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  • अनजानी गलती

    अनजानी गलती

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    कहानी की शुरुआत एक छोटे से गाँव, “आकाशपुर”, से होती है। यहाँ पर एक युवा लड़का, आर्यन, अपने माता-पिता के साथ रहता था। आर्यन का दिल बड़ा और उसका मन अपनी कला में गहराई से डूबा हुआ था। वह ख्वाबों में खोकर पेंटिंग बनाता था और अक्सर अपने गाँव की खूबसूरत नजारों को कैनवास पर उतारता था।

    एक दिन, आर्यन ने अपने गाँव में एक कला प्रदर्शनी आयोजित करने का निर्णय लिया। उसने अपनी सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग्स तैयार कीं और गाँव के बच्चों को आमंत्रित किया ताकि वे भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें। प्रदर्शनी का दिन नजदीक आया, और गाँव के लोग इसमें शामिल होने के लिए उत्सुक थे। आर्यन ने गाँव के सभी बच्चों के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें विजेताओं को इनाम दिए जाने थे।

    प्रदर्शनी के दिन, पूरा गाँव वहाँ मौजूद था। आर्यन ने अपनी पेंटिंग्स दिखाई, और सभी ने उसे सराहा। प्रतियोगिता के दौरान, गाँव के एक छोटे लड़के, सागर, ने अपनी पेंटिंग प्रस्तुत की। सागर की पेंटिंग में जीवन की गहराई और भावनाएँ भरी हुई थीं। आर्यन को सागर की पेंटिंग बहुत पसंद आई, लेकिन वह खुद को एक प्रसिद्ध आर्टिस्ट बनाने के ख्वाब में इतना डूबा हुआ था कि उसने सागर की पेंटिंग को सही से नहीं समझा।

    जब आर्यन ने सागर को प्रतिस्पर्धा का विजेता घोषित किया, तो उसने उपहार में उसके लिए एक पुराना कैनवास दिया। उस दिन आर्यन ने निर्णय लिया कि वह अपनी कला को और भी बेहतर करेगा ताकि वह एक दिन बड़ा आर्टिस्ट बने। हालांकि, उसने यह नहीं देखा कि उसने सागर के सपनों को किस तरह ठेस पहुँचाई थी।

    कुछ समय बाद, आर्यन ने एक बड़ी प्रदर्शनी में अपनी पेंटिंग पेश की, जिसमें सागर की पेंटिंग ने उसे प्रेरित किया था। लेकिन जब सागर ने देखा कि आर्यन ने उसकी पेंटिंग की कुछ विशेषताओं को अपनी पेंटिंग में शामिल किया है, तो वह बेहद दुखी हुआ। आर्यन की गलती उससे समझ में आई। उसने सागर से माफी मांगने का विचार किया, लेकिन डर की वजह से वह ऐसा नहीं कर सका।

    कुछ हफ़्तों बाद, आर्यन ने फिर से एक प्रदर्शनी आयोजित करने का सोचा। इस बार वह सागर को भी आमंत्रित करने का निश्चय किया। उसने सोचा, “अगर मैं सागर को अपने काम के लिए मान्यता दूँ और उसे सराहूँ, तो शायद वह मुझे माफ कर देगा।” आर्यन ने अपनी नई पेंटिंग्स के साथ-साथ एक विशेष जगह सागर के लिए भी तैयार कर ली।

    प्रदर्शनी का दिन आया। आर्यन ने सभी लोगों के सामने सागर के काम को महत्व दिया और बताया कि कैसे उसकी पेंटिंग ने उसे प्रेरित किया। गाँव के लोगों ने सागर की प्रतिभा की सराहना की, और वह ताजगी से खिल गया। आर्यन ने उस पल को महसूस किया, कि माफी केवल शब्दों में नहीं होती, बल्कि उसके पीछे का अर्थ और भावना भी मायने रखती है।

    हालांकि, सागर को अब भी आर्यन की गलती का दर्द था। उसने आर्यन के प्रति अपना दिल खोल दिया और कहा, “तुमने मेरे सपनों को चुराने का काम किया है। लेकिन आज, तुमने मुझे मान्यता दी है, इसीलिए मैं तुम्हें माफ कर रहा हूँ।” आर्यन ने सागर के प्रति अपनी सच्ची भावना व्यक्त की और उसे अपनापन महसूस कराया।

    इस घटना के बाद, दोनों लड़के एक दूसरे के अच्छे दोस्त बन गए। आर्यन ने अपनी कला में सुधार किया और सागर ने अपने सपनों को पूरा करने का हौंसला पाया।

     

  • 💞💞 प्यार का नशा..पार्ट 9💞💞

    💞💞 प्यार का नशा..पार्ट 9💞💞

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    कहानी अब आगे,

     

    अमानत को यह सुनकर गुस्सा आता है, लेकिन वह डरी हुई भी है। वह रिशाल से कहती है, “मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूँ। मैं अपने फैसले खुद लेती हूँ और आगे भी लुंगी ।”

     

     

    रिशाल हँसता है और कहता है, “तुम्हारे फैसले अब मैं लूँगा। तुम्हारी जिंदगी मेरे हाथ में है। तुम्हारा भाई मेरे पास है मेरी हर बात माननी ही होंगी अगर भाई से इतना प्यार है तो, ताकि मे तुम्हारे भाई को सही सलामत छोड़ दू अब उसकी आजादी तुम्हारे हाथो मे है तो तुम सोच लो क्या करना है क्या नहीं मे तब तक यहाँ बैठता हु ये कहते हुए रिशाल अग्निहोत्री अमानत का हाथ छोड़ देता है और खुद सोफे पर बैठ पैर पर पैर राख कर डेविल स्माइल के साथ अमानत के तरफ देखने लगता है !!!!!

     

     

    अमानत को लगता है कि वह फँस गई है। वह सोचती है कि कैसे रिशाल से खुद को और अपने भाई को बचा सकती है। “

     

    वह रिशाल से कहती है, “मैं तुम्हारी हर बात मानूंगी , लेकिन तुम्हें मुझे प्रोमिस करना होगा की तुम मेरे भाई को कुछ भी नहीं करोगे और वो सुरक्षित होगा जहा भी होगा मेरी उससे बात करवाओगे ताकि मे उसे कह पाऊ की कोई बात नहीं है सब ठीक है और वो डरे नहीं वो मेरे छोटा भाई है मुझे उसकी फ़िक्र है और मे उसे अच्छे से जनता हु अभी वो डर रहा होगा की आखिर हूआ क्या जो उसे और मुझे यु अलग कर दिया गया है ।”

     

     

    रिशाल मुस्कराता है और कहता है, “मैं तुम्हे ये प्रॉमिस तो करना नहीं चाहता क्युकी में रिशाल अग्निहोत्री हु और रिशाल अग्निहोत्री का जब मन जो करने का वही करता है, पर मे इतना भी बुरा नहीं हु इसीलिए चलो मे प्रॉमिस करता हु की मे तुम्हारे भाई को कुछ भी नहीं करूँगा पर wait wait wait…., 

     

    अमानत,”अब क्या हूआ तुम वादा करो मेरे भाई को कुछ भी नहि करोगे और उसे सही सलामत रखोगे बोलो?”

     

    रिशाल अग्निहोत्री, ” हाँ बिलकुल पर तब तक ही जब तक तुम मेरी गुलामी करोगी और मेरी कहीं हर बात को मानोगी उसके बाद ही मे तुम्हे ये वादा कर सकता हु तो बोलो मंजूर है???? “

     

    क्या अमानत रिशाल को वादा कर पाएगी कि वह उसकी गुलाम बन कर ही रहेगी ? क्या वह अपने भाई को बचाने के लिए बन जाएगी गुलाम ?

     

     

     

    आज के लिए बस इतना ही, कल फिर मिलेंगे कहानी के एक नए भाग के साथ, तब तक अपना ख्याल रखिये | 

  • नुकसान

    नुकसान

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दूर जाने के फ़ायदे तो बहुत हैं,

    अब खुद को दर्द नहीं देंगे,

    बस एक नुकसान रहेगा 

    हम चुपके-चुपके रो लेंगे।

     

  • पायल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    पायल हो तुम, इतना क्यों हँसती हो,

    पैरों में ही सजना है तुम्हें,

    सर का ताज नहीं हो तुम

  • अधूरा इश्क

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    अधूरा इश्क

     

    EPISODE 1 — पहली दस्तक

     

    रागिनी को हमेशा से अंधेरे कमरों से अजीब-सी खींच महसूस होती थी।

    उसके नए किराए के घर में एक कमरा था जिसका दरवाज़ा ताला लगा था। मालिक ने कहा था “कभी मत खोलना।”

     

    एक रात बिजली चली और वही कमरे से हल्की दस्तक आई। रागिनी डरते हुए बोली “क…कौन?”

     

    अंदर से एक धीमी, टूटी आवाज़ आई “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

     

    अगली बार बिजली जाने पर आवाज़ फिर आई।

    इस बार कमरे का ताला अपने आप गिरा।

    और अंदर था… सिर्फ़ अंधेरा।

     

    पर उसी अंधेरे में एक परछाई उभर रही थी एक लड़का… बेहद खूबसूरत, पर धुंध जैसा।

     

    उसने कहा “मेरा नाम आरव है… मैं इंसान नहीं हूँ, पर तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा।”

     

    रागिनी चाहकर भी उस कमरे से दूर नहीं रह पाती।

    आरव उसे हर रात मिलता कभी बातों में, कभी बस खामोशी में।

     

    रागिनी ने महसूस किया कि वह आरव की तरफ़ खिंच रही है… डर और प्यार के बीच फँसकर।

     

    आरव हमेशा कहता “मेरी दुनिया में मत आना रागिनी… वो अंधेरा तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा।”

     

    एक दिन रागिनी ने पूछ ही लिया “तुम कौन हो? क्या हो?”

     

    आरव की आँखों में अजीब-सा दर्द चमका“एक गलती ने मुझे इस दुनिया के बीच कहीं अटका दिया है… ना मैं ज़िंदा हूँ, ना मरा हुआ।”

     

    रागिनी उससे और गहराई से जुड़ने लगी, वह डर खत्म हो चुका था। बस एक अजीब-सी मोहब्बत जन्म ले चुकी थी।

     

    अब रागिनी हर दिन सूरज ढलने का इंतज़ार करती।

    रात होते ही आरव उसके पास आ जाता उसे कहानियाँ सुनाता, कभी हवा बनकर उसके बालों को छूता, कभी उसके आँसू पोंछता।

     

    दोनों जानते थे ये रिश्ता नामुमकिन है। पर इश्क़ कभी इजाज़त थोड़े ही पूछता है।

     

    एक रात कमरे में सिर्फ आरव नहीं आया… उसके पीछे कुछ और भी था।

     

    काली, गुर्राती परछाइयाँ जो रागिनी पर झपट पड़ीं।

     

    आरव चिल्लाया “भागो! ये मेरी दुनिया के भूखे साए हैं—तुम्हें ले जाएँगे!”

     

    आरव ने उन्हें रोक लिया… पर उसके शरीर का आधा हिस्सा अंधेरे में गायब हो गया।

     

    रागिनी रो पड़ी “मैं तुम्हें खो दूँगी क्या?”

     

    आरव बोला “मैं पहले ही खो चुका हूँ…”

     

    आरव कमज़ोर पड़ने लगा। वह कहने लगा “रागिनी… जब तक मैं हूँ, तुम सुरक्षित हो। पर मेरा समय ख़त्म हो रहा है। इस कमरे को छोड़कर किसी और शहर चली जाओ।”

     

    पर रागिनी ने साफ़ कह दिया “इश्क़ भागता नहीं, लड़ता है।”

     

    उस रात हवा में अजीब सरसराहट थी। कमरा खुद-ब-खुद खुल गया। अंधेरा गाढ़ा और डरावना।

     

    आरव ने रागिनी का हाथ पकड़ लिया पहली और आखिरी बार… उसका स्पर्श ठंडा, पर गहरा था।

     

    “मेरे साथ मत आना…”

     

    पर रागिनी ने कहा “मैं अकेली रह ही नहीं सकती तुम्हारे बिना।”

     

    अंधेरा दोनों के चारों तरफ घूमने लगा।

     

    अगली सुबह घर का दरवाज़ा खुला मिला। कमरा बिल्कुल शांत। आरव की परछाई गायब थी। रागिनी भी गायब थी।

     

    बस दीवार पर उभरी एक धुँधली लाइन “अंधेरों में किया इश्क़… दोनों को उजाला कभी नहीं मिला।”

     

    कई साल बाद, उसी घर में नए किरायेदार आते हैं।

    पहली ही रात, बिजली जाती है… और बंद कमरे से आवाज़ आती है “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

     

    इस बार कमरे में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं एक धुँधला लड़का… और उसके कंधे पर सिर रखे एक लड़की।

     

    दोनों की आँखों में एक ही बात उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हुई… और शायद कभी होगी भी नहीं।

     

    “अंधेरों का इश्क़… अधूरा ही सही, पर अमर रहा।”

     

  • सुकून मिलता है यार…

    सुकून मिलता है यार…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कुछ उदासियां किसी से नहीं बांटी जा सकती 

    उन्हें खुद के अन्दर ही रखने में बहुत सुकून मिलता है.. ✍️✍️

  • 💞💞प्यार का नशा.. पार्ट 8💞💞

    💞💞प्यार का नशा.. पार्ट 8💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे, 

     

    अमानत फार्महाउस के अंदर कैद तो हो जाती है, पर उसके मन में कई सवाल हैं। वह सोचती है कि रिशाल अग्निहोत्री की दुश्मनी क्या है उससे और क्यों वह उसके भाई व्योम को खतरे में डाल रहा है, और उसके साथ ये सब आखिर क्यों कर रहा है?” 

     

    अमानत सोच लेती है की अबकी रिशाल आएगा तो वो रिशाल से पूछेगी , “की मुझे बताये , उसे मुझसे क्या चाहता है ? मेरे भाई को मुझे वापस कर दे उसे कुछ भी नहीं होना चाहिए अगर उसे कुछ हूआ तो वो भी नहीं जी पायेगी ।”

     

     अमानत को लगता है कि उसका भाई खतरे में है। वह सोचती है कि कैसे अपने भाई को बचा सकती है और रिशाल से उसे आजाद करवा सकती है।

     

     

    क्या अमानत अपने भाई को बचा पाएगी? क्या वह रिशाल के खतरनाक इरादों से खुद को बचा पाएगी?

     

     

    तभी दरवाजे पर कुछ हलचल होती है और फिर अमानत पीछे मुड़कर देखती है जहा रिशाल को अपनी तरफ आते हुए देखती है जिससे अमानत का मन डर जाता है वो सोचती है की पता नहीं अब ये क्या ही करेगा रिशाल अग्निहोत्री अंदर आकर दरवाजा बंद कर देता है और अमानत को घेर लेता है। अमानत को डर लगता है और वह पीछे हटने लगती है।

     

     

    रिशाल का चेहरा लाल हो जाता है और उसकी आँखें भी बहुत ही दरवानी सी लगती हैं। वह अमानत को कहता है, “तुम कहीं नहीं जा सकती। तुम मेरे साथ यही रहोगी।”

     

     

    अमानत की साँसें तेज हो जाती हैं और वह डर से कांपने लगती है। वह रिशाल से दूर रहने की कोशिश करती है, लेकिन रिशाल उसे पकड़ लेता है।

     

     

    अमानत छूटने की कोशिश करती है, लेकिन रिशाल की पकड़ मजबूत होती है । वह अमानत को दीवार से सटा देता है और उसकी आँखों में देखता है।

     

     

    रिशाल की आवाज में खतरा है, “तुम्हे मुझे समझने में समय लगेगा। लेकिन तुम्हें मुझे समझाना ही पड़ेगा मेरी डार्लिंग आखिर अब तुम्हे यहाँ ही रहना है तो ये सब की आदत डालनी होंगी तुम्हे my sweetheart….💞💞

     

     

    अमानत की आँखों में डर आ जाता हैं और वह रिशाल से कहती है, “मुझे छोड़ दो। मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती आखिर मेने बिगड़ा ही क्या है तुम्हारा मे तो तुम्हे जानती तक नहीं फिर मेरे मेरे भाई के पीछे क्यों परे हो तुम?? है ऐसे ही बहुत सी मुश्किलो से घिरे है ज़िंदगी मे पहले ही अब तुम और मत बढ़ाओ प्लीज मुझे जाने दो और मेरे भाई को भी छोड़ दो प्लीज!!!

     

     

    रिशाल का चेहरा और भी लाल हो जाता है और वह अमानत को हस्ते हुए से कहता है, “तुम मुझे नहीं छोड़ सकती। तुम मेरी हो अब और मे तुम्हे कभी छोडरने नहीं दूंगा अब तुम्हारी यही जिंदगी है ये कैद और जब तक तुम यहाँ मेरी गुलामी करोगी तब तक ही तुम अपने भाई को बचा पाओगी उसके बाद तुम जानो और तुम्हरा वो भाई ।”

     

     

     

    अब अमानत को लगता है कि वह सच मे कैद मे आ चुकी है। 

     

    रिशाल अमानत की तरफ मुस्कुराकर देखता है और उसकी आँखों में एक डेविल सी चमक आ जाती है। वह अमानत को कहता है, “चलो शुरू हो जाओ, अमानत। आज से तुम्हारी जिंदगी मेरे हिसाब से चलेगी। आज से तुम मेरी गुलाम हो।”

     

     

     

    … to be continue…

     

  • अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    अधूरी मोहब्बत के ‘इंतज़ार का साया

    नयन और आरुषि का मिलना किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। पहली मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के पुराने आर्ट्स फैकल्टी की कैंटीन में हुई थी, जब पहली बरसात ने जून की तपती गर्मी को अचानक ठंडक में बदल दिया था। आरुषि अपनी किताबों और बिखरे हुए नोट्स को समेटने की हड़बड़ी में थी, और नयन, एक शांत, गंभीर चेहरा लिए, वहीं कोने की मेज पर बैठा उसे देख रहा था।
    “माफ़ करना, मेरा छाता आज धोखा दे गया,” आरुषि ने भीगे बालों से पानी झटकते हुए कहा।
    नयन ने बिना कुछ कहे, अपना जैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। “भीग जाओगी।”
    वह जैकेट, जिसकी महक में मिट्टी की सोंधी खुशबू और उसकी अपनी एक हल्की सी सिगरेट की गंध मिली हुई थी, आरुषि के लिए पहला तोहफ़ा था। वह जैकेट नयन की तरह ही था,  बाहर से रूखा, पर अंदर से बेहद गर्म और सुरक्षा देने वाला।
    धीरे धीरे वह एक छोटी मुलाक़ात कब दोस्ती में बदली और दोस्ती कब इश्क़ की एक गहरी नदी में, उन्हें पता ही नहीं चला। उनका रोमांस किताबों के पन्नों, देर रात की कॉफ़ी और दिल्ली की सर्द रातों में गर्माहट देने वाली लंबी ड्राइव में पनपा। आरुषि को नयन की खामोशियाँ पढ़ना आता था, और नयन को आरुषि की आँखों में छिपे हर सपने को साकार करना था।

    नयन की उंगलियां जब आरुषि के उलझे बालों को सुलझाती थीं, तो उस स्पर्श में सदियों का इकरार होता था। उनका प्रेम सिर्फ शब्दों का मोहताज नहीं था, वह एक-दूसरे की रूह में उतर चुका था। हर चुंबन, हर आलिंगन एक वादा था, हमेशा साथ रहने का।

    एक रात, इंडिया गेट पर, मद्धम रोशनी के बीच, नयन ने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लेकर भींच लिया था।
    “तुम मेरी हो, आरुषि। आख़िरी साँस तक।”
    आरुषि ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें बंद कर ली थीं, जैसे उसने ब्रह्मांड के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया हो।

    लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह उनकी प्रेम कहानी में एक मोड़ आना बाकी था, जो किसी भी प्रेम कहानी को पूरा नहीं होने देता।
    नयन एक मध्यवर्गीय परिवार से था, पर महत्वाकांक्षाएँ पहाड़ जितनी ऊँची थीं। उसके पिता का सपना था कि वह सिविल सर्विसेज़ में जाए। और नयन भी आरुषि के परिवार की तरह तथा अन्य लोंगों की तरह जानता था कि सरकारी नौकरी ही समाज में उनकी प्रेम कहानी को स्वीकार्यता दिला सकती है।
    “एक साल, बस एक साल और, आरुषि,” नयन ने उसे समझाते हुए कहा था, जब आरुषि ने उसे रोज़ मिलने से मना करने पर शिकायत की थी, तो नयन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला, बस इस एक साल के बाद तुम्हें वो सब दूँगा जिसका तुम सपना देखती हो, एक सुरक्षित भविष्य, एक छोटा-सा घर, और हर पल मेरा साथ।

    वह एक साल, इंतज़ार और विरह का है। उनका रोमांस अब फ़ोन कॉल्स, चोरी-छिपे की मुलाक़ातों और ख़त में सिमट गया था।
    परीक्षा की तैयारी चरम पर थी, और तभी किस्मत ने अपना क्रूर खेल खेला। नयन के पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा। परिवार की सारी जमापूंजी इलाज में लग गई, और नयन को अपनी पढ़ाई छोड़कर, परिवार को संभालने के लिए एक छोटी-सी निजी कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी।
    टूट गए सारे वादे, बिखर गए सारे सपने।
    कुछ दिनों तक जब आरुषि की बातचीत और कोई संपर्क नयन से नही हुआ,  तो अचानक एक दोपहर, आरुषि, नयन के पुराने कमरे में पहुँची। कमरा खाली था, सिर्फ़ कोने में रखी किताबों पर धूल जमी थी। नयन उसे यह सब बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था, उसने बस एक छोटा-सा संदेश छोड़ा था:
    आरुषि, मैं टूट गया हूँ। मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे सकता जिसका तुम हक़ रखती हो। मेरा प्रेम स्वार्थी नहीं है कि मैं तुम्हें भी अपने साथ इस अंधेरे में खींच लूँ। मुझे भूल जाना। यह हमारे इश्क़ का दर्दनाक अंत है।”

    नयन के उस एकतरफ़ा फ़ैसले ने आरुषि को अंदर तक झकझोर दिया। वह रोई, चिल्लाई, पर नयन का  कुछ भी पता नहीं चला। नयन यह जानता था कि आरुषि के परिवार वाले कभी एक असफल और आर्थिक रूप से टूटे हुए लड़के से उसकी शादी नहीं करेंगे। इसलिए उसने खुद को दूर करके, अपनी मोहब्बत को एक तरह से बलिदान कर दिया था।

    धीरे धीरे देखते देखते कब पांच साल गुज़र गए, किसी को पता भी नही चला।
    आरुषि की शादी एक सफल व्यवसायी से हो चुकी थी। अब उसके पास ऐशो-आराम के लिए सब कुछ था, बंगला, गाड़ी, ऐशो-आराम। पर उसकी आँखों में नयन का इंतज़ार आज भी ज़िंदा था। वह आज भी हर बारिश में नयन के जैकेट की महक खोजती थी।
    उसकी ज़िंदगी में रोमांस था, पर इश्क़ नहीं। उसका पति उसे बहुत प्यार करता था, पर वह स्पर्श, वह जुड़ाव जो नयन की नज़रों में था, उसे वह कहीं नहीं मिला।
    एक रात, बारिश ज़ोरों पर थी। आरुषि अपने बेडरूम की बालकनी में खड़ी थी, आँखें मूँदकर। उसके मन में नयन के साथ बिताई गई हर अंतरंग मुलाक़ात, हर मीठी शरारत घूम रही थी। उसे याद आया, कैसे नयन उसे पहली बार अपने सीने से लगाया था और कैसे उनके होंठ एक कसक भरी चाहत में मिले थे।
    आरुषि ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी नज़रों के सामने नयन का चेहरा घूम गया, एक दर्द भरा प्रेम, एक अनसुलझा बंधन। उसके दिल में एक टीस उठी।

    संयोगवश उसी शहर में, नयन ने भी खुद को अपने परिवार के लिए संभाला था। वह एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाता था, जो ठीक-ठाक चल जाती थी। वह भी एक खालीपन में जी रहा था। उसका सबसे बड़ा डर था कि वह आरुषि को किसी और के साथ खुश देखेगा। पर जब उसने दूर से आरुषि को एक बार अपनी कार में देखा, तो उसकी आँखों की उदासी ने नयन को बता दिया कि आरुषि अभी भी उसी अधूरी मोहब्बत के पिंजरे में कैद है।
    नयन ने हर शाम एक डायरी लिखी, जिसमें वह आरुषि को अपनी ज़िंदगी के हर पल का हिसाब देता था।
    आज मैंने तुम्हारे पसंदीदा फूल देखे।
    आज चाय बनाते हुए तुम्हारा ख़याल आया।
    आज बारिश हुई, और मुझे तुम्हारा भीगा हुआ चेहरा याद आया।
    यह डायरी, उसके लिए आरुषि से रोज़ बात करने का ज़रिया थी। उसका प्रेम अब भी ज़िंदा था, पर सिर्फ़ कागज़ों पर।

    छठे साल, एक कला प्रदर्शनी में, किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मिला दिया।
    आरुषि, अपने पति के साथ, एक पेंटिंग के सामने खड़ी थी, जिसका शीर्षक था, इंतज़ार का साया’। उस पेंटिंग में, एक लड़की दूर क्षितिज को देख रही थी, और उसके साये में एक धुंधला-सा पुरुष का चेहरा छिपा था।
    जब आरुषि ने पलटा, तो उसके सामने नयन खड़ा था। समय थम गया। पाँच सालों का दर्द, विरह, और प्रेम उनकी आँखों में भर आया।
    नयन का शरीर पहले से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था, पर उसकी आँखें आज भी वही थीं, गहरी और आरुषि के लिए अटूट प्रेम से भरी।
    “आरुषि…” नयन की आवाज़ काँपी।
    “नयन…” आरुषि ने केवल इतना कहा, और उसके होंठ काँपने लगे।
    आरुषि के पति ने नयन को देखा, पर उन्हें लगा कि वह कोई पुराना सहपाठी है। उन्होंने सम्मानपूर्वक हाथ मिलाया और थोड़ी देर में उन्हें अकेला छोड़ दिया।
    वे दोनों गैलरी के शांत कोने में बैठ गए।
    “तुमने क्यों किया ऐसा, नयन?” आरुषि की आवाज़ में पाँच सालों का दर्द था। “तुमने क्यों मान लिया कि मेरा प्यार इतना कमज़ोर है कि वह तुम्हारी मुश्किलों को नहीं सह पाएगा?”
    नयन ने उदास नज़रों से उसे देखा। “मैं स्वार्थी नहीं बन सकता था, आरुषि। मैं तुम्हें अंधेरे और अभाव की ज़िंदगी नहीं देना चाहता था। मेरा प्रेम आज भी उतना ही सच्चा है, पर मैं तुम्हें यह सब देने के बाद तुम्हारे सपनों को मरते हुए नहीं देख पाता।”
    उस शाम, वे घंटों बातें करते रहे। उन्होंने अपने अधूरे प्रेम के हर मोड़ को छुआ। उनका प्रेम, जो कभी शारीरिक आलिंगनों में व्यक्त होता था, आज सिर्फ़ आत्मिक जुड़ाव में सिमट गया था।
    आरुषि ने नयन का हाथ पकड़ा। वह स्पर्श आज भी उतना ही सुरक्षित और अपनापन देने वाला था।
    “हम अब भी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, नयन।”
    नयन की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ, करते हैं। पर अब यह प्यार हमारा नहीं रहा, यह बस एक दर्द भरी याद है।”
    नयन ने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई डायरी निकाली। “यह तुम्हारी अमानत है। इसमें हमारे हर अधूरे पल का हिसाब है।”
    “क्या अब हम…?” आरुषि ने हिम्मत करके पूछा।
    नयन ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी मुस्कुराहट में केवल पीड़ा थी।
    “हम हमेशा एक-दूसरे के रहेंगे, आरुषि, पर अब केवल सपनों में। तुम्हारी ज़िंदगी में अब एक सफ़र है जिसे तुम्हें पूरा करना है। और मेरी ज़िंदगी… मेरी ज़िंदगी तो उसी दिन खत्म हो गई थी जब मैंने तुम्हें खोने का फ़ैसला किया था।”
    आरुषि ने वह डायरी ले ली। वह डायरी नहीं थी, वह उनके इश्क़ का मज़ार था।
    नयन उठा। यह उनकी अंतिम, और सबसे दर्द भरी मुलाक़ात थी। उसने आरुषि के माथे को धीरे से छुआ, बिना कोई चुंबन दिए, बिना कोई आलिंगन दिए। यह स्पर्श, किसी भी गहरे शारीरिक मिलन से ज़्यादा पवित्र और गहरा था, क्योंकि इसमें केवल त्याग और निस्वार्थ प्रेम था।
    “ख़ुश रहना, आरुषि। तुम जहाँ हो, ख़ुश रहना।”
    “और तुम?”
    “मैं? मैं हमेशा तुम्हारा हूँ।”
    नयन मुड़ा और भीड़ में कहीं खो गया। आरुषि वहीं खड़ी रही। उसके पास प्रेम की सबसे बड़ी निशानी थी, वह अधूरी डायरी।
    आज भी, आरुषि अपने आलीशान घर में रात की तन्हाई में उस डायरी के पन्ने पढ़ती है। वह जानती है कि उसका पति उसे भौतिक सुख दे सकता है, पर उसकी रूह हमेशा नयन की रहेगी।
    उनकी मोहब्बत अधूरी रही, पर उनका इश्क़ अमर हो गया, एक मीठा, दर्द भरा एहसास जो हर साँस के साथ ज़िंदा रहता है।
    समाप्त
    पढ़ने के लिए धन्यवाद।
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  • 💞💞प्यार का नशा… पार्ट 7💞💞

    💞💞प्यार का नशा… पार्ट 7💞💞

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    कहानी अब आगे,

    लोकेशन, ” रिशाल अग्निहोत्री फॉर्मेहाउस,”

    रिशाल अपनी कार में, ” चलो अंदर!!

    अमानत, ” ये क्या बतमीजी है आपकी, ” आप अमीर है तो क्या कुछ भी करेंगे मेने कहा न मे कहीं नहीं जाने वाली और मेरे भाई को आपने कहा छोड़ा है बताये कहा है मेरा व्योम? “

    रिशाल अग्निहोत्री, ” वही बोल रहा हु, ” चुपचाप जो बोल रहा हु वो करोगी तो तुम्हारा भाई ठीक रहेगा वरना तुम सोच भी नहीं सकती मे उसकी साथ क्या कर सकता हु वो अब मेरे आदमी के अंदर मे है मे जब चहु उसे ऊपर पंहुचा सकता हु?? और तुम अच्छे से जानती हो मे ऐसा जरूर कर सकता हु? “

    अमानत के आँखों मे आंसू आ जाते है ये सब सुन कर आखिर रिशाल ऐसा कर क्यों रहा है क्या दुश्मनी थी उसकी अमानत से ये अमानत को समझ ही नहीं आ रहा था? “

    रिशाल अग्निहोत्री, ” लगता है तुम ऐसे नहीं मानोगी मुझे तुम्हे सबूत दिखाना ही होगा या फिर कुछ कर के बताना ही होगा की मे कुछ भी कर सकता हु? “

    रिशाल न अपने शर्ट के पॉकेट से फोन निकला और अपने आदमी को कॉल कर कहा व्योम का वीडियो उतर कर भेजो ओर हाँ मेरे ऑडर का इंतजार karna तभी उसे कुछ करना तब तक के लिए उसे कुछ सांस और ले लेने दो!!

    कुछ ही देर मे रिशाल के फ़ोन पर एक वीडियो आता है जो रिशाल अमानत को दिखा कहता है, ये देखो ये रहा तुम्हारा भाई जो अभी स्विंप्लू के आगे बैठा है मेरे आदमी बस मेरे ऑडर का इंतजार कर रहे है मेरे हाँ कहते है ही ये तुम्हारे भाई को धक्का दे देंगे और फिर वो पानी के अंदर…. और जहा तक मुझे पता है सायद तिम्हारे भाई को स्विंग करना नहीं आता है क्यों सही कहा न मेने??

    अमानत आपमें भाई को देख डर जाती है क्युकी ये बात सच थी की उसे स्विंग नहीं आता था,

    अमानत, ” व्योम…. व्योम् हट जा वहा से क्या कर रहा है वहा पर हट जा… देखो तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे मेरे भाई को छोड़ दो उसने क्या ही बिगड़ा है तुम्हरा मेरे भाई को बक्श दो तुम जो बोलोगे वो करुँगी मे पर मेरे भाई को छोड़ दो pls..!!!

    रिशाल अग्निहोत्री, ” तो ये हुई न बात अब बानी हो तुम असली बहन.. चलो अभी के लिए तो तुमने अपने भाई की जान बचा ली अब बस देखना है की और कितने देर बचा पाती हो.. मेरी जान अब चलो अंदर जाओ मे अभी आता है कार पार्क कर के फिर मे तुम्हे बताता हु की आगे करना क्या है….!!!!

    अमानत को तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की ये उसकी साथ हो क्या रहा है आखिर ये सब क्यों.. ये है कौन जो उसकी साथ ऐसा सब कर रहा है इसकी तो कोई दुश्मनी भी नहीं है अचानक कहीं से आकर मेरे साथ ये बर्ताव क्यों कर रहा है मेरा व्योम सही तो होगा न मेरी जान है वो उसकी बिना तो मे जीने का सोच भी नहीं सकती क्या करू कैसे बचाऊ खुद के भाई को… माँ पापा आप ही कुछ रास्ता दिखाई??? “”!!!!

    .. to be continue…

  • टी प्वाइंट का चक्कर

    टी प्वाइंट का चक्कर

    पढ़ने का समय : 8 मिनट ” मिस्टर भाटी कॉम यू ऑन द स्टेज ”

    बोलकर प्रोफेसर दयानन्द, प्रोफेसर विश्वनाथ भाटी का स्वगत किए थे। पहले सभी प्रोफेसर्स को बारी बारी से बोलना था। लास्ट में सभी बच्चों को प्रिंसिपल मैम संबोधन करने वाली थीं।

    प्रोफेसर भाटी अपने जगह से उठकर माइक के पास आते हैं।और बोलते हैं।

    ” जय श्री कृष्ण बच्चो ”

    स्टूडेंटस के भीड़ भी एक साथ बोलते हैं।

    ” जय श्री कृष्ण”

    प्रोफेसर भाटी आगे बोलना स्टार्ट किए थे।

    ” तो मेरे बच्चों,जैसा की आपको बताया गया है।अभी अभी आप सब को प्रोफेसर दयानन्द सर बता रहे थे। की भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिन मनाने के बारे में, हमारे कॉलेज ने फैसला लिया है। कि अपने कॉलेज में उस दिन पुजा पाठ भजन सांस्कृतिक कार्यक्रम  और श्री कृष्ण रचित लीलाओं का नाट्य  प्रदर्शन कर दिखाया जाना है। जिसमें आप सब लोग भी सहभागी बनेंगे। आप लोग वह लीला मंचन देख और सुन कर श्री कृष्ण के लीलाओं को आप अपने जिवन में उतारेंगे और उनके द्वारा दिए गए उपदेशों को अपने दोस्तों मित्रों के साथ शेयर करेंगे। इन्ही बातों के साथ हम अपनी  वानी को विराम देते हैं। धन्यवाद बच्चों।”

    इसी के साथ एक बार फिर तालियों के गर गड़गड़ाहट से पुरा मीटिंग हॉल गुंज उठता है। अब फिर से माइक प्रोफेसर दयानन्द जी के हांथ में थे। और वो फिर से बोलना स्टार्ट कर चुके थे।

    ” हां तो बच्चो, अभी आप लोग प्रोफेसर भाटी को सुन रहे थे। मुझे आशा नहीं उम्मीद है कि ,आप सभी उनके बताए बातों पर गौड़ करेंगे।”

    सभी स्टूडेंट्स के तरफ देखते हुए पुछते हैं।

    ” उनके बातों पर गौड़ करेंगे ना बच्चों?”

    सभी स्टूडेंट्स एक साथ बोलते हैं।

    “जी सर।”

    फिर प्रोफ़ेसर दयानन्द बोलते हैं।

    ” अब मैं आप लोगों के बीच, प्रोफेसर शास्त्री आयेंगे और अपनी बात को रखेंगे।”

    एक बार फिर सारा हॉल तालियों से गुंज उठता है। प्रोफेसर शास्त्री जी आते हैं। और अपने हांथ में  माइक लेकर बोलना स्टार्ट कर देते हैं।

    इधर शीला चांदनी राधा और रूपा कमल को लिए मीटिंग हॉल के रास्ते पर चल रहे होते हैं। सभी सहेलियों के चेहरे पर चिन्ता की लकीर साफ झलक रही थी। सभी के मन में खुशी भी थी की अब सब कुछ नोर्मल हो गयी थी। या प्रिंसिपल मैम से मिलने के बाद सब कुछ ठीक हो जाने वाली  थी। कमल के हाल की बात करें तो, उसका हाल बिल्कुल भी ठीक नहीं था। वो तो यही सोच सोच कर घबरा रहा था। की जब उसे प्रिंसिपल मैम के पास लेकर जाया जायेगा, तो फिर क्या होगा उसके साथ। उसको सारा कॉलेज के सामने बदनामी उसके दोस्तों के बीच में बेइज्जती उसके मम्मी पापा के बदनामी की बहुत चिंता होने लगी थी। भाई जब तुम्हे ये सब की चिन्ता थी। तो पहले ना सोचना था, की हम ये सब कर्म ना करें।जिससे हमारी इतनी बदनामी हो। उस टाइम तो बहुत बड़ा हिरो बन रहा था। की मेरे बढ़कर कोई हिरो है हीं नही इस दुनियां में,जब कर्म किया है तो फल भी तो मिलेगा। लेकिन उसके दिमाग में एक खुराफात आइडिया भी आता है। कि इन सब से अपने आप को छुड़ा कर भाग जायें। कहते हैं ना, जब काल सर पे नाचने लगता है।तो बुद्धी का विनाश हो जाता है। यही सब कमल के साथ अभी हो रहा था। शीला और चांदनी कमल को पकड़े हुए चल रहे हैं। की तभी एका एक जोरदार झटके के साथ,कमल दोनो से अपना हांथ झटक कर  छुड़ा लेता है। और जोर से दोनो को धक्का दे कर गिरा देता हैं। और भागने लगता है।

    ” पकड़ो राधा उसे ”

    चांदनी जो कमल के धक्के खा कर सड़क पर गिरी थी। जोर से बोली थी ।

    ” पकड़ो पकड़ो भागने ना पाये।”

    शीला भी नीचे पड़े पड़े हीं बोली थी। रूपा और राधा जो थोड़ा पिछे पिछे चल रही थी। कमल को भागते हुए देखी तो उसे दौड़कर पकड़ना चाहा पर उसे भी कमल झटक कर  भाग गया था। शीला उठकर खड़ी हो गई थी। चांदनी भी उठ गई थी।

    ” चलो दौड़कर पकड़ते हैं। कितना दूर भागेगा।”

    शीला बोली और दौड़ने लगी

    ” चोट लगा है उसे, ज्यादा तेज नहीं भाग सकता है। हम पकड़ लेंगे उसे।”

    चांदनी दौड़ते हुए बोली थी। राधा और रूपा भी कमल को पकड़ने के लिए सरपट दौड़ने लगी थी।

    ” इस बार पकड़ाया तो  छोडूंगी नहीं उसे, बीना हांथ पांव तोड़े।”

    रूपा गुस्से में दांत पीस कर जोर से बोली थी।

    ” यह सब मेरी वजह से हुआ है। हमने ध्यान नहीं दिया उसपर और वो भाग गया।”

    राधा अपने आप को ब्लेम करते हुए रूआंसी आवाज में बोली थी।

    ” तुम्हे खुदको कोसने की कोई जरूरत नही है राधा, इसमें हम सब की गलती है।”

    शीला राधा से बोली थी।

    ” हां दीदी ठीक कह रहीं है। आप अपने आप को दोशी नहीं मानिए।”

    बोल कर रूपा भी राधा को समझाने की कोशिश कर रही थी। बेचारा कमल ज्यादा दूर तक नहीं भाग पाया था। भागते भागते एक बिल्डिंग के पीछे दीवार से सटकर जोर जोर से सांस ले रहा था।कमल अपने पीछे चारो लड़कियों को दौड़ते हुए देख लिया था। यही सोचकर वो सभी लड़कियों के ध्यान डायवर्ट करने के लिए छुप गया था। ये सभी सहेलियां भी कमल का पीछा करते हुए उसके पीछे भाग रही थी। तभी शीला के पैर सड़क किनारे रखे एक पत्थर के टुकड़े से टकरा जाती है। वो गिर जाती है। ये देखकर सभी रूक जाती है। पर शीला उन लोगो को रूकने से मना करती है।

    ” तुम लोग मेरी फ़िक्र मत करो और उसे दौड़ कर पकड़ो, नहीं तो वो भाग जायेगा।”

    शीला अपना दर्द बर्दास्त करने के प्रयास करते हुए कराह कर बोली थी।

    ” नहीं दीदी तुम्हें चोट लगी है। और ऐसे मे…”

    चांदनी अभी अपनी  बात पूरी कर पाती इससे पहले हीं चांदनी के बात को बीच मे से हीं काटते हुए शीला बोली।

    ” नही मेरी छोड़ो तुम लोग और उसे पकड़ो तुम लोग नही तो वो भाग जायेगा।”

    ” दीदी आपको तो…”

    राधा भी अपनी बात पूरी नहीं कर पायी थी। कि शीला की चीखती हुई आवाज सभी के कानों में पड़ती है।

    ” उसे पकड़ना जरूरी है। मेरी चोट को नहीं।”

    तीनो सहेली समझ चुकी थी। की उसे क्या करना है। और वो सभी चल पड़े थे वे करने। समय भी देखिए ना कैसा खेल खेलता है ।शीला को चोट वहीं जाकर लगी थी। जिस बिल्डिंग के पीछे कमल छीपा था। वो बात अलग थी की वो अकेली थी। और चोटिल भी हो गयी थी। चांदनी राधा और रूपा दुबारा से दौड़ने लगी थी ! कमल इन लोगों को दौड़ते हुए आगे जाते हुए देख रहा था। वो सोच रहा था कि ये लोग दूर चले जायेंगे। तो हम निकल कर दुसरे रास्ते से कॉलेज से बाहर भाग जायेंगे। कहते हैं ना जो होता है अच्छे के लिए होता है। शीला वहीं थी जहां कमल छुपा हुआ था ।

    इधर चांदनी रूपा राधा भागते भागते दूर निकल गयी थी। और एक जगह पर जाकर तीनो सहेलियां रूक गयी थी। हुआ ये था की दौड़ते दौड़ते उन लोगों को एक टी प्वाइंट मिल गया था। वहां पर तीन रास्ता जा रहा था। एक रास्ते से तो वो तीनो आई हीं थी। और एक रास्ता इधर जा रहा था । तो दूसरा रास्ता उधर इसी लिए तीनो वही रूक गयी थी। की वो कौन रास्ते में जाये पता नहीं कमल कौन से रास्ते से भागा होगा और वो कौन रास्ता पकड़े यही कंफ्यूजन में तीनो सहेलियां वहीं रूक गयी थी।

    ” अब किधर जायें दीदी ?”

    राधा कंफ्यूज होते हुए चांदनी से पूछी थी।

    ” यहां पर कोई है भी नहीं, जिससे पूछ सकें की क्या कमल को देखा है।”

    रूपा भी चांदनी से बोली थी।

    ” कोई दिमाग लगाना पड़ेगा।”

    चांदनी दोनो के आंखों में झांकते हुए बोली थी।

    ” पर कैसे”

    थोड़ी देर सोचने के बाद चांदनी बोली थी कि।

    ”  हम कमल को अलग अलग ढूंढेंगे।  राधा तुम उस साइड जाओगी मैं इस तरफ जाती हूं। और रूपा तुम दीदी के पास जाओगी उन्हे चोट लगी हैं। तुम उनका ख्याल रखोगी।”

    ” पर दीदी आप लोग अकेले कैसे कमल को पकड़ोगी कही वो आप लोगों को?”

    रूपा बोलते बोलते रूक गयी थी।

    राधा बोली

    ” एक आइडिया है दीदी।”

    ” क्या आईडिया है। जल्दी बोलो।”

    राधा के तरफ देखते हुए चांदनी बोली थी। सही टाइम पर दिमाग भी सही चलता है सही लोगों का।

    ” हमलोग मोबाइल मे ग्रुप बना लेते है। सभी चारो सहेलियों को ग्रुप कॉल करना है। जिसे भी कमल दिखेगा वो कॉल करेगी और बतायेगी फिर हम लोग जल्दी से वहां पहुंच जायेंगे।”

    राधा अपनी पूरी प्लानिंग बताई थी।

    ” पर शीला दीदी को तो पता हीं नही है। ये बात तो वो कैसे कर पायेंगी कॉल।”

    रूपा बोली और दोनो को आशचर्य से देखने लगी थी।

    ” दीदी के पास तुम जा रही हो, तो तुम करोगी कॉल अगर तुन्हें कमल दिखा तो।”

    ” राधा तुम ग्रुप बनाओ जल्दी से टाइम नही है।”

    चांदनी दोनो को ऑर्डर देते हुए बोली थी। कुछ हीं देर में राधा मोबाइल में टाइप करके ग्रुप बना लेती है।

    ” बन गया दीदी ग्रुप।”

    .राधा चांदनी से बोली थी।

    ” ठीक है ओके तो तुम जाओ उधर।”

    चांदनी राधा को हांथ से एक तरफ इशारा करते हुए बोली थी। और बात आगे बढाते हुए फिर बोली

    ” मैं इधर जा रही हूं। और रूपा तुम दीदी के पास जाओ जल्दी से।”

    राधा और चांदनी एक साथ बोली थी।

    ” ठीक है दीदी मैं जा रही हूं।”

    रूपा बोलती है।और सभी अपने अपने रास्ते चल दिए थे।

    पढिए आगे कि कहानी अगले भाग में……प्यार एक अहसास…..