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  • 20 साल का इंतजार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “अरे, शादी को पूरे बीस साल हो गए… लेकिन आज तक इनके घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी।”

     

    गांव की चौपाल हो, किसी की शादी हो या कोई त्योहार, रवि और मीरा जहां भी जाते, लोगों की बातें उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं।

     

    “इतने साल हो गए, अब तो उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए।”

     

    “पता नहीं पिछले जन्म का कौन-सा पाप है।”

     

    ऐसी बातें सुन-सुनकर मीरा का दिल हर बार टूट जाता था। लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहती। बस चुपचाप अपने आंसू पोंछ लेती।

     

    रवि हमेशा उसका हौसला बनकर खड़ा रहता।

     

    वह मुस्कुराकर कहता,

    “दुनिया का काम बोलना है मीरा… और हमारा काम महादेव पर भरोसा रखना।”

     

    उनका छोटा-सा घर बहुत साधारण था, लेकिन उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी। दोनों एक-दूसरे का इतना ख्याल रखते कि देखने वाले कहते, “भगवान ने इन्हें संतान भले न दी हो, लेकिन इनके रिश्ते में कभी कमी नहीं आने दी।”

     

    हर सोमवार दोनों सुबह-सुबह उठकर महादेव के मंदिर जाते। मीरा अपने हाथों से शिवलिंग पर जल चढ़ाती और आंखें बंद करके बस एक ही प्रार्थना करती,

     

    “महादेव… अगर हमारी किस्मत में संतान है तो जरूर देना, और अगर नहीं है तो इतना धैर्य देना कि कभी आपसे शिकायत न करूं।”

     

    रवि भी हाथ जोड़कर कहता,

     

    “भोलेनाथ, हमें आपकी हर मर्जी मंजूर है।”

     

    समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।

     

    एक दिन रवि के छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था। पूरा परिवार खुशियां मना रहा था।

     

    मीरा भी अपने हाथों से बच्चे के लिए केक और मिठाइयां लेकर गई।

     

    तभी एक रिश्तेदार ने ताना मारते हुए कहा,

     

    “दूसरों के बच्चों पर इतना प्यार लुटाने से क्या होगा? अपना बच्चा होता तो बात ही अलग थी।”

     

    दूसरी औरत भी हंसते हुए बोली,

     

    “भगवान हर किसी की झोली नहीं भरता।”

     

    ये सुनते ही मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसके हाथ से मिठाई की प्लेट लगभग गिर ही गई।

     

    रवि ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल आया।

     

    घर लौटते समय पूरे रास्ते दोनों चुप रहे।

     

    कुछ देर बाद मीरा रोते हुए बोली,

     

    “क्या सच में मेरी ही कमी है? क्या मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?”

     

    रवि ने गाड़ी रोक दी।

     

    उसने मीरा का चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा,

     

    “मेरी नजर में तुम दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी हो। अगर पूरी जिंदगी भी हम दोनों अकेले रहे, तब भी मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे सिर्फ तुम्हारी मुस्कान चाहिए।”

     

    मीरा और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    उस रात दोनों ने खाना भी नहीं खाया।

     

    वे सीधे घर के मंदिर में जाकर महादेव की मूर्ति के सामने बैठ गए।

     

    न कोई शिकायत…

     

    न कोई सवाल…

     

    बस आंखों में आंसू और दिल में भरोसा था।

     

    दिन महीने बने…

     

    महीने साल बने…

     

    और देखते ही देखते शादी के पूरे बीस साल बीत गए।

     

    अब गांव वालों ने ताने देना भी कम कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अब इनके घर कभी बच्चा नहीं आएगा।

     

    लेकिन रवि और मीरा का विश्वास आज भी पहले जैसा अटल था।

     

    सावन का महीना शुरू हुआ।

     

    रवि ने कहा,

     

    “मीरा, इस बार हम पैदल चलकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करेंगे।”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जहां महादेव बुलाएंगे, वहां तक जरूर चलेंगे।”

     

    दोनों ने यात्रा शुरू की।

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    कभी तेज धूप पड़ती…

     

    कभी मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती…

     

    कभी पथरीले रास्तों पर पैर छिल जाते…

     

    लेकिन दोनों के होंठों पर सिर्फ एक ही जयकारा था—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    यात्रा के आखिरी दिन जब दोनों मंदिर पहुंचे तो मीरा शिवलिंग के सामने बैठते ही फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महादेव… आज मैं आपसे कुछ मांगने नहीं आई हूं। बस अपना सारा दुख आपके चरणों में छोड़ने आई हूं। अब जो आपकी इच्छा, वही हमारी किस्मत।”

     

    पास ही बैठे एक वृद्ध साधु काफी देर से दोनों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “बेटी, याद रखना… भोलेनाथ के घर देर हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं होता। तुम्हारा विश्वास खाली नहीं जाएगा।”

     

    रवि और मीरा ने उनके चरण छुए और मन में नई उम्मीद लेकर घर लौट आए।

     

    करीब दो महीने बाद मीरा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसे बार-बार चक्कर आने लगे और कमजोरी महसूस होने लगी।

     

    रवि घबरा गया और तुरंत उसे शहर के अस्पताल लेकर पहुंचा।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और दोनों को बाहर इंतजार करने के लिए कहा।

     

    रिपोर्ट आने तक दोनों की धड़कनें तेज थीं।

     

    मीरा बार-बार महादेव का नाम जप रही थी, जबकि रवि उसकी हथेली थामे चुपचाप बैठा था।

     

    थोड़ी देर बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए…

     

    और बोले,

     

    “बधाई हो… आप दोनों माता-पिता बनने वाले हैं।”

     

    यह सुनते ही दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बीस साल का इंतजार आखिरकार खत्म होने वाला है।

     

    डॉक्टर के कमरे से बाहर निकलते ही मीरा ने कांपते हाथों से अपनी रिपोर्ट सीने से लगा ली। उसकी आंखों से खुशी के आंसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार आसमान की ओर देखकर बस एक ही बात कह रही थी,

     

    “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    रवि की आंखें भी नम थीं। वह अस्पताल के छोटे-से मंदिर में गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ… बीस साल तक आपने हमारी परीक्षा ली, लेकिन आज आपने हमारी झोली खुशियों से भर दी। आपका लाख-लाख धन्यवाद।”

     

    इतने वर्षों तक उसने हर ताना मुस्कुराकर सहा था। उसने कभी अपनी पत्नी को अकेला महसूस नहीं होने दिया। आज उसे लग रहा था कि उसका हर आंसू, हर प्रार्थना और हर सोमवार का व्रत सफल हो गया।

     

    दोनों सबसे पहले घर पहुंचे। उन्होंने महादेव की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाया। पूरे घर में अगरबत्ती की सुगंध फैल गई। दोनों ने मिलकर शिव चालीसा का पाठ किया।

     

    मीरा ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, आपने हमें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है। अब बस इतनी कृपा करना कि हम इस बच्चे को अच्छे संस्कार दें और हमेशा आपके बताए रास्ते पर चलना सिखाएं।”

     

    उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जहां कभी सन्नाटा रहता था, वहां अब आने वाले नन्हे मेहमान की बातें होने लगीं। रवि रोज़ छोटे-छोटे कपड़े, खिलौने और झूले देखकर मुस्कुरा देता।

     

    नौ महीने जैसे-तैसे बीत गए।

     

    आखिर वह दिन भी आ गया जिसका दोनों ने बीस साल तक इंतजार किया था।

     

    अस्पताल के बाहर रवि बेचैनी से टहल रहा था। उसके होंठों पर लगातार “ॐ नमः शिवाय” का जाप चल रहा था।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बधाई हो… लक्ष्मी आई है। आपके घर बेटी ने जन्म लिया है।”

     

    यह सुनते ही रवि की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तुरंत हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और कहा,

     

    “महादेव… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

     

    जब उसने पहली बार अपनी नन्ही-सी बेटी को गोद में लिया, तो उसकी आंखों से आंसू बच्ची के माथे पर गिर पड़े। उसने प्यार से उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “तुम हमारी बीस साल की तपस्या का फल हो।”

     

    मीरा अपनी बेटी को सीने से लगाकर रोए जा रही थी। यह दुख के नहीं, बल्कि बरसों की अधूरी इच्छा पूरी होने की खुशी के आंसू थे।

     

    कुछ दिनों बाद रवि अपनी बेटी को गोद में लेकर सबसे पहले महादेव के मंदिर पहुंचा।

     

    उसने बच्ची को शिवलिंग के सामने झुकाकर कहा,

     

    “भोलेनाथ, यह हमारी नहीं… आपकी अमानत है। आपने इसे हमें संभालने के लिए भेजा है।”

     

    मंदिर में मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं।

     

    धीरे-धीरे पूरे गांव में यह खबर फैल गई।

     

    जो लोग कभी ताने मारते थे, वही आज मिठाई लेकर उनके घर आने लगे।

     

    उन्हीं रिश्तेदारों में से एक महिला, जिसने कभी मीरा का मजाक उड़ाया था, बेटी को गोद में लेकर रो पड़ी।

     

    वह बोली,”बहू… मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया।”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “जब महादेव ने सब माफ कर दिया, तो मैं कौन होती हूं किसी से नाराज़ रहने वाली?”

     

    उसकी बात सुनकर वहां खड़े सभी लोगों का सिर शर्म से झुक गया।

     

    उस दिन गांव के हर इंसान ने एक बात सीखी—

     

    किसी के दुख का मजाक कभी नहीं उड़ाना चाहिए। क्योंकि इंसान सिर्फ आज देखता है, लेकिन भगवान सही समय देखकर देते हैं।

     

    आज भी हर सोमवार रवि, मीरा और उनकी नन्ही बेटी हाथों में पूजा की थाली लेकर महादेव के मंदिर जाते हैं।

     

    पहले वे दो लोग महादेव से एक संतान मांगने जाते थे…

     

    और आज वही तीनों हर बार सिर्फ धन्यवाद कहने जाते हैं।

     

    मंदिर की घंटियां बजती हैं, उनकी बेटी भोलेनाथ को देखकर मुस्कुरा देती है, और रवि-मीरा की आंखें फिर से नम हो जाती हैं।

     

    वे समझ चुके थे कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान हर प्रार्थना सुनते हैं, बस उसका उत्तर अपने सही समय पर देते हैं।

     

    हर हर महादेव!

  • बुढ़ापे की तन्हाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    फ़ोन पर हर रोज़ यही पहला सवाल होता था। दूसरी तरफ़ से हमेशा वही छोटा-सा जवाब आता—

     

    “हाँ माँ… अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

     

    और कॉल कट जाती।

     

    शांति देवी कुछ पल तक मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन देखती रहतीं। फिर मुस्कुराने की कोशिश करतीं और धीरे से कहतीं, “चलो… कम से कम आवाज़ तो सुन ली।”

     

    पास ही चारपाई पर बैठे उनके पति रामस्वरूप सब समझ जाते, लेकिन कुछ कहते नहीं।

     

     

    कई साल पहले यही घर हँसी से गूंजा करता था।

     

    शादी के बाद जब शांति इस घर में आई थीं, तब घर में कुछ भी नहीं था। मिट्टी का छोटा-सा मकान, टपकती छत और दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं।

     

    रामस्वरूप सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चले जाते और रात को थके हुए लौटते। शांति पूरे दिन घर संभालतीं, गाय का दूध निकालतीं, चूल्हा जलातीं और हर मुश्किल में अपने पति का साथ देतीं।

     

    धीरे-धीरे दिन बदले।

     

    भगवान ने उन्हें दो बेटे और एक बेटी का सुख दिया।

     

    उनकी दुनिया अब बच्चों में बस गई।

     

    खुद फटे कपड़े पहन लेते, लेकिन बच्चों के लिए नए कपड़े ज़रूर लाते।

     

    खुद भूखे सो जाते, लेकिन बच्चों की थाली कभी खाली नहीं रहने देते।

     

    बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो दोनों पति-पत्नी पूरी रात जागकर बच्चों के बिस्तर इधर-उधर करते रहते, ताकि उनके ऊपर पानी की एक बूंद भी न गिरे।

     

    उन्हें लगता था…

     

    “हमारी ज़िंदगी चाहे जैसी रही हो, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी हमसे बेहतर होगी।”

     

    बस इसी उम्मीद में दोनों ने पूरी जवानी खपा दी।

     

     

    समय बीतता गया।

     

    बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए।

     

    बेटी की शादी बड़े प्यार से कर दी।

     

    दोनों बेटों को शहर में पढ़ाया। इसके लिए शांति ने अपने शादी के समय मिले सारे गहने बेच दिए।

     

    रामस्वरूप ने पुश्तैनी खेत का एक हिस्सा तक बेच दिया।

     

    जब लोगों ने पूछा, “बुढ़ापे का सहारा भी बेच दिया?”

     

    तो रामस्वरूप मुस्कुराकर बोले—

     

    “हमारा असली सहारा खेत नहीं… हमारे बच्चे हैं।”

     

    उन्हें क्या पता था कि यही बात एक दिन उनकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

     

    दोनों बेटों को अच्छी नौकरी मिल गई।

    एक दिल्ली चला गया।

     

    दूसरा मुंबई।

     

    शुरुआत में हर हफ्ते फ़ोन आता था।

    फिर महीने में।

    फिर त्योहारों पर।

     

    और धीरे-धीरे… वह भी बंद होने लगा।

    शांति हर सुबह दरवाज़े की ओर देखतीं।

    शायद आज कोई आ जाए…

     

    रामस्वरूप रोज़ शाम को घर के बाहर वाली टूटी कुर्सी पर बैठ जाते।

     

    हर बार सड़क पर आती गाड़ी देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं।

    लेकिन गाड़ी किसी और के घर चली जाती।

     

    फिर वे चुपचाप अंदर लौट आते।

     

    एक दिन शांति बोलीं—”सुनिए… इस बार दिवाली पर बच्चे ज़रूर आएँगे ना?”

     

    रामस्वरूप ने मुस्कुराकर कहा—

    “हाँ… क्यों नहीं आएँगे? आखिर अपना घर है।”

     

    दोनों ने पूरे घर की सफाई की।

    बेटों की पसंद की मिठाइयाँ बनाईं।

     

    उनके पुराने कमरे सजाए।

     

    दिवाली आ गई…

    रात हो गई…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    बस एक संदेश आया “इस बार छुट्टी नहीं मिली… अगली बार ज़रूर आएँगे।”

     

    शांति ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

    आँखों से आँसू बह निकले।

     

    लेकिन फिर भी बोलीं—

    “कोई बात नहीं… काम भी तो ज़रूरी है।”

     

    रामस्वरूप ने पहली बार अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि पत्नी उनके आँसू न देख सके।

     

    अब दोनों की उम्र ढल चुकी थी।

     

    चलना भी मुश्किल हो गया था।

     

    रामस्वरूप की आँखों से कम दिखाई देता था।

     

    शांति के घुटने जवाब दे चुके थे।

     

    फिर भी दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    अगर शांति गिर जातीं, तो रामस्वरूप काँपते हाथों से उन्हें उठाते।

     

    अगर रामस्वरूप की तबीयत खराब होती, तो शांति पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहतीं।

    दोनों जानते थे…

    अब उनके पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं बचा।

    एक रात बिजली चली गई।

     

    घर में घुप्प अँधेरा था।

    शांति ने धीमे से पूछा—

    “अगर मैं तुमसे पहले चली गई… तो तुम अकेले कैसे रहोगे?”

    रामस्वरूप की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने काँपते हाथों से पत्नी का हाथ पकड़ लिया और बोले—

    “मैं तो आज भी तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता… अकेले कैसे जिऊँगा?”

     

    दोनों देर तक चुप रहे।

     

    उस रात दोनों की आँखों से नींद नहीं… आँसू बहते रहे।

    कुछ महीनों बाद रामस्वरूप की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

    शांति ने बार-बार बेटों को फ़ोन किया।

     

    एक ने कहा “माँ, अभी ऑफिस में हूँ।”

    दूसरे ने कहा “दो दिन बाद आता हूँ।”

     

    लेकिन उन दो दिनों का इंतज़ार रामस्वरूप नहीं कर सके।

     

    उन्होंने शांति का हाथ कसकर पकड़ा…

     

    एक आख़िरी बार घर की ओर देखा…

     

    और हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।

     

    शांति फूट-फूटकर रोती रहीं।

     

    जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बिताई, वही उन्हें बीच रास्ते में अकेला छोड़ गया।

    बेटे अगले दिन पहुँचे।

    पिता की चिता जल चुकी थी।

     

    उन्होंने माँ से कहा—

    “चलो माँ, हमारे साथ शहर चलो।”

     

    शांति ने पूरे घर को देखा।

    वही आँगन…

    वही नीम का पेड़…

    वही चारपाई…

     

    जहाँ उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने पति के साथ बिताई थी।

     

    उन्होंने धीमे से कहा—

    “जिस घर में तुम्हारे पिता की यादें साँस लेती हों… उसे छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?”

     

    बेटे दो दिन बाद वापस लौट गए।

     

    माँ फिर अकेली रह गई।

    अब हर सुबह शांति दो कप चाय बनातीं।

    एक खुद पीतीं…

     

    दूसरा कप रामस्वरूप की तस्वीर के सामने रख देतीं।

    हर शाम दरवाज़े की ओर देखतीं।

     

    शायद आज बच्चे आ जाएँ…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता।

    एक दिन पड़ोस की औरत उन्हें बुलाने आई।

    बहुत आवाज़ दी…

    कोई जवाब नहीं मिला।

    जब अंदर गई तो देखा शांति अपने पति की तस्वीर को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थीं।

    लेकिन इस बार उनकी साँसें रुक चुकी थीं।

    शायद…

    उन्हें आखिरकार अपने जीवनसाथी का साथ मिल गया था।

    उस दिन दोनों बेटे बहुत रोए।

    लेकिन अब पछताने से क्या होता?

    जिन माँ-बाप ने अपनी पूरी जवानी बच्चों के भविष्य पर लुटा दी…

    उनके बुढ़ापे में बच्चों के पास उनके लिए दो पल भी नहीं थे।

    याद रखिए…

    बचपन में माँ-बाप हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं।

    बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ़ हमारी उँगली का सहारा चाहिए होता है।

    जिस दिन हम यह सहारा छीन लेते हैं, उसी दिन उनका घर नहीं… उनका दिल सूना हो जाता है।

    क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी पैसे की नहीं होती…

    सबसे बड़ी गरीबी बुढ़ापे की तन्हाई होती है।

  • जय गुरु देव

    जय गुरु देव

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    आज की ये रात है भक्ति की,  

    आज का ये दिन है श्रद्धा की।  

    गुरु की महिमा गूँजे हर दिशा में,  

    गुरु का आशीष बरसे हर हृदय में।  

     

    गुरु वो दीप हैं, जो अंधकार मिटाते,  

    गुरु वो सागर हैं, जो सत्य सिखाते।  

    गुरु के चरणों में है जीवन का सार,  

    गुरु ही हैं हमारे पथ‑प्रदर्शक अपार।  

     

    आइए मिलकर करें गुरु का वंदन,  

    भक्ति से भर दें हर मन का आलोकन।  

    जय गुरु देव, जय गुरु देव,  

    गूँजे मंच पर यही स्वर नित्य देव।

     

    आइए गुरु शिष्य संवाद के आनंदित पलों का आनंद लें।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, पढ़ाई बड़ी कठिन है,  

    गुरु मुस्काए – बेटा, यही तो जीवन का गहना है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, नींद बहुत सताती है,  

    गुरु हँसे – ज्ञान की रोशनी ही जगाती है। 😂

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, सफलता कब आएगी?  

    गुरु बोले – जब मेहनत तेरे कदमों को सजाएगी। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपका आशीष चाहिए,  

    गुरु बोले – बेटा, तेरा विश्वास ही सबसे बड़ा उपहार है।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, किताबें बहुत भारी हैं,  

    गुरु बोले – बेटा, ज्ञान ही सबसे प्यारी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, क्लास में नींद आती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही तो ध्यान की पहली सीढ़ी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, परीक्षा में क्या लिखूँगा?  

    गुरु बोले – बेटा, वही जो पढ़ाया है, वरना फिर सुनूँगा! 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपकी डाँट भी मीठी लगती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही डाँट ही तेरी जीत की सीढ़ी बनती है।😊

     

    गुरु ने कहा – पढ़ ले बेटा, वरना पछताएगा,  

    शिष्य ने कहा – WiFi नहीं है, नेट कहाँ से आएगा! 😂

     

    गुरु ने कहा – ध्यान लगा, मन को शांत कर,  

    शिष्य ने कहा – कर दें मोबाइल साइलेंट पर! 😂

     

    गुरु ने कहा – ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है,  

    शिष्य ने कहा – लेकिन UPI से रिचार्ज भी ज़रूरी है! 😂

     

    गुरु पूर्णिमा पर सबने किया गुरु को प्रणाम, 🙏

    गुरु मुस्काए बोले – बेटा, अब कर दो Exam पास तमाम!😊

     

    आपको कैसा लगा पढ़कर

    , अपने विचार रखें नीचे कमेंट में लिखकर 😊😂

  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

  • कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    संत कबीरदास भारतीय भक्ति परंपरा के उन महान संतों में से एक हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पाँच सौ वर्ष पहले थी। उन्होंने जाति, धर्म, पंथ और बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर प्रेम, सत्य और सहज ज्ञान का संदेश दिया। उनकी कविताएँ और दोहे आम आदमी की भाषा में हैं, फिर भी उनमें गहरी दार्शनिक गहराई छिपी हुई है। कबीरदास के हजारों दोहों में से एक दोहा ऐसा है जो गुरु की महिमा को भगवान से भी ऊँचा स्थान देता है

    “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

    बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

    इस दोहे का सीधा अर्थ है यदि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हों, तो मैं किसके चरणों में पहले प्रणाम करूँ? मैं तो अपने गुरु के बलिहारी जाता हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे गोविंद का मार्ग दिखाया।

    यह दोहा केवल श्रद्धा का भाव नहीं है, बल्कि कबीरदास के पूरे जीवन-दर्शन का सार है। वे गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए मानते थे क्योंकि उनके अनुसार भगवान तो सर्वव्यापी हैं, लेकिन उस सर्वव्यापी सत्ता तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाला गुरु ही है। बिना गुरु के मनुष्य अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है। गुरु वह प्रकाश है जो अंधेरे को चीरकर सत्य तक ले जाता है।

    कबीरदास का जन्म अनुमानतः सन् 1398 के आसपास काशी में हुआ था। उनके जीवन के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे एक जुलाहा परिवार में पले-बढ़े। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक जिज्ञासा थी। वे मस्जिद और मंदिर दोनों में जाते, लेकिन वहाँ के आडंबर उन्हें नहीं भाते थे। वे सत्य की खोज में थे उस सत्य की जो बाहरी पूजा-पाठ से परे हो।

    कबीरदास ने स्वयं गुरु की खोज की। प्रसिद्ध कथा है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य बने। रामानंद उस समय के बड़े वैष्णव संत थे। कबीरदास को डर था कि जाति के कारण रामानंद उन्हें शिष्य नहीं बनाएँगे। इसलिए उन्होंने एक दिन प्रातःकाल गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेटकर इंतजार किया। जब रामानंद जी स्नान करने उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया और मुख से “राम” निकल गया। कबीरदास ने उसी “राम” को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वयं को रामानंद का शिष्य घोषित कर दिया। बाद में रामानंद जी ने उन्हें स्वीकार भी कर लिया।

    यह घटना कबीरदास के गुरु-महिमा के भाव को स्पष्ट करती है। उनके लिए गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह माध्यम था जिसके द्वारा परमात्मा तक पहुँचा जा सकता था। कबीरदास ने कहा है।

    “गुरु की सोई परतिष्ठा, जो गुरुदेव बतावै।

    गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न राम॥”

    अर्थात् गुरु की वही प्रतिष्ठा है जो गुरुदेव बताएँ। गुरु के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं होता और गुरु के बिना राम नहीं मिलते।

    कबीरदास के अनुसार भगवान तो नित्य हैं, सर्वव्यापी हैं, लेकिन मनुष्य अपने अहंकार, अज्ञान और माया के कारण उन्हें देख नहीं पाता। गुरु वह होता है जो शिष्य के अंदर छिपे हुए परमात्मा को जगा देता है। जैसे अंधेरे कमरे में दीया जला देने से सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही गुरु ज्ञान का दीया जलाकर शिष्य के जीवन को प्रकाशित कर देता है।

    भगवान को कोई देख नहीं सकता, छू नहीं सकता, उनसे सीधे बात नहीं कर सकता। लेकिन गुरु साक्षात् रूप में मौजूद होता है। वह शिष्य की गलतियों को सुधारता है, उसे डांटता है, प्यार करता है, और सही मार्ग पर ले जाता है। कबीरदास कहते हैं कि गुरु की कृपा के बिना भगवान भी नहीं मिलते,

    “गुरु बिन कौन बतावै बाट, गुरु बिन कौन उतारे पार।

    गुरु बिन कौन दिखावै राम, गुरु बिन कौन करे निस्तार॥”

    गुरु के बिना रास्ता कौन बताएगा? गुरु के बिना पार कौन उतारेगा? गुरु के बिना राम कौन दिखाएगा और गुरु के बिना निस्तार कौन करेगा?

    कबीरदास ने गुरु को इसलिए ऊँचा स्थान दिया क्योंकि वे व्यावहारिक संत थे। वे केवल सिद्धांत नहीं बताते थे, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाते थे। उनके दोहों में बार-बार यह बात आती है कि बाहरी पूजा, तीर्थ, व्रत, जप-तप व्यर्थ हैं यदि भीतर का ज्ञान जागृत न हो। और भीतर का ज्ञान जगाने वाला गुरु ही होता है।

    कबीरदास ने गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत पवित्र और गहरी जिम्मेदारी वाला माना। उन्होंने कहा कि गुरु को चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गलत गुरु शिष्य को और अधिक अंधकार में धकेल सकता है। सही गुरु वह है जो स्वार्थ से मुक्त हो, जो शिष्य को अपना बनाकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र बनाकर ज्ञान दे।

    कबीरदास स्वयं ऐसे गुरु थे। उन्होंने अपने शिष्यों को कभी अंधभक्ति के लिए नहीं कहा। वे कहते थे कि गुरु की बात को भी विवेक से परखना चाहिए। लेकिन एक बार गुरु स्वीकार कर लेने के बाद उनकी आज्ञा का पालन पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए।

    उनके दोहे में गुरु की महिमा इस प्रकार है।

    “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।

    अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

    गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। गुरु शिष्य के अंदर के दोषों को गढ़-गढ़कर निकालता है। अंदर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट करता है ताकि शिष्य का जीवन सुंदर घड़े की तरह आकार ले सके।

    यह रूपक बहुत गहरा है। भगवान तो बस मौजूद हैं, लेकिन गुरु सक्रिय रूप से शिष्य को गढ़ता है। इसलिए कबीरदास गुरु को भगवान से बड़ा मानते हैं।

    कबीरदास अकेले नहीं थे जिन्होंने गुरु को इतना ऊँचा स्थान दिया। भारतीय भक्ति और संत परंपरा में गुरु को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। नानक देव, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई—सभी ने गुरु की महिमा गाई है। लेकिन कबीरदास ने इसे सबसे स्पष्ट और निर्भीक भाषा में कहा। उन्होंने समाज के सामने चुनौती रखते हुए कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों मौजूद हों तो पहले गुरु को प्रणाम करो।

    यह बात उस समय और भी क्रांतिकारी थी जब लोग मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे हुए थे। कबीरदास ने कहा कि भगवान तो एक है, लेकिन उस तक पहुँचने का रास्ता गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु की शरण में जाना सबसे पहला कदम है।

    आज के युग में जब ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है, किताबें सहज सुलभ हैं, तब भी गुरु की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। कबीरदास का दोहा आज भी उतना ही सत्य है। कोई भी कला, विज्ञान, संगीत, खेल या आध्यात्मिक साधना गुरु के बिना पूरी नहीं होती। शिक्षक, मेंटर, माता-पिता, बड़े भाई-बहत ये सभी किसी न किसी रूप में गुरु का कार्य करते हैं।

    आज मनुष्य सूचनाओं से घिरा हुआ है, लेकिन विवेक और दिशा की कमी है। गुरु वही है जो सूचना को ज्ञान में और ज्ञान को जीवन में बदलने का मार्ग दिखाए। कबीरदास की दृष्टि में गुरु केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला है।

    गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी भाव को जीवित रखता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी सफलता, हमारी समझ और हमारी प्रगति के पीछे किसी न किसी गुरु का योगदान है। कबीरदास हमें सिखाते हैं कि सफलता मिलने के बाद गुरु को भूल जाना सबसे बड़ी कृतघ्नता है। गुरु-दक्षिणा केवल धन या वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में गुरु के बताए मार्ग पर चलना और उनके प्रति कृतज्ञ बने रहना है।

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि भगवान तक पहुँचने का एकमात्र सच्चा माध्यम गुरु है। भगवान तो हमेशा मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य के अज्ञान ने उनके और अपने बीच दीवार खड़ी कर रखी है। गुरु उस दीवार को गिराता है। गुरु अंधेरे में दीप जलाता है, भटके हुए को रास्ता दिखाता है और अधूरे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।

    उनका दोहा हमें याद दिलाता है कि श्रद्धा का पहला अधिकार गुरु का है। यदि गुरु न होते तो हम गोविंद को कैसे पहचानते? इसलिए कबीरदास बलिहारी जाते हैं अपने गुरु की क्योंकि उन्होंने गोविंद का पता बता दिया।

    आज जब हम गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, तो कबीरदास की इस वाणी को हृदय में धारण करें। अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें चाहे वे स्कूल के शिक्षक हों, जीवन के मार्गदर्शक हों या माता-पिता। क्योंकि ज्ञान का मार्ग गुरु के बिना अधूरा है, और अधूरे मार्ग पर चलकर कोई भी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता।

    कबीरदास की वाणी अमर है। वे कहते हैं

    “कबीर गुरु की भक्ति का, सुख फल आगम अपार।

    जाके मन में भक्ति नहीं, ताका जीवन बेकार॥”

    गुरु की भक्ति में अपार सुख छिपा है। जिसके मन में गुरु के प्रति भक्ति नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है। यही कबीरदास का संदेश है गुरु को भगवान से भी बड़ा मानो, क्योंकि गुरु ही वह सेतु है जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।

  • एक अनाथ

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “बेटी, अब से यही तुम्हारा घर है… सबको अपना समझकर रहना।”

     

    विदाई के समय मामा की आँखों में आँसू थे। सामने खड़ी पायल भी रो रही थी। माँ-बाप का साया तो उसने बचपन में ही खो दिया था। वह सिर्फ पाँच साल की थी, जब एक सड़क हादसे ने उसके माता-पिता को उससे हमेशा के लिए छीन लिया। उस दिन के बाद उसकी दुनिया उजड़ गई थी।

     

    लेकिन भगवान ने उसके लिए एक सहारा पहले से ही चुन रखा था। उसके मामा और मामी ने उसे अपनी बेटी बनाकर अपने घर ले आए। उन्होंने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है। जितना प्यार उन्होंने अपने बेटे रोहन को दिया, उतना ही प्यार पायल को भी मिला। मामी हर रात उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं और मामा उसे कंधों पर बैठाकर मेले घुमाने ले जाते।

     

    पायल बड़ी होती गई। पढ़ाई में होशियार, संस्कारों में सबसे आगे और दिल से बेहद नरम। पूरे मोहल्ले में उसकी मिसाल दी जाती थी। उसे हमेशा यही भरोसा था कि जिस घर में उसकी शादी होगी, वहाँ भी उसे इतना ही अपनापन मिलेगा।

     

    समय आया तो उसके लिए अमन का रिश्ता आया। परिवार देखने में अच्छा था। बातों में मिठास थी और सब लोग बहुत संस्कारी होने का दिखावा कर रहे थे। मामा-मामी ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी की। जो बन पड़ा, सब कुछ दिया। विदाई के समय मामी ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी, अगर कभी ज़रा-सी भी परेशानी हो, तो अपने इस घर का दरवाज़ा हमेशा खुला मिलेगा।”

     

    पायल मुस्कुराई और आँसू पोंछते हुए ससुराल चली गई।

     

    लेकिन जिस घर को उसने अपना नया संसार समझा था, वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख बन गया।

     

    शादी के दूसरे ही दिन उसकी सास ने दहेज का सामान देखते हुए ताना मारा, “बस इतना ही सामान भेजा है? लगता है तुम्हारे मामा-मामी ने अपनी जिम्मेदारी जल्दी खत्म करनी थी।”

     

    पायल चुप रही। उसने सोचा, शायद पहली बार की नाराज़गी होगी।

     

    लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी।

     

    हर सुबह कोई न कोई ताना उसका इंतज़ार करता।

     

    “इतनी देर से क्यों उठी?”

     

    “खाना बनाना भी नहीं आता?”

     

    “अनाथ लड़की से इससे ज़्यादा उम्मीद भी क्या करें?”

     

    ये शब्द रोज़ उसके दिल को तोड़ देते थे।

     

    उसका पति अमन भी धीरे-धीरे अपनी माँ की बातों में आने लगा। पहले जो उससे प्यार से बात करता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उसे डाँटने लगा।

     

    एक दिन पायल ने हिम्मत करके कहा, “अगर मुझसे कोई गलती हुई है, तो मुझे समझाइए… लेकिन बार-बार अनाथ कहकर मत बुलाइए। बहुत दर्द होता है।”

     

    अमन ने बेरुखी से जवाब दिया, “माँ जो कहती हैं, सुन लिया करो। बेकार की बहस मत किया करो।”

     

    उस दिन पायल को समझ आ गया कि अब उसे इस घर में अकेले ही सब सहना होगा।

     

    धीरे-धीरे उससे पूरे घर का काम करवाया जाने लगा। सुबह चार बजे उठना, रात देर तक काम करना। अगर ज़रा-सी भी गलती हो जाती तो खाना तक नसीब नहीं होता।

     

    एक दिन उसे तेज़ बुखार था। शरीर काँप रहा था, लेकिन सास बोली, “बीमार होने का नाटक मत करो। रसोई में जाओ और खाना बनाओ।”

     

    पायल काँपते हाथों से रोटियाँ बना रही थी कि अचानक उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह रसोई में ही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    जब होश आया तो वह अपने कमरे में थी। उसे लगा कि शायद किसी ने उसकी चिंता की होगी।

     

    लेकिन तभी बाहर से सास की आवाज़ आई, “नाटक करने में तो बड़ी होशियार है। काम से बचने का नया तरीका ढूँढ़ लिया।”

     

    यह सुनकर पायल की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उस रात उसने अपने मामा को फोन किया। जैसे ही उधर से आवाज़ आई, “कैसी है मेरी बेटी?”

     

    पायल का गला भर आया। लेकिन वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।

     

    वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “मैं ठीक हूँ मामा… बस आपकी याद आ रही थी।”

     

    फोन कटते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उधर मामा समझ गए कि उनकी बेटी कुछ छिपा रही है।

     

    दो दिन बाद मामा और मामी बिना बताए उसके ससुराल पहुँच गए।

     

    दरवाज़ा पायल ने खोला। उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। आँखों के नीचे काले घेरे थे और हाथों पर जलने के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।

     

    मामी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से पूछा, “बेटी… सच बता, तू खुश तो है ना?”

     

    बस इतना सुनना था कि पायल खुद को रोक नहीं पाई। वह मामी के गले लगकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    उसकी सिसकियाँ सुनकर घर में सन्नाटा छा गया।

     

    उस दिन पहली बार मामा ने अपनी बेटी की आँखों में वह दर्द देखा, जिसे वह महीनों से मुस्कान के पीछे छिपा रही थी।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अपनी फूल जैसी बेटी को जिस घर में विदा किया था, वहाँ उसे प्यार नहीं, बल्कि अपमान और तकलीफ़ मिली थी।

     

    उस पल मामा ने मन ही मन एक फैसला कर लिया अब उनकी बेटी कभी अकेली नहीं लड़ेगी।

     

    पायल मामी के गले लगकर लगातार रोए जा रही थी। बरसों का दर्द जैसे आज उसकी आँखों से बाहर निकल रहा था।

     

    मामी बार-बार उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कह रही थीं, “बस बेटी… अब और मत रो। हम आ गए हैं ना।”

     

    मामा ने पूरे घर की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    इतने में पायल की सास बोली, “अरे, हमने ऐसा क्या कर दिया? बहुएँ अगर थोड़ा-बहुत काम करें तो क्या गलत है?”

     

    मामा ने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “काम करवाना गलत नहीं है… लेकिन किसी की बेटी का सम्मान छीन लेना सबसे बड़ा गलत काम है।”

     

    सास हँसते हुए बोली, “ये आपकी बेटी नहीं, अनाथ लड़की है। हमने तो इस पर एहसान किया है।”

     

    ये सुनते ही मामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिस दिन इसकी माँ-बाप की मौत हुई थी, उसी दिन मैंने इसे अपनी बेटी मान लिया था। अगर इसे जन्म देने वाले नहीं रहे, तो इसका मतलब ये नहीं कि इसका कोई अपना नहीं है।”

     

    पूरे घर में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन भी वहीं खड़ा सब सुन रहा था, लेकिन उसने एक शब्द तक नहीं कहा।

     

    मामा ने पायल से पूछा, “बेटी, सच-सच बता… क्या तू इस घर में खुश है?”

     

    पायल कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “मैंने बहुत कोशिश की मामा… सबको अपना माना… हर ताना सहा… हर अपमान सहा… लेकिन अब मुझसे नहीं होता।”

     

    उसकी बात सुनकर मामी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    मामा ने बिना एक पल गंवाए कहा, “चल बेटी… अपने घर चल।”

     

    सास तुरंत बोली, “अगर आज ये इस घर से गई, तो दोबारा इस घर में कदम नहीं रखेगी।”

     

    मामा ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया, “जिस घर में बेटी की इज़्ज़त नहीं होती, उस घर में लौटने की ज़रूरत भी नहीं होती।”

     

    पायल अपने मामा-मामी के साथ चली गई।

     

    कई दिनों बाद उसने खुलकर साँस ली। पहली बार उसे ऐसा लगा कि वह फिर से ज़िंदा है।

     

    मामी ने उसे संभाला। मामा ने कहा, “बेटी, अब किसी के सामने रोना नहीं… अब खुद को इतना मज़बूत बनाना कि लोग तुझे कमजोर समझने की गलती कभी न करें।”

     

    पायल ने उसी दिन फैसला कर लिया कि अब वह अपनी पहचान खुद बनाएगी।

     

    उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। साथ ही सिलाई और कंप्यूटर का कोर्स भी किया। धीरे-धीरे उसने घर से ही अपना छोटा-सा काम शुरू कर दिया।

     

    शुरुआत में कम कमाई हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ महीनों बाद उसके बनाए कपड़ों की माँग बढ़ने लगी। फिर उसने दो और महिलाओं को अपने साथ काम पर रखा।

     

    एक साल के अंदर उसका छोटा-सा काम एक अच्छी दुकान में बदल गया।

     

    आज वही पायल, जिसे कभी ताने सुनने पड़ते थे, कई ज़रूरतमंद महिलाओं को रोज़गार दे रही थी।

     

    उधर अमन का घर पहले जैसा नहीं रहा। सास की तबीयत खराब रहने लगी। घर के काम करने वाला कोई नहीं था। तब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि पायल नौकरानी नहीं, उस घर की बहू थी।

     

    एक दिन अमन पायल से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    उसने धीरे से कहा, “पायल… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो और वापस चलो।”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास था।

     

    वह बोली, “माफ़ मैंने तुम्हें उसी दिन कर दिया था… लेकिन जिस घर में मेरे आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं थी, वहाँ अब लौटना मेरे बस की बात नहीं।”

     

    अमन शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया।

     

    पायल ने मुस्कुराकर कहा, “रिश्ते प्यार से चलते हैं… तानों से नहीं। और सम्मान खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।”

     

    अमन बिना कुछ कहे वापस लौट गया।

     

    कुछ समय बाद पायल की मेहनत और हिम्मत की कहानी पूरे शहर में मिसाल बन गई। लोग उसे एक सफल महिला के रूप में पहचानने लगे।

     

    एक कार्यक्रम में जब उसे सम्मानित किया गया तो मंच से उसने सिर्फ एक बात कही—

     

    “मैं अनाथ ज़रूर थी, लेकिन कभी अकेली नहीं थी। मेरे मामा-मामी ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं हर मुश्किल से लड़ सकी। और आज मैं हर उस लड़की से कहना चाहती हूँ… अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता मत करना। क्योंकि जो खुद की इज़्ज़त करना सीख लेता है, दुनिया भी एक दिन उसकी इज़्ज़त करना सीख जाती है

    ।”

     

    पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

     

    मामा और मामी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उनकी बेटी हारकर नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाकर जीती थी।

     

  • गुरु की ज्योति

    गुरु की ज्योति

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    गुरु वो दीप हैं, जो तमस हर लेते,  

    ज्ञान की किरणों से जीवन भर देते।  

    उनके चरणों में है सारा संसार,  

    उनसे ही मिलता है सच्चा आधार।  

     

    गुरु वो वृक्ष हैं, छाया में सुकून देते,  

    धूप में भी ठंडक का एहसास देते।  

    उनकी वाणी अमृत सी बरसती,  

    हर शब्द में शिक्षा की गंध बसती।  

     

    गुरु वो सागर हैं, जिनमें सत्य की लहरें,  

    हर प्रश्न का उत्तर, हर मन की डगरें।  

    उनकी दृष्टि में करुणा का सागर,  

    उनके आशीष से मिटता है अंधकार।  

     

    गुरु पूर्णिमा का पावन दिन आया,  

    श्रद्धा का दीप हर मन में जलाया।  

    फूलों की वर्षा, भक्ति की धारा,  

    गुरु चरणों में समर्पित हमारा प्यारा।  

     

    गुरु से ही जीवन का अर्थ समझा,  

    गुरु से ही आत्मा का स्वर मिला।  

    गुरु वो सूरज हैं, जो कभी न ढलते,  

    उनकी रोशनी से सब पथ पलते।  

     

    जय गुरु देव, जय ज्ञान के दाता,  

    आपसे ही जीवन का हर पल निखरता।  

    आपकी कृपा से मन निर्मल होता,  

    आपकी छाया में संसार संवरता।

     

    गुरु वो दीपक हैं, 

    जो अंधियारे में राह दिखाते,

    ज्ञान की गंगा बनकर, 

    जीवन को पावन बनाते।

     

    गुरु वो छाया हैं, 

    जो हर दुख में सहारा देते,

    संस्कारों की ज्योति से, 

    मन को उजियारा देते।

     

    गुरु वो सागर हैं, 

    जिनमें सत्य की लहरें उठतीं,

    भ्रम के रेगिस्तान में, 

    आशा की नदियाँ बहतीं।

     

    गुरु वो पर्वत हैं, 

    अटल, अडिग, स्थिर खड़े,

    शिष्य के हर प्रश्न पर, 

    उत्तर के दीप जलाए खड़े।

     

    गुरु पूर्णिमा का दिन है, 

    श्रद्धा का उत्सव महान,

    गुरु चरणों में अर्पित है, 

    जीवन का सारा सम्मान।

    🙏🙏  जय गुरु देव  🙏🙏

  • अधूरी इबादत भाग~14

    अधूरी इबादत भाग~14

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~14 उसके जाने के बाद

     

    अद्वैत की कार धीरे-धीरे शहर की जगमगाती सड़कों से गुज़र रही थी, लेकिन उसके भीतर एक अंधेरा लगातार फैलता जा रहा था। बाहर की दुनिया रोशनी से सराबोर थी, रेड लाइट पर रुकती गाड़ियों की कतारें, फुटपाथ पर चलते लोग, ट्रैफिक सिग्नल की टिमटिमाती बत्तियाँ… मगर अद्वैत की आंखों में इन सबका कोई प्रतिबिंब नहीं था। वह कार की खिड़की से बाहर देख ज़रूर रहा था, पर उसकी नज़रें उन दृश्यों को चीरती हुई कहीं बहुत भीतर, बहुत दूर चली जा रही थीं।

    वह बाहर से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था, उसकी गर्दन सीधी, आँखें स्थिर, हाथ स्टीयरिंग पर टिके हुए… जैसे सब कुछ सामान्य हो। लेकिन भीतर एक उथल-पुथल चल रही थी, जैसे कोई जलप्रलय उसके भीतर ही फट पड़ा हो। मीडिया में आई तस्वीरें, लोगों की निगाहें, वो फुसफुसाहटें — “वो लड़की कौन है?”, “क्या सच में उसके साथ रह रहा है?”, “अब तक तो उसकी पत्नी मर चुकी थी, तो ये कौन है?” हर एक सवाल अद्वैत के मन में नश्तर की तरह चुभ रहा था।

    उसका मन बार-बार रूहानी की ओर भाग रहा था। लेकिन साथ ही उसे अब उस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरेज’ की बात भी याद आ रही थी जो उसके मैनेजर ने सुझाई थी। यह सोचते ही उसका माथा भिंच गया। 

    “मैं उससे कैसे कहूँगा ये बात? वो कोई चीज़ नहीं है कि एक कागज़ पर साइन करवा लिया और मामला खत्म।” 

    “और फिर, मैंने उसे जाना ही कितना है?”

    उसने खुद से एक सवाल पूछा, “क्या वाकई में मुझे हक है उससे यह प्रस्ताव रखने का?”

    वह जानता था कि यह प्रस्ताव एक शर्त की तरह लगेगा, एक सौदा “मेरी छवि बचाने के लिए, मुझे अपने साथ तुम्हारा नाम चाहिए।” और यह ख्याल ही उसे भीतर से झकझोर गया।  

    “क्या वो लड़की, जो पुल से छलांग लगाने जा रही थी, अब मेरी वजह से किसी और बोझ तले दब जाएगी?”

    कार फिर एक मोड़ पर धीमी हुई। सड़कों पर अब भीड़ कम हो चुकी थी, लेकिन अद्वैत का मन और अधिक भारी होता जा रहा था।  

    “काश मैंने उससे बात की होती, काश उसके भीतर की परतों को समझने की कोशिश की होती… कम से कम इतना तो पूछता कि वो हर रात खिड़की की तरफ चुपचाप क्या देखती है?”

    अब जब उससे एक बेहद निजी प्रस्ताव रखने की नौबत आई थी, तब उसे यह अहसास हो रहा था कि वह तो उस लड़की का नाम भर जानता है, उसकी कहानी नहीं।

    अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। उसने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली।  

    “ये गलत है… ये सब कुछ गलत है। लेकिन फिर, मैं झूठी अफवाहों से खुद को कैसे बचाऊँ? ये दुनिया सच नहीं पूछती, बस दिखावे पर यकीन करती है। और इस दिखावे से बाहर निकलने के लिए, मुझे रूहानी का नाम चाहिए… कम से कम बाहर की दुनिया के लिए।”

    उसने खुद से धीरे से कहा — “शायद, अब मुझे उससे सच में बात करनी ही होगी… पहली बार।”

    कार अब घर के गेट पर पहुंच चुकी थी। दरवाज़ा खुला और अद्वैत भीतर दाखिल हुआ… कमरा हल्का सा अस्त – व्यवस्त था। सोफे और हॉल के दरवाजे के बीच की जगह में बहुत कुछ बिखरा हुआ पड़ा था। उसकी आँखें उस बिखरे सामान में से एक चीज़ पर टिक गई -“रूहानी के नाम वाली ब्रेसेलेट”।

    वह ब्रेसेलेट गिरकर टूट चुका था। अद्वैत कुछ पल के लिए वहीं खड़ा हो गया मानो कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।

    उसका दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे ब्रेसेलेट के पास गया, ब्रेसलेट उठाते समय उसके हाथ कांप रहे थे। वह सोचने लगा, “क्या हुआ है आखि़र यहां” उसके मन में एक हलचल सी मची हुई थी। 

    अद्वैत ने पुकारा, “रूहानी… रूहानी…” लेकिन कही से कोई आवाज नहीं आई। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने एक बार फिर से आवाज लगाई, “रूहानी!” लेकिन उसके शब्द हवा में खो गए। 

    अब उसकी चिंता और बढ़ने लगी। वह घर के हर कोने में उसे खोजने लगा। उसकी आँखों में बेचैनी, घबराहट और कुछ समझ न पाने की स्थिति में थी। 

    शाम पहले ही हो चुकी थी और अंधेरा होने को था। अद्वैत को अचानक ख्याल आया, “क्यों न रूहानी को कॉल कर लूँ?” 

    लेकिन उसके चेहरे पर छाई मुस्कान गायब हो गई जब उसे याद आया कि उसने कभी रूहानी का नंबर एक्सचेंज ही नहीं किया था। 

    अद्वैत असमंजस में पड़ गया, “क्या करूँ अब?” उसके भीतर कुछ टूट सा गया। उसने जो उम्मीद की थी, वह अचानक उससे छिन गई। वह थक कर सोफे पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसकी आँखें बंद हो गई और वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा। 

    अद्वैत को जैसे कुछ अजीब सा अहसास हो रहा था कि रूहानी, उसका टूटा हुआ ब्रेसेलेट और यह पल कुछ गहरे अर्थ छुपाए हुए हैं। उसके मन में एक तूफान सा मचा हुआ था। वो खुद से सवाल की “क्या हुआ होगा रूहानी के साथ? क्या उसे कुछ हो गया?” 

    वह खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि वह तो रूहानी को ठीक से जानता भी नहीं तो ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? 

    तभी अचानक, सोफे के निचले साइड टेबल पर रखा हुआ फोन न बजने लगा। अद्वैत चौक कर देखा तो फोन रूहानी का था, और उस पर वही “my life” का कॉल आ रहा था। अद्वैत का मन तेज़ी से दौड़ने लगा। 

    क्या यह रूहानी से जुड़ी कोई अहम बात है? 

    क्या उसे कुछ हुआ है?

    जैसे ही उसने फोन पर कान लगाया, दूसरी तरफ से एक किशोर लड़के की आवाज सुनाई दी, जो हड़बड़ाहट में बोल रहा था, “क्या मेरी बात अद्वैत अवस्थी से हो रही है?”

    अद्वैत ने धीरे से जवाब दिया, “हां, मैं अद्वैत हूं। तुम कौन हो? और रूहानी का फोन यहां क्यों है? वो कहां है? कहीं उसे कुछ तो नहीं हो गया?” 

    उसका मन पूरी तरह से घबराहट से भर चुका था। उसकी आँखों में अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई बुरी खबर सुनने को मिल सकती हो।

    उधर से यशस्वी के भाई यश ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। आपकी बातों का जवाब देने के लिए, लेकिन इतना जान लीजिए कि मैं रूहानी दीदी का छोटा भाई हूं और मैं आपको एक पता मैसेज कर रहा हूं। कल सुबह अगर आप वहां पहुंचेंगे, तो आपसे सारी बातें हो पाएंगी।”

    अद्वैत की आँखें अचानक से चौड़ी हो गई। उसके मस्तिष्क में एक साथ कई सवाल उठ पड़े। 

    रूहानी का भाई?….. 

    क्या यह सच है?

    क्या वह सच में रूहानी का भाई है?

    यह नया मोड़ उसे और भी अधिक उलझा रहा था। 

    अद्वैत कुछ कहने ही वाला था कि अचानक कॉल कट गया। फोन के स्क्रीन पर सन्नाटा छा गया, जैसे कोई जरूरी बात अधूरी रह गई हो। वह कुछ क्षण यूं ही थमा रहा, जैसे समय रुक गया हो। फिर धीरे-धीरे उसकी आँखों में विचारों की लहरें उठने लगीं। 

    “अगर रूहानी का परिवार है… तो उसने उस रात यह क्यों कहा कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं है?” यह सवाल उसके भीतर लगातार गूंजता रहा। उसकी सांसें भारी हो गईं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि रूहानी ने ऐसा झूठ क्यों बोला। आखिर वजह क्या थी?

    अद्वैत की आंखों में उस रात की छवि लौट आई… वो रात जब रूहानी खुद को खत्म करने जा रही थी और उसने उसे बचाया था। लेकिन एक बात उसे अब चुभने लगी… उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि रूहानी ऐसा कदम क्यों उठाना चाहती थी। 

    फिर एक हल्की सी अपराधबोध की लहर उसके दिल में दौड़ गई। मगर उसी के साथ एक दूसरा ख्याल भी आया, एक तर्क….”किसी को बचा लेना तो ठीक है… पर क्या किसी की निजी ज़िंदगी में यूं झांकना सही होता है? खासकर तब, जब वो व्यक्ति अजनबी हो?” 

    यह विचार उसके मन को और भी उलझा दिया। वो खुद से लड़ने लगा…. “क्या वाकई में मैंने कुछ गलत किया? या फिर मैंने वही किया जो उस वक्त ज़रूरी था?” 

    उसके दिल के किसी कोने में अब यह जानने की जिद गहराने लगी थी कि रूहानी ने झूठ क्यों बोला।

    उसकी आंखें फोन की स्क्रीन पर रूहानी की तस्वीर पर टिक गई जैसे वो उससे जवाब मांग रहा हो। मगर जवाब तो अब उस पते पर था, जो उसे सुबह मिलना था।

    —————-

    क्या रूहानी ने जानबूझकर अपनी सच्चाई छुपाई थी?  

    क्या “इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है” महज़ एक झूठ था या कोई गहरा राज़?  

    अब अद्वैत के सामने सवाल ही सवाल थे… लेकिन जवाब कहाँ थे कि उस पते पर क्या इंतज़ार कर रहा था?

  • अधूरी इबादत भाग~13

    अधूरी इबादत भाग~13

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~13 अफवाहों के घेरे में

     

    शहर के सबसे बड़े सभागार की रोशनी आज अद्वैत के लिए खास थी। मखमली पर्दे धीमे-धीमे फड़फड़ा रहे थे, जैसे वे भी इस सुबह की थमी हुई बेचैनी को समझ रहे हों। अद्वैत मंच के ठीक बीच, विशिष्ट अतिथियों के लिए रखी गई भव्य, ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर बैठा था, जिस पर बैठते ही किसी के भी भीतर एक छलावा सा आत्मगौरव जाग सकता था। 

    चारों तरफ तालियों की गूंज थी, हर मुस्कान में आदर था, हर आँख में चमक। लेखक अद्वैत अवस्थी… शब्दों का जादूगर, दिलों को छूने वाला… आज उस ऊँचाई पर था, जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है। 

    लेकिन अद्वैत के भीतर कुछ टूट रहा था। उसके भीतर एक ऐसा शोर था जिसे कोई सुन नहीं सकता था। 

    जब वह तड़के ही अपने घर से निकला था, तभी से उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मन अजीब सा घुटा-घुटा था, जैसे कोई अनकही आशंका दिल में घर बना रही हो। गाड़ी की खिड़की से बाहर बहती हवा भी आज उसे बोझिल सी लगी थी। हरियाली, सड़कें, आसमान…. सब कुछ उसे अपने से दूर-दूर सा लग रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी वीरानी थी।

    सभागार के चमचमाते लाइटों के नीचे, वह तन से तो बैठा था, मुस्कुरा भी रहा था, मगर आत्मा कहीं भटक रही थी। भीड़ की तारीफों में डूबती-उतराती उसकी पहचान भी आज उसे बोझ जैसी लग रही थी। 

    एक हिस्सा जैसे लगातार पूछ रहा था… क्या यही था जिसकी तलाश थी? 

    क्या यही संतोष था जिसकी कल्पना की थी?

    किसी ने माइक पर उसका नाम पुकारा, बधाइयों के साथ। वह जैसे किसी नींद से जगा हो, धीरे से मुस्कुराया और आगे बढ़ा। कदम भारी थे, मुस्कान में बनावटी चमक थी।

    स्टेज पर पहुँचकर उसने माइक थामा।

    हॉल में एक गहरी ख़ामोशी छा गई। लोग उसकी अगली कहानी, उसकी अगली सीख, उसके शब्दों की गर्माहट को सुनने के लिए तत्पर थे। मगर अद्वैत के गले में जैसे कांटे उग आए थे। शब्द, जो कभी उसकी आत्मा से बहते थे, आज गले में अटके हुए थे।

    “मैं…,” उसने कहना शुरू किया, फिर पल भर को रुका।

    वह लोगों के चेहरों को देख रहा था। वहाँ केवल प्रशंसा थी, अपेक्षाएँ थीं, और कहीं भी उसे नहीं दिखा वह सुकून, जो शायद उसकी आत्मा मांग रही थी।

    उसे अपनी पत्नी की याद आई — वो जो इतनी जल्दी उससे बिछड़ गई थी। उसकी वो मुस्कुराहटें, उसके अधूरे वादे, उनका अधूरा सपना — सब एक साथ आँखों के सामने छा गया।

    और फिर… अचानक….. घर में एक बेहोश पड़ी लड़की की तस्वीर भी दिमाग के किसी कोने से उभर आई — रूहानी। वो अजनबी लड़की जो अब उसके घर की वीरानी में साँस ले रही थी। जिसे उसने बिना सोचे समझे बचा तो लिया था, पर अब उसके होने से घर में अजीब सी गूँज फैल गई थी।

    शायद रूहानी के टूटे हुए टुकड़े, अद्वैत के अपने बिखरे टुकड़ों से टकरा रहे थे। शायद इसलिए दिल में ये बेचैनी थी, ये घुटन थी। 

    “शब्दों से दुनिया को छूना आसान है,” उसने अचानक बोलना शुरू किया, “लेकिन अपने भीतर के सन्नाटे को छूना सबसे मुश्किल।”

    लोगों ने सोचा यह कोई गहरी भूमिका है, कोई नया विचार। पर अद्वैत जानता था, ये उसकी आत्मा की चीख थी, जो शब्द बनकर बाहर आ रही थी। उसकी आँखें चमक रही थीं, लेकिन वह चमक नम थी। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर होठों पर सिर्फ़ एक थकी हुई रेखा खिंच पाई।

    माइक रखते हुए वह जानता था, यह तालियाँ, ये हॉल, ये चमकती बत्तियाँ — सब कुछ उसकी सच्चाई से कोसों दूर हैं। आज भी वह अकेला था….. शायद पहले से भी ज्यादा…….

    शब्दों का सम्राट, दिलों का जादूगर — और फिर भी भीतर एक टूटा हुआ, बिखरा इंसान, जो बस किसी अपने की गर्माहट चाहता था लेकिन उस भीड़ में, उस सभागार में, उसे कोई अपना नहीं दिखा। केवल अजनबियों की गूँजती तालियाँ थीं, और एक थका हुआ दिल जो चुपचाप अपना बोझ ढो रहा था।

    रौशनी से चमकते मंच के पीछे का कोना हलचल से भर गया था। कवि सम्मेलन के समापन के बाद रिपोर्टर और मीडिया वाले अपने अपने कैमरों और रिकॉर्डरों के साथ अद्वैत के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। उनके सवालों की बौछार शुरू हो चुकी थी। शुरू में बात लेखन और रचनाओं के आस-पास घूमती रही। किस कविता में कौन सी भावना, किस कहानी में कौन सा दर्द… अद्वैत संयमित मुस्कान के साथ जवाब देता रहा, जैसे वर्षों से इस तरह के सवालों का सामना करता आया हो।

    लेकिन फिर अचानक सवालों की दिशा बदलने लगी। आवाजें तीखी हो गईं, नजरें चुभती हुई।

    “आपकी लेखनी की प्रेरणा कौन है?” एक युवा रिपोर्टर ने पूछा, उत्सुकता से झुकते हुए।

    अद्वैत ने अनायास ही बिना ज्यादा सोचे कहा, “मेरी पत्नी।”

    उसके शब्दों में एक नर्म, गहरी थकान थी। वह मुस्कुराया भी नहीं, बस नजरें एक पल को झुक गईं, मानो कोई भूला-बिसरा चेहरा फिर से उसकी आँखों के सामने तैर गया हो।

    लेकिन जैसे ही उसके शब्द हवा में घुले, एक और सवाल पीछे से आ गया, तीखा और बेरहम — “आपकी पत्नी तो एक साल पहले गुजर चुकी हैं, ना?”

    अद्वैत का दिल एक पल को थम गया। कमरे की गर्माहट जैसे अचानक बर्फ में बदल गई।  

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले ही कोई और बोल पड़ा, “या फिर वो लड़की, जिसके साथ आप इन दिनों अपने घर में रह रहे हैं, वही आपकी नई पत्नी हैं?”

    यह सवाल नहीं था, यह एक वार था — सीधा दिल पर।

    अद्वैत का चेहरा सफेद पड़ गया। पलकों के नीचे छुपी थकान अचानक खुल कर सामने आ गई। आँखों में जो धैर्य था, वह दरकने लगा।  

    भीतर एक बेचैन चुप्पी थी, जो चिल्ला रही थी, चीख रही थी, पर बाहर वह बस खड़ा था — गूंगा और अकेला।

    रिपोर्टरों के कैमरों की फ्लैश लाइट्स उसके चेहरे पर चमकती रहीं। कोई जवाब न पाकर, वे और भी आक्रामक हो गए, उनके सवाल अब तीर बनकर आ रहे थे।

    “कौन है वो लड़की?”  

    “क्या आपने फिर से शादी कर ली है?”  

    “क्या आप अपनी पत्नी की यादों को इतनी जल्दी भूल गए?”  

    अद्वैत ने गहरी साँस ली। गला सूख गया था, जैसे हर शब्द कहीं अंदर ही घुट कर मर गया हो। 

    उसने नजरें उठाई, सामने भीड़ थी…. उत्सुक, जिज्ञासु, और निर्मम। वहाँ कोई अपनापन नहीं था, कोई समझ नहीं थी, सिर्फ़ हड़पने की भूख थी, उसकी जिंदगी का कोई टुकड़ा, कोई सनसनी।

    अद्वैत के चारों तरफ भीड़ का घेरा कसता जा रहा था। मंच के नीचे, चारों दिशाओं से कैमरे, माइक और सवाल उसकी ओर धकेले जा रहे थे। सभागार की भीतरी दीवारों पर फुसफुसाहटें गूंज रही थीं, जो धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ों में बदलने लगी थीं। लोग उसे अब किसी और नजर से देखने लगे थे….. वही अद्वैत, जो शब्दों का जादूगर था, अब गंदी अफवाहों के घेरे में घिर गया था। 

    फिर अचानक मीडिया वालों ने दीवार पर प्रोजेक्टर चालू कर दिया। उजली दीवार पर एक तस्वीर उभरने लगी — एक पुल के किनारे की धुंधली शाम, जहाँ अद्वैत ने एक बेहोश लड़की को अपनी बाँहों में उठा रखा था। भीड़ सन्न रह गई। दूसरी तस्वीर में वह लड़की अद्वैत की कार में बैठी थी, और फिर उसके घर में दाखिल होती दिखाई दी। 

    सभागार में एक गहरी सरसराहट फैल गई। चुभती हुई निगाहें अद्वैत पर टिक गईं। सवाल अब और ज्यादा जहरीले हो चले थे।  

    “कौन है ये लड़की?”  

    “क्या ये आपकी नई प्रेमिका है?”  

    “कब से आपके घर में रह रही है?”  

    अद्वैत ने माइक थामा, उसकी आवाज अब भी वही मुलायम थी, लेकिन भीतर का दर्द उसके हर शब्द में रिस रहा था।  

    “मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ,” अद्वैत ने नज़रों में गहराई लाकर कहा, “जो कुछ भी आपने देखा, वह एक गलतफहमी है। वह लड़की मुश्किल में थी। अगर इंसानियत को बचाना गुनाह है, तो हाँ, मैंने गुनाह किया है।”

    लेकिन मीडिया को सफाई नहीं चाहिए थी, उन्हें सनसनी चाहिए थी।

    तालियों के बीच से, चुभती हुई फुसफुसाहटें उठती रहीं। भीड़ में अब जिज्ञासा नहीं, एक गहरी नफरत और गंदे मनोरंजन की भूख थी।

    स्थिति बेकाबू होने लगी थी। अद्वैत का मैनेजर, जो पीछे से सब कुछ देख रहा था, तुरंत आगे बढ़ा और उसे भीड़ से बाहर निकालने का रास्ता बना दिया। दोनों बड़ी मुश्किल से भीड़ से बचते हुए कार तक पहुँचे।

    कार के अंदर घुसते ही अद्वैत ने अपना सिर सीट से टिका दिया। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा थका और टूटा हुआ। सांसें भारी हो रही थीं, जैसे हर सांस अब एक बोझ थी।

    मैनेजर ने ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए गहरी सांस ली और फिर नरमी से कहा, “सर, इस हालात से एक ही रास्ता है बाहर निकलने का।”

    अद्वैत ने आँखें खोलीं, नजरें सवालों से भरी हुई थीं।

    “आपको और उस लड़की को शादीशुदा दिखाना पड़ेगा,” मैनेजर ने कहा।

    अद्वैत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रहे हो तुम? मैं अपनी ज़िंदगी का तमाशा नहीं बनाऊंगा।”

    मैनेजर ने संयम से बात आगे बढ़ाई, “सर, सुनिए। मैं असली शादी की बात नहीं कर रहा। पेपर पर शादी… “एक कॉन्ट्रैक्ट”। बस दिखावे के लिए। ताकि मीडिया शांत हो जाए, आपकी इमेज बर्बाद न हो।”

    अद्वैत ने कार की खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में भागती लाइटों के बीच उसका दिल भी भाग रहा था, कहीं दूर, जहाँ उसे अपनी सच्चाई बचानी थी। 

    थोड़ी देर बाद उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, “ठीक है। मैं आज ही घर जाकर उससे बात करूँगा।”

    उसकी आवाज थकी हुई थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता भी थी। एक फैसला… भले ही मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन अब उसे निभाना था।  

    ———-

    क्या अद्वैत सच में रूहानी को इस मजबूरी भरे सौदे में बाँध पाएगा?

    क्या एक मजबूरी से शुरू हुआ समझौता, अद्वैत के दिल के जख्मों को और गहरा कर देगा?

    या फिर रूहानी के अतीत का कोई ऐसा राज सामने आएगा, जो अद्वैत की आधी अधूरी दुनिया को और भी बिखेर देगा?

  • अधूरी इबादत भाग~12

    अधूरी इबादत भाग~12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    भाग~12 ग़लत इल्ज़ाम का बोझ

     

    रूहानी ने जब दरवाज़े पर अपने माँ-पापा और अपने भाई को देखा, तो एक पल के लिए उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जैसे कोई सपना अचानक हक़ीक़त में बदल गया हो, जैसे वर्षों की सूनी सड़कों पर अचानक कोई परिचित चेहरा मुस्कुरा कर सामने आ गया हो। दरवाज़े की चौखट पर खड़ी रूहानी की आँखें भर आईं….. आंसू न खुशी के थे, न ग़म के, बस एक लंबी प्रतीक्षा के थके हुए, गीले मोती थे।

    किसी के कुछ कहने या सोचने से पहले ही, यश दौड़कर अपनी बहन से लिपट गया। उस आलिंगन में अनगिनत शब्द थे… शिकायतें, माफ़ी, डर, अपनापन और ना जाने क्या – क्या….

    “मुझे लगा मैंने आपको खो दिया है, दीदी,” यश एक ही साँस में कह गया, उसकी आवाज़ में एक टूटी हुई राहत थी, जो शायद अब तक रोज़ रात उसकी नींदें तोड़ देती थी।

    रूहानी ने उसके सिर को थपथपाते हुए कहा, “देख, मैं हूं न यहाँ… सही सलामत।” उसके शब्दों में न कोई दंभ था, न कोई सफाई। बस एक कोमल सच्चाई थी।

    पर जैसे ही रूहानी अपने पिता के पास पहुँची, समय जैसे पल भर में ठहर गया। भानु प्रताप चौहान, एक गरिमामय भाव लिए अपने सख्त चेहरे के साथ हाथ उठा कर उसे वहीं रुकने का इशारा करते हैं। उस इशारे में कोई क्रोध नहीं था, पर कोई प्रेम भी नहीं। बस एक गहरी दूरी थी…. आत्मा से आत्मा तक की दूरी।

    “यही दिन दिखाने के लिए तू घर छोड़ कर चली गई थी?” उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे वर्षों से दबा ज्वालामुखी अब फूट पड़ा हो।

    रूहानी एक पल को स्तब्ध रह गई, मानो उसके कानों ने कुछ उल्टा सुन लिया हो।

    “मैं कुछ समझी नहीं, पापा,” उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में झिझक थी, पर दिल में अभी भी उम्मीद की थोड़ी सी रौशनी थी।

    भानु प्रताप गरज कर बोले, “मुझे पापा कहने का हक तुम पहले ही खो चुकी हो। तुम हमारे लिए पहले ही मर चुकी थी, लेकिन ये नहीं सोचा था कि तुम्हारी बेशर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि तुम्हारे जाने के बाद भी हमारी समाज में कोई इज़्ज़त नहीं रहेगी।”

    ये शब्द नहीं थे, अंगारे थे। रूहानी जैसे एक-एक शब्द से जलती चली गई। उसकी आत्मा पर, जो अब तक अपने लौटने की घड़ी में सहजता ढूंढ रही थी, अचानक ठंडी हवा की जगह तपता सूरज उतर आया।

    वो अपने पिता की आँखों में देखती रही… वहाँ न कोई अपनापन था, न कोई सुरक्षा बस परछाईयाँ थी और एक टूटा हुआ विश्वास।

    “आप ये क्या सब बोल रहे हैं, पापा?” उसने आँखें भरकर कहा, “किस बारे में बोले जा रहे हैं? अंदर तो आइए, तब बात करते हैं।”

    उसका स्वर अब भी शांति लिए हुए था, पर भीतर कुछ टूटता जा रहा था, बिखरता जा रहा था, मगर चेहरे पर वो अब भी एक मुस्कान लिए खड़ी थी…. शायद खुद को समझाने के लिए, शायद यह दिखाने के लिए कि वो अब भी मजबूत है।

    लेकिन उसकी माँ जानकी चौहान की आवाज़ में जो तीखापन निकला, वो उसे सहने लायक नहीं रही।

    “बस कर रूहानी,” माँ की कड़ी आवाज़ गूँजी, “तेरे चलते हम कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहे। पहले तो तूने ज़िद करके वो फ़ैशन वाला कपड़ा सिलने का काम शुरू किया था, ये जानते हुए भी कि हम दोनों में से कोई भी रज़ामंद नहीं था। और फिर उसके बाद क्या हुआ, भूल गई है क्या? या फिर से याद दिलाऊँ?”

    हर एक शब्द जैसे अतीत की धूल उड़ा रहा था, वो धूल जो रूहानी ने बड़ी मुश्किल से जमा दी थी, हर उस बात को ढँक दिया था जिसने उसकी रातों की नींद और दिल की चैन छीन ली थी।

    रूहानी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, मगर उसकी रगों में दर्द दौड़ रहा था, हर सांस के साथ जलन पैदा करता हुआ। उसे अब अपने माँ-बाप की इन उलझन भरी बातों से चिढ़ होने लगी थी। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब याद किया जाए। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब जिंदा हो….. वो रातें, वो ताने, वो अकेलापन।

    वो काँपते हुए अपने छोटे भाई यश का हाथ पकड़ ली, उसकी आँखों में एक बेचैनी थी, एक डर।

    “क्या हुआ है, यश? बता… मम्मी -पापा कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी, जैसे डरती हो कि कहीं खुद उसकी आवाज़ से उसकी दुनिया और ज़्यादा टूट न जाए।

    यश कुछ क्षण चुप रहा। उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ी रही और शब्द जैसे उसके गले में अटक गए हो। फिर वह अपने मम्मी -पापा से थोड़ी नज़रें चुराकर कहा, “वो दीदी… दी… वो पड़ोस वाली आंटी ने कहा है कि आप एक अजनबी आदमी के साथ उसके घर में अकेले रह रही हो और… और…”

    उसके शब्द अधूरे रह गए मगर रूहानी थोड़ा-थोड़ा समझ चुकी थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई जैसे कोई भूचाल आया हो उसके भीतर।

    “और क्या यश?” उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, मगर उसमें डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सख़्ती थी जो उसके टूटे हुए आत्मसम्मान को थामे हुए थी।

    तभी माँ की आवाज़ फिर गूँजी और इस बार उसमें नफ़रत की तपिश थी, आरोपों की आग।

    “वो क्या कहेगा, तुमने जब हमारे मुँह काले किए तब याद नहीं था क्या? जब पराए मर्द के साथ उसके घर में, उसके बिस्तर में… छी… मुझसे तो बोलते भी नहीं बनता है।”

    एक पल को समय जैसे ठहर गया। रूहानी का चेहरा फक पड़ गया। उसके होंठ काँप उठे, और उसका सारा शरीर जैसे बर्फ बन गया हो। माँ की बातों ने उसके भीतर की उस मासूम बच्ची को झकझोर दिया था, जो अब तक यही सोचती आई थी कि उसकी माँ उसे समझेगी कि कभी तो उसका दर्द एक दिन उनके सीने तक पहुँचेगा।

    लेकिन आज तो जैसे उसकी रूह तक को किसी ने चीर दिया था।

    उसने एक गहरी साँस ली, फिर उसकी आँखें जल उठीं, लेकिन उसमें आँसू नहीं, एक गुस्सा था…. ग़लत इल्ज़ामों के खिलाफ़ एक मौन विद्रोह।

    “ये आप क्या अनाप-शनाप बोले जा रही हैं, मम्मी?” उसकी आवाज़ थरथरा रही थी, मगर वो चुप नहीं रही। “आप किसी तीसरे की बातों में कैसे आ गईं? क्या आपने अपनी आँखों से मुझे कुछ भी ग़लत करते देखा है?”

    उसकी आवाज़ की कड़क अब किसी आंधी जैसी थी। वो अब तक उन दोनों की इज्जत करते आयी थी, लेकिन अब चुप रहना उसे गवारा नहीं था।

    रूहानी की आँखों में एक हज़ार सवाल थे। क्या उसके सपने देखने की आज़ादी इतनी बड़ी ग़लती थी? 

    क्या उसने कोई अपराध कर दिया क्योंकि उसने अपने लिए एक रास्ता चुना, जो उसकी माँ-बाप की सोच से अलग था? 

    क्या एक लड़की का अपने पैरों पर खड़े होने का हक़ नहीं?

    तभी रूहानी के पापा ने उसके गाल पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया जिसकी गूंज से रूहानई की माँ और उसका भाई दोनों एक दूसरे से चिपक से गए। 

    रूहानी के गाल पर वो तमाचा सिर्फ़ उसकी त्वचा नहीं, उसकी आत्मा तक को जला गया था। एक पल को समय ठहर गया, जैसे घर की दीवारें भी सहमकर चुप हो गई हों। 

    भानु प्रताप की गूंजती आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीरते हुए उसकी रगों में तूफान भर दिया, “बेशर्म तो तू पहले से ही थी, लेकिन चरित्रहीन भी हो जाएगी ये हमने कभी उम्मीद नहीं की थी। तेरी वही सब करतूत देखने के लिए ही क्या अब हमारी आंखें बची हैं?”

    रूहानी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था, पर उससे ज़्यादा काले वो शब्द थे जो उसके पिता के होंठों से निकले थे… तेज, नुकीले, और आत्मा को बींध देने वाले।

    रूहानी, वो वहीं आधे झुके हुए, अपने सुजे हुए गाल पर हाथ रखे, अपनी ही उलझनों में डूबी खड़ी थी। सन्नाटा, उसकी साँसों की रुकावट में तब्दील हो गया था। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे…. नहीं, अब तो वो भी सूख चुके थे, जैसे आत्मा रोते-रोते थक गई हो।

    रूहानी की आंखें कुछ पल के लिए पथरा गईं, गाल पर पड़ा हाथ अब कांपने लगा था, दर्द से नहीं, भीतर उमड़ते तूफान से। उसने कुछ नहीं किया था — ना कोई पाप, ना कोई छल, फिर भी हर बार वो ही क्यों दोषी बनती रही? अंदर से कोई चीख उठी, कोई घुटा हुआ आक्रोश जो बरसों से थमा हुआ था।

    “नहीं… बहुत हो गया…” उसने खुद से कहा, जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फूटने की तैयारी में हो।

    फिर एक लंबी, टूटी सांस लेकर, उसने एक ही बार में वो सब कह दिया जो उसकी रूह में बरसों से धंसा पड़ा था।

    “क्यों, पापा? क्या सिर्फ मेरी जननांग से आपकी इज़्ज़त जुड़ी है? क्या आपने मुझे बेटी बनाकर पाला था या कोई ‘इज़्ज़त का बक्सा’ बनाकर, जिसे जब तक ताला लगा रहे, तब तक आप शरीफ़ कहलाएं?”

    उसकी आवाज़ में ना चीख थी, ना सिसकी, बल्कि वो सन्नाटे का वो रूप थी जो कानों को फाड़ सकता था साथ ही दिल को भी चीर सकता था।

    “आपको मेरे हक़ से ज़्यादा मेरी देह की फिक्र क्यों है? मैं जीऊँ या मरूँ, आपको फर्क नहीं पड़ता….. बस इतना तय रहे कि मेरी देह किसी अजनबी की देह से ना छुए। क्या आपकी मर्दानगी इतनी सस्ती है कि मेरे ज़िंदा रहने से भी डर जाती है?”

    उसके शब्दों में जहर नहीं था, बल्कि वो सालों की पीड़ा थी, जो अब शब्दों के लिबास में बाहर आ रही थी।

    “जब मैं पुल से कूद कर मरने जा रही थी, उससे पहले आपको शर्म नहीं आई थी मुझे धिक्कारते हुए कहने में कि ‘तू हमारे लिए मर गई’। पर अब, जब मैं किसी की छत के नीचे साँस ले रही हूँ, तो आपको अपनी इज़्ज़त की चिंता सताने लगी?”

    उसका गला सूखने लगा था, पर शब्द नहीं रुके।

    “कौन-सी इज़्ज़त है ये, पापा, जो एक लड़की के पैरों के बीच से निकलकर आपके सीने में जाकर बसती है?”

    उसके ये शब्द जैसे दीवारों से टकराकर फिर उसके ही कानों में लौट आए। पर उससे पहले, उसकी मां ने जैसे खुद की बेइज़्ज़ती महसूस कर ली हो, तो उन्होंने उसके गाल पर एक और तमाचा मारा, फिर एक और। फिर वो बरसने लगी, न केवल हाथों से, बल्कि शब्दों से भी।

    “सही में सारी शरम-हया बेच कर खा गई है ये लड़की! बोलने से पहले लिहाज़ भी नहीं हुआ कि क्या-क्या बके जा रही है!”

    रूहानी कुछ कदम पीछे हट गई, पर उसकी आवाज़ अब भी टिकी रही, जैसे हर थप्पड़ के साथ और मजबूत हो रही हो।

    “तो आख़िर क्या ग़लत कहा मैंने?” उसने सवाल किया, पर उसमें कोई लड़ाई नहीं थी, बस थकावट थी। जैसे एक टूटे हुए इंसान ने अब लड़ने का बोझ उतार फेंका हो।

    तभी उसके पिता, गुस्से से कांपते हुए, लगभग चीखते हुए बोले, “बस! बहुत बोल लिया तूने और बहुत सुन लिया हमने!”

    उनकी आंखों में वो लाचारी थी जो हर उस पुरुष की आंखों में होती है जब उसकी ‘इज़्ज़त’ उसके नियंत्रण से बाहर जाने लगती है। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा, इतने ज़ोर से जैसे वो उसे अपनी ‘नाक कटने’ से बचाने के लिए किसी गहरी खाई से खींच रहे हों।

    “तुझे इसकी सज़ा मिलकर रहेगी।”

    और फिर वो उसे लगभग घसीटते हुए उस घर से बाहर निकाल ले गए, जैसे कोई अपराधी पकड़ा गया हो। पीछे-पीछे उसकी मां और छोटा भाई, जिनकी आंखों में सिर्फ़ शर्म और डर था। 

    रूहानी को इस पल में अपने पिता की पकड़ इतनी मजबूत महसूस हो रही थी, जैसे वह उसे किसी चट्टान की तरह घसीट रहे हो और वह उन चट्टानों के नीचे दबकर नष्ट हो जाएगी।

    उसका मन बेतहाशा उथल-पुथल कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह से खो चुकी थीं। उसकी दुनिया जैसे अंधेरे में डूब चुकी थी, जहां किसी भी उम्मीद का नामो-निशान नहीं था। वह जैसे एक खाली रास्ते पर चल रही थी, जहां न तो कोई मंजिल थी और न कोई वापसी का रास्ता।

    तभी रूहानी का मोबाइल उसकी नजरों के सामने गिर गया और उसके स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। लेकिन वह कुछ नहीं देख सकी। उसका मन वह था ही नहीं। 

    ———-

    रूहानी की आत्मा जैसे उथल-पुथल में थी, और हर शब्द, हर तमाचा, उसे और गहरे में ले जा रहा था। क्या उसके पास अब कोई रास्ता था, या ये उसका आखिरी संघर्ष था?

    क्या रूहानी की आत्मा इतनी टूट चुकी थी कि वो कभी खुद को फिर से नहीं पा सकेगी? 

    क्या अब भी कोई ऐसी उम्मीद है, जो उसे इस अंधेरे से बाहर निकाल सके?

    रूहानी की दुनिया अब सवालों में ढल चुकी थी, मगर क्या वह इन सवालों का जवाब कभी पा सकेगी?