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  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 3 — शकटासुर का उद्धार)

     

    गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म को कुछ समय बीत चुका था।

     

    पूतना जैसी भयंकर राक्षसी का अंत होने के बाद भी गोकुलवासियों का जीवन पहले जैसा ही चलता रहा। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि नंद बाबा का यह नन्हा-सा बालक बार-बार बड़े संकटों से कैसे बच जाता है।

     

    परंतु यशोदा मैया के लिए तो उनका कन्हैया अभी भी वही नन्हा बालक था, जिसे हर समय अपनी आँखों के सामने रखने का मन करता था।

     

    कृष्ण अब धीरे-धीरे बड़े होने लगे थे।

     

    उनके हाथ-पैरों में पहले से अधिक चंचलता आ गई थी।

     

    कभी वे अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा मैया की उँगली पकड़ लेते, तो कभी पैरों को हिलाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगते।

     

    उनकी मुस्कान देखते ही यशोदा मैया की सारी थकान दूर हो जाती।

     

    एक दिन सुबह यशोदा मैया कृष्ण को गोद में लेकर आँगन में बैठी थीं।

     

    कृष्ण बार-बार उनकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने उनके गालों को सहलाते हुए कहा—

     

    “क्या हुआ मेरे लाला? आज बड़े प्रसन्न हो!”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया को देखते रहे।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से इतना मुस्कुराते हो? लगता है कोई बड़ी शरारत सोच रहे हो।”

     

    कृष्ण ने फिर मुस्कुरा दिया।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव की तैयारी

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा के घर एक विशेष उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी।

     

    गोकुल में ऐसे अवसरों पर सभी गोप-गोपियाँ एकत्र होते थे।

     

    घर को सजाया गया।

     

    आँगन में सुंदर रंगोली बनाई गई।

     

    गायों को नहलाकर उनके सींगों पर रंग लगाया गया।

     

    उनके गले में नई घंटियाँ बाँधी गईं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों से दही, माखन, दूध और मिठाइयाँ लेकर नंद भवन पहुँचने लगीं।

     

    पूरा गोकुल जैसे एक परिवार बन गया था।

     

    कहीं गीत गाए जा रहे थे।

     

    कहीं ढोलक बज रही थी।

     

    कहीं बच्चे खेल रहे थे।

     

    और नंद भवन में तो विशेष चहल-पहल थी।

     

    यशोदा मैया सुबह से ही काम में लगी थीं।

     

    कभी रसोई में जातीं, कभी आँगन में आतीं, कभी मेहमानों का स्वागत करतीं।

     

    लेकिन बार-बार उनकी दृष्टि अपने कन्हैया पर चली जाती।

     

    “मेरा लाल कहाँ है?”

     

    वह पूछतीं।

     

    एक गोपी हँसकर कहती—

     

    “अरी यशोदा! आज तो पूरे गोकुल की चिंता छोड़कर बस अपने लाला की चिंता कर रही हो।”

     

    यशोदा मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “क्या करूँ? यह है ही ऐसा।”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “अभी छोटा है, थोड़ा बड़ा होने दो। फिर तुम्हें पता चलेगा इसकी शरारतों का।”

     

    यशोदा ने हँसकर कहा—

     

    “मेरा कन्हैया तो बहुत सीधा है।”

     

    सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।

     

    किसी को क्या पता था कि यही “सीधा” बालक आगे चलकर पूरे गोकुल की मटकी चुराने वाला है!

     

    —

     

    वह पुरानी बैलगाड़ी

     

    उत्सव के कारण नंद भवन के आँगन में बहुत-सा सामान रखा हुआ था।

     

    दूध के मटके, दही के घड़े, मक्खन के पात्र और अन्य घरेलू वस्तुएँ एक बड़ी पुरानी बैलगाड़ी के ऊपर रखी थीं।

     

    वह बैलगाड़ी बहुत भारी थी।

     

    उसे आँगन के एक कोने में खड़ा कर दिया गया था।

     

    यशोदा मैया ने सोचा कि कुछ समय के लिए कृष्ण को उसी गाड़ी के नीचे छाया में सुला दिया जाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को एक सुंदर वस्त्र पर लिटाया।

     

    फिर उनके सिर के पास बैठकर बोलीं—

     

    “लाला, मैं अभी आती हूँ। तुम यहीं सोना।”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें खोलकर मैया की ओर देखा।

     

    यशोदा ने उनके माथे को चूमा और काम में लग गईं।

     

    आँगन में उत्सव का शोर बढ़ता जा रहा था।

     

    कहीं कोई गीत गा रहा था।

     

    कहीं बच्चे हँस रहे थे।

     

    कहीं मटकी में दही मथा जा रहा था।

     

    और उस सबके बीच नन्हा कृष्ण उस भारी बैलगाड़ी के नीचे लेटे हुए थे।

     

    —

     

    संकट की आहट

     

    कहानी के अनुसार, कंस ने कृष्ण को समाप्त करने के लिए एक और राक्षस भेजा था।

     

    उस राक्षस का नाम था—

     

    शकटासुर।

     

    वह मायावी राक्षस था।

     

    उसने सोचा—

     

    “पूतना असफल हो गई। अब मैं इस बालक को समाप्त करूँगा।”

     

    शकटासुर ने अपनी मायावी शक्ति से उस भारी बैलगाड़ी में प्रवेश कर लिया।

     

    अब वह बैलगाड़ी केवल लकड़ी और पहियों की गाड़ी नहीं थी।

     

    उसमें एक भयंकर राक्षसी शक्ति समा चुकी थी।

     

    शकटासुर मन ही मन प्रसन्न हुआ।

     

    “यह बालक तो मेरे नीचे लेटा है। जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इस गाड़ी को इसके ऊपर गिरा दूँगा।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह जिस बालक के ऊपर अपनी शक्ति आजमाने आया है, उसके लिए पर्वत भी खिलौने के समान हैं।

     

    —

     

    कृष्ण को भूख लगी

     

    कुछ समय बीता।

     

    कृष्ण की आँख खुल गई।

     

    उन्होंने इधर-उधर देखा।

     

    मैया कहीं दिखाई नहीं दीं।

     

    उन्होंने अपनी छोटी-सी मुट्ठी हिलाई।

     

    फिर अपने पैरों को चलाया।

     

    लेकिन मैया काम में व्यस्त थीं।

     

    कृष्ण को भूख लगी।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे रोना शुरू किया।

     

    पहले हल्की-सी आवाज निकली।

     

    फिर रोना बढ़ गया।

     

    आँगन में उपस्थित कुछ गोपियों ने कृष्ण की आवाज सुनी।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लगता है यशोदा का लाला जाग गया।”

     

    दूसरी ने कहा—

     

    “यशोदा तो अभी रसोई में हैं।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “अरे, कोई जाकर देखो!”

     

    लेकिन उत्सव की भीड़ और शोर के कारण किसी का ध्यान ठीक से कृष्ण की ओर नहीं गया।

     

    कृष्ण अब और जोर से रोने लगे।

     

    उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैर चलाने शुरू किए।

     

    एक बार उन्होंने अपना पैर ऊपर उठाया।

     

    फिर नीचे किया।

     

    और फिर—

     

    उनका नन्हा-सा पैर उस भारी बैलगाड़ी से जा लगा।

     

    अगले ही क्षण जो हुआ, उसे देखकर सभी के होश उड़ गए।

     

    —

     

    भारी गाड़ी का पलटना

     

    एक भयंकर आवाज हुई—

     

    धड़ाम!

     

    वह विशाल और भारी बैलगाड़ी उलट गई।

     

    उस पर रखे सारे मटके और घड़े टूटकर चारों ओर बिखर गए।

     

    दही और दूध आँगन में फैल गया।

     

    लकड़ी के पहिए एक ओर जा गिरे।

     

    बर्तन टूटने की आवाज सुनकर पूरा गोकुल दौड़ पड़ा।

     

    गोपियाँ चिल्लाईं—

     

    “अरे! यह क्या हो गया?”

     

    “गाड़ी कैसे पलट गई?”

     

    “कहीं बालक कृष्ण को तो कुछ नहीं हुआ?”

     

    यशोदा मैया ने जैसे ही आवाज सुनी, उनके हाथ-पैर काँपने लगे।

     

    वह सब काम छोड़कर दौड़ती हुई आईं।

     

    “मेरा लाल!”

     

    उनकी आँखें सीधे कृष्ण को खोजने लगीं।

     

    उन्होंने देखा—

     

    कृष्ण बिल्कुल सुरक्षित थे।

     

    वह वहीं लेटे हुए थे और अपने छोटे-छोटे हाथ-पैर हिला रहे थे।

     

    यशोदा मैया ने तुरंत उन्हें उठाकर अपनी गोद में भर लिया।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ तो नहीं हुआ?”

     

    वह कृष्ण के हाथ-पैर देखने लगीं।

     

    उनके माथे को चूमा।

     

    फिर उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    —

     

    गोकुलवासियों का आश्चर्य

     

    गोप और गोपियाँ उस उलटी हुई गाड़ी को देखकर हैरान थे।

     

    एक गोप बोला—

     

    “यह गाड़ी इतनी भारी थी। इसे तो चार-पाँच आदमी मिलकर भी मुश्किल से हिला पाते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “फिर यह अपने आप कैसे उलट गई?”

     

    तीसरा बोला—

     

    “क्या किसी ने इसे धक्का दिया था?”

     

    एक बालक बोला—

     

    “मैंने देखा था! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    सभी उसकी ओर देखने लगे।

     

    एक गोपी हँसकर बोली—

     

    “अरे पगले! इतने-से पैर में इतनी शक्ति कहाँ से आएगी?”

     

    बालक बोला—

     

    “मैंने सच में देखा था!”

     

    दूसरे बच्चे भी कहने लगे—

     

    “हाँ! कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    गोपियाँ हँसने लगीं।

     

    उन्हें लगा कि बच्चे अपने प्रिय मित्र की प्रशंसा कर रहे हैं।

     

    किसी ने कल्पना भी नहीं की कि सचमुच उस गाड़ी को नन्हे कृष्ण ने ही पलटा था।

     

    —

     

    शकटासुर का अंत

     

    वास्तव में उस गाड़ी के भीतर छिपा शकटासुर भगवान कृष्ण के चरण-स्पर्श से नष्ट हो चुका था।

     

    जिस शक्ति के भरोसे वह आया था, वही शक्ति उसके लिए विनाश का कारण बन गई।

     

    भगवान ने न तो कोई अस्त्र उठाया।

     

    न कोई युद्ध किया।

     

    न कोई बड़ी शक्ति दिखाई।

     

    उन्होंने केवल अपने नन्हे-से पैर को थोड़ा-सा हिलाया।

     

    और राक्षस का अंत हो गया।

     

    यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।

     

    जो कार्य साधारण मनुष्य के लिए असंभव था, वह उनके लिए खेल मात्र था।

     

    —

     

    यशोदा मैया की चिंता

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था।

     

    उनके लिए बस इतना महत्वपूर्ण था कि उनका लाल सुरक्षित रहे।

     

    वह कृष्ण को गोद में लेकर बोलीं—

     

    “तू वहाँ अकेला क्यों लेटा था?”

     

    कृष्ण उन्हें देखते रहे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मैंने कहा था न, मैया अभी आती है!”

     

    कृष्ण ने अपनी आँखें झपकाईं।

     

    यशोदा का हृदय पिघल गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, अब रोना मत।”

     

    और फिर उन्हें अपने आँचल से ढक लिया।

     

    गोपियाँ यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा लाल तो बहुत भाग्यशाली है। उसे ऐसी माँ मिली है जो उसे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया।

     

    —

     

    नंद बाबा को समाचार मिला

     

    जब नंद बाबा को इस घटना के बारे में पता चला, तो वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने उलटी हुई बैलगाड़ी देखी।

     

    टूटे हुए मटके देखे।

     

    फिर अपने बालक को देखा।

     

    नंद बाबा कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाए।

     

    उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।

     

    “कन्हैया!”

     

    उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    फिर बोले—

     

    “आज तो भगवान ने मेरे लाल की रक्षा कर दी।”

     

    नंद बाबा को क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके हाथों में हैं।

     

    —

     

    ब्रज के बुजुर्गों की चर्चा

     

    गोकुल के कुछ वृद्ध लोग वहाँ एकत्र हुए।

     

    उन्होंने घटना को ध्यान से देखा।

     

    एक वृद्ध बोले—

     

    “यह कोई साधारण घटना नहीं है।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “बच्चों की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन इतनी भारी गाड़ी का अपने आप उलटना भी तो संभव नहीं।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हो सकता है इसमें कोई अदृश्य शक्ति हो।”

     

    एक अन्य वृद्ध बोले—

     

    “हमें अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।”

     

    सभी ने मिलकर भगवान का नाम लिया।

     

    लेकिन कृष्ण अपनी माँ की गोद में आराम से मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो उन्हें सब पता हो।

     

    —

     

    नंदलाल की नटखट मुस्कान

     

    उस शाम यशोदा मैया कृष्ण को अपने घर के भीतर लेकर आईं।

     

    उन्होंने उन्हें एक सुंदर शैया पर लिटाया।

     

    कृष्ण ने मैया की ओर देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “क्या बात है? आज बड़ी खुशी हो रही है?”

     

    कृष्ण ने पैर हिलाया।

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “अच्छा! आज गाड़ी भी तुमने ही पलटाई थी क्या?”

     

    कृष्ण फिर मुस्कुराए।

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “अरे! तू तो बड़ा शरारती निकलेगा।”

     

    कृष्ण ने जैसे अपनी आँखों से उत्तर दिया—

     

    “मैया, अभी तो शुरुआत है।”

     

    —

     

    इस लीला का रहस्य

     

    शकटासुर की कथा में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जाता है।

     

    वह भारी बैलगाड़ी जैसे हमारे जीवन के उन बोझों का प्रतीक मानी जा सकती है, जिन्हें हम अपने मन में ढोते रहते हैं।

     

    अहंकार।

     

    भय।

     

    लोभ।

     

    क्रोध।

     

    पुरानी चिंताएँ।

     

    और अनेक प्रकार के मानसिक बोझ।

     

    जब मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, तो उसके भीतर ऐसी शक्ति आती है जो बड़े से बड़े बोझ को भी दूर करने का सामर्थ्य देती है।

     

    श्रीकृष्ण ने इस लीला में यह दिखाया कि भगवान के लिए कोई संकट बड़ा नहीं होता।

     

    और सबसे सुंदर बात यह थी कि उन्होंने यह लीला किसी बड़े योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटे-से बालक के रूप में की।

     

    यही कृष्ण की बाल-लीलाओं की विशेषता है।

     

    वे कभी रोते हैं।

     

    कभी हँसते हैं।

     

    कभी खेलते हैं।

     

    कभी शरारत करते हैं।

     

    और आवश्यकता पड़ने पर संसार की रक्षा भी कर देते हैं।

     

    —

     

    गोकुल में फिर लौटी खुशी

     

    घटना के बाद गोकुलवासियों ने भगवान का धन्यवाद किया।

     

    टूटे हुए मटकों को हटाया गया।

     

    आँगन साफ किया गया।

     

    गायों को फिर से बाँधा गया।

     

    बच्चे थोड़ी देर तक उस घटना की चर्चा करते रहे।

     

    एक बालक दूसरे से कह रहा था—

     

    “मैंने तो पहले ही कहा था, कन्हैया ने पैर मारा था।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “हाँ, लेकिन कोई हमारी बात मानता ही नहीं।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    उधर कृष्ण यशोदा मैया की गोद में आराम से सो चुके थे।

     

    उनके मुख पर हल्की-सी मुस्कान थी।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “मेरे लाला, तू हमेशा ऐसे ही हँसता रहना।”

     

    बाहर रात उतरने लगी।

     

    आकाश में तारे चमकने लगे।

     

    यमुना जी की धारा शांत होकर बह रही थी।

     

    गोकुल में सब लोग सोने लगे।

     

    लेकिन भगवान की लीला कहाँ रुकने वाली थी?

     

    जिस बालक ने अभी अपने पैर से एक भारी गाड़ी पलट दी थी, वह शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला था जिसमें एक भयंकर बवंडर पूरे गोकुल को अपनी चपेट में ले लेगा।

     

    लोग भय से काँप उठेंगे।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को खोजती हुई व्याकुल हो जाएँगी।

     

    और तब गोकुलवासियों को एक बार फिर अनुभव होगा कि उनका नन्हा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं है।

     

    क्योंकि अगली लीला में आने वाला था—

     

    तृणावर्त।

     

    एक ऐसा राक्षस, जो स्वयं बवंडर का रूप धारण करके नंदलाल को आकाश में ले जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिसे वह आकाश में ले जा रहा है, वही संपूर्ण आकाश का स्वामी है।

     

    क्रमशः…

     

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

     

    (भाग 2 — पूतना का गोकुल आगमन)

     

    पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भाद्रपद मास की अष्टमी की अर्धरात्रि में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया और वसुदेव जी उन्हें यमुना पार करके गोकुल ले आए।

     

    गोकुल में उस समय किसी को यह ज्ञात नहीं था कि नंद बाबा के घर जन्म लेने वाला वह नन्हा बालक कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं।

     

    यशोदा मैया तो उन्हें अपना लाल समझकर ही दुलार रही थीं।

     

    कभी उन्हें गोद में लेकर चूमतीं, कभी उनके नन्हे हाथों को अपनी उँगली पकड़ातीं और कभी उनके मुख को निहारते-निहारते स्वयं मुस्कुराने लगतीं।

     

    गोकुल में हर ओर आनंद था।

     

    लेकिन इसी आनंद के बीच मथुरा में बैठा कंस बेचैन था।

     

    उसे उस आकाशवाणी की बात बार-बार याद आ रही थी—

     

    “तेरा काल गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    कंस के मन में भय ने घर कर लिया था।

     

    उसने अपने सैनिकों और राक्षसों को आदेश दिया—

     

    “गोकुल और उसके आसपास जितने भी नवजात बालक हैं, उन्हें खोजो। मुझे किसी भी कीमत पर उस बालक का पता चाहिए।”

     

    कंस को क्या पता था कि जिस बालक को वह खोज रहा है, वह उसके महलों से बहुत दूर नहीं, बल्कि एक छोटे-से गाँव में अपनी माँ की गोद में मुस्कुरा रहा है।

     

    —

     

    कंस की चिंता

     

    मथुरा के राजमहल में उस रात कंस सो नहीं पाया।

     

    वह बार-बार अपने महल की खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगता।

     

    चाँदनी रात थी, लेकिन कंस के मन में अंधकार था।

     

    उसने अपने एक मंत्री से कहा—

     

    “मुझे वह बालक चाहिए। चाहे वह कहीं भी छिपा हो।”

     

    मंत्री ने डरते हुए कहा—

     

    “महाराज, यदि वह बालक गोकुल में है तो वहाँ पहुँचने वाले हमारे राक्षस उसे खोज लेंगे।”

     

    कंस ने क्रोध से कहा—

     

    “मुझे आश्वासन नहीं चाहिए! मुझे परिणाम चाहिए।”

     

    तभी उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसे याद आई एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षसी—

     

    पूतना।

     

    पूतना मायावी थी।

     

    वह अपना रूप बदल सकती थी।

     

    कभी सुंदर स्त्री बन सकती थी, तो कभी भयंकर राक्षसी।

     

    वह छोटे बच्चों को छल से अपने पास बुलाती और अपने विषैले स्तनों का दूध पिलाकर उनका जीवन समाप्त कर देती।

     

    कंस ने तुरंत उसे बुलवाया।

     

    कुछ ही समय बाद पूतना उसके सामने उपस्थित हुई।

     

    उसका विशाल शरीर, लाल आँखें और भयंकर रूप देखकर राजमहल के सैनिक भी काँप उठे।

     

    कंस ने कहा—

     

    “पूतना! मुझे एक काम करना है।”

     

    पूतना ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “कैसा काम, महाराज?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “गोकुल में एक बालक जन्मा है। मुझे संदेह है कि वही मेरे विनाश का कारण है। तुम गोकुल जाओ और उस बालक का वध कर दो।”

     

    पूतना ने ठहाका लगाया।

     

    “बस इतनी-सी बात?”

     

    कंस ने कहा—

     

    “उसे पहचानना आसान नहीं होगा। वहाँ नंद नाम का गोप रहता है। उसके घर एक बालक है। मुझे वही चाहिए।”

     

    पूतना ने उत्तर दिया—

     

    “महाराज, आप चिंता न करें। मैं उस बालक को ऐसी मृत्यु दूँगी कि किसी को संदेह तक नहीं होगा।”

     

    कंस के चेहरे पर दुष्ट मुस्कान फैल गई।

     

    उसे लगा कि अब उसका भय समाप्त हो जाएगा।

     

    लेकिन वह नहीं जानता था कि जिस बालक के पास पूतना जा रही है, उसके सामने मृत्यु स्वयं भी असहाय होने वाली है।

     

    —

     

    गोकुल की सुबह

     

    उधर गोकुल में एक सुंदर सुबह हुई।

     

    सूर्य की किरणें धीरे-धीरे गाँव की गलियों में फैलने लगीं।

     

    गायों के गले की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों में दही मथने लगीं।

     

    कहीं मटकी में माखन निकाला जा रहा था, तो कहीं बालक खेलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर तो जैसे हर दिन उत्सव ही रहता था।

     

    यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    बालक कृष्ण उनकी उँगली पकड़कर खेल रहे थे।

     

    कभी अपनी छोटी-सी मुट्ठी बंद करते, कभी खोलते।

     

    यशोदा मैया हँसकर बोलीं—

     

    “अरे मेरे लाल! इतनी-सी मुट्ठी में क्या छिपा रखा है?”

     

    कृष्ण ने अपनी मुट्ठी और कसकर बंद कर ली।

     

    यशोदा मैया बोलीं—

     

    “अच्छा! मुझसे भी नहीं बताओगे?”

     

    कृष्ण मुस्कुराने लगे।

     

    यशोदा मैया उन्हें देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्हें अपने हृदय से लगा लिया।

     

    उन्हें क्या पता था कि आज उनके लाल के जीवन में एक बड़ी लीला होने वाली है।

     

    —

     

    पूतना का रूप परिवर्तन

     

    उधर पूतना गोकुल की ओर बढ़ रही थी।

     

    उसका असली रूप इतना भयंकर था कि कोई मनुष्य उसे देखकर जीवित न रह पाए।

     

    इसलिए उसने अपनी मायावी शक्ति से स्वयं को एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में बदल लिया।

     

    उसने सुंदर वस्त्र पहने।

     

    बालों में सुगंधित फूल लगाए।

     

    माथे पर सुंदर तिलक लगाया।

     

    उसका चेहरा इतना मनोहर बना दिया कि जो भी उसे देखता, उसे कोई राजमहल की देवी समझता।

     

    हाथ में उसने एक सुंदर पात्र लिया।

     

    लेकिन उस पात्र में अमृत नहीं, मृत्यु छिपी थी।

     

    उसने अपने स्तनों पर घोर विष लगा रखा था।

     

    उसका उद्देश्य स्पष्ट था—

     

    बालकृष्ण को अपने पास बुलाना और विषपान कराकर उनका वध करना।

     

    पूतना धीरे-धीरे गोकुल में प्रवेश कर गई।

     

    आश्चर्य की बात यह थी कि उसे देखकर किसी को भी उस पर संदेह नहीं हुआ।

     

    गोपियाँ उसकी सुंदरता देखकर एक-दूसरे से कहने लगीं—

     

    “यह कौन है?”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “शायद किसी दूर के नगर से आई कोई देवी है।”

     

    तीसरी ने कहा—

     

    “देखो, कितनी सुंदर है!”

     

    पूतना मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

     

    वह सोच रही थी—

     

    “मूर्खों! तुम जिसे देवी समझ रहे हो, वही तुम्हारे प्रिय बालक की मृत्यु बनकर आई है।”

     

    लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के नगर में छल कितनी देर टिक सकता है।

     

    —

     

    नंद भवन में प्रवेश

     

    पूतना सीधे नंद बाबा के घर पहुँची।

     

    उस समय यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लिए बैठी थीं।

     

    जैसे ही पूतना ने घर में प्रवेश किया, श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    कथा में कहा जाता है कि भगवान ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे अपनी लीला को पूर्ण करने वाले थे।

     

    पूतना धीरे-धीरे यशोदा के पास पहुँची।

     

    उसने मधुर स्वर में कहा—

     

    “बहन! कितना सुंदर बालक है तुम्हारा।”

     

    यशोदा मैया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ, मेरा कन्हैया बहुत प्यारा है।”

     

    पूतना ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसके मन में दुष्ट विचार उठे—

     

    “यही है वह बालक।”

     

    लेकिन तभी उसके भीतर एक विचित्र भावना भी उठी।

     

    उसने ऐसा सुंदर बालक पहले कभी नहीं देखा था।

     

    कृष्ण का मुख चंद्रमा के समान चमक रहा था।

     

    उनके छोटे-छोटे हाथ और चरण देखकर कुछ क्षण के लिए पूतना का हृदय भी कोमल हो उठा।

     

    लेकिन उसके भीतर छिपी दुष्टता ने उस भावना को दबा दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “बहन, मुझे बालक को थोड़ी देर गोद में लेने दो।”

     

    यशोदा मैया ने सहजता से कृष्ण को उसकी गोद में दे दिया।

     

    यशोदा को क्या पता था कि जिस स्त्री की गोद में वह अपने लाल को दे रही हैं, वह उन्हें मारने के उद्देश्य से आई है।

     

    —

     

    पूतना की गोद में कृष्ण

     

    पूतना ने बालक कृष्ण को अपनी गोद में लिया।

     

    कृष्ण शांत थे।

     

    उन्होंने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं।

     

    पूतना ने उन्हें अपने विषैले स्तन से दूध पिलाने के लिए अपने पास किया।

     

    वह मन ही मन सोच रही थी—

     

    “अब यह बालक कुछ ही क्षणों में समाप्त हो जाएगा।”

     

    लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण ने दूध पीना आरंभ किया, कुछ अद्भुत हुआ।

     

    उन्होंने केवल दूध ही नहीं पिया।

     

    उन्होंने पूतना के प्राण भी खींचने आरंभ कर दिए।

     

    पूतना का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें फैल गईं।

     

    वह दर्द से तड़प उठी।

     

    उसने कृष्ण को अपने से अलग करने की कोशिश की।

     

    लेकिन बालक कृष्ण ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

     

    पूतना चीख उठी—

     

    “छोड़ो! छोड़ो मुझे!”

     

    लेकिन नन्हे कृष्ण ने उसे नहीं छोड़ा।

     

    अब उसका सुंदर स्त्री वाला रूप समाप्त होने लगा।

     

    उसका शरीर विशाल होने लगा।

     

    उसके बाल बिखर गए।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    उसके दाँत बाहर निकल आए।

     

    उसका वास्तविक राक्षसी रूप प्रकट होने लगा।

     

    गोकुल की धरती काँपने लगी।

     

    गोपियाँ भयभीत होकर चिल्लाने लगीं—

     

    “अरे! यह क्या हो रहा है?”

     

    —

     

    पूतना का भयंकर रूप

     

    अचानक पूतना अपने वास्तविक विशाल रूप में आ गई।

     

    उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया।

     

    वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

     

    उसकी चीख से पूरा गोकुल काँप उठा।

     

    पेड़ों से पक्षी उड़ गए।

     

    गायें भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं।

     

    गोप और गोपियाँ अपने घरों से बाहर निकल आए।

     

    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

     

    पूतना ने कृष्ण को अपने शरीर से हटाने की बहुत कोशिश की।

     

    लेकिन भगवान कृष्ण उसके प्राणों को खींचते रहे।

     

    अंततः उसकी शक्ति समाप्त होने लगी।

     

    उसने अंतिम बार भयंकर गर्जना की—

     

    “आऽऽह!”

     

    और देखते ही देखते वह धरती पर गिर पड़ी।

     

    उसका विशाल शरीर गोकुल से बहुत दूर तक फैल गया।

     

    वृक्ष टूट गए।

     

    धरती काँप उठी।

     

    चारों ओर धूल उड़ने लगी।

     

    कुछ क्षण के लिए गोकुल में सन्नाटा छा गया।

     

    —

     

    यशोदा मैया की घबराहट

     

    जैसे ही धूल थोड़ी शांत हुई, यशोदा मैया की दृष्टि अपने कृष्ण पर पड़ी।

     

    उनका कलेजा मुँह को आ गया।

     

    “मेरा लाल!”

     

    वे दौड़कर कृष्ण को उठाने लगीं।

     

    उन्होंने देखा कि उनका कन्हैया बिल्कुल सुरक्षित है।

     

    न कोई चोट।

     

    न कोई भय।

     

    न कोई आँसू।

     

    वह तो ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

     

    उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मेरे लाल! तुझे कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”

     

    नंद बाबा भी दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    उन्होंने कृष्ण को देखा और राहत की साँस ली।

     

    गोपियाँ भी चारों ओर इकट्ठी हो गईं।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “यशोदा! तुम्हारा लाल तो बिल्कुल ठीक है!”

     

    दूसरी बोली—

     

    “देखो तो, यह तो हँस रहा है!”

     

    तीसरी ने आश्चर्य से कहा—

     

    “जिस राक्षसी ने पूरे गोकुल को हिला दिया, उसके ऊपर बैठकर यह बालक ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे खेल रहा हो!”

     

    सभी कृष्ण को आश्चर्य से देखने लगीं।

     

    —

     

    गोकुलवासियों ने क्या किया?

     

    गोपियों ने कृष्ण की रक्षा के लिए तुरंत उन्हें गोद में लेकर मंत्रों और भगवान के नाम का स्मरण किया।

     

    वे कहने लगीं—

     

    “हे नारायण! हमारे बालक की रक्षा करना।”

     

    “हे गोविंद! हमारे कन्हैया को अपनी छाया में रखना।”

     

    “हे माधव! इसे हर संकट से बचाना।”

     

    किसी ने कृष्ण के माथे पर गोबर और गोमूत्र से पारंपरिक रूप से रक्षा-चिह्न लगाया।

     

    किसी ने उनके चारों ओर पवित्र नामों का स्मरण किया।

     

    यशोदा मैया उन्हें बार-बार चूमती रहीं।

     

    वे बार-बार उनके हाथ-पैर देखतीं।

     

    “कहीं चोट तो नहीं लगी?”

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे।

     

    मानो कह रहे हों—

     

    “मैया, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

     

    लेकिन माँ का हृदय तो माँ का ही होता है।

     

    वह भगवान को भी बालक ही समझती है।

     

    —

     

    पूतना के शरीर का रहस्य

     

    अब गोकुलवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या थी—उस विशाल राक्षसी के शरीर का क्या किया जाए?

     

    उसका शरीर इतना विशाल था कि देखकर सभी भयभीत हो रहे थे।

     

    गोपों ने उसके शरीर को काटकर गोकुल से दूर ले जाकर जलाने का निर्णय किया।

     

    जब उसका शरीर जलाया गया तो आश्चर्यजनक रूप से वातावरण में एक सुगंध फैलने लगी।

     

    गोकुलवासी चकित रह गए।

     

    जिस राक्षसी के शरीर से मृत्यु और भय का संकेत मिलना चाहिए था, उसके शरीर से तो सुगंध आ रही थी।

     

    इसका कारण था—

     

    भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श ने उसे पवित्र कर दिया था।

     

    पूतना श्रीकृष्ण को मारने आई थी।

     

    उसके हृदय में प्रेम नहीं था।

     

    उसका उद्देश्य छल और हत्या था।

     

    फिर भी भगवान ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसा एक माँ के साथ किया जाता है।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि उसने भगवान को अपने स्तन से दूध पिलाने का भाव बनाया था, चाहे उसके मन में विष और छल ही क्यों न हो।

     

    इसीलिए भगवान ने उसे भी अपनी कृपा प्रदान की।

     

    यह श्रीकृष्ण की करुणा का अद्भुत उदाहरण है।

     

    —

     

    नंद बाबा का लौटना

     

    कुछ समय बाद नंद बाबा और गोकुल के अन्य पुरुष भी लौटकर आए।

     

    उन्होंने जब पूरी घटना सुनी तो वे आश्चर्य में पड़ गए।

     

    नंद बाबा ने कृष्ण को अपनी गोद में उठाया।

     

    उन्होंने अपने लाल को देखा और बोले—

     

    “कन्हैया! तू ठीक है न?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगली पकड़ ली।

     

    नंद बाबा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

     

    “हे प्रभु! मेरे बालक की सदैव रक्षा करना।”

     

    उन्हें यह नहीं पता था कि जिसे वे भगवान से बचाने की प्रार्थना कर रहे हैं, वही स्वयं भगवान है।

     

    —

     

    गोकुल में एक नई चर्चा

     

    उस दिन के बाद गोकुल में हर जगह केवल एक ही चर्चा होने लगी—

     

    “नंद बाबा का बालक साधारण नहीं है।”

     

    कोई कहता—

     

    “उसने उस भयंकर राक्षसी को कैसे मार दिया?”

     

    दूसरा कहता—

     

    “इतना छोटा बालक भला ऐसा कैसे कर सकता है?”

     

    तीसरा कहता—

     

    “शायद किसी देवता की कृपा है।”

     

    लेकिन यशोदा मैया को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था।

     

    उनके लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाल थे।

     

    उनका संसार थे।

     

    उनकी साँसों का आधार थे।

     

    रात को जब कृष्ण उनकी गोद में सोए, तो यशोदा मैया उन्हें निहारती रहीं।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तू जहाँ भी जाएगा, मैं तेरे साथ रहूँगी।”

     

    कृष्ण ने आँखें बंद कर लीं।

     

    यशोदा मैया ने उनके माथे को चूमा।

     

    बाहर यमुना की लहरें धीरे-धीरे बह रही थीं।

     

    आकाश में चाँद चमक रहा था।

     

    गोकुल शांत था।

     

    लेकिन यह शांति अधिक समय तक रहने वाली नहीं थी।

     

    क्योंकि नंदलाल अभी अपनी बाल-लीलाओं की शुरुआत ही कर रहे थे।

     

    —

     

    इस लीला का सबसे बड़ा संदेश

     

    श्रीकृष्ण की पूतना लीला केवल एक राक्षसी के वध की कथा नहीं है।

     

    यह भगवान की करुणा और कृपा का संदेश भी देती है।

     

    पूतना विष लेकर आई थी।

     

    उसके मन में हत्या का विचार था।

     

    फिर भी श्रीकृष्ण ने उसके भीतर से उस मातृत्व के बाहरी भाव को स्वीकार किया और उसे मुक्ति प्रदान की।

     

    इससे भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि भगवान की कृपा कितनी महान है।

     

    मनुष्य कितना भी दूर क्यों न चला गया हो, यदि उसका संबंध भगवान से किसी भी प्रकार जुड़ जाए, तो भगवान उसे अपने से दूर नहीं करते।

     

    और यही श्रीकृष्ण हैं—

     

    जो दुष्टों का अंत करते हैं,

    भक्तों की रक्षा करते हैं,

    और अपने शत्रुओं पर भी कृपा करते हैं।

     

    गोकुल के लोगों को उस दिन केवल इतना दिखाई दिया कि एक राक्षसी मारी गई और उनका कन्हैया बच गया।

     

    लेकिन देवताओं के लिए वह दिन कुछ और ही था।

     

    उन्होंने देखा था—

     

    स्वयं भगवान ने अपनी बाल-लीला आरंभ कर दी थी।

     

    अब गोकुल में कोई नहीं जानता था कि अगली बार क्या होगा।

     

    कभी कोई राक्षस आएगा।

     

    कभी कोई अद्भुत घटना घटेगी।

     

    और कभी नंदलाल अपनी ऐसी नटखट शरारत करेंगे कि पूरा गोकुल हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएगा।

     

    क्योंकि यह तो केवल शुरुआत थी।

     

    आगे आने वाली लीलाओं में कृष्ण कभी अपने नन्हे पैरों से ऐसी अद्भुत लीला करेंगे कि एक भारी गाड़ी पलट जाएगी…

     

    और गोकुलवासी फिर सोच में पड़ जाएँगे—

     

    “आखिर हमारा यह नन्हा-सा कन्हैया है कौन?”

     

    क्रमशः…

     

     

  • नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    (भाग 1 — गोकुल में नंदलाल का आगमन)

     

     

    बहुत समय पहले की बात है। यमुना नदी के पवित्र तट के पास एक सुंदर-सा गाँव बसा हुआ था—गोकुल।

     

    गोकुल कोई बहुत बड़ा नगर नहीं था, लेकिन उसकी सुंदरता ऐसी थी कि मानो स्वयं प्रकृति ने अपने हाथों से उसे सजाया हो। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, लताओं से ढकी हुई पगडंडियाँ, फूलों की सुगंध से महकती हवाएँ और यमुना जी की कल-कल करती धारा।

     

    सुबह होते ही गोकुल में एक अलग ही जीवन दिखाई देता था।

     

    कहीं गायों की घंटियाँ बजतीं, कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथतीं, कहीं बालक अपने मित्रों के साथ खेलते हुए गलियों में दौड़ते और कहीं ग्वाल अपने पशुओं को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर निकल जाते।

     

    गोकुल के मुखिया थे—नंद बाबा।

     

    नंद बाबा सरल हृदय, दयालु और धर्मात्मा थे। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, उनके आँगन में असंख्य गायें थीं, परंतु उनके जीवन में एक कमी थी।

     

    वह कमी थी—संतान की।

     

    नंद बाबा और उनकी पत्नी यशोदा मैया के मन में एक ही इच्छा थी—

     

    “काश! हमारे घर भी कोई बालक होता, जिसे हम अपनी गोद में खिलाते, जिसके नन्हे-नन्हे चरणों की आहट से हमारा आँगन गूँज उठता।”

     

    यशोदा मैया जब कभी किसी अन्य माता को अपने बच्चे को गोद में खिलाते देखतीं, तो उनके हृदय में मातृत्व की लहर उठती।

     

    वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करतीं—

     

    “हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। न धन चाहिए, न वैभव। बस एक बार मुझे माँ कहकर पुकारने वाला कोई बालक दे दीजिए।”

     

    नंद बाबा भी यशोदा की इस इच्छा को समझते थे।

     

    वे उन्हें सांत्वना देते—

     

    “यशोदा, धैर्य रखो। भगवान जब देंगे, तब ऐसा देंगे कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके घर आने वाले हैं।

     

    —

     

    कंस का अत्याचार

     

    उधर मथुरा में राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था।

     

    कंस अत्यंत शक्तिशाली था, परंतु उसके हृदय में दया का नाम तक नहीं था। वह अपने भय और अहंकार में इतना डूब गया था कि प्रजा उसके नाम से काँपती थी।

     

    एक दिन कंस अपनी बहन देवकी के विवाह के बाद उसे और उसके पति वसुदेव को रथ में बैठाकर स्वयं विदा करने जा रहा था।

     

    तभी आकाश में एक दिव्य वाणी गूँजी—

     

    “हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी देवकी की आठवीं संतान तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    यह सुनते ही कंस के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    उसने तलवार निकाल ली और देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे कंस! तुम्हें देवकी से क्या भय है? आकाशवाणी ने केवल उसकी आठवीं संतान के विषय में कहा है। मैं तुम्हें उसकी प्रत्येक संतान तुम्हारे हाथों सौंप दूँगा।”

     

    कंस ने वसुदेव की बात मान ली और दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

     

    समय बीतता गया।

     

    देवकी की एक-एक करके छह संतानों का जन्म हुआ और कंस ने निर्दयतापूर्वक उनका वध कर दिया।

     

    सातवीं संतान के रूप में भगवान शेष के अंश बलराम जी प्रकट हुए, जिन्हें योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया।

     

    अब आठवीं संतान का समय निकट आ चुका था।

     

    मथुरा के कारागार में उस रात असाधारण शांति थी।

     

    आकाश में बादल छाए हुए थे।

     

    यमुना की धारा गंभीर होकर बह रही थी।

     

    चारों ओर अंधकार था।

     

    लेकिन उस अंधकार के भीतर एक ऐसी ज्योति जन्म लेने वाली थी, जो आने वाले युगों तक संसार को प्रकाशित करने वाली थी।

     

    —

     

    श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म

     

    भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात थी।

     

    चारों ओर गहरा अंधकार था।

     

    कारागार के भीतर देवकी और वसुदेव भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

     

    तभी अचानक पूरा कारागार दिव्य प्रकाश से भर उठा।

     

    देवकी ने देखा—उनके सामने एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ।

     

    उस बालक के सिर पर मुकुट था, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

     

    देवकी और वसुदेव समझ गए—

     

    स्वयं भगवान विष्णु उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।

     

    वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “हे प्रभु! आप स्वयं हमारे सामने प्रकट हुए हैं। हम अत्यंत भाग्यशाली हैं।”

     

    देवकी की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “प्रभु! कंस को यदि आपके जन्म का पता चल गया तो वह आपको भी मारने का प्रयास करेगा। कृपा करके अपनी यह दिव्य छवि छिपा लीजिए।”

     

    भगवान मुस्कुराए।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “माता, मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में पृथ्वी पर आया हूँ। तुम चिंता मत करो। मुझे अभी गोकुल ले जाओ। वहाँ नंद बाबा के घर यशोदा के यहाँ एक कन्या जन्मी है। तुम मुझे वहाँ छोड़कर उस कन्या को यहाँ ले आना।”

     

    इतना कहकर भगवान ने अपना दिव्य रूप त्याग दिया और एक साधारण नवजात शिशु के रूप में दिखाई देने लगे।

     

    उसी क्षण कारागार के सभी द्वार अपने-आप खुल गए।

     

    पहरेदार गहरी नींद में सो गए।

     

    वसुदेव ने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

     

    वे कारागार से बाहर निकल पड़े।

     

    —

     

    यमुना की परीक्षा

     

    बाहर भयंकर वर्षा हो रही थी।

     

    बिजलियाँ चमक रही थीं।

     

    वसुदेव जी बालक को लेकर यमुना की ओर बढ़ने लगे।

     

    उनके मन में एक ही विचार था—

     

    “मुझे किसी भी प्रकार इस बालक को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।”

     

    जब वे यमुना जी के पास पहुँचे तो नदी उफान पर थी।

     

    वसुदेव जी कुछ क्षण रुक गए।

     

    लेकिन तभी उनके पीछे से एक दिव्य दृश्य दिखाई दिया।

     

    शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर वसुदेव और बालक कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया।

     

    तेज वर्षा होने के बाद भी बालक कृष्ण पर एक बूंद तक नहीं पड़ी।

     

    वसुदेव जी यमुना में उतर गए।

     

    यमुना का जल उनके कंधों तक पहुँचने लगा।

     

    तभी यमुना जी ने जैसे अपने प्रियतम को पहचान लिया।

     

    जल की एक लहर उठी और श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श कर गई।

     

    मानो यमुना माता कह रही हों—

     

    “प्रभु! इतने वर्षों से आपकी प्रतीक्षा थी। आज मेरे तट पर आपका आगमन हुआ है।”

     

    वसुदेव जी सुरक्षित रूप से यमुना पार करके गोकुल पहुँच गए।

     

    —

     

    नंद भवन में आनंद

     

    उस समय गोकुल में सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे।

     

    नंद बाबा के घर भी एक बालिका का जन्म हुआ था।

     

    योगमाया की शक्ति से सभी लोग निद्रा में थे।

     

    वसुदेव जी ने देखा कि यशोदा मैया अपने शिशु के पास सो रही हैं।

     

    उन्होंने धीरे से श्रीकृष्ण को वहाँ सुला दिया और वहाँ जन्मी कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

     

    उन्हें पता ही नहीं चला कि संसार का पालन करने वाला स्वयं उनके घर से होकर उनके घर को धन्य कर गया है।

     

    वसुदेव जी वापस कारागार पहुँचे।

     

    द्वार फिर अपने-आप बंद हो गए।

     

    पहरेदार जाग गए।

     

    और जैसे ही बालिका ने रोना आरंभ किया, कारागार में हलचल मच गई।

     

    कंस को समाचार दिया गया—

     

    “देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है।”

     

    कंस तुरंत कारागार में पहुँचा।

     

    उसने उस नवजात कन्या को उठाकर पत्थर पर पटकना चाहा।

     

    लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

     

    उसका रूप दिव्य हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “हे कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”

     

    यह कहकर वह देवी आकाश में विलीन हो गई।

     

    कंस के चेहरे पर भय छा गया।

     

    उधर गोकुल में किसी को कुछ पता नहीं था कि उनके बीच कौन आया है।

     

    —

     

    गोकुल में उत्सव

     

    प्रातःकाल होते ही गोकुल में एक अद्भुत आनंद फैल गया।

     

    यशोदा मैया की आँख खुली।

     

    उन्होंने अपने पास एक सुंदर बालक को देखा।

     

    बालक अत्यंत मनोहर था।

     

    श्याम वर्ण, घुँघराले बाल, गुलाबी होंठ और बंद आँखों पर झुकी हुई लंबी पलकें।

     

    यशोदा मैया कुछ क्षण तक उसे निहारती रह गईं।

     

    फिर उनके हृदय में ऐसी ममता उमड़ी कि उन्होंने बालक को अपनी छाती से लगा लिया।

     

    उनके मुख से अनायास निकला—

     

    “मेरे लाल!”

     

    जैसे ही यह समाचार गोकुल में फैला कि नंद बाबा के घर पुत्र हुआ है, पूरा गोकुल खुशी से झूम उठा।

     

    गोपियाँ दौड़-दौड़कर नंद भवन आने लगीं।

     

    कोई दही लेकर आई।

     

    कोई माखन लेकर आई।

     

    कोई शिशु के लिए सुंदर वस्त्र लेकर आई।

     

    किसी ने कहा—

     

    “अरे! नंद बाबा के घर तो चाँद उतर आया है!”

     

    दूसरी गोपी बोली—

     

    “नहीं-नहीं, चाँद तो आज फीका पड़ गया होगा। इतना सुंदर बालक उसने भी नहीं देखा होगा!”

     

    तीसरी गोपी हँसते हुए बोली—

     

    “देखना, यह बालक बड़ा होकर पूरे गोकुल की मटकी खाली कर देगा।”

     

    तब किसे पता था कि उसकी यह बात एक दिन सच होने वाली है!

     

    नंद बाबा तो आनंद से फूले नहीं समा रहे थे।

     

    उन्होंने गोकुल के लोगों के लिए दान बाँटा।

     

    गायों को सजाया गया।

     

    घर-घर दीप जलाए गए।

     

    ढोल और नगाड़े बजने लगे।

     

    गोप और गोपियाँ नाचने लगे।

     

    चारों ओर एक ही नाम गूँज रहा था—

     

    “नंद के घर आनंद भयो!”

     

    और उस दिन से वह नन्हा बालक सबके लिए बन गया—

     

    नंदलाल।

     

    —

     

    पहली बार यशोदा ने कृष्ण को देखा

     

    उत्सव समाप्त होने के बाद जब सब लोग चले गए, तब यशोदा मैया अपने लाल को लेकर अकेली बैठीं।

     

    वे उसके छोटे-छोटे हाथों को देखतीं।

     

    कभी उसके पैरों को चूमतीं।

     

    कभी उसके माथे पर हाथ फेरतीं।

     

    बालक कृष्ण ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।

     

    उनकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि यशोदा मैया उनमें खो गईं।

     

    उन्होंने प्रेम से पूछा—

     

    “लाला! तू कहाँ से आया है?”

     

    बालक मुस्कुराया।

     

    यशोदा मैया हँस पड़ीं।

     

    “अच्छा! अभी से मुझसे बातें करेगा?”

     

    उन्होंने उसे अपनी गोद में उठाया और धीरे-धीरे झुलाने लगीं।

     

    उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वह अपनी गोद में झुला रही हैं, उसी के चरणों में अनंत ब्रह्मांड झूलते हैं।

     

    जिसे वे अपना पुत्र समझकर दुलार रही हैं, वही समस्त संसार का पालनकर्ता है।

     

    परंतु भगवान को भी तो यही चाहिए था।

     

    उन्हें वैकुंठ का वैभव नहीं चाहिए था।

     

    उन्हें चाहिए था—

     

    माँ का प्रेम।

     

    इसीलिए तो वे गोकुल आए थे।

     

    —

     

    गोकुल क्यों बना भगवान का घर?

     

    भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल को इसलिए चुना क्योंकि वहाँ प्रेम था।

     

    वहाँ छल नहीं था।

     

    वहाँ अहंकार नहीं था।

     

    वहाँ लोग भगवान को किसी स्वार्थ से नहीं, प्रेम से चाहते थे।

     

    यशोदा के लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

     

    वे उनके लाला थे।

     

    नंद बाबा के लिए वे संसार के स्वामी नहीं थे।

     

    वे उनके कन्हैया थे।

     

    गोपियों के लिए वे कोई महान देवता नहीं थे।

     

    वे उनके गोकुल के नटखट बालक थे।

     

    और यही कृष्ण की सबसे सुंदर लीला थी—

     

    भगवान होकर भी भक्तों के प्रेम के वश में हो जाना।

     

    गोकुल की गलियों में अब एक नई चहल-पहल थी।

     

    हर घर में कृष्ण की चर्चा होने लगी।

     

    किसी को उनके सुंदर मुख की चिंता थी।

     

    किसी को उनकी मुस्कान की।

     

    कोई कहता—

     

    “नंदलाल बहुत सुंदर हैं।”

     

    कोई कहता—

     

    “इनकी आँखें तो कमल जैसी हैं।”

     

    और कोई हँसकर कहता—

     

    “अभी से इतना सुंदर है, बड़ा होकर जाने कितनी गोपियों की मटकी फोड़ेगा!”

     

    सभी हँस पड़ते।

     

    लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नन्हा बालक गोकुल की गलियों में ऐसी-ऐसी लीलाएँ करने वाला है कि लोग अपनी सारी चिंताएँ भूल जाएँगे।

     

    वह कभी माखन चुराएगा।

     

    कभी गोपियों को सताएगा।

     

    कभी यशोदा मैया से डाँट खाएगा।

     

    कभी ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने जाएगा।

     

    और कभी अपनी छोटी-सी मुस्कान से पूरे ब्रज को मोहित कर देगा।

     

    लेकिन अभी तो वह केवल एक नन्हा शिशु था।

     

    यशोदा मैया की गोद में सोया हुआ।

     

    उनकी उँगली पकड़े हुए।

     

    और बाहर गोकुल की गलियों में गूँज रहा था—

     

    “जय कन्हैया लाल की!”

     

    यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं।

     

    गायें रंभा रही थीं।

     

    वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे।

     

    मानो पूरी प्रकृति स्वयं कह रही हो—

     

    “गोकुल धन्य हो गया।”

     

    और सचमुच उस दिन से गोकुल केवल एक गाँव नहीं रहा।

     

    वह बन गया—

     

    श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की पवित्र भूमि।

     

    जहाँ भगवान ने ईश्वर बनकर नहीं,

    एक नटखट बालक बनकर जीवन जिया।

     

    जहाँ भक्तों ने उन्हें पूजा नहीं,

    उन्हें प्रेम किया।

     

    और जहाँ एक माँ ने संसार के स्वामी को अपनी गोद में लेकर कहा—

     

    “सो जा मेरे लाल… मेरी आँखों के तारे, मेरे कान्हा।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    और उस मुस्कान में जैसे पूरा ब्रह्मांड समा गया।

     

    यहीं से आरंभ होती है नंदलाल की अद्भुत बाल-लीलाओं की कथा…

     

    लेकिन गोकुल को अभी कहाँ पता था कि उसके आँगन में आया यह नन्हा-सा बालक शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला है, जिससे एक भयानक राक्षसी का अंत होगा और पूरे ब्रज को पहली बार अपने कान्हा की दिव्यता का आभास होगा…|

     

     

    Continue…. ✍️✍️(Story pasand are to comment jarur de🙏)

     

     

  • सुदामा की द्वारिका की ओर यात्रा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अध्याय 7 — सुदामा की द्वारका की ओर यात्रा

    सूरज निकलने से पहले ही सुदामा अपने घर से निकल पड़े।

     

    गाँव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। कहीं-कहीं घरों से धुएँ की पतली लकीरें उठ रही थीं। पक्षियों की आवाज धीरे-धीरे वातावरण में फैल रही थी। सुदामा ने एक बार पीछे मुड़कर अपने छोटे से घर को देखा।

     

    वही मिट्टी की दीवारें।

     

    वही साधारण आँगन।

     

    वही घर, जहाँ उसने जीवन के कितने ही सुख-दुख देखे थे।

     

    दरवाजे पर उसकी पत्नी खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में चिंता भी थी और उम्मीद भी।

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जल्द लौटने की कोशिश करूँगा।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा, “रास्ते का ध्यान रखिएगा।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उसकी पत्नी ने उसके हाथ में रखी छोटी सी पोटली को देखा।

     

    उसमें वही थोड़ा सा चिवड़ा था, जो वह कृष्ण के लिए लेकर जा रहा था।

     

    पत्नी ने कहा, “इसे संभालकर रखिएगा।”

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगाया।

     

    “यह मेरे पास सबसे कीमती चीज है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    सुदामा ने एक बार फिर अपने घर की ओर देखा और फिर आगे बढ़ गया।

     

    अब उसके सामने एक लंबी यात्रा थी।

     

    द्वारका बहुत दूर थी।

     

    सुदामा ने कभी इतनी लंबी यात्रा अकेले नहीं की थी। लेकिन इस बार उसके मन में एक ऐसी शक्ति थी, जो उसके पैरों को आगे बढ़ाती जा रही थी।

     

    वह शक्ति थी—

     

    अपने मित्र कृष्ण से मिलने की इच्छा।

     

    चलते-चलते उसे गुरुकुल की बातें याद आने लगीं।

     

    उसे याद आया जब वह पहली बार आश्रम पहुँचा था।

     

    वह कितना चुप और संकोची था।

     

    उसे किसी से बात करने की आदत नहीं थी।

     

    तभी कृष्ण उसके पास आए थे और पूछा था—

     

    “तुम नए आए हो?”

     

    सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “कृष्ण…” उसने धीरे से कहा।

     

    उसका मन जैसे वर्षों पीछे चला गया।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे छोटी-छोटी बातों में भी खुशी ढूँढ लेते थे।

     

    जब वह परेशान होता, कृष्ण उसे हँसा देते।

     

    जब उसे डर लगता, कृष्ण उसका हाथ पकड़ लेते।

     

    और जब वह स्वयं को दूसरों से छोटा समझता, कृष्ण उसे समझाते—

     

    “मित्रता में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।”

     

    सुदामा की आँखें हल्की नम हो गईं।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण आज भी वैसे ही होंगे?

     

    फिर उसने स्वयं से कहा—

     

    “कृष्ण बदल भी गए होंगे, तो क्या हुआ? मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ।”

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    दिन चढ़ते ही धूप तेज हो गई।

     

    सुदामा कई कोस तक चलता रहा।

     

    उसके पास यात्रा के लिए अधिक भोजन नहीं था।

     

    कभी वह किसी पेड़ की छाया में बैठ जाता और कुछ देर आराम करता।

     

    फिर उठकर चल पड़ता।

     

    एक दोपहर वह एक छोटे से गाँव के पास पहुँचा।

     

    वहाँ एक कुआँ था।

     

    सुदामा ने पानी पिया और वहीं कुछ देर बैठ गया।

     

    कुछ लोग उसके पास आए।

     

    उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा,

     

    “बाबा, आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “द्वारका।”

     

    वह व्यक्ति हैरान हुआ।

     

    “द्वारका? इतनी दूर?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “हाँ।”

     

    “वहाँ किससे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा कुछ क्षण चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “अपने मित्र से।”

     

    उस व्यक्ति ने पूछा,

     

    “कौन है आपका मित्र?”

     

    सुदामा ने शांत स्वर में कहा,

     

    “कृष्ण।”

     

    कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

     

    एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला,

     

    “हमारे द्वारकाधीश श्री कृष्ण?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कुछ लोग हँस पड़े।

     

    “आप उनसे मिलने जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने बिना बुरा माने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने पूछा,

     

    “और वह आपको पहचानेंगे?”

     

    यह प्रश्न सुनकर सुदामा कुछ क्षण चुप हो गया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “यह मुझे नहीं पता।”

     

    लोगों की हँसी धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    सुदामा आगे बोला,

     

    “लेकिन मैं उन्हें पहचानता हूँ।”

     

    उसके शब्दों में इतना विश्वास था कि कोई आगे कुछ नहीं कह पाया।

     

    कुछ देर आराम करने के बाद वह फिर चल पड़ा।

     

    लेकिन अब उसके मन में वही प्रश्न बार-बार आने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    उसने अपने साधारण कपड़ों की ओर देखा।

     

    उसके पैरों में धूल लगी हुई थी।

     

    उसके कंधे पर एक पुराना सा थैला था।

     

    उसने सोचा—

     

    “द्वारका के लोग मुझे देखकर क्या सोचेंगे?”

     

    फिर उसने अपनी छोटी पोटली को छुआ।

     

    और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं वहाँ किसी को प्रभावित करने नहीं जा रहा।”

     

    उसने मन ही मन कहा,

     

    “मैं अपने मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    यात्रा के कई दिन बीत गए।

     

    सुदामा लगातार आगे बढ़ता रहा।

     

    कभी किसी गाँव में रात बिताता।

     

    कभी किसी पेड़ के नीचे आराम करता।

     

    कभी रास्ते में मिलने वाले लोगों से द्वारका का रास्ता पूछता।

     

    हर दिन उसके पैरों की थकान बढ़ती जाती।

     

    लेकिन हर दिन कृष्ण से मिलने की इच्छा भी और मजबूत होती जाती।

     

    एक शाम वह एक नदी के किनारे बैठा था।

     

    सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

     

    आकाश का रंग बदल रहा था।

     

    सुदामा ने नदी के पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    वह पहले जैसा नहीं था।

     

    बालों में सफेदी आ चुकी थी।

     

    चेहरे पर समय की लकीरें थीं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण, अगर तुम मुझे देखोगे तो क्या पहचान पाओगे?”

     

    अचानक उसे वर्षों पुरानी बात याद आ गई।

     

    गुरुकुल से विदा होते समय उसने कृष्ण से पूछा था—

     

    “अगर मैं कभी तुम्हारे पास आया तो तुम मुझे पहचानोगे?”

     

    और कृष्ण ने कहा था—

     

    “सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    उसने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा।

     

    “मैं तुम्हें याद दिलाने नहीं आ रहा, कृष्ण,” उसने कहा।

     

    “मैं बस यह देखने आ रहा हूँ कि हमारी मित्रता आज भी वैसी ही है या नहीं।”

     

    अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई।

     

    अब रास्ते में लोग अधिक दिखाई देने लगे।

     

    कुछ व्यापारी द्वारका की ओर जा रहे थे।

     

    सुदामा उनके साथ कुछ दूर तक चलता रहा।

     

    एक व्यापारी ने उससे पूछा,

     

    “आप अकेले कहाँ जा रहे हैं?”

     

    सुदामा ने फिर वही उत्तर दिया,

     

    “द्वारका।”

     

    “काम से?”

     

    “मित्र से मिलने।”

     

    “कौन मित्र?”

     

    “कृष्ण।”

     

    इस बार व्यापारी हँसा नहीं।

     

    उसने सुदामा को ध्यान से देखा।

     

    फिर पूछा,

     

    “क्या आप वास्तव में उन्हें जानते हैं?”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “एक समय था जब हम दोनों एक-दूसरे को रोज देखते थे।”

     

    व्यापारी कुछ क्षण चुप रहा।

     

    सुदामा की बातों में कोई दिखावा नहीं था।

     

    उसने कहा,

     

    “अगर यह सच है, तो आप बहुत भाग्यशाली हैं।”

     

    सुदामा ने उत्तर दिया,

     

    “सच्चा मित्र मिलना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    यात्रा आगे बढ़ती रही।

     

    कुछ दिनों बाद सुदामा पहली बार एक ऊँची जगह पर पहुँचा, जहाँ से दूर तक फैली भूमि दिखाई देती थी।

     

    वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

     

    एक यात्री ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा,

     

    “वहीं आगे द्वारका है।”

     

    सुदामा की साँस जैसे कुछ क्षणों के लिए रुक गई।

     

    उसने दूर देखा।

     

    उसके सामने वह नगरी थी, जहाँ उसका बचपन का मित्र रहता था।

     

    वर्षों की दूरी।

     

    अनेक यादें।

     

    अनगिनत प्रश्न।

     

    सब जैसे एक ही क्षण में उसके मन में उमड़ आए।

     

    उसके कदम अचानक भारी हो गए।

     

    अब तक वह लगातार कृष्ण से मिलने के लिए चल रहा था।

     

    लेकिन द्वारका को सामने देखकर उसके मन में संकोच लौट आया।

     

    “क्या मैं सचमुच अंदर जा पाऊँगा?”

     

    उसने अपने वस्त्रों की ओर देखा।

     

    फिर उस पोटली को छुआ, जिसमें चिवड़ा रखा था।

     

    उसे लगा जैसे उसकी छोटी सी भेंट उस विशाल नगरी के सामने बहुत साधारण है।

     

    वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।

     

    तभी उसके मन में कृष्ण की मुस्कान उभर आई।

     

    और उसे याद आया—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने गहरी साँस ली।

     

    “मैं आ गया हूँ, मित्र।”

     

    वह धीरे-धीरे द्वारका की ओर बढ़ने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नगर के पास पहुँचता गया, उसकी आँखों में आश्चर्य बढ़ता गया।

     

    द्वारका बहुत सुंदर और विशाल थी।

     

    साफ रास्ते।

     

    भव्य भवन।

     

    चारों ओर लोगों की चहल-पहल।

     

    सुदामा ने ऐसा नगर पहले कभी नहीं देखा था।

     

    उसे एक क्षण के लिए लगा जैसे वह किसी दूसरे संसार में आ गया हो।

     

    लेकिन फिर उसने स्वयं को याद दिलाया—

     

    “इस नगर में कहीं मेरा मित्र कृष्ण रहता है।”

     

    वह आगे बढ़ता गया।

     

    लोग उसे देखकर अपने काम में व्यस्त रहते।

     

    किसी को नहीं पता था कि साधारण कपड़ों में चल रहा यह व्यक्ति वर्षों बाद द्वारका के राजा से मिलने आया है।

     

    आखिरकार सुदामा उस स्थान के पास पहुँचा जहाँ कृष्ण का महल था।

     

    महल के ऊँचे द्वार देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    उसने कभी इतने बड़े महल की कल्पना भी नहीं की थी।

     

    वह द्वार के बाहर खड़ा होकर भीतर देखने लगा।

     

    अंदर पहरेदार थे।

     

    लोग आते-जाते दिखाई दे रहे थे।

     

    सुदामा ने अपने पुराने वस्त्र ठीक किए।

     

    उसने अपनी पोटली को संभाला।

     

    फिर धीरे-धीरे द्वार की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन उसके मन में एक ही प्रश्न था—

     

    क्या इन विशाल द्वारों के पीछे रहने वाला द्वारकाधीश अब भी वही कृष्ण है, जो कभी जंगल में उसके साथ बारिश में भीगा था?

     

    वह पहरेदारों के सामने पहुँच गया।

     

    एक पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सुदामा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

     

    वर्षों बाद वह क्षण आ ही गया था।

     

    उसने शांत स्वर में कहा—

     

    “मेरा नाम सुदामा है।”

     

    पहरेदार ने पूछा,

     

    “और तुम यहाँ किससे मिलने आए हो?”

     

    सुदामा ने महल की ओर देखा।

     

    उसकी आँखों में वर्षों पुरानी मित्रता की चमक थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने आया हूँ।”

     

    पहरेदार कुछ क्षण उसे देखता रहा।

     

    और यहीं से शुरू होने वाला था…

     

    • वर्षों बाद दो मित्रों के मिलन का सबसे भावुक प्रसंग।
  • सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 6 — सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

     

    गुरुकुल से विदा हुए कई वर्ष बीत चुके थे।

     

    समय ने कृष्ण और सुदामा दोनों के जीवन को अलग-अलग दिशाओं में पहुँचा दिया था। बचपन में जो दो मित्र एक ही पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटते थे, आज उनके जीवन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं।

     

    सुदामा अपने गाँव में ही रहने लगा था।

     

    उसने अपने गुरुकुल की शिक्षा को कभी भुलाया नहीं। वह बच्चों को पढ़ाता, लोगों को अच्छी बातें समझाता और जो कुछ जानता था, उसे दूसरों के साथ बाँट देता था। गाँव के लोग उसका सम्मान करते थे, क्योंकि सुदामा का मन बहुत साफ था।

     

    लेकिन सम्मान से घर का चूल्हा नहीं जलता।

     

    समय बीतने के साथ सुदामा का जीवन कठिन होता चला गया।

     

    उसके पास धन नहीं था।

     

    एक छोटा सा घर था, जिसकी छत बरसात में कई जगह से टपकती थी। घर में जरूरत की चीजें भी बहुत कम थीं। फिर भी सुदामा ने कभी किसी से शिकायत नहीं की।

     

    वह अक्सर कहता था,

     

    “जिसके पास संतोष है, वह कभी पूरी तरह गरीब नहीं होता।”

     

    लेकिन जीवन की कठिनाइयाँ केवल संतोष से हमेशा आसान नहीं होतीं।

     

    धीरे-धीरे सुदामा का परिवार बढ़ा। घर की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ने लगीं। अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी सोचना पड़ता था।

     

    एक दिन सुदामा की पत्नी ने घर में रखे मिट्टी के बर्तनों को देखा।

     

    एक बर्तन लगभग खाली था।

     

    दूसरे में बस थोड़े से अनाज के दाने बचे थे।

     

    वह कुछ देर तक चुप रही।

     

    सुदामा घर के बाहर बैठा था और बच्चों को कुछ पढ़ा रहा था।

     

    बच्चे चले गए तो वह अंदर आया।

     

    पत्नी ने उसे देखा और पूछा,

     

    “आज बच्चों को क्या पढ़ा रहे थे?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “सच्चाई और धैर्य के बारे में।”

     

    पत्नी ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “और क्या धैर्य से भूख भी शांत हो जाती है?”

     

    सुदामा का चेहरा शांत हो गया।

     

    वह समझ गया कि उसकी पत्नी क्या कहना चाहती है।

     

    कुछ क्षणों तक घर में चुप्पी रही।

     

    फिर सुदामा ने कहा,

     

    “मैं जानता हूँ कि हमारे दिन कठिन चल रहे हैं।”

     

    पत्नी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं आपसे शिकायत नहीं कर रही।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो फिर तुम्हारी आँखों में चिंता क्यों है?”

     

    पत्नी की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि मैं आपको परेशान देखती हूँ।”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    वह जानता था कि उसके पास अपनी पत्नी को देने के लिए बहुत कम था।

     

    फिर भी वह हर दिन कोशिश करता था कि उसके चेहरे पर निराशा न दिखाई दे।

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आपके गुरुकुल के मित्र कृष्ण…”

     

    सुदामा अचानक शांत हो गया।

     

    कृष्ण का नाम सुनते ही जैसे उसके सामने वर्षों पुरानी यादें आ गईं।

     

    गुरुकुल का आँगन।

     

    पेड़ों के नीचे बैठा कृष्ण।

     

    उनकी मुस्कान।

     

    जंगल की बारिश।

     

    दोनों का साथ भोजन बाँटना।

     

    विदाई के समय कृष्ण का कहना—

     

    “अगर तुम्हें कभी लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसकी पत्नी ने पूछा,

     

    “आप उन्हें याद करते हैं?”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हर सच्चे मित्र को उसका मित्र याद रहता है।”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “तो फिर आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?”

     

    सुदामा ने तुरंत उसकी ओर देखा।

     

    “कृष्ण से?”

     

    पत्नी ने सिर हिला दिया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा कुछ क्षण तक चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “इतने वर्षों बाद?”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “उनका जीवन अब बहुत अलग होगा।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्या मित्रता परिस्थितियाँ देखकर बदल जाती है?”

     

    सुदामा के पास इस प्रश्न का उत्तर था।

     

    लेकिन वह बोल नहीं पाया।

     

    पत्नी आगे बोली,

     

    “आपने मुझे कितनी बार बताया है कि आपके मित्र कृष्ण आपको अपने बराबर मानते थे। फिर आज आप उनके पास जाने से क्यों डर रहे हैं?”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जा सकता।”

     

    पत्नी ने शांत स्वर में कहा,

     

    “किसने कहा कि आपको कुछ माँगना है?”

     

    “लेकिन अगर मैं इस समय उनके पास जाऊँगा, तो उन्हें लगेगा कि मैं किसी जरूरत के कारण आया हूँ।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो क्या जरूरत के समय अपने मित्र से मिलना गलत है?”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    उसे कृष्ण से मिलने की इच्छा तो हमेशा से थी।

     

    लेकिन वर्षों की दूरी ने उसके मन में संकोच भर दिया था।

     

    वह सोचने लगा—

     

    क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

     

    क्या वे वैसे ही मुस्कुराएँगे?

     

    क्या वे मुझे देखकर खुश होंगे?

     

    फिर उसके मन में एक और विचार आया।

     

    अगर मैं उनके सामने अपने साधारण वस्त्रों में खड़ा हुआ तो?

     

    यह सोचकर सुदामा स्वयं को ही समझाने लगा।

     

    “कृष्ण मेरे मित्र हैं। वह मुझे कभी धन या वस्त्रों से नहीं आँकेंगे।”

     

    लेकिन फिर भी उसका मन उसे रोक रहा था।

     

    उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

     

    वह घर के बाहर बैठा आसमान की ओर देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि गुरुकुल में भी वह और कृष्ण कई रातों में इसी तरह तारों को देखते थे।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “कृष्ण… क्या तुम्हें भी कभी मेरी याद आती होगी?”

     

    हवा हल्के से चली।

     

    सुदामा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसे लगा जैसे वर्षों की दूरी अचानक कम हो गई हो।

     

    अगले दिन भी जीवन वैसे ही चलता रहा।

     

    सुदामा सुबह उठा।

     

    कुछ बच्चों को पढ़ाया।

     

    फिर गाँव के एक वृद्ध व्यक्ति की सहायता की।

     

    शाम को घर लौटा।

     

    लेकिन घर का वातावरण देखकर उसका मन भारी हो गया।

     

    उसकी पत्नी चुप बैठी थी।

     

    बच्चे भी शांत थे।

     

    सुदामा ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    पत्नी ने धीरे से कहा,

     

    “आज घर में जो थोड़ा सा अनाज था, वह भी समाप्त हो गया।”

     

    सुदामा के कदम रुक गए।

     

    उसने चारों ओर देखा।

     

    घर में सचमुच बहुत कम चीजें बची थीं।

     

    उस क्षण उसके मन में दुख आया।

     

    अपने लिए नहीं।

     

    अपने परिवार के लिए।

     

    वह बाहर जाकर बैठ गया।

     

    उसकी पत्नी उसके पास आई।

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “कैसे न करूँ?”

     

    पत्नी ने पहली बार उसके सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

     

    “कृष्ण से मिलने जाइए।”

     

    सुदामा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं उनके पास सहायता माँगने नहीं जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “तो सहायता मत माँगिए। बस अपने मित्र से मिल आइए।”

     

    सुदामा ने उसकी ओर देखा।

     

    पत्नी बोली,

     

    “क्या मित्र से मिलने के लिए कोई कारण चाहिए?”

     

    यह बात सुदामा के हृदय में उतर गई।

     

    सच ही तो था।

     

    वह कृष्ण के पास धन माँगने नहीं जाना चाहता था।

     

    उसे बस अपने मित्र से मिलना था।

     

    उसे देखना था।

     

    उनसे बातें करनी थीं।

     

    वर्षों से मन में जमा बातें कहनी थीं।

     

    सुदामा ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं उनके पास खाली हाथ कैसे जाऊँ?”

     

    पत्नी ने कुछ क्षण सोचा।

     

    फिर वह घर के अंदर गई।

     

    वहाँ उसने बहुत खोजा।

     

    कुछ देर बाद वह एक छोटी सी पोटली लेकर आई।

     

    उसमें थोड़ा सा चिवड़ा था।

     

    बहुत साधारण।

     

    बहुत कम।

     

    लेकिन उसके पास देने के लिए वही सबसे कीमती चीज थी।

     

    पत्नी ने पोटली सुदामा की ओर बढ़ाई।

     

    “इसे अपने मित्र के लिए ले जाइए।”

     

    सुदामा ने पोटली को देखा।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    उसे गुरुकुल का समय याद आ गया।

     

    जब वह और कृष्ण थोड़े से दाने भी बाँटकर खा लेते थे।

     

    उसने पोटली अपने हाथों में ली।

     

    “यह बहुत कम है।”

     

    पत्नी मुस्कुराई।

     

    “प्रेम में दिया गया थोड़ा भी बहुत होता है।”

     

    सुदामा के मन में जैसे कोई पुरानी आवाज गूँज उठी।

     

    “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

     

    यह बात कृष्ण ने उससे वर्षों पहले कही थी।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    अब उसका मन दृढ़ होने लगा था।

     

    उसने पत्नी से कहा,

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    पत्नी के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैं कृष्ण से मिलने जाऊँगा।”

     

    पत्नी ने कहा,

     

    “और उनसे कहना कि उनका एक पुराना मित्र उन्हें कभी नहीं भूला।”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उनकी मित्रता सच्ची है, तो शायद उन्हें पहले से पता होगा।”

     

    पत्नी ने उसे यात्रा के लिए तैयार होने में सहायता की।

     

    सुदामा के पास पहनने के लिए साधारण वस्त्र थे।

     

    उसने अपनी छोटी सी पोटली संभालकर रखी।

     

    सुबह होते ही उसने अपने परिवार को देखा।

     

    बच्चों के सिर पर हाथ रखा।

     

    पत्नी ने उसके चरण छुए और कहा,

     

    “जल्दी लौट आइए।”

     

    सुदामा ने कहा,

     

    “मैं लौटूँगा।”

     

    फिर वह कुछ क्षण रुका।

     

    “लेकिन शायद पहले से अलग होकर।”

     

    पत्नी ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    सुदामा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि इतने वर्षों बाद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    उसके कदमों में एक अलग ही उत्साह था।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    लेकिन इस बार सुदामा को यात्रा की कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी।

     

    उसके मन में बस एक ही बात थी—

     

    कृष्ण।

     

    वह चलते-चलते पुराने दिनों को याद करता रहा।

     

    उसे याद आया कि कृष्ण कैसे हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुरा देते थे।

     

    कैसे वे उसकी चिंता को हल्का कर देते थे।

     

    कैसे उन्होंने कहा था—

     

    “अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा।

     

    “कृष्ण, मैं तुम्हें ढूँढने आ रहा हूँ।”

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वर्षों में कृष्ण का जीवन कितना बदल चुका है।

     

    जिस मित्र के साथ वह कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करता था…

     

    जिसके साथ वह एक पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटता था…

     

    आज वही कृष्ण एक महान राजा के रूप में द्वारका में रहते थे।

     

    सुदामा को नहीं पता था कि द्वारका कैसी होगी।

     

    वहाँ पहुँचने पर उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

     

    क्या महल के द्वारपाल उसे अंदर जाने देंगे?

     

    क्या कोई उसकी बात पर विश्वास करेगा कि वह स्वयं श्री कृष्ण का बचपन का मित्र है?

     

    उसके मन में हल्की चिंता फिर जागी।

     

    लेकिन उसने अपने कपड़ों के भीतर रखी चिवड़े की छोटी सी पोटली को छुआ।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “मैं राजा से मिलने नहीं जा रहा,” उसने मन ही मन कहा।

     

    “मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ।”

     

    और इसी विश्वास के साथ…

     

    सुदामा ने द्वारका की ओर अपनी यात्रा जारी रखी।

     

    लेकिन उसके सामने अभी एक लंबा रास्ता था।

     

    एक ऐसा रास्ता, जहाँ हर कदम के साथ उसके मन में कृष्ण से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

     

    उधर…

     

    बहुत दूर द्वारका में…

     

    कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

     

    लेकिन कौन जानता था कि वर्षों पहले गुरुकुल में उनके साथ बैठकर भोजन बाँटने वाला उनका प्रिय मित्र…

     

    अब उनसे मिलने के लिए चल पड़ा है।

     

    और बहुत जल्द…

     

    दो पुराने मित्रों के बीच वर्षों की दूरी समाप्त होने वाली थी।

     

  • Part 5 गुरुकुल से विदाई

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 5 — गुरुकुल से विदाई और दो राहों का सफर

     

    समय किसी के लिए नहीं रुकता।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में बिताए हुए दिन कब बीत गए, कृष्ण और सुदामा को स्वयं भी पता नहीं चला। कभी जो दोनों बालक पहली बार आश्रम में मिले थे, अब वे युवावस्था की ओर बढ़ चुके थे।

     

    उनके पास यादों का एक पूरा संसार था।

     

    कभी साथ मिलकर नदी से जल लाना, कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करना, कभी गुरु माता के लिए काम करना, तो कभी रात को देर तक बैठकर जीवन और भविष्य के बारे में बातें करना।

     

    लेकिन अब उन दिनों के समाप्त होने का समय आ गया था।

     

    उस सुबह आश्रम का वातावरण कुछ अलग था।

     

    सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए थे। कई लोगों के चेहरों पर खुशी थी कि उनकी शिक्षा पूरी होने वाली है, लेकिन कुछ की आँखों में अपने आश्रम को छोड़ने का दुख भी था।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठे थे।

     

    सुदामा चुप था।

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “आज तुम बहुत शांत हो।”

     

    सुदामा ने बिना उनकी ओर देखे कहा, “आज तुम भी बहुत ज्यादा बातें नहीं कर रहे।”

     

    कृष्ण हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तो तुम्हें पता है कि मैं भी समझ रहा हूँ।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है।”

     

    सुदामा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी गुरु सांदीपनि की आवाज गूँजी।

     

    “मेरे प्रिय शिष्यों।”

     

    सभी शांत हो गए।

     

    गुरु सांदीपनि ने एक-एक करके अपने सामने बैठे शिष्यों को देखा।

     

    “जब तुम इस आश्रम में आए थे, तब तुममें से अधिकांश बच्चे थे। तुम यहाँ ज्ञान पाने आए थे। लेकिन आज मैं तुम्हें देखकर केवल अपने शिष्य नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य देख रहा हूँ जो जीवन की राह पर चलने के लिए तैयार हैं।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    “याद रखना, शिक्षा का अंत किसी आश्रम से विदा लेने पर नहीं होता। असली शिक्षा तो उसके बाद शुरू होती है, जब जीवन तुम्हारी परीक्षा लेता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    गुरु की बातें उसके मन को छू रही थीं।

     

    गुरु आगे बोले, “जीवन में तुम्हें सुख भी मिलेगा और दुख भी। सम्मान भी मिलेगा और अपमान भी। कभी तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा और कभी बहुत कम। लेकिन किसी भी परिस्थिति को अपने मन से बड़ा मत होने देना।”

     

    फिर उन्होंने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ और अपने ज्ञान से केवल अपना नहीं, दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाने का प्रयास करो।”

     

    शिष्यों ने एक साथ गुरु के चरणों में प्रणाम किया।

     

    अब विदाई का समय सचमुच आ चुका था।

     

    सभी शिष्य अपने-अपने सामान को समेटने लगे।

     

    किसी के पास अधिक सामान था, किसी के पास कम।

     

    सुदामा के पास हमेशा की तरह एक छोटा सा कपड़े का थैला था।

     

    वह उसे उठाकर कुछ देर तक देखता रहा।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “चलो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “इतनी जल्दी?”

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    “समय जल्दी नहीं जा रहा, सुदामा। हम बस उसे रोक नहीं सकते।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैंने सोचा था कि यह दिन बहुत दूर है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “मैंने भी।”

     

    दोनों कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने वर्ष बिताए थे।

     

    फिर गुरु माता उनके पास आईं।

     

    उन्होंने सबसे पहले सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    सुदामा ने उनके चरण छुए।

     

    गुरु माता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमेशा शांत और सरल रहे हो, पुत्र। जीवन चाहे तुम्हें कितनी भी कठिनाइयाँ दे, अपने मन की सच्चाई मत खोना।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “माता, आपने मुझे माँ जैसा प्रेम दिया।”

     

    गुरु माता मुस्कुराईं।

     

    “तो फिर मुझे भूलना मत।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कभी नहीं।”

     

    फिर कृष्ण उनके चरणों में झुके।

     

    गुरु माता ने उन्हें देखते हुए कहा, “और तुम…”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं क्या, माता?”

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम्हारी मुस्कान कभी खत्म नहीं होगी, यह मुझे पता है। लेकिन याद रखना, जहाँ भी जाओ, लोगों के जीवन में वही प्रेम बाँटना जो तुमने इस आश्रम में बाँटा है।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा।”

     

    गुरु माता ने दोनों मित्रों को एक साथ देखा।

     

    उनकी आँखों में भी भावनाएँ थीं।

     

    “तुम दोनों की मित्रता ऐसी ही बनी रहे।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “यह तो बनी ही रहेगी।”

     

    लेकिन अब सबसे कठिन क्षण आने वाला था।

     

    दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना था।

     

    सुदामा को अपने गाँव लौटना था।

     

    वहीं कृष्ण को अपने परिवार और अपने जीवन की राह की ओर बढ़ना था।

     

    आश्रम से बाहर निकलते ही रास्ता दो दिशाओं में बँट जाता था।

     

    एक रास्ता सुदामा के गाँव की ओर जाता था।

     

    दूसरा रास्ता कृष्ण की यात्रा की ओर।

     

    दोनों धीरे-धीरे उस मोड़ तक पहुँचे।

     

    सुदामा के कदम भारी होते जा रहे थे।

     

    वह बार-बार कुछ कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में ही रुक जाते।

     

    आखिरकार वह रुक गया।

     

    कृष्ण भी रुक गए।

     

    दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “तो… अब हमें जाना होगा?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    कृष्ण ने कहा, “सुदामा।”

     

    “हूँ?”

     

    “मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे रोते हुए देखो।”

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे हँसते हुए याद रखो।”

     

    कृष्ण की मुस्कान हल्की हो गई।

     

    “मैं तुम्हें वैसे ही याद रखूँगा जैसे तुम हो।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    उसने कहा, “कृष्ण, तुम कहाँ जाओगे? तुम्हारा जीवन कैसा होगा? क्या मैं कभी तुम्हें फिर देख पाऊँगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर बोले, “जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, यह मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। लेकिन एक बात जानता हूँ।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए सच्ची मित्रता रहेगी, तो तुम मुझे कभी खो नहीं सकते।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें ढूँढूँगा कहाँ?”

     

    कृष्ण ने अपने हृदय पर हाथ रखा।

     

    “यहाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “और जब भी जीवन में तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम वादा करो कि अगर मैं तुम्हारे पास कभी आऊँ तो तुम मुझे पहचानोगे।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “क्या तुम सच में सोचते हो कि मैं अपने मित्र को नहीं पहचानूँगा?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने आगे कहा, “समय हमारे वस्त्र बदल सकता है, हमारे बाल बदल सकता है, हमारे घर और जीवन बदल सकता है। लेकिन सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर एक बात और वादा करो।”

     

    “कहो।”

     

    “हमारी मित्रता कभी नहीं बदलेगी।”

     

    कृष्ण ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।

     

    “मित्रता बदलने वाली चीज नहीं होती, सुदामा। अगर वह बदल जाए तो शायद वह सच्ची मित्रता थी ही नहीं।”

     

    दोनों कुछ देर तक चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “अब चलो।”

     

    सुदामा का मन नहीं मान रहा था।

     

    लेकिन वह जानता था कि अब रुकना संभव नहीं था।

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    दोनों मित्र कुछ क्षण तक वैसे ही खड़े रहे।

     

    उनके बीच कोई शब्द नहीं थे।

     

    लेकिन उस मौन में वर्षों की यादें थीं।

     

    आश्रम था।

     

    गुरु माता थीं।

     

    जंगल की बारिश थी।

     

    साथ बाँटा हुआ भोजन था।

     

    हँसी थी।

     

    छोटी-छोटी बहसें थीं।

     

    और एक ऐसी मित्रता थी, जिसे दोनों अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानते थे।

     

    कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।

     

    सुदामा ने आँसू पोंछे।

     

    “फिर मिलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “जरूर मिलेंगे।”

     

    सुदामा ने एक बार फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    कृष्ण भी दूसरी दिशा में आगे बढ़ गए।

     

    सुदामा कुछ दूर चला।

     

    लेकिन उसके कदम रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण भी पीछे मुड़कर उसे देख रहे थे।

     

    दोनों मुस्कुराए।

     

    फिर धीरे-धीरे वे अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए।

     

    समय बीतने लगा।

     

    सुदामा अपने गाँव पहुँचा।

     

    उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।

     

    वह पहले से अधिक समझदार हो चुका था।

     

    उसने अपने घर के साधारण जीवन को अपनाया।

     

    वह लोगों को ज्ञान देता, बच्चों को पढ़ाता और अपने जीवन को सरलता से जीने का प्रयास करता।

     

    लेकिन हर शाम…

     

    जब वह अकेला बैठता…

     

    उसे कृष्ण की याद आती।

     

    कभी किसी बात पर मुस्कान आ जाती।

     

    कभी आँखें नम हो जातीं।

     

    वह सोचता—

     

    कृष्ण कहाँ होंगे?

     

    क्या वह मुझे याद करते होंगे?

     

    उधर कृष्ण का जीवन भी तेजी से बदल रहा था।

     

    उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियाँ आने वाली थीं।

     

    जीवन उन्हें कई नए संघर्षों की ओर ले जाने वाला था।

     

    लेकिन समय की तेज रफ्तार में भी कुछ रिश्ते पीछे नहीं छूटते।

     

    कृष्ण के मन में भी सुदामा की याद हमेशा बनी रही।

     

    वर्ष बीत गए।

     

    दोनों मित्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन उनके जीवन एक जैसे नहीं थे।

     

    एक ओर कृष्ण का जीवन धीरे-धीरे महान जिम्मेदारियों और राजसी वैभव की ओर बढ़ रहा था।

     

    दूसरी ओर सुदामा का जीवन सादगी और संघर्षों से भरा था।

     

    फिर भी…

     

    एक समय था जब दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।

     

    वे बस दो मित्र थे।

     

    दो बालक।

     

    जो बारिश में भीगते हुए साथ खड़े रहते थे।

     

    जो थोड़ा सा भोजन भी बाँटकर खाते थे।

     

    जो एक-दूसरे के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं करते थे।

     

    लेकिन अब जीवन उन्हें एक ऐसी दूरी तक ले जा चुका था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    और बहुत जल्द…

     

    वह समय आने वाला था जब सुदामा का जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा।

     

    उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जब उसे अपने पुराने मित्र कृष्ण की याद पहले से भी अधिक आएगी।

     

    लेकिन क्या सुदामा इतने वर्षों बाद कृष्ण के पास जा पाएगा?

     

    क्या वह अपने पुराने मित्र को वैसे ही पा सकेगा?

     

    या समय और परिस्थितियाँ उनके बीच इतनी दूरी बना चुकी होंगी कि मिलना केवल एक सपना रह जाएगा?

     

    इन सवालों का जवाब अभी भविष्य के पास था।

     

    लेकिन एक बात निश्चित थी—

     

    उनकी मित्रता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    असल में…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।

     

    क्रमशः…

  • Part 4 गुरुकुल की अंतिम परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 4 — गुरुकुल की अंतिम परीक्षा और बिछड़ने का डर

     

    समय धीरे-धीरे बीत रहा था।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में आए हुए कृष्ण और सुदामा को कई वर्ष बीत चुके थे। जो दो बालक पहली बार एक-दूसरे से मिले थे, अब बड़े हो रहे थे। उनकी समझ बढ़ चुकी थी, उनके विचार बदल रहे थे, लेकिन एक चीज बिल्कुल नहीं बदली थी—उनकी मित्रता।

     

    हर सुबह दोनों साथ उठते।

     

    नदी तक जाते।

     

    आश्रम के कार्य करते।

     

    गुरु के सामने बैठकर शिक्षा प्राप्त करते।

     

    और शाम होते ही दिनभर की बातें करते हुए एक-दूसरे के पास बैठ जाते।

     

    लेकिन अब आश्रम का वातावरण थोड़ा बदलने लगा था।

     

    कई शिष्यों की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और वे अपने घर लौटने लगे थे।

     

    जब भी कोई शिष्य गुरु सांदीपनि और गुरु माता का आशीर्वाद लेकर आश्रम से विदा होता, सुदामा उसे चुपचाप देखता रहता।

     

    एक दिन कृष्ण ने उससे पूछा, “तुम इतने शांत क्यों हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा यह ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें सब पता चल जाता है।”

     

    “क्योंकि तुम मेरे मित्र हो।”

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने सामने जाते हुए एक शिष्य को देखा और धीरे से कहा, “कृष्ण, एक दिन हमें भी जाना होगा ना?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    सुदामा आगे बोला, “एक दिन हमारी शिक्षा भी पूरी होगी। फिर तुम अपने घर चले जाओगे और मैं अपने घर।”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हें कभी इस बात का डर नहीं लगता?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “डर लगता है।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “नहीं, तुम मेरी तरह बिल्कुल नहीं हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “ठीक है, लेकिन मित्र को खोने का डर मुझे भी होता है।”

     

    सुदामा का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “तो फिर क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किसका?”

     

    “हमारी मित्रता का।”

     

    कृष्ण ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “क्या तुम रोज सूरज को देखते हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रात को?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर भी तुम्हें विश्वास होता है कि सुबह सूरज वापस आएगा?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    कृष्ण बोले, “मित्रता भी ऐसी ही होती है। कभी-कभी जीवन की रात हमें अलग कर देती है, लेकिन सच्चा प्रेम फिर भी मन में बना रहता है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक कृष्ण की बात सोचता रहा।

     

    उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें रोज देखना चाहता हूँ।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मेरी यादों को अपने पास रखना।”

     

    “और अगर यादें कम पड़ गईं तो?”

     

    “तो फिर मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने पहली बार खुलकर हँसते हुए कहा, “तुम्हें ढूँढना आसान होगा?”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा, “नहीं, लेकिन तुम मेरे मित्र हो। तुम्हें रास्ता मिल जाएगा।”

     

    दोनों की हँसी आश्रम के शांत वातावरण में फैल गई।

     

    लेकिन सुदामा के मन में बिछड़ने का डर फिर भी कहीं न कहीं बना रहा।

     

    कुछ दिनों बाद गुरु सांदीपनि ने सभी बड़े शिष्यों को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठ गए।

     

    गुरु ने कहा, “तुम सभी कई वर्षों से इस आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे हो। अब समय आ गया है कि तुम अपनी शिक्षा के अंतिम चरण में प्रवेश करो।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से सुनने लगे।

     

    “शिक्षा केवल शास्त्र पढ़ लेने से पूरी नहीं होती। मनुष्य को अपने ज्ञान की परीक्षा जीवन में देनी पड़ती है।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमें कोई परीक्षा देनी होगी?”

     

    गुरु सांदीपनि ने कहा, “हाँ। लेकिन यह परीक्षा केवल पुस्तकों की नहीं होगी।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कुछ रोचक होने वाला है।

     

    गुरु सांदीपनि आगे बोले, “तुम सभी को अलग-अलग कार्य दिए जाएँगे। उन कार्यों के माध्यम से मैं देखूँगा कि तुमने यहाँ केवल ज्ञान सीखा है या जीवन को भी समझा है।”

     

    कुछ शिष्यों के चेहरे पर उत्साह था और कुछ चिंतित हो गए।

     

    सुदामा के मन में भी हल्की चिंता थी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण ने पूछा, “अब क्या सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “परीक्षा के बारे में।”

     

    कृष्ण ने करवट बदलते हुए कहा, “तुम हर आने वाली बात से पहले ही डर क्यों जाते हो?”

     

    “क्योंकि मुझे सब कुछ सही करना है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हर समय सही होने की कोशिश करने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान रहता है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तो क्या गलतियाँ करनी चाहिए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “नहीं, लेकिन गलती के डर से काम करना छोड़ भी नहीं देना चाहिए।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद कृष्ण ने कहा, “कल जो होगा, देखा जाएगा। आज आराम करो।”

     

    अगली सुबह सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए।

     

    गुरु ने एक-एक करके सभी को उनके कार्य बताए।

     

    कुछ को दूर गाँवों में जाकर लोगों की सहायता करनी थी।

     

    कुछ को कठिन विषयों पर अध्ययन करना था।

     

    कुछ को आश्रम की जिम्मेदारियाँ संभालनी थीं।

     

    फिर गुरु ने कृष्ण और सुदामा की ओर देखा।

     

    “तुम दोनों…”

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम दोनों को साथ में एक कार्य करना होगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा के चेहरे पर राहत आ गई।

     

    गुरु ने कहा, “तुम्हें तीन दिनों के लिए आश्रम से दूर एक गाँव जाना होगा। वहाँ के लोग पानी की कमी से परेशान हैं। पास की एक पुरानी जलधारा मिट्टी और पत्थरों से बंद हो गई है।”

     

    सुदामा ध्यान से सुन रहा था।

     

    गुरु ने आगे कहा, “तुम दोनों वहाँ जाकर लोगों की सहायता करोगे। लेकिन याद रखना, तुम्हें यह काम केवल अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर करना होगा।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आज्ञा, गुरुदेव।”

     

    दोनों उसी दिन यात्रा पर निकल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    कृष्ण पूरे रास्ते बातें करते रहे, लेकिन सुदामा इस बार कुछ ज्यादा ही चुप था।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने पूछा, “अब क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम इतने बड़े काम को कैसे पूरा करेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “पहले गाँव पहुँचते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “सुदामा।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान को थका देते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “और तुम वर्तमान में इतने खुश रहते हो कि कभी भविष्य की चिंता ही नहीं करते।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “शायद इसीलिए हम मित्र हैं। तुम मुझे सावधान रखते हो और मैं तुम्हें मुस्कुराना सिखाता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते गए।

     

    शाम तक वे उस गाँव में पहुँच गए।

     

    गाँव छोटा था।

     

    वहाँ के लोग परेशान दिखाई दे रहे थे।

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें बताया कि पहले गाँव के पास एक छोटी जलधारा बहती थी, लेकिन कई महीनों पहले तेज बारिश और मिट्टी के बहाव से उसका रास्ता बंद हो गया।

     

    अब लोगों को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था।

     

    सुदामा ने जलधारा का रास्ता देखा।

     

    वहाँ बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी जमा थी।

     

    वह चिंतित हो गया।

     

    “यह काम बहुत कठिन है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो कठिन काम शुरू करते हैं।”

     

    अगली सुबह दोनों गाँव वालों के साथ वहाँ पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम सब मिलकर काम करें, तो यह काम जल्दी पूरा हो सकता है।”

     

    कुछ लोग तैयार हो गए।

     

    कुछ ने कहा, “यह बहुत बड़ा काम है।”

     

    कुछ लोग निराश थे।

     

    सुदामा को लगा कि शायद यह कार्य पूरा नहीं होगा।

     

    लेकिन कृष्ण ने हार नहीं मानी।

     

    उन्होंने सबसे पहले स्वयं मिट्टी हटानी शुरू कर दी।

     

    उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी आ गए।

     

    फिर कुछ युवक।

     

    फिर धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी जुड़ने लगे।

     

    सुदामा ने देखा कि कृष्ण केवल बातें नहीं कर रहे थे।

     

    वह सबसे पहले स्वयं काम कर रहे थे।

     

    सुदामा भी उनके साथ लग गया।

     

    पूरा दिन मिट्टी हटाने में निकल गया।

     

    शाम तक सब थक चुके थे।

     

    लेकिन जलधारा का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था।

     

    सुदामा ने थके हुए स्वर में कहा, “शायद हमसे नहीं होगा।”

     

    कृष्ण ने कहा, “आज नहीं हुआ तो कल होगा।”

     

    “लेकिन तीन दिन में?”

     

    “तो तीन दिन तक पूरी कोशिश करेंगे।”

     

    दूसरे दिन सुबह सभी फिर जुट गए।

     

    इस बार काम पहले से तेज हुआ।

     

    कृष्ण और सुदामा ने लोगों को अलग-अलग काम बाँट दिए।

     

    कोई मिट्टी हटा रहा था।

     

    कोई पत्थर सरका रहा था।

     

    कोई रास्ता साफ कर रहा था।

     

    दोपहर तक अचानक मिट्टी के नीचे से पानी की एक छोटी धारा दिखाई देने लगी।

     

    सभी लोग उत्साहित हो गए।

     

    “पानी!”

     

    बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे।

     

    लेकिन अभी रास्ता पूरी तरह खुला नहीं था।

     

    कृष्ण ने कहा, “रुकना मत।”

     

    सबने फिर काम शुरू कर दिया।

     

    कुछ देर बाद आखिरी बड़ा पत्थर हटाया गया।

     

    और उसके साथ ही पानी तेजी से बहने लगा।

     

    पूरा गाँव खुशी से भर गया।

     

    लोगों ने कृष्ण और सुदामा का धन्यवाद किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने कहा, “हम दोनों ने नहीं किया। यह काम आप सबने मिलकर किया है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे समझ आया कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जो दूसरों को अपनी शक्ति का एहसास करा दे।

     

    तीन दिन बाद दोनों आश्रम लौट आए।

     

    गुरु सांदीपनि ने उनसे पूछा, “कार्य पूरा हुआ?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    सुदामा ने पूरी घटना विस्तार से बताई।

     

    गुरु ध्यान से सुनते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने अपनी परीक्षा में बहुत कुछ सीखा है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमारी शिक्षा अब पूरी हो गई?”

     

    गुरु सांदीपनि कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “अभी नहीं… लेकिन वह दिन अब दूर भी नहीं है।”

     

    सुदामा का मन अचानक भारी हो गया।

     

    वही बात…

     

    जिससे वह इतने दिनों से डर रहा था।

     

    गुरुकुल छोड़ना।

     

    कृष्ण से अलग होना।

     

    उस रात वह फिर से चुप बैठा था।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम फिर सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    “बिछड़ने के बारे में?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कृष्ण उसके पास बैठ गए।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर हमारे जीवन की राहें सच में अलग हो गईं तो?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “तो हमारी राहें अलग होंगी… हम नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “मुझसे वादा करो कि चाहे कुछ भी हो जाए, तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    “सुदामा, मित्र को याद रखने के लिए वादा नहीं करना पड़ता। सच्चा मित्र मन में रहता है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाला समय उनकी परीक्षा सचमुच लेने वाला है।

     

    बहुत जल्द…

     

    गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने वाली थी।

     

    और उसके बाद…

     

    दोनों मित्रों के सामने जीवन की दो अलग-अलग राहें खड़ी थीं।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दोनों ने आसमान में चमकते तारों को देखा।

     

    और मन ही मन एक ही बात महसूस की—

     

    समय चाहे उन्हें कितनी भी दूर ले जाए, उनकी मित्रता की डोर कभी नहीं टूटेगी।

     

    क्रमशः…

  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    भाग 2 — कंस का संदेश 🦚

     

    वृंदावन की उस सुबह के बाद दिन तो बीत गया था…

    लेकिन यशोदा मैया के मन की बेचैनी नहीं बीती।

     

    सूरज ढलने लगा था।

     

    आकाश पर लालिमा फैल चुकी थी। यमुना का जल सूर्य की अंतिम किरणों को अपने भीतर समेटे धीरे-धीरे शांत हो रहा था। गौएँ चरागाह से लौट रही थीं और उनके गलों में बंधी घंटियों की आवाज पूरे वृंदावन में एक मधुर संगीत की तरह फैल रही थी।

     

    गोपियाँ अपने-अपने घरों के बाहर खड़ी होकर गायों का स्वागत कर रही थीं।

    ग्वालबाल दिनभर की शरारतों के किस्से सुनाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे।

     

    और नंद भवन के आँगन में… श्री कृष्ण अपनी बाँसुरी लेकर बैठे थे, उनके पास ही बैठे थे उनके बड़े भाई बलराम 

     

    कभी कृष्ण कुछ कहते और बलराम हँस पड़ते।

    कभी दोनों बिना कुछ बोले ही यमुना की ओर देखते रहते। सब कुछ सामान्य था। फिर भी…

     

    मैया यशोदा को कुछ सामान्य नहीं लग रहा था।

    वह रसोई में खड़ी थीं, लेकिन बार-बार उनकी नजर कृष्ण पर जा रही थी।

     

    सुबह कृष्ण ने जो बात कही थी, वह उनके मन से निकल ही नहीं रही थी।

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    मैया ने सिर झटक दिया।

     

    “नहीं…” उन्होंने खुद से कहा। “मेरा कान्हा ऐसा कुछ नहीं कह सकता।”

     

    लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था। तभी बाहर से नंद बाबा की आवाज आई, “यशोदा!”

     

    मैया ने वहीं से आवाज लगाई, “जी?”

     

    “जरा बाहर आना।”

     

    वो हाथ पोंछते हुए बाहर आईं, नंद बाबा मुख्य द्वार के पास खड़े थे। उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    “क्या हुआ?” यशोदा ने पूछा।

     

    नंद बाबा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी बाहर से घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी , टापों की आवाज धीरे-धीरे तेज होती गई।

     

    नंद भवन के द्वार पर खड़े सेवक ने बाहर झाँककर देखा।

    “महाराज…”

     

    नंद बाबा उसकी ओर मुड़े। “क्या हुआ?”

     

    “एक रथ आ रहा है।”

     

    “किसका?”

     

    सेवक ने दूर देखते हुए कहा, “पहचान में नहीं आ रहा।”

     

    नंद बाबा कुछ क्षण शांत रहे। फिर बोले, “द्वार खोल दो।”

     

    कुछ ही पल बाद एक सुंदर रथ नंद भवन के सामने आकर रुका। रथ से एक गंभीर, तेजस्वी पुरुष नीचे उतरे।

    चेहरे पर थकान थी… लेकिन आँखों में गहरी भक्ति।

     

    उन्होंने जैसे ही नंद बाबा को देखा, हाथ जोड़ दिए। “नंद महाराज।”

     

    नंद बाबा आगे बढ़े। “आप?”

     

    उन्होंने ध्यान से देखा। फिर पहचानते ही बोले, “अक्रूर जी!”

    यशोदा भी उनके पास आ गईं।

     

    अक्रूर ने दोनों को प्रणाम किया। “महाराज, मैया…”

     

    नंद बाबा ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “आइए। इतनी संध्या के समय आपका आगमन… सब कुशल तो है?”

     

    अक्रूर ने एक क्षण नंद बाबा की ओर देखा। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि नंद बाबा का मन और भी बेचैन हो गया।

     

    “सब कुशल है ना?” इस बार नंद बाबा की आवाज में चिंता स्पष्ट थी।

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुकाया। “मैं एक संदेश लेकर आया हूँ।”

     

    यशोदा के हृदय में जैसे अचानक कोई अनजाना भय जाग उठा। उन्होंने बिना जाने ही कृष्ण की ओर देखा।

    कृष्ण अब भी आँगन में बैठे थे। लेकिन उनकी आँखें…

    सीधे अक्रूर पर थीं।

     

    जैसे वह पहले से जानते हों कि अक्रूर क्यों आए हैं।

     

    —

     

    नंद बाबा अक्रूर को भीतर ले गए।

     

    कृष्ण और बलराम भी कुछ दूरी पर खड़े हो गए।

     

    मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। “तुम यहीं रहना।”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “क्यों मैया?”

     

    “बस…” यशोदा के पास कोई कारण नहीं था।

     

    उन्हें स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं। अंदर सभा-कक्ष में नंद बाबा ने अक्रूर को आसन दिया।

    “बताइए।”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “महाराज… मैं मथुरा से आया हूँ।”

     

    “मथुरा से?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा का चेहरा गंभीर हो गया, “किसलिए?”

     

    अक्रूर ने गहरी साँस ली। “महाराज कंस ने एक धनुष यज्ञ का आयोजन किया है।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया। “यह तो सुना है।”

     

    “उसने वृंदावन से भी लोगों को आमंत्रित किया है।”

     

    “ठीक है।”

    नंद बाबा कुछ सहज हुए।

     

    लेकिन अगले ही शब्दों ने उनके चेहरे का रंग बदल दिया।

     

    “विशेष रूप से कृष्ण और बलराम को।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। यशोदा के हाथ से पानी का पात्र लगभग छूट गया।

    “कृष्ण… और बलराम?”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया। “हाँ, मैया।”

     

    यशोदा ने तुरंत कहा, “लेकिन क्यों?”

     

    अक्रूर ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में करुणा थी।

     

    “राजा कंस ने उन्हें मथुरा बुलाया है।”

     

    यशोदा आगे बढ़ीं। “कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर चुप रहे, यशोदा की आँखें फैल गईं।

    “मैंने पूछा… कितने दिनों के लिए?”

     

    अक्रूर ने कोई उत्तर नहीं दिया, नंद बाबा समझ गए।

     

    उन्होंने धीमी आवाज में पूछा, “क्या यह केवल धनुष यज्ञ के लिए बुलावा है?”

     

    अक्रूर ने उनकी आँखों में देखा। “नहीं।”

     

    बस एक शब्द और नंद भवन की सारी शांति जैसे टूट गई।

     

    —

     

    यशोदा ने तुरंत कृष्ण को अपनी ओर खींच लिया। “मेरा बेटा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण शांत खड़े रहे। “मैया…”

     

    “नहीं!” यशोदा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे नहीं पता राजा कंस ने क्यों बुलाया है। मुझे यह भी नहीं जानना कि वहाँ क्या उत्सव है, क्या यज्ञ है… मेरा कान्हा कहीं नहीं जाएगा।”

     

    नंद बाबा ने उन्हें समझाने की कोशिश की। “यशोदा…”

     

    “नहीं जी!” यशोदा ने उनकी ओर देखा।

    “आप कुछ मत कहिए।”

     

    फिर वह अक्रूर की ओर मुड़ीं। “आप वापस चले जाइए।”

     

    अक्रूर स्तब्ध रह गए। “मैया…”

     

    “कह दीजिए कंस से कि कृष्ण नहीं आएगा।”

     

    अक्रूर ने सिर झुका लिया। “काश मैं ऐसा कर पाता।”

     

    “तो कीजिए।” यशोदा की आवाज टूट गई। “आप नहीं जानते… वह मेरे लिए क्या है।”

     

    अक्रूर की आँखें नम हो गईं। “मैं जानता हूँ, मैया।”

     

    “नहीं!” यशोदा ने कृष्ण का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। “कोई नहीं जानता।”

     

    उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। “मेरे लिए यह भगवान नहीं है…”

    उनकी आवाज काँप रही थी। “यह मेरा पुत्र है।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उनकी पीठ पर हाथ रखा। “मैया…”

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगे।”

    कृष्ण चुप रहे। उनकी आँखें कुछ पल के लिए नंद बाबा पर गईं।

     

    नंद बाबा की आँखों में भी चिंता थी। लेकिन उस चिंता के पीछे कुछ और था।

     

    जैसे उन्हें भीतर से पता हो कि यह बुलावा केवल एक उत्सव का निमंत्रण नहीं है।

     

    —

     

    अक्रूर ने धीरे से कहा, “नंद महाराज, मुझे एक बात कहनी है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “कहिए।”

     

    “मैं स्वयं भी इस यात्रा को लेकर प्रसन्न नहीं हूँ।”

     

    यशोदा ने उनकी ओर देखा।

     

    अक्रूर बोले, “लेकिन मुझे विश्वास है कि कृष्ण और बलराम का मथुरा जाना किसी बड़े उद्देश्य का भाग है।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत पूछा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    अक्रूर कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “क्योंकि कंस कृष्ण से भयभीत है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। “भयभीत?” नंद बाबा ने दोहराया।

     

    अक्रूर ने सिर हिलाया। “हाँ।”

     

    “लेकिन कृष्ण ने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    “यही तो बात है।”

     

    अक्रूर की आवाज धीमी थी। “कंस कृष्ण से इसलिए नहीं डरता कि कृष्ण ने उसका कुछ बिगाड़ा है… वह इसलिए डरता है क्योंकि उसे अपने अंत का भय है।”

     

    यशोदा का हृदय धक से रह गया। “कैसा अंत?”

     

    अक्रूर ने उत्तर नहीं दिया।

    नंद बाबा ने गंभीर होकर पूछा, “क्या भविष्यवाणी वाली बात…”

     

    अक्रूर ने धीरे से सिर झुका दिया, यशोदा ने कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया। उनके मन में वर्षों पुरानी बातें कौंधने लगीं।

    कृष्ण का जन्म… उस रात की रहस्यमयी घटनाएँ…

    गोकुल में उनका आना… कंस के भेजे असुर…

    पूतना… शकटासुर… त्रिणावर्त… कालिया…

    गोवर्धन…

     

    एक-एक घटना जैसे अचानक उनके सामने जीवित हो उठी।

    क्या यह सब उसी दिन की ओर बढ़ रहा था? क्या कृष्ण का वृंदावन में रहना अब संभव नहीं था?

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा, वह शांत थे।

     

    असामान्य रूप से शांत। “कान्हा…”

     

    कृष्ण ने उनकी आँखों में देखा। “हाँ, मैया।”

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “किस बात का?”

     

    “मथुरा जाने का।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “जहाँ आपका आशीर्वाद हो, वहाँ डर कैसा?”

     

    यशोदा की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    वह नहीं चाहती थीं कि कृष्ण उन्हें रोते हुए देखें, लेकिन कृष्ण सब समझ रहे थे।

     

    —

     

    उस रात नंद भवन में किसी ने ठीक से भोजन नहीं किया।

     

    गोपियों तक यह समाचार पहुँच चुका था, धीरे-धीरे पूरा वृंदावन जान गया, कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया गया है।

     

    गलियों में फुसफुसाहट होने लगी।

    किसी ने कहा, “कृष्ण को नहीं जाना चाहिए।”

     

    किसी ने कहा, “कंस पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?”

    किसी ने कहा, “यह जरूर कोई चाल है।”

     

    और किसी ने बस इतना कहा, “अगर कृष्ण चले गए तो वृंदावन का क्या होगा?”

     

    यमुना किनारे राधा खड़ी थीं, उन्हें भी समाचार मिल चुका था। हवा में वही बाँसुरी की धुन जैसे अब भी तैर रही थी।

     

    लेकिन आज… वह धुन उन्हें खुश नहीं कर रही थी।

    उनकी आँखों के सामने कृष्ण का चेहरा था। सुबह का वही प्रश्न याद आ रहा था, “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    राधा की आँखों से एक आँसू गिरा, उन्होंने यमुना की ओर देखा।

    “तो क्या सच में…” उनकी आवाज हवा में खो गई।

    “कान्हा हमसे दूर जाने वाले हैं?”

     

    —

     

    नंद भवन में उस रात कृष्ण अपने कक्ष में बैठे थे, बलराम उनके सामने थे।

    कुछ देर दोनों भाई मौन रहे। फिर बलराम ने पूछा, “तुम्हें पहले से पता था?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा। “क्या?”

     

    “अक्रूर के आने के बारे में।”

     

    कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया। बलराम समझ गए। “तुम जानते थे।”

     

    कृष्ण ने धीरे से बाँसुरी उठाई। “दाऊ…”

     

    “हूँ?”

     

    “कभी-कभी जीवन हमें वहाँ ले जाता है जहाँ जाने की हमने इच्छा नहीं की होती।”

     

    बलराम ने उनकी आँखों में देखा। “और अगर कोई तुम्हें रोकना चाहे?”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण सोचा, फिर मुस्कुराए।

    “तो उसे प्रेम से समझाना होगा।”

     

    “और अगर प्रेम ही तुम्हें रोक ले?”

     

    इस बार कृष्ण की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, उन्होंने बाहर देखा। आँगन में यशोदा मैया बैठी थीं, उनकी आँखें कृष्ण के कक्ष की ओर थीं।

     

    कृष्ण कुछ पल उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “तब सबसे कठिन होता है… जाना।”

     

    उनकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ठहर गईं, बाहर रात गहरी होती जा रही थी।

    वृंदावन सो रहा था, लेकिन उस रात… नंद भवन में कोई नहीं सोया।

    एक माँ अपने पुत्र को खोने के भय में जाग रही थी।

     

    एक पिता अपने कर्तव्य और पुत्र के बीच खड़ा था।

    एक भाई आने वाले संघर्ष को महसूस कर रहा था।

     

    एक युवती यमुना किनारे अपने प्रिय के जाने की आहट सुन रही थी।

     

    और कृष्ण… वह सबसे शांत बैठे थे।

    जैसे उन्हें पता हो कि अगली सुबह से वृंदावन की हर साँस बदलने वाली है।

     

    क्योंकि अक्रूर केवल कंस का संदेश लेकर नहीं आए थे।

     

    वह अपने साथ…

    वृंदावन के विरह की पहली सुबह भी लेकर आए थे। 🦚❤️

     

    हम दिन में जाने कितने बुरे विचार लाते हैं या कहते हैं इसलिए एक बार साफ मन से 

    🌺 राधे राधे 🌺 कहते जाइए।

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  • 🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    🌸 वृंदावन का वो आखिरी दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    भाग 1 — वृंदावन की वो सुबह 🦚

     

    वृंदावन में सुबह कभी केवल सुबह नहीं होती थी।

     

    वहाँ सूरज की पहली किरण के साथ जैसे कोई बाँसुरी जन्म लेती थी…

    यमुना की लहरें उसे सुनती थीं, कदंब के वृक्ष झूमकर उसका स्वागत करते थे और गलियों में बिखरी धूल भी जैसे उस धुन पर नाचने लगती थी।

     

    उस दिन भी वृंदावन वैसा ही जागा था।

     

    आकाश अभी पूरी तरह लालिमा से नहीं भरा था। पूर्व दिशा में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। यमुना का जल शांत था और उसके ऊपर तैरती धुंध की पतली चादर धीरे-धीरे सूरज की किरणों में घुल रही थी।

     

    कहीं गौशाला से गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं घरों के आँगन में गोपियाँ मटके लिए निकल चुकी थीं।

     

    लेकिन उस सुबह वृंदावन की हवा में कुछ अलग था।

    बहुत हल्का-सा…

     

    इतना हल्का कि कोई उसे महसूस तो कर सकता था, पर उसका नाम नहीं रख सकता था।

    नंद भवन में यशोदा मैया रोज की तरह सुबह-सुबह उठ चुकी थीं।

     

    उन्होंने आँगन में गोबर से सुंदर-सी रंगोली बनाई, तुलसी माता को जल चढ़ाया और फिर माखन मथने बैठ गईं।

     

    मथानी की आवाज पूरे आँगन में गूँज रही थी।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

     

    यशोदा मैया के होंठों पर मुस्कान थी।

    लेकिन उनकी आँखें बार-बार उस कमरे की ओर उठ जातीं जहाँ उनका कान्हा सो रहा था।

    “पता नहीं कब बड़ा हो गया मेरा लल्ला…”

    उन्होंने धीरे से खुद से कहा।

     

    फिर मुस्कुराकर सिर हिलाया।

    “बड़ा कहाँ हुआ है? अभी भी तो सुबह उठते ही माखन के पीछे भागता है।”

     

    उसी क्षण कमरे के भीतर से कुछ गिरने की आवाज आई।

    धड़ाम!

     

    मैया यशोदा की मथानी रुक गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

    “लो… उठ गया मेरा नटखट।” उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई। 

     

    अगले ही पल उनकी आवाज पूरे भवन में गूँज उठी, “कान्हा!”

     

    अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। “कान्हा!”

     

    फिर भी शांति। मैया यशोदा ने हाथ कमर पर रखे और कमरे की ओर बढ़ गईं।

    दरवाजा खोलते ही उनकी नजर बिखरे हुए बिस्तर पर पड़ी।

     

    सबकुछ अस्त व्यस्त था लेकिन कृष्णा… कमरे में थे ही नहीं।

     

    मैया यशोदा कुछ क्षण उन्हें ढूँढती रहीं। फिर उनकी नजर खिड़की से बाहर गई।

    कदंब के पेड़ के पास वो खड़े थे।

     

    हाथ में बाँसुरी लिए। 

    नीली आभा से घिरा उनका मुख सुबह की पहली किरणों में ऐसा चमक रहा था जैसे स्वयं आकाश ने उन्हें अपने रंग में रंग दिया हो।

     

    कृष्ण की आँखें यमुना की ओर थीं और उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान।

     

    यशोदा खिड़की से ही पुकार उठीं, 

    “कान्हा! इतनी सुबह-सुबह वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। “मैया…”

     

    उनकी आवाज में वही मासूमियत थी। “आप जाग गईं?”

     

    यशोदा ने भौंहें चढ़ाईं। “हाँ, क्योंकि मेरा लाल कमरे में सोने के बजाय पता नहीं कहाँ-कहाँ घूम रहा है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो बस जल्दी भोर में ही यमुना मैया से मिलने आया था।”

     

    “यमुना मैया से मिलने?” यशोदा बाहर आईं और उनके पास पहुँचकर कान पकड़ लिया। “और मुझे बिना बताए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े। “मैया, आप तो सो रही थीं।”

     

    “तो क्या मुझे जगाते?”

     

    “जगाता तो आप मुझे जाने देतीं?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल उन्हें देखती रहीं। फिर उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। “नहीं।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “इसीलिए तो नहीं जगाया।”

     

    यशोदा ने उनके गाल पर हल्की-सी चपत लगाई।

    “बहुत चालाक हो गए हो, रे।”

     

    कृष्ण हँसने लगे। उनकी हँसी सुनकर पास से गुजरती एक गोपी भी मुस्कुरा उठी।

     

    “मैया, आपका कान्हा तो आज फिर माखन चुराने की तैयारी में है।”

     

    कृष्ण तुरंत बोले, “मैंने आज माखन नहीं चुराया।”

     

    यशोदा ने आँखें तरेरीं। “आज?”

     

    कृष्ण चुप हो गए, गोपी हँस पड़ी।

     

    “मैया, कल की मटकी याद है?”

     

    यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा। “तो कल किसने माखन चुराया था?”

     

    कृष्ण ने तुरंत आकाश की ओर देखा। “मैया, मुझे लगता है आज मौसम बहुत सुंदर है।”

     

    और इतना कहकर भागने लगे। “कान्हा!”

     

    मैया यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं।

     

    पूरा आँगन कृष्ण की हँसी से भर गया। कुछ ही देर में नंद भवन की वही पुरानी चहल-पहल लौट आई।

     

    कहीं ग्वाल-बाल कृष्ण को ढूँढते हुए आ रहे थे। कहीं गोपियाँ उनकी शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच रही थीं।

     

    कहीं गायों के बीच जाकर कृष्ण उन्हें पुकार रहे थे।

     

    वृंदावन के लिए कृष्ण केवल नंद बाबा के पुत्र नहीं थे, वह वृंदावन की धड़कन थे।

     

    उनके बिना जैसे हर चीज अधूरी लगती थी।

     

    —

     

    सुबह कुछ और चढ़ी तो कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे जा पहुँचे।

     

    बलराम भी उनके साथ थे। मित्र ने कृष्ण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “कान्हा, आज कहाँ चलें?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सामने देखा। “जहाँ मन करे।”

     

    “तो फिर कदंब वन!” एक ग्वालबाल चिल्लाया।

     

    सब दौड़ पड़े, कृष्ण पीछे रह गए।

    उनकी नजर यमुना पर टिक गई। बलराम ने यह देखा तो उनके कदम भी रुक गए। “कृष्ण?”

     

    कृष्ण ने उनकी ओर देखा। “हाँ, दाऊ?”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    बलराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। “तुम आज कुछ बदले-बदले लग रहे हो।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। “मैं तो वही हूँ।”

     

    बलराम ने सिर हिलाया। “नहीं। आज तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही हैं।”

     

    कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अपनी बाँसुरी निकाली।

     

    और अगले ही क्षण यमुना के किनारे वह धुन गूँज उठी।

     

    मधुर… शांत… और ऐसी कि जैसे किसी ने हवा में प्रेम घोल दिया हो।

     

    बांसुरी की वो धुन सुनकर, गायें चरना भूल गईं। पक्षियों का कलरव थम गया।

     

    यमुना की लहरें जैसे धीमी हो गईं। दूर खड़ी कुछ गोपियाँ भी उस धुन को सुनकर ठिठक गईं।

     

    उनमें राधा भी थीं। राधा ने आँखें बंद कर लीं। लेकिन आज…

    उस बाँसुरी में कुछ अलग था। वही धुन थी, वही कृष्ण थे, वही वृंदावन था।

    फिर भी दिल के भीतर एक अनजाना डर उतर आया था।

     

    राधा ने धीरे से आँखें खोलीं। “कान्हा…”

     

    उनके होंठों से बस इतना ही निकला।

     

    —

     

    उधर नंद भवन में यशोदा कृष्ण के लिए भोजन तैयार कर रही थीं।

     

    उन्होंने थाली में माखन रखा, मिश्री रखी।

     

    गरम-गरम रोटियाँ रखीं फिर अचानक उनके हाथ रुक गए। उनकी नजर थाली पर टिक गई।

    उन्हें जाने क्यों आज मन में एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी।

     

    उन्होंने खुद को समझाया, “शायद थक गई हूँ।”

     

    लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने आँगन में बैठे नंद बाबा को देखा। “सुनते हो?”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। “क्या हुआ?”

     

    मैया यशोदा कुछ पल चुप रहीं। “आज न जाने क्यों मन घबरा रहा है।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा, “लल्ला को लेकर?”

     

    मैया यशोदा ने सिर हिला दिया। “पता नहीं… बस ऐसा लगता है जैसे…” वह रुक गईं।

     

    “जैसे क्या?”

     

    मैया यशोदा के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने धीरे से कहा, “जैसे कुछ बदलने वाला है।”

     

    नंद बाबा का चेहरा भी कुछ क्षण गंभीर हो गया। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “सब कुछ तो भगवान की इच्छा से होता है, यशोदा।”

     

    मैया ने तुरंत उनकी बात काट दी। “भगवान की इच्छा अपनी जगह है। लेकिन मेरा लल्ला…”

     

    उनकी आवाज भर्रा गई। “मेरा कान्हा मेरी आँखों के सामने रहे… बस इतनी-सी इच्छा है।”

     

    नंद बाबा ने उनकी ओर देखा। लेकिन इस बार उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था।

     

    —

     

    दोपहर होने लगी थी। कृष्ण वापस लौटे। मैया यशोदा ने उन्हें देखते ही थाली आगे कर दी। “आओ, लल्ला। खाना खा लो।”

     

    कृष्ण उनके पास बैठ गए, यशोदा अपने हाथों से उन्हें खिलाने लगीं।

    एक निवाला… फिर दूसरा… कृष्ण उन्हें देखते रहे।

    “क्या हुआ?” मैया ने पूछा।

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया। “कुछ नहीं।”

     

    “तो ऐसे क्यों देख रहे हो?”

     

    कृष्ण ने उनकी उँगलियों को अपने हाथ में ले लिया। “मैया…”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर कभी आपका कान्हा आपसे दूर चला जाए तो?”

     

    यशोदा के हाथ अचानक रुक गए, अनायास ही उनके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। “ऐसी बातें क्यों कर रहे हो?” उनकी आँखें गमगीन हो चुकी थी। 

     

    कृष्ण चुप रहे, यशोदा ने उनका चेहरा अपने हाथों में थाम लिया। 

     

    “कहीं नहीं जाओगे तुम।”

     

    कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और अगर जाना पड़ा तो?”

     

    “नहीं।” यशोदा की आवाज इस बार दृढ़ थी।

    “तुम्हें कहीं नहीं जाना।”

     

    कृष्ण उनकी आँखों में देखते रहे, उन आँखों में माँ का प्रेम था।

    ऐसा प्रेम जिसे संसार की कोई शक्ति बाँट नहीं सकती थी।

    कृष्ण ने धीरे से अपना सिर अपनी मैया की गोद में रख दिया।

    “ठीक है मैया।”

     

    उन्होंने उनके बाल सहलाने शुरू कर दिए। उन्हें क्या पता था… कि कभी-कभी कृष्ण अपने सबसे प्रिय लोगों को भी आने वाले समय का पूरा सत्य नहीं बताते।

     

    क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं… जिन्हें रोकने का अधिकार प्रेम के पास भी नहीं होता।

     

    और वृंदावन की उस शांत सुबह में… किसी को नहीं पता था कि समय की धारा धीरे-धीरे उस क्षण की ओर बढ़ रही है…

     

    जब कृष्ण को अपना सबसे प्रिय स्थान छोड़ना होगा।

    लेकिन अभी… वृंदावन अनजान था। यमुना अनजान थी।

    गोपियाँ अनजान थीं। राधा अनजान थीं।

     

    और सबसे ज्यादा… यशोदा मैया अनजान थीं।

    कि उनके कान्हा के साथ बिताई जा रही यह साधारण-सी सुबह…

    वास्तव में वृंदावन की सबसे अनमोल सुबहों में से एक थी।

     

    क्योंकि आने वाला समय… वृं

    दावन से उसका कृष्ण माँगने वाला था।

     

    और उस दिन… पूरे वृंदावन को पहली बार समझ आएगा—

     

    कृष्ण सा प्रेम करना कितना आसान है…

    लेकिन कृष्ण से विरह सहना कितना कठिन। 🦚❤️

     

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    🌺 राधे राधे 🌺 

     

  • Part 3 गुरु माता की आज्ञा

    पढ़ने का समय : 10 मिनट
    • अध्याय 3 — गुरु माता की आज्ञा और मित्रता की परीक्षा

     

    जंगल में बिताई उस रात के बाद कृष्ण और सुदामा की मित्रता पहले से भी अधिक गहरी हो गई थी।

     

    अब आश्रम के दूसरे शिष्य भी अक्सर उनकी दोस्ती की चर्चा करते थे। सभी जानते थे कि दोनों का स्वभाव अलग है, जीवन अलग है और सोचने का तरीका भी अलग है, लेकिन फिर भी दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।

     

    सुदामा शांत था और कृष्ण चंचल।

     

    सुदामा किसी काम को शुरू करने से पहले कई बार सोचता था, जबकि कृष्ण मुस्कुराते हुए सबसे कठिन काम भी कर देते थे।

     

    लेकिन दोनों में एक बात समान थी—वे एक-दूसरे के लिए सच्चे मन से समर्पित थे।

     

    उस सुबह आश्रम में रोज की तरह काम चल रहा था। कुछ शिष्य नदी से जल भरकर ला रहे थे। कुछ पेड़ों के नीचे बैठकर पाठ याद कर रहे थे। कृष्ण और सुदामा आश्रम के आँगन की सफाई कर रहे थे।

     

    कृष्ण झाड़ू चलाते हुए धीरे-धीरे कोई धुन गुनगुना रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “कृष्ण, तुम कोई काम बिना गाना गाए नहीं कर सकते क्या?”

     

    कृष्ण ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “कर सकता हूँ।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल कृष्ण ने कहा, “लेकिन फिर काम इतना मजेदार नहीं रहेगा।”

     

    सुदामा मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए हर काम खेल ही है।”

     

    “और तुम्हारे लिए हर काम परीक्षा है।”

     

    “क्योंकि मैं जिम्मेदारी समझता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “और मैं खुशी समझता हूँ।”

     

    सुदामा ने झाड़ू एक तरफ रखते हुए कहा, “जिम्मेदारी और खुशी दोनों साथ हो सकती हैं।”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “तो तुम भी धीरे-धीरे मेरी तरह समझदार हो रहे हो।”

     

    “तुम्हारी तरह?”

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “कृष्ण, तुम कभी-कभी खुद को बहुत महान समझते हो।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, सुदामा। हमेशा।”

     

    दोनों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय गुरु माता वहाँ आईं।

     

    दोनों तुरंत शांत हो गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम दोनों से एक काम है।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “बताइए माता।”

     

    गुरु माता ने एक कपड़े की छोटी पोटली उनकी ओर बढ़ाई।

     

    “इसमें कुछ भोजन है। जंगल के उस पार रहने वाले एक वृद्ध साधु कई दिनों से अस्वस्थ हैं। मैंने उनके लिए यह भोजन तैयार किया है। तुम दोनों यह उनके पास पहुँचा आओ।”

     

    सुदामा ने पोटली हाथ में ली।

     

    “हम अभी चले जाते हैं, माता।”

     

    गुरु माता ने कहा, “ध्यान रखना, जंगल का रास्ता लंबा है। इस बार देर मत करना।”

     

    कृष्ण ने सुदामा की ओर देखकर आँख दबाई।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “माता, मैं ध्यान रखूँगा।”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मतलब तुम मुझ पर ध्यान रखोगे।”

     

    दोनों ने गुरु माता का आशीर्वाद लिया और यात्रा पर निकल पड़े।

     

    सुबह का समय था।

     

    रास्ते में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

     

    सुदामा के हाथ में भोजन की पोटली थी और कृष्ण एक पतली लकड़ी हाथ में घुमाते हुए चल रहे थे।

     

    कुछ दूरी चलने के बाद कृष्ण ने पूछा, “सुदामा, तुम्हें पता है इस पोटली में क्या है?”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो खोलकर देख लेते हैं।”

     

    सुदामा ने तुरंत पोटली को पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि यह हमारे लिए नहीं है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं सिर्फ देखने की बात कर रहा हूँ।”

     

    “तुम्हें मैं जानता हूँ।”

     

    कृष्ण ने हैरानी से पूछा, “क्या जानता हो?”

     

    “पहले तुम कहोगे सिर्फ देख लेते हैं, फिर कहोगे सिर्फ थोड़ा सा चख लेते हैं।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “तुम मुझे गलत समझते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “नहीं, मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    जंगल में प्रवेश करते ही रास्ता थोड़ा कठिन हो गया।

     

    कुछ जगह पेड़ गिरे हुए थे। कहीं-कहीं घनी झाड़ियाँ थीं।

     

    लेकिन दोनों एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने कहा, “थोड़ी देर आराम कर लें?”

     

    सुदामा ने कहा, “हमारे पास समय कम है।”

     

    “थोड़ा सा आराम करने से समय नहीं रुक जाएगा।”

     

    “और चलते रहने से समय बढ़ भी नहीं जाएगा।”

     

    कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारे साथ बहस करना बहुत कठिन है।”

     

    “तो मत किया करो।”

     

    “लेकिन तुम्हारे बिना किससे करूँ?”

     

    सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    सुदामा ने पोटली को अपने पास रख दिया।

     

    कृष्ण ने पोटली की ओर देखा।

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कृष्ण!”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हारी आँखें सब बता रही हैं।”

     

    “मेरी आँखें क्या कह रही हैं?”

     

    “कि तुम्हें भूख लगी है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “थोड़ी सी।”

     

    सुदामा ने अपनी छोटी पोटली निकाली।

     

    उसमें कुछ सूखे दाने थे, जो वह सुबह अपने साथ लेकर आया था।

     

    उसने उन्हें कृष्ण की ओर बढ़ाया।

     

    “लो।”

     

    कृष्ण ने पूछा, “और तुम?”

     

    “हम दोनों बाँटकर खाएँगे।”

     

    कृष्ण ने कुछ दाने लिए और बाकी सुदामा की ओर बढ़ा दिए।

     

    “तुम भी।”

     

    सुदामा ने कहा, “मैंने तुमसे कहा था, ये कम हैं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “जो चीज मित्र के साथ बाँटी जाए, वह कम नहीं लगती।”

     

    सुदामा को उनकी पुरानी बात याद आ गई।

     

    उसने कहा, “तुम यह बात पहले भी कह चुके हो।”

     

    कृष्ण ने हँसकर कहा, “अच्छी बातें दोहराने में क्या बुराई है?”

     

    कुछ देर बाद दोनों फिर चल पड़े।

     

    दोपहर होते-होते मौसम बदलने लगा।

     

    आसमान में बादल आ गए।

     

    सुदामा ने ऊपर देखा।

     

    “कृष्ण, लगता है बारिश आने वाली है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “इस बार हम रास्ता नहीं भूलेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “इस बार भूलना ही मत।”

     

    लेकिन कुछ ही समय बाद तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगीं।

     

    सुदामा ने भोजन की पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

     

    “हमें जल्दी चलना चाहिए।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ।”

     

    दोनों तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

     

    तभी रास्ते में एक बूढ़े व्यक्ति दिखाई दिए।

     

    वह एक पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    उनके कपड़े गीले हो चुके थे और वह बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    सुदामा तुरंत उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    वृद्ध ने कमजोर आवाज में कहा, “मैं कई घंटों से यहाँ बैठा हूँ। मेरे पैर में चोट लग गई है।”

     

    कृष्ण ने उनके पैर की ओर देखा।

     

    “आप अकेले हैं?”

     

    वृद्ध ने सिर हिला दिया।

     

    सुदामा ने चिंता से कृष्ण की ओर देखा।

     

    “हमें साधु के पास भी पहुँचना है।”

     

    कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले, “पहले इनकी सहायता करते हैं।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन गुरु माता ने भोजन समय पर पहुँचाने को कहा था।”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “और अगर किसी जरूरतमंद को हमारे सामने सहायता चाहिए, तो क्या हम उसे छोड़कर आगे बढ़ जाएँ?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    उसे कृष्ण की बात सही लगी।

     

    दोनों ने वृद्ध को सहारा देकर सुरक्षित जगह बैठाया।

     

    सुदामा ने अपनी पोटली से थोड़ा पानी उन्हें दिया।

     

    कृष्ण ने आसपास से कुछ पत्ते और लकड़ी लाकर उनके पैर को सहारा दिया।

     

    बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    अब दोनों को चिंता होने लगी कि भोजन की पोटली भीग न जाए।

     

    सुदामा ने उसे अपने कपड़े के अंदर सुरक्षित कर लिया।

     

    कुछ देर बाद वृद्ध ने कहा, “तुम दोनों कौन हो?”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “दो मित्र।”

     

    वृद्ध ने पूछा, “और कहाँ जा रहे हो?”

     

    सुदामा ने बताया कि वे गुरु माता के कहने पर भोजन लेकर जा रहे हैं।

     

    वृद्ध ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों पहले अपने काम पर जा सकते थे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम ऐसा करते, तो हमारा काम अधूरा रहता।”

     

    वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “याद रखना, बेटा। दूसरों के लिए किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा बन सकता है।”

     

    कुछ समय बाद रास्ते से कुछ लोग गुजरे।

     

    कृष्ण और सुदामा ने उनसे वृद्ध की सहायता करने को कहा।

     

    अब दोनों फिर अपने रास्ते पर आगे बढ़े।

     

    लेकिन बारिश तेज हो चुकी थी।

     

    रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    सुदामा कई बार फिसलते-फिसलते बचा।

     

    कृष्ण ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “धीरे चलो।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुमने ही तो जल्दी चलने को कहा था।”

     

    “जल्दी का मतलब उड़ना नहीं होता।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    कठिन रास्ते के बाद आखिरकार दोनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वृद्ध साधु रहते थे।

     

    साधु एक छोटी सी कुटिया के बाहर बैठे थे।

     

    उन्हें देखकर सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

     

    “गुरु माता ने आपके लिए भोजन भेजा है।”

     

    साधु ने पोटली स्वीकार की।

     

    उन्होंने दोनों को ध्यान से देखा।

     

    “तुम दोनों बहुत देर से आए हो।”

     

    सुदामा तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्षमा कीजिए, रास्ते में…”

     

    कृष्ण ने कहा, “रास्ते में एक वृद्ध व्यक्ति घायल मिले थे। हम उनकी सहायता करने के लिए रुक गए।”

     

    साधु कुछ देर शांत रहे।

     

    फिर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “तो तुम देर से नहीं आए, पुत्रों। तुम सही समय पर पहुँचे।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    साधु बोले, “जो व्यक्ति दूसरों की पीड़ा देखकर रुकना जानता है, वह जीवन का सबसे बड़ा पाठ सीख चुका होता है।”

     

    सुदामा के मन में खुशी हुई।

     

    लेकिन अब एक नई चिंता थी।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    उन्हें वापस आश्रम पहुँचना था।

     

    दोनों जल्दी से वापस चल पड़े।

     

    रास्ते में सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर गुरु माता हमसे नाराज़ हुईं तो?”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो हम सच बता देंगे।”

     

    “और अगर उन्होंने कहा कि हमें पहले अपना काम पूरा करना चाहिए था?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो हम उनसे सीखेंगे।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम हर बात को इतना आसान कैसे बना देते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि कठिन बातों को कठिन सोचते रहने से वे और कठिन हो जाती हैं।”

     

    दोनों चलते रहे।

     

    रात होने से पहले वे आश्रम पहुँच गए।

     

    गुरु माता उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    “माता…”

     

    गुरु माता ने पूछा, “तुम दोनों देर से क्यों आए?”

     

    सुदामा कुछ कहता, उससे पहले कृष्ण ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    गुरु माता ध्यान से सुनती रहीं।

     

    सुदामा सिर झुकाए खड़ा रहा।

     

    कुछ क्षणों तक वहाँ शांति रही।

     

    फिर गुरु माता ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम दोनों ने आज वही किया, जो एक सच्चे विद्यार्थी को करना चाहिए।”

     

    सुदामा ने राहत की साँस ली।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।

     

    उस रात दोनों आश्रम के बाहर बैठे थे।

     

    आसमान साफ हो चुका था।

     

    तारे चमक रहे थे।

     

    सुदामा ने कहा, “आज अगर तुम न होते तो शायद मैं उस वृद्ध की सहायता किए बिना आगे बढ़ जाता।”

     

    कृष्ण ने कहा, “और अगर तुम न होते, तो शायद मैं उसे अकेले सहारा नहीं दे पाता।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तुम हमेशा मुझे अपने बराबर क्यों समझते हो?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मित्रता में बराबरी नहीं समझनी पड़ती, सुदामा। मित्र बस मित्र होता है।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    उसने धीरे से कहा, “मैं हमेशा तुम्हारा मित्र रहूँगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जानता हूँ।”

     

    दोनों कुछ देर तक शांत बैठे रहे।

     

    उन्हें नहीं पता था कि समय धीरे-धीरे उन्हें उनके जीवन की अलग-अलग राहों की ओर ले जा रहा था।

     

    अभी उनके पास साथ बिताने के लिए कई दिन थे।

     

    कई बातें थीं।

     

    कई यादें थीं।

     

    लेकिन एक दिन ऐसा भी आने वाला था, जब गुरुकुल की शिक्षा पूरी होगी और दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना पड़ेगा।

     

    और उस दिन…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।