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  • बिछड़ा भाई

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    राखी के दिन मिला बिछड़ा भाई

     

    “किसी ने सही कहा है… कुछ रिश्ते कितनी भी दूर चले जाएं, दिल उन्हें ढूंढ ही लेता है।”

     

    रेलवे स्टेशन की भीड़ में पायल एक छोटे-से बच्चे का हाथ पकड़े खड़ी थी। उसकी आंखें बार-बार प्लेटफॉर्म पर जा रही थीं।

     

    आज रक्षाबंधन था।

     

    वह अपनी माँ के साथ मायके जा रही थी, लेकिन उसके मन में त्योहार की खुशी से ज्यादा एक पुरानी कमी थी।

     

    उसका भाई समीर।

     

    पंद्रह साल पहले दोनों अलग हो गए थे।

     

    तब पायल सिर्फ सात साल की थी और समीर दस साल का।

     

    उनके पिता का एक छोटे शहर में किराने का कारोबार था। घर की हालत ठीक थी, लेकिन एक दिन अचानक पिता का निधन हो गया।

     

    घर पर कर्ज बढ़ता गया।

     

    माँ ने रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह घर चलाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसी दौरान एक रिश्तेदार ने बच्चों को शहर के एक आश्रम में भेजने की बात कही।

     

    माँ मजबूर थीं।

     

    पायल को रिश्तेदारों के साथ भेज दिया गया और समीर को दूसरे शहर के एक बाल गृह में।

     

    माँ ने दोनों से कहा था,

     

    “कुछ दिन की बात है बेटा। हालात ठीक होते ही मैं तुम्हें वापस ले आऊंगी।”

     

    लेकिन हालात ठीक नहीं हुए।

     

    समय बीतता गया।

     

    पायल को माँ के साथ रहने का मौका मिल गया, लेकिन समीर का पता धीरे-धीरे खो गया।

     

    किसी ने कहा वह दूसरे शहर चला गया।

     

    किसी ने कहा उसे किसी परिवार ने गोद ले लिया।

     

    और फिर एक दिन…

     

    उसका नाम सिर्फ पुरानी याद बनकर रह गया।

     

    लेकिन पायल ने कभी उसे भुलाया नहीं।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह एक राखी खरीदती।

     

    माँ से कहती,

     

    “जब भैया मिलेंगे ना, तब मैं सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    माँ की आंखों में आंसू आ जाते।

     

    लेकिन वह हमेशा कहतीं,

     

    “जरूर मिलेगा।”

     

    आज पंद्रह साल बाद पायल फिर मायके जा रही थी।

     

    उसके बैग में एक राखी थी।

     

    इस बार भी वही उम्मीद थी।

     

    ट्रेन स्टेशन पर पहुंची।

     

    पायल और उसकी माँ उतरकर बाहर जाने लगीं।

     

    तभी उसकी नजर सामने बैठे एक युवक पर पड़ी।

     

    वह लगभग पच्चीस साल का था।

     

    साधारण कपड़े, हाथ में छोटा बैग और चेहरे पर थकान।

     

    पायल कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर अचानक रुक गई।

     

    उस युवक की कलाई पर एक पुराना निशान था।

     

    बचपन में समीर के हाथ पर भी ऐसा ही निशान था।

     

    पायल का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “माफ कीजिए… आपका नाम क्या है?”

     

    युवक ने उसकी तरफ देखा।

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपकी बहन का नाम… पायल था?”

     

    युवक अचानक चुप हो गया।

     

    “आपको मेरा नाम कैसे पता?”

     

    पायल ने अपने बैग से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में दो छोटे बच्चे खड़े थे।

     

    एक लड़की और एक लड़का।

     

    लड़के के हाथ में छोटी-सी लकड़ी की कार थी।

     

    समीर ने तस्वीर देखते ही उसे अपने हाथ में ले लिया।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये…”

     

    पायल रोते हुए बोली,

     

    “ये मैं हूं।”

     

    समीर कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी आंखों में पहचान की चमक आई।

     

    “पायल?”

     

    पायल ने सिर हिलाया।

     

    “भैया…”

     

    अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    पंद्रह साल की दूरी उस एक पल में जैसे खत्म हो गई।

     

    समीर रोते हुए कह रहा था,

     

    “मैंने तुझे बहुत ढूंढा था।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “मैं भी।”

     

    “मुझे लगा तू मुझे भूल गई।”

     

    “मैं हर साल तुम्हारे लिए राखी खरीदती थी।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हर साल?”

     

    पायल ने अपने बैग से राखी निकाली।

     

    “आज भी।”

     

    समीर की आंखें भर आईं।

     

    उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दे।”

     

    पायल ने स्टेशन के एक कोने में ही भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    “भैया… इतने सालों से ये राखी आपके लिए बची थी।”

     

    समीर ने राखी को देखते हुए कहा,

     

    “और मैं सोचता रहा कि शायद मुझे कोई याद भी नहीं करता।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “माँ ने कभी आपको भुलाया नहीं।”

     

    समीर ने तुरंत पूछा,

     

    “माँ?”

     

    “वो मेरे साथ हैं।”

     

    समीर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    “क्या वो मुझे पहचानेंगी?”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “माँ तुम्हें भूल सकती हैं क्या?”

     

    कुछ देर बाद तीनों घर पहुंचे।

     

    दरवाजे पर माँ खड़ी थीं।

     

    पायल ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस पीछे हट गई।

     

    समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे देखा।

     

    पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

     

    फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “समीर?”

     

    समीर घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    तीनों रोते रहे।

     

    उस दिन घर में कोई बड़ी सजावट नहीं थी।

     

    कोई महंगी मिठाई नहीं थी।

     

    लेकिन घर में पंद्रह साल बाद एक ऐसी खुशी लौटी थी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता था।

     

    शाम को पायल ने भाई से पूछा,

     

    “भैया, आप इतने साल कहां थे?”

     

    समीर ने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनाई।

     

    बाल गृह से उसे एक दूसरे शहर में काम सीखने के लिए भेज दिया गया था।

     

    वह बड़ा हुआ, काम करने लगा।

     

    कई बार उसने परिवार को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कोई सही पता नहीं मिला।

     

    कुछ साल पहले उसे पिता का पुराना शहर पता चला था।

     

    वह वहां गया भी था।

     

    लेकिन तब तक घर बिक चुका था।

     

    उसे लगा शायद सब लोग कहीं और चले गए।

     

    “फिर आज यहां कैसे?”

     

    पायल ने पूछा।

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मैं अपनी पुरानी यादों के पीछे आया था।”

     

    “मतलब?”

     

    “आज रक्षाबंधन था। बचपन में तू कहती थी कि एक दिन मुझे बहुत बड़ी राखी बांधेगी।”

     

    पायल हंसते हुए रो पड़ी।

     

    “तो आज बांध दी।”

     

    समीर ने अपनी कलाई देखी।

     

    “हां… और शायद यही राखी मुझे यहां तक खींच लाई।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं जाऊंगा।”

     

    माँ ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    दोनों ने उनकी तरफ देखा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “मैंने इतने साल भगवान से सिर्फ एक चीज मांगी थी।”

     

    “क्या?”

     

    “रक्षाबंधन के दिन मेरी बेटी की राखी मेरे बेटे की कलाई पर देखना।”

     

    माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस रात पायल ने अपनी पुरानी राखियों का डिब्बा निकाला।

     

    उसमें पंद्रह राखियां थीं।

     

    हर साल की एक राखी।

     

    समीर ने डिब्बा देखा तो हैरान रह गया।

     

    “तूने ये सब संभालकर रखीं?”

     

    पायल मुस्कुराई।

     

    “मैंने कहा था ना… जब तुम मिलोगे, तब सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    समीर ने मजाक में कहा,

     

    “पंद्रह राखियां एक साथ बांधेगी तो मेरी कलाई टूट जाएगी।”

     

    पायल हंस पड़ी।

     

    “तो अगले पंद्रह साल तक धीरे-धीरे बांध दूंगी।”

     

    माँ भी हंसने लगीं।

     

    उस रात घर में बहुत सालों बाद भाई की आवाज गूंजी।

     

    पायल को लगा जैसे उसका बचपन वापस आ गया हो।

     

    वही भाई।

     

    वही हंसी।

     

    वही रिश्ता।

     

    बस वक्त बहुत आगे निकल चुका था।

     

    अगली सुबह समीर ने अपनी बहन से कहा,

     

    “पायल, एक बात समझ आई।”

     

    “क्या?”

     

    “रिश्ते खोते नहीं हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “बस कभी-कभी उनसे मिलने में देर हो जाती है।”

     

    पायल ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “और कुछ राखियां रास्ता दिखाती रहती हैं।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब हर रक्षाबंधन पर मैं खुद तेरे सामने बैठूंगा।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    और इस बार उस वादे का गवाह कोई तस्वीर या पुरानी राखी नहीं थी।

     

    गवाह था…

     

    पंद्रह साल बाद मिला एक भाई, उसकी बहन की कलाई में बंधा प्यार और वह घर, जिसने आखिरकार अपने दोनों बच्चों को फिर से एक साथ देख लिया था।

  • एक भाई जिसे अपनी बहन याद नहीं थी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस भाई को अपनी बहन याद नहीं थी

     

    “माफ कीजिए… क्या आप मुझे जानती हैं?”

     

    ये सवाल सुनते ही अनामिका के हाथ से राखी का डिब्बा नीचे गिर गया।

     

    सामने खड़ा आदमी उसका अपना भाई विवान था।

     

    वही भाई, जिसके साथ उसने बचपन की हर छोटी-बड़ी याद बांटी थी।

     

    लेकिन आज उसकी आंखों में अनजानापन था।

     

    अनामिका ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “भैया… मुझे पहचान नहीं रहे?”

     

    विवान ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर सिर हिलाते हुए कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अनामिका को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो।

     

    विवान की मां यानी उनकी माँ पीछे खड़ी थीं। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ महीने पहले एक दुर्घटना के बाद विवान की याददाश्त चली गई थी। डॉक्टरों ने कहा था कि उसे पुरानी बातें याद आने में समय लग सकता है।

     

    लेकिन अनामिका को उम्मीद थी कि शायद उसे देखकर उसका भाई उसे पहचान लेगा।

     

    आखिर वह उसकी छोटी बहन थी।

     

    जिसे वह बचपन में प्यार से “नन्ही” कहता था।

     

    जिसके बिना खाना नहीं खाता था।

     

    जिसे स्कूल छोड़ने रोज जाता था।

     

    लेकिन आज…

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    अनामिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कोई बात नहीं भैया। मैं… आपकी बहन हूं।”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे सच में कुछ याद नहीं।”

     

    अनामिका ने सिर हिला दिया।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    वह अपने आंसू छिपाकर बाहर चली गई।

     

    उस दिन के बाद अनामिका रोज भाई से मिलने आती।

     

    कभी उसके लिए पसंद की मिठाई लाती।

     

    कभी बचपन की तस्वीरें दिखाती।

     

    कभी पुरानी बातें सुनाती।

     

    “भैया, आपको याद है? आपने एक बार मेरी गुल्लक तोड़ दी थी।”

     

    विवान हंसता।

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आपको क्रिकेट खेलने के लिए पैसे चाहिए थे।”

     

    विवान मुस्कुराता।

     

    “फिर?”

     

    “फिर आपने अपनी सारी बचत मुझे दे दी थी और कहा था कि गुल्लक वापस खरीद लेंगे।”

     

    विवान ध्यान से सुनता, लेकिन उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं आती।

     

    अनामिका को दुख होता।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    माँ ने कहा,

     

    “बेटा, इस बार राखी मत बांधना। अगर उसे कुछ याद नहीं है तो उसे अजीब लगेगा।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं माँ। मैं राखी जरूर बांधूंगी।”

     

    “लेकिन वह तुझे पहचानता भी नहीं।”

     

    अनामिका ने धीरे से कहा,

     

    “राखी पहचान के लिए नहीं बांधी जाती माँ… रिश्ते के लिए बांधी जाती है।”

     

    रक्षाबंधन के दिन अनामिका एक छोटी-सी थाली लेकर भाई के कमरे में गई।

     

    विवान खिड़की के पास बैठा था।

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “भैया, आज आपको पता है कौन-सा दिन है?”

     

    विवान ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “अच्छा।”

     

    “आज बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है।”

     

    विवान ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दो।”

     

    अनामिका कुछ पल उसे देखती रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने धीरे-धीरे राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    विवान ने पूछा,

     

    “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “खुशी के आंसू हैं।”

     

    राखी बांधने के बाद उसने उसके सामने मिठाई रखी।

     

    विवान ने मिठाई उठाई।

     

    फिर अचानक रुक गया।

     

    उसने राखी को गौर से देखा।

     

    “ये राखी…”

     

    अनामिका का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ याद आ रहा है।”

     

    अनामिका तुरंत उसके पास बैठ गई।

     

    “क्या?”

     

    विवान ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “एक छोटी लड़की…”

     

    अनामिका की सांस रुक गई।

     

    “वो बहुत रो रही है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसकी राखी टूट गई है।”

     

    अनामिका की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    विवान माथे पर हाथ रखकर बोला,

     

    “मैं उसे नई राखी देने के लिए बाजार जा रहा हूं।”

     

    अनामिका ने कांपते हुए पूछा,

     

    “फिर?”

     

    विवान ने आंखें खोलीं।

     

    “वो लड़की मुझे भैया कहती है।”

     

    अनामिका रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “हां भैया… वही लड़की मैं हूं।”

     

    विवान उसे देखने लगा।

     

    कुछ पल बाद उसकी आंखों में पहचान की हल्की चमक आई।

     

    “नन्ही?”

     

    अनामिका जैसे जम गई।

     

    उसके मुंह से आवाज नहीं निकली।

     

    फिर वह भाई के गले लगकर रो पड़ी।

     

    “भैया!”

     

    विवान भी भावुक हो गया।

     

    “नन्ही…”

     

    दोनों काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी रो रही थीं।

     

    लेकिन तभी विवान अचानक पीछे हट गया।

     

    उसने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद नहीं आ रहा।”

     

    अनामिका ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    “लेकिन मुझे इतना याद है कि तू मेरी बहन है।”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए इतना ही काफी है।”

     

    उस दिन के बाद विवान की याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी।

     

    कुछ बातें पहले याद आईं।

     

    फिर कुछ चेहरे।

     

    फिर घर की यादें।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा उसे अपनी बहन की बातें याद आने लगीं।

     

    एक दिन उसने अनामिका से कहा,

     

    “तू रोज मेरे पास क्यों आती थी?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैं आना बंद कर दूंगी तो शायद आपको लगेगा कि मैं सच में आपकी बहन नहीं हूं।”

     

    विवान की आंखें नम हो गईं।

     

    “तूने मुझे याद दिलाने की कोशिश क्यों नहीं छोड़ी?”

     

    “क्योंकि आप भूल सकते थे कि मैं कौन हूं… लेकिन मैं कैसे भूल जाती कि आप कौन हैं?”

     

    विवान ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुझे पहचान नहीं पाया।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “इसमें आपकी गलती नहीं थी।”

     

    “लेकिन तूने मेरा साथ नहीं छोड़ा।”

     

    “भाई को याददाश्त खोने पर बहन थोड़ी छोड़ देती है।”

     

    कुछ महीनों बाद विवान पूरी तरह ठीक होने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पुरानी अलमारी खोली।

     

    अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था।

     

    उसने डिब्बा निकाला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां थीं।

     

    विवान ने एक राखी उठाई।

     

    “ये किसकी है?”

     

    अनामिका ने देखकर कहा,

     

    “मेरी।”

     

    “इतनी सारी?”

     

    “हर साल की।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    फिर उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “अगली राखी के लिए नई राखी मत बनाना।”

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद चुनूंगा।”

     

    “क्या?”

     

    “एक ऐसी राखी जिसमें सबसे मजबूत धागा हो।”

     

    अनामिका हंस पड़ी।

     

    “इतनी मजबूत क्यों?”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “ताकि अगर मेरी याददाश्त फिर कभी मेरा साथ छोड़ दे… तो भी वो धागा मुझे तेरे रिश्ते की याद दिलाता रहे।”

     

    अनामिका की आंखें भर आईं।

     

    उसने भाई की कलाई पकड़कर कहा,

     

    “अब आपको कभी भूलने नहीं दूंगी।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    “और मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    उस रक्षाबंधन ने दोनों को एक बात सिखा दी थी—

     

    रिश्ते सिर्फ यादों से नहीं चलते।

     

    कभी-कभी यादें चली जाती हैं, चेहरे भूल जाते हैं, नाम मिट जाते हैं…

     

    लेकिन सच्चा प्यार अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।

     

    और एक छोटी-सी राखी…

     

    कभी-कभी उस रास्ते की पहली निशानी बन जाती है।

  • एक राखी हजारों यादें

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक राखी, हजारों यादें

     

    “भैया की अलमारी खोलने की इजाजत मुझे कभी नहीं थी।”

     

    मीरा ने अलमारी के सामने खड़े होकर धीरे से खुद से कहा।

     

    आज कई साल बाद वह अपने पुराने घर में आई थी। माँ ने उसे फोन करके कहा था कि कमरे की सफाई कर दे, क्योंकि काफी समय से बंद पड़ा था।

     

    अलमारी खोलते ही पुराने कपड़ों की खुशबू कमरे में फैल गई।

     

    मीरा कपड़े निकालकर अलग कर रही थी कि अचानक पीछे की तरफ रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा नीचे गिर पड़ा।

     

    उसने डिब्बा उठाया।

     

    ऊपर धूल जमी थी।

     

    मीरा ने अपनी हथेली से धूल हटाई।

     

    डिब्बे पर छोटे अक्षरों में लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन के लिए।”

     

    मीरा का हाथ रुक गया।

     

    यह उसके भाई आरव की लिखावट थी।

     

    वही आरव, जो छह साल पहले घर छोड़कर चला गया था।

     

    उसके बाद कभी वापस नहीं आया।

     

    घरवालों से उसकी आखिरी मुलाकात भी बहुत अच्छी नहीं रही थी।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां रखी थीं।

     

    कुछ टूट चुकी थीं, कुछ के रंग फीके पड़ गए थे।

     

    सबसे ऊपर एक छोटी-सी राखी रखी थी, जो शायद मीरा ने बचपन में बनाई थी।

     

    उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया।

     

    वह आठ साल की थी और आरव उससे छह साल बड़ा था।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह भाई के पीछे भागती थी।

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    आरव हाथ पीछे कर लेता।

     

    “पहले बताओ गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    मीरा मुंह बनाकर कहती,

     

    “आप पहले राखी बंधवाओ।”

     

    “नहीं। पहले गिफ्ट।”

     

    “ठीक है, इस बार गिफ्ट नहीं दूंगी।”

     

    “तो राखी भी नहीं बंधवाऊंगा।”

     

    दोनों की नोकझोंक चलती रहती।

     

    फिर आखिर में आरव खुद हाथ आगे कर देता।

     

    “चल, बांध दे।”

     

    मीरा हंसते हुए राखी बांधती और आरव उसके सिर पर हाथ रखकर कहता,

     

    “हमेशा खुश रहना।”

     

    मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने अगली राखी उठाई।

     

    उसके साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा की स्कूल फीस भरने के लिए मैंने अपनी नई साइकिल नहीं खरीदी थी।”

     

    मीरा चौंक गई।

     

    उसे वह बात कभी पता नहीं थी।

     

    उसे हमेशा लगा था कि आरव ने साइकिल खरीदी ही नहीं क्योंकि उसे साइकिल पसंद नहीं थी।

     

    उसने अगली पर्ची उठाई।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा को तेज बुखार था और मैंने पूरी रात उसके पास बैठकर बिताई थी।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसे याद था।

     

    उस रात वह बार-बार कह रही थी,

     

    “भैया, मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव उसका हाथ पकड़कर कह रहा था,

     

    “मैं हूं ना। तू सो जा।”

     

    मीरा ने अगली राखी उठाई।

     

    फिर एक और।

     

    हर राखी के साथ एक याद जुड़ी थी।

     

    कहीं उसने मीरा की स्कूल फीस के लिए अपनी चीज बेची थी।

     

    कहीं उसकी किताबें खरीदी थीं।

     

    कहीं उसकी गलती छिपाकर उसे पापा की डांट से बचाया था।

     

    मीरा डिब्बे के नीचे तक पहुंच गई।

     

    वहां एक बंद लिफाफा रखा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था—

     

    “मीरा को तभी देना, जब उसे लगे कि उसका भाई उसे छोड़कर चला गया।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    “मीरा,

     

    अगर तू ये पत्र पढ़ रही है, तो शायद तू मुझसे बहुत नाराज होगी।

     

    तुझे लगेगा कि मैं बिना कुछ कहे घर छोड़कर चला गया।

     

    तुझे लगेगा कि मुझे तुझसे कोई प्यार नहीं था।

     

    लेकिन सच कुछ और है।

     

    पापा की बीमारी के बाद घर पर बहुत कर्ज हो गया था। मैं चाहता था कि तेरी पढ़ाई किसी भी हालत में न रुके।

     

    मुझे शहर से बाहर नौकरी मिली थी।

     

    मैं जानता था कि अगर मैं चला गया तो तू मुझसे नाराज होगी।

     

    लेकिन अगर मैं नहीं जाता, तो शायद तेरी पढ़ाई रुक जाती।

     

    इसलिए मैंने जाने का फैसला किया।

     

    माँ से कहा कि तुझे मत बताना।

     

    मैं चाहता था कि तू पढ़ाई करे और अपने सपने पूरे करे।

     

    मैंने कभी तुझे अकेला छोड़ना नहीं चाहा।

     

    बस चाहता था कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

     

    और हां…

     

    हर रक्षाबंधन पर मैं तेरी राखी लेने आता था।

     

    तू मुझे देख नहीं पाती थी, क्योंकि मैं दूर से माँ को राखी दे जाता था।

     

    मुझे डर था कि अगर मैं सामने आ गया तो शायद वापस जाने की हिम्मत नहीं कर पाऊंगा।

     

    तू मुझे याद करती होगी।

     

    मैं भी तुझे हर दिन याद करता हूं।

     

    तेरा भाई।”

     

    मीरा पत्र को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई,

     

    “तुझे मिल गया?”

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    “माँ… आपने मुझसे ये सब क्यों छिपाया?”

     

    माँ की आंखें भी भर आईं।

     

    “क्योंकि ये आरव की इच्छा थी।”

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “पता नहीं।”

     

    मीरा ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    “पिछले साल तक वह कभी-कभी फोन करता था। फिर उसका फोन बंद हो गया।”

     

    मीरा का दिल बैठ गया।

     

    उसने तुरंत भाई का पुराना नंबर मिलाया।

     

    फोन बंद था।

     

    वह पूरी रात आरव की तस्वीरें देखती रही।

     

    बचपन की तस्वीरें।

     

    स्कूल की तस्वीरें।

     

    रक्षाबंधन की तस्वीरें।

     

    हर तस्वीर में एक ही चीज दिखाई दे रही थी—

     

    आरव की कलाई पर राखी।

     

    अगली सुबह मीरा ने फैसला किया।

     

    “माँ, मैं भैया को ढूंढने जाऊंगी।”

     

    “लेकिन कहां?”

     

    “जहां से उनका आखिरी फोन आया था।”

     

    कई घंटों की तलाश के बाद उसे पता चला कि आरव जिस शहर में काम करता था, वहां एक छोटी-सी दुकान थी जहां वह अक्सर जाया करता था।

     

    मीरा वहां पहुंची।

     

    दुकानदार ने उसे देखते ही पूछा,

     

    “आप आरव की बहन हैं?”

     

    मीरा की आंखें चमक उठीं।

     

    “जी! आपको पता है वो कहां हैं?”

     

    दुकानदार मुस्कुराया।

     

    “वो कुछ महीने पहले यहां से गया था। लेकिन जाने से पहले एक चीज मेरे पास छोड़ गया था।”

     

    उसने दराज से एक छोटा डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक नई राखी थी।

     

    और एक छोटी-सी पर्ची।

     

    “इस बार शायद मैं घर न आ पाऊं। लेकिन मेरी बहन राखी बांधना मत भूलना।”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह उसी समय घर लौट आई।

     

    माँ के सामने बैठकर उसने राखी उठाई।

     

    “भैया जहां भी होंगे, आज मैं उन्हें राखी बांधूंगी।”

     

    उसने राखी अपनी कलाई पर बांधी।

     

    फिर आंखें बंद करके बोली,

     

    “भैया, आपने कहा था ना कि मैं हमेशा खुश रहूं?”

     

    उसकी आवाज भर्रा गई।

     

    “तो आप भी जहां हैं, खुश रहना।”

     

    अचानक बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    माँ ने दरवाजा खोला।

     

    सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    हाथ में छोटा-सा बैग था।

     

    चेहरे पर हल्की मुस्कान।

     

    मीरा ने उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे पहचान ही नहीं पाई।

     

    फिर उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “भैया…!”

     

    आरव ने मुस्कुराकर हाथ आगे कर दिया।

     

    “राखी लाई है?”

     

    मीरा दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “इतने साल कहां थे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तेरी यादों में।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब नहीं जाऊंगा।”

     

    मीरा ने पुराने लकड़ी के डिब्बे को देखा।

     

    उसमें पड़ी हर राखी अब उसे सिर्फ धागा नहीं लग रही थी।

     

    हर राखी में उसके भाई का एक त्याग था।

     

    एक कहानी थी।

     

    एक याद थी।

     

    और सबसे बढ़कर…

     

    एक ऐसा प्यार था, जिसे दूरी भी खत्म नहीं कर सकी।

     

    उसने डिब्बा बंद किया और मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “भैया, अब समझ आया… एक राखी में सिर्फ एक धागा नहीं होता। उसमें बचपन की शरारतें, लड़ाइयां, आंसू, त्याग और हजारों यादें बंधी होती हैं।”

    आरव ने उसकी कलाई पर हाथ रखा।

    “और उन यादों में सबसे खूबसूरत तू है।”

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन ने सिर्फ राखी का त्योहार नहीं मनाया।

    उन्होंने उन छह सालों को फिर से जी लिया…

    जिनमें दूरी बहुत थी,लेकिन प्यार उससे भी ज्यादा था।

  • बहन की राखी और भाई का राज़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहन की राखी और भाई का राज़

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में सिया अपनी माँ के साथ रहती थी। रक्षाबंधन में बस दो दिन बाकी थे और सिया पूरे घर को सजाने में लगी थी।

     

    लेकिन एक बात उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी।

     

    उसका बड़ा भाई आकाश पिछले कुछ महीनों से बहुत बदल गया था।

     

    पहले वह हर छोटी-बड़ी बात अपनी बहन को बताता था। सिया को कोई परेशानी होती तो सबसे पहले आकाश को फोन करती। लेकिन अब आकाश फोन तो करता था, मगर कुछ मिनट बात करके जल्दी से फोन रख देता।

     

    सिया कई बार पूछ चुकी थी,

     

    “भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो क्या?”

     

    आकाश हर बार हंसकर कहता,

     

    “नहीं पगली, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    लेकिन सिया को यकीन नहीं होता।

     

    इस बार रक्षाबंधन पर उसने आकाश के लिए खुद राखी बनाई थी। राखी के बीच में एक छोटा-सा चांदी का दिल लगा था।

     

    वह राखी हाथ में लेकर मुस्कुराई।

     

    “देखना भैया, इस बार आपसे एक बड़ा गिफ्ट लूंगी।”

     

    माँ ने पीछे से आवाज लगाई,

     

    “पहले भाई को आने तो दे।”

     

    सिया ने हंसकर कहा,

     

    “आएगा क्यों नहीं? उसने खुद कहा है कि इस बार रक्षाबंधन मेरे साथ मनाएगा।”

     

    लेकिन अगले ही दिन आकाश का फोन आया।

     

    “सिया, इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    सिया कुछ सेकंड चुप रही।

     

    “क्यों?”

     

    “काम बहुत है।”

     

    “आपने वादा किया था।”

     

    “पता है… लेकिन मजबूरी है।”

     

    “आपकी मजबूरी क्या है?”

     

    आकाश चुप हो गया।

     

    फिर बोला,

     

    “राखी संभालकर रखना। मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सिया को गुस्सा आ गया।

     

    “हर बार यही! जरूर कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    उस रात सिया ने तय किया कि वह खुद पता लगाएगी।

     

    अगली सुबह उसने आकाश के पुराने दोस्त करण को फोन किया।

     

    “करण भैया, आपको पता है आकाश भैया इन दिनों इतने परेशान क्यों रहते हैं?”

     

    करण कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “सिया, मुझे नहीं लगता कि मुझे तुम्हें बताना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आकाश खुद चाहता है कि तुमसे ये बात छिपी रहे।”

     

    सिया का दिल धड़क उठा।

     

    “मतलब कोई बड़ी बात है?”

     

    करण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम उससे खुद पूछो।”

     

    “आप बस इतना बता दो कि वो ठीक हैं?”

     

    करण ने जवाब दिया,

     

    “हां, वो ठीक हैं।”

     

    लेकिन इस जवाब ने सिया की चिंता और बढ़ा दी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह आ गई।

     

    घर में मिठाई बन रही थी। माँ ने पूजा की थाली सजा दी थी। सिया ने भी नए कपड़े पहन लिए थे।

     

    लेकिन उसका भाई अब तक नहीं आया था।

     

    दोपहर हो गई।

     

    फिर शाम।

     

    सिया बार-बार दरवाजे की तरफ देखती।

     

    माँ ने समझाया,

     

    “बेटा, शायद काम में फंस गया होगा।”

     

    सिया ने धीमे से कहा,

     

    “माँ, मुझे लगता है भैया किसी परेशानी में हैं।”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    सिया दौड़कर बाहर गई।

     

    सामने आकाश खड़ा था।

     

    चेहरे पर थकान थी, कपड़े भी सफर की वजह से थोड़े अस्त-व्यस्त थे।

     

    लेकिन हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

     

    सिया उसे देखते ही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आपने कहा था नहीं आओगे।”

     

    आकाश मुस्कुराया,

     

    “अपनी बहन की राखी छोड़कर कैसे रहता?”

     

    सिया ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

     

    “भैया… आप ठीक तो हो?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    “झूठ।”

     

    आकाश हंस पड़ा।

     

    “अंदर चल।”

     

    सिया ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    आकाश उसके सामने बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, आरती की और फिर अपनी बनाई हुई राखी निकाली।

     

    उसने राखी आकाश की कलाई पर बांध दी।

     

    “अब बताइए।”

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “आपका राज़।”

     

    आकाश की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    माँ भी चुप हो गईं।

     

    आकाश ने कुछ देर अपनी राखी को देखा।

     

    फिर जेब से एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसने लिफाफा सिया की तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे खोल।”

     

    सिया ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    वह उन्हें पढ़ने लगी।

     

    उसकी आंखें अचानक बड़ी हो गईं।

     

    “ये क्या है?”

     

    आकाश ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कॉलेज की फीस की रसीदें।”

     

    सिया ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मेरी फीस तो…”

     

    “पिछले दो साल से मैं भर रहा हूं।”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    “माँ ने कहा था कि अब घर की हालत ऐसी नहीं कि तुम्हारी पढ़ाई का पूरा खर्च उठा सकें। मैंने सोचा, जब तक मैं हूं, तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    सिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू अपनी पढ़ाई को लेकर कभी चिंता न करे।”

     

    सिया ने सिर झुका लिया।

     

    फिर अचानक उसकी नजर आकाश के हाथ पर पड़ी।

     

    उसकी कलाई पर हल्की चोट का निशान था।

     

    “ये कैसे हुआ?”

     

    आकाश ने हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “भैया!”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “सच बताइए।”

     

    आकाश ने लंबी सांस ली।

     

    “कुछ दिन पहले काम से लौटते समय रास्ते में गिर गया था।”

     

    “और आपने मुझे बताया तक नहीं?”

     

    “तू परेशान हो जाती।”

     

    सिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं आपकी बहन हूं। आपकी परेशानी में परेशान होने का हक भी मेरा है।”

     

    आकाश कुछ नहीं बोला।

     

    तभी माँ ने धीमे से कहा,

     

    “सिया, अभी एक बात और है जो तुझे नहीं पता।”

     

    सिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरे भैया ने पिछले महीने अपनी बाइक बेच दी।”

     

    “क्या?”

     

    सिया ने आकाश की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “तेरे कॉलेज की आगे की पढ़ाई और हॉस्टल की फीस के लिए।”

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बहने लगे।

     

    वह आकाश के पास जाकर बैठ गई।

     

    “भैया… आपको बाइक बहुत पसंद थी ना?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “थी।”

     

    “फिर बेच दी?”

     

    “बाइक दोबारा खरीदी जा सकती है।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन मेरी बहन की पढ़ाई का समय दोबारा नहीं आएगा।”

     

    सिया ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “आप इतने अच्छे क्यों हो?”

     

    आकाश ने हंसकर कहा,

     

    “क्योंकि तू इतनी परेशान करने वाली बहन है।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन सिया का मन अभी भी भारी था।

     

    उसने राखी वाली कलाई को अपने हाथों में लिया।

     

    “भैया, आज मैं भी आपको एक वादा करूंगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं आपकी मेहनत बेकार नहीं जाने दूंगी।”

     

    आकाश ने उसे देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मैं खूब पढ़ूंगी। अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी। और एक दिन आपको वो सब वापस दूंगी जो आपने मेरे लिए छोड़ा है।”

     

    आकाश ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तुझसे कुछ वापस नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन मुझे देना है।”

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मेरी कलाई पर नहीं, मेरी जिंदगी पर भरोसे का धागा बांधा है।”

     

    आकाश की आंखें भी नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जिंदगी में कितनी भी मुश्किल आए, अपने सपनों से समझौता मत करना।”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वादा।”

     

    कुछ साल बाद सिया ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली।

     

    उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह बाजार गई और एक डिब्बा लेकर घर लौटी।

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या लाई है?”

     

    सिया ने डिब्बा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    आकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “उस बाइक की जगह तो नहीं ले सकती जो आपने मेरे लिए बेच दी थी… लेकिन ये आपकी मेहनत की पहली छोटी-सी वापसी है।”

     

    आकाश की आंखें भर आईं।

     

    सिया ने उसकी कलाई देखी।

     

    वही कलाई, जिस पर सालों पहले उसने एक छोटी-सी राखी बांधी थी।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “भैया, आपका राज़ मुझे बहुत देर से पता चला।”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “और अब?”

     

    “अब समझ आया कि कुछ भाई अपनी बहन को सिर्फ राखी का तोहफा नहीं देते…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “वे अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उसके सपनों के नाम कर देते हैं।”

     

    आकाश ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    और उस दिन सिया को एहसास हुआ—

     

    राखी का धागा कलाई पर कुछ पल के लिए बंधता है, लेकिन भाई का प्यार पूरी जिंदगी साथ रहता है।

  • भाई की कलाई पर बंधा वादा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाई की कलाई पर बंधा वादा

    रक्षाबंधन आने में बस दो दिन बाकी थे। पूरे घर में त्योहार की तैयारियां चल रही थीं, लेकिन काव्या के मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    वह बार-बार अपना फोन देखती और फिर रख देती।

     

    उसे अपने भाई रोहन के फोन का इंतजार था।

     

    रोहन पिछले पांच साल से दूसरे शहर में नौकरी करता था। पहले वह हर रक्षाबंधन पर घर जरूर आता था, लेकिन पिछले साल काम की वजह से नहीं आ पाया था।

     

    इस बार उसने काव्या से वादा किया था—

     

    “इस रक्षाबंधन पर चाहे कुछ भी हो जाए, मैं घर जरूर आऊंगा।”

     

    काव्या को भाई की बात पर पूरा भरोसा था।

     

    वह बाजार से राखी खरीदने की बजाय खुद राखी बना रही थी।

     

    उसने लाल और सुनहरे धागे में मोती लगाए और बीच में एक छोटा-सा लकड़ी का अक्षर लगाया—

     

    “भैया”

     

    माँ ने उसे देखा तो मुस्कुराते हुए बोलीं,

     

    “इतनी मेहनत क्यों कर रही है? बाजार से अच्छी-सी राखी ले आती।”

     

    काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “बाजार की राखी तो कोई भी बांध देगा माँ, लेकिन ये राखी सिर्फ मेरे भैया के लिए है।”

     

    माँ कुछ नहीं बोलीं।

     

    बस बेटी के सिर पर हाथ फेर दिया।

     

    काव्या और रोहन बचपन से ही बहुत करीब थे।

     

    पिता के गुजर जाने के बाद रोहन ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी संभाल ली थीं।

     

    उस समय रोहन सिर्फ सत्रह साल का था।

     

    काव्या उससे चार साल छोटी थी।

     

    एक दिन काव्या ने स्कूल की फीस के लिए रोते हुए कहा था,

     

    “भैया, अगर फीस नहीं भरी तो मैडम मुझे स्कूल से निकाल देंगी।”

     

    रोहन ने उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा था,

     

    “तू बस पढ़ाई कर। तेरी पढ़ाई कभी नहीं रुकेगी।”

     

    अगले दिन रोहन अपनी पसंद की घड़ी बेचकर उसकी फीस भर आया था।

     

    काव्या को सालों बाद यह बात पता चली थी।

     

    उसने तब रोहन से पूछा था,

     

    “आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    रोहन हंसकर बोला था,

     

    “भाई अपनी बहन से हिसाब थोड़ी करता है।”

     

    उस दिन से काव्या के लिए रोहन सिर्फ भाई नहीं था।

     

    वह उसका सबसे बड़ा सहारा था।

     

    रक्षाबंधन की सुबह काव्या जल्दी उठ गई।

     

    उसने घर सजाया।

     

    माँ ने मिठाई बनाई।

     

    काव्या ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    लेकिन दोपहर हो गई और रोहन नहीं आया।

     

    काव्या ने फोन लगाया।

     

    फोन बंद था।

     

    उसका चेहरा उतर गया।

     

    माँ ने कहा,

     

    “शायद रास्ते में होगा।”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन भैया ने कहा था सुबह तक पहुंच जाएंगे।”

     

    शाम होने लगी।

     

    बाहर आसमान में काले बादल छा गए।

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    काव्या दरवाजे के पास बैठ गई।

     

    उसकी आंखें रास्ते पर टिकी थीं।

     

    तभी फोन की घंटी बजी।

     

    काव्या ने तुरंत फोन उठाया।

     

    “हैलो भैया!”

     

    लेकिन सामने रोहन नहीं था।

     

    एक अनजान आदमी की आवाज आई।

     

    “क्या आप रोहन की बहन हैं?”

     

    काव्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “जी… क्या हुआ?”

     

    “आप घबराइए मत। रोहन का रास्ते में एक्सीडेंट हुआ है। उन्हें अस्पताल लाया गया है।”

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    “वो ठीक हैं?”

     

    “डॉक्टर इलाज कर रहे हैं।”

     

    फोन कट गया।

     

    काव्या ने तुरंत माँ को बताया।

     

    दोनों अस्पताल के लिए निकल पड़े।

     

    अस्पताल पहुंचते ही काव्या डॉक्टर के पास भागी।

     

    “डॉक्टर साहब, मेरे भैया… रोहन…”

     

    डॉक्टर ने कहा,

     

    “उनकी हालत गंभीर थी, लेकिन अभी हम उनका इलाज कर रहे हैं। आपको हिम्मत रखनी होगी।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    वह अस्पताल के बाहर बैठ गई।

     

    उसके हाथ में अब भी वही राखी थी।

     

    वह राखी को देखकर फुसफुसाई,

     

    “भैया… आपने वादा किया था।”

     

    कुछ देर बाद एक नर्स बाहर आई।

     

    उसने काव्या को एक छोटा-सा बैग दिया।

     

    “ये सामान रोहन के पास था।”

     

    काव्या ने बैग खोला।

     

    उसमें रोहन का फोन, बटुआ और एक छोटा-सा डिब्बा था।

     

    काव्या ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक सुंदर-सी चांदी की पायल थी।

     

    साथ में एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    काव्या ने कांपते हाथों से पर्ची खोली।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन के लिए। इस बार राखी पर उसे खाली हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    काव्या फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “भैया… मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप ठीक होकर मेरे सामने आ जाओ।”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    आखिरकार डॉक्टर बाहर आए।

     

    “अब खतरा कम है। उन्हें होश आने में थोड़ा समय लगेगा।”

     

    काव्या ने राहत की सांस ली।

     

    अगली सुबह रोहन ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

     

    सामने काव्या बैठी थी।

     

    उसकी आंखें पूरी रात रोने से लाल थीं।

     

    रोहन ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “तू… यहां क्यों बैठी है?”

     

    काव्या ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि आप अपना वादा निभाने आए थे ना?”

     

    रोहन हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैंने कहा था… रक्षाबंधन पर घर आऊंगा।”

     

    “और अस्पताल में आकर बैठ गए!”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर रोहन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “राखी लाई है?”

     

    काव्या की आंखें फिर भर आईं।

     

    उसने धीरे से राखी निकाली और रोहन की कलाई पर बांध दी।

     

    राखी बांधते हुए उसने कहा,

     

    “आज मैं आपसे एक और वादा चाहती हूं।”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “अब कभी अपनी जिंदगी को इतना जोखिम में नहीं डालोगे कि मुझे तुम्हें खोने का डर लगे।”

     

    रोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “वादा।”

     

    काव्या ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    रोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “और तू भी एक वादा कर।”

     

    “क्या?”

     

    “चाहे जिंदगी कितनी भी मुश्किल हो जाए, तू अपनी पढ़ाई और अपने सपने कभी नहीं छोड़ेगी।”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “वादा।”

     

    उस दिन अस्पताल के कमरे में दो वादे हुए।

     

    एक भाई ने अपनी बहन की जिंदगी में हमेशा रहने का वादा किया।

     

    और एक बहन ने अपने सपनों को कभी न छोड़ने का।

     

    कुछ महीने बाद रोहन पूरी तरह ठीक होकर घर लौट आया।

     

    काव्या ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे अपनी पसंद की नौकरी भी मिल गई।

     

    एक दिन रोहन ने उसकी अलमारी में वही पुरानी राखी देखी।

     

    “ये अभी तक संभालकर रखी है?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने राखी को हाथ में लेते हुए कहा,

     

    “क्योंकि ये सिर्फ राखी नहीं है भैया।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “ये उस दिन का सबूत है जब मेरी कलाई पर नहीं… आपकी कलाई पर एक वादा बंधा था।”

     

    रोहन मुस्कुराया।

     

    उसने अपनी कलाई की तरफ देखा।

     

    राखी तो कब की टूट चुकी थी।

     

    लेकिन उस राखी का वादा आज भी दोनों के दिल में वैसे ही बंधा हुआ था।

     

    क्योंकि भाई-बहन का रिश्ता धागे से नहीं, भरोसे से बंधता है। और जब उस रिश्ते में सच्चा वादा हो, तो वक्त भी उसे कमजोर नहीं कर पाता।

  • राखी का वो आखिरी धागा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राखी का वो आखिरी धागा

    सावन की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। शहर की एक छोटी-सी गली में बने पुराने से घर की खिड़की के पास नैना चुपचाप बैठी थी। उसके हाथ में एक सुंदर-सी राखी थी, जिसे उसने पूरे दो दिन लगाकर खुद बनाया था।

     

    राखी में लाल और पीले रंग के धागे थे और बीच में एक छोटा-सा चाँदी का मोती लगा था।

     

    नैना बार-बार दरवाजे की तरफ देखती और फिर अपनी राखी को देखने लगती।

     

    उसकी माँ रसोई से बोलीं,

    “नैना, बेटा… कब तक दरवाजे को देखती रहेगी? शायद इस बार भी तेरा भाई नहीं आ पाएगा।”

     

    नैना ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “नहीं माँ, भैया जरूर आएंगे।”

     

    “हर साल यही कहती है।”

     

    नैना कुछ पल चुप रही।

     

    फिर धीरे से बोली,

    “इस बार उन्होंने खुद कहा है कि राखी पर जरूर आएंगे।”

     

    उसका भाई अमन पिछले चार साल से दूसरे शहर में नौकरी कर रहा था। पहले वह हर रक्षाबंधन पर घर जरूर आता था। लेकिन पिछले दो सालों से काम का बहाना बनाकर नहीं आ पाया था।

     

    नैना को उससे शिकायत थी।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    लेकिन उससे भी ज्यादा उसे अपने भाई की याद आती थी।

     

    बचपन में दोनों की खूब लड़ाई होती थी।

     

    कभी नैना अमन की किताब छिपा देती, तो कभी अमन उसकी गुड़िया के बाल काट देता।

     

    माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर खाना खाने लगते।

     

    एक बार नैना को तेज बुखार हुआ था। रातभर अमन उसके सिरहाने बैठा रहा था।

     

    नैना ने उस समय पूछा था,

    “भैया, आप सोते क्यों नहीं?”

     

    अमन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,

    “तू ठीक हो जा, फिर मैं पूरी जिंदगी सो लूंगा।”

     

    नैना हंस पड़ी थी।

     

    आज भी वह बात उसे याद थी।

     

    तभी बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई।

     

    नैना तुरंत उठकर दरवाजे की तरफ भागी।

     

    “भैया!”

     

    लेकिन दरवाजे पर दूध वाला खड़ा था।

     

    नैना का चेहरा उतर गया।

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा।

     

    रात हो गई।

     

    अमन का फोन भी बंद आ रहा था।

     

    नैना ने राखी अपने पास रख ली।

     

    उस रात वह ठीक से सो नहीं पाई।

     

    अगली सुबह रक्षाबंधन था।

     

    घर में बाकी सब तैयारियां चल रही थीं, लेकिन नैना के मन में बस एक ही सवाल था—

     

    “क्या भैया सच में आएंगे?”

     

    दोपहर तक अमन का कोई फोन नहीं आया।

     

    नैना ने खुद फोन लगाया।

     

    इस बार फोन बजा।

     

    उसने जल्दी से फोन कान पर लगाया।

     

    “हैलो भैया?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक आदमी की आवाज आई।

     

    “क्या आप अमन की बहन बोल रही हैं?”

     

    नैना का दिल धक से रह गया।

     

    “जी… लेकिन आप कौन?”

     

    आवाज आई—

     

    “मैं अस्पताल से बोल रहा हूँ।”

     

    नैना के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    “अमन को क्या हुआ?”

     

    “आप घबराइए मत… उनका छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ है।”

     

    “वो ठीक हैं ना?”

     

    “अभी डॉक्टर उनका इलाज कर रहे हैं।”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने तुरंत माँ को बताया।

     

    कुछ ही देर में दोनों अस्पताल के लिए निकल गए।

     

    अस्पताल पहुंचकर नैना भागते हुए रिसेप्शन पर पहुंची।

     

    “अमन… अमन शर्मा… उनका एक्सीडेंट हुआ है।”

     

    नर्स ने कुछ जानकारी लेने के बाद कहा,

    “ऑपरेशन चल रहा है। आप बाहर इंतजार कीजिए।”

     

    नैना वहीं फर्श के पास लगी कुर्सी पर बैठ गई।

     

    उसके हाथ में अब भी वही राखी थी।

     

    माँ ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटा, भगवान सब ठीक करेंगे।”

     

    नैना ने राखी को कसकर पकड़ लिया।

     

    “माँ… मैंने भैया से बहुत नाराजगी रखी है।”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “मैंने उनसे कितनी बार कहा था कि मुझे फोन किया करो… लेकिन मैं खुद भी कई बार उनसे ठीक से बात नहीं करती थी।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “रिश्तों में छोटी-छोटी नाराजगी होती रहती है।”

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    आखिरकार डॉक्टर बाहर आए।

     

    “अमन की हालत अब खतरे से बाहर है। लेकिन उन्हें कुछ समय आराम की जरूरत होगी।”

     

    नैना ने राहत की सांस ली।

     

    कुछ देर बाद उसे अमन से मिलने दिया गया।

     

    अमन आंखें बंद किए लेटा था।

     

    नैना उसके पास जाकर बैठ गई।

     

    उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

     

    “भैया…”

     

    अमन ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

     

    उसे देखते ही हल्की मुस्कान आई।

     

    “तू… रो रही है?”

     

    नैना ने गुस्से में कहा,

    “आपको क्या लगता है? मैं नाचूंगी?”

     

    अमन हल्का-सा हंसने लगा।

     

    “मुझे पता था… तू मुझे डांटेगी।”

     

    “आपने आने का वादा किया था।”

     

    “मैं आया तो हूं।”

     

    “लेकिन अस्पताल में!”

     

    दोनों कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर अमन ने कमजोर आवाज में पूछा,

    “राखी लाई है?”

     

    नैना ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    वही लाल-पीली राखी देखकर अमन की आंखों में चमक आ गई।

     

    “इतनी सुंदर राखी… मेरे लिए?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    उसने धीरे से अमन की कलाई पर राखी बांधी।

     

    अमन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    नैना बोली—

     

    “इस बार मैं कोई बड़ा गिफ्ट नहीं मांगूंगी।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस एक वादा।”

     

    “बोल।”

     

    “अगले रक्षाबंधन पर मुझे अस्पताल में राखी नहीं बांधनी पड़ेगी।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    उसने नैना का हाथ पकड़कर कहा,

     

    “वादा।”

     

    कुछ दिन बाद अमन घर वापस आ गया।

     

    लेकिन उस हादसे ने दोनों भाई-बहन को बदल दिया था।

     

    अब छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी नहीं होती थी।

     

    अमन हर शाम अपनी बहन को फोन करता।

     

    नैना भी उसकी आवाज सुनकर मुस्कुरा देती।

     

    एक साल बाद फिर रक्षाबंधन आया।

     

    नैना सुबह से दरवाजे पर बैठी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

     

    अचानक दरवाजा खुला।

     

    अमन सामने खड़ा था।

     

    हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

     

    “मैडम, राखी बांधने का समय हो गया है।”

     

    नैना की आंखें भर आईं।

     

    वह दौड़कर भाई के गले लग गई।

     

    “आप सच में आ गए।”

     

    अमन ने हंसते हुए कहा,

     

    “इस बार कोई हादसा नहीं। सीधे घर आया हूं।”

     

    नैना ने राखी बांधी।

     

    अमन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    उसमें एक चांदी का छोटा-सा कंगन था।

     

    “तेरे लिए।”

     

    नैना ने कहा,

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “तो?”

     

    “बस ऐसे ही हर साल आते रहना।”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    और दोनों की आंखों में एक ही बात थी—

     

    राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।

     

    वह बचपन की याद होती है।

     

    वह हजारों झगड़ों के बाद भी बचा हुआ प्यार होती है।

     

    और कभी-कभी…

     

    वही छोटा-सा धागा किसी रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

  • सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    सिगरेट की लत ने बदल दी दुनिया

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    रवि एक मेहनती और खुशमिजाज लड़का था। वह अपने परिवार के साथ रहता था और भविष्य में कुछ बड़ा करने का सपना देखता था।

     

    कॉलेज के दिनों में उसके कुछ दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उसे सिगरेट पीने के लिए कहा। रवि ने पहले मना किया, लेकिन दोस्तों के दबाव में आकर उसने एक सिगरेट पी ली।

     

    उसे लगा कि यह बस एक बार की बात है। लेकिन धीरे-धीरे वही एक सिगरेट उसकी रोज़ की आदत बन गई।

     

    कुछ महीनों बाद रवि बिना सिगरेट के बेचैन रहने लगा। पढ़ाई और काम में उसका मन कम लगने लगा। घरवालों ने समझाया, लेकिन वह हर बार कहता, “मैं जब चाहूँगा, छोड़ दूँगा।”

     

    समय बीतता गया। उसकी सेहत और पैसे दोनों पर असर पड़ने लगा। सबसे ज्यादा दुख उसके माता-पिता को होता था, जो अपने बेटे को इस आदत से परेशान देखते थे।

     

    एक दिन रवि ने अपने पिता को चुपचाप रोते हुए देखा। पिता ने सिर्फ इतना कहा, “बेटा, हमें तुम्हारे पैसों की नहीं, तुम्हारी जिंदगी की चिंता है।”

     

    ये शब्द रवि के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अपनी इस आदत से बाहर निकलने की कोशिश करेगा। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उसने परिवार का साथ लिया और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मदद भी ली।

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद रवि ने सिगरेट से दूरी बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी।

     

    रवि ने समझ लिया कि लत कभी छोटी नहीं होती। शुरुआत चाहे मज़ाक में हो, लेकिन उसका असर जिंदगी पर बहुत बड़ा हो सकता है।

     

    सीख: गलत आदत को “बस एक बार” कहकर शुरू करना आसान है, लेकिन उससे बाहर निकलने के लिए हिम्मत, परिवार का साथ और सही मदद जरूरी होती है।

  • सिगरेट की लत

    सिगरेट की लत

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
    • रमेश एक मेहनती लड़का था। वह अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। दोस्तों के साथ बैठते समय उसने पहली बार सिगरेट पी। दोस्तों ने कहा, “एक बार पीने से कुछ नहीं होता।”

     

    रमेश ने भी यही सोचा। लेकिन धीरे-धीरे एक सिगरेट रोज की आदत बन गई। फिर दो, फिर तीन… अब बिना सिगरेट के उसका मन बेचैन रहने लगा।

     

    उसकी माँ अक्सर कहतीं, “बेटा, ये सिगरेट छोड़ दे। हमें तेरी सेहत की चिंता होती है।”

     

    रमेश हर बार कहता, “माँ, छोड़ दूँगा… बस थोड़ा समय दो।”

     

    एक दिन सीढ़ियाँ चढ़ते समय रमेश जल्दी थक गया। उसे समझ आया कि जिस चीज को वह मज़ाक समझकर शुरू किया था, वही अब उसकी जिंदगी पर असर डाल रही थी।

     

    उस रात उसने अपनी माँ की बात याद की। उसने फैसला किया कि वह इस आदत से छुटकारा पाने की कोशिश करेगा। उसने अपने भरोसेमंद परिवारवालों से मदद ली और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेने का निर्णय किया।

     

    कई दिनों तक मुश्किल हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ समय बाद उसकी जिंदगी बदलने लगी। उसे महसूस हुआ कि असली आज़ादी वही है, जब इंसान किसी बुरी आदत का गुलाम न रहे।

     

    कहानी की सीख:

    सिगरेट की शुरुआत भले ही छोटी लगे, लेकिन निकोटीन की लत पकड़ सकती है। इसलिए शुरुआत ही न करना सबसे अच्छा है। और अगर किसी को लत लग चुकी हो, तो शर्मिंदा होने के बजाय किसी भरोसेमंद बड़े या स्वास्थ्यकर्मी से मदद लेना बेहतर है।

  • 🧚‍♀️ जादुई परियों की कहानी 🧚‍♀️

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के ठीक बारह बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, तभी आसमान से एक चमकता हुआ सितारा टूटकर धरती पर आ गिरा। लेकिन वह साधारण सितारा नहीं था। उसके गिरते ही जंगल के बीचों-बीच हजारों सुनहरी रोशनियाँ जगमगा उठीं और हवा में किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही… क्या कोई हमें ढूँढ़ पाएगा?”

     

    अगली सुबह दस साल की मीरा ने अपने खिड़की के पास एक चमकीला सुनहरा पंख पड़ा देखा। पंख को हाथ में लेते ही वह गर्म हो गया और उसमें से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—

     

    “मीरा… हमें तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    मीरा की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    पंख से आवाज़ आई, “हम जादुई परियाँ हैं… और हमारा जादुई राज्य खतरे में है!”

     

    मीरा डरने के बजाय उत्साहित हो गई। उसने पंख को अपनी छोटी-सी लाल थैली में रखा और बिना किसी को बताए जंगल की ओर चल पड़ी।

     

    गाँव के बाहर एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। दादी हमेशा कहती थीं कि उसके आगे वाला जंगल रहस्यमयी है और वहाँ कभी अकेले नहीं जाना चाहिए। लेकिन आज मीरा के मन में डर से ज्यादा उस आवाज़ को जानने की इच्छा थी।

     

    जैसे ही वह बरगद के पेड़ के पास पहुँची, पेड़ के तने पर एक चमकता हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया। दरवाज़े पर लिखा था—

     

    “जिसके मन में सच्चाई और दया हो, वही अंदर आ सकता है।”

     

    मीरा ने दरवाज़े को छुआ।

     

    अचानक तेज रोशनी हुई और वह एक अनोखी दुनिया में पहुँच गई।

     

    वहाँ आसमान गुलाबी था, बादल रुई जैसे सफेद थे और पेड़ों पर फूलों की जगह छोटे-छोटे सितारे खिले हुए थे। नदियों का पानी चाँदी की तरह चमक रहा था। रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में उड़ रही थीं और छोटे-छोटे खरगोश अपने कानों से जादुई घंटियाँ बजा रहे थे।

     

    तभी सामने से चार सुंदर परियाँ उड़ती हुई आईं।

     

    सबसे आगे नीले पंखों वाली परी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “स्वागत है, मीरा। मैं नीलपरी हूँ।”

     

    उसके साथ गुलाबी पंखों वाली परी बोली, “मैं फूलपरी हूँ।”

     

    पीले पंखों वाली परी ने कहा, “मेरा नाम सूरजपरी है।”

     

    और सबसे छोटी हरे पंखों वाली परी बोली, “मैं वनपरी हूँ।”

     

    मीरा ने पूछा, “आप लोगों को मेरी मदद क्यों चाहिए?”

     

    नीलपरी का चेहरा अचानक उदास हो गया।

     

    “हमारे जादुई राज्य का ‘सतरंगी रत्न’ चोरी हो गया है। उसके बिना हमारे जंगल के फूल मुरझा रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और हमारी जादुई रोशनी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।”

     

    “रत्न किसने चुराया?” मीरा ने पूछा।

     

    वनपरी ने धीरे से कहा, “काली गुफा में रहने वाला छायादानव।”

     

    मीरा थोड़ी घबराई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    “अगर मैं आपकी मदद कर सकती हूँ, तो मैं जरूर करूँगी।”

     

    चारों परियाँ खुशी से उसके चारों ओर उड़ने लगीं।

     

    उन्होंने मीरा को एक जादुई नक्शा दिया। नक्शे पर तीन जगह चमक रही थीं—फुसफुसाती नदी, उल्टा पहाड़ और चाँदनी गुफा।

     

    “इन तीन स्थानों को पार करके ही छायादानव की गुफा तक पहुँचा जा सकता है,” नीलपरी ने बताया।

     

    सबसे पहले वे फुसफुसाती नदी के पास पहुँचे। नदी का पानी लगातार बातें कर रहा था।

     

    “जो सच बोलेगा, वही आगे जाएगा… जो झूठ बोलेगा, वह यहीं रह जाएगा…”

     

    नदी ने मीरा से पूछा, “तुम यहाँ क्यों आई हो?”

     

    मीरा ने कहा, “मैं अपने लिए कोई जादू लेने नहीं आई। मैं इन परियों की मदद करने आई हूँ।”

     

    नदी चमक उठी और उसके बीच एक पुल बन गया।

     

    इसके बाद वे उल्टे पहाड़ के पास पहुँचे। वहाँ पेड़ नीचे और जड़ें ऊपर थीं। पहाड़ का रास्ता बहुत कठिन था। मीरा कई बार फिसली, लेकिन सूरजपरी और वनपरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    आखिर वे चाँदनी गुफा तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर इतनी अंधेरी थी कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी मीरा ने अपनी थैली से सुनहरा पंख निकाला। पंख चमका और पूरा रास्ता रोशन हो गया।

     

    अचानक एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “कौन है जो मेरी गुफा में आने की हिम्मत कर रहा है?”

     

    सामने एक विशाल काला साया दिखाई दिया।

     

    वह छायादानव था।

     

    उसके हाथ में सतरंगी रत्न चमक रहा था।

     

    परियाँ डरकर पीछे हट गईं, लेकिन मीरा आगे बढ़ी।

     

    “वह रत्न वापस कर दो।”

     

    दानव जोर से हँसा।

     

    “तुम मुझे आदेश दोगी? मैं इस रत्न की शक्ति से पूरे जादुई राज्य को अपना गुलाम बना सकता हूँ!”

     

    मीरा ने ध्यान से उसे देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन कहीं न कहीं बहुत गहरी उदासी भी थी।

     

    मीरा ने पूछा, “तुमने यह रत्न चुराया क्यों?”

     

    दानव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि… मुझे कोई अपना नहीं मानता।”

     

    सभी परियाँ चौंक गईं।

     

    दानव ने कहा, “मैं भी कभी इस जादुई राज्य का रक्षक था। लेकिन एक दिन मेरी जादुई शक्ति खत्म हो गई। सभी परियों ने मुझे कमजोर समझकर दूर कर दिया। तब से मैं इस अंधेरी गुफा में अकेला रहता हूँ।”

     

    मीरा को उस पर दया आ गई।

     

    उसने कहा, “गलती करने पर किसी को हमेशा के लिए अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर तुम रत्न वापस कर दो, तो क्या तुम हमारे साथ वापस चलोगे?”

     

    छायादानव ने पहली बार किसी को अपने लिए इतना प्यार से बोलते सुना था।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने सतरंगी रत्न मीरा के हाथ में रख दिया।

     

    “क्या… क्या परियाँ मुझे स्वीकार करेंगी?”

     

    नीलपरी आगे आई और मुस्कुराई।

     

    “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए हमारे राज्य में हमेशा जगह है।”

     

    छायादानव ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं वादा करता हूँ।”

     

    जैसे ही सतरंगी रत्न अपने स्थान पर वापस रखा गया, पूरे जादुई राज्य में अद्भुत परिवर्तन होने लगा।

     

    सूखे फूल फिर से खिल उठे। नदियाँ चाँदी की तरह चमकने लगीं। आसमान में सात रंगों का विशाल इंद्रधनुष बन गया। हजारों छोटी परियाँ आसमान में उड़ने लगीं और चारों ओर घंटियों जैसी मधुर आवाज़ गूँजने लगी।

     

    परियों की रानी भी वहाँ आईं। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “तुमने केवल हमारा राज्य नहीं बचाया, बल्कि एक अकेले हृदय में भी रोशनी जलाई है। यही सच्चा जादू है।”

     

    रानी ने मीरा को एक छोटी-सी चमकती हुई डिबिया दी।

     

    “जब भी किसी जरूरतमंद की सच्चे मन से मदद करोगी, यह डिबिया एक सुनहरी रोशनी से भर जाएगी।”

     

    मीरा ने डिबिया अपने पास रख ली।

     

    अब उसे अपने घर लौटना था।

     

    नीलपरी ने उसे वही सुनहरा पंख दिया और कहा, “जब भी तुम्हें हमारी याद आए, इसे चाँदनी में रखना।”

     

    मीरा मुस्कुराई और अपने गाँव लौट आई।

     

    सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर थी। उसे लगा शायद यह सब सपना था।

     

    लेकिन उसकी मुट्ठी में सुनहरा पंख अब भी मौजूद था।

     

    मीरा खिड़की के पास गई। दूर जंगल के ऊपर एक छोटा-सा इंद्रधनुष चमक रहा था।

     

    तभी हवा में एक परिचित आवाज़ आई—

     

    “सच्चे दिल से किया गया अच्छा काम कभी जादू से कम नहीं होता।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    उस दिन से उसने हर जरूरतमंद की मदद करना शुरू कर दिया। और हर बार उसकी छोटी-सी जादुई डिबिया थोड़ी और चमकने लगती।

     

    कहते हैं, आज भी उस गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के पास रात में कभी-कभी सुनहरी रोशनी दिखाई देती है।

     

    शायद वे परियाँ आज भी वहाँ रहती हैं।

     

    और शायद वे ऐसे ही किसी बच्चे का इंतज़ार कर रही हैं, जिसके दिल में सच्चाई, दया और दूसरों की मदद करने का साहस हो।

     

    क्योंकि असली जादू परियों के पंखों में नहीं…

     

    हमारे अच्छे दिल में छिपा होता है।