थी।

     

    कृष्ण ने खींचा।

     

    नहीं निकली।

     

    उन्होंने फिर खींचा।

     

    फिर भी नहीं निकली।

     

    तब उन्होंने अपने मित्रों से कहा—

     

    “और जोर लगाओ!”

     

    सभी बच्चों ने एक साथ जोर लगाया।

     

    मटकी हिली।

     

    फिर हिली।

     

    और अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    मटकी नीचे गिर गई।

     

    दही और माखन चारों ओर फैल गया।

     

    कृष्ण ने तुरंत माखन उठाया।

     

    एक मित्र के मुँह में लगाया।

     

    फिर दूसरे के।

     

    फिर स्वयं खाने लगे।

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    —

     

    गोपी ने देख लिया

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि पास की खिड़की से एक गोपी यह सब देख रही थी।

     

    वह चुपचाप खड़ी होकर सब देखती रही।

     

    उसने सोचा—

     

    “आज तो नंदलाल को रंगे हाथों पकड़ लिया।”

     

    वह तुरंत यशोदा मैया के पास पहुँची।

     

    “यशोदा!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “अपने लाला को समझाओ।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्यों? क्या कर दिया उसने?”

     

    गोपिका बोली—

     

    “तुम्हारा लाल हमारे घर का माखन चुराने लगा है।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “अरे, मेरा कन्हैया ऐसा नहीं कर सकता।”

     

    गोपी बोली—

     

    “अच्छा? तो मेरे साथ चलो।”

     

    यशोदा उनके साथ चल पड़ीं।

     

    —

     

    शिकायतों की शुरुआत

     

    अब तो जैसे गोकुल की सभी गोपियों को एक अवसर मिल गया।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कृष्ण मेरे घर से माखन चुरा ले जाता है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मेरे घर में तो मटकी ही फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “मेरे घर का माखन खाकर बंदरों को भी खिला देता है।”

     

    चौथी बोली—

     

    “और मेरे घर में तो माखन खाकर ऊपर से मुस्कुराता है!”

     

    यशोदा मैया सबकी बातें सुनती रहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “सच कह रही हो?”

     

    एक साथ कई गोपियाँ बोलीं—

     

    “हाँ!”

     

    तभी पीछे से किसी ने हँसकर कहा—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल बहुत बड़ा चोर है।”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण चुपचाप खड़े थे।

     

    उनके होंठों पर माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कन्हैया! यह क्या है?”

     

    कृष्ण ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    —

     

    कृष्ण की मासूम सफाई

     

    यशोदा ने कृष्ण को अपनी ओर बुलाया।

     

    “इधर आओ।”

     

    कृष्ण धीरे-धीरे आगे आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने माखन चुराया?”

     

    कृष्ण ने सिर हिला दिया—

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो तुम्हारे मुँह पर माखन कैसे लगा?”

     

    कृष्ण चुप।

     

    यशोदा ने फिर पूछा—

     

    “बोलो।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें बड़ी कर लीं।

     

    फिर धीरे से बोले—

     

    “मैया… मुझे तो बंदर ने लगाया।”

     

    गोपियाँ हँसते-हँसते दोहरी हो गईं।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब बंदर तुम्हारे मुँह पर माखन लगाने लगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा समझ गईं कि उनका लाल सच नहीं बोल रहा।

     

    लेकिन उनका मन कठोर कैसे होता?

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में उठा लिया।

     

    गोपियाँ बोलीं—

     

    “देखा! फिर बच गया।”

     

    —

     

    एक नई शरारत

     

    लेकिन कृष्ण कहाँ रुकने वाले थे?

     

    अगले दिन उन्होंने एक नई योजना बनाई।

     

    अब वह अकेले चोरी नहीं करते थे।

     

    उन्होंने अपने मित्रों की पूरी टोली बना ली थी।

     

    एक बालक दरवाजे पर पहरा देता।

     

    दूसरा खिड़की के पास खड़ा रहता।

     

    तीसरा मटकी तक पहुँचने की व्यवस्था करता।

     

    और कृष्ण?

     

    वे तो स्वयं सेनापति थे।

     

    कृष्ण ने कहा—

     

    “जब मैं संकेत करूँ, तब सब माखन खाना।”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    कृष्ण घर में घुसे।

     

    मटकी देखी।

     

    धीरे से उसे नीचे उतारा।

     

    माखन निकाला।

     

    पहले स्वयं खाया।

     

    फिर सबको बाँट दिया।

     

    फिर बोले—

     

    “जो यहाँ आया है, उसे खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

     

    उन्होंने थोड़ा माखन बाहर बैठे बंदरों को भी दे दिया।

     

    बंदर माखन खाते रहे।

     

    बच्चे हँसते रहे।

     

    कृष्ण भी हँसते रहे।

     

    उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे गोकुल में कोई बड़ा उत्सव चल रहा हो।

     

    —

     

    गोपियों ने बनाई योजना

     

    अब गोपियाँ भी कृष्ण की शरारतों से परेशान होने लगीं।

     

    उन्होंने आपस में सलाह की।

     

    एक बोली—

     

    “अब माखन ऐसी जगह रखेंगे जहाँ कृष्ण पहुँच ही न सके।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँधेंगे।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “घर के दरवाजे बंद रखेंगे।”

     

    चौथी बोली—

     

    “देखते हैं अब नंदलाल कैसे चोरी करते हैं।”

     

    सब हँस पड़ीं।

     

    लेकिन वे कृष्ण को अभी ठीक से जानती नहीं थीं।

     

    कृष्ण ने जब यह योजना सुनी तो मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माखन छिपाओगी?”

     

    उनकी आँखों में शरारत चमक रही थी।

     

    “तो हम भी देखेंगे।”

     

    —

     

    ऊँची मटकी और नंदलाल

     

    अगले दिन गोपियों ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर बाँध दी।

     

    कृष्ण घर में आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मटकी बहुत दूर थी।

     

    कृष्ण ने अपने हाथ कमर पर रखे।

     

    कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर बाहर गए।

     

    अपने मित्रों को बुलाया।

     

    सबने मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना शुरू किया।

     

    कृष्ण सबसे ऊपर पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    मटकी भी जैसे उन्हें देखकर डर रही हो।

     

    कृष्ण ने धीरे से हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी—

     

    दरवाजे के बाहर से आवाज आई—

     

    “अरे! कौन है वहाँ?”

     

    सभी बच्चे घबरा गए।

     

    कृष्ण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “शांत!”

     

    सब चुप हो गए।

     

    गोपी अंदर आई।

     

    उसने देखा कि बच्चे दीवार के पास खड़े हैं।

     

    मटकी सुरक्षित थी।

     

    वह मुस्कुराकर बाहर चली गई।

     

    जैसे ही वह गई, कृष्ण ने मटकी की ओर देखा।

     

    फिर मित्रों की ओर।

     

    और अचानक—

     

    मटकी फूट गई।

     

    माखन नीचे गिरा।

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    धीरे-धीरे कृष्ण की शरारतें इतनी बढ़ने लगीं कि यशोदा मैया को चिंता होने लगी।

     

    वह एक दिन नंद बाबा से बोलीं—

     

    “आप अपने लाल को कुछ समझाते क्यों नहीं?”

     

    नंद बाबा हँसकर बोले—

     

    “मैं क्या समझाऊँ? जब वह मुस्कुराता है तो मैं स्वयं सब भूल जाता हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन यह दूसरे घरों की मटकी फोड़ता है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो गोपियाँ शिकायत करने आती हैं?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और फिर?”

     

    यशोदा मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “फिर मैं भी उसे देखकर कुछ कह नहीं पाती।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    —

     

    माखनचोर का अर्थ

     

    धीरे-धीरे “माखनचोर” नाम कृष्ण के लिए प्रेम का नाम बन गया।

     

    गोपियाँ शिकायत करतीं, लेकिन भीतर से चाहतीं कि कृष्ण उनके घर भी आएँ।

     

    क्योंकि जिस घर में कृष्ण आते थे, वहाँ केवल माखन नहीं चोरी होता था।

     

    वहाँ तो—

     

    मन की उदासी भी चोरी हो जाती थी।

     

    कृष्ण आते और घर हँसी से भर जाता।

     

    बच्चे उनके पीछे दौड़ते।

     

    गोपियाँ उन्हें पकड़ने का नाटक करतीं।

     

    कृष्ण भागते।

     

    कभी छिपते।

     

    कभी माखन किसी के हाथ पर लगा देते।

     

    और कभी स्वयं मुँह पर माखन लगाकर ऐसे खड़े हो जाते जैसे कोई अपराध ही न किया हो।

     

    इसीलिए तो ब्रजवासी कहते—

     

    “हमारा माखन जाए तो जाए, पर कन्हैया की मुस्कान न जाए।”

     

    —

     

    कृष्ण और बंदर

     

    कृष्ण को बंदरों से भी बहुत प्रेम था।

     

    जब वह माखन चुराते, तो उसका कुछ भाग बंदरों को अवश्य खिलाते।

     

    एक दिन यशोदा मैया ने उन्हें ऐसा करते देख लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “लाला! यह क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण बोले—

     

    “मैया, ये भी तो भूखे हैं।”

     

    यशोदा मैया कुछ कह न सकीं।

     

    उन्होंने देखा कि कृष्ण स्वयं कम खा रहे हैं और बंदरों को अधिक खिला रहे हैं।

     

    उनका हृदय भर आया।

     

    उन्होंने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    “तू सच में बहुत दयालु है मेरे लाल।”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    —

     

    माखन-चोरी की लीला का रहस्य

     

    कृष्ण की माखन-चोरी केवल बाल-शरारत नहीं मानी जाती।

     

    भक्ति की दृष्टि से “माखन” को मन की निर्मलता का प्रतीक माना जाता है।

     

    जैसे दूध को मथकर माखन निकाला जाता है, वैसे ही प्रेम और भक्ति से मन को मथने पर उसके भीतर से निर्मल भाव निकलता है।

     

    और कृष्ण उस निर्मल प्रेम को अपने पास खींच लेते हैं।

     

    इसीलिए भक्त प्रेम से कहते हैं—

     

    “कृष्ण चोर हैं, पर माखन के नहीं—वे भक्तों के हृदय चुराते हैं।”

     

    वे किसी के घर की मटकी तोड़ते हैं तो किसी के भीतर का अहंकार भी तोड़ देते हैं।

     

    वे माखन खाते हैं तो किसी के जीवन से चिंता भी खा जाते हैं।

     

    और वे मुस्कुराते हैं तो भक्त का मन अपने आप उनके चरणों में लग जाता है।

     

    —

     

    एक दिन की बड़ी शिकायत

     

    एक दिन गोकुल की सभी गोपियाँ एक साथ यशोदा मैया के घर पहुँचीं।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    एक गोपी बोली—

     

    “आज तो हद हो गई।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हाँ! तुम्हारे लाल ने हमारी सारी मटकी फोड़ दी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “और जाते-जाते खिड़की पर माखन से अपना नाम भी लिख गया।”

     

    यशोदा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सब हँसने लगीं।

     

    तभी बाहर से कृष्ण की हँसी सुनाई दी।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण दरवाजे पर खड़े थे।

     

    उनके हाथ में माखन था।

     

    और चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।

     

    गोपियों ने एक साथ कहा—

     

    “यही है अपराधी!”

     

    कृष्ण भागे।

     

    सभी गोपियाँ उनके पीछे दौड़ीं।

     

    कृष्ण हँसते हुए आँगन में भागने लगे।

     

    यशोदा मैया भी पीछे दौड़ीं।

     

    “रुक जा कन्हैया!”

     

    कृष्ण और तेज भागे।

     

    गोपियाँ हँसती रहीं।

     

    पूरा गोकुल हँसी से गूँज उठा।

     

    और उस दिन सबको समझ में आ गया—

     

    माखन की मटकी चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न रखो, नंदलाल तक पहुँचने से उसे कोई नहीं रोक सकता।

     

    लेकिन किसी को क्या पता था कि कृष्ण की यह नटखट माखन-चोरी जल्द ही एक ऐसी घटना का रूप लेने वाली है, जिसमें यशोदा मैया अपने कन्हैया को पकड़ लेंगी।

     

    उस दिन पहली बार गोकुल देखेगा कि—

     

    जिस भगवान को पूरा संसार बाँध नहीं सकता, वही अपनी माँ के प्रेम से बँध जाएगा।

     

    और यशोदा मैया के हाथ में होगी—

     

    एक साधारण-सी रस्सी।

     

    लेकिन उस रस्सी में संसार की सबसे बड़ी शक्ति होगी—

     

    माँ का प्रेम।

     

    क्रमशः…

     

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

                         (भाग 4)

    ( तृणावर्त का अंत: जब नन्हे कृष्ण ने बवंडर को भी रोक दिया)

     

     

     

    गोकुल में नंदलाल की बाल-लीलाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं।

     

    अभी कुछ ही समय पहले की बात थी, जब एक भारी बैलगाड़ी के नीचे सोए हुए नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-से पैर से उसे पलट दिया था। गोकुलवासी उस घटना को लेकर आज भी चर्चा करते थे।

     

    कोई कहता—

     

    “यह अवश्य कोई दैवी शक्ति है।”

     

    कोई कहता—

     

    “न जाने इस बालक के जन्म के साथ गोकुल में कैसी-कैसी अद्भुत घटनाएँ होने लगी हैं!”

     

    लेकिन यशोदा मैया इन बातों को सुनकर मुस्कुरा देतीं।

     

    उनके लिए कृष्ण कोई रहस्यमय शक्ति नहीं थे।

     

    वे तो बस उनके लाला थे।

     

    उनकी आँखों का तारा।

     

    उनकी गोद की शोभा।

     

    उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी।

     

    कृष्ण अब थोड़ा बड़े होने लगे थे। उनके हाथ-पैरों में चंचलता आ गई थी। वे कभी करवट लेने का प्रयास करते, कभी हाथ-पैर चलाकर अपने पास रखे खिलौनों को छूने की कोशिश करते।

     

    जब भी वे मुस्कुराते, यशोदा मैया की आँखों में खुशी छलक उठती।

     

    वह अक्सर अपनी सखियों से कहतीं—

     

    “मेरा कन्हैया जब मुस्कुराता है न, तब लगता है जैसे पूरा घर उजाला हो गया।”

     

    गोपियाँ हँसतीं और कहतीं—

     

    “यशोदा, तुम्हें तो अपने लाल के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता।”

     

    यशोदा कहतीं—

     

    “माँ को अपने बच्चे के अलावा भला क्या दिखाई देगा?”

     

    और सच ही तो था।

     

    माँ का हृदय अपने बच्चे में ही संसार देखता है।

     

    लेकिन उस दिन गोकुल में जो होने वाला था, वह यशोदा मैया के हृदय को कंपा देने वाला था।

     

    —

     

    कंस की बेचैनी फिर बढ़ी

     

    उधर मथुरा में कंस को जब यह समाचार मिला कि पूतना का भी अंत हो गया, तो उसका भय और बढ़ गया।

     

    वह अपने महल में क्रोध से इधर-उधर घूमने लगा।

     

    उसने अपने मंत्रियों से कहा—

     

    “पूतना जैसी शक्तिशाली राक्षसी उस बालक का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। आखिर वह बालक है कौन?”

     

    एक मंत्री ने धीरे से कहा—

     

    “महाराज, संभव है कि वह साधारण बालक न हो।”

     

    कंस ने घूरकर देखा।

     

    “क्या कहना चाहते हो?”

     

    मंत्री काँपते हुए बोला—

     

    “शायद आकाशवाणी सत्य होने वाली है।”

     

    यह सुनते ही कंस का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

     

    “चुप!”

     

    उसने अपना मुकुट उतारकर फेंक दिया।

     

    “मैं किसी बालक से नहीं हार सकता। चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।”

     

    तभी सभा में उपस्थित एक राक्षस आगे आया।

     

    उसका नाम था—

     

    तृणावर्त।

     

    वह अत्यंत शक्तिशाली मायावी राक्षस था।

     

    वह अपने शरीर को भयंकर बवंडर में बदल सकता था।

     

    जहाँ वह जाता, वहाँ धूल का ऐसा तूफान उठता कि कुछ दिखाई नहीं देता।

     

    तृणावर्त ने कंस से कहा—

     

    “महाराज, यदि आपको उस बालक की चिंता है तो मुझे गोकुल जाने की अनुमति दीजिए।”

     

    कंस ने पूछा—

     

    “तुम क्या करोगे?”

     

    तृणावर्त मुस्कुराया।

     

    “मैं उसे आकाश में ले जाऊँगा। इतनी ऊँचाई पर कि कोई उसे बचा नहीं सकेगा।”

     

    कंस की आँखों में चमक आ गई।

     

    “जाओ।”

     

    तृणावर्त ने प्रणाम किया।

     

    “उस बालक को मैं आपके पास वापस नहीं आने दूँगा।”

     

    कंस को क्या पता था कि वह स्वयं अपने विनाश की ओर एक और कदम बढ़ा रहा है।

     

    —

     

    गोकुल का शांत दिन

     

    उधर गोकुल में एक दिन सब कुछ सामान्य था।

     

    सुबह की हल्की धूप चारों ओर फैल रही थी।

     

    गायें चरने के लिए बाहर जा रही थीं।

     

    गोप अपने काम में व्यस्त थे।

     

    गोपियाँ घरों में दही मथ रही थीं।

     

    यशोदा मैया अपने कन्हैया को लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण आज कुछ अधिक ही चंचल दिखाई दे रहे थे।

     

    वे बार-बार यशोदा मैया की ओर हाथ बढ़ा रहे थे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या चाहिए मेरे लाला?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से बाहर की ओर संकेत किया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “बाहर जाना है?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा हँसकर बोलीं—

     

    “अभी नहीं। बाहर धूप है।”

     

    कृष्ण ने फिर अपनी उँगली हिलाई।

     

    “अच्छा-अच्छा, मेरी बात नहीं मानोगे?”

     

    कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

     

    “बड़े नटखट हो गए हो।”

     

    पास बैठी एक गोपी बोली—

     

    “अभी से नटखट है, यशोदा। बड़ा होकर तो पूरे गोकुल को नचा देगा।”

     

    सभी हँसने लगीं।

     

    —

     

    अचानक मौसम बदल गया

     

    कुछ समय बाद अचानक वातावरण बदलने लगा।

     

    आकाश पर धूल छाने लगी।

     

    हवा धीरे-धीरे तेज होने लगी।

     

    पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।

     

    लेकिन थोड़ी ही देर में हवा इतनी तेज हो गई कि पेड़ों की डालियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं।

     

    गायें बेचैन होकर रंभाने लगीं।

     

    पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को घर के भीतर बुलाने लगीं।

     

    एक गोपी ने आकाश की ओर देखकर कहा—

     

    “अरे! यह अचानक कैसी आँधी आ गई?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “इतनी तेज हवा तो मैंने बहुत दिनों से नहीं देखी।”

     

    तीसरी ने अपने बच्चे को पकड़ते हुए कहा—

     

    “सब लोग अपने-अपने घरों में चले जाओ।”

     

    धीरे-धीरे हवा का वेग बढ़ता गया।

     

    आकाश में धूल ही धूल दिखाई देने लगी।

     

    कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा कि दिन के समय भी रात उतर आई हो।

     

    —

     

    यशोदा मैया की गोद में कृष्ण

     

    उस समय कृष्ण यशोदा मैया की गोद में थे।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें और कसकर पकड़ लिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “डरना मत मेरे लाल। मैया यहीं है।”

     

    कृष्ण बिल्कुल शांत थे।

     

    वह अपनी माँ की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अचानक उनका शरीर यशोदा मैया को बहुत भारी लगने लगा।

     

    यशोदा ने आश्चर्य से उन्हें संभाला।

     

    “अरे! मेरा लाला इतना भारी कब हो गया?”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में सँभालने की कोशिश की।

     

    लेकिन कुछ ही क्षणों में उन्हें लगा कि वह बालक को उठा नहीं पा रही हैं।

     

    यशोदा ने उन्हें धीरे से नीचे बैठा दिया।

     

    “अच्छा, तू यहीं रह। मैया अभी आती है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को सुरक्षित स्थान पर लिटाया।

     

    उन्हें क्या पता था कि यह सब उसी मायावी शक्ति का प्रभाव था।

     

    तृणावर्त अपना समय देख चुका था।

     

    —

     

    तृणावर्त का आगमन

     

    अचानक हवा का एक भयंकर चक्र उठा।

     

    वह धूल और मिट्टी को अपने भीतर समेटता हुआ तेजी से घूमने लगा।

     

    किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    वह कोई साधारण आँधी नहीं थी।

     

    वह स्वयं तृणावर्त था।

     

    उसने बवंडर का रूप धारण कर लिया था।

     

    उसकी गति इतनी तेज थी कि वृक्षों की शाखाएँ टूटने लगीं।

     

    छप्पर उड़ने लगे।

     

    गोपियाँ अपने बच्चों को पकड़कर घरों में छिपने लगीं।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसा संकट आ गया।

     

    तृणावर्त ने कृष्ण को देखा।

     

    नन्हा बालक शांत पड़ा था।

     

    उसने मन ही मन कहा—

     

    “यही है वह बालक!”

     

    वह तेज गति से नीचे आया और देखते ही देखते कृष्ण को अपने साथ आकाश में उठा ले गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया का हृदय काँप उठा

     

    जब यशोदा मैया वापस आईं, तो उन्होंने देखा—

     

    जहाँ कृष्ण लेटे थे, वहाँ कोई नहीं था।

     

    “कन्हैया?”

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    “कन्हैया!”

     

    लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।

     

    यशोदा की आँखें भय से फैल गईं।

     

    उन्होंने चारों ओर देखा।

     

    कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    उन्होंने घबराकर पुकारा—

     

    “मेरा लाल कहाँ गया?”

     

    गोपियाँ दौड़कर उनके पास आईं।

     

    “क्या हुआ यशोदा?”

     

    यशोदा रोते हुए बोलीं—

     

    “मेरा कन्हैया… मेरा कन्हैया यहाँ था। अभी यहीं था। मैं थोड़ी देर के लिए गई और…”

     

    उनकी आवाज रुक गई।

     

    उन्होंने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “हे भगवान! मेरा बच्चा कहाँ चला गया?”

     

    गोपियाँ भी घबरा गईं।

     

    किसी ने कहा—

     

    “शायद कहीं लुढ़क गया हो।”

     

    किसी ने कहा—

     

    “आँगन में खोजो।”

     

    किसी ने घर के भीतर देखा।

     

    लेकिन कृष्ण कहीं नहीं थे।

     

    —

     

    आकाश में तृणावर्त

     

    उधर तृणावर्त कृष्ण को लेकर बहुत ऊँचाई तक पहुँच चुका था।

     

    उसे लगा—

     

    “अब यह बालक मेरे हाथ से नहीं बच सकता।”

     

    वह और ऊपर जाने लगा।

     

    नीचे पूरा गोकुल बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन तभी उसे अपने शरीर पर एक विचित्र भार महसूस हुआ।

     

    पहले उसे लगा कि शायद हवा का प्रभाव है।

     

    लेकिन भार बढ़ता गया।

     

    तृणावर्त ने सोचा—

     

    “यह क्या हो रहा है?”

     

    उसने कृष्ण को और ऊपर ले जाने का प्रयास किया।

     

    लेकिन अब कृष्ण का शरीर उसे अत्यंत भारी लगने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में उसकी गति रुक गई।

     

    उसकी साँसें भारी होने लगीं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    “यह बालक इतना भारी कैसे हो गया?”

     

    तृणावर्त ने पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन अब तो वह स्वयं नीचे खिंचने लगा।

     

    —

     

    भगवान का अद्भुत रूप

     

    तृणावर्त को अब समझ में आने लगा कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    उसने कृष्ण को अपने शरीर से अलग करने का प्रयास किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने अपनी छोटी-सी भुजा उसके गले के चारों ओर डाल दी।

     

    और देखते ही देखते उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई कि तृणावर्त का दम घुटने लगा।

     

    उसकी आँखें बाहर निकल आईं।

     

    उसने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

     

    लेकिन भगवान के सामने उसकी सारी शक्ति समाप्त हो गई।

     

    तृणावर्त की गति रुक गई।

     

    उसका बवंडर समाप्त होने लगा।

     

    आकाश से धूल नीचे गिरने लगी।

     

    गोकुल में धीरे-धीरे प्रकाश लौटने लगा।

     

    और फिर—

     

    धड़ाम!

     

    तृणावर्त का विशाल शरीर एक ऊँचे स्थान से धरती पर आ गिरा।

     

    उसका प्राणांत हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर नन्हे कृष्ण सुरक्षित बैठे थे।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने देखा अद्भुत दृश्य

     

    जैसे ही धूल बैठी, गोकुलवासियों ने देखा कि एक विशाल राक्षस धरती पर पड़ा है।

     

    उसके ऊपर नन्हा कृष्ण सुरक्षित था।

     

    एक गोप चिल्लाया—

     

    “कन्हैया!”

     

    सब लोग दौड़ पड़े।

     

    यशोदा मैया तो अपने लाल को देखते ही रोती हुई दौड़ीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उन्होंने कृष्ण को बार-बार चूमा।

     

    उनके आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    “तुझे कुछ हो जाता तो?”

     

    कृष्ण अपनी माँ की गोद में शांत थे।

     

    जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने आँचल में छिपा लिया।

     

    “अब मैं तुझे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ूँगी।”

     

    —

     

    नंद बाबा की चिंता

     

    जब नंद बाबा को घटना का समाचार मिला, वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने तृणावर्त का विशाल शरीर देखा और फिर कृष्ण को देखा।

     

    उनका मन भय और आश्चर्य से भर गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “यह कैसी अद्भुत घटना है?”

     

    एक वृद्ध गोप ने कहा—

     

    “नंद बाबा, यह बालक साधारण नहीं लगता।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “जो भी हो, भगवान ने आज मेरे बालक की रक्षा की है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    कृष्ण ने उनकी दाढ़ी पकड़ ली।

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अरे! तुझे तो कोई चिंता ही नहीं है।”

     

    गोपियाँ भी मुस्कुराने लगीं।

     

    कुछ ही समय पहले जिस गोकुल में भय छाया हुआ था, वहीं अब हँसी लौटने लगी थी।

     

    —

     

    यशोदा मैया की ममता

     

    उस रात यशोदा मैया ने कृष्ण को अपनी गोद से नीचे नहीं उतारा।

     

    वह उन्हें देखती रहीं।

     

    कभी उनके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    कभी उनके पैरों को सहलातीं।

     

    फिर धीरे से बोलीं—

     

    “लाला, आज तू मुझे बहुत डरा गया।”

     

    कृष्ण ने आँखें खोलकर माँ की ओर देखा।

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “क्या देख रहा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा के चेहरे को छुआ।

     

    यशोदा की आँखों से फिर आँसू निकल आए।

     

    उन्होंने कृष्ण को चूमते हुए कहा—

     

    “तू मेरा है।”

     

    भगवान स्वयं उनके सामने थे।

     

    फिर भी यशोदा उन्हें अपना मानती थीं।

     

    यही तो प्रेम की शक्ति है।

     

    —

     

    इस लीला का गहरा संदेश

     

    तृणावर्त केवल एक राक्षस का नाम नहीं था।

     

    वह अहंकार और अंधी शक्ति का प्रतीक भी माना जाता है।

     

    उसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान था कि उसने सोचा—

     

    “मैं इस छोटे-से बालक को आकाश में ले जाकर समाप्त कर दूँगा।”

     

    लेकिन जिस बालक को उसने कमजोर समझा, वही उसके लिए सबसे भारी बन गया।

     

    यह लीला हमें सिखाती है कि केवल बाहरी शक्ति ही सब कुछ नहीं होती।

     

    जिसके भीतर अहंकार होता है, वह अपनी ही शक्ति के कारण विनाश की ओर जा सकता है।

     

    और जो भगवान की शरण में होता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर मुस्कान लौटी

     

    अगली सुबह गोकुल में फिर वही चहल-पहल थी।

     

    गोपियाँ एक-दूसरे से कल की घटना के बारे में बातें कर रही थीं।

     

    एक बोली—

     

    “मैंने तो ऐसा बवंडर कभी नहीं देखा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और देखो, हमारा कन्हैया फिर बच गया।”

     

    तीसरी हँसते हुए बोली—

     

    “अब तो मुझे लगता है कि यह बालक स्वयं गोकुल की रक्षा करने आया है।”

     

    यशोदा मैया ने यह बात सुनी तो बोलीं—

     

    “अरे, ऐसी बातें मत करो। मेरा लाला तो अभी बहुत छोटा है।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    “हाँ-हाँ, तुम्हारा लाला बहुत छोटा है!”

     

    यशोदा भी मुस्कुरा दीं।

     

    लेकिन मन ही मन वह कल की घटना को भूल नहीं पा रही थीं।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा।

     

    कृष्ण उस समय एक छोटी-सी लकड़ी की वस्तु से खेल रहे थे।

     

    यशोदा ने सोचा—

     

    “यह मेरा नन्हा-सा बालक आखिर कौन है?”

     

    लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने उस विचार को मन से निकाल दिया।

     

    “जो भी है, मेरा तो है।”

     

    उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    और कृष्ण ने अपनी माँ के गले में हाथ डाल दिए।

     

    —

     

    आगे की लीला की शुरुआत

     

    गोकुल में अब कृष्ण की ख्याति बढ़ती जा रही थी।

     

    हर दिन कोई नई शरारत।

     

    हर दिन कोई नई मुस्कान।

     

    हर दिन कोई नई लीला।

     

    लेकिन अब उनकी सबसे बड़ी शरारतें आरंभ होने वाली थीं।

     

    कृष्ण धीरे-धीरे घुटनों के बल चलना सीखने वाले थे।

     

    वे घर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते।

     

    माखन की मटकी को देखते।

     

    दही को देखते।

     

    और फिर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यशोदा मैया की ओर देखते।

     

    यशोदा समझ जातीं—

     

    “कुछ तो शरारत होने वाली है।”

     

    लेकिन वह शरारत क्या थी?

     

    एक दिन कृष्ण ने अपने छोटे-से हाथ से माखन की मटकी की ओर बढ़ना शुरू किया।

     

    गोपियों ने उन्हें देख लिया।

     

    एक गोपी चिल्लाई—

     

    “अरी यशोदा! संभाल अपने लाल को!”

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण मटकी की ओर बढ़ रहे थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “कन्हैया! उधर क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण तुरंत रुक गए।

     

    यशोदा उनकी ओर बढ़ीं।

     

    कृष्ण ने मासूम चेहरा बना लिया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तू माखन खाने जा रहा था न?”

     

    कृष्ण ने आँखें झुका लीं।

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    यशोदा भी मुस्कुरा उठीं।

     

    लेकिन उस दिन से गोकुल में एक नई पहचान बनने वाली थी—

     

    माखनचोर कन्हैया की।

     

    जो माखन चुराएगा।

     

    जो मटकी फोड़ेगा।

     

    जो गोपियों को सताएगा।

     

    और फिर ऐसी मासूम मुस्कान देगा कि कोई उसे डाँट ही नहीं पाएगा।

     

    यही थी नंदलाल की अगली लीला की शुरुआत।

     

    क्रमशः…