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  • 😱 मौत की दस्तक 😱 (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    तीसरी रात के बाद सब कुछ बदल गया।

     

    आरव और कबीर ने गाँव छोड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें रास्ता वापस उसी हवेली तक ले आता।

     

    चौथी रात आरव ने आईने में सावित्री को देखा।

     

    वह उसके पीछे खड़ी थी।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन आईने में सावित्री अब भी खड़ी थी।

     

    उसने अपने होंठों पर उंगली रखी और फुसफुसाई—

     

    “चुप रहो…”

     

    पाँचवीं रात सावित्री ने कबीर की माँ की आवाज़ में बात की।

     

    “कबीर… बेटा, मुझे बचा लो।”

     

    कबीर रो पड़ा।

     

    वह आवाज़ के पीछे जाने लगा।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    “ये तेरी माँ नहीं है!”

     

    अचानक सामने खड़ी परछाई ने अपना चेहरा बदला।

     

    वह सावित्री नहीं थी।

     

    उसका चेहरा किसी इंसान जैसा ही नहीं था।

     

    दोनों आँखें काली थीं और मुँह असामान्य रूप से चौड़ा।

     

    फिर वह चीखी।

     

    पूरी हवेली हिल गई।

     

    छठी रात सबसे भयानक थी।

     

    रात करीब दो बजे कबीर अचानक गायब हो गया।

     

    आरव उसे ढूँढते हुए नीचे तहखाने में पहुँचा।

     

    वहाँ एक पुराना कुआँ था।

     

    कुएँ के चारों तरफ वही सात निशान बने थे जो नाना की डायरी में बनाए गए थे।

     

    कबीर कुएँ के सामने खड़ा था।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आरव ने उसे आवाज़ दी।

     

    “कबीर!”

     

    कबीर ने आँखें खोलीं।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ बदल चुकी थी।

     

    “सातवीं रात पूरी होने वाली है।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “जिसे तुम्हारे नाना ने चालीस साल तक बंद रखा।”

     

    आरव को समझ आ गया।

     

    असली आत्मा सावित्री नहीं थी।

     

    वह शक्ति अब कबीर के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम्हारे नाना ने मुझे रोकने के लिए सातवीं रात का नियम बनाया था। लेकिन वह मर गया। अब कोई मुझे नहीं रोक सकता।”

     

    आरव ने नाना की डायरी निकाली।

     

    उसके आख़िरी पन्ने पर एक मंत्र लिखा था।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “सावित्री को मुक्त करो, तभी श्राप समाप्त होगा।”

     

    आरव ने समझ लिया कि उन्हें उस बुरी शक्ति से लड़ना नहीं था।

     

    उन्हें सावित्री की आत्मा को मुक्त करना था।

     

    उसने चाँदी की अंगूठी कुएँ में फेंक दी।

     

    अचानक कुएँ से भयानक चीख निकली।

     

    कबीर ज़मीन पर गिर पड़ा।

     

    उसके शरीर से काले धुएँ जैसा कुछ निकलने लगा।

     

    धुआँ धीरे-धीरे एक औरत का आकार लेने लगा।

     

    सफेद साड़ी।

     

    लंबे बाल।

     

    सावित्री।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    उसने आरव से कहा,

     

    “मुझे माफ़ कर दो…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुमने मेरे नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    सावित्री ने कहा,

     

    “मैंने कोशिश की थी। लेकिन वह भी डर गया था। उसने मुझे इस हवेली में बाँध दिया था।”

     

    “कैसे?”

     

    “सातवीं रात के श्राप को खत्म करने के लिए किसी एक इंसान को अपनी जान देनी पड़ती थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो नाना ने…?”

     

    सावित्री ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे नाना ने अपनी जान देने की कोशिश की थी। लेकिन वह शक्ति उनसे भी अधिक ताकतवर थी।”

     

    अचानक काले धुएँ ने फिर से आकार लिया।

     

    इस बार वह बहुत बड़ा था।

     

    उसकी आवाज़ पूरी हवेली में गूँज उठी—

     

    “सातवीं रात मेरी है!”

     

    दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।

     

    कुएँ से काला धुआँ बाहर आने लगा।

     

    सावित्री ने आरव से कहा,

     

    “अगर इसे रोकना है तो इसे उसी जगह वापस भेजना होगा जहाँ से यह आया था।”

     

    आरव ने कुएँ की तरफ देखा।

     

    “कैसे?”

     

    सावित्री ने कहा,

     

    “सातवाँ नाम बोलो।”

     

    आरव ने नाना की डायरी खोली।

     

    उसमें छह नाम लिखे थे।

     

    लेकिन सातवाँ नाम खाली था।

     

    तभी उसे समझ आया।

     

    सातवाँ नाम किसी मरे हुए इंसान का नहीं था।

     

    सातवाँ नाम उसे खुद लिखना था।

     

    आरव ने काँपते हाथ से अपना नाम लिखा।

     

    “आरव।”

     

    अचानक हवेली में भयंकर तूफ़ान उठ गया।

     

    काले धुएँ ने उसे पकड़ लिया।

     

    कबीर चिल्लाया,

     

    “आरव! भाग!”

     

    लेकिन आरव ने कुएँ की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    वह चिल्लाया—

     

    “जिस श्राप की शुरुआत मेरे परिवार से हुई थी, उसका अंत भी मेरे नाम से होगा!”

     

    और उसने डायरी कुएँ में फेंक दी।

     

    तेज़ सफेद रोशनी हुई।

     

    एक भयानक चीख के साथ काला धुआँ कुएँ में खिंचने लगा।

     

    सावित्री की आत्मा भी धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “धन्यवाद…”

     

    फिर वह गायब हो गई।

     

    सुबह गाँव वालों ने देखा कि काली हवेली का आधा हिस्सा गिर चुका था।

     

    कबीर बेहोश पड़ा था।

     

    लेकिन आरव कहीं नहीं था।

     

    कुएँ के पास सिर्फ़ उसकी घड़ी मिली।

     

    गाँव वालों ने मान लिया कि आरव मर चुका है।

     

    सात दिन बाद हवेली पूरी तरह तोड़ दी गई।

     

    कुएँ को पत्थरों से बंद कर दिया गया।

     

    लोगों ने सोचा कि श्राप खत्म हो गया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    ठीक एक साल बाद, शहर में रहने वाली आरव की माँ को एक लिफाफा मिला।

     

    लिफाफे पर कोई पता नहीं था।

     

    अंदर सिर्फ़ एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में आरव खड़ा था।

     

    उसके पीछे वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन हवेली तो एक साल पहले टूट चुकी थी।

     

    तस्वीर के पीछे सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—

     

    “सातवीं रात खत्म नहीं हुई…”

     

    उस रात आरव की माँ ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।

     

    रात के ठीक 12 बजकर 7 मिनट पर—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर दस्तक हुई।

     

    उन्होंने काँपते हुए पूछा,

     

    “कौन?”

     

    बाहर से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—

     

    “माँ… दरवाज़ा खोलो।”

     

    वह आरव की आवाज़ थी।

     

    लेकिन उसी समय घर के अंदर रखी पुरानी घड़ी बंद हो गई।

     

    उसकी सुइयाँ 12:07 पर रुक गईं।

     

    और आईने में आरव की माँ के पीछे एक औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    सफेद साड़ी।

     

    लंबे काले बाल।

     

    और हाथ में वही पुरानी डायरी।

     

    उसने धीरे से डायरी खोली।

     

    आख़िरी पन्ने पर अब एक नया वाक्य लिखा था—

     

    “अगली सातवीं रात… तुम्हारी होगी।”

     

    और आईने के अंदर से किसी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा—

     

    “श्राप कभी खत्म नहीं होता… वह सिर्फ़ अपना घर बदलता है।”

     

     

    END

  • 😱 मौत की दस्तक 😱 (part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह होते ही आरव सीधे कबीर के पास पहुँचा।

     

    उसने रात की सारी घटना उसे बता दी।

     

    कबीर काफी देर तक चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “अब वापस मत जाना।”

     

    आरव ने पूछा,

    “क्यों?”

     

    कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि तू पहली रात बच गया है। लेकिन श्राप अभी शुरू हुआ है।”

     

    आरव ने नाना की डायरी उसके सामने रख दी।

     

    कबीर ने डायरी देखते ही उसे बंद कर दिया।

     

    “इसे मत खोल।”

     

    “तू जानता है इसमें क्या लिखा है?”

     

    कबीर ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “मेरे दादा ने मुझे इस कहानी के बारे में बताया था।”

     

    उसने बताया कि लगभग चालीस साल पहले हवेली में सावित्री नाम की एक औरत रहती थी। उसका पति अचानक मर गया था। गाँव वालों का मानना था कि सावित्री पर किसी आत्मा का साया था।

     

    एक रात उसने घर के सात लोगों को मार डाला।

     

    लेकिन मरने से पहले उसने कहा था—

     

    “मैंने किसी को नहीं मारा। वह मुझसे करवाया गया था।”

     

    उसके बाद उसने खुदकुशी कर ली।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “उस रात से हर कुछ साल में सात रातों का सिलसिला शुरू होता है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और सातवीं रात?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने ज़ोर देकर पूछा,

     

    “सातवीं रात को क्या होता है?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “जिसके घर में वह दिखाई देती है… वह सातवीं रात के बाद कभी नहीं मिलता।”

     

    शाम को आरव फिर नाना के घर गया।

     

    वह इस बार अकेला नहीं था। कबीर भी उसके साथ था।

     

    दोनों ने घर की तलाशी शुरू की।

     

    ऊपर वाले कमरे के सामने पहुँचते ही कबीर रुक गया।

     

    “इसे खोलना मत।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तेरे नाना ने इसे अपनी मौत से पहले बंद किया था।”

     

    आरव ने दरवाज़े को ध्यान से देखा।

     

    उस पर अंदर की तरफ से खरोंचों के निशान थे।

     

    जैसे कोई कमरे के अंदर बंद होकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।

     

    अचानक अंदर से धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “चल यहाँ से।”

     

    लेकिन आरव ने दरवाज़े का ताला तोड़ दिया।

     

    दरवाज़ा खुलते ही कमरे से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आई।

     

    कमरा खाली था।

     

    सिर्फ़ बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।

     

    दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    सभी तस्वीरों में वही औरत थी।

     

    लेकिन आख़िरी तस्वीर देखकर आरव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    उस तस्वीर में वह खुद खड़ा था।

     

    उसके बगल में वही औरत थी।

     

    तस्वीर बहुत पुरानी लग रही थी।

     

    आरव ने काँपते हुए कहा,

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    कबीर ने तस्वीर हाथ से गिरा दी।

     

    तभी पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    दोनों ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन वह नहीं खुला।

     

    कमरे में अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।

     

    “माँ… मुझे मत छोड़ो…”

     

    आरव ने दीवार की तरफ देखा।

     

    एक तस्वीर धीरे-धीरे हिल रही थी।

     

    उसने तस्वीर हटाई।

     

    पीछे दीवार में एक छोटा-सा छेद था।

     

    छेद के अंदर एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।

     

    उसमें कुछ कागज़, एक चाँदी की अंगूठी और नाना की दूसरी डायरी थी।

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई।

     

    “सावित्री हत्यारी नहीं थी।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “उस रात हवेली में जो हुआ, उसके पीछे गाँव के कुछ लोग थे। उन्होंने सावित्री के पति की जमीन हड़पने के लिए उसे पागल साबित किया। लेकिन उन्होंने गलती से उस पुराने कुएँ को खोल दिया, जिसमें वर्षों पहले एक तांत्रिक ने किसी बुरी शक्ति को बंद किया था।”

     

    आरव पन्ने पलटता गया।

     

    “वह शक्ति सावित्री के शरीर में प्रवेश कर गई। उसने अपने परिवार को नहीं मारा। उसके शरीर से किसी और ने वह सब करवाया।”

     

    फिर एक वाक्य था—

     

    “सावित्री की आत्मा आज भी हवेली में कैद है, लेकिन असली श्राप उस चीज़ का है जो उसके भीतर आई थी।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आज कौन सी रात है?”

     

    आरव ने घड़ी देखी।

     

    रात के 12 बजकर 1 मिनट।

     

    दूसरी रात।

     

    अचानक कमरे में रखी कुर्सी अपने आप हिलने लगी।

     

    फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “अब मैं घर के अंदर हूँ…”

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    दोनों किसी तरह दरवाज़ा खोलकर बाहर भागे।

     

    सीढ़ियों से उतरते समय आरव ने नीचे देखा।

     

    हॉल में सावित्री खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके बाल चेहरे पर नहीं थे।

     

    उसका चेहरा बेहद सफेद था।

     

    उसने हाथ उठाकर आरव की तरफ इशारा किया।

     

    फिर उसके होंठ हिले—

     

    “तीसरी रात… मैं तुम्हारा नाम पुकारूँगी।”

     

    अगले ही पल सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    जब लाइट वापस आई, वह गायब थी।

     

    सुबह आरव ने नाना की डायरी फिर खोली।

     

    उसमें एक नया वाक्य दिखाई दे रहा था, जो पहले वहाँ नहीं था।

     

    स्याही अभी गीली थी।

     

    “सावधान। अब वह घर के अंदर है।”

     

    आरव ने काँपते हुए डायरी बंद कर दी।

     

    लेकिन तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से कहा—

     

    “आरव…”

     

    वह आवाज़ बिल्कुल कबीर की थी।

     

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कबीर उसके सामने खड़ा था।

     

    उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा,

     

    “मैंने तुझे नहीं बुलाया।”

     

    दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    और उसके बाद एक और आवाज़—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज़ खुद आरव की थी।

     

    लेकिन वह आवाज़ ऊपर वाले बंद कमरे से आ रही थी।

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “अब तीसरी रात आने वाली है।”

     

    और तभी हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    धड़ाम!

     

    बाहर आसमान में बिजली चमकी।

     

    और हवेली की दीवार पर किसी ने खून से लिख दिया—

     

    “छह रातें पूरी होने तक कोई नहीं बचेगा।”

  • 😱 मौत की दस्तक 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ में शाम के बाद सन्नाटा छा जाता था। गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे।

     

    कहते थे कि लगभग चालीस साल पहले उस हवेली में रहने वाली एक औरत ने अपने ही घर के सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उसके बाद उसने हवेली के कुएँ में कूदकर जान दे दी।

     

    लेकिन गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि कहानी इतनी सीधी नहीं थी।

     

    उनका कहना था कि मरने से पहले उस औरत ने श्राप दिया था—

     

    “हर सातवीं रात मैं लौटूँगी… और इस बार कोई मुझे रोक नहीं पाएगा।”

     

    तब से हर कुछ साल बाद गाँव में कोई न कोई अजीब मौत होती थी। और हर बार मौत से पहले सात रातों तक हवेली से घंटी बजने की आवाज़ आती थी।

     

    लोग उस रास्ते से सूर्यास्त के बाद गुजरना तक पसंद नहीं करते थे।

     

    इसी गाँव में कई साल बाद आरव अपने नाना की मौत के बाद वापस आया था।

     

    आरव शहर में रहता था और भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता था। नाना की पुरानी हवेली बेचने से पहले वह वहाँ रखे कुछ ज़रूरी कागज़ लेने आया था।

     

    गाँव पहुँचते ही उसकी मुलाकात बचपन के दोस्त कबीर से हुई।

     

    कबीर ने आरव को देखते ही कहा,

    “तू रात में नाना के घर मत रुकना।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “क्यों? घर मुझे खा जाएगा?”

     

    कबीर का चेहरा गंभीर था।

     

    “मज़ाक मत कर। सातवीं रात शुरू हो चुकी है।”

     

    आरव की हँसी अचानक रुक गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा,

    “आज पहली रात है।”

     

    आरव ने इसे गाँव की पुरानी अफवाह समझकर टाल दिया।

     

    रात करीब दस बजे वह नाना के घर पहुँच गया। घर बहुत पुराना था। लकड़ी के दरवाज़े, दीवारों पर जमी सीलन और लंबे गलियारे में लटकती पुरानी तस्वीरें।

     

    बिजली बार-बार जा रही थी।

     

    आरव ने अपना बैग रखा और नाना के कमरे में कागज़ ढूँढने लगा।

     

    तभी उसकी नज़र एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के कवर पर सिर्फ़ इतना लिखा था—

     

    “इसे सातवीं रात से पहले मत पढ़ना।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

    “नाना भी ना…”

     

    उसने डायरी खोल ली।

     

    पहले पन्ने पर तारीखें लिखी थीं।

     

    पहली रात — वह दरवाज़े पर आएगी।

     

    दूसरी रात — वह घर के अंदर होगी।

     

    तीसरी रात — वह तुम्हारा नाम पुकारेगी।

     

    चौथी रात — आईने में दिखाई देगी।

     

    पाँचवीं रात — किसी अपने की आवाज़ में बात करेगी।

     

    छठी रात — घर में कोई मर जाएगा।

     

    और आख़िरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “सातवीं रात… वह तुम्हें अपने साथ ले जाएगी।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    तभी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    मुख्य दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।

     

    आरव कुछ सेकंड तक स्थिर बैठा रहा।

     

    फिर उसने घड़ी देखी।

     

    रात के 12 बजकर 7 मिनट हो चुके थे।

     

    उसने सोचा शायद कबीर होगा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ और तेज़ थी।

     

    आरव दरवाज़े के पास गया और पूछा,

    “कौन?”

     

    बाहर से एक औरत की बहुत धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी।

     

    लेकिन उसकी माँ शहर में थी।

     

    आरव ने तुरंत दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर डायरी की पहली लाइन याद आ गई।

     

    “पहली रात — वह दरवाज़े पर आएगी।”

     

    उसने हाथ पीछे खींच लिया।

     

    बाहर से फिर आवाज़ आई—

     

    “बेटा… दरवाज़ा खोलो।”

     

    आरव के माथे पर पसीना आ गया।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    कुछ देर तक दरवाज़े पर दस्तक होती रही।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी घर के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    गलियारे के आख़िरी छोर पर एक औरत खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी।

     

    लंबे काले बाल।

     

    चेहरा बालों से पूरी तरह ढका हुआ।

     

    आरव की साँस अटक गई।

     

    औरत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    बालों के बीच से दो बिल्कुल काली आँखें दिखाई दीं।

     

    फिर वह मुस्कुराई।

     

    आरव पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।

     

    औरत ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस अपना हाथ उठाकर ऊपर की मंज़िल की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ एक पुराना दरवाज़ा था, जिसे आरव ने बचपन से बंद देखा था।

     

    अचानक दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    औरत गायब थी।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान मुख्य दरवाज़े से अंदर नहीं आए थे।

     

    वे ऊपर वाले बंद कमरे से निकलकर सीधे आरव के कमरे तक आए थे।

     

    आरव ने उसी रात घर छोड़ने का फैसला किया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, बाहर घना कोहरा था।

     

    और कोहरे के बीच उसे वही औरत दिखाई दी।

     

    वह घर के बाहर खड़ी थी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी उसकी नज़र उसके हाथ में पकड़ी किसी चीज़ पर पड़ी।

     

    वह एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में उसके नाना के साथ वही औरत खड़ी थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “पहली रात पूरी हुई। अब छह रातें बाकी हैं।”

  • आधी रात की आखिरी बस (last part-3)

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    आरव खिड़की से बाहर देखता रह गया।

     

    सड़क के बीचोंबीच एक दूसरी बस खड़ी थी।

     

    उसके आगे साफ लिखा था—

     

    रूट नंबर 13

     

    लेकिन वह बस पुरानी नहीं थी।

     

    वह बिल्कुल नई थी।

     

    उसकी खिड़कियां चमक रही थीं और अंदर की सीटें खाली थीं।

     

    आरव ने गौर से देखा।

     

    फिर उसका दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    बस की हर सीट पर…

     

    उसी के जैसे चेहरे वाला एक आदमी बैठा था।

     

    किसी की आंखें बंद थीं।

     

    कोई खिड़की से बाहर देख रहा था।

     

    कोई सिर झुकाकर बैठा था।

     

    लेकिन सभी का चेहरा आरव जैसा था।

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव की आवाज़ कांप रही थी।

     

    ड्राइवर ने कहा—

     

    “तुम्हारे जितने अधूरे जीवन हैं… उतने चेहरे।”

     

    “मैं समझा नहीं।”

     

    “हर बार जब कोई इंसान मरने से पहले कोई बड़ा फैसला अधूरा छोड़ देता है, उसका एक रास्ता इस बस में बन जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो मैं कौन हूं?”

     

    ड्राइवर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम वह आरव हो जिसने अपनी मौत स्वीकार नहीं की।”

     

    अचानक आरव के दिमाग में यादों का तूफान आने लगा।

     

    बारिश की रात।

     

    सड़क पर उसकी बाइक।

     

    सामने से आती तेज़ रोशनी।

     

    ब्रेक फेल होना।

     

    फिर पुल।

     

    फिर जोरदार टक्कर।

     

    आरव को याद आया कि एक्सीडेंट से कुछ सेकंड पहले उसने अपनी मां को फोन किया था।

     

    “मां… मैं जल्दी घर आ रहा हूं।”

     

    मां ने कहा था—

     

    “बेटा, रास्ते में सावधान रहना।”

     

    आरव ने जवाब दिया था—

     

    “चिंता मत करो।”

     

    फिर फोन कट गया था।

     

    और कुछ ही सेकंड बाद उसकी बाइक पुल से नीचे गिर गई थी।

     

    उसकी आखिरी इच्छा थी—

     

    “मुझे घर पहुंचना है।”

     

    यही इच्छा उसे रूट नंबर 13 की बस तक ले आई थी।

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “तो मैं मर चुका हूं?”

     

    ड्राइवर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “लेकिन मेरी मां?”

     

    “वह तुम्हारा इंतजार कर रही है।”

     

    “मैं उससे मिलना चाहता हूं।”

     

    ड्राइवर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मिल सकते हो।”

     

    आरव ने उम्मीद से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “बस से उतर जाओ।”

     

    आरव ने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    “फिर?”

     

    “फिर तुम्हारी आखिरी याद पूरी हो जाएगी।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी सावित्री उसके सामने आ गई।

     

    अब वह फिर बूढ़ी दिखाई दे रही थी।

     

    “मत जाना।”

     

    आरव रुक गया।

     

    “आपने ही तो कहा था कि मुझे अपनी मौत स्वीकार करनी होगी।”

     

    सावित्री ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन पहले तुम्हें एक बात जाननी होगी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    सावित्री ने पीछे खड़ी दूसरी बस की तरफ देखा।

     

    “इस बस का ड्राइवर हमेशा मर चुका होता है।”

     

    आरव ने ड्राइवर की तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    सावित्री बोली—

     

    “बीस साल पहले इस बस का पहला ड्राइवर मेरा पति था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आपके पति?”

     

    “हां।”

     

    “उसने क्या किया था?”

     

    “वह लोगों को उनकी मौत के बाद घर पहुंचाने का काम करता था।”

     

    “लेकिन एक दिन उसने एक यात्री को बचाने के लिए नियम तोड़ दिया।”

     

    “उस यात्री को उसकी मां से मिलना था।”

     

    “उसने बस रोक दी।”

     

    “यात्री उतर गया।”

     

    “लेकिन उसकी जगह किसी और को बस में आना पड़ा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसे?”

     

    सावित्री ने धीरे से कहा—

     

    “मेरे बेटे मोहन को।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    सावित्री रोने लगी।

     

    “मेरे पति ने मोहन को बचाने के लिए बस के साथ सौदा किया।”

     

    “उस दिन से मोहन इस बस में फंस गया।”

     

    “और मेरे पति ड्राइवर बन गए।”

     

    “लेकिन फिर…”

     

    सावित्री की आवाज़ टूट गई।

     

    “एक रात मेरे पति ने बस से भागने की कोशिश की।”

     

    “बस ने उन्हें भी निगल लिया।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    अब उसे समझ आ रहा था कि यह बस सिर्फ मृत लोगों को नहीं ले जाती थी।

     

    यह उन लोगों को कैद करती थी जो किसी और की जिंदगी बदलने की कोशिश करते थे।

     

    ड्राइवर ने अचानक कहा—

     

    “बहुत बातें हो गईं।”

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    “आरव, तुम्हारे पास दो रास्ते हैं।”

     

    “पहला—बस से उतर जाओ और अपनी मौत स्वीकार कर लो।”

     

    “दूसरा—ड्राइवर की सीट पर बैठ जाओ।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर मैं ड्राइवर बन गया तो?”

     

    ड्राइवर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें हर रात उन लोगों को उनके आखिरी पड़ाव तक पहुंचाना होगा।”

     

    “और अगर मैंने मना किया?”

     

    ड्राइवर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो बस तुम्हें हमेशा के लिए अपने अंदर रखेगी।”

     

    आरव ने अपनी मां को याद किया।

     

    फिर उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें फैसला बहुत सोचकर करना।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मैं अपनी मां को एक बार देखना चाहता हूं।”

     

    वह बस से नीचे उतर गया।

     

    जैसे ही उसके पैर जमीन पर पड़े…

     

    पूरा संसार बदल गया।

     

    बारिश बंद हो गई।

     

    सड़क पर कोई बस नहीं थी।

     

    न सावित्री।

     

    न ड्राइवर।

     

    न रूट नंबर 13।

     

    सिर्फ एक अस्पताल था।

     

    आरव अंदर गया।

     

    उसने रिसेप्शन पर अपनी मां का नाम पूछा।

     

    नर्स ने कहा—

     

    “वह ICU में हैं।”

     

    आरव दौड़कर वहां पहुंचा।

     

    कांच के दूसरी तरफ उसकी मां बिस्तर पर लेटी थी।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    मशीनें चल रही थीं।

     

    आरव ने कांच पर हाथ रखा।

     

    “मां…”

     

    अचानक उसकी मां ने आंखें खोल दीं।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मां।”

     

    उसकी मां ने आसपास देखा।

     

    फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

     

    “आरव?”

     

    आरव रोने लगा।

     

    “हां मां।”

     

    मां की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तुम आ गए?”

     

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “हां।”

     

    मां ने हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन उनके बीच कांच था।

     

    आरव ने कांच पर अपना हाथ रखा।

     

    मां ने दूसरी तरफ अपना हाथ रख दिया।

     

    कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

     

    फिर उसकी मां ने कहा—

     

    “अब घर आ जाओ बेटा।”

     

    आरव की आंखें बंद हो गईं।

     

    उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर हल्का हो रहा है।

     

    जैसे वह हवा में घुल रहा हो।

     

    उसे लगा अब सब खत्म हो जाएगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    अस्पताल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    एक आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    वह मुड़ा।

     

    गलियारे के आखिरी छोर पर रूट नंबर 13 की बस खड़ी थी।

     

    उसके दरवाज़े खुले थे।

     

    अंदर सावित्री बैठी थी।

     

    उसके पास मोहन बैठा था।

     

    और ड्राइवर की सीट खाली थी।

     

    सावित्री ने कहा—

     

    “आरव… हमें तुम्हारी जरूरत है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “मैं वापस नहीं जाऊंगा।”

     

    सावित्री ने कहा—

     

    “अगर तुम नहीं आए… तो अगली बस तुम्हारी मां को लेने आएगी।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    “जिस इंसान से तुम्हारा रिश्ता सबसे गहरा होता है… बस आखिर में उसे भी अपने साथ ले जाती है।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    मशीन पर उसकी धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

     

    बीप…

     

    बीप…

     

    बीप…

     

    आरव समझ गया।

     

    अगर वह बस में वापस नहीं गया…

     

    तो अगला टिकट उसकी मां का होगा।

     

    उसने आखिरी बार अपनी मां को देखा।

     

    “मुझे माफ करना।”

     

    फिर वह बस की तरफ चल पड़ा।

     

    जैसे ही वह बस में चढ़ा…

     

    दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    ड्राइवर की सीट पर बैठते ही उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने आंखें खोलीं।

     

    उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे।

     

    सामने सड़क थी।

     

    घड़ी पर समय था—

     

    11:47 PM

     

    कंडक्टर ने पीछे से कहा—

     

    “पहली यात्रा?”

     

    आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    कंडक्टर ने उसे टिकट मशीन दी।

     

    “आज रात तीन यात्री हैं।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    बस में तीन लोग बैठे थे।

     

    एक बूढ़ा आदमी।

     

    एक जवान लड़की।

     

    और एक छोटा बच्चा।

     

    आरव ने बस स्टार्ट की।

     

    इंजन की आवाज़ गूंजी।

     

    बस आगे बढ़ी।

     

    पहला यात्री बूढ़ा आदमी था।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे अपने घर जाना है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां?”

     

    बूढ़े ने एक पता बताया।

     

    बस वहां पहुंची।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    बाहर एक छोटा-सा घर था।

     

    दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    वह अपने पति का इंतजार कर रही थी।

     

    बूढ़ा आदमी बस से उतरा।

     

    उसने पीछे मुड़कर आरव को देखा।

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर वह अपनी पत्नी के पास चला गया।

     

    दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगे।

     

    और उसी पल वह दोनों गायब हो गए।

     

    दूसरी यात्री एक जवान लड़की थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे स्टेशन जाना है।”

     

    आरव ने बस स्टेशन पहुंचाई।

     

    वहां एक लड़का उसका इंतजार कर रहा था।

     

    लड़की बस से उतरी।

     

    लड़के ने उसे देखा और मुस्कुराया।

     

    दोनों एक-दूसरे के पास गए।

     

    फिर दोनों भी रोशनी में गायब हो गए।

     

    तीसरा यात्री छोटा बच्चा था।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    बच्चा चुपचाप बैठा था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तुम्हें कहां जाना है?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “मेरी मां के पास।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम्हारी मां कहां रहती हैं?”

     

    बच्चे ने खिड़की के बाहर इशारा किया।

     

    “वहां।”

     

    आरव ने बस रोक दी।

     

    बाहर एक घर था।

     

    दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी।

     

    वह रो रही थी।

     

    बच्चे ने बस से उतरते हुए आरव को देखा।

     

    “भैया… धन्यवाद।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मोहन।”

     

    आरव के हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।

     

    “मोहन?”

     

    बच्चा गायब हो गया।

     

    बाहर सावित्री खड़ी थी।

     

    उसने अपने बेटे को गले लगा लिया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में पहली बार शांति थी।

     

    “अब तुम आज़ाद हो।”

     

    अचानक बस की घड़ी बदल गई।

     

    11:47 PM

     

    से

     

    11:48 PM

     

    हो गई।

     

    आरव ने हैरानी से घड़ी देखी।

     

    बीस साल में पहली बार…

     

    समय आगे बढ़ा था।

     

    बस के अंदर की सारी लाइटें जल उठीं।

     

    कंडक्टर ने कहा—

     

    “रूट नंबर 13 की आखिरी यात्रा पूरी हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अब?”

     

    कंडक्टर मुस्कुराया।

     

    “अब बस खत्म।”

     

    बस धीरे-धीरे रुक गई।

     

    सामने सूरज उग रहा था।

     

    आरव ने दरवाज़ा खोला।

     

    वह नीचे उतर गया।

     

    बस के पीछे देखा।

     

    वहां कोई बस नहीं थी।

     

    सिर्फ खाली सड़क थी।

     

    आरव ने अपनी आंखें बंद कीं।

     

    उसे अपनी मां की आवाज़ सुनाई दी—

     

    “अब घर आ जाओ बेटा।”

     

    जब उसने आंखें खोलीं…

     

    वह अस्पताल के बाहर खड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    वह अंदर भागा।

     

    ICU के बाहर डॉक्टर खड़े थे।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मेरी मां?”

     

    डॉक्टर मुस्कुराए।

     

    “उनकी हालत अब खतरे से बाहर है।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह कमरे में गया।

     

    उसकी मां ने आंखें खोलीं।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    मां ने कमजोर आवाज़ में पूछा—

     

    “तुम रात को आए थे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “हां।”

     

    मां ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मुझे पता था।”

     

    “मैंने तुम्हें देखा था।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा—

     

    “कहां?”

     

    मां ने आंखें बंद करते हुए कहा—

     

    “एक बस में।”

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “कौन-सी बस?”

     

    मां ने धीरे से कहा—

     

    “रूट नंबर 13।”

     

    आरव खामोश रह गया।

     

    उसने खिड़की के बाहर देखा।

     

    सड़क पर एक पुरानी बस गुजर रही थी।

     

    उसके आगे कोई नंबर नहीं था।

     

    लेकिन उसकी पिछली खिड़की पर किसी ने उंगली से लिखा था—

     

    “धन्यवाद, आरव।”

     

    बस कुछ सेकंड में गायब हो गई।

     

    आरव ने अपनी मां का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    उस दिन के बाद रूट नंबर 13 कभी किसी शहर में दिखाई नहीं दी।

     

    लोग कहते हैं कि वह बस खत्म हो गई।

     

    लेकिन कुछ बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

     

    अगर रात के 11:47 बजे आप किसी सुनसान बस स्टॉप पर अकेले खड़े हों…

     

    और दूर से कोई पुरानी बस आती दिखाई दे…

     

    तो उसमें मत बैठना।

     

    क्योंकि हो सकता है वह बस आपको आपके घर तक पहुंचाने नहीं…

     

    आपकी आखिरी याद तक पहुंचाने आई हो।

     

    और अगर बस के ड्राइवर की सीट पर कोई जवान लड़का बैठा दिखाई दे…

     

    तो उसका चेहरा ध्यान से मत देखना।

     

    क्योंकि शायद वह…

     

    आरव हो।

     

    जो आज भी उन लोगों को उनके आखिरी पड़ाव तक पहुंचा रहा है…

     

    जिन्हें अपने घर से आखिरी बार मिलने की इच्छा होती है।

     

    समाप्त।

  • (भाग 2) आधी रात की आखिरी बस

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बस का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद हो रहा था।

     

    आरव की नजर बाहर खड़ी उस लड़की पर थी।

     

    वह उसकी छोटी बहन जैसी दिख रही थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आंखें।

     

    वही आवाज़।

     

    “भैया… मुझे अपने साथ ले चलो।”

     

    आरव का दिल टूटने लगा।

     

    उसकी बहन रिया की मौत पांच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में हुई थी।

     

    तब आरव उसे बचा नहीं पाया था।

     

    आज पहली बार उसे लगा जैसे किस्मत उसे दूसरा मौका दे रही हो।

     

    वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाना!”

     

    आरव ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

     

    “ये मेरी बहन है!”

     

    बूढ़ी औरत चीखी—

     

    “नहीं!”

     

    उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरी बस शांत हो गई।

     

    “ये तुम्हारी बहन नहीं है।”

     

    बाहर खड़ी लड़की अचानक हंसने लगी।

     

    उसकी हंसी इंसान जैसी नहीं थी।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

     

    पहले आंखें काली हुईं।

     

    फिर उसकी त्वचा राख जैसी हो गई।

     

    और आखिर में उसका मुंह असामान्य रूप से फैल गया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत बोली—

     

    “ये वो है जो हर यात्री को उसके सबसे प्यारे इंसान का चेहरा दिखाकर बस से बाहर बुलाती है।”

     

    “अगर कोई उसके पीछे चला जाए… तो कभी वापस नहीं आता।”

     

    दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    बाहर खड़ी वह चीज़ अचानक गायब हो गई।

     

    बस फिर चल पड़ी।

     

    आरव कांप रहा था।

     

    उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    औरत ने कुछ देर तक उसे देखा।

     

    “मेरा नाम सावित्री है।”

     

    “आप इस बस में कब से हैं?”

     

    सावित्री ने खिड़की के बाहर देखा।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “शायद बीस साल।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “बीस साल?”

     

    “हां।”

     

    “आपकी उम्र कितनी है?”

     

    सावित्री हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “जब मैं इस बस में चढ़ी थी, तब मेरी उम्र पैंतीस साल थी।”

     

    आरव ने गौर से उसका चेहरा देखा।

     

    वह लगभग सत्तर साल की लग रही थी।

     

    “तो आप बूढ़ी कैसे हुईं?”

     

    सावित्री ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस एक अंधेरी सड़क से गुजर रही थी।

     

    कुछ देर बाद बस के अंदर की घड़ी फिर दिखाई दी।

     

    11:47 PM

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    उसकी घड़ी में 12:32 AM था।

     

    वह परेशान हो गया।

     

    “ये घड़ी हमेशा 11:47 क्यों दिखा रही है?”

     

    सावित्री बोली—

     

    “क्योंकि इस बस में समय आगे नहीं बढ़ता।”

     

    “यहां हर रात वही रात होती है।”

     

    “11:47 से 12:15 तक।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो फिर हम कब निकलेंगे?”

     

    सावित्री ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “जब तुम्हें अपना सच याद आ जाएगा।”

     

    अचानक बस झटके से रुकी।

     

    सभी यात्री अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।

     

    कंडक्टर धीरे-धीरे गलियारे में चलने लगा।

     

    उसके हाथ में टिकटों का बंडल था।

     

    वह हर यात्री के पास जाकर टिकट काट रहा था।

     

    जब वह आरव के पास पहुंचा तो उसने पूछा—

     

    “टिकट?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

     

    कंडक्टर मुस्कुराया।

     

    “यहां पैसे नहीं लगते।”

     

    “फिर?”

     

    “एक याद।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    कंडक्टर ने अपनी जेब से छोटा-सा पंचिंग मशीन निकाला।

     

    “हर यात्री एक याद देता है।”

     

    “और बदले में उसे एक टिकट मिलता है।”

     

    “अगर यादें खत्म हो जाएं?”

     

    कंडक्टर उसकी तरफ झुककर बोला—

     

    “तो तुम भी खत्म।”

     

    आरव ने टिकट लेने से मना कर दिया।

     

    कंडक्टर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “फिर तुम यहां से कभी नहीं उतर पाओगे।”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    आरव ने सावित्री से पूछा,

     

    “आपने कौन-सी याद दी थी?”

     

    सावित्री की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरे बेटे की।”

     

    “क्या?”

     

    “मैंने अपने बेटे की पूरी जिंदगी की याद इस बस को दे दी।”

     

    “अब मुझे उसका चेहरा भी याद नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “फिर आप यहां क्यों हैं?”

     

    सावित्री बोली—

     

    “क्योंकि मैं अपने बेटे को ढूंढ रही हूं।”

     

    “क्या वह भी इस बस में था?”

     

    “हां।”

     

    “क्या वह मर गया था?”

     

    सावित्री ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो फिर?”

     

    सावित्री ने धीरे से कहा—

     

    “उसे इस बस ने मारा था।”

     

    आरव समझ नहीं पाया।

     

    सावित्री ने अपनी कहानी बतानी शुरू की।

     

    बीस साल पहले सावित्री अपने बेटे मोहन के साथ इसी रास्ते से घर जा रही थी।

     

    रात 11:47 पर उनकी बस एक सुनसान जगह पर खराब हो गई।

     

    ड्राइवर ने कहा कि बस ठीक होने में समय लगेगा।

     

    तभी एक दूसरी बस वहां आई।

     

    उस पर लिखा था—

     

    रूट नंबर 13।

     

    ड्राइवर ने सावित्री और मोहन को उसमें बैठने के लिए कहा।

     

    बस में सिर्फ कुछ लोग थे।

     

    कुछ देर बाद मोहन ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसे सड़क के किनारे एक आदमी दिखाई दिया।

     

    वह आदमी मोहन को बुला रहा था।

     

    मोहन ने कहा—

     

    “मां, मैं अभी आया।”

     

    और बस से उतर गया।

     

    सावित्री भी उसके पीछे जाने लगी।

     

    लेकिन बस का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    मोहन बाहर खड़ा रह गया।

     

    बस चल पड़ी।

     

    सावित्री चीखती रही।

     

    लेकिन ड्राइवर ने बस नहीं रोकी।

     

    कुछ मिनट बाद उसने खिड़की से बाहर देखा।

     

    मोहन गायब था।

     

    उस रात से सावित्री इस बस में फंसी हुई थी।

     

    “मैं हर रात उसे ढूंढती हूं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या आपको कभी वो मिला?”

     

    सावित्री ने कहा—

     

    “आज तक नहीं।”

     

    तभी बस के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    सावित्री अचानक खड़ी हो गई।

     

    “मोहन!”

     

    वह पीछे भागी।

     

    आरव भी उसके पीछे गया।

     

    बस के आखिरी हिस्से में एक छोटा बच्चा बैठा था।

     

    उसकी पीठ उनकी तरफ थी।

     

    सावित्री उसके पास गई।

     

    “मोहन?”

     

    बच्चा धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    सावित्री खुशी से रो पड़ी।

     

    “बेटा!”

     

    लेकिन आरव को कुछ अजीब लगा।

     

    बच्चे की आंखें पूरी तरह सफेद थीं।

     

    वह सावित्री की तरफ देखकर बोला—

     

    “मां… तुमने मुझे इतनी देर क्यों लगाई?”

     

    सावित्री ने उसे गले लगा लिया।

     

    आरव चीखा—

     

    “रुकिए!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    बच्चे के हाथ सावित्री की पीठ के आर-पार चले गए।

     

    सावित्री का शरीर हवा में उठ गया।

     

    उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “भागो!”

     

    फिर वह धुएं की तरह गायब हो गई।

     

    आरव अकेला खड़ा रह गया।

     

    बस में बैठे सभी यात्री उसे देखने लगे।

     

    तभी ड्राइवर की आवाज़ आई—

     

    “अगला स्टॉप…”

     

    बस की घड़ी पर समय था—

     

    12:15 AM

     

    ड्राइवर ने कहा—

     

    “आरव का घर।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    बस उसके घर के सामने आकर रुक गई।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    बाहर उसकी मां खड़ी थी।

     

    वह रो रही थी।

     

    “आरव… बेटा!”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह नीचे उतरने ही वाला था कि उसे कुछ याद आया।

     

    उसकी मां अस्पताल में थी।

     

    वह घर पर कैसे हो सकती थी?

     

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका घर दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन खिड़की में कोई रोशनी नहीं थी।

     

    फिर उसकी नजर सामने सड़क पर गई।

     

    वहां पुलिस की गाड़ी खड़ी थी।

     

    कुछ लोग जमा थे।

     

    और जमीन पर…

     

    एक मोटरसाइकिल पड़ी थी।

     

    आरव समझ गया।

     

    वह अभी भी अपने एक्सीडेंट के बाद की दुनिया में था।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “आरव…”

     

    उसने मुड़कर देखा।

     

    सावित्री खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह बूढ़ी नहीं थी।

     

    वह लगभग पैंतीस साल की थी।

     

    उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था।

     

    मोहन।

     

    सावित्री ने कहा—

     

    “तुम्हें बस से उतरना है तो पहले इसका राज़ समझना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन-सा राज़?”

     

    सावित्री ने बच्चे की तरफ देखा।

     

    “यह बस मरने वालों को नहीं ले जाती।”

     

    “तो किसे ले जाती है?”

     

    सावित्री ने कहा—

     

    “यह उन लोगों को ले जाती है जो मरना स्वीकार नहीं करते।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “और जो लोग अपने मरने को स्वीकार कर लेते हैं…”

     

    “उन्हें बस छोड़ देती है।”

     

    अचानक ड्राइवर की सीट से आवाज़ आई—

     

    “गलत!”

     

    सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।

     

    ड्राइवर धीरे-धीरे अपनी सीट से उठा।

     

    उसका बिना चेहरा वाला सिर आरव की तरफ घूम गया।

     

    “बस किसी को छोड़ती नहीं।”

     

    “बस सिर्फ एक यात्री को छोड़ती है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    ड्राइवर ने पहली बार अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली आरव की तरफ थी।

     

    “वही… जो अगली बस चलाएगा।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    कंडक्टर ने टिकट मशीन उठाई।

     

    “तुम्हारी बारी आ गई।”

     

    बस की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ आरव की आवाज़ गूंजी—

     

    “मैं ड्राइवर नहीं बनूंगा!”

     

    ड्राइवर हंसा।

     

    “तुम्हें बनना नहीं है।”

     

    “तुम पहले से हो।”

     

    अचानक आरव के दिमाग में एक याद चमकी।

     

    एक पुरानी बस।

     

    एक सड़क।

     

    बारिश।

     

    और वह खुद…

     

    ड्राइवर की सीट पर बैठा हुआ।

     

    उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे।

     

    और पीछे बैठे यात्रियों में…

     

    सावित्री भी थी।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    उसे अचानक सब याद आने लगा।

     

    रूट नंबर 13 का पहला ड्राइवर कोई और नहीं… खुद आरव था।

     

    लेकिन फिर सवाल था—

     

    अगर वह पहले से ड्राइवर था…

     

    तो वह यात्री बनकर इस बस में दोबारा क्यों आया?

     

    और उसी क्षण बस के शीशे पर अपने आप एक तारीख लिखी गई—

     

    13 अगस्त 2026।

     

    आज की तारीख।

     

    नीचे एक और लाइन उभरी—

     

    “आज आखिरी यात्रा है।”

     

    और ड्राइवर ने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि आज रात… इस बस को एक नया ड्राइवर नहीं, एक नया शिकार चाहिए।”

     

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    सड़क के बीचोंबीच एक और बस खड़ी थी।

     

    उसके आगे लिखा था—

     

    रूट नंबर 13

     

    लेकिन वह बस बिल्कुल नई थी।

     

    और उसके अंदर…

     

    आरव के जैसे दिखने वाले दर्जनों लोग बैठे थे।

  • (भाग 1 ) 😱आधी रात की आखिरी बस😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    रात के करीब 11:45 बज रहे थे।

     

    आरव सड़क के किनारे बने छोटे-से बस स्टॉप पर अकेला खड़ा था।

     

    आसमान में बादल छाए हुए थे और ठंडी हवा के साथ हल्की बारिश हो रही थी। सड़क लगभग सुनसान थी। कभी-कभी कोई कार तेज़ी से गुजरती और फिर कुछ सेकंड के लिए सड़क दोबारा बिल्कुल शांत हो जाती।

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    11:47 PM.

     

    उसे किसी भी हालत में घर पहुंचना था।

     

    उसकी मां पिछले दो दिनों से बीमार थी और आज शाम उसका फोन आया था कि तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है।

     

    आरव ने कई बार कैब बुक करने की कोशिश की थी, लेकिन इस सुनसान इलाके में कोई कैब नहीं मिल रही थी।

     

    तभी दूर से बस की पीली रोशनी दिखाई दी।

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    बस धीरे-धीरे उसके सामने आकर रुकी।

     

    उसने बस के आगे लगे बोर्ड को देखा।

     

    “रूट नंबर 13”

     

    आरव को थोड़ा अजीब लगा।

     

    इस रूट की बस रात में इतनी देर तक नहीं चलती थी।

     

    लेकिन उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    कंडक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां जाना है?”

     

    “शिवनगर।”

     

    कंडक्टर ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस में चढ़ते ही आरव ने महसूस किया कि अंदर बहुत ज्यादा ठंड थी।

     

    इतनी ठंड कि उसकी सांस से धुंध निकल रही थी।

     

    बस लगभग खाली थी।

     

    सिर्फ पीछे की सीट पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।

     

    उसने सिर पर सफेद कपड़ा डाल रखा था और खिड़की से बाहर देख रही थी।

     

    आरव आगे की सीट पर जाकर बैठ गया।

     

    बस चल पड़ी।

     

    कुछ मिनट तक सब सामान्य रहा।

     

    फिर आरव ने देखा कि बस के अंदर लगी डिजिटल घड़ी में समय था—

     

    11:47 PM

     

    उसने अपनी घड़ी देखी।

     

    11:53 PM.

     

    फिर बस की घड़ी देखी।

     

    11:47 PM.

     

    उसे लगा घड़ी खराब होगी।

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    “अजीब है।”

     

    तभी पीछे बैठी बूढ़ी औरत ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “बेटा… पहली बार इस बस में बैठे हो?”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “जी।”

     

    बूढ़ी औरत ने खिड़की से नजर हटाए बिना कहा—

     

    “तो एक बात याद रखना।”

     

    “जी?”

     

    “अगर ड्राइवर तीसरे पुल के बाद बस रोक दे… तो नीचे मत उतरना।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़ी औरत ने अब उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखें बहुत डरावनी थीं।

     

    “क्योंकि वहां कोई बस स्टॉप नहीं है।”

     

    आरव कुछ बोलता, उससे पहले बस की लाइट दो बार झपकी।

     

    फिर सामान्य हो गई।

     

    बस शहर की मुख्य सड़क छोड़कर एक सुनसान रास्ते पर चली गई।

     

    आरव खिड़की से बाहर देखने लगा।

     

    उसे रास्ता बिल्कुल अनजान लग रहा था।

     

    उसने कंडक्टर से पूछा,

     

    “भाई साहब, ये बस शिवनगर जाएगी ना?”

     

    कंडक्टर ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल भावहीन था।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन ये रास्ता तो शिवनगर का नहीं है।”

     

    कंडक्टर चुप रहा।

     

    आरव को अब बेचैनी होने लगी।

     

    उसने ड्राइवर की तरफ देखा।

     

    ड्राइवर का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि उसके सामने अंधेरा था।

     

    बस आगे बढ़ती रही।

     

    करीब दस मिनट बाद सामने एक पुराना पुल दिखाई दिया।

     

    बस पुल पर चढ़ी।

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव को उसकी बात याद आई।

     

    “तीसरे पुल के बाद बस रोक दे… तो नीचे मत उतरना।”

     

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

     

    पुल के नीचे गहरी नदी बह रही थी।

     

    तभी बस अचानक रुक गई।

     

    चीईईं…

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    कंडक्टर अपनी सीट से उठा।

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    बाहर घना अंधेरा था।

     

    कंडक्टर ने कहा—

     

    “जो उतरना चाहते हैं, उतर जाएं।”

     

    आरव ने देखा।

     

    बस के अंदर बैठे बाकी सभी यात्री एक साथ खड़े हो गए।

     

    उसे यह देखकर झटका लगा।

     

    अभी कुछ मिनट पहले बस लगभग खाली थी।

     

    अब उसमें कम से कम बीस लोग बैठे थे।

     

    और सबसे डरावनी बात…

     

    सभी यात्री एक ही दिशा में देख रहे थे।

     

    बस के खुले दरवाज़े की तरफ।

     

    आरव ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    वह अभी भी अपनी आंखें बंद किए बैठी थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मत उतरना।”

     

    लेकिन तभी किसी ने आरव के कंधे पर हाथ रखा।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “अंकल… आप भी हमारे साथ चलेंगे?”

     

    आरव ने उसका हाथ झटक दिया।

     

    “मुझे घर जाना है।”

     

    बच्चा धीरे से बोला—

     

    “घर?”

     

    फिर वह हंसने लगा।

     

    उसकी हंसी धीरे-धीरे पूरे बस में गूंजने लगी।

     

    आरव डर गया।

     

    वह आगे ड्राइवर के पास गया।

     

    “बस चलाइए!”

     

    ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़कर घुमाया।

     

    और उसी क्षण उसकी चीख निकल गई।

     

    ड्राइवर का चेहरा नहीं था।

     

    जहां चेहरा होना चाहिए था, वहां सिर्फ काली, खाली त्वचा थी।

     

    आरव पीछे गिर गया।

     

    बस की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “अगला स्टॉप… मौत है।”

     

    फिर बस के अंदर सभी यात्रियों ने एक साथ सिर घुमाया।

     

    सभी की आंखें आरव पर थीं।

     

    और बूढ़ी औरत रोते हुए बोल रही थी—

     

    “बेटा… तुम इस बस में चढ़े ही क्यों?”

     

    आरव ने कांपते हुए पूछा—

     

    “ये बस है क्या?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “ये बस… उन लोगों को लेकर जाती है जो घर पहुंचने से पहले मर चुके होते हैं।”

     

    आरव का दिल रुकने जैसा हो गया।

     

    “लेकिन मैं तो जिंदा हूं!”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    उसने आरव की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हें ऐसा लगता है।”

     

    आरव ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला।

     

    स्क्रीन पर कोई नेटवर्क नहीं था।

     

    लेकिन स्क्रीन के ऊपर एक नोटिफिकेशन चमक रहा था।

     

    “मां: बेटा, जल्दी घर आना…”

     

    उसके नीचे एक और मैसेज था।

     

    “तुम्हारे एक्सीडेंट की खबर मिल गई है।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    उसने कांपते हुए बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “एक्सीडेंट…?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारी बाइक पुल के नीचे गिर गई थी।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “नहीं… ये झूठ है।”

     

    तभी बस की खिड़की के बाहर उसे अपनी बाइक दिखाई दी।

     

    वह पुल के नीचे पड़ी थी।

     

    और उसके पास…

     

    लोगों की भीड़ खड़ी थी।

     

    एक एंबुलेंस थी।

     

    और जमीन पर एक शरीर पड़ा था।

     

    आरव ने गौर से देखा।

     

    उस शरीर के कपड़े वही थे जो उसने पहने हुए थे।

     

    उसका चेहरा भी…

     

    उसी का था।

     

    बस के अंदर बैठे सभी यात्रियों ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

     

    “चलो…”

     

    “चलो…”

     

    “चलो…”

     

    आरव पीछे हटता गया।

     

    तभी ड्राइवर की बिना चेहरे वाली गर्दन उसकी तरफ घूमी।

     

    एक भारी आवाज़ आई—

     

    “अब तुम्हारा स्टॉप आ गया है।”

     

    बस का दरवाज़ा खुला।

     

    बाहर घना अंधेरा था।

     

    और उस अंधेरे में…

     

    एक लड़की खड़ी थी।

     

    वह आरव की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।

     

    आरव उसे पहचानता था।

     

    वह उसकी छोटी बहन थी…

     

    जिसकी मौत पांच साल पहले हो चुकी थी।

     

    लड़की ने हाथ बढ़ाया।

     

    “भैया… घर चलो।”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    लेकिन तभी बूढ़ी औरत ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “उसका हाथ मत पकड़ना!”

     

    आरव ने डरते हुए पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़ी औरत ने कांपती आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुमने उसका हाथ पकड़ लिया… तो तुम्हारी कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।”

     

    और उसी पल…

     

    बस के बाहर खड़ी लड़की ने अपना चेहरा उठाया।

     

    उसका चेहरा इंसान का नहीं था।

     

    उसके मुंह की जगह एक गहरा काला गड्ढा था।

     

    और उस गड्ढे से एक ही आवाज़ निकल रही थी—

     

    “भैया… मुझे अपने साथ ले चलो।”

     

    बस का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    आरव के सामने सिर्फ दो रास्ते थे—

     

    बस में रहना…

     

    या उस डरावनी चीज़ के साथ बाहर उतरना।

     

    लेकिन उसे अभी नहीं पता था कि असली खतरा बस के बाहर नहीं…

     

    बस के अंदर था।

  • कमरा नंबर 101 (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    इंदरजीत की चीख पूरे होटल में गूंज उठी।

     

    उसके सामने खड़ी निशा मुस्कुरा रही थी।

     

    लेकिन वह चेहरा…

     

    वह निशा का नहीं था।

     

    वह उसकी मां का चेहरा था।

     

    “बेटा…”

     

    वह आवाज़ सुनकर इंदरजीत के शरीर में जैसे खून जम गया।

     

    उसकी मां की मौत तब हो गई थी जब वह सिर्फ दस साल का था।

     

    वह उसे आखिरी बार अस्पताल में देख पाया था।

     

    फिर भी…

     

    उसके सामने वही चेहरा खड़ा था।

     

    इंदरजीत पीछे हटते हुए बोला,

     

    “तुम मेरी मां नहीं हो।”

     

    सामने खड़ी औरत की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

     

    “तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

     

    अचानक होटल की दीवारें कांपने लगीं।

     

    लाइटें एक-एक करके जलने लगीं।

     

    और जब रोशनी वापस आई…

     

    वह औरत गायब थी।

     

    उसकी जगह बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर डर था।

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    इंदरजीत ने उसका कॉलर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब सच बताओ!”

     

    बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    दोनों वापस कमरा नंबर 101 में पहुंचे।

     

    बूढ़े ने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।

     

    फिर वह आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “यह होटल पहले होटल नहीं था।”

     

    इंदरजीत चुपचाप सुनता रहा।

     

    “करीब बीस साल पहले यहां एक मानसिक अस्पताल हुआ करता था। उस अस्पताल में एक डॉक्टर था—डॉक्टर देव।”

     

    “वह लोगों के दिमाग और यादों पर अजीब प्रयोग करता था।”

     

    “एक दिन उसे लगा कि इंसान की यादों को आईने में कैद किया जा सकता है।”

     

    इंदरजीत ने आईने की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा आगे बोला,

     

    “उसने इस कमरे में एक खास आईना लगवाया। जो व्यक्ति उसके सामने ज्यादा देर तक बैठता… उसकी यादें धीरे-धीरे आईने में दिखाई देने लगती थीं।”

     

    “लेकिन एक दिन प्रयोग गलत हो गया।”

     

    “डॉक्टर देव की बेटी निशा उस कमरे में चली गई।”

     

    इंदरजीत ने पूछा,

     

    “निशा… वही लड़की?”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “वह आईने के सामने बैठी थी। तभी बिजली चली गई। जब बिजली वापस आई… निशा गायब थी।”

     

    “लेकिन उसका शरीर कहीं नहीं मिला।”

     

    इंदरजीत ने आईने को देखा।

     

    “तो वह आईने में फंस गई?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “सिर्फ निशा नहीं।”

     

    इंदरजीत की सांस रुक गई।

     

    “और कौन?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “2006 में पांच दोस्त यहां आए थे। वे उस समय इस होटल को एक सस्ते गेस्टहाउस के रूप में इस्तेमाल करते थे।”

     

    “उनमें एक लड़का था—इंदरजीत।”

     

    “उस रात उन्हें पुराने कमरे में वह आईना मिला।”

     

    “मजाक-मजाक में उन्होंने आईने के सामने बैठकर एक खेल शुरू किया।”

     

    “उन्होंने मोमबत्तियां जलाईं और एक-दूसरे से कहा कि जो भी आईने में अपना दूसरा चेहरा देखेगा, उसे कमरे से बाहर नहीं जाना है।”

     

    इंदरजीत के दिमाग में अचानक पुरानी यादें चमकने लगीं।

     

    अंधेरा।

     

    मोमबत्तियां।

     

    चार दोस्त।

     

    और वह खुद।

     

    फिर निशा की चीख।

     

    “इंदरजीत! आईने की तरफ मत देखना!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    इंदरजीत ने आईने में देखा था।

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब नहीं था।

     

    उसकी जगह एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    फिर उसने आईने के अंदर से हाथ बढ़ाया।

     

    इंदरजीत की याद अचानक टूट गई।

     

    वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    बूढ़ा उसके पास बैठ गया।

     

    “तुम्हें अब सब याद आ रहा है।”

     

    इंदरजीत कांपते हुए बोला,

     

    “उस रात क्या हुआ था?”

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “तुमने निशा को बचाने की कोशिश की।”

     

    “लेकिन आईने ने तुम दोनों को खींच लिया।”

     

    “अमित, राकेश और सुरेश भाग गए।”

     

    “लेकिन बाहर जाते समय उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

     

    इंदरजीत ने हैरानी से पूछा,

     

    “उन्होंने हमें बचाया क्यों नहीं?”

     

    बूढ़े की आंखों में गुस्सा था।

     

    “क्योंकि वे डर गए थे।”

     

    “उन्होंने पुलिस को बताया कि तुम और निशा वहां थे ही नहीं।”

     

    “कुछ दिनों बाद उन्होंने शहर छोड़ दिया।”

     

    “लेकिन निशा और तुम…”

     

    बूढ़ा आईने की तरफ देखने लगा।

     

    “तुम दोनों आईने के अंदर फंस गए।”

     

    इंदरजीत की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “फिर मैं यहां से बाहर कैसे आया?”

     

    बूढ़ा बोला,

     

    “तुम बाहर नहीं आए।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारा शरीर वहीं मर गया था।”

     

    “लेकिन तुम्हारी यादें… तुम्हारी आत्मा… इस आईने में रह गई।”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    “तो मैं…”

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

     

    आईने में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    इंदरजीत का चेहरा।

     

    लेकिन वह मुस्कुरा रहा था।

     

    वह आईने के अंदर से बोल रहा था—

     

    “अब तुम्हें सब याद आ गया।”

     

    इंदरजीत ने आईने को छूने की कोशिश की।

     

    उसी समय आईने की सतह पानी की तरह हिलने लगी।

     

    अंदर से निशा दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा अब पहले जैसा डरावना नहीं था।

     

    वह रो रही थी।

     

    “इंदरजीत… मुझे यहां से निकालो।”

     

    इंदरजीत ने अपना हाथ आईने के अंदर डाल दिया।

     

    उसका हाथ दूसरी तरफ चला गया।

     

    निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    अचानक कमरे में जोरदार हवा चलने लगी।

     

    खिड़कियां खुल गईं।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    दीवारों से चीखने की आवाज़ें आने लगीं।

     

    “हमें भी बाहर निकालो…”

     

    इंदरजीत ने आईने के अंदर देखा।

     

    वहां सिर्फ निशा नहीं थी।

     

    सैकड़ों चेहरे थे।

     

    बूढ़े।

     

    बच्चे।

     

    औरतें।

     

    मर्द।

     

    सब आईने के अंदर कैद थे।

     

    उन सभी की आंखें इंदरजीत पर थीं।

     

    निशा ने कहा,

     

    “यह आईना सिर्फ यादें नहीं रखता।”

     

    “यह आत्माएं रखता है।”

     

    इंदरजीत ने पूछा,

     

    “इसे खत्म कैसे करें?”

     

    निशा ने कमरे के कोने की तरफ देखा।

     

    “जिसने इसे बनाया था… उसी की मौत के साथ इसका राज़ खत्म होगा।”

     

    “डॉक्टर देव?”

     

    निशा ने सिर हिलाया।

     

    “वह मरा नहीं था।”

     

    इंदरजीत की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    निशा ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    आईने में एक बूढ़ा डॉक्टर दिखाई दिया।

     

    सफेद कोट।

     

    हाथ में पुरानी डायरी।

     

    और आंखों में अजीब चमक।

     

    वह डॉक्टर देव था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तुम लोग सोचते रहे कि मैं मर गया।”

     

    बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट डरकर पीछे हट गया।

     

    डॉक्टर देव की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजने लगी।

     

    “मैंने इंसानी यादों को अमर कर दिया है।”

     

    इंदरजीत चिल्लाया,

     

    “तुमने लोगों को कैद किया!”

     

    डॉक्टर हंसा।

     

    “कैद?”

     

    “नहीं।”

     

    “मैंने उन्हें मौत से बचाया।”

     

    इंदरजीत ने कहा,

     

    “तुम पागल हो!”

     

    डॉक्टर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “अगर तुम्हें अपनी मां से मिलना है… तो आईने में आ जाओ।”

     

    इंदरजीत जम गया।

     

    आईने में अचानक उसकी मां दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    “इंदरजीत… बेटा।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह एक कदम आगे बढ़ा।

     

    फिर दूसरा।

     

    निशा चीखी—

     

    “नहीं!”

     

    इंदरजीत रुक गया।

     

    उसे अपनी मां की एक बात याद आई।

     

    जब वह बच्चा था, उसकी मां हमेशा कहती थी—

     

    “सच्चा प्यार कभी तुम्हें अंधेरे में बुलाकर अकेला नहीं करता।”

     

    इंदरजीत ने आईने में अपनी मां को देखा।

     

    उसकी मां मुस्कुरा रही थी।

     

    लेकिन उसकी आंखों में कोई भावना नहीं थी।

     

    वह नकली थी।

     

    इंदरजीत समझ गया।

     

    “तुम मेरी मां नहीं हो।”

     

    डॉक्टर देव की आंखें लाल हो गईं।

     

    “तो फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।”

     

    आईना टूटने लगा।

     

    कड़ाक!

     

    एक बड़ी दरार बीच से नीचे तक चली गई।

     

    इंदरजीत ने जमीन पर पड़ी जंग लगी चाबी उठाई।

     

    उसे याद आया कि चाबी उसी बॉक्स में थी।

     

    बूढ़े ने कहा,

     

    “वह चाबी कमरे के नीचे बने पुराने तहखाने की है।”

     

    इंदरजीत तुरंत फर्श की तरफ गया।

     

    उसने लकड़ी के एक पुराने हिस्से को हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियां थीं।

     

    वह नीचे उतर गया।

     

    तहखाने में अंधेरा था।

     

    बीच में एक पुरानी मशीन लगी थी।

     

    मशीन से कई तार निकलकर दीवार के पीछे जा रहे थे।

     

    एक लोहे की प्लेट पर लिखा था—

     

    PROJECT 101

     

    इंदरजीत ने मशीन बंद करने की कोशिश की।

     

    लेकिन डॉक्टर देव की आवाज़ आई—

     

    “अगर मशीन बंद की… तो आईने में मौजूद सभी आत्माएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।”

     

    इंदरजीत रुक गया।

     

    निशा की आवाज़ आई—

     

    “मत रुको।”

     

    “हमें आज़ाद करो।”

     

    इंदरजीत ने मशीन की तरफ देखा।

     

    उसने पूरी ताकत से मुख्य स्विच खींच दिया।

     

    धड़ाम!

     

    मशीन बंद हो गई।

     

    ऊपर से आईना टूटने की आवाज़ आई।

     

    सैकड़ों चीखें एक साथ सुनाई दीं।

     

    फिर…

     

    अचानक सब शांत हो गया।

     

    इंदरजीत ऊपर भागा।

     

    कमरा नंबर 101 में आईना पूरी तरह टूट चुका था।

     

    कांच के हजारों टुकड़े फर्श पर पड़े थे।

     

    निशा वहां खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    उसने इंदरजीत को देखा और मुस्कुराई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    “अब हम जा सकते हैं।”

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

     

    निशा धीरे-धीरे उस रोशनी में गायब हो गई।

     

    फिर बाकी सभी आत्माएं भी।

     

    इंदरजीत अकेला खड़ा रह गया।

     

    बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट दरवाज़े पर खड़ा था।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    “अब सब खत्म हो गया।”

     

    इंदरजीत ने पूछा,

     

    “क्या मैं भी…”

     

    बूढ़े ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    इंदरजीत समझ गया।

     

    उसका समय भी खत्म हो चुका था।

     

    सुबह होने तक कमरा नंबर 101 खाली था।

     

    पुलिस जब होटल पहुंची तो उन्हें वहां सिर्फ टूटा हुआ आईना मिला।

     

    और एक पुरानी फोटो।

     

    फोटो में पांच लोग खड़े थे।

     

    अमित।

     

    राकेश।

     

    सुरेश।

     

    निशा।

     

    और इंदरजीत।

     

    लेकिन इस बार फोटो में एक बदलाव था।

     

    इंदरजीत मुस्कुरा रहा था।

     

    उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसके पास निशा खड़ी थी।

     

    दोनों के पीछे एक खुला हुआ दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

     

    101

     

    होटल कुछ महीनों बाद हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

     

    लोगों ने कहा कि वहां अब कुछ नहीं होता।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    करीब एक साल बाद एक नया होटल उसी जगह बनाया गया।

     

    नई इमारत।

     

    नई दीवारें।

     

    नए कमरे।

     

    पुरानी इमारत का कोई निशान नहीं था।

     

    एक रात होटल का नया कर्मचारी कमरों की चाबियां व्यवस्थित कर रहा था।

     

    उसे एक पुरानी जंग लगी चाबी मिली।

     

    उस पर नंबर लिखा था—

     

    101

     

    उसने मैनेजर से पूछा,

     

    “सर, हमारे होटल में कमरा नंबर 101 तो है ही नहीं।”

     

    मैनेजर ने कहा,

     

    “तो इसे फेंक दो।”

     

    कर्मचारी ने चाबी कूड़ेदान में डाल दी।

     

    उसी रात…

     

    करीब 12:15 बजे…

     

    रिसेप्शन की घंटी बजी।

     

    ट्रिन… ट्रिन…

     

    कर्मचारी ने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से एक लड़के की आवाज़ आई।

     

    बहुत धीमी आवाज़।

     

    “मुझे कमरा नंबर 101 चाहिए।”

     

    कर्मचारी ने कहा,

     

    “सर, हमारे होटल में 101 नाम का कोई कमरा नहीं है।”

     

    कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर दूसरी तरफ से जवाब आया—

     

    “कमरा तो है।”

     

    “बस… तुम्हें दिखाई नहीं देता।”

     

    फोन कट गया।

     

    कर्मचारी ने डरते हुए सामने लगे सीसीटीवी मॉनिटर की तरफ देखा।

     

    पहली मंज़िल के गलियारे में एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

     

    उस दरवाज़े पर लिखा था—

     

    101

     

    और दरवाज़े के सामने…

     

    एक लड़का खड़ा था।

     

    उसने कैमरे की तरफ देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    वह इंदरजीत था।

     

    उसके पीछे निशा खड़ी थी।

     

    दोनों ने एक साथ कैमरे की तरफ देखा।

     

    और फिर स्क्रीन काली हो गई।

     

    उस रात के बाद होटल के उस गलियारे में कभी कोई कैमरा काम नहीं कर पाया।

     

    लोग कहते हैं…

     

    अगर किसी सुनसान होटल में रात के 12:15 बजे आपको कोई अपने नाम से पुकारे…

     

    तो पीछे मुड़कर मत देखना।

     

    और अगर कोई आपसे कहे—

     

    “कमरा नंबर 101 खुला है…”

     

    तो वहां से तुरंत चले जाना।

     

    क्योंकि हो सकता है…

     

    दरवाज़े के उस पार कोई कमरा न हो।

     

    सिर्फ एक आईना हो।

     

    और उस आईने में…

     

    इंदरजीत अब भी आपका इंतज़ार कर रहा हो।

  • कमरा नंबर 101😱 (Part-2)

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    इंदरजीत की आंखें उस लड़की पर जमी हुई थीं।

     

    गलियारे में अंधेरा था। सिर्फ कमरे की हल्की-सी रोशनी दरवाज़े तक पहुंच रही थी। लड़की बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसके लंबे काले बाल चेहरे को पूरी तरह ढके हुए थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात उसके हाथ में मौजूद डायरी थी।

     

    वही डायरी…

     

    जो कुछ सेकंड पहले इंदरजीत के हाथ में थी।

     

    इंदरजीत का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे से पूछा, “तुम… कौन हो?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस डायरी का आखिरी पन्ना खोला।

     

    फिर धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर पन्ने पर कुछ लिखा।

     

    इंदरजीत को दूर से सिर्फ इतना दिखाई दिया—

     

    “मुझे याद करो।”

     

    अचानक गलियारे की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    इंदरजीत ने डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं…

     

    गलियारा खाली था।

     

    लड़की गायब थी।

     

    डायरी भी गायब थी।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    उसने तुरंत दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन हैंडल नहीं घूम रहा था।

     

    “खुल… जा!”

     

    उसने पूरी ताकत लगाई।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी घड़ी चलने लगी।

     

    टिक… टिक… टिक…

     

    उसने घड़ी की तरफ देखा।

     

    समय था—

     

    12:15 AM

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    घड़ी की सुइयां उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

     

    12:14…

     

    12:13…

     

    12:12…

     

    और फिर अचानक घड़ी रुक गई।

     

    कमरे में तेज़ ठंड फैलने लगी।

     

    इंदरजीत के सामने दीवार पर लगी तस्वीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    कांच टूट गया।

     

    तस्वीर के पीछे दीवार में एक छोटा-सा काला निशान था।

     

    इंदरजीत ने पास जाकर देखा।

     

    वह निशान किसी दरवाज़े की तरह लग रहा था।

     

    उसने दीवार पर हाथ फेरा।

     

    अचानक…

     

    ठक!

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    फिर वही आवाज़ दोबारा आई।

     

    ठक… ठक…

     

    दीवार के अंदर कुछ था।

     

    उसने कमरे की कुर्सी उठाई और दीवार पर मार दी।

     

    धड़ाम!

     

    प्लास्टर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।

     

    अंदर एक छोटा लकड़ी का बॉक्स दिखाई दिया।

     

    बॉक्स पुराना था और उस पर धूल जमी हुई थी।

     

    इंदरजीत ने उसे बाहर निकाला।

     

    उस पर सिर्फ एक नंबर लिखा था—

     

    101

     

    उसने बॉक्स खोला।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज, एक जंग लगी चाबी और एक फोटो थी।

     

    फोटो देखकर इंदरजीत की सांस रुक गई।

     

    फोटो में होटल के सामने पांच लोग खड़े थे।

     

    उनमें एक लड़की भी थी।

     

    वही सफेद कपड़े।

     

    वही लंबे बाल।

     

    वही चेहरा।

     

    इंदरजीत ने फोटो को गौर से देखा।

     

    फिर नीचे लिखी तारीख पढ़ी।

     

    17 अगस्त 2006

     

    फोटो के पीछे किसी ने नाम लिखे थे।

     

    अमित।

     

    राकेश।

     

    सुरेश।

     

    निशा।

     

    और…

     

    इंदरजीत।

     

    उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    “ये… मेरा नाम यहां कैसे?”

     

    उसने फोटो दोबारा देखी।

     

    वह पांचवां लड़का बिल्कुल उसी जैसा दिख रहा था।

     

    चेहरा।

     

    आंखें।

     

    बाल।

     

    सब कुछ।

     

    लेकिन वह तस्वीर चौदह साल पुरानी थी।

     

    इंदरजीत ने अपना मोबाइल निकाला और फोटो की तस्वीर लेने की कोशिश की।

     

    मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

     

    फिर अपने आप एक वीडियो चलने लगा।

     

    वीडियो में वही होटल दिखाई दे रहा था।

     

    कैमरा किसी कमरे के अंदर था।

     

    आवाज़ें आ रही थीं।

     

    “निशा, दरवाज़ा बंद कर!”

     

    “जल्दी कर!”

     

    “वो आ रही है!”

     

    फिर किसी लड़के की आवाज़ आई—

     

    “इंदरजीत कहां है?”

     

    वीडियो में अचानक कैमरा घूम गया।

     

    एक लड़का दिखाई दिया।

     

    वह बिल्कुल इंदरजीत जैसा था।

     

    वह घबराया हुआ था।

     

    उसने कैमरे की तरफ देखा और कहा—

     

    “अगर कोई ये वीडियो देख रहा है, तो कमरे नंबर 101 में मत रुकना।”

     

    फिर पीछे से एक लड़की की आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    लड़का धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कैमरा जमीन पर गिर गया।

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    इंदरजीत का मोबाइल वापस सामान्य हो गया।

     

    वह कुछ समझ नहीं पा रहा था।

     

    तभी बॉक्स के अंदर रखे कागजों में से एक कागज नीचे गिरा।

     

    उस पर होटल के पुराने कर्मचारियों की रिपोर्ट थी।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    “17 अगस्त 2006 की रात होटल के कमरे नंबर 101 में पांच युवक-युवती रुके थे। सुबह कमरे में चार लोग मिले। पांचवां व्यक्ति, इंदरजीत, लापता था।”

     

    इंदरजीत की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन मैं तो…”

     

    उसने कागज पलटा।

     

    अगली लाइन थी—

     

    “कमरे में मौजूद निशा ने दावा किया कि इंदरजीत गायब नहीं हुआ था। उसने कहा कि वह कमरे के आईने के अंदर चला गया।”

     

    इंदरजीत ने तुरंत आईने की तरफ देखा।

     

    आईना बिल्कुल शांत था।

     

    लेकिन उसमें…

     

    वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे चार लोग खड़े थे।

     

    अमित।

     

    राकेश।

     

    सुरेश।

     

    और निशा।

     

    चारों के चेहरे सफेद थे।

     

    इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरा खाली था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    चारों लोग अभी भी वहीं खड़े थे।

     

    निशा ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली आईने के अंदर एक जगह की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    इंदरजीत ने देखा।

     

    आईने के बीच में एक दरार दिखाई दे रही थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

     

    कर्क… कर्क…

     

    और फिर आईने के अंदर से एक आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    इस बार आवाज़ किसी लड़की की नहीं थी।

     

    यह उसकी अपनी आवाज़ थी।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    आईने के अंदर खड़ा इंदरजीत मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूं… जिसे तुम भूल चुके हो।”

     

    आईने में मौजूद चारों लोगों ने एक साथ अपना सिर नीचे कर लिया।

     

    फिर निशा ने कहा—

     

    “तुमने हमें मरने के लिए छोड़ दिया था।”

     

    इंदरजीत के दिमाग में अचानक तेज़ दर्द हुआ।

     

    उसकी आंखों के सामने कुछ तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक पुराना कमरा।

     

    पांच दोस्त।

     

    शराब की बोतलें।

     

    हंसी।

     

    फिर निशा रो रही थी।

     

    किसी बात पर झगड़ा हो रहा था।

     

    और फिर…

     

    कमरे की लाइट बंद हो गई थी।

     

    अंधेरे में किसी ने चीखकर कहा था—

     

    “आईने को मत देखना!”

     

    लेकिन किसी ने आईने की तरफ देख लिया था।

     

    इंदरजीत ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “ये सब… मेरे साथ क्यों हो रहा है?”

     

    निशा की आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम वापस आ गए हो।”

     

    “कहां से?”

     

    “उसी जगह से जहां तुम चौदह साल से फंसे हुए थे।”

     

    इंदरजीत ने आईने की तरफ देखा।

     

    आईने में अब वह कमरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    उसकी जगह एक लंबा अंधेरा गलियारा था।

     

    गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    101

     

    इंदरजीत को अचानक याद आया।

     

    उसने उस दरवाज़े को पहले भी देखा था।

     

    लेकिन कहां?

     

    उसके दिमाग में एक आवाज़ गूंजी—

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    उसने कांपते हुए पूछा—

     

    “हां।”

     

    “तो आईने के अंदर आओ।”

     

    “अगर मैं अंदर चला गया तो?”

     

    कुछ पल सन्नाटा रहा।

     

    फिर निशा बोली—

     

    “तुम बाहर कभी थे ही नहीं।”

     

    इंदरजीत का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    बाहर वही बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट खड़ा था।

     

    उसने इंदरजीत को देखा और कहा—

     

    “मुझे पता था तुम वापस आओगे।”

     

    इंदरजीत दौड़कर उसके पास गया।

     

    “आप मुझे जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    “मैं कौन हूं?”

     

    बूढ़े ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

     

    फिर धीरे से बोला—

     

    “तुम इंदरजीत नहीं हो।”

     

    इंदरजीत के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।

     

    फोटो में वही पांच लोग थे।

     

    लेकिन इस बार पांचवां चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह इंदरजीत नहीं था।

     

    वह एक दूसरा लड़का था।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “असली इंदरजीत चौदह साल पहले मर चुका है।”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    “तो फिर मैं कौन हूं?”

     

    बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर कमरे के आईने पर चली गई।

     

    आईने में निशा अब मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर आईने पर धीरे-धीरे शब्द उभरे—

     

    “अब इसे सब कुछ याद आ गया है।”

     

    बूढ़े के चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

     

    उसने तुरंत इंदरजीत का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    “कहां?”

     

    बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

     

    “होटल से बाहर।”

     

    इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ भागा।

     

    लेकिन जैसे ही वह नीचे पहुंचा, उसके सामने वही गलियारा था।

     

    कमरा नंबर 101।

     

    वह पीछे मुड़ा।

     

    फिर सामने देखा।

     

    फिर वही दरवाज़ा।

     

    101

     

    वह दूसरी तरफ भागा।

     

    फिर भी…

     

    कमरा 101।

     

    तीसरी तरफ गया।

     

    फिर भी…

     

    101।

     

    अब उसे समझ आ गया था।

     

    वह होटल में नहीं था।

     

    वह किसी और जगह फंस चुका था।

     

    तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    निशा उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे से बाल हटे हुए थे।

     

    और उसका चेहरा देखकर इंदरजीत की चीख निकल गई।

     

    क्योंकि निशा का चेहरा…

     

    बिल्कुल उसकी मां जैसा था।

     

    निशा ने धीरे से कहा—

     

    “बेटा… तुम्हें इतनी देर क्यों लगी मुझे पहचानने में?”

     

    और उसी क्षण पूरे होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ एक आवाज़ गूंजी—

     

    “भाग 3 में सच सामने आएगा।”

  • 😱कमरा नंबर 101😱–भाग 1

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे इंदरजीत उस पुराने होटल के सामने खड़ा था। बारिश इतनी तेज़ हो रही थी कि सड़क पर कुछ मीटर दूर तक भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा इलाका सफेद रोशनी में नहा जाता।

     

    होटल का नाम था—होटल शांति निवास।

     

    नाम सुनने में जितना शांत था, उसकी इमारत उतनी ही डरावनी लग रही थी।

     

    तीन मंज़िला वह पुरानी इमारत पिछले कई सालों से शहर के उस सुनसान हिस्से में खड़ी थी। दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर लगा बोर्ड हवा के साथ लगातार चरमराता था।

     

    इंदरजीत ने अपने बैग को कंधे पर ठीक किया और अंदर चला गया।

     

    वह शहर में नया था। उसे एक निजी कंपनी में नौकरी मिली थी और ऑफिस से नज़दीक होने के कारण उसने कुछ दिनों के लिए इसी होटल में कमरा लेने का फैसला किया था।

     

    रिसेप्शन पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और उसकी आंखें कुछ अजीब तरह से स्थिर थीं।

     

    “कमरा चाहिए?” बूढ़े ने बिना इंदरजीत की तरफ देखे पूछा।

     

    “जी। एक रात के लिए।”

     

    बूढ़े ने रजिस्टर खोला।

     

    “नाम?”

     

    “इंदरजीत।”

     

    बूढ़े ने उसका नाम लिख लिया।

     

    फिर उसने चाबियों का एक गुच्छा उठाया। कुछ सेकंड तक वह चाबियों को देखता रहा और आखिर में एक चाबी अलग कर ली।

     

    उस पर पीतल की छोटी-सी प्लेट लगी थी।

     

    101

     

    इंदरजीत ने चाबी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन बूढ़े ने चाबी देने से पहले उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात याद रखना।”

     

    इंदरजीत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    बूढ़े की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।

     

    “रात के बाद अगर कमरे के अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    इंदरजीत कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्का-सा हंस दिया।

     

    “बाबा, आप मज़ाक कर रहे हैं?”

     

    बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस चाबी इंदरजीत के हाथ में रख दी।

     

    “कमरा नंबर 101… पहली मंज़िल पर।”

     

    इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

     

    पीछे से बूढ़े की आवाज़ फिर सुनाई दी।

     

    “और हाँ… अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर दरवाज़ा खटखटाए, तब भी दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    इंदरजीत रुक गया।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    लेकिन बूढ़ा अब रजिस्टर में कुछ लिख रहा था।

     

    इंदरजीत ने इसे होटल के मालिक की अजीब आदत समझकर बात वहीं छोड़ दी।

     

    पहली मंज़िल पर पहुंचकर उसने कमरा नंबर 101 खोज लिया।

     

    दरवाज़ा पुराना था। लकड़ी पर कई खरोंचें थीं।

     

    उसने चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    कमरे के अंदर अजीब-सी ठंड थी।

     

    बाहर इतनी उमस और बारिश होने के बावजूद कमरे में ऐसा लग रहा था जैसे कई घंटों से कोई खिड़की खुली हो।

     

    कमरे में एक पुराना पलंग, एक मेज़, एक कुर्सी और दीवार पर टंगा हुआ बड़ा-सा आईना था।

     

    इंदरजीत ने अपना बैग रखा और खिड़की बंद करने के लिए आगे बढ़ा।

     

    खिड़की पहले से बंद थी।

     

    लेकिन शीशे पर अंदर की तरफ पानी की बूंदें जमी थीं।

     

    उसने हाथ से शीशा साफ किया।

     

    बाहर अंधेरा था।

     

    अचानक बिजली चमकी।

     

    और उस एक पल की रोशनी में इंदरजीत को लगा कि सड़क के उस पार कोई लड़की खड़ी है।

     

    सफेद कपड़ों में।

     

    वह बिल्कुल स्थिर थी।

     

    इंदरजीत ने दोबारा देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    उसने पर्दा खींच दिया।

     

    फिर वह पलंग पर लेट गया।

     

    रात के करीब बारह बजकर पंद्रह मिनट हुए होंगे कि कमरे में अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    की आवाज़ आई।

     

    इंदरजीत उठकर बैठ गया।

     

    आवाज़ दरवाज़े से आ रही थी।

     

    उसने घड़ी देखी।

     

    12:15 AM.

     

    उसे रिसेप्शन वाले बूढ़े की बात याद आई।

     

    “किसी के नाम लेने पर भी दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    वह कुछ देर शांत बैठा रहा।

     

    फिर बाहर से आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    उसका शरीर जैसे जम गया।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी।

     

    लेकिन वह साफ उसका नाम था।

     

    “इंदरजीत… दरवाज़ा खोलो।”

     

    उसने सांस रोक ली।

     

    वह दरवाज़े के पास नहीं गया।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ और तेज़ थी।

     

    “इंदरजीत… मुझे अंदर आने दो।”

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    उसने रिसेप्शन पर फोन करने की कोशिश की।

     

    फोन नहीं लगा।

     

    तभी दरवाज़े के नीचे से एक काली परछाईं दिखाई दी।

     

    किसी के पैर दरवाज़े के बाहर खड़े थे।

     

    इंदरजीत की नजरें उन पैरों पर टिक गईं।

     

    वह व्यक्ति बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

     

    फिर धीरे-धीरे दरवाज़े के नीचे से एक हाथ दिखाई दिया।

     

    उंगलियां असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    वे दरवाज़े के नीचे से अंदर आने की कोशिश कर रही थीं।

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    तभी बाहर से एक लड़की की आवाज़ आई।

     

    “तुमने मुझे पहचाना नहीं, इंदरजीत?”

     

    इंदरजीत का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    वह आवाज़…

     

    उसे जानी-पहचानी लग रही थी।

     

    लेकिन वह याद नहीं कर पा रहा था कि उसने यह आवाज़ कहां सुनी थी।

     

    अचानक बाहर सब शांत हो गया।

     

    हाथ गायब हो गया।

     

    पैरों की परछाईं भी नहीं थी।

     

    इंदरजीत ने राहत की सांस ली।

     

    वह वापस पलंग पर बैठा।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर सामने लगे आईने पर पड़ी।

     

    आईने में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    चेहरा बालों से ढका हुआ।

     

    इंदरजीत ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    लड़की अब उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    इंदरजीत चीखने ही वाला था कि आईने पर अपने आप धुंध जमने लगी।

     

    उस धुंध पर किसी ने उंगली से धीरे-धीरे लिखा—

     

    “तुम बहुत देर से आए हो।”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    मोबाइल की टॉर्च जलाकर उसने चारों तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    फिर उसकी नजर पलंग के नीचे पड़ी।

     

    वहां से एक पुरानी डायरी बाहर निकली हुई थी।

     

    इंदरजीत ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर तुम्हें यह डायरी कमरा नंबर 101 में मिली है, तो समझ लो कि उसने तुम्हें भी चुन लिया है।”

     

    नीचे तारीख लिखी थी।

     

    17 अगस्त 2006

     

    इंदरजीत ने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें होटल के इसी कमरे के बारे में लिखा था।

     

    “हर रात 12:15 पर वह आती है।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही इंदरजीत के हाथ कांपने लगे।

     

    “वह दरवाज़ा नहीं खोलती… वह इंतज़ार करती है कि तुम खुद उसे अंदर बुलाओ।”

     

    तभी कमरे के दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इंदरजीत ने डायरी बंद कर दी।

     

    बाहर से वही लड़की की आवाज़ आई।

     

    लेकिन इस बार आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास से आई—

     

    “इंदरजीत… दरवाज़ा तो तुमने पहले ही खोल दिया था।”

     

    इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा…

     

    खुला हुआ था।

     

    और उसके बाहर अंधेरे गलियारे में एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा अब भी बालों से ढका था।

     

    लेकिन उसके हाथ में…

     

    इंदरजीत की वही डायरी थी।

     

    वही डायरी…

     

    जो कुछ सेकंड पहले उसके हाथ में थी।

  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 3 — आखिरी दरवाज़ा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव कुछ क्षण तक अपने ही चेहरे को अंधेरे में देखता रहा।

     

    उसके सामने खड़ा व्यक्ति बिल्कुल उसी जैसा था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आँखें।

     

    वही कपड़े।

     

    लेकिन उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “आरव… ये क्या है?”

     

    सामने खड़ा दूसरा आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    असली आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    दूसरा आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “मैं वो हूँ जो हर बार यहाँ आने वाले लोगों की यादों से पैदा होता है।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “यह कमरा लोगों को मारता नहीं। यह उनकी यादों को अपने अंदर कैद करता है।”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज़ दर्द होने लगा।

     

    उसकी आँखों के सामने पुराने दृश्य घूमने लगे।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    एक बंद कमरा।

     

    एक आदमी जंजीर लगा रहा था।

     

    और…

     

    एक बच्चा कमरे के बाहर खड़ा होकर रो रहा था।

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    दूसरे आरव ने कहा—

     

    “तुमने बचपन में यह हवेली देखी थी। तुम्हें याद नहीं।”

     

    आरव को धीरे-धीरे कुछ याद आने लगा।

     

    वह लगभग पाँच साल का था।

     

    अपने नाना के साथ गाँव आया था।

     

    एक दिन वह खेलते-खेलते हवेली के अंदर चला गया था।

     

    उसी समय उसने एक बच्ची को कमरे की खिड़की से देखा था।

     

    वह बच्ची रो रही थी।

     

    उसने आरव से कहा था—

     

    “दरवाज़ा खोल दो।”

     

    लेकिन आरव डरकर भाग गया था।

     

    उस रात हवेली में आग लगी थी।

     

    मीरा गायब हो गई थी।

     

    और आरव की याददाश्त से वह पूरी घटना मिट गई थी।

     

    सामने खड़ा दूसरा आरव बोला—

     

    “तुम्हारे डर ने तुम्हारी याद को बंद कर दिया था। लेकिन कमरे ने उसे नहीं भुलाया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मीरा कहाँ है?”

     

    अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

     

    वही मासूम चेहरा।

     

    वही चाँदी की पायल।

     

    मीरा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “मैं यहाँ हूँ।”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “तुम्हें किसने बंद किया था?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    “मेरे पिता ने।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा बोली—

     

    “क्योंकि मैं उस चीज़ को देख सकती थी जो दीवार के पीछे रहती थी।”

     

    अचानक सुरंग काँपने लगी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वो चीज़ मेरे डर से बड़ी होती गई। हर बार जब कोई इस कमरे में आता है, वो उसकी आवाज़ चुरा लेती है। फिर उसकी याद। और आखिर में उसका चेहरा।”

     

    आरव ने सफेद आँखों वाली लड़की को याद किया।

     

    “वो क्या है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “उसका कोई नाम नहीं। लोग उसे अलग-अलग नाम देते रहे। लेकिन वह असल में डर है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “इसे खत्म कैसे किया जा सकता है?”

     

    मीरा ने अपनी पायल उतारी।

     

    “इसे उसी जगह लौटाना होगा जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    सुरंग के अंत में एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे के बीचोंबीच पत्थर का एक पुराना चबूतरा था।

     

    उस पर एक गोल निशान बना था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यहीं मेरी पायल रख दो।”

     

    आरव ने पायल चबूतरे पर रख दी।

     

    अचानक पूरी हवेली में जोरदार चीख गूँजी।

     

    सफेद आँखों वाली लड़की सुरंग में दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा भयानक था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    आरव ने साहस जुटाकर कहा—

     

    “तू भूत नहीं है। तू सिर्फ हमारा डर है।”

     

    वह चीखी।

     

    “डर को खत्म नहीं किया जा सकता!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन उसका सामना किया जा सकता है।”

     

    अचानक सुरंग की दीवारों पर कैद सभी आवाज़ें एक साथ गूँजने लगीं।

     

    “हमें बचाओ!”

     

    “हमें बाहर निकालो!”

     

    “बहुत अंधेरा है!”

     

    कबीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “आरव! कुछ करो!”

     

    आरव ने चबूतरे पर हाथ रखा।

     

    उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके भीतर वर्षों से छिपा डर बाहर निकल रहा है।

     

    उसे अपना बचपन दिखाई दिया।

     

    वह बच्चा आरव कमरे के सामने खड़ा था।

     

    मीरा अंदर से मदद माँग रही थी।

     

    बच्चा आरव डरकर भाग रहा था।

     

    इस बार उसने खुद को भागने नहीं दिया।

     

    वह उस पुराने दृश्य में वापस गया।

     

    मीरा ने हाथ बढ़ाया।

     

    “आरव… दरवाज़ा खोल दो।”

     

    इस बार आरव ने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरे के भीतर घना अंधेरा था।

     

    अंधेरे में वही सफेद आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम मुझे स्वीकार करोगे तो मैं तुम्हारा हिस्सा बन जाऊँगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं। मैं अपने डर को स्वीकार करता हूँ… लेकिन उसे अपने ऊपर राज नहीं करने दूँगा।”

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

     

    अचानक लड़की चीखने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    कमरे की दीवारें टूटने लगीं।

     

    काला हाथ दीवार से अलग होकर जमीन पर गिरा।

     

    और फिर…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुरंग में सुबह की रोशनी फैलने लगी।

     

    मीरा आरव के सामने खड़ी थी।

     

    अब उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “अब मैं जा सकती हूँ।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें बहुत पहले जाना चाहिए था।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुमने बहुत देर से सही… लेकिन इस बार दरवाज़ा खोल दिया।”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदल गया।

     

    चाँदी की पायल जमीन पर गिर गई।

     

    और मीरा गायब हो गई।

     

    कुछ ही क्षण बाद पूरी हवेली काँपने लगी।

     

    आरव और कबीर सुरंग से बाहर भागे।

     

    जैसे ही वे हवेली से बाहर निकले, पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी पुरानी हवेली का बीच वाला हिस्सा ढह गया।

     

    कुछ देर तक धूल हवा में उड़ती रही।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    गाँव वाले वहाँ इकट्ठा हो गए।

     

    नाना भी दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसने अपनी जेब से चाँदी की पायल निकाली।

     

    नाना उसे देखते ही समझ गए कि सब खत्म हो चुका है।

     

    “मीरा…”

     

    उन्होंने बस इतना कहा।

     

    उस रात आरव पहली बार बिना डर के सोया।

     

    सुबह जब वह गाँव से जाने लगा तो उसने आखिरी बार हवेली की तरफ देखा।

     

    जहाँ कभी वह काला कमरा था, वहाँ अब सिर्फ मलबा था।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसे बहुत हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “आरव…”

     

    वह रुक गया।

     

    कुछ क्षण बाद वही आवाज़ फिर आई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे पता था कि यह मीरा की आवाज़ थी।

     

    वह कार में बैठ गया और गाँव से निकल गया।

     

    कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी।

     

    लेकिन…

     

    उस रात शहर लौटने के बाद आरव ने अपने कमरे की अलमारी खोली।

     

    अंदर उसे वही पुरानी चाँदी की पायल दिखाई दी।

     

    जबकि वह पायल तो उसने हवेली के मलबे के पास छोड़ दी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    पायल के नीचे एक छोटा-सा कागज़ रखा था।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “हर बंद कमरा खाली नहीं होता।”

     

    आरव ने कागज़ को देखा।

     

    और तभी उसके कमरे के बंद दरवाज़े पर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार दस्तक हुई।

     

    आरव ने दरवाज़े की ओर देखा।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर बाहर से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    लेकिन इस बार वह आवाज़ मीरा की नहीं थी।

     

    और कहानी यहीं समाप्त होती है।