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  • अधूरी इबादत भाग~11

    अधूरी इबादत भाग~11

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~11 दरवाज़े पर तूफ़ान

     

    कुछ दिन पहले 

    जब यश रूहानी से फोन पर बात कर रहा था। तभी यश को अपने पीछे से अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    वो कुछ पल वैसे ही खड़ा रहा, फोन अब भी उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन बुझ चुकी थी… ठीक वैसे जैसे उसके भीतर की रोशनी। 

    उसकी रूहानी दीदी की काँपती आवाज़ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी। एक अजीब सी चुप्पी कमरे में फैल गई थी, जैसे हर दीवार अब उसके जवाब चाहती हो।  

    “किससे बात कर रहे थे?” पिता की आवाज़ में उतनी ही सख्ती थी जितनी चिंता।

    यश, जो अभी-अभी फोन कट कर चुका था, थोड़ा हड़बड़ा गया। उसकी उंगलियाँ अब भी फोन की स्क्रीन पर ठहरी हुई थीं।

    “वो… दीदी थी…” उसने धीरे से कहा, आँखें नीचे कर लीं।

    उसके बोलते ही कमरे में जैसे सब कुछ थम गया। माँ ने चूल्हे पर रखी चाय की केतली को बंद कर दिया, जब उन्होंने यश के पिता की सख्त आवाज सुनी।

    “क्या कहा तुमने?” पिता की आवाज़ अब कुछ भारी हो गई थी।

    “द… दीदी से बात कर रहा था,” यश ने थोड़ा और स्पष्ट किया, लेकिन अब उसकी आवाज़ में भी डर था।

    “वो… ठीक हैं… मैंने बस पूछा कि कैसी हैं। मुझे उनकी फिक्र हो रही थी।”

    माँ की आँखों में नमी उतर आई। “कहाँ है वो?” उन्होंने लगभग फुसफुसाकर पूछा।

    यश ने सिर हिलाया, “पता नहीं माँ… लेकिन… लेकिन वो जिंदा हैं। उनकी आवाज़ बिलकुल वैसी ही थी। मैंने पूछा कि कब आओगी घर, तो…..”

    “बस!” पिता की आवाज़ तीर की तरह बरस पड़ी।

    “वो हमारे लिए मर चुकी है, यश। ये बात जितनी जल्दी समझो, उतना अच्छा होगा।”

    यह वाक्य यश के दिल को चीरता हुआ निकला। उसके भीतर कुछ टूटा, जैसे कोई काँच की परत हो जो अब तक उसके भीतर दीदी की यादों को सहेजे थी।

    यश ने आँखें मूंद लीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो दीदी की आवाज़ से खुश हो या इस घर की चुप्पी से डर जाए।

    यश ने फिर भी हिम्मत जुटाई, माँ की तरफ देखा, लेकिन उसकी आँखें अब कहीं और टिक चुकी थीं – शायद यादों की किसी पुरानी धूल भरी किताब पर।  

    उसे समझ नहीं आया कि दीदी से बात करना क्यों इतना गलत था?  

    यश ने धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ना शुरू किया, पीछे से किसी ने नहीं रोका, किसी ने नहीं पुकारा। शायद अब उस घर में रिश्ते नहीं, सिर्फ़ नाम बचे थे… और कुछ अधूरी बातें, जो अब भी दीदी की तरह कहीं हवा में टंगी थीं।

    सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था और आसमान पर एक हल्की नारंगी आभा छा गई थी। यश अपने कमरे में बैठा, अपनी दीदी के बारे में सोच रहा था। उसके मन में उथल-पुथल मची हुई थी, जैसे कोई तूफ़ान उसके भीतर उठ रहा हो।

    तभी बाहर से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। यश अपने कमरे के खिड़की की तरफ बढ़ा और परदे को हल्का सा खिसका कर झाँका। उसने देखा कि बाहर गली में पड़ोस वाली आंटी उसके माँ-पापा से बात कर रही थीं। उनके चेहरे पर चिंता और तीखी जिज्ञासा थी, जैसे कोई बड़ा रहस्य उजागर कर रही हों।

    यश ने कान लगाए तो उनकी आवाज़ें साफ़ सुनाई देने लगीं।

    “मैंने खुद देखा है, अपनी आँखों से,” वो कह रही थीं, “आपकी बेटी एक अजनबी के घर में जा रही थी। अकेली लड़की, इस उम्र में… और वो भी एक अनजान आदमी के घर? पता नहीं कौन है वो? कहाँ से आया? लेकिन इतना जरूर सुना है कि अकेले घर में रहता है और कोई है नहीं उसका उसे घर में…. पूरे मोहल्ले में तो यह बातें आग की तरह फैल रही हैं।”

    यश के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने देखा, माँ-पापा का चेहरा सुन पड़ गया था। माँ की आँखों में हैरानी और तकलीफ़ साफ झलक रही थी, जबकि पापा का चेहरा एकदम सख्त और कठोर हो गया था।

    “ये तो वाकई शर्म की बात है…” वो आगे बोलीं, “आप लोगों ने तो कहा था कि आपकी लड़की अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन अब तो पूरे मोहल्ले में बात फैलने लगी है। लोग सवाल कर रहे हैं। आपकी इज्ज़त का क्या होगा?”

    पापा ने मुश्किल से अपनी जबान पर काबू पाते हुए कहा, “धन्यवाद, आपका। हम देख लेंगे।”

    उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया।

    अंदर आते ही जैसे घर की हवा भारी हो गई। माँ सोफे पर बैठ गईं, उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे। पापा चुपचाप खड़े रहे, लेकिन उनके सख्त चेहरे से साफ था कि अंदर बहुत कुछ उबल रहा है। यश समझ गया था कि अब कोई तूफ़ान उठने वाला है।

    “यश!” पापा की आवाज़ गूंज उठी। “अभी फोन करो अपनी बहन को। पूछो उससे, किसके घर हमारी इज्ज़त नीलाम कर रही है।”

    यश ने काँपते हाथों से फोन उठाया और रूहानी का नंबर डायल किया। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर से कॉल किया, लेकिन इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया।

    “नहीं उठा रही है फोन,” यश ने धीरे से कहा।

    “तो अब हम क्या करें?” माँ ने घबराते हुए कहा। “लोग क्या कहेंगे? हमारी बेटी किसी अजनबी के घर में रह रही है और हमें कुछ पता ही नहीं।”

    पापा ने गहरी साँस ली और कहा, “हमें खुद जाकर देखना होगा। पता करना होगा कि वो कहाँ है और किसके साथ रह रही है।”

    यश ने सिर हिलाया और कहा, “मैं भी चलूँगा। मुझे भी दीदी से बात करनी है।”

    तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि वे उस जगह पर जाएंगे जहाँ उनकी पड़ोसन ने रूहानी को देखा था। 

    आज 

    कुछ दिनों की खोज खबर के बाद वे तीनों उस इलाके में पहुँच गए। उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की, और अंततः एक महिला ने बताया कि एक लेखक अद्वैत अवस्थी के घर में एक लड़की रह रही है, जो शायद आपकी रूहानी ही हो।

    वे सभी अद्वैत के घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया।

    दूसरे तरफ से रूहानी के पैर दरवाज़े की ओर बढ़े, लेकिन मन पीछे किसी तूफान में उलझा हुआ था। हाथ ने चिटकनी घुमाई, पर उंगलियाँ काँप रही थीं। दरवाज़ा खुला, और सामने जैसे समय रुक गया हो…

     

    लेकिन दरवाज़ा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और साँस अटक गई।

    दरवाज़े पर खड़े थे उसके और यश के माता-पिता। उनकी आँखों में गुस्सा, अपमान और अविश्वास की ज्वाला जल रही थी। रूहानी के होंठ काँपने लगे, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

    —— 

    क्या अब रूहानी के जवाब, सब कुछ बिखेर देंगे… या फिर कोई और सच उजागर होने वाला है, जिससे अब तक सब अनजान हैं?

    उस पल, दरवाज़े की दहलीज़ पर खड़ी रूहानी—क्या वो फिर से एक बार खो जाएगी… हमेशा के लिए?

  • अधूरी इबादत भाग~10

    अधूरी इबादत भाग~10

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~10 तूफ़ान से पहले

     

    सुबह की ठंडी हवा खिड़कियों से छनकर कमरे के भीतर उतर रही थी, लेकिन रूहानी के भीतर एक अनाम घबराहट की तपिश थी। उसने बार-बार अपनी हथेलियों को आपस में मसलते हुए खुद को शांत करने की कोशिश की, पर बेचैनी जैसे उसके भीतर से फूट रही थी। 

    अद्वैत आज सुबह जल्दी ही निकल गया था। एक पास के शहर में कवि सम्मेलन था, जहाँ उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। जाते समय उसने सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया था, कुछ कहा नहीं था। शायद कहने को कुछ था भी नहीं। दोनों के बीच अब तक जो दूरी थी, वह अनकही बातों से भरी थी।  

    रूहानी ने सोफे पर बैठते हुए गहरी सांस ली। दिल जैसे हल्का नहीं हो रहा था। हर कुछ मिनट पर उसे लग रहा था कि कुछ गलत होने वाला है, कुछ ऐसा जो उसकी समझ से परे है। वह इस अजीब सी भावना को झटकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर बार वह और गहरे उतरती जा रही थी।  

    मीना, जो चाय लेकर आई थी, उसकी खोई-खोई आँखों को देख नहीं पाई। उसने धीरे से चाय का कप सामने रख दिया और मुस्कुराते हुए कहा, “क्या हुआ मैडम, आप बहुत चुपचाप हैं आज? आपके पैर का घाव तो अब पूरी तरह ठीक हो गया है, कई दिन हो गए।”  

    रूहानी ने अनमने भाव से अपने तलवे की ओर देखा। वहाँ अब सिर्फ एक हल्का गुलाबी निशान बचा था, जैसे बीते दर्द की कोई फीकी याद। उसने धीमे से कहा, “हाँ, घाव तो ठीक हो गया है, लेकिन पता नहीं क्यों, आज मन बहुत बेचैन हो रहा है… जैसे कुछ बुरा होने वाला है।”  

    उसकी आवाज में एक ऐसी मासूमियत और डर था, जिसे सुनकर मीना का दिल पसीज गया। मीना ने अपने अनुभव से सीखा था कि कई बार दिल की बेचैनी कोई झूठा वहम नहीं होती, लेकिन फिर भी उसने रूहानी को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, “ज्यादा चिंता मत कीजिए मैडम। सब कुछ अच्छा ही होगा। अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है।”  

    रूहानी ने एक कमजोर मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन भीतर का तूफान अब भी थमा नहीं था।  

    उसने चाय का कप अपने हाथों में थामा और खिड़की के बाहर झांकने लगी – धूप हल्की थी, पेड़ धीरे-धीरे हिल रहे थे, सब कुछ सामान्य था… फिर भी दिल के किसी कोने में कोई साया मंडरा रहा था, कोई अनदेखा डर जो उसके भीतर घर कर गया था।

    मीना अब धीरे-धीरे रूहानी से खुलने लगी थी। घर के काम करते-करते वह अपनी चुप्पी तोड़ बैठी। उसकी आवाज़ में अपनापन घुला था, जैसे अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहती हो। उसने सिर झुकाए हुए कहा, “मैडम, आप जानती हैं, मेरे बच्चे की पढ़ाई का सारा खर्च अद्वैत सर उठाते हैं।”

    रूहानी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। मीना ने सफाई देते हुए आगे कहा, “मेरे पति बहुत शराबी थे। रोज़ पीकर घर आते, गाली-गलौच, मारपीट… सब सहती रही। लेकिन एक रात ज़्यादा पीकर कहीं गिर पड़े और फिर लौटकर नहीं आए।” उसकी आवाज़ में ना कोई पछतावा था, ना कोई आँसू…. बस एक थकान, जो बरसों के जिए हुए दुःख से आई थी।

    “उनके मरने के बाद मैंने घर-घर जाकर काम करना शुरू किया। एक दिन अद्वैत सर के पापा के यहाँ भी काम पर लगी। लेकिन…” मीना का चेहरा तनिक कस गया, “उनकी पत्नी को मैं कभी पसंद नहीं आई। रोज़ कोई न कोई गलती निकालती, डाँटतीं। कभी खाना खराब, कभी झाड़ू सही नहीं।”

    रूहानी चुपचाप सुनती रही। मीना ने आगे कहा, “फिर एक दिन सर आए। देखा कि मैं डाँट खा रही हूँ। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से मिलवाया और कहा — ‘मीना अब हमारे घर काम करेगी।’ बस तब से यहीं हूँ, सर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। हमेशा सम्मान दिया।”

    मीना के शब्दों में अद्वैत के लिए एक गहरा आदर था। रूहानी ने उसकी आँखों में वह चमक देखी, जो केवल उन लोगों की आँखों में होती है जिन्हें किसी ने टूटने से बचा लिया हो।

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही। मीना ने धीरे से झाड़ू एक कोने में टिकाई और हिचकिचाते हुए पूछा, “मैडम, आपके घरवाले क्यों नहीं आते आपको देखने?”

    यह सवाल हवा में तीर की तरह तना रह गया। रूहानी का दिल एक पल को जैसे रुक गया। उसने पलकों को झपकाया, अपने भीतर उठती कड़वी यादों को जब्त किया। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए, उसने नजरें चुराते हुए कहा, “ऐसा कुछ नहीं… वो सब बहुत दूर रहते हैं… व्यस्त होंगे शायद।”

    मीना ने उसकी आवाज़ में छुपे दर्द को महसूस कर लिया था, मगर उसने ज़्यादा कुरेदना सही नहीं समझा पर कमरे में जो मौन फैल चुका था, वह अब और भी गाढ़ा हो गया था।

    मीना ने माहौल को हल्का करने की कोशिश में फिर से बातचीत शुरू की। इस बार उसकी आवाज़ में हल्की उत्सुकता थी, “वैसे, आप क्या करती थीं, मैडम?”

    रूहानी ने एक पल को सोचा, क्या सच बताए या फिर वही आधा-अधूरा जवाब दे, जिसे सुनकर सामने वाला सवाल न बढ़ाए लेकिन मीना की आँखों में कोई छल नहीं था, बस एक सीधी-सादी जिज्ञासा थी।

    हल्की मुस्कान के साथ रूहानी ने कहा, “मैं ड्रेस डिजाइनर हूं।”

    मीना की आँखों में चमक आ गई। उसने पास आकर चहकते हुए पूछा, “अच्छा! तो आप तो बहुत बड़ी डिजाइनर होंगी न?”

    रूहानी ने हल्के से हँसते हुए सिर झुकाया। उसकी हँसी में एक थकी हुई सच्चाई थी।

    “नहीं, इतनी बड़ी भी नहीं,” उसने धीरे से कहा, “अभी तो बस… संघर्ष ही कर रही थी। खुद को साबित करने की कोशिश में थी।”

    मीना ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा। फिर फुर्ती से बोली, “अरे, आप तो बहुत अच्छा काम करती होंगी। कपड़े का डिजाइन बनाना कोई मामूली बात थोड़े न है।”

    रूहानी ने मीना की बात पर कुछ नहीं कहा। दिल के किसी कोने में मीना की मासूम प्रशंसा ने हल्का-सा सुकून दिया, जैसे कोई किसी बर्फीली रात में काँपते हुए कंधों पर चुपचाप एक गर्म चादर रख दे।

    लेकिन उसी सुकून के नीचे एक कड़वी सच्चाई भी थी कि किस तरह उसका सपना टूटने की कगार पर था, कैसे उसे अपने अस्तित्व के लिए भी लड़ना पड़ा था, कैसे अपने घरवालों के ठुकराए जाने के बाद उसके पास खुद के अलावा कोई सहारा नहीं बचा था।

    कमरे में फिर से चुप्पी छा गई। मीना अब अपने बर्तन समेट रही थी, उनकी आवाजें उस भारी सन्नाटे में टकरा कर रह रह कर गूंज रही थीं।

    मीना ने आखिरी कुर्सी पर कपड़ा मारते हुए कहा, “ठीक है, मैंने अपना काम कर दिया है, मैं जा रही हूं।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिलाया। उसकी मुस्कान फीकी थी, मगर आँखों में एक हल्का-सा अपनापन झलक गया था।

    मीना के जाते ही रूहानी ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद करते समय उसका हाथ कुछ पल के लिए हैंडल पर रुका, जैसे वह इस छोटे-से घर में पसरी एकाकी खामोशी से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हो।

    कमरे में फिर से वही पुरानी चुप्पी फैल गई। रूहानी ने गहरी साँस ली और खुद को संयत करते हुए सोचा कि आज शायद कुछ पल अपने लिए भी होंगे। लेकिन इस उम्मीद को वक़्त ने लंबा नहीं चलने दिया।

    कुछ ही देर में दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। रूहानी ने चौंक कर पलटकर दरवाजे की ओर देखा। उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उठी।

    “अब कौन?” उसने खुद से बुदबुदाया और धीमे कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी।

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने मीना खड़ी थी। हाथों में अपनी चुन्नी मरोड़ते हुए, आँखों में उम्मीद की चमक लिए।

    “अरे तुम?” रूहानी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा।

    मीना हड़बड़ाई-सी बोली, “मैडम, एक बात कहनी थी। आप तो ड्रेस डिजाइनर हो ना? मेरे बच्चों के लिए ड्रेस डिजाइन कर दोगी क्या?”

    उसकी आवाज़ में संकोच और एक मासूम उम्मीद दोनों थीं।

    रूहानी ने भौंहें चढ़ाकर पूछा, “ड्रेस?”

    मीना ने जल्दी-जल्दी समझाया, “वो क्या है ना, मेरी बेटी का जन्मदिन आने वाला है। एक ड्रेस देखी थी उसने बाजार में, बहुत पसंद आई है उसे। लेकिन बहुत महंगी है, मारे बस की नहीं। अगर आप वही ड्रेस बना दें… तो मेरी गुड़िया बहुत खुश हो जाएगी।”

    रूहानी के होंठों पर एक कोमल मुस्कान तैर गई। मीना की आँखों में एक माँ का प्रेम साफ़ चमक रहा था।

    रूहानी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हां, बना दूंगी। लेकिन मैं कोई बहुत फेमस डिजाइनर नहीं हूं। फिर भी, अपनी बेटी को ले आना। मैं उसके नाप की ड्रेस डिजाइन कर दूंगी।”

    मीना के चेहरे पर एक चमक आ गई, जैसे उसे कोई अनमोल तोहफा मिल गया हो। उसने बार-बार धन्यवाद कहा, फिर खुशी-खुशी पलट गई।

    रूहानी ने फिर दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में लौटते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बनी रही, जो मीना के भोलेपन से उपजी थी।

    लेकिन जैसे ही वह अपने बिस्तर के किनारे बैठी, पुराने विचार फिर से उसे घेरने लगे। उसने सोचा, “कितने दिन हो गए स्टूडियो गए हुए… सारा सामान वहीं रखा है।” एक कसक सी उसके भीतर उठी।

    “आज चली जाऊंगी,” उसने धीरे से खुद से वादा किया।

    मन में एक हल्का सा उत्साह जागा… शायद काम में खुद को डुबो कर वह इस अनजानी खालीपन से बच सकेगी।

    उसे लगा जैसे कोई चीज़ उसके भीतर फिर से सांस लेने लगी हो लेकिन उसकी ये सोच भी बस कुछ ही पल ठहरी।

    अचानक दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। इस बार दस्तक में थोड़ी जोर थी, थोड़ी बेसब्री भी।

    रूहानी ने झल्लाकर बड़बड़ाया, “अब क्या है, मीना?”

    तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ते हुए उसने चिटकनी घुमाई और दरवाजा खोल दिया।

    लेकिन दरवाजा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और सांस अटक गई।

    ——

    कौन था वह, जो इस बार मीना नहीं थी? 

    क्यों उसकी आंखों में अचानक डर की परछाई दौड़ गई? 

    क्या वही अनजानी आशंका अब हकीकत बनने जा रही थी?

  • अधूरा रिश्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “यार, तेरी सगाई पक्की हो गई!”

     

    दोस्त की बात सुनकर आदित्य के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। घर में भी कई दिनों से खुशियों का माहौल था। रिश्ता कोई अनजान परिवार में नहीं, बल्कि अपने ही रिश्तेदारों में तय हुआ था। लड़की का नाम जानवी था। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए आदित्य को लगा कि इससे अच्छा रिश्ता शायद ही कहीं मिलेगा।

     

    सगाई में जब पहली बार उसने जानवी की उंगली में अंगूठी पहनाई, तो उसकी आँखों में ढेर सारे सपने थे। लेकिन जानवी की आँखों में वह चमक नहीं थी। आदित्य ने सोचा, “शायद शर्माती होगी।”

     

    सगाई के बाद आदित्य रोज़ उसे मैसेज करता।

    “कैसी हो?”

    “ठीक हूँ।”

     

    बस इतना ही जवाब आता।

     

    आदित्य कई बार सोचता कि शायद जानवी नई ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को लेकर घबराई हुई है। इसलिए उसने कभी उस पर सवालों की बारिश नहीं की। वह हर छोटे-छोटे मौके पर उसे खुश करने की कोशिश करता। कभी उसकी पसंद की किताब भेज देता, तो कभी बिना किसी वजह के फूल। लेकिन हर बार जानवी सिर्फ “थैंक यू” लिखकर बात खत्म कर देती। आदित्य रात-रात भर उनकी आने वाली ज़िंदगी के सपने देखता, जबकि जानवी उन्हीं रातों में अपने फैसले को लेकर बेचैन होकर रोती रहती। दोनों एक ही रिश्ते में बंधे थे, लेकिन उनके दिल दो बिल्कुल अलग रास्तों पर चल रहे थे। एक तरफ सच्चा प्यार था, तो दूसरी तरफ मजबूरी और छिपा हुआ सच।

     

    वह घंटों उसके रिप्लाई का इंतज़ार करता, लेकिन जानवी कभी खुद से बात शुरू नहीं करती थी। आदित्य फिर भी यही सोचकर खुश रहता कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।

     

     

     

    धीरे-धीरे उसने शादी के सपने बुनने शुरू कर दिए। उसने अपने कमरे की दीवार पर उनकी सगाई की तस्वीर लगा दी। मोबाइल के वॉलपेपर पर भी जानवी की मुस्कुराती तस्वीर थी। वह अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी उसी से जोड़ चुका था।

     

    एक दिन आदित्य ने जानवी से कहा,

    “अगर तुम्हें कहीं घूमने का मन हो तो बताना, शादी से पहले परिवार के साथ चलेंगे।”

     

    जानवी ने सिर्फ इतना कहा,”देखते हैं।”

     

    उसका हर जवाब ऐसा ही होता। आदित्य को कभी-कभी अजीब लगता, लेकिन उसने कभी ज़बरदस्ती नहीं की।

     

    उधर जानवी एक ऐसे सच के साथ जी रही थी, जिसे बताने की हिम्मत उसमें नहीं थी।

     

    वह कॉलेज के दिनों से रोहन नाम के लड़के से प्यार करती थी। दोनों कई सालों से साथ थे। लेकिन जब घरवालों ने रिश्तेदारों में उसका रिश्ता तय किया, तो वह अपने परिवार के सामने कुछ बोल नहीं पाई। उसने सोचा, शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।

     

    लेकिन वक्त के साथ उसकी बेचैनी और बढ़ती गई।

    शादी की तारीख अब सिर्फ एक महीने दूर थी।

     

    एक शाम आदित्य बड़े प्यार से जानवी के लिए उसकी पसंद का सूट लेकर उसके घर पहुँचा। वह उसे सरप्राइज़ देना चाहता था।

     

    कमरे के बाहर पहुँचते ही उसे अंदर से किसी की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “जानवी… आखिर कब तक ये सब चलेगा?”

     

    आदित्य रुक गया।

     

    जानवी रोते हुए कह रही थी,

    “रोहन, मैं मजबूर हूँ। मैं घरवालों को मना नहीं कर पाई।”

     

    रोहन बोला,

    “लेकिन तुम किसी और से शादी कैसे कर सकती हो? तुमने तो मुझसे साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं।”

     

    ये सुनते ही आदित्य के हाथ से गिफ्ट का बैग नीचे गिर गया।

     

    अंदर दोनों चौंक गए।

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आदित्य की आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ बिल्कुल शांत थी।

     

    “एक बात पूछूँ, जानवी?”

     

    वह सिर झुकाकर खड़ी रही।”क्या तुम उससे प्यार करती हो?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद जानवी ने धीरे से कहा,

    “…हाँ।”

     

    बस एक शब्द…

    और आदित्य के सारे सपने उसी पल टूट गए।

     

    उसने काँपती आवाज़ में पूछा,”तो फिर मुझसे सगाई क्यों की? एक बार सच बता देती… मैं खुद पीछे हट जाता।”

     

    जानवी फूट-फूटकर रोने लगी।

    “मैं डर गई थी… मुझे लगा घरवाले कभी नहीं मानेंगे।”

     

    आदित्य ने गहरी साँस ली।

     

    “घरवालों से डर गई… लेकिन मेरी ज़िंदगी के बारे में एक बार भी नहीं सोचा?”

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    आदित्य चुपचाप वहाँ से चला गया।

     

    उस रात उसने अपने कमरे की दीवार से सगाई की तस्वीर उतार दी। मोबाइल का वॉलपेपर बदल दिया। लेकिन यादें… उन्हें कहाँ हटाया जा सकता था।

     

    अगले दिन दोनों परिवार आमने-सामने बैठे।

     

    सबको सच्चाई पता चली।

     

    घर में गुस्सा, रोना और आरोपों का दौर शुरू हो गया।

     

    तभी आदित्य ने सबको रोकते हुए कहा,

     

    “किसी को दोष मत दीजिए। गलती सिर्फ इतनी हुई है कि सच समय पर नहीं बोला गया।”

     

    फिर उसने जानवी की ओर देखकर कहा,

     

    “अगर आज भी तुम्हारा दिल रोहन के लिए धड़कता है, तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। रिश्ता भरोसे से चलता है, मजबूरी से नहीं।”

     

    इतना कहकर उसने अपनी सगाई की अंगूठी उतारी और मेज़ पर रख दी।

     

    उस पल कमरे में बैठे हर इंसान की आँखें नम थीं।

     

    कुछ दिनों बाद जानवी की शादी रोहन से हो गई।

     

    उधर आदित्य ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। उसने किसी से शिकायत नहीं की, लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं रहा।

     

    जो लड़का हर समय हँसता था, अब मुस्कुराने से पहले भी सोचता था।

     

    महीनों बाद एक दिन उसकी मुलाकात अपने पुराने स्कूल के शिक्षक से हुई।

     

    उन्होंने पूछा,

    “कैसे हो बेटा?”

     

    आदित्य मुस्कुराया और बोला,

    “ठीक हूँ।”

     

    शिक्षक ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा,

     

    “बेटा, ज़िंदगी में हर इंसान तुम्हारी किस्मत नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ तुम्हें मज़बूत बनाने आते हैं।”

     

    ये बात उसके दिल में उतर गई।

     

    उसने धीरे-धीरे खुद को सँभालना शुरू किया। परिवार के साथ समय बिताने लगा। अपने अधूरे सपनों को पूरा करने में लग गया।

     

    कई साल बाद एक शादी में उसकी मुलाकात फिर से जानवी से हुई।

     

    दोनों की नज़रें मिलीं।

     

    जानवी की आँखों में पछतावा था।

     

    वह धीरे से बोली,

    “मुझे माफ़ कर दोगे?”

     

    आदित्य हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि नफ़रत लेकर जीने से ज़्यादा मुश्किल कुछ नहीं होता।”

     

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

     

    उस दिन जानवी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि धोखा सिर्फ रिश्ता नहीं तोड़ता, किसी के भरोसे और मासूमियत को भी हमेशा के लिए बदल देता है।

     

    और आदित्य…

     

    उसने उस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में साथ निभाने नहीं, बल्कि हमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाने आते हैं।

  • रहस्यमयी गांव

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    1.  गाँव जहाँ कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था

    राजस्थान की ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था अंधेरपुर। देखने में यह गाँव बिल्कुल साधारण था। चारों तरफ हरियाली, मिट्टी के घर, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और खेतों में मेहनत करते लोग। लेकिन इस गाँव का एक ऐसा नियम था, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता था।

     

    उस गाँव की ज़मीन पर कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था।

     

    अगर किसी औरत को गर्भ ठहर जाता, तो जैसे ही सातवाँ या आठवाँ महीना शुरू होता, पूरे परिवार वाले उसे शहर ले जाते। वहीं अस्पताल में बच्चे का जन्म कराया जाता और कुछ दिनों बाद माँ और बच्चा वापस गाँव लौट आते।

     

    गाँव के बाहर वालों को यही बताया जाता कि गाँव में अस्पताल नहीं है, इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन गाँव के लोग जानते थे कि इसके पीछे एक ऐसा राज़ छिपा है, जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता।

     

    इसी गाँव में नई-नई शादी होकर आई थी जानवी। वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत ही सरल स्वभाव की लड़की थी। शादी के कुछ महीनों बाद जब उसे पता चला कि वह माँ बनने वाली है, तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। लेकिन उसी खुशी के साथ सबके चेहरों पर एक अजीब-सा डर भी उतर आया।

     

    एक रात जानवी ने अपनी सास से पूछा,

    “माँ जी… मैं कई दिनों से देख रही हूँ कि सब लोग किसी बात को लेकर परेशान हैं। आखिर बात क्या है?”

     

    सास ने गहरी साँस ली और बोली,

    “बेटी… समय आने पर तुम्हें शहर ले जाया जाएगा। बस इतना याद रखना कि इस गाँव में कोई बच्चा पैदा नहीं होता।”

     

    जानवी ने हैरानी से पूछा,”लेकिन क्यों?”

    सास ने उसकी तरफ देखा और बोली,

    “इस सवाल का जवाब हमारे पास भी नहीं है… बस यही परंपरा है।”

    अब जानवी की बेचैनी और बढ़ गई। उसे लगा कि ज़रूर कोई बहुत बड़ा राज़ छिपाया जा रहा है।

    एक दिन वह गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला दादी कमला के पास पहुँची।

    “दादी, मुझे सच जानना है। आखिर ऐसा क्यों होता है?”

    दादी कमला ने चारों तरफ देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोलीं,

    “अगर सच सुनना चाहती हो, तो आज रात पुराने बरगद के पेड़ के पास आ जाना।”

     

    रात गहरा चुकी थी। पूरा गाँव सो चुका था। जानवी धीरे-धीरे बरगद के पास पहुँची। वहाँ दादी पहले से उसका इंतज़ार कर रही थीं।

     

    दादी ने कहना शुरू किया,”आज से करीब सौ साल पहले इस गाँव में धरा नाम की एक दाई रहती थी। पूरे इलाके में उससे अच्छा प्रसव कोई नहीं कराता था।”

     

    “एक दिन गाँव के ज़मींदार की बहू को प्रसव पीड़ा हुई। धरा ने पूरी कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। माँ और बच्चा दोनों नहीं बच सके।”

     

    “ज़मींदार गुस्से से पागल हो गया। उसने अपनी गलती छिपाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी ठहरा दिया।”

     

    “बिना कोई सबूत, बिना कोई सुनवाई… लोगों ने धरा को ज़िंदा जला दिया।”

     

    जानवी की आँखों से आँसू निकल आए।

    दादी की आवाज़ भर्रा गई।

    “मरते समय धरा ने बस इतना कहा था…”

    ‘जिस मिट्टी ने मेरे साथ अन्याय देखा है, अब इस मिट्टी पर किसी बच्चे की पहली साँस कभी नहीं गूँजेगी।’

     

    “उस दिन के बाद जो भी बच्चा इस गाँव में पैदा हुआ… वह कुछ ही मिनटों में मर गया।”

    “पहले किसी ने यकीन नहीं किया, लेकिन जब कई नवजात बच्चों की मौत हो गई, तब पूरे गाँव ने फैसला किया कि अब कोई भी बच्चा इस गाँव में पैदा नहीं होगा।”

    जानवी सारी रात सो नहीं पाई।

    समय बीतता गया। उसका नौवाँ महीना शुरू होने वाला था। परिवार वाले शहर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक लगातार कई दिनों तक इतनी तेज़ बारिश हुई कि गाँव की सभी सड़कें टूट गईं।

    नदियाँ उफान पर थीं।

    शहर जाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।पूरा गाँव डर से काँप उठा।

    लोग कहने लगे,

    “अगर इस बार बच्चा यहीं पैदा हुआ… तो फिर वही होगा जो हमेशा होता आया है।”

    इसी बीच जानवी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

    घर में अफरा-तफरी मच गई।

    कोई भगवान से प्रार्थना कर रहा था, कोई रो रहा था।

     

    दादी कमला ने जानवी का हाथ पकड़कर कहा,

    “डरना मत बेटी… जो होगा, देखा जाएगा।”

    कुछ घंटों बाद पूरे घर में एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    सभी लोग साँस रोककर खड़े थे।

    एक मिनट…

    दो मिनट…

    पाँच मिनट…

    दस मिनट…

    लेकिन बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

    तभी अचानक ज़मीन ज़ोर से काँपी।

     

    पुराना बरगद बीच से टूटकर गिर पड़ा।

    उसकी जड़ों के नीचे से एक पुराना लोहे का संदूक दिखाई दिया।

    गाँव वालों ने उसे बाहर निकाला।

     

    उसके अंदर कुछ सोने के गहने और एक पुरानी डायरी रखी थी।डायरी ज़मींदार की थी।

     

    गाँव के मास्टर जी ने उसे पढ़ना शुरू किया।

    उसमें लिखा था “धरा निर्दोष थी। मेरी बहू की मौत मेरी लापरवाही से हुई थी। मैंने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी बना दिया। अगर कभी यह डायरी किसी को मिले… तो धरा से माफ़ी माँग लेना।”

     

    यह सुनते ही पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    जिस औरत को सौ साल तक लोग दोषी मानते रहे…

    वह तो बिल्कुल बेगुनाह थी।

     

    हर किसी की आँखों से आँसू बहने लगे।

    अगले दिन पूरे गाँव ने उसी जगह धरा की याद में एक छोटी-सी समाधि बनाई।

     

    सबने हाथ जोड़कर उससे माफ़ी माँगी।

    उस रात गाँव के कई लोगों ने एक जैसा सपना देखा।

    सफेद कपड़ों में एक औरत मुस्कुराते हुए गाँव से दूर जा रही थी।

    जाते-जाते उसने कहा—

    “अब किसी माँ की गोद सूनी नहीं रहेगी।”

    कुछ महीनों बाद गाँव की दूसरी बहू भी गर्भवती हुई।

     

    इस बार किसी ने उसे शहर नहीं भेजा।

    सबके दिलों में डर तो था, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज़्यादा थी।

    समय आया…

    और पूरे गाँव की मौजूदगी में एक और बच्चे का जन्म हुआ।

    इस बार भी बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    उस दिन पूरे गाँव में ढोल बजे।

    हर घर में मिठाइयाँ बाँटी गईं।मंदिर में दीप जलाए गए।

    लोगों की आँखों में खुशी के आँसू थे।

     

    जिस गाँव में कभी बच्चों की किलकारी सुनना एक सपना था…

    आज वही गाँव मासूम हँसी से गूँज रहा था।

     

    तब से अंधेरपुर की पहचान डर से नहीं, बल्कि एक सीख से होने लगी

    किसी बेगुनाह के साथ किया गया अन्याय कभी खत्म नहीं होता, जब तक सच सामने आकर न्याय न दिला दे।

     

  • अधूरी इबादत भाग~9

    अधूरी इबादत भाग~9

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    भाग~9 खोई नहीं हूँ मैं

    कमरे में चुप्पी घुली थी, जैसे दीवारें भी उसके भीतर उठते-गिरते ज्वार की साक्षी बन गई हों। रूहानी की उंगलियां अब भी मोबाइल को थामे कांप रही थीं, जबकि स्क्रीन बहुत पहले ही बुझ चुकी थी। कॉल कटने की वो छोटी सी ‘बीप’ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी, जैसे कोई अटकी हुई सांस, जो पूरी निकलने से पहले ही दबा दी गई हो।

    यश की रुआंसी आवाज, माँ-बाबा के कठोर शब्द, सब उसके भीतर किसी पुराने घाव की तरह फिर से रिसने लगे थे। पल भर को रूहानी का मन किया कि वो फिर से फोन मिलाए, यश से बात करे, उससे पूछे कि अब वह ठीक तो है ना। पर अगले ही पल उसे खुद को रोकना पड़ा। वह जानती थी, अच्छी तरह जानती थी कि चाहे माँ-बाबा उसे अपने जीवन से काट चुके हों, पर यश अब भी उनका दुलारा बेटा था। उस पर हाथ उठाने या उसकी अनदेखी करने का सवाल ही नहीं था। यश, वो बेटा जिसे उन्होंने बरसों की तपस्या के बाद पाया था, उसके लिए तो उनके दिलों में अब भी असीम प्रेम था।

    इसी सोच ने उसे थोड़ी राहत दी, पर उस राहत की परत के नीचे जो कसक थी, वह कम नहीं हुई।

    धीरे से उसने मोबाइल को सिरहाने रखा और अपने पैरों की ओर देखा। पैर के तलवे पर पट्टी बंधी थी, पर पट्टी के बीच से झांकता दर्द अब भी धड़क रहा था। रूहानी ने पल भर को अपनी पलकों को भींच लिया, जैसे अपनी ही नजरों से खुद को बचाना चाहती हो। फिर एक धीमी, कसैली हँसी उसके होठों से फिसल गई।

    “अकेली,” उसने खुद से बुदबुदाया, “एकदम अकेली।”

    उसने अपने घायल पैर को हलके से सीधा किया। चुभन अब भी थी, पर उससे भी ज्यादा चुभन उसके मन में थी। खुद पर गुस्सा, खुद से नाराजगी। क्यों? क्यों वो इस हालत में आई थी? क्यों उसे लगा था कि मर जाने से सब कुछ बदल जाएगा? क्यों उसने सोचा था कि दुनिया इतनी आसान है कि बस एक फैसला, एक कदम और सब कुछ वैसा हो जाएगा जैसा वह चाहती थी?

    कमरे की धुंधली रोशनी में उसे अपनी ही परछाईं दीवार पर लहराती दिखी। एक टूटी हुई परछाईं, जिसमें अब कोई ठोस आकृति नहीं बची थी।

    “अब पड़े रहो,” वह खुद से फुसफुसाई, “इस अजनबी घर में, उस अजनबी आदमी के साथ… जब तक ये घाव भर नहीं जाते, तब तक कहीं जा भी नहीं सकती।”

    उसके शब्दों में जितनी कड़वाहट थी, उतनी ही असहायता भी। अद्वैत के घर में शरण लेना उसकी मजबूरी थी, न कि उसकी मर्जी। वो जानती थी कि अद्वैत उससे कोई उम्मीद नहीं रखता, न ही उसे यहाँ देखकर कोई खुशी होती थी, पर उसकी चुप्पी… उसकी चुप्पी उसे कहीं भीतर से चुभ रही थी।

    रूहानी ने अपने घुटनों को सीने से लगाकर खुद को और छोटा कर लिया, जैसे अपनी ही बाहों में छिप जाना चाहती हो।

    उसकी आँखों के कोनों से आंसू बह निकले, चुपचाप, बिना किसी आवाज के। वह रोई नहीं, बस बहने दिया उन आंसुओं को, जैसे बहाव ही उसकी सजा हो। उसने खुद से कहा, “तुम्हीं ने चुना था ये रास्ता, तुम्हीं को सहना भी होगा।”

    उसके दिल का सन्नाटा कमरे के भीतर भी उतर आया। हर चीज़ थम गई थी — धड़कनें, साँसें, उम्मीदें।

    एक पल के लिए उसे माँ-बाबा की वो आँखें याद आई, जो कभी उसके लिए आशीर्वाद थी और अब सिर्फ नफरत से भरी थीं। कैसे एक पल में वे लोग, जो उसके जीवन का आधार थे, उसे अपने जीवन से मिटा चुके थे। सिर्फ इसलिए कि उसने अपने लिए जीने की जुर्रत की थी?

    अचानक उसकी स्मृतियों में वह क्षण कौंध उठा जब अद्वैत ने उसे मृत्यु के मुख से खींच लाया था, जैसे किसी सूखते प्राण में फिर से प्राणवायु भर दी हो। आज फिर वही हाथ, उसके दूसरे पाँव को क्रूर कांच के टुकड़े से बचा गया था… एक चुप, मगर सजीव पहरेदार की तरह। 

    तभी रूहानी के भीतर कोई गहरी, शांत आवाज उठी—”नहीं… मैं विलीन नहीं हुई हूँ, मैं अब भी हूँ… पूर्ण और धड़कती हुई।”

    उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं, दर्द से, डर से, और कहीं न कहीं, जिद से भी। उस अजनबी कमरे में, उस अजनबी के घर में, वह अपने अस्तित्व की छोटी सी लौ को थामे हुए थी।

    धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब सी शांति फैलने लगी। एक ऐसा सन्नाटा जो बाहर के शोर से अलग था। यह सन्नाटा अंदर से आ रहा था, जैसे उसकी आत्मा ने हार मानने से इनकार कर दिया हो।

    ——–

    अद्वैत की सुबह हमेशा की तरह खामोशी के आवरण में लिपटी थी। सूरज की किरणें धीरे-धीरे खिड़कियों के पर्दों के नीचे से कमरे में घुसने लगी थीं, लेकिन अद्वैत को उजाले से कोई खास वास्ता नहीं था। वह नीचे रसोई में चुपचाप दराज खींच रहा था, जैसे हर ध्वनि से बचना चाहता हो। चाय के कपों के आपस में टकराने की धीमी सी आवाज कमरे के सन्नाटे को हल्के से चीरती थी। वही धीमा सधा हुआ स्पर्श, वही अभ्यस्त मौन, लेकिन आज इस मौन में कुछ और भी घुला था — एक अनजानी, अनकही उपस्थिति।

    रूहानी, जो अद्वैत के सुझाये गए रसोई से सटे कमरे में थी, अधजगी सी हालत में लेटी थी। उसकी पलकों के बीच नींद और जागृति का झीना सा परदा था। रसोई से आती हल्की आहटें, कप-प्लेट के टकराने की आवाजें उसके कानों में रिसती रहीं। उसे एहसास हुआ कि अद्वैत रसोई है — उसी घर में, उसी सांसों की लय में, बस कुछ कमरों की दूरी पर। कोई संवाद नहीं, कोई आमना-सामना नहीं, फिर भी उसकी उपस्थिति पूरे घर में महसूस हो रही थी, जैसे दीवारों में उसकी थकी हुई आत्मा की गूँज भरी हो।

    रूहानी ने कराहते हुए करवट ली। उसके सूजे हुए चेहरे पर कल रात के आँसुओं की कहानी अब भी बाकी थी। बाल बेतरतीबी से बिखरे थे, आँखों के नीचे गहरे साए थे। दर्द और थकान की मिश्रित परछाइयाँ उसकी देह पर पसरी हुई थीं। उसके घाव अब भी रिसते थे — न सिर्फ तलवों पर लगे घाव, बल्कि दिल के भी। 

    उसी वक्त अद्वैत, गलती से या शायद किसी अनकही बेचैनी के वश में, उसके कमरे के सामने से गुजरा। अनायास उसकी नजर कमरे के भीतर चली गई और वहाँ रूहानी को यूँ टूटा-बिखरा देखकर वह कुछ पल के लिए जैसे वहीं थम गया।  

    उसकी आँखें अनजाने ही रूहानी के सूजे चेहरे, नम पलकों और बिखरे बालों पर टिक गईं। उस पल अद्वैत के भीतर कोई अनचाहा मंथन उठ खड़ा हुआ। वह जो अब तक खुद को दुनिया से काट चुका था, जिसने अपनी पीड़ा को ताले में बंद कर दिया था, आज एक अनजान लड़की के दुःख से क्यों जुड़ रहा था? क्यों उसकी पीड़ा उसे अपने लंबे, सूने अकेलेपन की याद दिला रही थी?

    अद्वैत का गला अचानक भारी लगने लगा। भीतर एक कसक उठी जो उसे असहज कर गई। उसके भीतर का एक हिस्सा उसे झिड़क रहा था — क्यों देख रहा है? क्यों महसूस कर रहा है? यह तेरी लड़ाई नहीं है। लेकिन एक और हिस्सा था, जो फुसफुसा रहा था — यह पीड़ा पहचानी हुई है। यह वही खालीपन है जिसे तूने भी जिया है।

    उसकी उंगलियाँ दरवाजे के फ्रेम पर कस गईं। वह एक क्षण को भीतर जाने का सोचता है, फिर खुद को रोक लेता है। खुद पर गुस्सा आता है — इस बेबसी पर, इस अनचाही करुणा पर। 

    वह जानता था कि रूहानी एक अजनबी है, बस संयोग से उसके जीवन में आ गई है। और फिर भी, उसका टूटा हुआ चेहरा देखकर अद्वैत के भीतर बीते दिनों की एक रेखा खिंच गई थी। उसे अपनी पत्नी की आखिरी रात याद आ गई — जब उसने भी ठीक ऐसे ही बिस्तर पर बेजान पड़ी, थकी हारी आँखों से उसे देखा था। 

    एक टीस ने अद्वैत के सीने को चीर दिया। वह जानता था कि यह तुलना गलत थी। रूहानी उसकी पत्नी नहीं थी। यह अतीत को वर्तमान पर थोपना था। लेकिन भावनाएँ तर्क की राह कब चलती हैं?

    उसने धीरे से आँखें मूँद लीं, जैसे खुद को इस क्षण से अलग करना चाहता हो। फिर कदम पीछे खींच लिए, बमुश्किल खुद को कमरे से दूर किया।  

    लौटते हुए उसके कदम भारी थे, जैसे हर कदम उसके भीतर उठती हूक को और गहरा कर रहा हो। रसोई में लौटकर उसने दो कपों में चाय डाली। चाय के धुएं में उसकी आँखें फिर से उस सूजे चेहरे की परछाई खोजने लगीं। 

    अद्वैत चुपचाप कुर्सी पर बैठा रहा। चाय का कप हाथ में थामे, लेकिन पीने की कोई जल्दी नहीं। उसकी नजरें खिड़की के पार जाने कहाँ भटक रही थीं। 

    उधर, रूहानी धीरे से उठ बैठी थी। पैर का दर्द हल्का चुभ रहा था, लेकिन दिल का दर्द कहीं गहरा था। नीचे से आती हल्की-हल्की आहटें अब उसे चुभती नहीं थीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। जैसे यह जान लेना कि कोई और भी घर में है, खुद में एक दवा बन गया हो। 

    वह जानती थी, अद्वैत से उसे कोई सहारा नहीं माँगना चाहिए। न कोई आस लगानी चाहिए। फिर भी, उसकी उपस्थिति — यह जानना कि वह अकेली नहीं है — एक नर्म, चुप सांत्वना की तरह उसके दिल के किसी कोने में फैलने लगी थी।  

    उसने खुद को सँभाला, गहरी साँस ली और अपने पैरों को बिस्तर से नीचे सरकाया। दर्द की एक लहर उसके तलवों से होते हुए पूरे जिस्म में दौड़ गई। वह जानती थी कि उसे अभी लंबा सफर तय करना है — न केवल शारीरिक घावों से उबरने का, बल्कि उस दिल के घावों से भी जिन्हें वह जाने कब से अपने भीतर छुपाती आई थी।

    और अद्वैत अपने ही विचारों के घेरे में फँसा चाय के कप से उठते धुएँ को ताक रहा था — जैसे उसमें से अपने सवालों के जवाब तलाश रहा हो, जिन्हें उसने खुद से पूछने की भी हिम्मत अब तक नहीं जुटाई थी। 

    दोनों चुप थे। दोनों अकेले थे। फिर भी एक महीन, अदृश्य धागे से एक-दूसरे से बंधने लगे थे — बिना बोले, बिना कहे।

    ——

    क्या अद्वैत अपनी बंद दुनिया के दरवाजे रूहानी के लिए खोलेगा? 

    या फिर दोनों अपनी-अपनी तन्हाइयों में डूबे रह जाएंगे? 

    क्या दर्द के पुराने साये उन्हें जोड़ेंगे या फिर और दूर कर देंगे?

  • अधूरी इबादत भाग~8

    अधूरी इबादत भाग~8

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~8 नाम तक मिटा दिया

    अद्वैत उस बंद दरवाज़े के सामने खड़ा था, जो बरसों से अपने पीछे ना जाने कितनी कहानियाँ छुपाए खड़ा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव था, जैसे वह खुद को इस पल के लिए भीतर से तैयार कर रहा हो। उसकी उंगलियाँ चाबी पर कस गई थीं। पल भर को उसने अपनी सांस रोक ली, फिर धीरे से चाबी घुमाई।

    चटक की एक धीमी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला। जैसे ही अद्वैत ने दरवाज़े को धकेला, एक हल्की सी धूल भरी खुशबू उसके चेहरे से टकराई। वह भीतर कदम रखा और एक पल को उसकी आँखों के आगे उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे उलटने लगी।

    यह कमरा कभी उसके सबसे करीब था। उसकी आत्मा का एक कोना।

    दीवार के साथ सजी किताबों की लंबी-लंबी कतारें थीं, जैसे समय को पकड़ कर रखने की एक नाकाम कोशिश हो। मोटी जिल्द वाली, पुरानी, धुंधली किताबें, जिनके कवर अब फीके पड़ चुके थे। किताबों के बीच-बीच में कुछ डायरी भी थीं, जिनके किनारे झड़ने लगे थे।  

    कमरे में जो भी था, उसे एक पाठक सह लेखक के घर का कमरा होना बता रहा था। 

    कमरे के एक कोने में खिड़की के पास एक स्टडी टेबल था। उस पर फैले हुए कागज, आधी लिखी चिट्ठियाँ और खाली पड़े पन्ने। कुछ चिट्ठियाँ ऐसी थीं, जिनके किनारे मुड़े हुए थे, शायद गीले हो जाने के कारण। जैसे कोई आँसू उनमें चुपके से समा गया हो।

    अद्वैत धीमे कदमों से भीतर चला आया। उसकी चाल में नरमी थी, जैसे वो इस कमरे की नींद को तोड़ना न चाहता हो। उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें धूल और बीते हुए समय की महक घुल गई थी।

    यह सिर्फ वही जानता था कि क्यों उसने इस कमरे को बंद रखा था?

    क्यों मीना को साफ़ करने से मना किया था?

    क्योंकि यह कमरा उसकी आत्मा का सबसे कोमल हिस्सा था, जिसे वह दुनिया की नजरों से छुपाकर रखना चाहता था।

    फिर अद्वैत ने दरवाजे के पीछे से डस्टर और वाइपर निकाले। उसकी चाल में एक सधी हुई थकावट थी, जैसे वो हर कदम के साथ अपने भीतर किसी भारी बोझ को उठाने का साहस जुटा रहा हो।

    उसने डस्टर को कस कर पकड़ा और सबसे पहले दीवार से सटी किताबों की अलमारी की ओर बढ़ा। एक-एक करके किताबों के ऊपर जमी धूल हटाते हुए, उसकी उंगलियाँ किताबों की रीढ़ पर रेंगती चली गईं। जैसे हर किताब, हर कवर, हर स्पाइन पर उसके किसी बीते पल की परछाई बैठी हो।

    कुछ किताबों को छूते ही उसके चेहरे पर बिछी एक उदास मुस्कान हल्की सी तैर जाती। कोई पुराना शेर, कोई भूली-बिसरी कविता, कोई प्रेम कहानी… सब जैसे उसे पुकार रही थीं।

    कमरा धीरे-धीरे सांस लेने लगा। किताबें चमकने लगीं, अलमारियाँ मुस्कुराने लगीं।

    फिर वह स्टडी टेबल के पास की खिड़की तक चला गया। खिड़की से बाहर झांकते हुए उसने एक थकी हुई मुस्कान के साथ आसमान को देखा। बादल गहरे हो चले थे, जैसे कोई भी पल में बारिश फूट पड़ेगी।

    फिर भी वहां एक अलग सी संजीदगी थी, एक अलग सी तपिश। उसने डस्टर को और भी मुलायम हाथों से पकड़ा, जैसे किसी अपने के माथे से धूल हटाता हो। टेबल के हर कोने को उसने साफ किया, छोटे-छोटे खरोंचों को अपनी हथेली से सहलाया, मानो उन निशानों में दबी कहानियों को फिर से जीना चाहता हो।

    टेबल के किनारे रखे चिट्ठियों के बंडल पर नजर पड़ी तो उसने एक पल के लिए आँखें मूँद लीं। सांसें जैसे थोड़ी देर को थम गईं। फिर बहुत धीरे से, जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ खोल रहा हो, उसने उन चिट्ठियों को अपने सामने रखा।

    कमरा अब पूरी तरह से साफ था। एक कोमल, शांत, मगर भारी हवा वहाँ बह रही थी।

    अद्वैत कुर्सी पर बैठ गया। उसकी उंगलियाँ एक चिट्ठी पर फिसलीं, फिर उसने पहली चिट्ठी उठाई। चिट्ठी के शब्द पढ़ते ही, उसकी आँखों के किनारे भीगने लगे। उसने चिट्ठी को अपने सीने से लगा लिया।

    पलकों के नीचे से कुछ गर्म बूँदें बह निकलीं। उसने आँखें बंद कर लीं और उन लम्हों में लौट गया जब वह दुनिया की भीड़ में सबसे अकेला नहीं था, जब उसका दिल किसी और के दिल की धड़कनों के साथ धड़कता था।

    एक-एक कर वह सारी चिट्ठियाँ पढ़ता गया। कहीं हँस पड़ता, कहीं साँसें भारी हो उठतीं। कभी उंगलियों से अक्षरों को छूता, मानो उन्हें आत्मा में समेट लेना चाहता हो।

    समय थम-सा गया था। हर चिट्ठी बीते कल की धुंध में उसे डुबोती चली जाती।

    आखिरी चिट्ठी हाथ में थी। उसने धीरे से उसे खोला, जैसे शब्दों के साथ कोई सपना टूट सकता हो। उसे भी पढ़कर उसने चिट्ठी को बहुत प्यार से मोड़ा और पूरे बंडल को फिर से एक किनारे रख दिया।

    इसके बाद उसने पास रखे नये कोरे कागजों के बंडल में से एक चिट्ठी निकाली। जिसमे कागज की खुशबू नई थी, लेकिन अद्वैत के भीतर सब कुछ पुराना था।

    उसने कलम उठाई। एक गहरी सांस ली और लिखता चला गया। 

    जब चिट्ठी पूरी हुई, उसने उसे बाकियों के बंडल में रख दिया। बहुत सहेज कर, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो।

    फिर उसकी नजर टेबल के बीचोंबीच रखे छोटे से फ्रेम पर पड़ी। उसने तस्वीर को उठाया।

    वह तस्वीर जिसमें वह और उसकी पत्नी एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। इतनी सच्ची, इतनी गहरी मुस्कान कि आज भी उसमें जीवन की गर्माहट बाकी थी।

    उसने अपनी उंगलियाँ बहुत प्यार से उसके चेहरे पर फेरीं। जैसे वह उसके गालों को छू रहा हो, जैसे उसकी हँसी को महसूस कर रहा हो।

    फिर तस्वीर को वापस उसी जगह रख दिया और अपनी ठुड्डी टेबल पर टिकाकर वह तस्वीर को एकटक देखता रहा।

    उसके भीतर कुछ भी बोल नहीं रहा था। सब कुछ बस महसूस हो रहा था।

    कमरे में केवल दीवारों की साँसे थीं, धूल की हल्की खुशबू थी और अद्वैत के दिल की नमी थी।

    बाहर बारिश थम चुकी थी। बादलों के बीच कहीं एक हल्की सी धूप झाँक रही थी।

    अद्वैत ने तस्वीर को देखते हुए बुदबुदाया – “तुम अब भी यहीं हो… हमेशा।”

    उसके शब्द हवा में घुल गए, दीवारों में समा गए और शायद उसके दिल की गहराइयों में कहीं बैठ गए।

    —–

    उधर कमरे में रूहानी फोन के उस पार अपनी घुटती आवाज़ में सवाल कर रही थी, “यश! मां-बाबा अभी भी गुस्से में हैं?” उसकी आवाज़ में वह कम्पन था जो टूटे हुए सपनों और बिखरे हुए रिश्तों से उठता है, जैसे पतझड़ की रात में बर्फीली हवा किसी वीरान पेड़ की शाखों को कंपा देती है।

    यश — यशवर्धन चौहान — जो रूहानी से उम्र में करीब 9-10 साल छोटा था, उस पल खुद भी टूटा हुआ सा महसूस कर रहा था। उसके गले में भरा हुआ दर्द जैसे हर शब्द को कांपता बना देता। रुआंसी आवाज़ में वह बोला, “दीदी… मां-बाबा तो तुम्हारा नाम तक नहीं ले रहे हैं। अगर मैं तुम्हारा जिक्र भी कर दूं… तो मुझे भी डांट कर कहते हैं कि इस घर में अब आपका नाम कोई नहीं लेगा।”

    यश की आवाज जैसे फिसलती चली गई और अगले ही पल वह फोन पर फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना नंगे पांव किसी वीराने में भटकते बच्चे का विलाप था, जो हर सुनने वाले के दिल को चीर सकता था। वह घुटती सांसों के बीच बिखरे लफ्जों में कहने लगा, “माँ-बाबा ने तो यहाँ तक कह दिया है… कि अब आप हमारे लिए म… म… मर चुकी हो।”

    यह सुनते ही रूहानी के भीतर कुछ चटक कर टूट गया। उसकी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे जैसे किसी सूखी नदी को अचानक बाढ़ ने छू लिया हो। वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं सकी। लेकिन भाई उसकी रोती हुई आवाज़ न सुन ले, इसलिए उसने अपने होठों को दांतों के बीच जकड़ लिया, इतना ज़ोर से कि शायद खून भी छलक आया हो… पर दर्द का एहसास उस पल उसके दिल के टूटने के आगे बौना था।

    फोन के उस पार यश की आवाज़ फिर आई, हिचकियों के बीच काँपती हुई, मासूम और बेबस, “दीदी, तुम मेरे लिए कभी नहीं मर सकती… माँ-बाबा ने कितनी आसानी से कह दिया… दीदी, माँ-बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    उसके शब्द रूहानी के दिल में गहरी दरारें डालते जा रहे थे, जैसे बर्फ़ की एक शांत झील अचानक भीतर से टूटने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, कुछ ऐसा जो यश के भी टूटे हुए दिल को सहला दे, उसे यह यकीन दिला दे कि प्यार कभी नहीं मरता, कि रूह कभी अलग नहीं होती। लेकिन उसकी जुबान जैसे पत्थर बन गई थी, शब्द गले में अटक कर रह गए।

    तभी यश के तरफ से रूहानी को फोन पर अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    उस आवाज़ ने जैसे दोनों के होश उड़ा दिए। यश एकदम सहम गया, उसकी साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं और रूहानी का तो गला ही सूख गया, जैसे किसी ने उसके भीतर के सारे पानी को सोख लिया हो।

    —————

    क्या अद्वैत उस कमरे में दबी किसी भूली हुई सच्चाई से फिर टकराने वाला था?

    क्या रूहानी के अतीत की कोई दरार अब वर्तमान को भी निगलने वाली थी?

    वो तीखी आवाज़… क्या एक नया तूफान दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था?

  • अधूरी इबादत भाग~7

    अधूरी इबादत भाग~7

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~7 “My Life” कौन?

    रूहानी का मोबाइल टेबल पर वैसे ही पड़ा था, जैसे कोई चुपचाप बम घड़ी हो, जो किसी भी पल फट सकती है। अद्वैत अब भी फर्श पर बैठा था, फर्स्ट ऐड बॉक्स एक तरफ रखा हुआ, उसका ध्यान पूरी तरह रूहानी पर था। उसकी उंगलियाँ अभी तक हवा में ठहरी हुई थीं, जैसे वे अब भी दर्द से कराहते पाँव की ओर बढ़ना चाहती हों, लेकिन रूहानी के शब्दों ने रोक दिया था।

    और तभी… मोबाइल की स्क्रीन पर हल्की रौशनी फूटी और उसमें एक नाम उभरा—“My Life”।

    अद्वैत की नज़र उस स्क्रीन पर जा ठहरी।

    उसके चेहरे की भाव-भंगिमा धीरे-धीरे बदलने लगी। उसकी आँखें थोड़ी सिकुड़ीं, जैसे कुछ गहराई में देखने की कोशिश कर रही हों। अभी तो रूहानी ने कहा था कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है, तो फिर ये “My Life” कौन था? कौन हो सकता था जिसकी पहचान रूहानी ने इतनी आत्मीयता से अपने फोन में दर्ज कर रखी थी?

    एक खामोशी तैरने लगी, जो पल भर में भारी होने लगी।

    रूहानी की नज़र भी मोबाइल की स्क्रीन पर पड़ी, और उसने बिजली की तरह झपट कर फोन उठा लिया। कॉल कट करते हुए उसने मोबाइल अपनी हथेलियों में छिपा लिया जैसे कोई बच्चा चोरी पकड़े जाने पर अपना खिलौना छुपा लेता है।

    वो जानती थी, अद्वैत कुछ पूछ सकता है, उसकी निगाहों में अब भी सवाल थे, शक था, लेकिन उसे मौक़ा दिए बिना रूहानी जल्दी से बोल पड़ी—आवाज़ में एक तरह की बनावटी सहजता थी, पर भीतर कुछ काँप रहा था।

    “तो फिक्स रहा ना, मैं कुछ दिनों के लिए यहाँ रह सकती हूँ ना?” उसने जल्दी से पूछा, जैसे किसी और दिशा में ध्यान मोड़ देना चाहती हो।

    अद्वैत की चेतना उस फोन स्क्रीन पर अटक गई थी, लेकिन रूहानी की बात ने उसे उस विचार से बाहर खींच लिया।

    “हाँ,” अद्वैत ने एक छोटे से विराम के बाद कहा, “यहाँ रसोई से लगा हुआ एक कमरा है, उसमें रह लेना। और खबरदार जो छत पर आने की कोशिश की तो।”

    उसके स्वर में आदेश था, हल्की चेतावनी थी, और कहीं भीतर एक अदृश्य दीवार भी, जो उसने खुद के और रूहानी के बीच खड़ी कर दी थी। शायद वो नहीं चाहता था कि कोई उस छत तक पहुँचे—वो छत जहाँ कई अधूरी कहानियाँ छुपी थीं।

    “वैसे,” अद्वैत ने अब अपना सिर थोड़ा झुकाया, जैसे ज़्यादा सहज होने की कोशिश कर रहा हो, “तुम किराया देने की बात कर रही थी ना, तो क्या करती हो तुम… मतलब क्या प्रोफेशन है तुम्हारा?”

    रूहानी की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई। ऐसा लगा जैसे उस प्रश्न ने उसकी पहचान को फिर से छू लिया हो, जैसे एक मुरझाए फूल को हल्की सी धूप मिल गई हो।

    उसने हल्का मुस्कराते हुए कहा, “वो मैं… एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूं।”

    उसकी आवाज़ में हल्की थकान थी, लेकिन उसके शब्दों में उम्मीद का रंग था।

    “फिलहाल तो मेरा काम ठप्प पड़ा हुआ है,” उसने थोड़ी सी सांस ली, “लेकिन मेरे कुछ सेविंग्स हैं, जिसमें से मैं तुम्हें किराया दे दूंगी। कोई दिक्कत नहीं होगी।”

    वो जैसे खुद को साबित करना चाह रही थी। उसके लहज़े में विनम्रता थी, पर साथ ही एक आत्म-सम्मान भी।

    फिर उसने अपने कंधे हल्के से उचकाए, जैसे वो खुद से कह रही हो, “मैं अभी पूरी टूटी नहीं हूँ, अभी कुछ बचा है मुझमें।”

    अद्वैत ने उसकी ओर देखा, उसकी मुस्कान को, उसके टूटे आत्मबल के बीच से झाँकते उस गर्व को। कुछ पल के लिए वो अपनी ज़ुबान से कुछ न कह सका।

    वो देख रहा था उस लड़की को, जो कुछ ही घंटे पहले मौत के किनारे खड़ी थी, और अब अपने हुनर, अपने संघर्ष पर मुस्कुरा रही थी।

    उसके बाद अद्वैत ने अपने हाथ में झाड़ू और डस्टपैन थामा और सावधानी से फर्श पर बिखरे कांच के टुकड़ों को समेटना शुरू किया। हर टुकड़ा जो उसने उठाया, जैसे किसी बीती कहानी का एक टुकड़ा था—चुभता हुआ, चमकता हुआ, खामोश। कमरे में कुछ नहीं बोला जा रहा था, लेकिन हर हरकत में जैसे कई अधूरी आवाज़ें गूँज रही थीं। अद्वैत की उंगलियाँ नुकीले कांच से बचती हुई फुर्ती से चल रही थीं, लेकिन उसका ध्यान अब भी रूहानी पर था, जो अब तक सोफे पर स्थिर बैठी थी।

    रूहानी की साँसें थोड़ी तेज थीं, दर्द तो था, मगर उससे ज़्यादा कुछ और… कोई अंदरूनी हलचल, जो उस लम्हे से बाहर निकलने ही नहीं दे रही थी।

    जब आखिरी टुकड़ा भी डस्टबिन में गिरा, तो अद्वैत वापस रूहानी के पास आया। उसका चेहरा पहले से कुछ शांत था, जैसे उसने खुद से एक लंबी बहस के बाद कोई निर्णय लिया हो। उसने अपना दायाँ हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए सहज स्वर में कहा, “चलो, खाना खाने।”

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल के लिए उसकी आँखें उस हाथ को निहारती रहीं, जैसे किसी अजनबी की पेशकश को परख रही हों। फिर उसने धीरे से अपनी पलकों को कुछ बार झपकाया—धीरे, थमे हुए क्षण में जैसे आँखें कुछ भीगती हुई कहानियाँ पोंछ रही हों। उसके चेहरे पर अब भी दर्द था, मगर वह अद्वैत का हाथ पकड़कर, एक पैर के सहारे, खुद को खींचती हुई उठी और उसके सहारे डाइनिंग टेबल तक पहुँची।

    अद्वैत ने उसे हाथ से थामे रखा, लेकिन उसने कहीं भी उसे छूने की कोशिश नहीं की। उसने रूहानी को सहारा दिया, बिना कोई अनचाहा बोझ बनें। इस दूरी में एक अनकही नज़दीकी थी, जैसे दोनों एक ही पुल पर चल रहे हों, बस अलग-अलग किनारों पर।

    डाइनिंग टेबल के पास पहुँचकर अद्वैत ने कुर्सी खींची और रूहानी को बैठने में मदद की। फिर चुपचाप फ्रिज की ओर बढ़ गया, जैसे वह अपनी भावनाओं को भी वहीं किसी ठंडे कोने में रख आया हो। उसने दो प्लेटें निकालीं, माइक्रोवेव में खाना गर्म किया और फिर दोनों के सामने सादगी से परोस दिया।

    रूहानी चुपचाप उसे देखती रही, उसके हर हावभाव को जैसे किसी पुरानी किताब के पन्नों की तरह पढ़ती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यही व्यक्ति कुछ घंटे पहले कितना खड़ूस और तटस्थ लग रहा था।

    खाना परोसा गया और दोनों चुपचाप खाने लगे।

    सन्नाटा कमरे की हवा में घुला था, जैसे हर दीवार उसे महसूस कर रही हो। रूहानी को यह खामोशी खलने लगी। वह जो आम तौर पर चुलबुली, बातूनी थी, अब खुद को किसी साए में दबा हुआ महसूस कर रही थी।

    उसने एक कौर मुँह में डालते हुए धीरे से पूछा, “तुम्हें लेखक बनने का बुखार कब चढ़ा था?”

    अद्वैत ने बिना सिर उठाए पहले एक पल रुक कर कौर चबाया, फिर हल्की भौंहें चढ़ाकर उसकी तरफ देखा। आँखें थोड़ी छोटी हो गईं, जैसे बात को समझने की कोशिश कर रहा हो या शायद अंदाज़ा लगाने की, कि यह सवाल मज़ाक में था या जिज्ञासा में।

    रूहानी ने अपनी बात स्पष्ट की, “मीना बता रही थी कि तुम एक प्रसिद्ध लेखक हो।“

    अब अद्वैत का चेहरा थोड़ा सहज हुआ, जैसे उसे अपनी किसी छुपी हुई पहचान को अब स्वीकारना पड़ रहा हो।

    “दूसरी बात यह है कि मैं बहुत छोटे से ही लिखता आ रहा हूँ,” उसने शांत स्वर में कहा।

    “वो….अच्छा…” रूहानी ने हौले से सिर हिलाया। लेकिन तभी उसके दिमाग में एक बात कौंधी। उसने तुरंत पूछ लिया, “तो फिर पहली बात क्या है?”

    अद्वैत ने एकदम से कौर मुँह में डालते हुए कड़क स्वर में कहा, “पहली बात ये है कि खाते हुए बातें करना मुझे पसंद नहीं।”

    रूहानी के होंठ थोड़ा से सिकुड़े, उसने बुदबुदाते हुए कहा, “खड़ूस नहीं तो…”

    उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद अद्वैत ने नहीं सुनी, या शायद जानबूझकर अनसुनी कर दी।

    बाकी खाना चुपचाप ही निपटा। उस खामोशी में कहीं अद्वैत के मन का ठहराव था और रूहानी की बेचैनी। दोनों के भीतर बहुत कुछ उथल-पुथल मचा हुआ था, मगर बाहर सिर्फ सन्नाटा पसरा था।

    खाना खत्म होने के बाद अद्वैत ने प्लेटें उठाईं, बिना एक शब्द कहे, और फिर वापस आकर रूहानी को सहारा देते हुए उसके कमरे तक पहुँचा दिया।

    रूहानी को कमरे के भीतर पहुँचा कर उसने दरवाज़े के पास एक क्षण ठहर कर देखा। कुछ कहने की चाह चेहरे पर तैरती रही, लेकिन होंठ बंद ही रहे। वह मुड़ा और सीढ़ियों की ओर चल दिया—धीमे, शांत कदमों से, जैसे कोई अधूरी बात को पीछे छोड़ता चला गया हो।

    रूहानी कमरे में अकेली रह गई। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ ही उसने एक गहरी साँस ली, और अपनी जगह बैठते ही मोबाइल उठाया। उसकी उंगलियाँ काँप रहीं थीं। कुछ पल उसे समझ ही नहीं आया कि वो क्या कर रही है।

    फिर उसने कॉल लॉग खोला, और “My Life” को दोबारा कॉल बैक कर दिया।

    फोन मिलते ही दूसरी तरफ से कोई हल्की आवाज़ आई, लेकिन रूहानी की आँखों में आँसू भर आए। उसका गला रुंध गया। वो फूट पड़ी।

    “किसी को पता तो नहीं है कि तुम मुझे कॉल कर रहे हो ना…” उसकी आवाज़ भारी थी, टूटी हुई।

    ———

    आखिर ये ‘My Life’ कौन था?

    अद्वैत… क्या वाकई वो सिर्फ काँच समेट रहा था, या उन टुकड़ों में रूहानी का कोई और सच भी ढूँढ़ रहा था?

    अब क्या वो दोनों सिर्फ किरायेदार और मकान मालिक रहेंगे, या कोई पुराना ज़ख्म अचानक खुलने वाला है?

     

  • रात को रोशनी वाला पेड़

    रात को रोशनी वाला पेड़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    गाँव के किनारे एक पुराना आम का पेड़ खड़ा था। दिन में वह बिल्कुल साधारण लगता। पत्ते हरे, तना मोटा, जड़ें धरती में गहरी धँसी हुई। बच्चे उसके नीचे खेलते, बूढ़े बैठकर बातें करते। लेकिन रात होते ही वह पेड़ बदल जाता। अँधेरे में उसकी शाखाओं से हल्की सी सुनहरी रोशनी फूटने लगती। इतनी मंद कि दूर से कोई नोटिस न करे, लेकिन पास जाने पर दिल थाम ले।

     

    अनिका पहली बार उस पेड़ को रात में देखी थी जब वह शहर से गाँव लौटी थी। माँ की बीमारी की खबर मिलते ही वह आ गई थी। घर पहुँचते-पहुँचते रात हो चुकी थी। माँ सो रही थीं। अनिका बेचैन होकर बाहर निकली। चाँद नहीं था। अँधेरी कच्ची सड़क पर चलते हुए अचानक उसने देखा दूर एक पेड़ हल्के सुनहरे रंग से जगमगा रहा है।

     

    वह पास गई। रोशनी पत्तों के बीच से झर रही थी जैसे कोई अदृश्य दिया जल रहा हो। अनिका ने तने पर हाथ रखा। गर्माहट थी। अजीब सी शांति। उसने फुसफुसाकर पूछा, “यह क्या जादू है?” कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ पत्तियाँ सरसराईं।

     

    अगली रात वह फिर गई। इस बार एक बुजुर्ग आदमी भी वहाँ बैठा था। गाँव के सबसे पुराने रहने वाले दादा जी। उन्होंने अनिका को देखकर मुस्कुराया। “पहली बार देख रही हो न?”  

     

    अनिका ने सिर हिलाया। “यह रोशनी कहाँ से आती है?”  

     

    दादा जी ने लंबी साँस ली। “बहुत पुरानी बात है। तुम्हारे बाबा के बाबा के जमाने की। उस समय यहाँ एक लड़का रहता था सूरज। और एक लड़की चांदनी। दोनों इस पेड़ के नीचे मिलते थे। परिवार वाले मानते नहीं थे। एक रात दोनों ने यहीं बैठकर वादा किया कि चाहे कुछ भी हो, वे एक-दूसरे को कभी नहीं छोड़ेंगे। लेकिन अगले ही हफ्ते सूरज को शहर भेज दिया गया। चांदनी यहाँ रह गई। हर रात वह इस पेड़ के नीचे आकर रोती। एक दिन उसने पेड़ से कहा ‘अगर मेरी आवाज़ उसे पहुँच सके…’ और उसी रात पहली बार पेड़ में रोशनी जगी।”

     

    अनिका चुपचाप सुनती रही। दादा जी ने आगे कहा, “सूरज कभी नहीं लौटा। चांदनी बुढ़ापे तक इसी पेड़ के नीचे बैठती रही। मरते समय उसने कहा था कि रोशनी तब तक जलती रहेगी जब तक कोई सच्चा दिल वाला इसे समझ न ले।”

     

    अनिका के मन में कुछ हलचल हुई। माँ बीमार थीं। डॉक्टर ने कहा था कि समय कम है। अनिका दिन भर माँ की सेवा करती, रात को चुपके से पेड़ के पास चली जाती। कभी बैठी रहती, कभी पेड़ से बातें करती जैसे कोई पुराना दोस्त हो। “माँ ठीक हो जाएँगी न?” वह पूछती। पत्तियाँ सिर्फ हिलतीं। लेकिन रोशनी हर रात पहले से थोड़ी तेज लगती।

     

    एक रात अनिका देर तक बैठी रही। अचानक रोशनी में हल्की सी हलचल हुई। लगा जैसे कोई धीरे से गुनगुना रहा हो। आवाज़ परिचित थी माँ की। अनिका काँप गई। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं। फिर रोशनी के बीच से माँ की आवाज़ साफ सुनाई दी, “बेटा, डरना मत। कुछ रिश्ते पेड़ों में बस जाते हैं।”

     

    अनिका रो पड़ी। उसने पेड़ को कसकर पकड़ लिया। “माँ… आप?”  

     

    आवाज़ फिर आई, इस बार और साफ। “मैं यहाँ हूँ। और जब तक तुम मुझे याद रखोगी, मैं यहीं रहूँगी।”

     

    उस रात अनिका घर लौटी तो माँ की हालत पहले से बेहतर थी। डॉक्टर हैरान थे। माँ ने आँखें खोलकर अनिका का हाथ थामा और मुस्कुराईं। “रात को मैंने सपना देखा। एक रोशनी वाला पेड़… और तुम उसके नीचे बैठी थी।”

     

    अनिका ने कुछ नहीं कहा। बस माँ के माथे पर हाथ फेरा।

     

    दिन बीतते गए। माँ धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगीं। अनिका अब हर रात पेड़ के पास जाती। कभी अकेली, कभी माँ को लेकर। माँ पेड़ के नीचे बैठकर पुरानी बातें बतातीं अपनी शादी की, अनिका के बचपन की, और उन दिनों की जब गाँव में बिजली नहीं थी और लोग दीयों से काम चलाते थे।

     

    एक रात माँ ने कहा, “इस पेड़ की रोशनी सिर्फ यादों की नहीं है। यह उन दिलों की है जो अधूरे रह गए। जो कह नहीं पाए, जो मिल नहीं पाए। तुम जब भी अकेली महसूस करना, यहाँ आ जाना।”

     

    अनिका ने पूछा, “क्या सूरज और चांदनी कभी मिले थे?”  

     

    माँ ने सिर हिलाया। “नहीं। लेकिन उनकी रोशनी अब भी जल रही है। मतलब वे कहीं न कहीं साथ हैं।”

     

    गाँव में धीरे-धीरे बात फैल गई। लोग रात को पेड़ के पास आने लगे। कोई अपनी मुश्किल बताता, कोई चुपचाप बैठता। रोशनी कभी कम होती, कभी ज्यादा। लेकिन कभी बुझती नहीं थी। अनिका ने नोटिस किया कि जब कोई सच्चा दिल लेकर आता, रोशनी और चमक उठती।

     

    एक शाम अनिका शहर वापस जाने वाली थी। माँ अब ठीक थीं। उसने पेड़ से विदा ली। “मैं लौटूँगी,” उसने कहा। पत्तियों ने जवाब में सरसराहट की। रात को जब वह ट्रेन पकड़ने निकली, तो दूर से पेड़ की रोशनी दिखी इस बार थोड़ी सी चांदनी जैसी सफेद। अनिका मुस्कुराई।

     

    शहर में अनिका व्यस्त हो गई। ऑफिस, फ्लैट, भीड़। लेकिन हर रात सोने से पहले वह आँखें बंद करके उस पेड़ को याद करती। कभी-कभी सपने में वह पेड़ के नीचे बैठती और माँ की आवाज़ सुनती। एक रात सपने में सूरज और चांदनी दोनों दिखाई दिए। वे पेड़ के नीचे हाथ थामे खड़े थे। सूरज ने अनिका की ओर देखा और कहा, “रोशनी तुम्हारे पास है। इसे जलाए रखना।”

     

    महीनों बाद अनिका फिर गाँव आई। माँ ने गले लगाया। शाम होते ही दोनों पेड़ के पास पहुँचे। रोशनी पहले जैसी ही थी नरम, सुनहरी, दिल को छू लेने वाली। अनिका ने पेड़ के तने पर अपना सिर टिकाया। “मैं वापस आ गई,” उसने फुसफुसाया।  

     

    हवा चली। पत्तियों ने जवाब दिया। लगा जैसे कोई कह रहा हो “हम जानते थे।”

     

    उस रात अनिका ने फैसला किया कि वह गाँव में ही रहेगी। शहर की चमक छोड़कर इस रोशनी को चुन लिया। उसने पेड़ के नीचे एक छोटी सी बेंच रखवाई। लोग आने लगे। कोई अपनी कहानी लिखकर छोड़ जाता, कोई दीया जलाकर रख देता। लेकिन असली रोशनी हमेशा पेड़ की ही रहती।

     

    साल बीत गए। अनिका की शादी हुई। उसका बेटा जब पाँच साल का हुआ तो पहली बार रात को पेड़ दिखाया। बच्चे ने आँखें फाड़कर देखा। “मम्मी, यह जादू है?”  

     

    अनिका ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा। लेकिन यह जादू दिल से जलता है।”  

     

    बच्चे ने पेड़ को छुआ। रोशनी थोड़ी और चमक उठी।  

     

    अब भी जब गाँव में रात होती है, वह आम का पेड़ जलता है। कोई नहीं जानता कि रोशनी कहाँ से आती है। कोई कहता है पुरानी यादें हैं, कोई कहता है प्रेम की बाकी बची हुई साँसें। लेकिन जो भी उसके नीचे बैठता है, उसे लगता है कि वह अकेला नहीं।  

     

    अनिका कभी-कभी रात के तीसरे पहर अकेली वहाँ चली जाती है। तने से लगकर बैठती है और फुसफुसाती है, “धन्यवाद।” पत्तियाँ हिलती हैं। रोशनी थोड़ी तेज हो जाती है। और अँधेरी रात में एक पेड़ चुपचाप जलता रहता है उन सबके लिए जो कभी अधूरे रह गए थे, और उन सबके लिए जो अभी भी पूरा होना चाहते हैं। 

  • संत धन्ना जी महाराज लोकगाथा

    संत धन्ना जी महाराज लोकगाथा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    संत धन्ना जी की लोकगाथा

     

    राजस्थान के टोंक जिले के पास एक छोटा-सा गांव था। गांव की गलियां कच्ची थीं, घर मिट्टी के बने थे और लोगों का जीवन खेती-बाड़ी पर निर्भर था। उसी गांव में एक किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया—धन्ना।

     

    धन्ना बचपन से ही दूसरे बच्चों से थोड़ा अलग था। जहां गांव के बच्चे खेलते-कूदते, वहीं धन्ना अक्सर खेतों की मेड़ पर बैठकर आसमान को निहारता रहता। कभी वह पेड़ों से बातें करता तो कभी गाय-बछड़ों के पास बैठकर उन्हें प्यार से सहलाता।

     

    उसकी मां अक्सर कहती, “धन्ना, तू इतना चुपचाप क्यों रहता है बेटा?”

     

    धन्ना मुस्कुराकर कहता, “मां, मैं भगवान से बात करता हूं।”

     

    मां हंस देती, “अरे पगले, भगवान से भी कोई बात करता है?”

     

    धन्ना बड़े विश्वास से कहता, “क्यों नहीं मां? अगर भगवान सबके हैं, तो मेरे भी तो हैं।”

     

    धीरे-धीरे धन्ना बड़ा होने लगा। उसके पिता खेती करते थे और धन्ना भी उनके साथ खेतों में काम करने लगा। सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाता और खेतों की ओर चला जाता। मिट्टी में काम करते हुए भी उसके मन में हमेशा भगवान का नाम रहता।

     

    एक दिन गांव में एक साधु आए। उनके साथ कुछ भक्त भी थे। वे भगवान की भक्ति और संतों की महिमा के बारे में बातें कर रहे थे। धन्ना भी चुपचाप उनके पास जाकर बैठ गया।

     

    साधु ने कहा, “भगवान को पाने के लिए बड़े-बड़े यज्ञ, धन-दौलत या महल जरूरी नहीं हैं। भगवान तो सच्चे मन से पुकारने पर मिल जाते हैं।”

     

    धन्ना ने तुरंत पूछा, “बाबा, अगर कोई सच्चे मन से भगवान को पुकारे, तो क्या भगवान सच में उसके पास आते हैं?”

     

    साधु मुस्कुराए, “हां बेटा, अगर पुकार सच्ची हो तो भगवान को आना ही पड़ता है।”

     

    धन्ना के मन में यह बात बस गई।

     

    उसने साधु से कहा, “बाबा, मुझे भी भगवान चाहिए।”

     

    साधु ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, “भक्ति कर बेटा। भगवान को अपना समझकर भज। वह जरूर मिलेंगे।”

     

    उस दिन के बाद धन्ना की भक्ति और गहरी हो गई। वह भगवान को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगा। सुबह उठकर उनसे बातें करता, खेत में काम करते समय उन्हें याद करता और रात को सोने से पहले उन्हें अपनी दिनभर की सारी बातें बताता।

     

    एक दिन धन्ना ने साधु से पूछा, “बाबा, भगवान दिखाई क्यों नहीं देते?”

     

    साधु ने कहा, “जब तेरी भक्ति पूरी तरह सच्ची हो जाएगी, तब भगवान खुद तुझे दिखाई देंगे।”

     

    धन्ना ने उसी दिन मन में ठान लिया कि वह भगवान को जरूर बुलाएगा।

     

    वह रोज भगवान के सामने बैठकर कहता, “हे प्रभु, मैं आपको देखना चाहता हूं। आप मेरे पास आ जाइए। मैं आपके लिए खाना बनाऊंगा, आप मेरे साथ बैठकर खाइएगा।”

     

    गांव के लोग उसकी बातें सुनकर हंसते थे।

     

    कोई कहता, “देखो, धन्ना भगवान को अपने घर बुला रहा है।”

    कोई कहता, “अरे भगवान कोई इंसान हैं क्या, जो बुलाने पर घर आ जाएंगे?”

    लेकिन धन्ना को किसी की बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

    एक दिन उसने भगवान के लिए खाना बनाया। उसने थाली सजाई और सामने रखकर बोला, “प्रभु, आज आप मेरे साथ खाना खाइए।”

    वह इंतजार करता रहा।

    घंटों बीत गए।

    धन्ना ने फिर कहा, “प्रभु, शायद आप कहीं काम में होंगे। कोई बात नहीं, मैं इंतजार कर लूंगा।”

     

    शाम हो गई, लेकिन कोई नहीं आया।

    धन्ना ने खाना नहीं खाया। वह थाली के सामने बैठा रहा।

    उसकी मां ने कहा, “बेटा, खाना खा ले।”

    धन्ना बोला, “मां, पहले भगवान खाएंगे।”

    मां ने समझाया, “बेटा, भगवान तो दिखाई नहीं देते।”

    धन्ना ने मासूमियत से कहा, “मां, वे दिखाई नहीं देते तो क्या हुआ, वे सुनते तो हैं ना?”

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

    रात गहरी हो गई। धन्ना की आंखों से आंसू बहने लगे।

    वह हाथ जोड़कर बोला, “प्रभु, मैंने आपको सच्चे मन से बुलाया है। अगर आप नहीं आए तो लोग कहेंगे कि मेरा विश्वास झूठा था। मैं आपसे कुछ मांगता नहीं हूं। बस एक बार मेरे पास आ जाइए।”

    उसकी आवाज कांप रही थी।

    कहते हैं, उस रात उसकी सच्ची पुकार ने भगवान का हृदय भी पिघला दिया।

    धन्ना ने आंखें बंद कीं।

    कुछ देर बाद उसे लगा जैसे उसके सामने कोई खड़ा है।

    जब उसने आंखें खोलीं, तो उसके सामने भगवान का दिव्य स्वरूप था।

    धन्ना कुछ पल तक उन्हें देखता ही रह गया।

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

    वह बोला, “प्रभु… आप सच में आ गए?”

    भगवान मुस्कुराए।

    धन्ना ने तुरंत थाली उनकी ओर बढ़ा दी और बोला, “पहले आप खाना खाइए। मैंने आपके लिए बनाया है।”

    कहते हैं, भगवान ने उसके हाथों से भोजन स्वीकार किया।

    धन्ना की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उसके लिए भगवान कोई दूर बैठे देवता नहीं थे। वे उसके अपने थे। उसके दुख में साथ देने वाले, उसकी खुशी में मुस्कुराने वाले और उसकी पुकार पर आने वाले।

    धीरे-धीरे धन्ना की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। लोग उसे देखने आने लगे। बड़े-बड़े विद्वान उससे शास्त्रों की बातें पूछते, लेकिन धन्ना सरलता से कहता—

    “मुझे बड़े-बड़े मंत्र नहीं आते। मैं तो बस अपने भगवान को सच्चे मन से पुकारता हूं।”

    एक विद्वान ने उससे पूछा, “तुमने भगवान को कैसे पा लिया?”

    धन्ना ने कहा, “मैंने उन्हें कभी भगवान समझकर दूर नहीं रखा। मैंने उन्हें अपना समझकर पुकारा। शायद इसी कारण वे मेरे पास आ गए।”

    उसकी यही सरल भक्ति लोगों के हृदय को छू जाती।

    धन्ना जी ने लोगों को सिखाया कि भगवान को पाने के लिए जाति, धन, ऊंच-नीच या बड़े-बड़े दिखावे की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है तो केवल सच्चे मन की।

    उनका संदेश था

    “जिसके मन में सच्ची श्रद्धा हो, जिसके हृदय में छल न हो, और जो भगवान को अपना मानकर पुकारे, उसके लिए भगवान दूर नहीं रहते।”

    आज भी राजस्थान की लोकधुनों में संत धन्ना जी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। टोंक की धरती उनकी भक्ति की गवाही देती है। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति किसी बड़े मंदिर, महल या धन की मोहताज नहीं होती।

    कभी-कभी एक भोले किसान का सच्चा विश्वास भी भगवान को उसके दरवाजे तक ले आता है।

    और यही संत धन्ना जी की लोकगाथा का सबसे बड़ा संदेश है

    भगवान को पाने के लिए विद्वान होना जरूरी नहीं, बस दिल से सच्चा होना जरूरी है।

  • पुरानी डायरी का रहस्य

    पुरानी डायरी का रहस्य

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    घर पुराना था। दीवारों पर समय की परतें चढ़ चुकी थीं। अरेरा के उस मकान में तीन पीढ़ियाँ रह चुकी थीं, लेकिन पिछले दो साल से वह लगभग खाली पड़ा था। कबीर जब वहाँ पहुँचा तो दरवाज़े की चाबी घुमाते हुए उसके हाथ काँप रहे थे। बाबा की मृत्यु के बाद माँ ने कहा था, “बेटा, घर समेट लो। जो रखना हो रख लो, बाकी बेच देना।” कबीर ने सोचा था कि दो दिन में काम निपट जाएगा। लेकिन घर ने उसे रोक लिया।

     

    पहले दिन उसने बाबा के कमरे की अलमारी खोली। कपड़े, किताबें, पुराने चश्मे। सबसे नीचे एक लकड़ी का बक्सा मिला। बक्सा खोलते ही धूल उड़ी। अंदर एक पुरानी डायरी थी—काले चमड़े की, पन्ने पीले। ऊपर बाबा का नाम लिखा था: “रमेशचंद्र शर्मा – 1978”।

     

    कबीर ने डायरी खोली। पहली एंट्री साफ अक्षरों में थी 

     

    “आज मैंने उससे मुलाकात की। नाम है सुमति। आँखें ऐसी कि दिल बैठ जाए। लेकिन वह किसी और की मंगेतर है।”

     

    कबीर हैरान रह गया। बाबा की शादी दादी से हुई थी। सुमति कौन थी? उसने आगे पढ़ा। डायरी में प्यार भरी पंक्तियाँ थीं। बाबा ने सुमति के साथ नदी किनारे बैठने का जिक्र किया था, पुराने मंदिर में छिपकर मिलने का, और एक रात की बात जब दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया था कि वे जिंदगी भर साथ रहेंगे। लेकिन अचानक एंट्री रुक गईं। तीन महीने का गैप। फिर एक पन्ना 

     

    “सुमति चली गई। परिवार ने उसकी शादी जबरदस्ती कहीं और कर दी। मैंने विरोध किया तो घर से निकाल दिया गया। आज से यह डायरी सिर्फ यादों की रह जाएगी।”

     

    कबीर का दिल बैठ गया। बाबा ने कभी इस बात का जिक्र नहीं किया था। दादी से शादी बाद में हुई थी। क्या बाबा ने अपना पहला प्यार छुपाया था?

     

    रात भर कबीर डायरी पढ़ता रहा। बीच-बीच में बाबा ने लिखा था कि सुमति को खोजने की कोशिश की, लेकिन कोई पता नहीं चला। आखिरी एंट्री में सिर्फ एक वाक्य था 

     

    “अगर कभी मेरा कोई पोता यह डायरी पढ़े, तो उसे बता देना कि कुछ प्रेम अधूरे रह जाते हैं… लेकिन अधूरे रहकर भी पूरे होते हैं।”

     

    सुबह कबीर ने माँ को फोन किया। माँ चुप रही। फिर धीरे से बोली, “बेटा, तुम्हारे बाबा ने कभी विस्तार से नहीं बताया। बस इतना कहा था कि जिंदगी में एक गलती हुई थी… और वह गलती उन्होंने अपनी ही चुप्पी से सुधारी।”

     

    कबीर तय नहीं कर पाया कि आगे क्या करे। डायरी में एक पता था पुराने शहर का एक मोहल्ला, जहाँ सुमति के परिवार का घर हुआ करता था। उसने ट्रेन का टिकट काटा।

     

    दो दिन बाद वह उस गली में खड़ा था। घर अब नहीं था। जगह पर एक छोटा सा स्कूल बन चुका था। कबीर ने आसपास के बुजुर्गों से पूछा। एक बूढ़ी दुकानदार ने याद किया, “सुमति? हाँ… रमेश बाबू वाली। गरीब घर की थी। शादी के बाद पति के साथ शहर छोड़कर चली गई थी। फिर कभी नहीं आई।”

     

    कबीर निराश होकर लौट रहा था कि एक आवाज़ आई। “आप रमेशचंद्र के पोते हैं?”  

     

    पीछे एक महिला खड़ी थी—लगभग साठ साल की, सफेद बाल, लेकिन आँखें चमकदार। उसने अपना परिचय दिया, “मैं अंजलि। सुमति मेरी माँ थी।”

     

    कबीर काँप उठा। अंजलि ने बताया कि सुमति ने जीवन भर रमेश का नाम नहीं छोड़ा। शादी के बाद भी वह कभी-कभी पुरानी डायरी जैसी छोटी नोटबुक में लिखती थी। “माँ कहती थी कि कुछ रिश्ते समय से बड़े होते हैं। वे पूरे नहीं होते, बस जीवित रह जाते हैं।”

     

    अंजलि ने कबीर को अपने घर ले गई। वहाँ एक छोटी सी लकड़ी की पेटी निकाली। अंदर सुमति की नोटबुक थी। पन्ने में एक फोटो भी थी—जवान बाबा और एक सुंदर लड़की, नदी किनारे। फोटो के पीछे लिखा था—“रमेश… मेरा अधूरा पूरा”।

     

    कबीर ने दोनों डायरियाँ साथ रखीं। बाबा की और सुमति की। दो अलग-अलग हाथों से लिखी गई एक ही कहानी। अंजलि ने कहा, “माँ ने मरते समय कहा था कि अगर कभी रमेश का कोई अपना आए तो उसे यह दे देना। उन्होंने कभी एक-दूसरे को भुलाया नहीं… बस स्वीकार कर लिया।”

     

    कबीर कई घंटे वहाँ बैठा रहा। अंजलि ने चाय बनाई। दोनों चुपचाप पुरानी यादें बाँटते रहे। शाम होते-होते कबीर ने पूछा, “क्या वे कभी मिले थे बाद में?”  

     

    अंजलि ने सिर हिलाया। “नहीं। लेकिन माँ कहती थी कि हर बारिश में उन्हें लगता था जैसे रमेश कहीं पास ही खड़ा हो।”

     

    वापस लौटते समय कबीर के बैग में दो डायरियाँ थीं। घर पहुँचकर उसने बाबा की तस्वीर के सामने दोनों रख दीं। रात को उसने डायरी के आखिरी खाली पन्ने पर कुछ लिखा 

     

    “बाबा, आपकी अधूरी कहानी मैंने पूरी पढ़ ली। अब समझ आया कि कुछ प्रेम इसलिए अधूरे रह जाते हैं ताकि वे पीढ़ियों तक जीवित रह सकें। आपने चुप रहकर हमें सिखाया कि प्यार सिर्फ मिलने में नहीं, निभाने और सहेजने में भी होता है।”

     

    अगले दिन कबीर ने घर बेचने का विचार छोड़ दिया। उसने कमरों की सफाई शुरू की। बाबा का कमरा वैसा ही रखा। डायरी को अलमारी में वापस नहीं रखा, बल्कि एक काँच की पेटी में सहेज लिया। कभी-कभी रात को वह डायरी खोलकर पढ़ता। लगता जैसे बाबा और सुमति दोनों कमरे में मौजूद हों चुपचाप, लेकिन साथ।

     

    महीनों बाद अंजलि आई। दोनों ने मिलकर बाबा और सुमति की याद में एक छोटी सी नोटबुक तैयार की। उसमें दोनों की डायरियों के चुनिंदा पन्ने थे। कबीर ने नाम रखा “अधूरे पूरे”।  

     

    एक शाम कबीर छत पर बैठा था। बारिश शुरू हुई। बूँदें गिर रही थीं। उसने आँखें बंद कीं। लगा जैसे कोई धीरे से कह रहा हो “धन्यवाद बेटा… अब बोझ हल्का हो गया।”

     

    कबीर मुस्कुराया। पुरानी डायरी का रहस्य अब रहस्य नहीं रहा था। वह एक सच्चाई बन चुका था कि कुछ कहानियाँ समय के पार चली जाती हैं। वे खत्म नहीं होतीं। बस एक हाथ से दूसरे हाथ में चली जाती हैं। और जब सही हाथ मिलता है, तो अधूरा भी पूरा लगने लगता है।

     

    घर की दीवारें अब उतनी पुरानी नहीं लगती थीं। उनमें गर्माहट थी। डायरी की खुशबू अभी भी कमरे में तैरती थी। और कबीर जानता था कि जब भी वह अकेला महसूस करेगा, बस डायरी खोल लेगा। वहाँ दो

    दिलों की धड़कनें अभी भी बाकी थीं धीमी, लेकिन जिंदा।