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  • अंधियारे का अंत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 4 और अंतिम भाग: अंधियारे का अंत

     

    कमरे में दीपक बुझ चुका था। बाहर चांदनी रात थी, लेकिन कमरे के अंदर ऐसा अंधेरा था कि किसी का चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    चांदनी पीछे हट गई।

     

    उसके सामने वही आदमी खड़ा था, जिसे दादी ने देवराज बताया था।

     

    और कमरे के दूसरे कोने में उसकी बड़ी बहन चांदनी खड़ी थी।

     

    “चांदनी… भागो!”

     

    बहन की आवाज सुनते ही चांदनी का डर थोड़ा कम हुआ।

     

    उसने पूछा, “दीदी, आप यहां कैसे?”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    बड़ी चांदनी उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    “अब बहुत हो चुका, देवराज।”

     

    देवराज हंस पड़ा।

     

    “इतने साल बाद भी तुमने हार नहीं मानी?”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “मैंने हार नहीं मानी थी। मैं सिर्फ सही समय का इंतजार कर रही थी।”

     

    तभी दरवाजा खुला और गौरी अंदर आ गई।

     

    उसके पीछे चांदनी की मां और दादी भी थीं।

     

    मां ने अपनी बड़ी बेटी को देखते ही आंखों पर हाथ रख लिया।

     

    “चांदनी…”

     

    बड़ी चांदनी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “राधिका।”

     

    दोनों बहनें एक-दूसरे के पास आईं।

     

    राधिका ने अपनी बड़ी बहन को गले लगा लिया।

     

    कई सालों का इंतजार उस एक पल में खत्म हो गया।

     

    चांदनी उन्हें देखती रही।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि खुशी मनाए या इतने सालों के दर्द पर रोए।

     

    उसने पूछा, “दीदी, आप इतने साल कहां थीं?”

     

    बड़ी चांदनी ने धीरे से कहा, “उस रात मुझे हवेली से बाहर ले जाया गया था। देवराज मुझे डराकर एक पुराने मंदिर के पास छोड़ गया था। मैं किसी तरह वहां से बच निकली, लेकिन जब वापस आई तो हवेली बंद हो चुकी थी।”

     

    देवराज ने बीच में कहा, “झूठ!”

     

    बड़ी चांदनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर झूठ है तो फिर तुम्हें इतने सालों से मेरे वापस आने का डर क्यों था?”

     

    देवराज चुप हो गया।

     

    दादी ने कहा, “अब सच बोलने का समय है।”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “तुम लोग सच जानकर भी क्या कर लोगे?”

     

    चांदनी ने कहा, “सच को छिपाने के लिए झूठ बोलने की जरूरत पड़ती है। लेकिन सच को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।”

     

    देवराज कुछ नहीं बोला।

     

    बड़ी चांदनी ने एक पुराना कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे पिता के हस्ताक्षर वाला दस्तावेज है।”

     

    देवराज ने कागज देखते ही चेहरा फेर लिया।

     

    राधिका बोली, “पिताजी ने अपनी संपत्ति दोनों बेटियों के नाम की थी। लेकिन देवराज ने कागज बदलकर पूरी संपत्ति अपने नाम करने की कोशिश की थी।”

     

    दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना को जब यह पता चला तो उन्होंने उसे घर से निकाल दिया।”

     

    देवराज ने गुस्से में कहा, “मैंने सिर्फ अपना हक मांगा था!”

     

    राधिका ने जवाब दिया, “हक मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है।”

     

    कुछ पल तक कोई नहीं बोला।

     

    फिर देवराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने मुझे अपमानित किया था। मैंने सिर्फ बदला लिया।”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “बदला लेने के लिए एक परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी?”

     

    देवराज की आंखों में पछतावे की जगह अभी भी गुस्सा था।

     

    लेकिन अब उसके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं बचा था।

     

    राधिका ने दूसरा कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे खिलाफ सबसे बड़ा सबूत है।”

     

    देवराज चौंक गया।

     

    “ये तुम्हें कहां मिला?”

     

    “उसी पुराने संदूक में, जिसे तुमने समझा था कि कभी कोई नहीं ढूंढ पाएगा।”

     

    चांदनी को अब समझ आया कि हवेली का सारा रहस्य इन्हीं कागजों के इर्द-गिर्द था।

     

    देवराज ने कई सालों तक परिवार को डराकर रखा था ताकि कोई उन दस्तावेजों तक न पहुंच सके।

     

    राधिका ने कहा, “मैंने इतने साल इंतजार किया क्योंकि मेरे पास अकेले सच साबित करने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन अब मेरी बहन, मेरी बेटी और पूरा परिवार मेरे साथ है।”

     

    चांदनी ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    मां ने उसकी आंखों से आंसू पोंछे।

     

    “मुझे माफ कर देना बेटा। मैंने तुम्हें सच नहीं बताया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम्हें भी कुछ न हो जाए।”

     

    चांदनी ने मां को गले लगा लिया।

     

    “आपने मुझे सच से दूर रखा, लेकिन अब मैं आपसे नाराज नहीं हूं।”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “तो आखिर इतने सालों से हवेली की खिड़की में दीपक कौन जलाता था?”

     

    बड़ी चांदनी मुस्कुराई।

     

    “मैं।”

     

    चांदनी ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं हर पूर्णिमा की रात हवेली में आती थी। मैं चाहती थी कि कोई न कोई उस घर के सच तक पहुंचे।”

     

    “लेकिन आप हमें दिखाई कैसे देती थीं?”

     

    बड़ी चांदनी ने कहा, “शायद इसलिए क्योंकि तुम मुझे ढूंढने के लिए तैयार थीं। कई बार इंसान डर के पीछे छिपे सच को तभी देख पाता है, जब वह खुद उसे देखने की हिम्मत करे।”

     

    चांदनी मुस्कुरा दी।

     

    उसे अब समझ आ गया था कि जिस अंधियारे से वह डर रही थी, असल में वह अंधियारा उसके मन का था।

     

    सुबह होते ही परिवार गांव के बुजुर्गों के पास गया।

     

    पुराने दस्तावेज सबके सामने रखे गए।

     

    देवराज के झूठ और धोखे का सच सामने आ गया।

     

    गांव वालों ने भी स्वीकार किया कि इतने सालों से हवेली के बारे में फैली डरावनी बातें पूरी सच्चाई नहीं थीं।

     

    देवराज के खिलाफ कार्रवाई की गई और परिवार को उसकी संपत्ति वापस मिल गई।

     

    कुछ दिनों बाद हवेली की सफाई शुरू हुई।

     

    जहां कभी लोग जाने से डरते थे, वहां अब बच्चे खेलने लगे।

     

    ऊपर की वही खिड़की, जहां हर पूर्णिमा को रहस्यमयी दीपक जलता था, अब खुली रहती थी।

     

    एक शाम चांदनी और उसकी बड़ी बहन छत पर बैठी थीं।

     

    आसमान में पूरा चांद चमक रहा था।

     

    चांदनी ने पूछा, “दीदी, आपने इतने साल अकेले कैसे बिताए?”

     

    बड़ी चांदनी ने मुस्कुराकर कहा, “उम्मीद के सहारे।”

     

    “आपको यकीन था कि परिवार आपको ढूंढ लेगा?”

     

    “नहीं। लेकिन मुझे यकीन था कि एक दिन सच जरूर सामने आएगा।”

     

    चांदनी ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज ये हवेली डरावनी नहीं लग रही।”

     

    बड़ी बहन ने कहा, “क्योंकि अब इसके अंदर कोई राज नहीं छिपा।”

     

    तभी मां ऊपर आईं।

     

    “तुम दोनों यहां बैठी हो? नीचे आओ, खाना तैयार है।”

     

    चांदनी हंसते हुए बोली, “मां, आज चांद बहुत सुंदर है।”

     

    मां मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारे नाम जैसा।”

     

    चांदनी ने अपनी बड़ी बहन की तरफ देखा।

     

    “और उनका नाम भी तो चांदनी है।”

     

    दोनों बहनें हंस पड़ीं।

     

    मां ने दोनों को गले लगा लिया।

     

    उस रात हवेली में पहली बार कोई डर नहीं था।

     

    न कोई रहस्यमयी आवाज।

     

    न कोई बंद दरवाजा।

     

    न कोई छिपा हुआ राज।

     

    सिर्फ परिवार की हंसी थी।

     

    कुछ दिनों बाद गांव के लोगों ने हवेली के बाहर एक छोटा-सा बगीचा बना दिया।

     

    चांदनी और उसकी बहन वहां फूल लगाने लगीं।

     

    गौरी भी रोज उनकी मदद करने आने लगी।

     

    एक दिन गौरी ने मजाक में कहा, “अब अगर रात को यहां कोई परछाईं दिखाई दे तो?”

     

    चांदनी हंसते हुए बोली, “तो पहले पूछेंगे कि उसे भी चाय चाहिए या नहीं।”

     

    तीनों हंसने लगीं।

     

    सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

     

    आसमान पर हल्की चांदनी फैलने लगी।

     

    चांदनी ने हवेली की ऊपरी खिड़की की तरफ देखा।

     

    वहां एक दीपक जल रहा था।

     

    वह कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर उसकी बड़ी बहन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अब उसे बुझने दो।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब किसी को रास्ता दिखाने की जरूरत नहीं है।”

     

    दोनों बहनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।

     

    दीपक की लौ धीरे-धीरे बुझ गई।

     

    लेकिन चांद की रोशनी पहले से ज्यादा चमक रही थी।

     

    चांदनी मुस्कुराई।

     

    उसे आखिर समझ आ गया था कि चांदनी रात का असली अंधियारा हवेली में नहीं था, बल्कि उन लोगों के झूठ और डर में था, जिन्होंने सालों तक सच को छिपाए रखा।

     

    और जिस रात सच सामने आया, उसी रात वह अंधियारा हमेशा के लिए खत्म हो गया।

     

    समाप्त।

  • मां का छिपा सच

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 3: मां का छिपा हुआ सच

     

    “और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

     

    उस लड़की की बात सुनकर चांदनी और गौरी जैसे पत्थर की हो गईं।

     

    चांदनी कुछ पल तक उसे देखती रही। उसके हाथ में पकड़ा पत्र कांप रहा था।

     

    “मेरी मां… रघुवीर सिंह की बेटी?”

     

    लड़की ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चांदनी ने तुरंत पूछा, “लेकिन मेरी मां ने मुझे कभी इसके बारे में क्यों नहीं बताया?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस कुएं के पास रखे पुराने संदूक की तरफ देखने लगी।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मेरा नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “मतलब… तुम वही लड़की हो जो सालों पहले गायब हो गई थी?”

     

    लड़की ने कुछ पल उसकी आंखों में देखा।

     

    “गायब हुई थी… लेकिन मरी नहीं थी।”

     

    गौरी ने हैरानी से पूछा, “फिर इतने साल कहां थीं?”

     

    लड़की ने कुएं की तरफ देखा।

     

    “इसका जवाब तुम्हारी मां के पास है।”

     

    चांदनी के मन में हजारों सवाल उठ रहे थे।

     

    “तुम मुझे डराने के लिए यहां क्यों आई हो?”

     

    लड़की ने कहा, “मैं तुम्हें डराने नहीं आई। मैं चाहती हूं कि तुम्हें सच पता चले। क्योंकि अब वही लोग दोबारा इस रहस्य के पीछे हैं।”

     

    “कौन लोग?”

     

    लड़की ने जवाब देने के बजाय दूर गांव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सुबह होने से पहले घर लौट जाना चाहिए।”

     

    चांदनी ने कहा, “नहीं। मैं अब बिना सच जाने वापस नहीं जाऊंगी।”

     

    लड़की ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वह धुंधली रोशनी में गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए पूछा, “ये क्या था?”

     

    चांदनी ने जमीन पर पड़े पत्र को उठाया।

     

    “मुझे मां से बात करनी होगी।”

     

    दोनों घर लौट आईं।

     

    सुबह होते ही चांदनी ने मां के सामने वह पत्र रख दिया।

     

    मां ने पत्र देखा और उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहां मिला?”

     

    “पुराने कुएं के पास।”

     

    मां ने कांपते हाथों से कुर्सी पकड़ ली।

     

    “तुम वहां भी गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुम्हें मना किया था।”

     

    चांदनी की आवाज में इस बार गुस्सा था।

     

    “आपने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम इस सब से दूर रहो।”

     

    “लेकिन मैं पहले ही इस सब के बीच आ चुकी हूं।”

     

    कुछ देर तक कमरे में खामोशी रही।

     

    फिर मां ने धीरे से कहना शुरू किया।

     

    “हां, मैं रघुवीर सिंह की बेटी हूं।”

     

    चांदनी की आंखें भर आईं।

     

    “आपने इतने साल ये बात हमसे छिपाई?”

     

    “मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    मां ने बताया कि उनका असली नाम राधिका था। बचपन में वह अपनी बड़ी बहन चांदनी के साथ उसी हवेली में रहती थीं।

     

    दोनों बहनों में बहुत प्यार था।

     

    लेकिन एक रात हवेली में अचानक हंगामा हुआ।

     

    उनके पिता किसी से बहस कर रहे थे।

     

    राधिका को उनकी बातों का मतलब समझ नहीं आया।

     

    उसी रात उनकी बड़ी बहन चांदनी गायब हो गई।

     

    “मैंने उसे बहुत ढूंढा,” राधिका ने कहा, “लेकिन वह नहीं मिली।”

     

    “फिर आप गांव में कैसे आईं?”

     

    “मेरे पिता के दोस्त ने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला। उन्होंने मेरा नाम बदल दिया ताकि कोई मुझे पहचान न सके।”

     

    चांदनी ने पूछा, “लेकिन मेरी बहन कहां थी?”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “लेकिन वह तो कल रात मेरे सामने थी।”

     

    मां अचानक चौंक गईं।

     

    “तुमने उसे देखा?”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “तो इसका मतलब… वो वापस आ गई है।”

     

    चांदनी ने पूछा, “मां, आपको किस बात का डर है?”

     

    मां ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    दादी कमरे में आईं।

     

    उन्होंने कहा, “अब इससे कुछ मत छिपाओ।”

     

    मां ने दादी की तरफ देखा।

     

    दादी बोलीं, “इतने साल हमने चुप रहकर गलती की है।”

     

    चांदनी ने कहा, “मुझे सब जानना है।”

     

    दादी ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हारे नाना का मानना था कि हवेली में सिर्फ परिवार का झगड़ा नहीं हुआ था। किसी ने उनकी संपत्ति हड़पने की कोशिश की थी।”

     

    “किसने?”

     

    “उनके सबसे करीबी आदमी ने।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्या वह आदमी अभी जिंदा है?”

     

    दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चांदनी और गौरी एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    “कौन?”

     

    दादी ने नाम लिया—

     

    “देवराज।”

     

    चांदनी ने यह नाम पहली बार सुना था।

     

    मां बोलीं, “देवराज तुम्हारे नाना का भरोसेमंद आदमी था। वह घर के सारे काम और संपत्ति के कागज संभालता था।”

     

    “और फिर?”

     

    “एक रात तुम्हारे नाना ने उसे कुछ कागजों के साथ पकड़ लिया। शायद वह संपत्ति अपने नाम करवाने की कोशिश कर रहा था।”

     

    “फिर मेरी मौसी… यानी बड़ी चांदनी?”

     

    मां ने कहा, “उसी रात वह गायब हुई।”

     

    चांदनी के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “क्या देवराज ने उसे…?”

     

    मां ने तुरंत कहा, “हमें नहीं पता। लेकिन तुम्हारे नाना ने उसके बाद देवराज पर भरोसा नहीं किया।”

     

    दादी ने कहा, “और कुछ ही दिनों बाद तुम्हारे नाना भी गायब हो गए।”

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    चांदनी को अचानक पिछली रात की बात याद आई।

     

    वह लड़की बार-बार कह रही थी कि सच उसके अपने घर में छिपा है।

     

    “मां, अगर मौसी जिंदा हैं तो वह अब तक हवेली में क्यों थीं?”

     

    मां ने कहा, “शायद वह किसी वजह से वापस नहीं आ सकीं।”

     

    तभी बाहर किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    सभी चौंक गए।

     

    चांदनी खिड़की के पास गई।

     

    बाहर आंगन में कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर एक पुराना कागज पड़ा था।

     

    चांदनी बाहर गई और उसे उठा लाई।

     

    कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह हवेली में नहीं है।”

     

    चांदनी ने कागज पलटा।

     

    पीछे एक पुराने मंदिर का नाम लिखा था।

     

    गौरी ने पूछा, “ये क्या है?”

     

    चांदनी बोली, “शायद अगला सुराग।”

     

    मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम कहीं नहीं जाओगी।”

     

    “लेकिन मां—”

     

    “नहीं!”

     

    मां की आवाज में पहली बार इतना डर था कि चांदनी चुप हो गई।

     

    दादी ने मां को देखा।

     

    “राधिका, अब इसे रोकना मुश्किल है।”

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे डर है कि अगर उसने सच जान लिया तो…”

     

    चांदनी ने पूछा, “तो क्या?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात चांदनी अपने कमरे में बैठी रही।

     

    उसके पास अब तीन चीजें थीं—पुरानी पायल, वह पत्र और मंदिर का नाम।

     

    आधी रात के करीब पायल फिर से हिली।

     

    छन…

     

    चांदनी ने उसे उठाया।

     

    इस बार पायल के नीचे एक बहुत छोटा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मुझ पर भरोसा करो। मंदिर के पीछे पुराने पीपल के पेड़ के नीचे तुम्हारे नाना का आखिरी राज है।”

     

    चांदनी ने कागज पढ़ा।

     

    तभी खिड़की के बाहर किसी की परछाईं दिखाई दी।

     

    वह तुरंत खिड़की तक गई।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन आंगन के रास्ते पर मिट्टी में पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान घर से बाहर नहीं…

     

    बल्कि घर के अंदर की तरफ जा रहे थे।

     

    चांदनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी।

     

    कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    और दरवाजे के पास एक आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “बहुत खोज लिया तुमने।”

     

    चांदनी पीछे हट गई।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    आदमी ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    “जिस सच को तुम्हारा परिवार इतने सालों से छिपाता आया है… उसे जानने की कीमत बहुत बड़ी है।”

     

    चांदनी ने हिम्मत करके पूछा—

     

    “क्या तुम देवराज हो?”

     

    आदमी कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम्हें मेरा नाम किसने बताया?”

     

    चांदनी समझ गई कि उसके सामने वही आदमी था, जिसका नाम दादी ने लिया था।

     

    लेकिन वह कुछ और पूछ पाती, उससे पहले कमरे की खिड़की जोर से बंद हुई।

     

    दीपक बुझ गया।

     

    और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूंजी—

     

    “चांदनी… भागो!”

     

    चांदनी ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वही उसकी बड़ी बहन खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    और उसकी नजर सीधे देवराज पर थी।

  • बंद कमरे का सच

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 2: बंद कमरे का सच

     

    कमरे में अचानक दीपक जलते ही चांदनी और गौरी कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गईं।

     

    अंधेरे में जो आवाज गूंजी थी, वह अभी भी उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    चांदनी ने कांपती आवाज में पूछा, “कौन हो तुम?”

     

    कमरे में कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    गौरी ने चांदनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “चांदनी, चलो यहां से। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    “पहले पता करते हैं कि ये आवाज किसकी है।”

     

    “तुम्हें हर चीज की सच्चाई जाननी जरूरी है क्या?”

     

    “हां।”

     

    गौरी ने परेशान होकर कहा, “तुम्हारी यही आदत एक दिन हमें बड़ी मुसीबत में डाल देगी।”

     

    चांदनी कुछ बोलती, उससे पहले दीपक की लौ अचानक तेज हुई।

     

    दीवार पर एक परछाईं बनी।

     

    वही लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने डरते हुए उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    इस बार कोई जवाब नहीं आया।

     

    बस परछाईं धीरे-धीरे दीवार पर आगे बढ़ी और एक पुराने चित्र के पास जाकर रुक गई।

     

    चांदनी उस चित्र के पास गई।

     

    चित्र में एक परिवार खड़ा था।

     

    एक आदमी, एक औरत और उनके बीच एक छोटी लड़की।

     

    चांदनी ने चित्र को ध्यान से देखा।

     

    उस लड़की का चेहरा देखकर वह चौंक गई।

     

    “ये तो वही लड़की है।”

     

    गौरी ने पूछा, “जिसे हमने नीचे देखा था?”

     

    चांदनी ने सिर हिलाया।

     

    चित्र के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रघुवीर सिंह का परिवार।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा, “तो इस हवेली के मालिक का नाम रघुवीर सिंह था।”

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीर हवा से हिलने लगी।

     

    तस्वीर के पीछे से एक छोटा कागज नीचे गिरा।

     

    चांदनी ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रही हो, उसका जवाब इस घर में नहीं, तुम्हारे अपने घर में छिपा है।”

     

    चांदनी की सांस रुक गई।

     

    “मेरे घर में?”

     

    गौरी बोली, “ये क्या मतलब हुआ?”

     

    चांदनी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके दिमाग में अपनी मां की बातें घूमने लगीं।

     

    मां हमेशा इस हवेली का नाम सुनते ही चुप क्यों हो जाती थीं?

     

    दादी ने भी उसे आधा सच ही क्यों बताया?

     

    और सबसे बड़ी बात—हवेली की लड़की का नाम भी चांदनी क्यों था?

     

    तभी नीचे से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    गौरी घबरा गई।

     

    “कोई अंदर आया है!”

     

    चांदनी ने दीपक उठा लिया।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकलीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गौरी ने फुसफुसाकर कहा, “जब हम आए थे तब दरवाजा बंद था।”

     

    चांदनी ने कहा, “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

     

    दोनों तेजी से नीचे आईं और हवेली से बाहर निकल गईं।

     

    घर लौटते समय चांदनी बिल्कुल चुप थी।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “मुझे लगता है मेरी मां कुछ जानती हैं।”

     

    अगली सुबह चांदनी ने मां से सीधे सवाल किया।

     

    “मां, क्या आपका इस हवेली से कोई संबंध है?”

     

    मां के हाथ रुक गए।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “क्योंकि मैं कल रात वहां गई थी।”

     

    मां के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम हवेली गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए था!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां जो हुआ था, उसे दोबारा छेड़ना ठीक नहीं है।”

     

    चांदनी की आंखें भर आईं।

     

    “मां, मुझे सच जानने का हक है।”

     

    मां कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे जन्म से पहले की बात है।”

     

    चांदनी ध्यान से सुनने लगी।

     

    “जब मैं छोटी थी, तब उस हवेली में रघुवीर सिंह का परिवार रहता था। उनकी एक बेटी थी। उसका नाम चांदनी था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात वह लड़की गायब हो गई।”

     

    “और?”

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “उस रात तुम्हारे नाना वहां गए थे।”

     

    चांदनी चौंक गई।

     

    “नाना?”

     

    “हां। उन्होंने कुछ देखा था। लेकिन उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।”

     

    “क्या देखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    चांदनी को यकीन नहीं हुआ।

     

    “मां, आप कुछ छिपा रही हैं।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं।”

     

    “किससे?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    दोनों चुप हो गईं।

     

    बाहर दादी खड़ी थीं।

     

    दादी अंदर आईं और चांदनी को देखते ही समझ गईं कि अब बात छिपाना मुश्किल है।

     

    उन्होंने कहा, “अब इसे सच बता देना चाहिए।”

     

    मां ने कहा, “लेकिन मां…”

     

    दादी बोलीं, “अगर इसे सच नहीं बताया तो ये खुद उसे ढूंढने जाएगी।”

     

    चांदनी ने दादी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपको सब पता है?”

     

    दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर उन्होंने अपनी पुरानी संदूकची खोली।

     

    उसमें से एक कपड़े में लिपटी हुई छोटी-सी चीज निकाली।

     

    वह एक चांदी की पायल थी।

     

    चांदनी ने पायल देखते ही कहा, “ये तो…”

     

    दादी बोलीं, “ये उसी लड़की की थी।”

     

    चांदनी ने पायल हाथ में ले ली।

     

    उसी पल उसे रात का दृश्य याद आया।

     

    वह लड़की सीढ़ियों पर खड़ी थी।

     

    उसके पैर में एक पायल थी।

     

    चांदनी के हाथ कांपने लगे।

     

    “लेकिन ये पायल आपके पास कैसे आई?”

     

    दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना इसे हवेली से लेकर आए थे।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन्हें लगा था कि लड़की शायद किसी मुसीबत में थी।”

     

    चांदनी ने पूछा, “क्या वह जिंदा थी?”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    “हमें कभी पता नहीं चला।”

     

    चांदनी की आंखों में डर और सवाल दोनों थे।

     

    “तो फिर हर पूर्णिमा की रात जो दिखाई देती है… वो कौन है?”

     

    दादी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात चांदनी ने पायल अपने पास रख ली।

     

    उसे नींद नहीं आई।

     

    आधी रात को अचानक पायल से हल्की-सी आवाज आई।

     

    छन…

     

    चांदनी उठकर बैठ गई।

     

    पायल खुद-ब-खुद हिल रही थी।

     

    वह डरते हुए उसके पास गई।

     

    पायल के नीचे एक छोटा कागज रखा था।

     

    उसने कागज खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पुराने कुएं के पास आओ।”

     

    चांदनी ने तुरंत खिड़की से बाहर देखा।

     

    दूर वही लड़की खड़ी थी।

     

    वह कुछ पल चांदनी को देखती रही।

     

    फिर मुड़कर गांव के पुराने कुएं की तरफ चल दी।

     

    चांदनी ने बिना किसी को जगाए घर से निकलने का फैसला किया।

     

    लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।

     

    गौरी पहले से बाहर उसका इंतजार कर रही थी।

     

    “मुझे पता था तू जाएगी।”

     

    चांदनी मुस्कुराई।

     

    “चल।”

     

    दोनों पुराने कुएं तक पहुंचीं।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर मिट्टी थोड़ी उखड़ी हुई थी।

     

    चांदनी नीचे बैठी और हाथों से मिट्टी हटाने लगी।

     

    कुछ देर बाद उसे लकड़ी का एक छोटा संदूक मिला।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक तस्वीर और एक पत्र था।

     

    तस्वीर में रघुवीर सिंह की बेटी थी।

     

    उसके साथ एक छोटी लड़की भी खड़ी थी।

     

    चांदनी ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “मेरी बेटी के बाद उसकी छोटी बहन की जिम्मेदारी मेरी दोस्त की बेटी संभालेगी।”

     

    चांदनी का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “दोस्त की बेटी?”

     

    गौरी ने पूछा, “कौन?”

     

    चांदनी ने पत्र खोला।

     

    पहली ही पंक्ति पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरी बेटी चांदनी वापस न आए, तो उसकी छोटी बहन को मेरी सबसे भरोसेमंद दोस्त के पास भेज देना।”

     

    चांदनी ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन रघुवीर सिंह की तो सिर्फ एक बेटी थी…”

     

    तभी पीछे से वही धीमी आवाज आई—

     

    “नहीं… दो बेटियां थीं।”

     

    चांदनी और गौरी ने एक साथ पीछे देखा।

     

    वही लड़की उनके सामने खड़ी थी।

     

    चांदनी की सांस अटक गई।

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

     

    चांदनी के हाथ से पत्र जमीन पर गिर गया।

     

    उसके सामने अब सिर्फ हवेली का नहीं…

     

    बल्कि उसके अपने परिवार का सबसे बड़ा राज खुलने वाला था।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 28

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 28

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 28 : अमन आखिर है कौन?

     

    पुराने रेलवे स्टेशन पर सन्नाटा पसरा हुआ था।

     

    कुछ पल पहले चली गोली की आवाज अभी भी आरव के कानों में गूंज रही थी।

     

    अमन जमीन पर गिरा हुआ था और उसके कंधे से खून बह रहा था।

     

    आरव उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “अमन!”

     

    आरोही भी उसके पास आ गई।

     

    “आरव, खून बहुत निकल रहा है।”

     

    आरव ने अपनी शर्ट का कपड़ा फाड़कर अमन के कंधे पर दबाया।

     

    “आंखें खोलो!”

     

    अमन ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    “तुम… मुझे बचा रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम मेरे भाई हो।”

     

    अमन की आंखों में दर्द के साथ एक अजीब-सी हंसी आ गई।

     

    “मैंने… तुम्हें मारने की कोशिश की।”

     

    “लेकिन मैंने नहीं की।”

     

    तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “आरव, उससे दूर हटो।”

     

    आरव तुरंत पलटा।

     

    शेखर अभी भी बंदूक पकड़े हुए थे।

     

    आरव की आंखों में अविश्वास था।

     

    “पापा… आपने इसे गोली क्यों मारी?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि ये अमन नहीं है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने भी शेखर की तरफ देखा।

     

    “आप कहना क्या चाहते हैं?”

     

    शेखर धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    “जिसे तुम अमन समझ रहे हो… वो असली अमन नहीं है।”

     

     

    आरव खड़ा हो गया।

     

    “तो असली अमन कहां है?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    “पापा!”

     

    “आरव, अभी तुम्हें मेरी बात माननी होगी।”

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज में गुस्सा था।

     

    “हर बार आप मुझे यही कहते हैं कि मुझ पर भरोसा करो। लेकिन हर बार आप कोई नया राज छुपा लेते हैं।”

     

    शेखर की आंखें झुक गईं।

     

    “मुझे मजबूर होना पड़ा।”

     

    “किसने मजबूर किया?”

     

    शेखर ने विराज की तरफ देखा।

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “विराज कहां गया?”

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    “वो यहां नहीं है।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “वो हमें यहां लाकर गायब हो गया।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुके।

     

    “इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड कोई और है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने जवाब नहीं दिया।

     

    अमन जमीन पर पड़ा सब सुन रहा था।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “शेखर…”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “तुम मुझे पहचानते हो।”

     

    शेखर उसके पास गए।

     

    “हां।”

     

    “तो फिर आरव को सच क्यों नहीं बताते?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं…”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं वही हूं… जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं अमन हूं।”

     

    शेखर अचानक चौंक गए।

     

    “नहीं!”

     

    अमन ने दर्द में मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे पहचान लिया था।”

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो फिर आपने गोली क्यों चलाई?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने फिर पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    शेखर की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “क्योंकि…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अमन तुम्हें मार देगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैं तुम्हें मारना चाहता था।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    “लेकिन अब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने अपनी मुट्ठी में पकड़ी डायरी दिखाई।

     

    “क्योंकि मेरी मां ने मुझे कुछ और सिखाया था।”

     

    अमन ने डायरी खोली।

     

    “मेरी मां ने लिखा था…”

     

    वह पढ़ने लगा।

     

    “‘अमन, अगर कभी तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन है, तो अपने दिल से पूछना कि सच में तुम्हें किसने नुकसान पहुंचाया।’”

     

    अमन की आवाज भर्रा गई।

     

    “मैंने कभी नहीं पूछा।”

     

    आरव उसके पास बैठ गया।

     

    “अब पूछो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने सालों तक तुम्हें अपना दुश्मन समझा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज ने मुझे बताया कि मेरी मां की मौत तुम्हारे परिवार की वजह से हुई।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां को मेरे परिवार ने नहीं मारा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब मुझे समझ आ रहा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे?”

     

    अमन ने डायरी का आखिरी पन्ना दिखाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी मौत का जिम्मेदार वह नहीं है जिसे तुम अपना दुश्मन समझोगे।”

     

    नीचे एक नाम आधा लिखा हुआ था।

     

    सिर्फ अक्षर दिखाई दे रहे थे—

     

    “वि…”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मैंने हमेशा इसे विराज समझा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यहां नाम पूरा नहीं है।”

    आरोही ने डायरी हाथ में ली।

     

    “ये देखो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “स्याही का रंग अलग है।”

     

    “मतलब?”

     

    “पहली लाइन पुरानी है। लेकिन ये नाम बाद में लिखा गया है।”

     

    शेखर ने तुरंत डायरी छीन ली।

     

    “इसे मुझे दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    शेखर ने पहली बार गुस्से में कहा,

     

    “आरव!”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप इतना डर क्यों रहे हैं?”

     

    शेखर की आंखों में बेचैनी थी।

     

    “क्योंकि अगर ये नाम गलत हाथों में चला गया… तो कई लोगों की जान जा सकती है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “किसका नाम है इसमें?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “आपको पता है।”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अमन की हालत बिगड़ने लगी।

     

    उसका चेहरा पीला पड़ गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “पहले इसे अस्पताल ले चलते हैं।”

     

    शेखर ने मना किया।

     

    “अस्पताल सुरक्षित नहीं है।”

     

    “तो क्या करें?”

     

    अर्जुन, जो कुछ दूरी पर खड़े थे, आगे आए।

     

    “मेरे पुराने डॉक्टर को बुलाता हूं।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “जल्दी कीजिए।”

     

    आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम आरोही हो?”

     

    “हां।”

     

    “आरव तुमसे बहुत प्यार करता है।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    अमन हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “उसकी आंखों से।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम अभी भी बातें कर रहे हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मरने से पहले कुछ अच्छी बातें कर लेने में क्या बुराई है?”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “मरने की बात मत करो।”

     

    अमन पहली बार मुस्कुराया।

     

    “ठीक है… भाई।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    उसने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “फिर से बोलो।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    आरोही उन्हें देखती रही।

     

    तभी आरव के फोन पर कॉल आया।

     

    स्क्रीन पर नाम देखकर वह चौंक गया।

     

    मां।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “हां मां?”

     

    दूसरी तरफ माधवी की घबराई हुई आवाज थी।

     

    “आरव, तुम जहां भी हो, तुरंत वहां से निकल जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “विराज तुम्हें ढूंढ रहा है।”

     

    “उसे ढूंढने दो।”

     

    “नहीं बेटा!”

     

    माधवी की आवाज कांप रही थी।

     

    “तुम्हें समझ नहीं आ रहा। विराज से भी ज्यादा खतरनाक कोई और है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “कौन?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद इंसान समझते हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर फोन कट गया।

     

    आरव ने तुरंत वापस कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मां ने कहा है कि हमारे बीच कोई ऐसा है जिस पर हमें सबसे ज्यादा भरोसा है… लेकिन वही सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरोही ने चारों तरफ देखा।

     

    अर्जुन, शेखर, कबीर, राघव…

     

    सब एक-दूसरे को देख रहे थे।

     

    अमन ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “आरव…”

     

    “हां?”

     

    “तुम्हारी मां सही कह रही हैं।”

     

    “तुम्हें पता है कौन है?”

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव उसके पास झुक गया।

     

    “कौन?”

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “जिसके पास…”

     

    वह अचानक रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लाल फाइल तो हमारे पास है।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम्हारे पास सिर्फ उसकी कॉपी है।”

     

    आरव और आरोही दोनों चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    “असली लाल फाइल…”

     

    अमन ने आंखें खोलीं।

     

    “उस इंसान के पास है।”

     

    “किस इंसान के?”

     

    अमन ने चारों तरफ देखा।

     

    उसकी नजर अचानक…

     

    कबीर पर जाकर रुक गई।

     

    कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कबीर?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “अमन क्या बकवास कर रहा है?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम्हें पता है… मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    कबीर ने बंदूक निकाल ली।

     

    आरव ने भी तुरंत अपनी बंदूक निकाल ली।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “आरव, मेरी बात सुनो।”

     

    “पहले बंदूक नीचे।”

     

    कबीर ने बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।”

     

    अमन हंसा।

     

    “फिर तुम्हारी जेब में ये क्या है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “लाल फाइल की चाबी।”

     

    आरव ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “कबीर…”

     

    कबीर चुप था।

     

    आरव ने आगे बढ़कर उसकी जेब से चाबी निकाल ली।

     

    चाबी पर वही निशान था—

     

    A-17

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “ये वही चाबी है जो कमरे नंबर 17 की थी!”

     

    कबीर ने अचानक कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव पलटा।

     

    कबीर की आंखों में आंसू थे।

     

    “मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया।”

     

    “तो फिर ये चाबी?”

     

    “मुझे ये विराज ने दी थी।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “विराज ने?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने मुझे आदेश दिया था कि अगर तुम लाल फाइल तक पहुंच जाओ…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    कबीर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “तो मुझे तुम्हें खत्म कर देना था।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    अमन उठने की कोशिश करने लगा।

     

    तभी स्टेशन के बाहर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “वो आ गए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    कबीर ने धीमे से कहा—

     

    “विराज के लोग नहीं…”

     

    “तो कौन?”

     

    कबीर ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “शेखर के लोग।”

     

    आरव धीरे-धीरे अपने पिता की तरफ मुड़ा।

     

    शेखर के चेहरे पर अजीब-सी खामोशी थी।

     

    और उसी वक्त…

     

    बाहर से एक आदमी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो… वरना ये पूरा स्टेशन उड़ा दिया जाएगा!”

     

    आरव ने अमन की तरफ देखा।

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “अब समझे… असली खेल किसका है?”

     

    जारी है।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 27

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 27

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 27 : अमन कौन है?

     

    कमरा नंबर 17 में अचानक छाया अंधेरा सबके दिलों में डर भर रहा था।

     

    कुछ पल पहले तक जहां आरव अपने कथित जुड़वां भाई के बारे में जानने की कोशिश कर रहा था, वहीं अब शेखर की बात ने सबको उलझा दिया था।

     

    “अमन तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरव ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “पापा… आप अमन को जानते हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “आप उसे जानते हैं ना?”

     

    शेखर ने धीरे से आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज में बेचैनी थी।

     

    “तो फिर वो कौन है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “ये बात मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता था।”

     

    “लेकिन अब मुझे जानना है।”

     

    “आरव…”

     

    “नहीं पापा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखते हुए कहा,

     

    “मेरी पूरी जिंदगी झूठ में बीती है। हर बार कोई न कोई मुझे बचाने के नाम पर सच छुपाता रहा। अब और नहीं।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसे सच बता दीजिए।”

     

    शेखर ने आरोही की तरफ देखा।

     

    फिर उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “अमन वही लड़का है जिसे मैंने पच्चीस साल पहले तुम्हारे सामने से उठा लिया था।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा,

     

    “जिस रात तुम्हारा जन्म हुआ था, उसी रात अस्पताल में एक और बच्चा था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरा जुड़वां?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वो अमन था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वो अस्पताल में क्यों था?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि उसकी मां भी उसी अस्पताल में भर्ती थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उसकी मां कौन थी?”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “उसका नाम था… सिया।”

     

    आरव ने पहली बार यह नाम सुना था।

     

    “सिया कौन थी?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो मेरी सबसे करीबी दोस्त थी।”

     

    राघव ने तुरंत कहा,

     

    “शेखर, क्या तुम सच में ये सब बताना चाहते हो?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “अब वक्त आ गया है।”

     

    “सिया एक बहुत बहादुर लड़की थी। उसने कई सालों तक विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”

     

    विराज ने तुरंत कहा,

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें डर है ना कि सिया का नाम फिर से सामने आ रहा है?”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    शेखर आगे बोले,

     

    “सिया के पास लाल फाइल थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “वही लाल फाइल?”

     

    “हां।”

     

    “तो वो फाइल उसके पास कैसे आई?”

     

    “सिया ने उसे चुराया नहीं था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो फाइल उसी ने तैयार की थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “मतलब उसमें विराज के सारे अपराध थे?”

     

    “हां।”

     

    विराज गुस्से में बोला,

     

    “शेखर, बहुत हो गया।”

     

    “नहीं विराज।”

     

    शेखर की आवाज मजबूत थी।

     

    “आज सच सामने आएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “सिया उस रात अपने बच्चे को जन्म देने आई थी।”

     

    “अमन?”

     

    “हां।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    “अस्पताल में आग लग गई।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “वही रात…”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “उसी रात।”

     

    “सिया ने अमन को बचाने की कोशिश की।”

     

    “क्या वो बच गई?”

     

    शेखर की आंखें नम हो गईं।

     

    “नहीं।”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो अमन?”

     

    “मैंने उसे बचाया।”

     

    “फिर?”

     

    “मैं उसे लेकर भाग गया।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि अगर विराज को पता चला कि सिया का बच्चा जिंदा है, तो वो उसे भी मार देगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “फिर आपने उसे कहां रखा?”

     

    शेखर चुप हो गए।

     

    “पापा?”

     

    “मैंने उसे एक अनाथालय में भेज दिया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपने उसे छोड़ दिया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मैं मजबूर था।”

     

    “लेकिन वो बच्चा था!”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर की आंखों में दर्द था।

     

    “कुछ साल बाद मुझे पता चला कि अमन को एक परिवार ने गोद ले लिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन सा परिवार?”

     

    शेखर ने जवाब देने से पहले विराज की तरफ देखा।

     

    विराज का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने हैरानी से विराज की तरफ देखा।

     

    “आपने अमन को गोद लिया था?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता था कि वो सिया का बच्चा है।”

     

    शेखर हंस पड़ा।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    “तुम्हें पता था।”

     

    विराज ने गुस्से में कहा,

     

    “अगर मुझे पता होता तो मैं उसे जिंदा क्यों रखता?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हें लाल फाइल चाहिए थी।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “अमन के पास फाइल थी?”

     

    “नहीं।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “लेकिन उसके पास एक चाबी थी।”

     

    “किसकी?”

     

    “उस कमरे की… जिसमें लाल फाइल छुपी थी।”

     

    आरव की नजर कमरे के चारों तरफ घूम गई।

     

    “तो अमन को चाबी के बारे में पता था?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “सिया ने चाबी उसके कपड़े में सिल दी थी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर अमन को ये सब पता चला तो?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “वो पच्चीस साल से बदला ले रहा है।”

     

    “किससे?”

     

    “विराज से।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि अमन आरव का दुश्मन है।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब अमन को लगता है कि आरव की वजह से उसकी मां मरी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरी वजह से?”

     

    “अमन को बताया गया कि उस रात तुम्हारे परिवार ने उसकी मां को मरने के लिए छोड़ दिया था।”

     

    “किसने बताया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज ने।”

     

    विराज ने तुरंत कहा,

     

    “मैंने सिर्फ वही बताया जो सच था।”

     

    शेखर बोले,

     

    “तुमने आधा सच बताया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पूरा सच क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “उस रात सिया को बचाने के लिए मैं गया था।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन वहां पहले से कोई मौजूद था।”

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “रुद्र।”

     

    सब चौंक गए।

     

    राघव ने कहा,

     

    “रुद्र वहां था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने सिया को बचाने की कोशिश की।”

     

    “तो सिया की मौत कैसे हुई?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज के आदमियों ने अस्पताल में आग लगा दी।”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    “तुम्हारे पास कोई दूसरा सच है तो बोलो।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    आरव कमरे से बाहर जाने लगा।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “कहां जा रहे हो?”

     

    “अमन को ढूंढने।”

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन कल रात उसने खुद बुलाया है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर वो मुझे दुश्मन समझता है तो मैं उसे सच बताऊंगा।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तुम्हें डर नहीं लगता?”

     

    “लगता है।”

     

    “फिर?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम साथ हो।”

     

    आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

     

    “हां।”

     

    तभी नंदिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “आरव।”

     

    आरव पलटा।

     

    “ये क्या है?”

     

    “सिया की डायरी।”

     

    सबकी नजरें उस डायरी पर टिक गईं।

     

    आरव ने डायरी ली।

     

    “ये आपके पास कैसे?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “सिया ने मुझे दी थी।”

     

    “कब?”

     

    “तुम्हारे जन्म से एक दिन पहले।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे बेटे अमन को सच बताना।”

     

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    आगे लिखा था—

     

    “अमन को कभी ये मत बताना कि उसके पिता कौन हैं।”

     

    आरव रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।

     

    “शेखर।”

     

    आरव ने चौंककर शेखर की तरफ देखा।

     

    “पापा…”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज कांप गई।

     

    “क्या अमन आपका बेटा है?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विराज भी हैरान होकर शेखर को देखने लगा।

     

    शेखर ने धीरे से सिर झुका लिया।

     

    “हां… अमन मेरा बेटा है।”

     

    आरोही के मुंह से निकला,

     

    “तो अमन… आरव का भाई नहीं?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “वो मेरा बेटा है… लेकिन उसकी मां सिया थी।”

     

    आरव स्तब्ध था।

     

    “तो आपने मुझे और उसे अलग क्यों रखा?”

     

    शेखर की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “क्योंकि अगर विराज को पता चल जाता कि तुम दोनों मेरे बच्चे हो… तो वो तुम दोनों को मार देता।”

    रात बहुत गहरी हो चुकी थी।

     

    सभी लोग हवेली के एक सुरक्षित कमरे में बैठे थे।

     

    आरव चुप था।

     

    आरोही उसके पास बैठी थी।

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    “अमन के बारे में।”

     

    “तुम उसे क्या कहोगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “भाई।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “अगर वो तुम्हें भाई मानने से इनकार कर दे?”

     

    “तो भी मैं उसे भाई मानूंगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसने अपनी मां खोई है।”

     

    आरव की आवाज भर्रा गई।

     

    “मैं नहीं चाहता कि वो अपने पिता को भी खो दे।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम सच में बहुत अच्छे हो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और तुम?”

     

    “मैं?”

     

    “तुम मेरे साथ कल चलोगी?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “क्या तुम्हें अब भी पूछने की जरूरत है?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “नहीं।”

    अगली रात दोनों पुराने रेलवे स्टेशन पहुंचे।

     

    स्टेशन कई सालों से बंद था।

     

    चारों तरफ सन्नाटा था।

     

    टूटी हुई बेंचें, जंग लगी पटरियां और अंधेरे में जलती एक पीली लाइट…

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमें बुलाया है, आएगा जरूर।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “मैं आ गया।”

     

    दोनों पलटे।

     

    एक युवक अंधेरे से बाहर आया।

     

    लंबा कद।

     

    काले कपड़े।

     

    चेहरे पर हल्की दाढ़ी।

     

    आंखों में गुस्सा।

     

    वह धीरे-धीरे उनके सामने आकर रुका।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम अमन हो?”

     

    युवक ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने आगे बढ़कर कहा,

     

    “मैं आरव हूं।”

     

    अमन हंसा।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम्हें मेरे बारे में क्या पता है?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “इतना कि तुम्हारी वजह से मेरी मां मरी।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “ये सच नहीं है।”

     

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरव ने आरोही को पीछे किया।

     

    “नहीं। जो कहना है मुझसे कहो।”

     

    अमन ने बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “तुम्हें पता है मैं कौन हूं?”

     

    “हां।”

     

    “कौन?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे पिता का बेटा।”

     

    अमन के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

     

    “तुम्हें पता चल गया?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें ये भी पता होगा कि हमारी मां कौन थी?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सिया।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुमने उसका नाम कैसे लिया?”

     

    आरव ने डायरी आगे कर दी।

     

    “ये उसकी डायरी है।”

     

    अमन ने डायरी देखते ही बंदूक नीचे कर दी।

     

    वह कांपते हाथों से डायरी लेने लगा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने पहला पन्ना पढ़ा…

     

    उसकी आंखें भर आईं।

     

    “मां…”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तुम अकेले नहीं हो।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे भाई मत कहना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने तुम्हें मारने की कसम खाई है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    अमन ने बंदूक फिर उठा ली।

     

    “और आज वो कसम पूरी होगी।”

     

    आरोही चिल्लाई—

     

    “अमन!”

     

    अमन की उंगली ट्रिगर पर थी।

     

    लेकिन तभी पीछे से किसी ने अमन पर गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    अमन के कंधे से खून निकल आया।

     

    आरव उसे संभालने के लिए दौड़ा।

     

    “अमन!”

     

    अमन जमीन पर गिर पड़ा।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    दूर खड़ा एक नकाबपोश आदमी उन्हें देख रहा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    फिर उसने अपना नकाब उतार दिया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    आरोही भी स्तब्ध रह गई।

     

    क्योंकि सामने खड़ा आदमी था—

     

    शेखर।

     

    आरव चीख उठा—

     

    “पापा… आपने अमन को गोली क्यों मारी?”

     

    शेखर ने बंदूक नीचे की।

     

    उनके चेहरे पर दर्द था।

     

    और उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि अमन वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 26 : कमरा नंबर 17 का रहस्य

     

     

    नीलगिरी हवेली के बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज लगातार करीब आती जा रही थी।

     

    लेकिन आरव के कानों में इस वक्त कुछ भी नहीं पड़ रहा था।

     

    उसके हाथ में शेखर की दी हुई छोटी-सी चाबी थी।

     

    वही चाबी…

     

    जो कमरा नंबर 17 का दरवाजा खोलने वाली थी।

     

    आरव ने अपनी मुट्ठी कस ली।

     

    उसकी नजर सामने खड़ी माधवी पर थी।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “हां बेटा…”

     

    “आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं…”

     

    वह कुछ कह पातीं, उससे पहले आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “पहले कमरा नंबर 17 देखते हैं। शायद वहां हमें सारे सवालों के जवाब मिल जाएं।”

     

    आरव ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    सभी लोग तेजी से हवेली के अंदर जाने लगे।

     

    शेखर को राघव और कबीर सहारा देकर ले जा रहे थे।

     

    उनके कंधे पर गोली लगी थी और खून अभी भी बह रहा था।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले शेखर का इलाज जरूरी है।”

     

    शेखर ने मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “आपकी हालत खराब है।”

     

    “जब तक आरव को सच नहीं मिल जाता, मैं अस्पताल नहीं जाऊंगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “पापा, आप मेरे लिए अपनी जान खतरे में मत डालिए।”

     

    शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारे लिए तो पच्चीस साल से खतरे में है।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “अब और नहीं।”

     

    शेखर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बस एक आखिरी काम।”

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    “हां।”

     

    हवेली की दूसरी मंजिल बिल्कुल सुनसान थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जाले लगे थे।

     

    गलियारे में अंधेरा था।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    आखिर में एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—

     

    कमरा नंबर 17

     

    आरव उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    उसने जेब से चाबी निकाली।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    आरव ने सच कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “मुझे भी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी खोलेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो, तब भी मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”

     

    आरव की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “चलो।”

     

    उसने चाबी ताले में डाली।

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था।

     

    यहां धूल नहीं थी।

     

    सामान करीने से रखा हुआ था।

     

    बीच में एक बड़ी लकड़ी की मेज थी।

     

    उस पर कई पुरानी फाइलें रखी थीं।

     

    दीवार पर तस्वीरें लगी थीं।

     

    आरव ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें माधवी थीं।

     

    दूसरी में शेखर।

     

    तीसरी में नंदिनी और अर्जुन।

     

    लेकिन चौथी तस्वीर देखकर आरव की सांस रुक गई।

     

    उसमें…

     

    माधवी एक नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़ी थीं।

     

    आरव धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।

     

    “ये… मैं हूं?”

     

    माधवी पीछे से कमरे में आईं।

     

    उनका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    आरव ने तस्वीर उनकी तरफ बढ़ाई।

     

    “मां, ये तस्वीर कब की है?”

     

    माधवी ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम्हारे जन्म की।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन यहां तारीख गलत क्यों है?”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने तस्वीर ध्यान से देखी।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “बच्चे के हाथ में ये निशान देखो।”

     

    आरव ने तस्वीर को करीब किया।

     

    बच्चे की कलाई पर एक छोटा सा जन्मचिह्न था।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    उसकी कलाई पर भी वही निशान था।

     

    “ये मेरा है।”

     

    मेज पर एक लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के लायक हो जाए।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना खत था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया—

     

    “आरव,

     

    अगर तुम ये खत पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मेरे पास तुमसे सच छुपाने का कोई अधिकार नहीं बचा।

     

    तुम्हारे जन्म की रात जो हुआ, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था।

     

    उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।

     

    लेकिन तुम्हें बचा लिया गया।

     

    तुम्हें एक ऐसी जगह भेजा गया जहां कोई तुम्हें पहचान न सके।

     

    तुम्हारी मां माधवी ने तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा बचाया।

     

    लेकिन इस कहानी में एक और इंसान था…

     

    जिसने तुम्हारी जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव पढ़ते-पढ़ते रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आगे क्या लिखा है?”

     

    आरव ने कांपती आवाज में पढ़ा—

     

    “वो इंसान तुम्हारा दुश्मन नहीं था।

     

    वो तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कौन?”

     

    आरव ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसके हाथ से खत लगभग गिर गया।

     

    “नंदिनी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

    आरोही ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे आगे आईं।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आपने मुझे बचाया था?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां बेटा।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”

     

    “किसने दिया था?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने जोर से पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज इस वक्त कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैंने।”

     

    आरोही पलटकर उसे देखने लगी।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही की आंखों में नफरत उतर आई।

     

    “आप मेरे पिता होकर भी इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं?”

     

    विराज कुछ नहीं बोला।

     

    आरव उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “तुमने मुझे क्यों मारना चाहा?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए खतरा थे।”

     

    “मैं तो बच्चा था।”

     

    “बच्चे नहीं… तुम्हारे नाम का अधिकार खतरा था।”

     

    विराज ने कमरे की एक तस्वीर उठाई।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारे जन्म के बाद क्या हुआ?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “शेखर ने अपनी पूरी विरासत तुम्हारे नाम कर दी।”

     

    “तो?”

     

    “और मैं उस विरासत का असली वारिस बनना चाहता था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसलिए आपने एक बच्चे को मारने का आदेश दे दिया?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    नंदिनी चीख पड़ीं,

     

    “और मैंने उसी आदेश को नकार दिया!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ी।”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “मैंने अपनी बेटी को बचाया।”

     

    “और मेरा बच्चा मुझसे छीन लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें बेटी नहीं चाहिए थी, विराज! तुम्हें सिर्फ अपनी ताकत चाहिए थी।”

     

    आरव ने मेज पर रखी दूसरी फाइल उठाई।

     

    उसके ऊपर लिखा था—

     

    “Project A-17”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    अंदर अस्पताल के दस्तावेज थे।

     

    एक पन्ने पर तीन नाम लिखे थे।

     

    बच्चा 1 — आरव

     

    बच्चा 2 — आरोही

     

    और…

     

    बच्चा 3 — अज्ञात

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तीसरा बच्चा!”

     

    रुद्र की बात सच थी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये बच्चा कौन था?”

     

    शेखर धीरे-धीरे कमरे में आए।

     

    उनके चेहरे पर दर्द था।

     

    “वही राज जिसे हमने सबसे ज्यादा छुपाया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था वो?”

     

    शेखर ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने फाइल का अगला पन्ना खोला।

     

    वहां बच्चे के पिता का नाम खाली था।

     

    लेकिन मां के नाम के सामने लिखा था—

     

    माधवी।

     

    आरव का दिल रुक गया।

     

    “मां?”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    आरव उनकी तरफ देखने लगा।

     

    “आपके… तीन बच्चे थे?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    “फिर?”

     

    “वो तीसरा बच्चा…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    माधवी ने सिर उठाया।

     

    उनकी आंखों में ऐसा दर्द था, जिसे देखकर सब खामोश हो गए।

     

    “वो बच्चा…”

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारा जुड़वां भाई था।”

     

     

    कमरे में जैसे विस्फोट हो गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मेरा… जुड़वां भाई?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “फिर वो कहां है?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “हमें लगा था वो मर गया।”

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    “लेकिन यहां लिखा है कि उसकी मौत की पुष्टि नहीं हुई।”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने फाइल अपने हाथ में ली।

     

    “यहां एक कोड है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “A-18।”

     

    शेखर का चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “ये कोड…”

     

    उन्होंने फाइल छीन ली।

     

    “ये संभव नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “A-18 का मतलब है… बच्चा जिंदा था।”

     

    आरव की सांसें तेज हो गईं।

     

    “तो मेरा भाई जिंदा था?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर कहां गया?”

     

    “उसे किसी ने अस्पताल से निकाल लिया।”

     

    “किसने?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने उनका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पापा, बताइए।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “उसका नाम…”

     

    तभी अचानक कमरे की खिड़की टूट गई।

     

    धड़ाम!

     

    एक गोली फाइल के पास आकर लगी।

     

    सब नीचे झुक गए।

     

    कबीर ने खिड़की की तरफ गोली चलाई।

     

    बाहर से कोई भागता हुआ दिखाई दिया।

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    लेकिन तभी किसी ने पीछे से आकर उसके हाथ पर वार किया।

     

    फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    आरोही चीख उठी—

     

    “आरव!”

     

    एक नकाबपोश आदमी फाइल उठाकर भागने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुको!”

     

    आरोही भी उसके पीछे भागी।

     

    गलियारे में नकाबपोश आदमी तेजी से सीढ़ियों की तरफ भाग रहा था।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।

     

    नकाबपोश ने आरव को धक्का दिया।

     

    आरव दीवार से टकराया।

     

    आरोही ने उसके हाथ से फाइल छीन ली।

     

    नकाबपोश ने आरोही को पकड़ लिया।

     

    “फाइल दो!”

     

    आरोही ने मना कर दिया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव उठकर उसकी तरफ दौड़ा।

     

    नकाबपोश ने आरोही को छोड़ दिया और खिड़की से बाहर कूद गया।

     

    आरव खिड़की तक पहुंचा।

     

    लेकिन नीचे कोई नहीं था।

     

    सिर्फ…

     

    एक छोटा सा कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अपने जुड़वां भाई को ढूंढना है तो कल रात पुराने रेलवे स्टेशन आना।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था—

     

    “अमन।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “अमन…”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कागज उसे दिया।

     

    आरोही ने पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “क्या ये तुम्हारे भाई का नाम है?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “नहीं, आरव… अमन तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरव पलटा।

     

    “तो कौन है?”

     

    शेखर की आंखों में डर था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अमन… तुम्हारा जुड़वां भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    और तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अंधेरे में किसी की आवाज गूंजी—

     

    “भाई से मिलने के लिए तैयार हो जाओ, आरव…”

     

    “क्योंकि कल रात तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा राज तुम्हारे सामने खड़ा होगा।”

     

    जारी रहेगा…

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 5

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अंधेरा इतना गहरा था कि कबीर को अपने हाथ भी दिखाई नहीं दे रहे थे।

     

    उसके कानों में सिर्फ ट्रेन के पहियों की आवाज़ थी।

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    रोहित उसके पास था।

     

    मीरा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    “मीरा!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “रोहित?”

     

    कोई आवाज़ नहीं।

     

    कबीर अकेला था।

     

    फिर सामने एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

     

    एक दरवाज़ा।

     

    दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

     

    आखिरी स्टेशन।

     

    कबीर ने दरवाज़ा खोला।

     

    सामने एक प्लेटफॉर्म था।

     

    लेकिन यह देवगढ़ स्टेशन नहीं था।

     

    प्लेटफॉर्म पर हजारों पुराने टिकट पड़े थे।

     

    दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई यात्री था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    और कुछ कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    अचानक पीछे से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया।”

     

    कबीर ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    उसके साथ रघुवीर भी था।

     

    लेकिन रोहित नहीं था।

     

    “रोहित कहाँ है?”

     

    मीरा ने नीचे देखा।

     

    “वह वापस चला गया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो हम भी वापस जा सकते हैं?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कैसे?”

     

    मीरा ने सामने एक पुराना रेलवे सिग्नल दिखाया।

     

    “उसे लाल से हरा करना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “इसके लिए किसी एक को यहाँ रहना होगा।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    रघुवीर आगे आया।

     

    “इस बार मैं रहूँगा।”

     

    मीरा ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “बहुत देर कर दी आपने।”

     

    रघुवीर की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोली।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “लेकिन इस ट्रेन को खत्म कैसे करेंगे?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ट्रेन किसी इंजन से नहीं चलती।”

     

    “फिर?”

     

    “यह डर से चलती है।”

     

    कबीर समझ नहीं पाया।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “जब कोई इंसान डरकर इसकी बात मानता है, ट्रेन मजबूत होती है। जब कोई इसके सामने खड़ा होकर कहता है कि उसे डर नहीं लगता, ट्रेन कमजोर होने लगती है।”

     

    कबीर ने सामने देखा।

     

    काली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।

     

    उसकी खिड़कियों से दर्जनों चेहरे उसे देख रहे थे।

     

    फिर वही बिना चेहरे वाली आकृति ट्रेन से बाहर निकली।

     

    वह धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ी।

     

    उसकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    उसने भारी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम वापस नहीं जा सकते।”

     

    कबीर का शरीर काँपने लगा।

     

    लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुमने मेरा टिकट स्वीकार किया।”

     

    कबीर ने अपनी जेब से टिकट निकाला।

     

    उस पर अब लिखा था—

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    लेकिन नीचे एक नई लाइन दिखाई दी—

     

    “स्थिति — मृत।”

     

    कबीर ने टिकट को देखा।

     

    फिर उस आकृति की तरफ।

     

    “अगर मैं मर चुका हूँ…”

     

    उसने टिकट फाड़ दिया।

     

    “…तो मैं डर क्यों रहा हूँ?”

     

    आकृति कुछ पल के लिए स्थिर हो गई।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    कबीर ने जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हारा यात्री नहीं हूँ!”

     

    ट्रेन हिलने लगी।

     

    सभी खिड़कियाँ काँपने लगीं।

     

    अंदर बैठे यात्रियों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति पीछे हट गई।

     

    कबीर ने और जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हें स्वीकार नहीं करता!”

     

    ट्रेन की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “सिग्नल!”

     

    कबीर दौड़कर सिग्नल के पास पहुँचा।

     

    लेकिन सिग्नल तक पहुँचने से पहले जमीन पर दर्जनों हाथ निकल आए।

     

    उन्होंने कबीर के पैर पकड़ लिए।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    वे सभी उसे नीचे खींच रहे थे।

     

    “हमें छोड़कर मत जाओ!”

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    “हम अकेले नहीं रहना चाहते!”

     

    कबीर ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।

     

    तभी रघुवीर दौड़कर आया।

     

    उसने उन हाथों को रोक लिया।

     

    “भागो!”

     

    कबीर ने सिग्नल पकड़ लिया।

     

    वह जाम था।

     

    उसने पूरी ताकत लगाई।

     

    सिग्नल हिला।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    फिर अचानक—

     

    क्लिक!

     

    लाल बत्ती हरी हो गई।

     

    पूरे स्टेशन में एक भयानक चीख गूँज उठी।

     

    ट्रेन के पहिए अपने आप घूमने लगे।

     

    काली आकृति चीखती हुई ट्रेन की तरफ खिंचने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    उसने कबीर की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी मीरा उसके सामने आ गई।

     

    “अब यह तुम्हारा घर नहीं है।”

     

    आकृति ने मीरा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    रघुवीर बीच में आ गया।

     

    “मेरी बेटी को छोड़ दो!”

     

    एक तेज़ रोशनी चमकी।

     

    और अगले ही पल रघुवीर और वह आकृति दोनों गायब हो गए।

     

    ट्रेन भी धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    मीरा कबीर की तरफ देखने लगी।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और तुम?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरा स्टेशन आ गया है।”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

     

    लेकिन उसका हाथ हवा से गुजर गया।

     

    मीरा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “भैया… अगर कभी रात में कोई ट्रेन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए…”

     

    “हाँ?”

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    इतना कहकर मीरा भी गायब हो गई।

     

    अचानक कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं—

     

    वह देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर पड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल रहा था।

     

    रोहित उसके पास बैठा था।

     

    “कबीर!”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। लेकिन तू पूरी रात गायब था।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    सुबह के 7:30 बजे थे।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    “ट्रेन खत्म हो गई?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “कौन-सी ट्रेन?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कुछ याद नहीं?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने सब कुछ बताना शुरू किया।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर प्लेटफॉर्म की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक नया पोस्टर लगा था।

     

    “देवगढ़ स्टेशन पर नया प्लेटफॉर्म नंबर 4 अगले महीने शुरू होगा।”

     

    कबीर ने पोस्टर को देखा।

     

    उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—

     

    “12:15 — पहली ट्रेन।”

     

    कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रोहित…”

     

    “क्या?”

     

    “चल यहाँ से।”

     

    दोनों स्टेशन से बाहर निकलने लगे।

     

    तभी पीछे से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर रुक गया।

     

    रोहित ने कहा—

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहित कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    “क्योंकि मैं भी उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    रोहित ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    उसकी हथेली पर एक पुराना टिकट था।

     

    यात्री — रोहित वर्मा

     

    सीट — 13

     

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर के चेहरे से सारी उम्मीद खत्म हो गई।

     

    दूर स्टेशन की घड़ी ने 12:15 बजाए।

     

    लेकिन सुबह के 7:30 बजे।

     

    और उसी समय प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर एक ट्रेन आकर रुकी।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया… इस बार अकेले मत आना।”

     

    ट्रेन की सारी खिड़कियों में एक साथ चेहरे दिखाई दिए।

     

    उनमें एक चेहरा कबीर का था।

     

    दूसरा रघुवीर का।

     

    तीसरा मीरा का।

     

    और चौथा—

     

    रोहित का।

     

    कबीर ने आखिरी बार ट्रेन की तरफ देखा।

     

    फिर अंधेरे में एक बोर्ड चमका—

     

    “आखिरी ट्रेन कभी खत्म नहीं होती।”

     

    और ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।

     

    समाप्त।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

     

    कमरे में गूँजती आवाज़ के साथ ही कबीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।

     

    वह और रोहित किसी गहरी खाई में गिरने लगे।

     

    कबीर ने चीखते हुए रोहित का हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों नीचे गिरते रहे।

     

    फिर अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    कबीर किसी कठोर चीज़ पर आकर गिरा।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    वह एक ट्रेन के अंदर था।

     

    रोहित उसके पास पड़ा था।

     

    दोनों उठने की कोशिश करने लगे।

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    वह वही ट्रेन थी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही पीली रोशनी।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन चल रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    रोहित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “हम कहाँ हैं?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर सीट नंबर 13 पर गई।

     

    सीट खाली थी।

     

    फिर पीछे से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    वह मुड़ा।

     

    वही बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    रघुवीर सिंह।

     

    लेकिन अब उसका चेहरा बूढ़ा नहीं था।

     

    वह लगभग तीस साल का दिखाई दे रहा था।

     

    “आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “मैंने नहीं बुलाया।”

     

    “तो कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर देखा।

     

    “वह।”

     

    “कौन वह?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने कबीर को एक पुराना कागज़ दिया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    कागज़ पर रघुवीर की लिखावट थी।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    कबीर ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    फिर अचानक ट्रेन जोर से हिली।

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।

     

    उनकी आँखें बंद थीं।

     

    रघुवीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “जब तक ट्रेन रुक न जाए, किसी यात्री से बात मत करना।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वे यात्री नहीं हैं।”

     

    रोहित ने धीरे से पूछा—

     

    “तो ये लोग कौन हैं?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी का आखिरी सफर पूरा नहीं किया।”

     

    अचानक सामने बैठे एक आदमी ने आँखें खोल दीं।

     

    उसने कबीर को देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें भी देर हो गई।”

     

    रघुवीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “चुप!”

     

    आदमी ने अपना सिर झुका लिया।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद सभी यात्रियों ने अपनी आँखें खोल दीं।

     

    एक साथ।

     

    तेरहों की आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    कबीर ने गिनना शुरू किया।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    बारह…

     

    वह रुक गया।

     

    सिर्फ बारह यात्री थे।

     

    तेरहवीं सीट खाली थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “वह सीट हमेशा खाली रहती है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस दिन कोई उस पर बैठता है, ट्रेन उसे अपना बना लेती है।”

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    हर बार रोशनी वापस आती तो सीट नंबर 13 पर कोई अलग चीज़ दिखाई देती।

     

    पहली बार खाली।

     

    दूसरी बार एक लाल फ्रॉक।

     

    तीसरी बार एक छोटी बच्ची।

     

    मीरा।

     

    वह सीट पर बैठी थी।

     

    कबीर ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मीरा!”

     

    रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उससे बात मत करो!”

     

    लेकिन मीरा ने खुद कबीर की तरफ देखा।

     

    “भैया… पापा झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रघुवीर का चेहरा बदल गया।

     

    “मीरा!”

     

    बच्ची ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मुझे बंद किया था।”

     

    कबीर ने रघुवीर की तरफ देखा।

     

    “क्या यह सच है?”

     

    रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    रोहित ने गुस्से में पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रेन क्या चाहती है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “एक जीवित बच्चा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    रघुवीर ने आगे कहा—

     

    “हर साल 15 अगस्त की रात यह ट्रेन आती थी। पहले यह सिर्फ एक यात्री ले जाती थी। फिर हर साल इसकी भूख बढ़ती गई।”

     

    “तो मीरा?”

     

    “मैंने उसे ट्रेन से बचाने के लिए पुराने कमरे में छिपा दिया था।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन वह गायब कैसे हुई?”

     

    रघुवीर की आवाज़ टूट गई।

     

    “क्योंकि ट्रेन मेरे घर तक पहुँच गई।”

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “पापा ने दरवाज़ा खोला था।”

     

    रघुवीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “और फिर?”

     

    “ट्रेन ने मीरा को ले लिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर आपने क्या किया?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने ट्रेन से सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “मैंने कहा कि अगर वह मीरा को वापस कर देगी, तो मैं हर साल एक यात्री उसे दे दूँगा।”

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “आपने लोगों को मरने के लिए भेजा?”

     

    रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    यात्रियों के चेहरे धीरे-धीरे बदलने लगे।

     

    उनमें से एक आदमी ने कहा—

     

    “हममें से किसी ने टिकट नहीं खरीदा था।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हमारे नाम उसने चुने थे।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हर साल एक।”

     

    कबीर को अचानक सब समझ आने लगा।

     

    यह ट्रेन यात्रियों को नहीं चुनती थी।

     

    कोई उसे यात्री देता था।

     

    और वह व्यक्ति था—

     

    रघुवीर।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो इस बार आपने मुझे चुना?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की तरफ देखा।

     

    “इस बार उसने खुद चुना है।”

     

    अचानक ट्रेन के पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    काला धुआँ पूरे डिब्बे में फैलने लगा।

     

    मीरा सीट से उतर गई।

     

    उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, हमें भागना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “ट्रेन के इंजन तक।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वहीं उसकी मौत है।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “किसकी?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    अंधेरे में एक विशाल आकृति खड़ी थी।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    लेकिन चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो लाल आँखें।

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ट्रेन की।”

     

    रघुवीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    कबीर, रोहित और मीरा आगे की ओर दौड़े।

     

    लेकिन पीछे से यात्रियों की आवाज़ आने लगी।

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    कबीर रुका।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    बारहों यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे।

     

    वे सभी अब इंसानों जैसे नहीं दिख रहे थे।

     

    उनके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    उनमें से एक ने हाथ बढ़ाया।

     

    “हमें इस ट्रेन से बाहर निकालो…”

     

    कबीर ने मीरा की तरफ देखा।

     

    मीरा रो रही थी।

     

    “भैया… अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया तो हम भी हमेशा के लिए यहीं रह जाएँगे।”

     

    तीनों इंजन की ओर दौड़े।

     

    ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक पार करते हुए वे सबसे आगे पहुँचे।

     

    इंजन के दरवाज़े पर वही काली आँखों वाला आदमी खड़ा था।

     

    कबीर रुक गया।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।

     

    फिर उसने अपना चेहरा बदला।

     

    पहले वह बूढ़ा बना।

     

    फिर मीरा।

     

    फिर रोहित।

     

    और अंत में—

     

    कबीर।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें पता है असली कबीर कौन है?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    वह नकली कबीर हँसने लगा।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि तुम असली हो?”

     

    अचानक रोहित ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात सुन।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर हम तीनों यहाँ हैं… तो बाहर कौन है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसी क्षण ट्रेन की खिड़की से बाहर उसे प्लेटफॉर्म दिखाई दिया।

     

    वहाँ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिख रहा था।

     

    और उसके हाथ में कैमरा था।

     

    वह ट्रेन की तस्वीर ले रहा था।

     

    फिर उसने कैमरा नीचे किया और सीधे खिड़की की तरफ देखा।

     

    कबीर ने पहचान लिया।

     

    वह वही कबीर था जो उसे पहले तस्वीरों में दिखाई देता था।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    और उसके हाथ में एक टिकट था।

     

    सीट नंबर 13।

     

    मीरा ने कबीर से कहा—

     

    “भैया… वह असली है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो मैं कौन हूँ?”

     

    मीरा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आप… इस ट्रेन के अगले यात्री हो।”

     

    और तभी ट्रेन की सीटी बजी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

     

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 3

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सुबह के लगभग सात बजे कबीर देवगढ़ स्टेशन से बाहर निकला, लेकिन उसके कदम आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे।

     

    उसके हाथ में अभी भी वही तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वह खुद प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा था। उसके पीछे वही रहस्यमयी ट्रेन खड़ी थी और खिड़की के अंदर लाल कपड़े पहने एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    कबीर ने तस्वीर को कई बार देखा।

     

    फिर उसने उसे डिलीट कर दिया।

     

    लेकिन कुछ सेकंड बाद वही तस्वीर दोबारा उसकी गैलरी में दिखाई देने लगी।

     

    कबीर का दिल बैठ गया।

     

    उसने फोन बंद कर दिया।

     

    “यह सब मेरे दिमाग का वहम है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन तभी उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    समय था—

     

    12:15 PM

     

    और स्क्रीन पर एक शब्द लिखा था—

     

    “आओ।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन बंद कर दिया।

     

    वह स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आया। वहाँ एक ऑटो खड़ा था।

     

    “शहर चलोगे?” कबीर ने पूछा।

     

    ऑटो वाले ने उसकी तरफ देखा और तुरंत सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    ड्राइवर ने स्टेशन की तरफ देखा।

     

    “आप रात में प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर गए थे?”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    ड्राइवर ने डरते हुए कहा—

     

    “तो फिर मेरे ऑटो में मत बैठिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ऐसे लोग ज्यादा दूर नहीं जाते।”

     

    यह सुनकर कबीर पीछे हट गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने ऑटो स्टार्ट किया और तेज़ी से वहाँ से चला गया।

     

    कबीर सड़क किनारे अकेला खड़ा रह गया।

     

    कुछ देर बाद उसे एक बस मिली और वह शहर लौट आया।

     

    घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले रोहित को बुलाया।

     

    रोहित ने कबीर को देखते ही पूछा—

     

    “तू ठीक है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “सब कुछ शुरू से बता।”

     

    कबीर ने उसे ट्रेन, बूढ़े आदमी, बच्ची और टिकट की पूरी कहानी बताई।

     

    रोहित ध्यान से सुनता रहा।

     

    फिर उसने लैपटॉप खोला।

     

    “मैंने कल रात से उस ट्रेन के बारे में खोजबीन की है।”

     

    उसने स्क्रीन पर एक पुरानी अखबार की कटिंग दिखाई।

     

    शीर्षक था—

     

    “देवगढ़ स्टेशन से 13 यात्री रहस्यमय तरीके से लापता।”

     

    खबर की तारीख थी—

     

    16 अगस्त 2001।

     

    कबीर ने खबर पढ़नी शुरू की।

     

    15 अगस्त की रात देवगढ़ स्टेशन पर एक ट्रेन आई थी।

     

    ट्रेन का कोई नंबर नहीं था।

     

    उसमें तेरह यात्री सवार हुए थे।

     

    सुबह स्टेशन पर ट्रेन तो मिली, लेकिन उसमें कोई यात्री नहीं था।

     

    सिर्फ तेरह पुराने टिकट मिले थे।

     

    रेलवे ने इसे दुर्घटना मानकर मामला बंद कर दिया।

     

    लेकिन उसी खबर में एक और बात लिखी थी।

     

    स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह की आठ वर्षीय बेटी मीरा भी उस रात गायब हुई थी।

     

    कबीर ने तुरंत पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। वही बच्ची।”

     

    “तो वह ट्रेन में गई थी?”

     

    “शायद।”

     

    रोहित ने दूसरी फाइल खोली।

     

    उसमें एक पुरानी फोटो थी।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    कबीर की साँस अटक गई।

     

    “यही है।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “इसका नाम मीरा सिंह था।”

     

    कबीर ने फोटो को ध्यान से देखा।

     

    मीरा की आँखें बिल्कुल सामान्य थीं।

     

    लेकिन फोटो के पीछे किसी ने पेंसिल से लिखा था—

     

    “मीरा कभी ट्रेन में नहीं गई थी।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “फिर?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “यही सबसे बड़ा रहस्य है।”

     

    उसने एक और दस्तावेज़ खोला।

     

    यह पुलिस की पुरानी रिपोर्ट थी।

     

    रिपोर्ट में लिखा था कि मीरा के गायब होने से पहले स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह ने पुलिस को बताया था कि उसे कई दिनों से एक अजीब ट्रेन दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन उस समय रेलवे अधिकारियों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

     

    रघुवीर का दावा था कि ट्रेन हमेशा 12:15 पर आती थी।

     

    और हर बार उसकी खिड़की में एक बच्ची दिखाई देती थी।

     

    वही बच्ची।

     

    मीरा।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा तो पहले से गायब हो चुकी थी?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “यही तो सवाल है।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर कबीर को अपने बैग में कुछ महसूस हुआ।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे बाहर निकाला।

     

    टिकट पर लिखा था—

     

    देवगढ़ से — अज्ञात स्थान

     

    यात्री — मीरा

     

    सीट — 13

     

    कबीर ने टिकट देखते ही उसे फेंक दिया।

     

    लेकिन टिकट जमीन पर गिरने के बजाय सीधे मेज पर जा गिरा।

     

    और उसके ऊपर एक नया शब्द उभर आया—

     

    “मुझे ढूँढो।”

     

    रोहित ने पीछे हटते हुए कहा—

     

    “इसे मत छूना।”

     

    लेकिन कबीर ने टिकट उठा लिया।

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर तेज़ हवा चलने लगी।

     

    फिर किसी बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    कबीर जम गया।

     

    आवाज़ कमरे के अंदर से आई थी।

     

    “भैया… मुझे घर जाना है।”

     

    रोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “कबीर… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन कबीर ने पीछे देख लिया।

     

    कमरे के दरवाज़े के पास मीरा खड़ी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    चेहरा सफेद।

     

    आँखें काली।

     

    कबीर ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तुम चाहती क्या हो?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे घर जाना है।”

     

    “तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    उसने हाथ उठाकर खिड़की की ओर इशारा किया।

     

    “ट्रेन में।”

     

    कबीर ने डरते हुए पूछा—

     

    “तुम ट्रेन में क्यों हो?”

     

    मीरा का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि पापा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    रोहित ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “रघुवीर ने।”

     

    कबीर को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “लेकिन रघुवीर तुम्हारे पिता थे।”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उन्होंने तुम्हें ट्रेन में क्यों बंद किया?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना खिलौना जमीन पर रख दिया।

     

    खिलौने के अंदर से एक पुरानी चाबी निकली।

     

    “प्लेटफॉर्म के नीचे कमरा है।”

     

    कबीर ने चाबी उठाई।

     

    मीरा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    “वहाँ सबूत है।”

     

    “किस चीज़ का?”

     

    मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    “उस रात ट्रेन में कौन गया था… और कौन नहीं गया था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    कमरे की लाइटें वापस जल गईं।

     

    रोहित ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “हमें पुलिस को बताना चाहिए।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “पहले हमें वह कमरा ढूँढना होगा।”

     

    रात तक दोनों देवगढ़ स्टेशन वापस पहुँच गए।

     

    इस बार वे प्लेटफॉर्म नंबर 3 के नीचे बने पुराने हिस्से में गए।

     

    वहाँ जंग लगा एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    कबीर ने चाबी लगाई।

     

    क्लिक!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    सीढ़ियों से बदबू आ रही थी।

     

    जैसे वहाँ वर्षों से कोई बंद पड़ा हो।

     

    दोनों टॉर्च जलाकर नीचे उतरने लगे।

     

    नीचे एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में एक यात्री था।

     

    कबीर एक-एक करके तस्वीरें देखने लगा।

     

    कुछ चेहरे पुराने थे।

     

    कुछ नए।

     

    लेकिन हर तस्वीर के नीचे एक तारीख थी।

     

    2001…

     

    2005…

     

    2012…

     

    2018…

     

    2024…

     

    कबीर अचानक रुक गया।

     

    आखिरी तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक खाली कुर्सी थी।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “यात्री अभी बाकी है।”

     

    रोहित ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कबीर… इधर देख।”

     

    कमरे के दूसरे कोने में एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “इस ट्रेन में तेरह यात्री नहीं जाते।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “हर बार बारह जाते हैं।”

     

    कबीर ने पन्ना पलटा।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “तेरहवाँ यात्री हमेशा वही होता है जिसे ट्रेन खुद चुनती है।”

     

    कबीर की नजर आखिरी लाइन पर गई।

     

    उसका दिल रुक-सा गया।

     

    क्योंकि वहाँ आज की तारीख के सामने नाम लिखा था—

     

    कबीर शर्मा।

     

    अचानक ऊपर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “लेकिन अभी तो 11:50 हैं!”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:14।

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    दोनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

     

    ऊपर से किसी ने उसे बाहर से बंद कर दिया था।

     

    फिर कमरे में अंधेरा हो गया।

     

    कबीर ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर अंधेरे में किसी ने फुसफुसाया—

     

    “सीट नंबर 13 तैयार है।”

     

    कबीर ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कमरे के बीचों-बीच वही पुरानी कुर्सी अब मौजूद नहीं थी।

     

    उसकी जगह एक रेलवे सीट थी।

     

    और सीट पर कोई बैठा था।

     

    कबीर जैसा चेहरा।

     

    काली आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “इस बार तुम नहीं बचोगे।”

     

    ऊपर से ट्रेन की सीटी बजी।

     

    12:15।

     

    और बंद कमरे के अंदर अचानक ट्रेन चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    कबीर ने नीचे देखा।

     

    फर्श गायब हो चुका था।

     

    उसके नीचे सिर्फ काला अंधेरा था।

     

    और उसी अंधेरे से दर्जनों आवाज़ें एक साथ आईं—

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    कबीर कुछ देर तक प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ा रहा।

     

    ट्रेन जा चुकी थी।

     

    लेकिन उसके कानों में अभी भी पहियों की आवाज़ गूँज रही थी।

     

    उसने अपने हाथ में पकड़े टिकट को फिर से देखा।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

    सीट — 13

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर की उंगलियाँ काँप रही थीं।

     

    “यह किसी का मज़ाक है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ में खुद उसे भी भरोसा नहीं था।

     

    कुछ देर पहले जिस बूढ़े आदमी से उसकी बात हुई थी, वह अचानक गायब हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर उसके अलावा कोई नहीं था।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क वापस आ चुका था।

     

    उसने तुरंत अपने दोस्त रोहित को फोन लगाया।

     

    एक बार घंटी गई।

     

    दो बार।

     

    तीन बार।

     

    फिर कॉल उठ गई।

     

    “हाँ कबीर?”

     

    रोहित की आवाज़ नींद में डूबी हुई थी।

     

    कबीर ने जल्दी-जल्दी सारी घटना बताई।

     

    कुछ सेकंड तक रोहित चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “तू अभी देवगढ़ स्टेशन पर है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तुरंत वहाँ से निकल।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने अभी तेरे नंबर से एक फोटो रिसीव की है।”

     

    कबीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “क्या फोटो?”

     

    रोहित ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ सेकंड बाद कबीर के मोबाइल पर वही फोटो आ गई।

     

    कबीर ने फोटो खोली।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    फोटो में वही ट्रेन थी।

     

    लेकिन इस बार तस्वीर बाहर से नहीं ली गई थी।

     

    तस्वीर ट्रेन के अंदर से ली गई थी।

     

    और तस्वीर में सीट नंबर 13 पर कोई बैठा हुआ था।

     

    कबीर।

     

    वह खुद।

     

    उसने वही काली जैकेट पहन रखी थी।

     

    वही घड़ी।

     

    वही बैग।

     

    लेकिन तस्वीर में बैठा कबीर कैमरे की तरफ नहीं देख रहा था।

     

    वह खिड़की के बाहर देख रहा था।

     

    कबीर ने घबराकर मोबाइल नीचे कर लिया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    “फोटो किसने भेजी?”

     

    “तेरे ही नंबर से।”

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    तभी प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कबीर ने धीरे से सिर उठाया।

     

    अंधेरे में कोई उसकी ओर आ रहा था।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा कुछ नहीं बोला।

     

    वह उसके पास आया और धीरे से बोला—

     

    “तुमने टिकट उठा लिया।”

     

    कबीर ने टिकट जेब में रख लिया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब वह तुम्हें ढूँढ रही है।”

     

    “कौन?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म के पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    “ट्रेन की मालकिन।”

     

    कबीर ने घबराकर पूछा, “कौन है वह?”

     

    बूढ़े ने जवाब देने के बजाय पूछा—

     

    “तुमने ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “अच्छा हुआ।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बैठा है, वह यात्री नहीं है।”

     

    अचानक स्टेशन की सारी लाइटें फिर से बुझ गईं।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    बूढ़ा सामने खड़ा था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर डर था।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “क्योंकि अगली ट्रेन आने वाली है।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:28।

     

    “लेकिन ट्रेन तो अभी गई है।”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वह ट्रेन नहीं थी।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “वह सिर्फ उसका रास्ता था।”

     

    अचानक पटरी के नीचे से आवाज़ आई।

     

    जैसे लोहे के नीचे कोई चीज़ खरोंच रही हो।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    कबीर और बूढ़ा दोनों पीछे हट गए।

     

    फिर पटरी के बीच से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ ऊपर उठकर एक इंसानी आकार बनाने लगा।

     

    धीरे-धीरे उस धुएँ में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    एक औरत का चेहरा।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    वह कुछ कह रही थी।

     

    कबीर ने ध्यान से सुना।

     

    “सीट… नंबर… तेरह…”

     

    कबीर की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    उसने जेब से टिकट निकालकर फाड़ना चाहा।

     

    लेकिन टिकट फट नहीं रहा था।

     

    उसने दोनों हाथों से जोर लगाया।

     

    कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर टिकट पर लिखे शब्द बदलने लगे।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    धीरे-धीरे नाम गायब हुआ।

     

    उसकी जगह नया नाम दिखाई दिया—

     

    यात्री — रघुवीर सिंह

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “रघुवीर सिंह कौन है?”

     

    बूढ़े ने कुछ नहीं कहा।

     

    कबीर ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “बताइए!”

     

    बूढ़े ने आखिरकार कहा—

     

    “इस स्टेशन का पहला स्टेशन मास्टर।”

     

    “और?”

     

    “पच्चीस साल पहले उसकी बेटी ट्रेन में गायब हुई थी।”

     

    “कौन-सी ट्रेन में?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म नंबर 3 की ओर देखा।

     

    “इसी ट्रेन में।”

     

    अचानक दूर से सीटी की आवाज़ आई।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने देखा।

     

    इस बार ट्रेन पटरी पर नहीं आ रही थी।

     

    वह अंधेरे के अंदर से जैसे हवा में तैरती हुई प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थी।

     

    उसकी खिड़कियों में कोई रोशनी नहीं थी।

     

    सिर्फ एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    बूढ़े ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर की तरफ दौड़ने लगे।

     

    लेकिन कुछ कदम बाद कबीर रुक गया।

     

    उसे किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ प्लेटफॉर्म नंबर 3 से आ रही थी।

     

    फिर वही आवाज़ आई—

     

    “माँ… मुझे घर जाना है…”

     

    कबीर ने पीछे देखा।

     

    ट्रेन खड़ी थी।

     

    उसका दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    दरवाज़े पर लगभग आठ साल की एक बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने लाल फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना खिलौना था।

     

    वह सीधे कबीर को देख रही थी।

     

    “भैया…”

     

    कबीर कुछ नहीं बोला।

     

    बच्ची ने पूछा—

     

    “क्या आप मुझे घर छोड़ देंगे?”

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “उसकी तरफ मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    उसके चेहरे की त्वचा धीरे-धीरे काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें खुलीं।

     

    आँखों की जगह सिर्फ गहरा अंधेरा था।

     

    और उसके मुँह से इंसानी आवाज़ नहीं निकली।

     

    एक भारी, गहरी आवाज़ आई—

     

    “सीट नंबर 13 खाली है।”

     

    ट्रेन का दरवाज़ा अचानक पूरी तरह खुल गया।

     

    अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    फिर सभी ने एक साथ कहा—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

     

    वही आदमी।

     

    जो बिल्कुल उसके जैसा दिखता था।

     

    काली आँखें।

     

    चेहरे पर मुस्कान।

     

    उसने कबीर के कान के पास आकर कहा—

     

    “एक कबीर ट्रेन में जा चुका है।”

     

    फिर उसने अपनी उंगली कबीर की ओर की।

     

    “अब दूसरे की बारी है।”

     

    कबीर चीखकर भागा।

     

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    उसके जूते के फीते नहीं थे।

     

    उनकी जगह काले बालों की लंबी लटें उसके पैरों से लिपटी थीं।

     

    वे बाल पटरी के नीचे से निकल रहे थे।

     

    कबीर ने पूरी ताकत से पैर छुड़ाया।

     

    और अचानक वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 3 खाली था।

     

    ट्रेन गायब थी।

     

    बूढ़ा भी गायब था।

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    वह खड़ा हुआ और स्टेशन से बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसकी नजर स्टेशन की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में स्टेशन के पुराने कर्मचारी खड़े थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2001

     

    कबीर की नजर तस्वीर के बीच में खड़े एक आदमी पर टिक गई।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही कपड़े।

     

    वही आँखें।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    रघुवीर सिंह — स्टेशन मास्टर

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि तस्वीर में रघुवीर सिंह की उम्र लगभग तीस साल थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लाल स्याही से किसी ने लिखा था—

     

    “वह आज भी अपनी बेटी का इंतज़ार कर रहा है।”

     

    उसी क्षण कबीर के मोबाइल में एक नया मैसेज आया।

     

    मैसेज उसी अज्ञात नंबर से था।

     

    सिर्फ एक लाइन—

     

    “आज रात 12:15 बजे सीट नंबर 13 पर बैठना मत भूलना।”

     

    और उसके नीचे एक तस्वीर थी।

     

    कबीर ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वह खुद स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा हुआ था।

     

    लेकिन तस्वीर में रात नहीं थी।

     

    तस्वीर में सुबह थी।

     

    और उसके पीछे खड़ी ट्रेन की खिड़की से एक छोटी बच्ची उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।