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  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 1 — हवेली से आती आवाज़😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बिहार के राजगीर से कुछ दूर पहाड़ियों और घने पेड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—बरहटा।

     

    गाँव छोटा था, लेकिन उसके आखिरी छोर पर खड़ी एक पुरानी हवेली के कारण दूर-दूर तक मशहूर था।

     

    लोग उसे सिंह हवेली कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले उस हवेली में एक जमींदार परिवार रहता था। एक रात परिवार के सभी सदस्य अचानक गायब हो गए।

     

    न कोई लाश मिली।

     

    न कोई सामान चोरी हुआ।

     

    न घर के दरवाज़े टूटे।

     

    बस हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसे तब से हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय उस कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

     

    कभी किसी बूढ़े आदमी के चलने की।

     

    और कभी…

     

    किसी महिला की आवाज़—

     

    “दरवाज़ा खोल दो…”

     

    गाँव में रहने वाला राघव इन कहानियों को हमेशा मजाक समझता था।

     

    वह पटना में रहकर पत्रकारिता करता था और कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आया था।

     

    एक शाम चाय की दुकान पर बैठे हुए उसने हवेली की बात छेड़ दी।

     

    “लोग आज भी उस हवेली से डरते हैं?”

     

    बूढ़े दुकानदार रामजी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरना चाहिए।”

     

    राघव हँस पड़ा।

     

    “आप भी?”

     

    रामजी ने चाय का गिलास नीचे रखा।

     

    “मैंने अपनी आँखों से देखा है।”

     

    “क्या?”

     

    “उस हवेली की खिड़की में एक लड़की खड़ी थी।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “कब?”

     

    “बीस साल पहले।”

     

    “फिर?”

     

    रामजी की आवाज़ धीमी हो गई।

     

    “अगले दिन जिस आदमी ने उसे देखा था… वह गायब हो गया।”

     

    राघव कुछ देर चुप रहा।

     

    उसी समय उसके दोस्त अमन का फोन आया।

     

    अमन पटना से राघव से मिलने गाँव आया था।

     

    उसने कहा—

     

    “भाई, सुना है यहाँ एक पुरानी हवेली है।”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “चलोगे?”

     

    अमन तुरंत तैयार हो गया।

     

    उनके साथ गाँव का लड़का छोटू भी चल पड़ा।

     

    तीनों शाम करीब पाँच बजे हवेली पहुँच गए।

     

    हवेली बाहर से ही डरावनी लग रही थी।

     

    ऊँची दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं।

     

    मुख्य दरवाज़े पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

     

    राघव ने जंजीर हटाई।

     

    दरवाज़ा अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    क्रीईई…

     

    अमन ने कहा—

     

    “भाई, अभी भी वापस चल सकते हैं।”

     

    राघव हँसा।

     

    “डर गया?”

     

    “नहीं। लेकिन मरने की जल्दी भी नहीं है।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के अंदर पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी।

     

    दीवारों पर परिवार की पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर में एक आदमी, उसकी पत्नी और दो बच्चे दिखाई दे रहे थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    1978।

     

    राघव ने तस्वीर को कैमरे से रिकॉर्ड किया।

     

    तभी छोटू ने कहा—

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “इस तस्वीर में चार लोग हैं ना?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन दीवार पर पाँच परछाइयाँ क्यों हैं?”

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    वास्तव में तस्वीर के नीचे दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    चौथी परछाईं किसी बच्चे की थी।

     

    और पाँचवीं…

     

    एक बहुत लंबे आदमी की।

     

    अमन ने तुरंत कहा—

     

    “चलो यहाँ से।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल खाली थी।

     

    राघव ने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर ऊपर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    छोटू का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “ये आवाज़…”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी छोटी बहन जैसी है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुम्हारी बहन तो पटना में है।”

     

    छोटू ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “छोटू…”

     

    इस बार छोटू सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    छोटू बोला—

     

    “वो मुझे बुला रही है।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “जो भी है, ऊपर नहीं जाना।”

     

    लेकिन तभी सीढ़ियों के ऊपर एक लड़की दिखाई दी।

     

    उसने लाल रंग की पुरानी पोशाक पहनी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर थे।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    राघव ने कैमरा उसकी तरफ किया।

     

    कैमरे की स्क्रीन पर लड़की दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    सिर्फ एक खाली गलियारा था।

     

    राघव का हाथ काँप गया।

     

    “ये…”

     

    अचानक लड़की ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए हो।”

     

    लाइट अचानक बंद हो गई।

     

    तीनों चीख पड़े।

     

    कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।

     

    लड़की गायब थी।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक पुरानी चाबी पड़ी थी।

     

    राघव ने चाबी उठा ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा नंबर लिखा था—

     

    13।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तेरह किस चीज़ का नंबर है?”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    उसे पहली मंजिल पर एक बंद दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़े पर वही नंबर था।

     

    13।

     

    दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।

     

    राघव ने चाबी लगाई।

     

    जंजीर खुल गई।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाज़ा मत खोल।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “हम इतनी दूर सिर्फ देखने आए हैं।”

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरे के अंदर अंधेरा था।

     

    फर्श पर पुराने खिलौने पड़े थे।

     

    एक टूटी हुई गुड़िया।

     

    लकड़ी की छोटी ट्रेन।

     

    और एक पुराना झूला।

     

    कमरे के बीच में दीवार पर एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम्हें पहले से खोज रहा है।”

     

    राघव ने दीवार को छुआ।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “राघव…”

     

    वह पीछे हट गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी कमरे के कोने में रखा पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया।

     

    उसमें से टूटी-फूटी आवाज़ आने लगी।

     

    “आज रात…”

     

    “हवेली में…”

     

    “कोई…”

     

    “जिंदा नहीं बचेगा…”

     

    रेडियो बंद हो गया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें अभी निकलना होगा।”

     

    तीनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही वे मुख्य दरवाज़े के पास पहुँचे, दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने उसे खींचा।

     

    नहीं खुला।

     

    अचानक ऊपर से किसी महिला के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मेरे बच्चे को बचा लो…”

     

    फिर दूसरी आवाज़ आई—

     

    “राघव…”

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया है।”

     

    राघव ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल पर वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

     

    इस बार उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर नीचे फेंक दी।

     

    राघव ने उसे उठाया।

     

    तस्वीर में वही परिवार था।

     

    लेकिन इस बार एक बात अलग थी।

     

    परिवार के चार लोगों के बीच…

     

    राघव खुद खड़ा था।

     

    राघव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

     

    मुख्य दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    बाहर रात हो चुकी थी।

     

    लेकिन जैसे ही तीनों बाहर निकलने लगे…

     

    छोटू रुक गया।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    छोटू गायब था।

     

    सिर्फ जमीन पर उसकी चप्पल पड़ी थी।

     

    और हवेली के अंदर से उसकी आवाज़ आ रही थी—

     

    “भैया…”

     

    “मुझे ढूँढो…”

     

    “मैं अभी जिंदा हूँ।”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर दीवार पर ताजा लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “अब तीन नहीं… चार लोग हैं।”

  • चुनरी वाली चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    घुटनों तक लटकी चुनरी वाली चुड़ैल

    राजपुर गांव में एक ऐसा रास्ता था, जिस पर दिन में भी लोग अकेले जाने से डरते थे।

    गांव से बाजार जाने वाला वही रास्ता सबसे छोटा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से लोग उसे छोड़कर लंबा रास्ता अपनाने लगे थे।

    क्योंकि उस रास्ते पर दोपहर के समय एक औरत दिखाई देती थी।

    लाल चुनरी ओढ़े।

    उसकी चुनरी सिर से शुरू होकर घुटनों तक लटकी रहती थी। चेहरा कभी साफ दिखाई नहीं देता था। वह बस धीरे-धीरे सड़क के बीचों-बीच चलती रहती।

    और सबसे डरावनी बात यह थी कि…

    जिसकी नजर उससे टकराती, उसकी मौत कुछ ही मिनटों में हो जाती।

    गांव में इस बात की इतनी दहशत थी कि लोग दोपहर में भी अपनी खिड़कियां बंद रखते।

    एक दिन राजपुर का रहने वाला रमेश बाजार से घर लौट रहा था।

    उसने दूर सड़क पर एक लाल चुनरी देखी।

    वह अचानक रुक गया।

    “हे भगवान…”

    वह औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

    रमेश ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    उसे गांव के बुजुर्गों की बात याद थी।

    “उसे देखना मत। उसकी आंखों में आंखें मत डालना।”

    रमेश सिर झुकाकर आगे बढ़ने लगा।

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई।

    “रमेश…”

    उसके कदम वहीं रुक गए।

    उसने पलटकर नहीं देखा।

    आवाज फिर आई।

    “रमेश…”

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास से आई।

    रमेश का शरीर कांपने लगा।

    उसने आंखें बंद कर लीं।

    लेकिन तभी सड़क पर उसकी नजर सामने पड़े एक छोटे पत्थर पर गई।

    पत्थर के पास लाल चुनरी का एक कोना पड़ा था।

    रमेश डर गया।

    वह भागने ही वाला था कि सामने से आती हवा में चुनरी थोड़ा ऊपर उठी।

    रमेश की नजर अनजाने में उस औरत के चेहरे पर चली गई।

    बस कुछ पल के लिए।

    उसने दो चमकती हुई आंखें देखीं।

    औरत मुस्कुराई।

    रमेश के हाथ से सामान गिर गया।

    वह पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    लेकिन कुछ ही मिनट बाद वह सड़क के किनारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

    जब गांव वालों ने उसे देखा, तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।

    उस दिन गांव में फिर वही सवाल उठ गया।

    आखिर वह चुड़ैल कौन थी?

    गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास ने सबको बुलाकर कहा,

    “मैंने इस औरत को पहले भी देखा है। बहुत साल पहले।”

    लोग चुप हो गए।

    हरिदास ने धीरे से कहा,

    “करीब बीस साल पहले इसी रास्ते से एक लड़की रोज अपने मायके जाया करती थी। उसका नाम था सुहानी।”

    “फिर क्या हुआ था?” किसी ने पूछा।

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

    “एक दिन वह इसी रास्ते पर गायब हो गई।”

    “गायब?”

    “हां। उसका कभी पता नहीं चला।”

    गांव की चंदा ने पूछा,

    “लेकिन उसका चुड़ैल से क्या संबंध है?”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “यही तो कोई नहीं जानता।”

    अगले दिन चंदा की सहेली मीना बाजार जाने के लिए उसी रास्ते पर निकल गई।

    चंदा ने उसे रोकते हुए कहा,

    “मत जा। दूसरा रास्ता ले ले।”

    मीना हंस पड़ी।

    “दिन के उजाले में भी डरोगी?”

    चंदा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “मैं मजाक नहीं कर रही।”

    मीना ने हाथ छुड़ाया।

    “मैं दस मिनट में लौट आऊंगी।”

    चंदा उसे जाते हुए देखती रही।

    कुछ देर बाद गांव के बाहर से एक बच्चे की चीख सुनाई दी।

    “लाल चुनरी!”

    चंदा का दिल बैठ गया।

    वह दौड़कर बाहर आई।

    सड़क बिल्कुल खाली थी।

    लेकिन बीच रास्ते पर मीना की चप्पल पड़ी थी।

    मीना कहीं नहीं थी।

    उस रात गांव में किसी ने खाना नहीं खाया।

    हरिदास ने कहा,

    “अब हमें उस औरत का सच पता करना ही होगा।”

    चंदा ने पूछा,

    “कैसे?”

    हरिदास ने कहा,

    “सुहानी की कहानी से शुरू करेंगे।”

    अगली सुबह चंदा और हरिदास गांव के पुराने मंदिर के पीछे बने एक टूटे हुए कमरे में गए।

    हरिदास ने मिट्टी से ढका एक पुराना संदूक खोला।

    उसमें कुछ पुराने कागज और एक तस्वीर थी।

    तस्वीर में एक जवान लड़की खड़ी थी।

    सिर पर लाल चुनरी।

    चंदा तस्वीर देखते ही सिहर गई।

    “यही है…”

    हरिदास ने सिर हिलाया।

    “सुहानी।”

    तभी संदूक के अंदर से एक पुराना कागज नीचे गिरा।

    चंदा ने उसे उठाया।

    उस पर लिखा था—

    “जिस दिन मेरी लाल चुनरी सड़क पर दिखाई दे, समझ लेना मैं सच बताने वापस आ गई हूं।”

    चंदा ने घबराकर हरिदास की तरफ देखा।

    “इसका मतलब?”

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

    उसी समय बाहर से पायल की आवाज आई।

    छन…

    छन…

    छन…

    दोनों जम गए।

    दिन के ठीक बारह बजे थे।

    खिड़की से बाहर देखा तो सड़क पर वही लाल चुनरी वाली औरत खड़ी थी।

    इस बार वह गांव की तरफ देख रही थी।

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा,

    “आंखें मत मिलाना।”

    चंदा ने धीरे से पूछा,

    “अगर हम उसका चेहरा नहीं देखेंगे तो उसे कैसे रोकेंगे?”

    हरिदास ने कहा,

    “शायद रोकना ही गलत होगा। शायद हमें उसकी बात सुननी होगी।”

    अचानक औरत ने हाथ उठाया।

    उसकी उंगली गांव के पुराने कुएं की तरफ थी।

    फिर वह धीरे-धीरे चलने लगी।

    चंदा और हरिदास कुछ दूरी से उसके पीछे चल पड़े।

    औरत कुएं के पास जाकर रुक गई।

    उसने अपनी लाल चुनरी जमीन पर गिरा दी।

    पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।

    वह डरावना नहीं था।

    बल्कि उसकी आंखों में गहरा दुख था।

    चंदा ने कांपते हुए पूछा,

    “तुम सुहानी हो?”

    औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

    हरिदास की आंखें फैल गईं।

    सुहानी ने कुएं की तरफ इशारा किया।

    हरिदास अचानक सब समझ गया।

    “तुम्हें यहां छिपाया गया था…”

    सुहानी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    चंदा ने पूछा,

    “किसने?”

    सुहानी ने सड़क की तरफ देखा।

    फिर गांव के एक पुराने मकान की ओर इशारा किया।

    वह मकान गांव के सबसे अमीर आदमी के परिवार का था।

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

    “नहीं…”

    उसी समय पीछे से एक आवाज आई।

    “तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?”

    दोनों पलटे।

    गांव का सरपंच खड़ा था।

    सुहानी को देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।

    उसने कांपते हुए कहा,

    “इसे देखकर भी तुम जिंदा हो?”

    चंदा ने पूछा,

    “आप इसे जानते हैं?”

    सरपंच पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “झूठ मत बोलो।”

    सरपंच चुप रहा।

    तभी सुहानी ने जमीन से लाल चुनरी उठाई और सरपंच के सामने रख दी।

    सरपंच कांपने लगा।

    “मैंने कुछ नहीं किया था…”

    हरिदास चौंका।

    “तो फिर किसने किया था?”

    सरपंच ने सिर झुका लिया।

    “उस समय गांव का जमींदार…”

    वह आगे कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली।

    सुहानी की चुनरी हवा में लहराई।

    सड़क पर अचानक सन्नाटा छा गया।

    सरपंच घबराकर पीछे हटने लगा।

    लेकिन सुहानी ने उसे छुआ तक नहीं।

    बस उसकी ओर देखकर बोली,

    “सच बोलो।”

    सरपंच की आंखों में डर उतर आया।

    उसने सबके सामने पुराना राज खोल दिया।

    सुहानी को कभी किसी ने नहीं मारा था।

    वह उस रात गांव छोड़कर चली गई थी।

    लेकिन जाते समय उसकी लाल चुनरी कुएं के पास गिर गई थी।

    लोगों ने उसके गायब होने की कहानी को डर और अफवाहों में बदल दिया।

    और वर्षों बाद जब सुहानी की मौत दूसरे शहर में हुई, तब उसकी आखिरी इच्छा थी कि गांव वालों को सच्चाई पता चले।

    लेकिन फिर सवाल था—

    फिर रास्ते पर दिखाई देने वाली चुड़ैल कौन थी?

    हरिदास ने सुहानी की तरफ देखा।

    “अगर तुम सुहानी नहीं हो… तो तुम कौन हो?”

    लाल चुनरी वाली औरत कुछ पल चुप रही।

    फिर उसने अपनी चुनरी उठाई।

    हवा में चुनरी लहराई।

    और उसके पीछे खड़ी एक दूसरी परछाईं दिखाई दी।

    एक और लाल चुनरी।

    घुटनों तक लटकी हुई।

    चंदा के मुंह से चीख निकल गई।

    सुहानी ने धीरे से अपना सिर झुका लिया।

    दूसरी परछाईं सड़क की ओर बढ़ने लगी।

    हरिदास फुसफुसाया

    “अब समझ आया…”

    “क्या?”

    “सुहानी चुड़ैल नहीं थी…”

    वह डरते हुए बोला”वह तो लोगों को असली चुड़ैल से बचाने के लिए यहां आती थी।”

    चंदा ने सड़क की ओर देखा।

    दूसरी लाल चुनरी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।

    और इस बार…उसके पीछे कोई चेहरा नहीं था।

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

    और गांव के रास्ते पर फिर से वही आवाज गूंजी

    छन… छन… छन…

  • गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    Rohan और Ananya का रिश्ता ठीक वैसा ही था जैसे गरम चाय में थोड़ी सी अदरक—तीखा भी, स्वादिष्ट भी।

     

    रविवार की सुबह थी। Rohan अभी भी बिस्तर पर लेटा था। Ananya रसोई से चिल्लाई, “ओय सोने वाले राजा! उठो वरना परांठे खुद उठकर चल जाएँगे!”

     

    Rohan ने आँखें मलते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे परांठे इतने भारी होते हैं ना… उठ ही नहीं पाते।”

     

    “क्या कहा तुमने?” Ananya चम्मच लेकर कमरे में घुस आई।

     

    Rohan मुस्कुराते हुए बोला, “मैंने कहा… तुम्हारे परांठे इतने स्वादिष्ट होते हैं कि लोग उठाकर ले जाते हैं।”

     

    Ananya ने चम्मच हवा में लहराया, “झूठ बोलना भी सीख लो थोड़ा। कल रात को कहा था ना कि मेरा बनाया खाना दुनिया का सबसे बेस्ट है… आज भारी कह रहे हो?”

     

    “कल रात मैं भूखा था। भूखा आदमी कुछ भी बोल देता है,” Rohan ने तकिया से मुँह छुपा लिया।

     

    Ananya ने तकिया छीन लिया। “अच्छा! तो अब सच्चाई बताओ—मेरा खाना कैसा है?”

     

    Rohan ने नाटकीय अंदाज में कहा, “इतना अच्छा कि मैं रोज-रोज मारने के बाद भी जिंदा हूँ।”

     

    दोनों हँस पड़े। लेकिन हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी।

     

    थोड़ी देर बाद Ananya ने कहा, “आज शाम को मेरे कॉलेज वाले दोस्त आ रहे हैं। तुम भी रहना।”

     

    Rohan का चेहरा लटक गया। “फिर से? पिछले हफ्ते भी आए थे। और वो तेरा एक्स… नहीं आएगा ना?”

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “कितनी बार कहा है—वो सिर्फ दोस्त है अब। और तुम हर बार क्यों जलते हो?”

     

    “जलता नहीं… सिर्फ परेशान होता हूँ। वो तुम्हें ‘अनु’ कहकर बुलाता है। अनु! मेरा हक है वो।”

     

    “ओहो! अब नाम पर भी कब्जा?” Ananya हँसी। “तुम ना… बहुत छोटे हो जाते हो कभी-कभी।”

     

    Rohan उठकर खड़ा हो गया। “छोटे? मैंने तुम्हारे लिए वो महँगा परफ्यूम लिया, तुम्हारे पसंदीदा शो के लिए रात-रात भर जगा… और तुम मुझे छोटा कह रही हो?”

     

    Ananya पास आकर बोली, “हाँ बोल रही हूँ। क्योंकि जब तुम जलते हो तो बहुत क्यूट लगते हो।”

     

    Rohan ने नाटक करते हुए मुँह फुला लिया। “मैं क्यूट नहीं, मैं हैंडसम हूँ।”

     

    “हैंडसम हो… लेकिन जब नाराज होते हो तो बच्चों जैसे लगते हो,” Ananya ने उसकी गाल Pinch की।

     

    Rohan ने उसका हाथ पकड़ लिया। “एक काम करो। आज शाम को तुम मेरे दोस्तों के साथ आओ। फिर देखना मैं कितना जलता हूँ।”

     

    Ananya हँस पड़ी। “नहीं जाना। तुम्हारे दोस्त सिर्फ क्रिकेट और ऑफीस की बात करते हैं। बोर हो जाऊँगी।”

     

    “और तुम्हारे दोस्त सिर्फ पुरानी यादें और ‘याद है ना जब…’ करते हैं। मैं बोर हो जाता हूँ।”

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे। एक पल को लगता था जैसे लड़ाई होने वाली है। लेकिन दोनों की आँखों में हँसी थी।

     

    Ananya ने अचानक कहा, “ठीक है। आज न तो मेरे दोस्त, न तुम्हारे। आज सिर्फ हम दोनों। फिल्म? या लॉन्ग ड्राइव?”

     

    Rohan ने सोचा। “लॉन्ग ड्राइव। लेकिन कंडीशन है—तू गाड़ी नहीं चलाएगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पिछली बार तूने इतना जोर से ब्रेक मारा था कि मेरा दिल मुँह में आ गया था।”

     

    Ananya ने हाथ कमर पर रखे। “क्योंकि तुमने अचानक कहा था ‘आई लव यू’। झटका तो लगेगा ना!”

     

    Rohan शांत पड़ गया। फिर धीरे से बोला, “तो अब झटका नहीं लगता क्या?”

     

    Ananya ने उसकी ओर देखा। गुस्सा, नोक-झोंक, जलन… सब एक पल में गायब। वह पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लगता है… हर रोज। लेकिन अब मैं आदी हो गई हूँ।”

     

    Rohan मुस्कुराया। “तो फिर आज की नोक-झोंक का फैसला क्या?”

     

    Ananya ने उसकी तरफ एक परांठा थमाते हुए कहा, “फैसला यह कि तू पहले यह खा। वरना मैं नाराज हो जाऊँगी।”

     

    Rohan ने बड़ा सा निवाला लिया और बोला, “नाराज मत होना। तुम्हारी नाराजगी भी मीठी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो खट्टी पड़ जाती है।”

     

    Ananya हँसते हुए बोली, “और तुम्हारी जलन भी प्यारी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो मैं तुम्हें चुप कराने के लिए किस कर देती हूँ।”

     

    Rohan ने तुरंत मुँह बंद कर लिया।  

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “क्या हुआ?”

     

    “चुप हूँ। किस का इंतजार है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    यही उनकी कहानी थी।  

    नोक-झोंक में भी प्यार,  

    जलन में भी अपनापन,  

    और हर खट्टी बात के बाद एक मीठी मुस्कान।

     

    क्योंकि असली प्यार वही होता है  

    जहाँ लड़ाई भी हँसी में खत्म हो जाए,  

    और नाराजगी भी गले मिलने का बहाना बन जाए।

  • जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    आज मेरा बत्तीसवाँ जन्मदिन था।  

    कमरे में हल्की रोशनी थी। दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी नौ बज रहे थे। मेज पर एक छोटा-सा केक रखा था—वही वाला, जो हर साल मैं खुद बाजार से लाता था। कोई गाना नहीं, कोई पार्टी नहीं, कोई भीड़ नहीं। सिर्फ मैं और मेरी चुप्पी।

     

    पत्नी रिया रसोई में थी। उसने कहा था, “आज कुछ स्पेशल बनाऊँगी।” लेकिन उसकी आवाज में वह पुरानी गर्माहट नहीं थी। पिछले दो साल से हमारे बीच जैसे कोई काँच की दीवार खड़ी हो गई थी। बातें होती थीं, लेकिन दिल नहीं छूती थीं। बेटा आरव स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में चला गया था। उसने सुबह सिर्फ इतना कहा था, “पापा, हैप्पी बर्थडे,” और चले गए थे।

     

    मैं खिड़की के पास खड़ा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई।  

    रिया चिल्लाई, “कौन है?”  

    मैंने दरवाजा खोला।  

    बाहर एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। उम्र साठ के करीब। हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखों में कोई अजीब//सी चमक।  

     

    “आप… अनुज मिश्रा हैं न?” उसने पूछा।  

     

    “हाँ।”  

     

    उसने डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया। “यह आपके लिए है। जन्मदिन का तोहफा।”  

     

    मैंने हैरानी से देखा। “आप…?”  

     

    “मेरा नाम महेश है। मैं आपके पिताजी का पुराना दोस्त था। उन्होंने यह आपको देने को कहा था… बहुत पहले।”  

     

    पिताजी।  

    वह शब्द सुनते ही मेरा गला सूख गया। पिताजी को गए हुए ग्यारह साल हो चुके थे। अचानक दिल का दौरा। कोई चेतावनी नहीं, कोई अलविदा नहीं। बस एक सुबह अखबार पढ़ते-पढ़ते चले गए थे।  

     

    मैंने डिब्बा लिया। महेश जी मुस्कुराए और बिना और कुछ कहे चले गए। बारिश में उनकी छाया गायब हो गई।  

     

    रिया पास आकर बोली, “कौन था?”  

    “पिताजी का कोई पुराना जानने वाला… तोहफा दे गया।”  

     

    मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी डायरी थी। काली कवर, कोनों से घिसी हुई। पहली पृष्ठ पर पिताजी का हाथ—  

     

    *“अनुज के लिए।  

    जब तुम तैयार हो, तब खोलना।  

    —पापा”*

     

    मैंने डायरी बंद कर दी। अचानक कमरा बहुत छोटा लगने लगा।  

    रिया ने पूछा, “क्या है?”  

    “कुछ नहीं। बाद में देखूँगा।”  

     

    रात के खाने में सब चुप थे। केक काटा गया। आरव ने जल्दी-जल्दी अपना पीस खाया और कमरे में चला गया। रिया ने बर्तन धोए। मैं डायरी को टेबल पर रखे देखता रहा।  

     

    बारह बजने वाले थे। मैंने डायरी खोली।  

     

    पहला पन्ना—  

    *“बेटे, आज तुम्हारा ग्यारहवाँ जन्मदिन है। तुम सो रहे हो। मैं यह लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ बातें कहनी हैं जो मुँह से नहीं कह पाता।”*

     

    आगे के पन्ने साल-दर-साल भरे हुए थे। हर जन्मदिन पर एक चिट्ठी।  

     

    *बारहवाँ जन्मदिन…*  

    *पंद्रहवाँ…*  

    *अठारहवाँ…*  

    *जब तुम कॉलेज गए…*  

    *जब तुम्हारी माँ बीमार पड़ीं…*  

    *जब तुमने नौकरी छोड़ दी थी और मैंने डांटा था…*  

     

    और फिर आखिरी चिट्ठी। तारीख वही थी जब पिताजी का देहांत हुआ था—एक दिन पहले की।  

     

    *“बेटे,  

    अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो शायद मैं नहीं हूँ।  

    मुझे माफ करना।  

    मैंने तुम्हें बहुत डांटा। बहुत सख्ती की। तुम्हें लगता होगा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता था।  

    सच यह है कि मैं डरता था।  

    डरता था कि तुम मेरी तरह मेहनत में खो जाओगे। डरता था कि दुनिया तुम्हें तोड़ देगी।  

    मैंने प्यार को डांट में छुपा लिया।  

    आज तुम्हारा इक्कीसवाँ जन्मदिन है। मैं चाहता था कि खुद आकर कहूँ… लेकिन हिम्मत नहीं हो रही।  

    इस डायरी को मैंने महेश के पास रख दिया है। उसने वादा किया है कि जब समय आएगा, तुम्हें दे देगा।  

    अनुज,  

    तुम काफी हो।  

    तुम्हारी कमी नहीं है।  

    और हाँ… मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।  

    हर जन्मदिन पर।  

    —पापा”*

     

    डायरी हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।  

    मैं रो नहीं पाया। बस बैठ गया। सालों का गुबार एक साथ उठ आया। पिताजी की सख्ती, उनकी चुप्पी, उनकी वो आँखें जो कभी नहीं मुस्कुराती थीं… सब एक-एक करके याद आने लगा।  

     

    रिया कमरे में आई। उसने डायरी उठाई और चुपचाप पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भी भर गईं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।  

     

    “यह तोहफा अनचाहा था ना?” उसने धीरे से कहा।  

     

    मैंने सिर हिलाया। “हाँ। मैं नहीं चाहता था कि वे वापस आएँ। न यादों में, न शब्दों में।”  

     

    रिया बोली, “लेकिन कभी-कभी अनचाहा तोहफा ही सबसे जरूरी होता है।”  

     

    मैंने डायरी फिर उठाई। आखिरी पन्ने पर एक छोटी-सी नोट थी—  

     

    *“अगर एक दिन तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज हो, तो उसे यह डायरी दिखाना।  

    ताकि वह समझे कि पिता भी इंसान होते हैं।”*

     

    मैं उठकर आरव के कमरे में गया। वह सो रहा था। मैंने उसके माथे पर हाथ रखा। फिर वापस आकर रिया के पास बैठ गया।  

     

    “रिया… क्या हम बात कर सकते हैं? सच-सच?”  

     

    उसने सिर हिलाया।  

     

    रात भर हमने बात की। सालों से जमा शिकायतें, अनकहे शब्द, थकान, डर… सब निकले। कोई चीख-पुकार नहीं हुई। बस दो थके हुए लोग एक-दूसरे को सुन रहे थे।  

     

    सुबह हुई। बारिश रुक चुकी थी।  

    मैंने केक का बचा हुआ टुकड़ा आरव को दिया। उसने हैरानी से देखा।  

    “पापा, आप रोए हैं?”  

     

    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ। लेकिन अच्छे आँसू थे।”  

     

    फिर मैंने उसे डायरी दिखाई।  

    आरव ने धीरे-धीरे पढ़ा। पढ़कर बोला, “दादाजी… अच्छे थे ना?”  

     

    “हाँ बेटे। बहुत अच्छे थे। बस बता नहीं पाए।”  

     

    उस जन्मदिन के बाद घर की हवा बदल गई। पूरी तरह नहीं, लेकिन काफी हद तक। रिया फिर से हँसने लगी। आरव मेरे साथ बैठकर बात करने लगा। और मैं… हर साल उस डायरी को खोलता रहा।  

     

    अब जब भी कोई पूछता है कि उस जन्मदिन पर सबसे अच्छा तोहफा क्या मिला, तो मैं कहता हूँ।

     

    “एक अनचाहा तोहफा।  

    जो मैंने कभी माँगा नहीं था।  

    लेकिन जिसने मुझे वह सब लौटा दिया जो मैंने खो दिया था  

    अपने पिता का प्यार,  

    अपने घर की गर्माहट,  

    और खुद को माफ करने की हिम्मत।”  

     

    कभी-कभी जिंदगी अनचाही चीजें देती है।  

    और वही अनचाही चीजें… सबसे ज्यादा बदल देती हैं।

  • सफर में मिली एक बच्ची

    सफर में मिली एक बच्ची

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने सोचा था कि यह सफर भी बाकी सफरों की तरह ही बीत जाएगा। दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वह रात की ट्रेन थी। डिब्बे में भीड़ थी, लेकिन मेरी सीट खिड़की वाली होने की वजह से थोड़ी राहत थी। मैं अपने काम के सिलसिले में जा रहा था। मन भारी था। घर में माँ बीमार थीं, पत्नी से अनबन चल रही थी और ऑफिस का दबाव सिर पर सवार था। जिंदगी जैसे रुक-रुककर साँस ले रही थी।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे ट्रेन रूकी। एक छोटा-सा स्टेशन था। कुछ यात्री उतरे, कुछ चढ़े। तभी मेरी बगल वाली सीट पर एक छोटी-सी बच्ची बैठ गई। उम्र शायद आठ-नौ साल की होगी। फटी हुई फ्रॉक पहनी हुई, बाल बिखरे हुए, पैरों में कोई चप्पल नहीं। उसके हाथ में एक फटी हुई पॉलीथीन की थैली थी, जिसमें दो-तीन सूखे रोटियाँ और एक प्लास्टिक की पानी की बोतल थी।

     

    वह चुपचाप बैठ गई। मैंने उसकी ओर देखा तो उसने भी मेरी ओर देखा। आँखें बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन उनमें कोई बचपन वाली चमक नहीं थी। बस एक अजीब-सी थकान और कुछ छिपा हुआ दर्द।

     

    थोड़ी देर बाद ट्रेन चल पड़ी। बच्ची ने अपनी थैली खोली और एक रोटी निकालकर खाने लगी। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत कीमती चीज खा रहा हो। मैंने सोचा कि शायद भूखी है। मैंने अपने बैग से बिस्किट का पैकेट निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

     

    “लो, खा लो।”

     

    वह झिझकी। फिर धीरे से बोली, “नहीं भैया… माँ ने कहा है पराया खाना नहीं खाना।”

     

    आवाज बहुत हल्की थी, लेकिन साफ। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह पराया नहीं है। तुम खा लो। मैं भी खाऊँगा।”

     

    उसने एक बिस्किट लिया और बहुत धीरे-धीरे खाने लगी। फिर अचानक उसने पूछा, “भैया, आप कहाँ जा रहे हो?”

     

    “वाराणसी।”

     

    “मैं भी… वाराणसी जा रही हूँ।”

     

    “अकेली?” मैंने हैरानी से पूछा।

     

    वह चुप रही। फिर बोली, “माँ स्टेशन पर उतर गई थीं… दवा लेने। कहा था कि जल्दी आ जाएँगी। लेकिन ट्रेन चल पड़ी… और माँ नहीं आईं।”

     

    मेरा दिल एक पल के लिए रुक-सा गया। “तो तुम अकेली हो?”

     

    उसने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन माँ आ जाएँगी। वे वादा करके गई थीं।”

     

    मैंने उसकी ओर देखा। बच्ची की आँखों में आँसू नहीं थे। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वह बहुत दिनों से इस इंतजार की आदी हो चुकी हो।

     

    मैंने धीरे से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “गुड़िया।”

     

    “गुड़िया… तुम्हारी माँ कहाँ काम करती हैं?”

     

    वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “माँ बीमार हैं। बहुत दिनों से। डॉक्टर साहब ने कहा था कि शहर में इलाज कराना पड़ेगा। इसलिए हम गाँव से चले। पापा… पापा तो पहले ही चले गए थे।”

     

    “पापा कहाँ गए?”

     

    गुड़िया ने रोटी का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा और बोली, “स्वर्ग। माँ कहती हैं कि पापा स्वर्ग में हैं। वहाँ से हमें देख रहे हैं। इसलिए रोना नहीं चाहिए।”

     

    मेरी साँस अटक गई। आठ साल की बच्ची इतनी सहजता से अपने पिता की मौत की बात कर रही थी, जैसे कोई रोजमर्रा की बात हो।

     

    ट्रेन की आवाज के बीच उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। “भैया, क्या स्वर्ग में भी ट्रेन जाती है? माँ कहती हैं कि पापा हमें लेने आएंगे एक दिन। लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर पापा आ गए तो माँ को कौन संभालेगा? माँ तो बहुत कमजोर हो गई हैं। खड़े भी नहीं हो पातीं ठीक से।”

     

    मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था।

     

    गुड़िया आगे बोली, “कल रात माँ ने मुझे गले से लगाया था। कहा था—गुड़िया, अगर कभी मैं खो जाऊँ तो तुम घबराना मत। कोई अच्छा आदमी मिल जाएगा जो तुम्हें पहुँचा देगा। और तुम हँसते रहना। क्योंकि पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं।”

     

    उसने अपनी थैली से एक पुरानी तस्वीर निकाली। फटी हुई, मुड़ी हुई। उसमें एक पतला-दुबला आदमी था, गोद में छोटी गुड़िया और बगल में एक औरत। सब मुस्कुरा रहे थे।

     

    “यह हमारे घर की है। जब पापा थे।” उसने तस्वीर दिखाते हुए कहा। “अब घर भी नहीं रहा। किराया नहीं दे पाए तो मालिक ने निकाल दिया। माँ ने कहा—चले चलो, कोई जगह मिल जाएगी।”

     

    मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था। हर शब्द दिल के किसी कोने को छू रहा था। मैंने अपनी जिंदगी के झमेलों को याद किया—माँ की बीमारी, पत्नी से अनबन, ऑफिस का तनाव—और अचानक सब कुछ बहुत छोटा लगने लगा।

     

    गुड़िया ने अचानक मेरी ओर देखा। “भैया, आप उदास क्यों हो?”

     

    मैंने मुस्कुराने की कोशिश की। “नहीं… कुछ नहीं।”

     

    “माँ कहती हैं कि उदास रहने से दिल कमजोर हो जाता है। और कमजोर दिल वाला इंसान जल्दी थक जाता है। आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया ताकि वह न देख सके। लेकिन आँसू रुक नहीं रहे थे।

     

    रात गहराने लगी। गुड़िया धीरे-धीरे मेरी बाँह पर सर रखकर सो गई। उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं। मैं उसे देखता रहा। उस छोटी-सी जिंदगी में इतना बोझ, इतनी समझ, इतनी मजबूरी… और फिर भी वह सो रही थी, जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि सुबह माँ आ ही जाएँगी।

     

    सुबह हुई। ट्रेन वाराणसी पहुँचने वाली थी। मैंने गुड़िया को जगाया। उसने आँखें रगड़ते हुए पूछा, “माँ आईं?”

     

    मैंने सिर हिलाया। “अभी नहीं… लेकिन हम ढूँढ़ेंगे।”

     

    स्टेशन पर मैंने टीटीई को बताया। पुलिस को सूचना दी गई। घोषणा हुई। थोड़ी देर बाद एक कमजोर-सी औरत दौड़ती हुई आई। साड़ी फटी हुई, चेहरा पीला, साँसें फूल रही थीं। उसने गुड़िया को देखते ही गले लगा लिया और रोने लगी।

     

    “मैं दवा लेने गई थी… लाइन लग गई… ट्रेन छूट गई… मैंने सोचा तू खो गई…”

     

    गुड़िया ने माँ का चेहरा पोंछते हुए कहा, “माँ, मैं नहीं रोई। पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं ना?”

     

    माँ और जोर से रो पड़ी।

     

    मैं वहीं खड़ा रहा। मेरा गला भर आया। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और माँ के हाथ में थमा दिए। उन्होंने मना किया, लेकिन मैंने कहा, “यह पराया नहीं है। गुड़िया की तरह ही अपना है।”

     

    ट्रेन फिर खुलने वाली थी। मैं डिब्बे में चढ़ गया। खिड़की से देखा—गुड़िया हाथ हिला रही थी। माँ भी।

     

    ट्रेन चल पड़ी। मैंने खिड़की से बाहर देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। दिल भारी था, लेकिन अजीब तरह से हल्का भी।

     

    उस छोटी-सी बच्ची ने कुछ ऐसा कह दिया था जो मैं सालों से सुनना चाहता था, लेकिन किसी ने नहीं कहा था।  

    कि जिंदगी कितनी भी कठिन हो, हँसते रहना चाहिए।  

    कि वादा निभाना चाहिए।  

    कि कभी-कभी सबसे छोटे लोग सबसे बड़े सबक सिखा देते हैं।

     

    उस दिन के बाद जब भी मैं उदास होता, गुड़िया की आवाज कानों में गूंज जाती  

    “आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    और मेरा दिल… सच में रो उठता।  

    लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं, शुक्र के होते।

     

    क्योंकि सफर में मिली उस बच्ची ने मुझे याद दिला दिया था कि जिंदगी की असली ताकत बड़े-बड़े लोगों में नहीं, छोटी-छोटी बातों और छोटे-छोटे दिलों में छिपी होती है।

  • बारिश से दुश्मनी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश से थी कियाना की दुश्मनी

     

    कियाना को बचपन से ही बारिश बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    दूसरों के लिए बारिश मतलब ठंडी हवा, मिट्टी की खुशबू, पकौड़े और खिड़की के पास बैठकर चाय पीना था।

     

    लेकिन कियाना के लिए बारिश मतलब डर।

     

    क्योंकि उसके शरीर को बारिश की बूंदें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती थीं। जैसे ही वह बारिश में भीगती, कुछ ही देर में उसके शरीर पर लाल-लाल रैशेज और तेज खुजली होने लगती। कई बार हालत इतनी खराब हो जाती कि उसे डॉक्टर के पास जाना पड़ता।

     

    बचपन में जब दूसरे बच्चे बारिश में खेलते थे, कियाना अपनी खिड़की के पीछे खड़ी होकर उन्हें देखा करती थी।

     

    उसकी मां कहतीं,

    “बेटा, बाहर मत जाना। बारिश तुम्हारे लिए ठीक नहीं है।”

     

    कियाना सिर हिला देती।

    लेकिन उसके मन में एक ही सवाल आता“आखिर मैं बाकी बच्चों जैसी क्यों नहीं हूं?”

     

    धीरे-धीरे वह बारिश से दूर होती गई।

     

    स्कूल में भी जब बारिश होती, बाकी बच्चे मैदान में दौड़ते हुए जाते और कियाना छत के नीचे अकेली खड़ी रहती।

     

    कुछ बच्चे उसे देखकर बातें भी बनाते।

     

    “इसे बारिश से एलर्जी है।”

    “अरे, इसे छूना मत कहीं तुम्हें भी न हो जाए।”

     

    कियाना जानती थी कि ऐसी बातें बेवकूफी थीं, लेकिन फिर भी हर बार उसके दिल को चोट लगती।

     

    वह कम बोलने लगी।

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात रुद्र से हुई।

     

    रुद्र बिल्कुल कियाना के उलट था।वह हमेशा मुस्कुराता रहता था।

     

    किसी दिन परीक्षा में कम नंबर आते तो भी मुस्कुराता।

     

    किसी दोस्त से झगड़ा हो जाता तो कुछ देर बाद खुद ही हंसने लगता।

     

    और अगर कोई दुखी होता, तो उसके पास बैठकर उसे हंसाने की कोशिश करता।

     

    पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई।

     

    कियाना एक कोने में बैठी किताब पढ़ रही थी।

     

    अचानक सामने से रुद्र आया और उसकी किताब उठाकर बोला,

    “ये किताब इतनी गंभीर क्यों है?”

     

    कियाना ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

    “क्या?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

    “मैं पूछ रहा हूं कि तुम इतनी गंभीर क्यों हो?”

     

    कियाना ने किताब वापस लेते हुए कहा,

     

    “मैं पढ़ रही हूं।”

     

    “अच्छा… तो पढ़ते समय मुस्कुराना मना है क्या?”

     

    कियाना ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र चला गया।

     

    अगले दिन फिर आया।

     

    फिर उसके अगले दिन भी।

     

    धीरे-धीरे कियाना को उसकी आदत होने लगी।

     

    एक दिन कियाना ने पूछ ही लिया,

     

    “तुम हमेशा खुश कैसे रहते हो?”

     

    रुद्र कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मैं हमेशा खुश नहीं रहता।”

     

    कियाना ने उसकी तरफ देखा।

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “बस दुखी रहने के बजाय खुश रहने की कोशिश करता हूं।”

     

    कियाना को उसकी बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन हर किसी की जिंदगी में परेशानियां होती हैं।”

     

    “मेरी जिंदगी में भी हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर क्या? परेशानी को अपने ऊपर इतना अधिकार क्यों दूं कि वो मेरी मुस्कान भी छीन ले?”

     

    कियाना पहली बार मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद दोनों दोस्त बन गए।

     

    रुद्र को कियाना की बारिश वाली परेशानी के बारे में पता था।

     

    वह कभी उसे बारिश में बाहर आने के लिए नहीं कहता था।

     

    बल्कि जब बारिश शुरू होती तो खुद उसके लिए छाता लेकर आता।

     

    एक दिन उसने मजाक में कहा,

     

    “तुम्हारी बारिश से दुश्मनी है, लेकिन मेरी छाते से दोस्ती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    “तुम बहुत अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत ज्यादा सोचती हो।”

     

    “क्योंकि मुझे हर चीज से डर लगता है।”

     

    रुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “डरना गलत नहीं है। लेकिन डर की वजह से जिंदगी जीना छोड़ देना गलत है।”

     

    कियाना चुप हो गई।

     

    उसे पहली बार लगा कि कोई उसकी परेशानी को देखकर उससे दूर नहीं जा रहा था।

     

    समय बीतता गया।

     

    कियाना की जिंदगी में रुद्र की मौजूदगी बढ़ती गई।

     

    जब वह उदास होती, रुद्र उसे हंसाता।

     

    जब वह अपने शरीर को लेकर परेशान होती, रुद्र उसे समझाता,

     

    “तुम्हारे शरीर पर रैशेज आ जाते हैं, इसका मतलब ये नहीं कि तुम खराब हो।”

     

    कियाना की आंखें भर आतीं।

     

    “लेकिन लोग मुझे देखकर घबरा जाते हैं।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लोगों की नजर से खुद को देखना बंद करो।”

     

    कियाना ने पूछा,

     

    “और तुम्हारी नजर से?”

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मेरी नजर में तुम वही कियाना हो जो मुझे रोज परेशान करती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसके दिल में उस दिन कुछ बदल गया।

     

    अब वह रुद्र की मुस्कान का इंतजार करने लगी थी।

     

    फिर एक दिन कॉलेज में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कियाना कैंपस के बाहर खड़ी थी।

     

    उसके पास छाता नहीं था।

     

    रुद्र कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    तभी कियाना ने देखा कि उसके सामने एक छोटा बच्चा सड़क के किनारे फंस गया था।

     

    वह भीग रहा था और रो रहा था।

     

    कियाना कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर रुक गई।

     

    उसे पता था कि बारिश में जाना उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।

     

    लेकिन बच्चा लगातार रो रहा था।

     

    कियाना ने अपने डर को पीछे छोड़ा और दौड़कर बच्चे को पास की दुकान की छत के नीचे ले आई।

     

    कुछ ही मिनटों में उसकी त्वचा पर लाल रैशेज दिखाई देने लगे।

     

    खुजली भी शुरू हो गई।

     

    लेकिन उसने बच्चे को सुरक्षित कर दिया था।

     

    तभी पीछे से रुद्र दौड़ता हुआ आया।

     

    उसके हाथ में छाता था।

     

    उसने कियाना को देखा तो घबरा गया।

     

    “तुम बारिश में क्यों आई?”

     

    कियाना ने बच्चे की तरफ देखकर कहा,

     

    “वो अकेला था।”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, चिंता थी।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारी हालत क्या हो सकती है?”

     

    कियाना ने धीरे से कहा,

     

    “हां।”

     

    “फिर भी?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “तुमने ही तो कहा था… डर की वजह से जिंदगी जीना नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    रुद्र कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने छाता कियाना के ऊपर कर दिया।

     

    “तुम मेरी बातें याद रखती हो?”

     

    कियाना ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “कुछ बातें याद रखने लायक होती हैं।”

     

    रुद्र भी मुस्कुरा दिया।

     

    उस दिन पहली बार कियाना को अपनी परेशानी से उतनी नफरत नहीं हुई।

     

    उसे समझ आया कि बारिश उसके लिए मुश्किल हो सकती है, लेकिन उसकी पूरी जिंदगी नहीं।

     

    कुछ दिनों बाद रुद्र उसे एक जगह लेकर गया।

     

    वह एक छोटी सी पहाड़ी थी, जहां से पूरा शहर दिखाई देता था।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    कियाना ने डरते हुए पूछा,

     

    “यहां क्यों लाए हो?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि आज बारिश होने वाली है।”

     

    कियाना तुरंत पीछे हट गई।

     

    “तुम पागल हो?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

     

    “मैं तुम्हें भीगने के लिए नहीं कह रहा।”

     

    उसने अपनी जेब से एक छोटा सा कांच का जार निकाला।

     

    बारिश की पहली बूंदें उसमें गिरने लगीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम बारिश को छू नहीं सकतीं, लेकिन उसे देख तो सकती हो।”

     

    कियाना जार को देखने लगी।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    रुद्र ने पूछा,

     

    “अब भी बारिश से नफरत है?”

     

    कियाना ने सिर हिलाया।

     

    “थोड़ी।”

     

    “और जिंदगी से?”

     

    कियाना ने रुद्र की तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि अब उसमें तुम हो।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर हमेशा की तरह मुस्कुरा दिया।

     

    बारिश तेज होती गई।

     

    कियाना और रुद्र छत के नीचे खड़े उसे देखते रहे।

     

    कियाना बारिश में नहीं भीगी।

     

    लेकिन पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके अंदर बरसों से जमा उदासी जरूर भीगकर धुल गई हो।

     

    उस दिन कियाना को समझ आया कि जिंदगी हमेशा हमारी पसंद के हिसाब से नहीं बदलती।

     

    कभी-कभी हमें अपनी मुश्किलों के साथ जीना सीखना पड़ता है।

     

    और अगर रास्ते में कोई ऐसा इंसान मिल जाए जो हमारी परेशानी देखकर हमसे दूर जाने के बजाय हमारा हाथ थाम ले…

     

    तो जिंदगी थोड़ी आसान जरूर हो जाती है।

     

  • ❤️ सावन की पहली बारिश 💦❤️💚

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    सावन आया तो बादल भी मुस्कुराने लगे,

    सूखे पत्तों पर मोती-से आँसू गिराने लगे।

    मिट्टी ने जब ली बारिश की पहली अंगड़ाई,

    हवा में घुल गई जैसे कोई मीठी-सी तन्हाई।❣️❣️💞💞❣️❣️

     

    नीम की डाल पर झूला धीरे-धीरे झूलने लगा,

    मन का कोई भूला हुआ गीत फिर से गूंजने लगा।

    भीगी गलियों में तेरी यादों के दीप जले,

    हर बूँद में जैसे तेरे ही एहसास मिले।💛💛💛❤️❤️

     

    कहीं रिमझिम, कहीं घटाओं का शोर है,

    सावन की हर बूँद में छुपा कोई प्रेम का दौर है।

    खिड़की पर ठहरी बूँद ने चुपके से ये कहा—

    “जिसे दिल से चाहो, उसे बारिश में महसूस करना।”💕💕💕

     

    और जब शाम हुई, बादल भी थम गए,

    आसमान के आँचल में सितारे फिर जम गए।

    मैंने हथेली पर एक बूँद संभालकर रख ली—

    सोचा, शायद इसमें तुम्हारी मुस्कान मिल गई।💞💞💞

     

    सावन तो हर साल आता है,

    मगर कुछ बारिशें उम्रभर याद रहती हैं…!!!❤️❤️

     

     

    ❤️HAPPY SAVAN TO ALL FRIENDS 💚🫂🌻🌹🙏

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 3 — असली डायन का सच और अंतिम अंत😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

     

    हवेली की दीवारें काँप रही थीं।ऊपर की खिड़की में खड़ी वह बूढ़ी औरत लगातार मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी लाल आँखें अंधेरे में किसी जलते हुए अंगारे की तरह चमक रही थीं।

     

    नीचे तहखाने में नंदिनी, अमन, हरिदास बाबा और वीरेंद्र पत्थर की तरह खड़े थे।

     

    किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    वीरेंद्र की नजर अब भी ऊपर उसी बूढ़ी औरत पर थी।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी… आप तो तीस साल पहले मर गई थीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    फिर उसकी हँसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    “मरी थी… लेकिन तुम लोगों के लालच ने मुझे मरने नहीं दिया।”

     

    नंदिनी ने गौरी की आत्मा की तरफ देखा।

     

    “क्या यही वह औरत है?”

     

    गौरी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “इसने तुम्हारे साथ क्या किया था?”

     

    गौरी की आँखों में वर्षों पुराना दर्द दिखाई दिया।

     

    “उसका नाम था भवानी।”

     

    हरिदास बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “भवानी… भैरव सिंह की माँ।”

     

    वीरेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    गौरी ने अपनी कहानी शुरू की।

     

    तीस साल पहले जब गाँव में बीमारी फैली थी, तब भवानी ने लोगों के डर का फायदा उठाया था।

     

    वह तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की बातें करके लोगों को अपने नियंत्रण में रखती थी।

     

    भैरव सिंह जमीन हड़पता था और भवानी लोगों के मन में डर पैदा करती थी।

     

    जिस औरत के पास जमीन होती, उसे डायन कह दिया जाता।

     

    जिस परिवार ने विरोध किया, उसके घर के बाहर रात में अजीब निशान बना दिए जाते।

     

    फिर पूरे गाँव में अफवाह फैलाई जाती कि उस परिवार पर डायन का साया है।

     

    लोग डर जाते।

     

    और आखिरकार अपनी जमीन छोड़कर गाँव से चले जाते।

     

    गौरी ने इस षड्यंत्र को देख लिया था।

     

    इसीलिए उसे भी डायन बना दिया गया।

     

    लेकिन गौरी भागने में सफल हो गई।

     

    उस रात उसने भवानी और भैरव सिंह को आपस में बात करते सुन लिया था।

     

    वे किसी पुराने तहखाने में एक अनुष्ठान करने वाले थे।

     

    गौरी ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन भवानी ने उसे पकड़ लिया।

     

    “तुमने हमारा राज देख लिया है,” भवानी ने कहा था।

     

    गौरी ने जवाब दिया—

     

    “मैं पूरे गाँव को सच बता दूँगी।”

     

    भवानी हँसी।

     

    “गाँव वाले तुम्हारी बात नहीं मानेंगे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “एक दिन सच सामने जरूर आएगा।”

     

    भवानी ने उसे धमकाया।

     

    लेकिन उसी समय मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गाँव वाले उस तरफ आने लगे।

     

    भवानी डर गई।

     

    उसने गौरी को तहखाने में बंद कर दिया और गाँव वालों से कहा—

     

    “गौरी डायन है। इसे पकड़ो।”

     

    गाँव वालों ने तहखाने को घेर लिया।

     

    लेकिन उसी रात अचानक भयंकर आग लग गई।

     

    अराजकता में गौरी तहखाने से बाहर निकल गई।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    वहाँ उसने आखिरी बार हरिदास को देखा।

     

    “बाबा, मुझे बचा लीजिए।”

     

    लेकिन हरिदास डर के कारण कुछ नहीं कर पाए।

     

    गौरी जंगल की तरफ भागी।

     

    इसके बाद किसी ने उसे जीवित नहीं देखा।

     

    कुछ दिनों बाद बरगद के पेड़ के पास उसकी चूड़ियाँ और खून से सना कपड़ा मिला।

     

    गाँव वालों ने मान लिया कि वह मर चुकी है।

     

    लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

     

    गौरी कई वर्षों तक जंगल में छिपकर जीवित रही।

     

    उसने गाँव से दूर एक छोटी झोपड़ी बनाई।

     

    वह आज भी लोगों का इलाज करती रही।

     

    लेकिन भवानी ने उसे ढूँढ़ लिया।

     

    और एक रात…

     

    गौरी की हत्या कर दी गई।

     

    उसकी आत्मा उसी बरगद के पेड़ से बंध गई।

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मैं सिर्फ अपना सच साबित करना चाहती थी।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “लेकिन लोग तुम्हें डायन कहते रहे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने भवानी की ओर देखा।

     

    “और उसने मेरे नाम का इस्तेमाल करके डर फैलाया।”

     

    तभी ऊपर खड़ी भवानी की आत्मा जोर से हँसी।

     

    “क्योंकि इंसान डरना पसंद करता है।”

     

    अचानक हवेली की दीवारों से धुआँ निकलने लगा।

     

    भवानी नीचे उतरने लगी।

     

    उसके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।

     

    वह हवा में तैरती हुई सीढ़ियों से नीचे आई।

     

    हर कदम के साथ दीवारों पर लगे चित्रों से औरतों की चीखें आने लगीं।

     

    “हमें बचाओ…”

     

    “हम निर्दोष हैं…”

     

    “हमने कुछ नहीं किया…”

     

    नंदिनी ने चारों तरफ देखा।

     

    सभी चित्रों की आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    भवानी ने हाथ उठाया।

     

    अचानक अमन हवा में उठ गया।

     

    “अमन!”

     

    नंदिनी उसकी तरफ भागी।

     

    लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उसे पीछे फेंक दिया।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    भवानी ने उनकी ओर देखा।

     

    “तुम!”

     

    हरिदास काँप गए।

     

    “मैंने क्या किया?”

     

    भवानी हँसी।

     

    “तुमने सच देखा था… फिर भी चुप रहे।”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “हाँ… मेरी गलती थी।”

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “लेकिन अब मैं सच बताऊँगा।”

     

    भवानी ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    लेकिन इस बार हरिदास पीछे नहीं हटे।

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में कहा—

     

    “गौरी डायन नहीं थी!”

     

    उनकी आवाज हवेली से बाहर तक पहुँची।

     

    गाँव के कई लोग डरते-डरते हवेली के पास पहुँच चुके थे।

     

    हरिदास ने फिर कहा—

     

    “गौरी निर्दोष थी!”

     

    गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    वीरेंद्र अचानक आगे आया।

     

    उसने सबके सामने अपने परिवार का सच बता दिया।

     

    “मेरे दादा और मेरी दादी ने गाँव की औरतों को डायन कहकर उनकी जमीन छीनी थी।”

     

    गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने भी वर्षों तक यह सच छिपाया।”

     

    “लेकिन अब नहीं।”

     

    उसने जमीन के सारे कागज गाँव वालों के सामने रख दिए।

     

    “जिसकी जो जमीन थी, वह वापस मिलेगी।”

     

    भवानी की आत्मा क्रोध से काँपने लगी।

     

    “तुम मेरे खिलाफ जाओगे?”

     

    वीरेंद्र ने सिर उठाकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्योंकि मेरे परिवार ने जो किया, वह गलत था।”

     

    अचानक भवानी की शक्ति और बढ़ गई।

     

    हवेली की छत टूटने लगी।

     

    लोग बाहर भागने लगे।

     

    लेकिन नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने गौरी की तरफ देखा।

     

    “अब क्या करें?”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मेरा सच सामने आ गया है।”

     

    “लेकिन भवानी?”

     

    “उसे भी सच से ही हराया जा सकता है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    गौरी ने हवेली के बीच रखी एक पुरानी पत्थर की पटिया की ओर इशारा किया।

     

    “इसके नीचे वह चीज है जिसके लिए उसने यह सब किया।”

     

    नंदिनी, अमन और हरिदास ने मिलकर पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक लोहे का संदूक मिला।

     

    संदूक खोलते ही उसमें पुराने दस्तावेज, सोने के सिक्के और एक काली किताब मिली।

     

    काली किताब भवानी की थी।

     

    उसमें गाँव की हर उस औरत का नाम लिखा था जिसे उसने डायन घोषित करवाया था।

     

    हर नाम के सामने उसकी जमीन का विवरण था।

     

    नंदिनी ने किताब उठाकर गाँव वालों को दिखाई।

     

    “यही है असली सबूत।”

     

    भवानी चीखने लगी।

     

    “उसे जला दो!”

     

    अचानक आग की लपटें किताब की ओर बढ़ीं।

     

    लेकिन नंदिनी ने किताब को कसकर पकड़ लिया।

     

    गौरी उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    दोनों आत्माएँ आमने-सामने थीं।

     

    एक निर्दोष की आत्मा।

     

    दूसरी लालच और झूठ से भरी आत्मा।

     

    भवानी ने कहा—

     

    “तुम मुझे नहीं हरा सकती।”

     

    गौरी ने शांत स्वर में कहा—

     

    “मैं तुम्हें नहीं हरा रही।”

     

    “सच तुम्हें हरा रहा है।”

     

    इतना सुनते ही हवेली के चारों तरफ तेज प्रकाश फैल गया।

     

    जिन औरतों के चित्र दीवारों पर लगे थे, वे एक-एक करके दीवार से बाहर निकलने लगे।

     

    वे सभी आत्माएँ थीं।

     

    वे गौरी के पीछे खड़ी हो गईं।

     

    भवानी पहली बार डर गई।

     

    “नहीं…”

     

    एक वृद्ध आत्मा आगे आई।

     

    “हम सबको तुमने डायन कहा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हमारी जमीन छीनी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “हमारे परिवार उजाड़े।”

     

    चौथी ने कहा—

     

    “लेकिन अब हमारा सच सामने आ चुका है।”

     

    भवानी पीछे हटती गई।

     

    अचानक उसके पैरों के नीचे की जमीन काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आत्मा कमजोर होने लगी।

     

    वह चीखी—

     

    “मैंने कुछ गलत नहीं किया!”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “झूठ बोलना बंद करो।”

     

    भवानी ने आखिरी बार चीख लगाई।

     

    और फिर…

     

    उसका शरीर राख में बदल गया।

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    अचानक गौरी की आत्मा भी प्रकाश में बदलने लगी।

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    “अब मुझे किसी बदले की जरूरत नहीं।”

     

    “मुझे सिर्फ यह चाहिए था कि लोग सच जानें।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “क्या तुम फिर कभी वापस आओगी?”

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जब तक लोग सच को याद रखेंगे, मुझे लौटने की जरूरत नहीं होगी।”

     

    यह कहते ही गौरी धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गई।

     

    उसकी आत्मा आसमान की ओर उठी।

     

    और फिर पूरी तरह गायब हो गई।

     

    उसी क्षण हवेली की पुरानी घड़ी चलने लगी।

     

    टक… टक… टक…

     

    चालीस वर्षों से रुकी हुई घड़ी पहली बार आगे बढ़ी।

     

    सुबह होने लगी।

     

    सूरज की पहली किरण हवेली की टूटी खिड़की से अंदर आई।

     

    जहाँ रात भर अंधेरा था, वहाँ अब उजाला था।

     

    गाँव वालों ने उस दिन से हवेली को डर की जगह नहीं, बल्कि एक सबक की जगह बना दिया।

     

    जिन औरतों की जमीन छीनी गई थी, उनकी जमीन उनके परिवारों को वापस दी गई।

     

    गौरी के नाम पर गाँव में एक छोटा-सा स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया, जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज होने लगा।

     

    बरगद के पेड़ के नीचे एक पत्थर लगाया गया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “गौरी — जिसे लोगों ने डायन कहा, लेकिन जिसने अंत तक इंसानियत नहीं छोड़ी।”

     

    हरिदास बाबा ने अपनी बाकी जिंदगी गाँव के बच्चों को यही समझाने में बिताई कि किसी भी अजीब घटना को देखकर तुरंत उसे भूत, डायन या जादू मत समझो।

     

    पहले सच खोजो।

     

    वीरेंद्र ने अपने परिवार के अपराधों को स्वीकार किया और गाँव वालों की जमीन वापस करने में मदद की।

     

    और नंदिनी?

     

    वह शहर वापस चली गई।

     

    लेकिन हर साल गौरी की बरसी पर भैरवपुर जरूर आती।

     

    एक बार उसने बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताई।

     

    गाँव वाले उसे रोकते रहे।

     

    “रात मत रुकना।”

     

    “गौरी वापस आ सकती है।”

     

    लेकिन नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “अगर वह आएगी भी तो मुझे उससे डर नहीं लगेगा।”

     

    रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए।

     

    हवा चली।

     

    बरगद के पत्ते हिले।

     

    नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “सच को कभी मरने मत देना…”

     

    नंदिनी ने आँखें खोलीं।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    बस बरगद की एक शाखा पर सफेद चमेली के फूल खिले हुए थे।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं वादा करती हूँ।”

     

    और उसी रात पहली बार भैरवपुर में किसी ने डायन के डर से दरवाजा बंद नहीं किया।

     

    लोग बाहर निकले।

     

    बच्चे खेलते रहे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बजीं।

     

    और वह हवेली, जो कभी डर का प्रतीक थी, अब गाँव को एक बात याद दिलाती थी—

     

    हर डर के पीछे भूत नहीं होता।

     

    कभी उसके पीछे कोई झूठ होता है।

     

    कभी लालच।

     

    कभी अज्ञान।

     

    और कभी किसी निर्दोष के साथ किया गया अन्याय।

     

    कहानी की सीख

     

    किसी भी इंसान को सिर्फ अफवाह, शक या अंधविश्वास के आधार पर डायन, भूत या बुरा इंसान मान लेना बहुत बड़ा अन्याय है।

     

    अंधविश्वास इंसान की सोचने की शक्ति छीन सकता है।

     

    गौरी को लोगों ने बिना सच जाने डायन समझ लिया और उसके साथ अन्याय किया। असली दोषी वे लोग थे जिन्होंने डर और लालच का इस्तेमाल किया।

     

    इसलिए हमें हमेशा याद रखना चाहिए—

     

    “सच जानने से पहले किसी पर विश्वास या आरोप मत लगाओ।”

     

    “डर के कारण अपनी बुद्धि मत खोओ।”

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    “किसी निर्दोष की चुप्पी को उसकी गलती मत समझो।”

     

    क्योंकि कभी-कभी जिसे पूरी दुनिया डायन समझती है…

     

    वह वास्तव में सबसे ज्यादा पीड़ित और सबसे ज्यादा निर्दोष इंसान होता है।

     

    और असली राक्षस किसी सुनसान जंगल या पुरानी हवेली में नहीं…

     

    इंसान के लालच, झूठ और अंधविश्वास के अंदर छिपा होता है।

     

    यहीं “बहु बनी डायन” की कहानी समाप्त होती है।

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 2 — हवेली के नीचे का रहस्य😱

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    •  

     

    रात के लगभग एक बज चुके थे।भैरवपुर गाँव अब पूरी तरह नींद में डूबा हुआ था, लेकिन गाँव के बाहर खड़ी वह पुरानी हवेली जाग रही थी।

     

    हवेली की टूटी हुई खिड़कियों से कभी-कभी पीली रोशनी बाहर आती और फिर अचानक गायब हो जाती।

     

    हवा में चमगादड़ों की फड़फड़ाहट थी।

     

    दूर कहीं सियार रो रहे थे।

     

    और हवेली के सामने खड़े नंदिनी, अमन और हरिदास बाबा के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    भाग 1 में गौरी की आत्मा ने उन्हें हवेली के नीचे दफन सच खोजने का संकेत दिया था।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि उस हवेली में उनके लिए क्या इंतजार कर रहा था।

     

    अमन ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “नंदिनी, हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने हवेली की ओर देखते हुए कहा—

     

    “अगर हम वापस चले गए तो गौरी की आत्मा कभी शांत नहीं होगी।”

     

    हरिदास बाबा ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “सिर्फ गौरी ही नहीं… शायद इस गाँव में कई आत्माएँ भटक रही हैं।”

     

    अमन ने उनकी तरफ देखा।

     

    “कई आत्माएँ?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने हवेली का पुराना दरवाजा धक्का देकर खोला।

     

    चर्रररर…

     

    दरवाजा इतनी तेज आवाज के साथ खुला कि तीनों सहम गए।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने लालटेन जलाई।

     

    कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे।

     

    दीवारों पर जाले लटक रहे थे।

     

    छत से चमगादड़ उल्टे लटके हुए थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि दीवार पर दर्जनों औरतों के चित्र लगे थे।

     

    हर चित्र के नीचे एक ही शब्द लिखा था—

     

    “डायन।”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे एक चित्र के पास गई।

     

    उसने धूल साफ की।

     

    चित्र में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “सीता — डायन।”

     

    दूसरे चित्र पर—

     

    “मालती — डायन।”

     

    तीसरे पर—

     

    “कमला — डायन।”

     

    नंदिनी ने घबराकर पूछा—

     

    “ये सब कौन थीं?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “गाँव की औरतें।”

     

    “लेकिन इन्हें डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास चुप रहे।

     

    नंदिनी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “बाबा, आप सब जानते हैं।”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “तो बताइए।”

     

    हरिदास ने भारी आवाज में कहा—

     

    “तीस साल पहले भैरव सिंह गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसके पास जमीन थी, पैसा था और लोग उससे डरते थे।”

     

    “जो कोई उसके खिलाफ बोलता, उसे डायन या तांत्रिक कहकर बदनाम कर दिया जाता।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन इससे उसे क्या फायदा होता था?”

     

    “जमीन।”

     

    हरिदास ने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “इनमें से ज्यादातर औरतों के पास जमीन थी। डर फैलाकर उन्हें गाँव से भगाया गया और उनकी जमीन भैरव सिंह ने अपने नाम कर ली।”

     

    नंदिनी की मुट्ठियाँ कस गईं।

     

    “और गौरी?”

     

    हरिदास की आँखें नम हो गईं।

     

    “गौरी ने उसके खिलाफ आवाज उठाई थी।”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों चौंक गए।

     

    अमन ने लालटेन उठाई।

     

    “ऊपर कोई है।”

     

    हरिदास ने तुरंत कहा—

     

    “हमें ऊपर नहीं जाना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस रात गौरी गायब हुई थी, वह आखिरी बार इसी हवेली में देखी गई थी।”

     

    तीनों के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा—

     

    “आपने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच बाहर आया तो गाँव में फिर खून बह सकता है।”

     

    नंदिनी ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “सच छिपाने से खून बहना बंद नहीं होता, बाबा।”

     

    तीनों सीढ़ियों की ओर बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

     

    चीं… चीं… चीं…

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    उस दरवाजे पर खून से लिखा था—

     

    “गौरी यहाँ नहीं मरी।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर कुछ कागज पड़े थे।

     

    अमन ने एक कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे दुनिया डायन समझती है, वह असल में गवाह है।”

     

    नंदिनी ने दूसरा कागज उठाया।

     

    उस पर गाँव के कई लोगों के नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों के आगे लाल निशान लगा था।

     

    नंदिनी ने देखा—

     

    हरिदास का नाम भी उनमें था।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “डरा हुआ गवाह।”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था ना… मैं सब जानता था।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर गौरी को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    अचानक कमरे की खिड़की जोर से खुली।

     

    धड़ाम!

     

    ठंडी हवा अंदर आई।

     

    दीवार पर लगी एक तस्वीर अपने आप गिर गई।

     

    उसके पीछे एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यहाँ कुछ छिपा हुआ है।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही है…”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली का तहखाना।”

     

    तीनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक बड़ा कमरा सामने था।

     

    कमरे के बीच में लोहे का संदूक रखा था।

     

    संदूक पर पुराने ताले लगे थे।

     

    नंदिनी ने उसे छुआ।

     

    अचानक कमरे में किसी लड़की की हँसी गूँजी।

     

    ही… ही… ही…

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “यह आवाज…”

     

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “गौरी।”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कागज और तस्वीरें थीं।

     

    नंदिनी ने तस्वीरें उठाईं।

     

    एक तस्वीर देखकर उसकी साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में भैरव सिंह खड़ा था।

     

    उसके साथ गाँव के कई बड़े लोग थे।

     

    और उनके बीच…

     

    गौरी भी थी।

     

    लेकिन गौरी के चेहरे पर डर था।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “आज रात सौदा पूरा होगा।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कौन-सा सौदा?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    अमन ने संदूक के नीचे से एक और कागज निकाला।

     

    वह जमीन का नक्शा था।

     

    नक्शे पर हवेली, बरगद का पेड़ और गाँव के आसपास की जमीन दिखाई गई थी।

     

    लाल निशान एक खास जगह पर था।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यह जगह कहाँ है?”

     

    हरिदास ने नक्शा देखते ही कहा—

     

    “पुराना कुआँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “वही कुआँ जहाँ गौरी गायब हुई थी?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “वह वहाँ नहीं मरी थी।”

     

    तीनों ने एक साथ पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में एक सफेद साया खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    और धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ चेहरा।

     

    गौरी।

     

    अमन ने डरकर आँखें बंद कर लीं।

     

    नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर तुम नहीं मरी थीं… तो तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

     

    गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया।

     

    और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    दीवार पर अचानक दरार पड़ गई।

     

    चर्ररर…

     

    फिर ईंटें गिरने लगीं।

     

    उनके पीछे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के अंदर एक पुराना लकड़ी का बक्सा था।

     

    नंदिनी ने बक्सा खोला।

     

    उसमें एक डायरी थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह मेरी आखिरी गवाही है।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी गौरी की थी।

     

    उसमें लिखा था कि जिस रात गाँव वालों ने उसे डायन कहकर पकड़ने की कोशिश की, वह भागकर हवेली पहुँची थी।

     

    वह भैरव सिंह से मदद माँगने आई थी।

     

    लेकिन भैरव सिंह ने उसकी मदद करने के बजाय उसे कैद कर लिया।

     

    गौरी ने वहाँ एक ऐसा राज देखा था, जिसके बारे में किसी को पता नहीं था।

     

    भैरव सिंह अकेला नहीं था।

     

    गाँव के कुछ बड़े लोग उसके साथ मिलकर लोगों की जमीन हड़पते थे।

     

    जो विरोध करता, उसके बारे में अफवाह फैलाई जाती कि वह डायन के जादू से गाँव को नुकसान पहुँचा रहा है।

     

    लेकिन डायरी का आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा डरावना था।

     

    गौरी ने लिखा था—

     

    “मैंने उन्हें एक ऐसी चीज करते देखा है, जिसे देखने के बाद शायद मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    इसके आगे के पन्ने फटे हुए थे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “बाकी पन्ने कहाँ हैं?”

     

    तभी तहखाने में किसी आदमी की आवाज गूँजी—

     

    “तुम्हें बाकी पन्ने नहीं मिलेंगे।”

     

    तीनों पीछे मुड़े।

     

    सीढ़ियों के पास एक आदमी खड़ा था।

     

    वह गाँव का वर्तमान जमींदार वीरेंद्र सिंह था।

     

    भैरव सिंह का पोता।

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    वीरेंद्र मुस्कुराया।

     

    “उस सच को बचाने आया हूँ जिसे मेरे परिवार ने तीस साल से छिपा रखा है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम्हें गौरी के बारे में सब पता है?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मुझसे ज्यादा किसी को नहीं।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम्हारे दादा ने गौरी को कहाँ रखा था?”

     

    वीरेंद्र की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तहखाने में।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्या उन्होंने उसे मार दिया?”

     

    वीरेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    तीनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “गौरी उस रात भाग गई थी।”

     

    “कहाँ?”

     

    वीरेंद्र ने बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।

     

    “लेकिन उसके बाद जो हुआ… वह मेरे परिवार के लिए भी रहस्य बन गया।”

     

    तभी तहखाने की दीवारों से धीमी-धीमी खरोंचने की आवाज आने लगी।

     

    खर्र… खर्र… खर्र…

     

    अमन ने चारों तरफ देखा।

     

    “ये आवाज कहाँ से आ रही है?”

     

    वीरेंद्र अचानक डर गया।

     

    “यह संभव नहीं…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    वीरेंद्र ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “यह आवाज… तब आती है जब वह जागती है।”

     

    “कौन?”

     

    वीरेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक तहखाने की सारी लालटेन बुझ गईं।

     

    पूर्ण अंधकार।

     

    फिर किसी ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    वह चीख पड़ी।

     

    “अमन!”

     

    “मैं यहाँ हूँ!”

     

    “तो फिर मेरा हाथ किसने पकड़ा?”

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    नंदिनी ने नीचे देखा।

     

    उसकी कलाई पर पाँच काली उँगलियों के निशान थे।

     

    तभी अंधेरे में एक और आवाज गूँजी।

     

    लेकिन इस बार आवाज गौरी की नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “गौरी को मैंने नहीं मारा…”

     

    हरिदास काँपने लगे।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “उसे मैंने बनाया…”

     

    अचानक दीवार पर एक चेहरा उभर आया।

     

    वह चेहरा किसी बूढ़ी औरत का था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और माथे पर गहरा काला निशान था।

     

    वीरेंद्र चीख पड़ा—

     

    “नहीं! यह नहीं हो सकता!”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम इसे जानते हो?”

     

    वीरेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “मेरी दादी…”

     

    हरिदास ने भयभीत होकर कहा—

     

    “रुक जाओ…”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    दीवार पर वह चेहरा मुस्कुराया।

     

    और बोला—

     

    “जिसे तुम गौरी की आत्मा समझते रहे… वह गौरी नहीं थी।”

     

    तभी तहखाने का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे में भयंकर ठंड फैल गई।

     

    और दीवार पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभर आया—

     

    “नंदिनी।”

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    उसके सामने अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है…”

     

    अचानक जमीन फट गई।

     

    नंदिनी नीचे गिरने लगी।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन नीचे से किसी अदृश्य शक्ति ने नंदिनी को खींचना शुरू कर दिया।

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन पूरी ताकत लगा रहा था।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    वीरेंद्र दीवार से चिपककर खड़ा था।

     

    और तभी…

     

    गौरी की आत्मा अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने नंदिनी की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    एक तेज प्रकाश फैला।

     

    नंदिनी ऊपर खिंच आई।

     

    लेकिन गौरी का चेहरा अब शांत नहीं था।

     

    वह पहली बार डरती हुई दिखाई दे रही थी।

     

    उसने नंदिनी की तरफ देखा और कहा—

     

    “वह जाग चुकी है…”

     

    नंदिनी ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गौरी ने हवेली के नीचे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “जिसने मुझे डायन बनाया था।”

     

    अगले ही पल हवेली की पूरी जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से चीखें निकलने लगीं।

     

    सैकड़ों औरतों की आवाजें एक साथ सुनाई दीं—

     

    “हमें न्याय चाहिए…”

     

    और हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर वीरेंद्र घुटनों के बल गिर पड़ा।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी…”

     

    बूढ़ी औरत ने नीचे देखा।

     

    और धीरे से बोली—

     

    “तीस साल पहले मैंने एक डायन बनाई थी… अब मैं पूरे गाँव को अपना घर बनाऊँगी।”

     

    अचानक पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

     

    और उसी अंधेरे में नंदिनी ने एक बात समझ ली—

     

    गौरी से डरना शायद सबसे बड़ी भूल थी।

     

    क्योंकि असली डरावनी शक्ति अभी तक छिपी हुई थी।

     

    और अब वह जाग चुकी थी।

     

    जारी रहेगा…

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 1 — वह रात जब डायन लौटी 😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    रात के लगभग बारह बज चुके थे।आसमान में चाँद तो था, लेकिन उसके चारों ओर इतने घने बादल छाए थे कि उसकी रोशनी जमीन तक पहुँचने के लिए संघर्ष कर रही थी। पूरे गाँव पर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

     

    गाँव का नाम था भैरवपुर।

     

    छोटा-सा गाँव था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वहाँ एक ऐसी दहशत फैल चुकी थी, जिसने लोगों को रात में अपने ही घरों में कैद कर दिया था।

     

    लोग कहते थे कि गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे एक डायन रहती है।

     

    किसी ने उसे सफेद कपड़ों में देखा था।

     

    किसी ने उसके लंबे बाल देखे थे।

     

    किसी ने दावा किया था कि आधी रात को वह पेड़ के नीचे बैठकर किसी बच्चे की तरह रोती है।

     

    और कुछ लोगों का कहना था कि जिसने भी उसकी आँखों में देख लिया, उसकी मौत निश्चित है।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि पिछले एक महीने में गाँव के तीन लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे।

     

    उनमें से पहला था रामलाल।

     

    दूसरी थी जमुना।

     

    और तीसरा था गाँव का चौकीदार हरिया।

     

    तीनों के घरों के बाहर सुबह सिर्फ एक चीज मिलती थी—

     

    काले राख जैसे पैरों के निशान।

     

    हरिया के गायब होने के बाद गाँव के मुखिया ने घोषणा कर दी थी—

     

    “आज से सूरज ढलने के बाद कोई भी घर से बाहर नहीं निकलेगा।”

     

    लेकिन उस रात एक लड़की घर से निकल चुकी थी।

     

    उसका नाम था नंदिनी।

     

    नंदिनी शहर से अपने गाँव आई थी। वह पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। वह भूत-प्रेत और डायन जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती थी।

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ गाँव में अकेली रहती थी, इसलिए नंदिनी कुछ दिनों के लिए गाँव आई थी।

     

    उस रात अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई।

     

    दवा घर में नहीं थी।

     

    नंदिनी ने घड़ी देखी।

     

    बारह बजकर पाँच मिनट।

     

    उसकी माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा—

     

    “बेटी… सुबह तक रुक जा।”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ, डरने की जरूरत नहीं है। मैं अभी दवा लेकर आती हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    माँ की आँखें डर से फैल गईं।

     

    “वह आज रात फिर निकली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “माँ, कोई डायन नहीं है। गाँव वालों ने अफवाह फैला रखी है।”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “काश तू सही होती…”

     

    नंदिनी ने लालटेन उठाई और घर से बाहर निकल गई।

     

    गली में कदम रखते ही उसे लगा जैसे पूरा गाँव उसे देख रहा हो।

     

    हर घर का दरवाजा बंद था।

     

    खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    कहीं कोई आवाज नहीं थी।

     

    बस दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    हूँऽऽऽ… हूँऽऽऽ…

     

    नंदिनी तेज कदमों से आगे बढ़ने लगी।

     

    तभी उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    वह रुक गई।

     

    आवाज भी रुक गई।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    नंदिनी ने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ी।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे थी।

     

    नंदिनी ने अचानक मुड़कर देखा।

     

    एक सफेद कपड़े पहने औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

     

    उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नंदिनी ने लालटेन ऊपर उठाई।

     

    अचानक हवा का तेज झोंका आया।

     

    लालटेन बुझ गई।

     

    अंधेरे में एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”

     

    औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    नंदिनी पीछे हटने लगी।

     

    फिर औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर नंदिनी की चीख निकल गई।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बिल्कुल काली।

     

    और होंठों पर एक अजीब मुस्कान।

     

    वह औरत फुसफुसाई—

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

     

    नंदिनी भागने के लिए मुड़ी।

     

    लेकिन तभी उसके सामने कोई आकर खड़ा हो गया।

     

    वह उसका बचपन का दोस्त अमन था।

     

    अमन ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पूरी ताकत से दौड़ने लगे।

     

    पीछे से उस औरत की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    हा… हा… हा…

     

    दोनों दौड़ते हुए पुराने मंदिर तक पहुँचे।

     

    अमन ने मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    कुछ पल बाद बाहर किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी की साँसें तेज चल रही थीं।

     

    अमन ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वह यहाँ तक आ गई है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुमने उसे पहले भी देखा है?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कब?”

     

    “तीन दिन पहले।”

     

    “फिर तुमने किसी को बताया क्यों नहीं?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि उस रात मैंने उसके पीछे जाकर जो देखा था… उसके बाद से मुझे डर लगता है।”

     

    “क्या देखा?”

     

    अमन ने मंदिर के फर्श की तरफ देखा।

     

    “वह किसी इंसान की तरह चल रही थी।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तो?”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसके पैर उल्टी दिशा में थे।”

     

    नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अचानक मंदिर के बाहर से एक आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन काँप गया।

     

    आवाज उसकी माँ की थी।

     

    “बेटा… दरवाजा खोलो…”

     

    अमन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “मेरी माँ बाहर है!”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ तो पाँच साल पहले मर चुकी हैं।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    बाहर की आवाज अचानक बदल गई।

     

    अब वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “बहुत समझदार बनते हो…”

     

    मंदिर का दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    नंदिनी और अमन पीछे हट गए।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    लगभग पाँच मिनट तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “शायद वह चली गई।”

     

    नंदिनी ने दरवाजे के पास जाकर बाहर झाँका।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    राख से।

     

    नंदिनी नीचे बैठी और पढ़ने लगी।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “पहला नाम मिल गया।”

     

    नंदिनी के हाथ काँपने लगे।

     

    “पहला नाम?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय मंदिर के पीछे से घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    मंदिर में कोई नहीं था।

     

    फिर भी घंटी लगातार बज रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों मंदिर से बाहर आए।

     

    सड़क पर पहुँचते ही उन्हें गाँव का बूढ़ा पुजारी हरिदास बाबा दिखाई दिया।

     

    उसने दोनों को देखते ही कहा—

     

    “तुम लोग उसके सामने आ गए?”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    हरिदास ने बरगद की तरफ देखा।

     

    “गौरी के।”

     

    नंदिनी ने पहली बार वह नाम सुना था।

     

    “गौरी कौन?”

     

    हरिदास ने गहरी साँस ली।

     

    “जिसे इस गाँव ने डायन कहा था।”

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “क्या वह सच में डायन थी?”

     

    हरिदास ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “वह एक निर्दोष लड़की थी।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर उसे डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास कुछ कहने ही वाला था कि अचानक बरगद के पेड़ की तरफ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

     

    उसने तुरंत दोनों से कहा—

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    तीनों मंदिर के अंदर वापस चले गए।

     

    हरिदास ने दरवाजा बंद किया।

     

    फिर उसने मंदिर के पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी डायरी निकाली।

     

    “इसमें गौरी की कहानी है।”

     

    नंदिनी ने डायरी हाथ में ली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरा नाम डायन के रूप में लिया जाए, तो यह डायरी सच बताएगी।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी लगभग तीस वर्ष पुरानी थी।

     

    गौरी गाँव की सबसे गरीब लड़की थी।

     

    उसकी माँ जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी।

     

    गौरी ने भी अपनी माँ से वही विद्या सीखी थी।

     

    गाँव के लोग बीमार पड़ते तो गौरी उनकी मदद करती।

     

    लेकिन एक दिन गाँव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे।

     

    बच्चों को तेज बुखार आने लगा।

     

    जानवर मरने लगे।

     

    लोग डर गए।

     

    तभी गाँव के जमींदार भैरव सिंह ने कहा—

     

    “यह किसी डायन का काम है।”

     

    और उसने गौरी पर आरोप लगा दिया।

     

    गौरी ने बहुत समझाया।

     

    “मैंने किसी का बुरा नहीं किया।”

     

    लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

     

    एक रात गाँव वालों की भीड़ उसके घर पहुँच गई।

     

    उन्होंने उसके घर में आग लगा दी।

     

    गौरी भागी।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    लेकिन वहाँ जमींदार के आदमी पहले से मौजूद थे।

     

    गौरी को पकड़ लिया गया।

     

    और उसी रात…

     

    वह गायब हो गई।

     

    डायरी यहीं खत्म हो गई थी।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “आगे क्या हुआ?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यही तो रहस्य है।”

     

    “गौरी की लाश कभी नहीं मिली।”

     

    “लेकिन उसके बाद गाँव में एक-एक करके लोगों की मौत होने लगी।”

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “क्या गौरी बदला लेने वापस आई?”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    अचानक मंदिर की दीवार पर लगी घंटी अपने आप हिलने लगी।

     

    फिर एक काली परछाईं दीवार पर दिखाई दी।

     

    तीनों ने उस परछाईं को देखा।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “मुझे डायन बनाने वालों को… मैं कभी नहीं भूलूँगी…”

     

    दीवार पर खून जैसे लाल रंग से एक नाम उभर आया।

     

    भैरव सिंह।

     

    हरिदास के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “लेकिन भैरव सिंह तो तीस साल पहले मर चुका है।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “हाँ…”

     

    तभी परछाईं ने धीरे से दूसरा नाम लिखा।

     

    हरिदास।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाबा, आपने क्या किया था?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैंने…”

     

    वह कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर मंदिर के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    तीनों ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी नहीं था।

     

    वह काला था।

     

    और उसमें छोटे-छोटे लाल अक्षर तैर रहे थे।

     

    “सच बताओ…”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तो फिर आपने क्या किया?”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने देखा था।”

     

    “क्या?”

     

    “उस रात मैंने गौरी को भागते देखा था।”

     

    “और?”

     

    “मैं उसे बचा सकता था।”

     

    “फिर बचाया क्यों नहीं?”

     

    हरिदास की आवाज टूट गई।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक तेज हवा चली।

     

    दीपक बुझ गए।

     

    पूर्ण अंधकार छा गया।

     

    और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूँजी—

     

    “डरने वाले भी दोषी होते हैं…”

     

    नंदिनी ने महसूस किया कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “अब दूसरा नाम तुम्हारा है…”

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    और उसी क्षण मंदिर की सारी घंटियाँ एक साथ बज उठीं।

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    दूर बरगद के पेड़ पर एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह हवा में खड़ी थी।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी।

     

    गौरी की आत्मा ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर गाँव के पुराने हवेली की ओर इशारा किया।

     

    और अचानक उसकी आवाज पूरे गाँव में गूँज उठी—

     

    “सच… उस हवेली के नीचे दफन है…”

     

    अगले ही पल वह गायब हो गई।

     

    नंदिनी ने अमन की तरफ देखा।

     

    अमन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “अब?”

     

    नंदिनी ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “अब हमें वहाँ जाना होगा।”

     

    लेकिन वे दोनों नहीं जानते थे कि उस हवेली के नीचे सिर्फ गौरी का राज नहीं दफन था।

     

    वहाँ ऐसा सच छिपा था…

     

    जिसे सामने आने के बाद पूरे गाँव की नींव हिलने वाली थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर गौरी निर्दोष थी, तो असली डायन कौन थी?

     

    जारी रहेगा…