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  • सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सोने का पिंजरा या खुला आसमान

     

    एक सुंदर-सी चिड़िया थी जिसका नाम था मीरा। उसके पंख सोने जैसे चमकते थे और आवाज़ ऐसी मधुर कि सुनने वाले ठहर जाते। मीरा एक बहुत बड़े महल में रहती थी। महल का मालिक एक अमीर साहब था, जो चिड़ियों का शौकीन था। उसने मीरा के लिए एक सोने का पिंजरा बनवाया था। पिंजरा इतना चमकदार था कि धूप पड़ते ही पूरा कमरा रोशन हो जाता। अंदर रेशमी घास बिछाई गई थी, छोटे-छोटे सोने के बर्तनों में पानी और दाना रखा जाता था। हर रोज़ ताज़े फल, कीड़े और विशेष मिश्रण वाला खाना आता था। नौकर सुबह-शाम पिंजरा साफ़ करते, मीरा के पंखों को सहलाते और कहते, “देखो, कितनी किस्मत वाली हो तुम! सोने के पिंजरे में रहती हो, राजाओं जैसा खाना मिलता है।”

     

    पहले-पहले मीरा खुश थी। वह गाती थी, फुदकती थी और अमीर साहब की तालियों से खुश होती। लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर कुछ बदलने लगा। खिड़की के बाहर वह आसमान देखती। नीला, विशाल, बादलों से भरा आसमान। पक्षी उड़ते, घूमते, गाते और फिर गायब हो जाते। मीरा अपने पंख फैलाती, लेकिन पिंजरे की सलाखें उसे रोक लेतीं। वह सोचती, “ये पंख किसलिए दिए गए हैं अगर उड़ना नहीं है?”

     

    दिन बीतते गए। मीरा का गाना कम होता गया। वह अब कम खाती। नौकर परेशान होते, “खाना नहीं खाती? यह तो सबसे अच्छा खाना है!” अमीर साहब खुद आते, मीरा को हाथ पर बिठाते और कहते, “तुम्हें क्या चाहिए? और सोना? और जवाहरात?” लेकिन मीरा चुप रहती। उसकी आँखें सिर्फ़ खिड़की की ओर होतीं।

     

    एक दिन मीरा बीमार पड़ गई। उसके पंख झड़ने लगे, आँखें धँसीं, शरीर कमज़ोर हो गया। डॉक्टर बुलाए गए। उन्होंने कहा, “खाना बढ़िया है, देखभाल अच्छी है, लेकिन चिड़िया उदास है। शायद कोई बीमारी हो।” दवाइयाँ चलीं, और भी बढ़िया खाना आया, लेकिन मीरा दिन-ब-दिन मरने लगी। वह अब गाना पूरी तरह बंद कर चुकी थी। सिर्फ़ खिड़की की तरफ़ देखती और धीरे-धीरे साँस लेती।

     

    एक रात आँधी आई। तेज़ हवा चली, खिड़की का शीशा टूट गया। हवा ने सोने के पिंजरे को हिला दिया। सलाखों में से एक ढीली हो गई। सुबह जब नौकर आए तो उन्होंने देखा कि पिंजरा खुला है और मीरा नहीं है। पूरे महल में हड़कंप मच गया। अमीर साहब चिल्लाए, “ढूँढो उसे! सोने का पिंजरा खाली कैसे रह सकता है?” लोग बागों में, छतों पर, आसपास के जंगलों में खोजने निकले। लेकिन मीरा नहीं मिली।

     

    मीरा उड़ी थी। पहली बार उसने अपने पंखों को पूरी तरह फैलाया। हवा ने उसे ऊपर उठाया। वह घबराई, लेकिन खुशी भी हुई। आसमान इतना बड़ा था! नीचे शहर, नदी, पेड़, खेत—सब कुछ छोटा लग रहा था। वह उड़ती गई, थक गई, फिर एक बड़े बरगद के पेड़ पर बैठ गई। भूख लगी थी। कोई दाना नहीं, कोई फल नहीं। लेकिन उसकी साँसें आसान हो रही थीं। पंख हल्के लग रहे थे।

     

    अगले दिन भी भूख लगी रही। उसने ज़मीन पर कुछ बीज खोजे, थोड़े से खाए। पानी नदी से पिया। शरीर कमज़ोर था, लेकिन दिल में एक नई ताक़त आ रही थी। वह गा नहीं पा रही थी, लेकिन अंदर से कोई राग गूँज रहा था। दूसरे पक्षी उसके पास आए। एक कौआ बोला, “तुम सोने के पिंजरे वाली हो न? यहाँ क्या कर रही हो? वहाँ तो बढ़िया खाना मिलता था।” मीरा ने धीरे से कहा, “हाँ, मिलता था। लेकिन उड़ने को जगह नहीं थी।”

     

    दिन बीतते गए। मीरा को कभी-कभी बहुत भूख लगती। बरसात में भीग जाती, ठंड में काँपती। एक बार बाज़ ने पीछा किया, वह मुश्किल से बची। लेकिन हर मुश्किल के बाद वह और मज़बूत होती गई। उसके पंख फिर से चमकने लगे। आवाज़ वापस आ गई। वह अब सुबह सूरज निकलते ही गाती। उसकी आवाज़ जंगल में गूँजती। दूसरे पक्षी उसके साथ गाने लगे।

     

    एक दिन वह उस महल के पास से गुज़री। खिड़की से अमीर साहब दिखे। वे उदास बैठे थे। सोने का पिंजरा अभी भी वहाँ था, खाली। मीरा ने एक पल सोचा—क्या वापस जाए? वहाँ खाना था, सुरक्षा थी। लेकिन फिर उसने आसमान की ओर देखा। बादल तैर रहे थे, हवा बुला रही थी। उसने पंख फैलाए और दूर उड़ गई।

     

    महीनों बाद मीरा एक पहाड़ी घाटी में पहुँची। वहाँ पानी के झरने थे, फलदार पेड़ थे, और ढेर सारे पक्षी। उसने वहाँ अपना घोंसला बनाया। अब वह रोज़ उड़ती, गाती, और कभी-कभी ज़मीन पर बीज चुगती। कभी पेट भरा रहता, कभी खाली। लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। एक दिन एक छोटी चिड़िया ने पूछा, “दीदी, आप इतनी खुश कैसे रहती हैं? कभी-कभी तो खाने को भी नहीं मिलता।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “बेटा, सोने के पिंजरे में मुझे हर रोज़ बढ़िया खाना मिलता था। फल, दाने, पानी—सब कुछ। लेकिन मैं मर रही थी। पंख थे, लेकिन उड़ नहीं सकती थी। गला था, लेकिन गाना नहीं आता था। दिल था, लेकिन धड़कन सुस्त पड़ गई थी। यहाँ खुले आसमान में कभी भूख लगती है, कभी ठंड, कभी खतरा। लेकिन मैं ज़िंदा हूँ। असली ज़िंदा। क्योंकि मेरी अपनी मर्ज़ी है। जहाँ चाहूँ उड़ूँ, जो चाहूँ गाऊँ। खाना मिल जाए तो अच्छा, नहीं मिले तो भी मैं साँस ले सकती हूँ, क्योंकि हवा मेरी है, आसमान मेरा है।”

     

    छोटी चिड़िया ने पूछा, “तो फिर सोने का पिंजरा बुरा है?”

     

    मीरा ने आसमान की ओर देखा। “बुरा नहीं। लेकिन अधूरा है। पिंजरा सुरक्षा देता है, खाना देता है, लेकिन आज़ादी नहीं देता। और आज़ादी के बिना पक्षी अधूरा रह जाता है। सोना चमकता है, लेकिन पंखों की चमक उससे बड़ी होती है। खाना पेट भरता है, लेकिन उड़ान दिल भरती है।”

     

    एक दिन फिर आँधी आई। तेज़ बारिश हुई। मीरा अपने घोंसले में बैठी रही। पानी टपक रहा था, ठंड लग रही थी। पेट में हल्की भूख थी। लेकिन उसने गाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ बारिश की आवाज़ में घुल गई। दूसरे पक्षी भी साथ देने लगे। आँधी थम गई। सूरज निकला। इंद्रधनुष बना। मीरा ने पंख फैलाए और ऊँची उड़ान भरी। नीचे घाटी चमक रही थी, ऊपर आसमान अनंत।

     

    दूर कहीं महल में अमीर साहब अभी भी सोने का पिंजरा संभाले बैठे थे। वे सोचते, “कितनी नादान चिड़िया थी। इतनी सुविधा छोड़कर चली गई।” लेकिन उन्हें नहीं पता था कि मीरा अब सिर्फ़ ज़िंदा नहीं, जी रही थी।

     

    साल बीत गए। मीरा बूढ़ी हो गई। उसके पंखों में सफ़ेदी आ गई, लेकिन आँखों की चमक वैसी ही रही। एक शाम वह एक ऊँची चोटी पर बैठी थी। सूरज डूब रहा था। आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। उसने अपने जीवन को याद किया—सोने का पिंजरा, बढ़िया खाना, फिर भागना, भूख, ठंड, डर, और फिर आज़ादी की खुशी। उसने धीरे से गाया। आवाज़ अब उतनी तेज़ नहीं थी, लेकिन उसमें एक गहराई थी।

     

    पास में बैठे युवा पक्षी ने पूछा, “दादी, आपको कभी पछतावा हुआ? सोने का पिंजरा छोड़ने का?”

     

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं बेटा। अगर मैं वहाँ रहती तो शायद आज भी साँस ले रही होती, लेकिन जी नहीं रही होती। खुला आसमान ने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी सिर्फ़ खाने-पीने का नाम नहीं। ज़िंदगी उड़ान का नाम है। कभी पंख थक जाएँ, कभी भूख लगे, लेकिन आसमान हमेशा अपना रहता है। सोने का पिंजरा चमकता है, लेकिन वह चमक उधार की होती है। आसमान की नीलिमा अपनी होती है।”

     

    सूरज डूब गया। तारे निकले। मीरा ने आँखें बंद कीं। हवा उसके पंखों से खेल रही थी। पेट में हल्की भूख थी, लेकिन दिल भरा हुआ था। वह जानती थी कि कल फिर सूरज निकलेगा, फिर उड़ान होगी, फिर गाना होगा। चाहे दाना मिले या न मिले।

     

    और कहीं दूर, समय की धारा में, एक सच्चाई गूँज रही थी—पक्षी के लिए सोने का पिंजरा चाहे जितना चमकदार हो, खुला आसमान ही उसका असली घर है। क्योंकि पिंजरे में शरीर बचता है, लेकिन आसमान में आत्मा जीती है।

     

    मीरा की कहानी जंगल में फैल गई। पक्षी उसे याद करते और अपने बच्चों को सुनाते। जब भी कोई युवा पक्षी किसी आकर्षक पिंजरे की ओर देखता, बूढ़े पक्षी कहते, “याद रखना मीरा की बात। खाना मिलेगा, आराम मिलेगा, लेकिन अगर पंख बाँध दिए गए तो तुम धीरे-धीरे मरने लगोगे। खुले आसमान में कभी भूखे सोना पड़े, लेकिन कम से कम तुम उड़ तो सकोगे।”

     

    और इस तरह, एक छोटी-सी चिड़िया ने पूरी दुनिया को सिखा दिया कि आज़ादी का स्वाद किसी सोने के पिंजरे से बड़ा होता है। भले ही उस आज़ादी के साथ भूख हो, ठंड हो, खतरा हो—फिर भी वह ज़िंदा रखती है। जबकि पिंजरे की सुविधाएँ शरीर को तो पालती हैं, लेकिन धीरे-धीरे प्राण ले लेती हैं।

     

    आज भी जब कोई पक्षी ऊँची उड़ान भरता है, हवा में गाता है और बादलों को छूता है, तो लगता है जैसे मीरा की आत्मा उसके साथ उड़ रही हो। और सोने का खाली पिंजरा कहीं महल में पड़ा

    चमक रहा होता है—चमकदार, कीमती, लेकिन निर्जीव।

     

  • अधूरी इबादत भाग~6

    अधूरी इबादत भाग~6

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~6 कहानी वहीं रुक गई

    कार का दरवाज़ा खोलते ही अद्वैत को अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया। जैसे कोई अनकही बात हवा में तैर रही हो, जैसे कोई याद अब भी घर की दीवारों से चिपकी बैठी हो। उसके मन में एक डर सरसराने लगा—पता नहीं क्यों, लेकिन दिल धड़कने लगा था तेज़… जैसे कुछ होने वाला हो।

    वो तेज़ क़दमों से घर के भीतर दाखिल हुआ। अंदर की हल्की रौशनी, खिड़की से छनकर आती धूप और टेबल पर पड़े पानी के गिलास से उठती नमी… सब कुछ सामान्य था। पर उसकी आँखें जिसे ढूंढ रही थीं, वह नज़रों से ओझल थी।

    “रूहानी?” उसने धीमे से पुकारा।

    कोई जवाब नहीं आया।

    उसी क्षण एक धीमी आहट उसके बाएँ तरफ से आई। वो उधर बढ़ा और जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने का दृश्य उसके दिल को सिहराने वाला था।

    रूहानी नंगे पाँव फर्श पर बिखरे टूटे काँच पर चल रही थी। उसके कदम डगमगा रहे थे, पर उसकी चाल में एक अजीब-सी जिद थी, जैसे दर्द अब उसके लिए मायने नहीं रखता। अद्वैत का दिल धक् से रह गया। एक पल भी देर करता, तो शायद कोई और हादसा हो जाता।

    “रूहानी!” वो चीख़ा और तेज़ी से आगे बढ़ा।

    उसने झपटकर उसका हाथ पकड़ा और एक झटके में उसे अपनी तरफ खींच लिया। रूहानी उसकी बाहों में आकर झूल गई। उसका शरीर हल्का था, जैसे जान ही न बची हो और अद्वैत की बाँहों में एक अजीब-सी गर्मी उतर आई।  

    अद्वैत की आँखों के ठीक सामने रूहानी का चेहरा था। साँवली-सी रंगत, पर उसमें एक सुकून था, जैसे किसी भूले हुए गीत की धुन हो जो बरसों बाद फिर से कानों में पड़ी हो। उसका चेहरा थकान और डर से ढँका हुआ था, पर उस पल में कुछ ऐसा था जो अद्वैत को भीतर तक हिला गया। 

    उसके दिल के कोनों में, जो अब तक वीरान पड़े थे, कुछ जागने लगा था। लेकिन जैसे ही वो एहसास पनपा, उसकी पलकें झपकीं और उसकी पत्नी का चेहरा तैरता हुआ सामने आ गया—वही मुस्कुराहट, वही ठंडी-सी नज़रे, वही शांत आवाज़ जो अब केवल यादों में बची थी।

    उसने सिर हल्के से झटका, जैसे किसी परछाईं को खुद से दूर करना चाहता हो।  

    “नहीं,” उसने मन ही मन कहा, “ये सब नहीं दोबारा…”  

    थोड़ी ग्लानि से भरे हुए, उसने रूहानी को थोड़ा सीधा किया और उसकी ओर देखा। अब भी उसकी आँखें बंद थीं, वो डर में सिमटी हुई थी।

    उसकी मासूम प्रतिक्रिया पर अद्वैत के होंठों पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। मगर अगले ही पल उसने उसे छुपा लिया। जैसे खुद से ही शर्मिंदगी हो रही हो कि इस क्षण में भी वो मुस्कुरा कैसे गया।

    वो उसे दोनों बाहों में उठा लिया। उसके वजन में हल्कापन था, लेकिन उसकी थकान गहरी थी। 

    धीरे से सोफे पर बिठाकर वो थोड़ी देर उसे देखता रहा। फिर बिना कुछ बोले पलटा और पास ही रखे ड्रॉअर के पास गया। वहाँ से फर्स्ट ऐड बॉक्स निकाला और वापस लौटकर उसके सामने फर्श पर बैठ गया।

    “मुझे ये सब करने की क्या ही ज़रूरत ….” वो बुदबुदाया, जैसे खुद को भी नहीं पता था कि उसे ये सब क्यों करना पड़ रहा है।

    उसने चुपचाप धीरे से उसका पैर उठाया और सोफे के पास वाले टेबल पर रख दिया। उसके तलवे में कांच के कई छोटे-छोटे टुकड़े चुभे हुए थे, जिनसे हल्का खून रिस रहा था। 

    रूहानी के तलवों से जब उसने पहला टुकड़ा निकाला, तो वो हल्का हिली, जैसे दर्द को अब भी महसूस कर सकती हो।

    अद्वैत के छूने से वो असहज हो उठी। पैर पीछे खींचने लगी। शायद दर्द बढ़ गया था। 

    “थोड़ा और…” अद्वैत बुदबुदाया, “बस एक टुकड़ा और है…”

    अद्वैत अगला टुकड़ा निकालने ही वाला था कि रूहानी तड़पकर चीख़ पड़ी।

    “आह!” उसकी चीख कमरे की हवा में गूंज गई।

    उसकी हालत देखकर अद्वैत की साँस तेज़ हुई। “शिट… थोड़ा आराम से निकालता हूँ।” उसने धीरे से कहा, जैसे उसकी लाचारी खुद पर भारी पड़ रही हो।

    तभी, रूहानी ने पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, मगर ठोस थी, जैसे अपने घावों की रक्षा कर रही हो।

    “नहीं… नहीं… प्लीज़… तुम मेरे पाँव मत छुओ।”

    उसकी आवाज़ में कुछ था। घृणा नहीं… दर्द था, एक डर था… आत्म-संकोच भी शायद।

    अद्वैत एक पल के लिए थमा, उसकी आँखें ऊपर उठीं और रूहानी के चेहरे पर टिक गईं।

    हाँ, अद्वैत ने उसकी बात सुनी, पर अनसुनी कर दी। उसकी उँगलियाँ अब भी उसके पैर के आसपास थीं। शायद अद्वैत किसी और ही सोच में था, या शायद… खुद से लड़ रहा था।

    उसने गहरी साँस ली, और पहली बार रूखे लहज़े में बोला, “मरने का इतना ही शौक है तो हिम्मत करके एक बार में ही मर जाओ, ऐसे ट्राई क्यों करती हो जिसमें जान पूरी तरह से जाने का चांस इतना कम रहता है?”

    उसके लहजे में तल्ख़ी थी। शायद वह खुद पर गुस्सा था, शायद अपनी लाचारी पर, जिसे अद्वैत खुद समझ नहीं पा रहा था। पर जैसे ही उसने ये कहा, उसकी आत्मा को यह एहसास हुआ कि ये बात बहुत कठोर थी।

    रूहानी का चेहरा सन्न हो गया। अद्वैत ने उसे देखा, कैसे उसकी आँखें एकाएक धुंधला गईं। रूहानी के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई उसे अब तक समझने की कोशिश नहीं कर पा रहा था ….. शायद वह अद्वैत भी नहीं।

    रूहानी को अपने कानों पर अब भी यकीन नहीं हो पा रहा थी। उसे सुबह में कही मीना की बात याद आ गई। उसने उसके बारे में कितना कुछ कहा था – संवेदनशील, शांत, अपने दुखों में डूबा, मगर किसी और का दर्द समझने वाला। 

    लेकिन उसके सामने जो खड़ा था, वह तो जैसे अपने ही डर में कैद कोई और आदमी था। वो खड़ूस था, बेरुख़, और कहीं न कहीं खुद में उलझा हुआ।

    वो सन्न सी बैठी रही, उसकी आँखें अद्वैत के चेहरे पर जमी थीं, जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि कौन है ये आदमी जो उसके जले पर नमक छिड़क रहा है।

    अद्वैत ने उसे खोया हुआ देखा तो झल्लाकर उसकी आँखों के सामने चुटकी बजाई, “कुछ कहोगी भी कि नहीं? घर नहीं जाना है क्या तुम्हें? सब राह देख रहे होंगे तुम्हारी।”

    उसका सवाल सीधा नहीं था, बल्कि एक तीर था—जख्म को कुरेद देने वाला।

    रूहानी जैसे अचानक सूख गई हो। उसका चेहरा पीला पड़ा, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को फिर से खोल दिया गया हो।

    ‘घर’

    ये शब्द उसके भीतर एक तूफान बनकर उठा। उसकी आँखों में तिर आया हर मंज़र—वो गालियाँ, वो झगड़े, वो ज़हर जो उसके अपने लफ्ज़ों में घोलते थे।

    कुछ देर की खामोशी के बाद उसने धीमे से कहा, “क्या मैं यहाँ कुछ दिनों के लिए रह सकती हूँ? मेरे घाव ठीक होने तक… तुम कहो तो मैं किराया भी दे दूंगी।”

    अद्वैत ने चौंककर उसे देखा। उसकी आँखों में कोई चाल नहीं थी, बस एक अजीब-सी बेचैनी थी।

    “मतलब तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं?” उसने थोड़ा अचंभित होते हुए पूछा।

    रूहानी ने एक थका हुआ सा मुस्कान दी, “कुछ ऐसा ही समझ लो।”

    अद्वैत ने गहरी सांस ली, जैसे कोई पुरानी याद सीने में चुभ गई हो।

    “तो अब तक कहाँ रहती थी?” उसने पूछा।

    रूहानी का चेहरा बुझ गया। वो जवाब देना चाहती थी, पर बस “अ… उ…” करती रह गई।

    अद्वैत ने आँखें संकरी कीं और फिर अचानक जैसे उसे कोई शंका हुई, “नहीं… नहीं… कहीं तुम चोर निकली तो…?”

    रूहानी का चेहरा लाल पड़ गया। एक तीखी गर्माहट उसके गालों तक चढ़ आई।

    “क्या मैं तुम्हें शक्ल से चोर नज़र आती हूँ?” वो झल्लाकर बोली।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि तभी सोफे के पास पड़ा रूहानी का मोबाइल बजने लगा। दोनों की निगाहें अचानक उधर मुड़ीं। मोबाइल की स्क्रीन पर उभरे नाम को देखकर दोनों कुछ पल के लिए स्थिर हो गए।

    एक लंबा सन्नाटा कमरे में पसर गया।

    अद्वैत ने रूहानी की तरफ देखा। उसकी आँखों में फिर वही डर लौट आया था। मगर इस बार उसके साथ कोई और भी था—राज़… गहरे राज़ जो उसकी साँसों में छुपे थे।

    नाम अब भी स्क्रीन पर चमक रहा था, लेकिन दोनों में से किसी ने भी उसे उठाने की हिम्मत नहीं की।

    उस एक नाम ने जैसे उनकी पूरी बातचीत को अधर में रोक दिया था।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला… पर इस बार शब्द नहीं निकले।

    और रूहानी बस अपने मोबाइल को देखती रही… जैसे कोई पुराना साया फिर से लौट आया हो…

    —————-

    कौन था वो, जिसकी कॉल ने रूहानी की साँसें थमा दीं?

    क्या उस नाम के पीछे छिपा है कोई ऐसा सच जिसे रूहानी ने अब तक दुनिया से छुपाकर रखा है?

    अगर अद्वैत ने वो नाम पुकार लिया… तो क्या टूट जाएगी वो खामोश दीवार, जो अब तक उनके बीच खड़ी थी?

  • अधूरी इबादत भाग~5

    अधूरी इबादत भाग~5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~5 ज़ख्म जो लिखे नहीं गए

    पुणे की सड़कों पर कार दौड़ रही थी, लेकिन मेरा ज़हन किसी और सफर पर निकला हुआ था—एक ऐसा सफर, जो सड़क पर नहीं, मेरे भीतर चल रहा था। सड़कें लंबी थीं, आसमान खुला और हवा तेज़ थी, मगर मेरे अंदर घुटन थी।  

    सुबह से चला था मैं, लेखकों के एक सम्मेलन में शरीक होने के लिए, जहाँ शब्दों की महफ़िल जमी थी, विचारों की गूँज थी और किस्सों का सैलाब था। मगर अब जब मैं वापस लौट रहा था, मेरी कार की खिड़की से झाँकता शहर तेज़ी से पीछे छूट रहा था और उसके साथ ही वह हलचल भी, जो कुछ देर पहले मेरे भीतर थी।  

    सम्मेलन में कहानियों की बुनावट, भाषा की बारीकियाँ और शब्दों की ताक़त पर कई चर्चाएँ हुईं, लेकिन मेरा मन कहीं और अटका रहा—उन अधूरे क़िस्सों में, जिन्हें मैंने कभी लिखा नहीं, उन भावनाओं में, जिन्हें कभी पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाया।  

    खिड़की से आती हवा मेरे चेहरे को छूकर निकल जाती थी, मगर दिल की तपिश कम नहीं कर पाती थी। शब्दों के उस समंदर से लौटते हुए भी, भीतर कहीं एक सूखापन था। शायद इसलिए कि कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित रह गए थे, कुछ कहानियाँ अभी भी अधूरी थीं।

    कल रात की महफ़िल… वही महफ़िल, जहाँ मैं जाना नहीं चाहता था, लेकिन फिर भी मैं उसे मना नहीं कर पाया। 

    क्यों? यही सवाल अब तक ज़हन में गूंज रहा था, मगर जवाब कहीं गहरे दबा पड़ा था। शायद मैं जानता था, पर स्वीकार नहीं करना चाहता था।  

    वहाँ बैठे हर चेहरे पर एक नक़ाब था—सभ्य समाज का, खुलेपन का, उच्च विचारों का, लेकिन उनकी आँखों में वही पुरानी धूर्तता थी, शब्दों में वही कड़वाहट, वही ज़हर।  

    अरे, देखो तो कौन आया है!”

    “इसकी तो माँ भी वही थी न…?”

    “क्या खाक लेखक बनेगा? अपनी माँ की कहानी लिखेगा क्या?” 

    “वैसे, अब इसका कोई है भी? माँ नहीं, बाप नहीं… बीवी भी नहीं रही।”

    हर लफ्ज़ नश्तर की तरह रगों में उतरता चला गया। मैं वहाँ कितनी देर तक रुका, याद नहीं, बस इतना याद है कि हर शब्द मेरी रगों में ज़हर की तरह घुलता जा रहा था।    

    मुझे हमेशा से अपने वजूद पर पछतावा रहा था। मेरी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल थी, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था।

    मैं नहीं जानता था कि मेरे जन्म को लेकर इतना शोर क्यों था, इतनी घृणा क्यों थी? 

    क्या मैंने अपनी माँ से कहा था कि वो मुझे जन्म दे? 

    क्या मैंने इस दुनिया में आने का चुनाव किया था? नहीं ना …..

    फिर क्यों? क्यों हर बार मुझे ही दोष दिया जाता है?  

    नाजायज़!”  

    एक ऐसा शब्द, जो मेरी रग-रग में उतर चुका था। मेरा पूरा वजूद मानो इसी एक लफ्ज़ में कैद था।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मैं सच में किसी जुर्म का नतीजा था? क्या मैं सच में एक भूल था? मेरे पिता ने मुझे कभी अपनाया नहीं। और मैं भी उन्हें कभी अपना नहीं पाया। लेकिन क्या मैं उनके साथ रहने वाली उस औरत को अपनी माँ का दर्जा दे सकता था? कभी नहीं।  

    और मेरी माँ?  

    वो अब इस दुनिया में नहीं थीं। आत्महत्या कर ली थी उन्होंने। लोग कहते हैं, उन्होंने ज़िंदगी से हार मान ली थी। लेकिन मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं था। उन्होंने ज़िंदगी से नहीं, लोगों की नफरत से हार मानी थी। उन्होंने उस समाज से हार मानी थी, जिसने उन्हें कभी स्वीकार ही नहीं किया।  

    कभी-कभी सोचता हूँ, अगर मैं नहीं होता, तो क्या वो ज़िंदा होतीं? क्या सच में मैं उनकी मौत का ज़िम्मेदार था?  

    रातों को जब नींद नहीं आती तो आईने में खुद को देखकर सोचता था – क्या मैं सच में वही हूँ, जैसा लोग कहते हैं? एक अपशगुन? एक मनहूस इंसान?  

    लोगों को लगता है, लेखक हूँ, तो दर्द को समझता हूँ, उसे शब्दों में ढाल लेता हूँ, मगर क्या लेखक का दिल नहीं टूटता? क्या लेखक की आत्मा पर लगे ज़ख्म कम गहरे होते हैं? क्या शब्दों में घुलकर कोई अपने दर्द से बच सकता है? अगर ऐसा होता, तो मैं अब तक खुद को लिखकर ख़त्म कर चुका होता।  

    पर ऐसा नहीं है …. दर्द सिर्फ़ लिखने से नहीं जाता। वो अंदर जड़ें जमा लेता है, साँसों में घुल जाता है, ख़ून में बहता रहता है।  

    लोगों को लगता है, मैं मजबूत हूँ। लेकिन मैं हर दिन, हर पल टूटता हूँ।  

    मेरी पत्नी…  

    उसकी मुस्कान अब भी आँखों में बसी हुई है। उसके स्पर्श की गर्माहट अब भी हथेलियों में ठहरी हुई है। लेकिन लोग कहते हैं, मेरी वजह से उसकी मौत हुई। जैसे मेरी माँ की हुई थी। तो क्या सच में मैं ही दोषी हूँ? क्या सच में मेरी ज़िंदगी किसी शाप से कम नहीं? क्या मैं जहाँ भी जाता हूँ, जो भी मेरे करीब आता है, वो बर्बाद हो जाता है?  

    अगर हाँ, तो फिर मैं अब भी ज़िंदा क्यों हूँ?  

    क्या सिर्फ़ इस दुनिया का तमाशा देखने के लिए?  

    या सिर्फ़ समाज के तानों को सुनने के लिए?  

     

    पीछे किसी ने तेज़ हॉर्न बजाया। मेरी तंद्रा टूटी। सामने सिग्नल हरा हो चुका था, मगर मैं अब भी जड़ था। जैसे मेरे भीतर कोई जाम लग गया हो। 

    मैंने गहरी सांस ली, एक्सीलेटर दबाया, और गाड़ी आगे बढ़ा दी।  

    लेकिन भीतर कुछ अब भी रुका हुआ था—  

    माँ की यादें, पत्नी की परछाइयाँ और वे तमाम आवाज़ें, जो ज़हन में अब भी गूँज रही थीं—

    “मनहूस!”

    “नाजायज़!”

    “इसका कोई नहीं!”  

    क्या सच में मेरा कोई नहीं था?  

    क्या मैं इस पूरी दुनिया में सच में अकेला था?

    और तभी…

    अचानक, उस लड़की का चेहरा ज़हन में कौंध गया।

    वही लड़की, जिसे कल रात मैंने उस पुल से कूदने से रोका था।

    उसकी बेबस आँखें, काँपते होंठ और वो खामोश चीख़, जो मैं अब तक सुन सकता था।

    वो क्यों कूदना चाहती थी? कौन थी वो?

    मैंने उसे बचा तो लिया था, लेकिन वो बेहोश हो गई थी।

    उसके हाथ में बंधे ब्रेसलेट से उसका नाम पता चला था – “रूहानी” मगर बाकी कुछ भी नहीं।

    मेरा दर्द मेरे अंदर था, लेकिन उसका दर्द उसकी आँखों में साफ़ झलक रहा था।

    शायद… मैं उसका जवाब नहीं था, पर क्या वो मेरे सवालों का कोई सिरा थी?

    मैं आज तक बहुत से लोगों को टूटते देखा था। मैं जानता था कि समाज किस तरह किसी को उसके अपने ही जीवन से बेगाना बना देता है। मैं जानता था कि दर्द जब हद से बढ़ जाता है, तो इंसान खुद को मिटा देना चाहता है।

    पर मैं उसे टूटने नहीं देना चाहता था।

    क्यों?

    शायद इसलिए कि उसकी आँखों में मैंने खुद को देखा था। वही खालीपन, वही तन्हाई, वही हताशा, जो बरसों से मेरे साथ थी।

    पता नहीं, वो अब भी मेरे घर में होगी या जा चुकी होगी।

    मुझे नहीं पता कि उसके मन में क्या चल रहा था, ना ही मैं उसके बारे में कुछ जानता था। बस इतना जानता था कि जब मैंने उसे बचाया, तो वो पूरी तरह बेहोश थी। मैं उसे अपने घर ले आया, पर हम एक शब्द भी नहीं बोल पाए क्योंकि रात में वह अपने होश में नहीं थी और सुबह में मैं जल्दबाज़ी में निकल गया। 

    मेरी उंगलियाँ कार के स्टीयरिंग पर कस गईं। मन में एक अजीब-सी घबराहट पसरने लगी। अगर वो अब भी वहाँ हुई, तो क्या मैं उससे कुछ पूछ पाऊँगा?

    और अगर नहीं हुई…

    अगर वो जा चुकी होगी…

    तो फिर?

    एक अनजान-सी बेचैनी ने मेरे अंदर दस्तक दी।

    मैंने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी।

    सड़कें पीछे छूट रही थीं, मगर दिल में जो हलचल थी, वो तेज़ होती जा रही थी। घर के करीब पहुँचते ही मेरी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। न जाने क्यों, पर दिल किसी अनहोनी का एहसास करा रहा था।

    जैसे ही मैंने कार रोकी और घर की तरफ देखा। 

    दरवाजा खोलते ही सामने का नज़ारा देख ……….

    ————-

    क्या रूहानी अब भी वहीं थी, या वह कहीं जा चुकी थी—बिना कोई निशान छोड़े?

    कमरे के कोने में एक टूटा हुआ काँच पड़ा था, और फर्श पर पानी फैला हुआ था।

    वो खून के निशान किसके थे?

  • अधूरी मुहब्बत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शहर के एक किनारे पर एक बहुत बड़ी पुरानी हवेली थी, जिसे लोग राठौर हवेली कहते थे। उसी शहर के दूसरे छोर पर एक छोटा-सा घर था, जहां आलिया अपने परिवार के साथ रहती थी।

     

    दोनों परिवार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे।

     

    राठौर परिवार अपने खानदान, अपनी परंपराओं और अपनी ऊंची सोच के लिए जाना जाता था। उनके लिए परिवार की इज्जत सबसे ऊपर थी।

     

    वहीं आलिया का परिवार अपने अलग विचारों और संस्कारों को सबसे ज्यादा मानता था।

     

    दोनों परिवारों के बीच कोई बड़ी दुश्मनी नहीं थी, लेकिन उनके बीच एक ऐसी दूरी थी, जिसे पार करना किसी के लिए भी आसान नहीं था।

     

    और फिर एक दिन…

     

    आलिया की मुलाकात तपिश से हुई।

     

    पहली मुलाकात बिल्कुल आम थी।

     

    आलिया कॉलेज के बाहर बारिश में खड़ी थी। उसके पास छाता नहीं था और बारिश लगातार तेज होती जा रही थी।

     

    तभी एक लड़का उसके सामने छाता लेकर आकर खड़ा हो गया।

     

    “आप भीग जाएंगी,” उसने कहा।

     

    आलिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और आप?”

     

    तपिश हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैं तो पहले से भीग चुका हूं।”

     

    आलिया हंस पड़ी।

     

    उसे क्या पता था कि बारिश में मिला यह अजनबी उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाला था।

     

    धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं।

     

    कभी कॉलेज के बाहर…

     

    कभी सड़क किनारे चाय की दुकान पर…

     

    कभी किसी बहाने से फोन पर घंटों बातें।

     

    तपिश को आलिया की बातें अच्छी लगती थीं और आलिया को तपिश का खामोश रहकर भी उसकी हर बात समझ जाना।

     

    एक दिन आलिया ने उससे पूछा,

     

    “तुम्हें पता है ना… हम दोनों का साथ होना आसान नहीं है?”

     

    तपिश कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “हां।”

     

    “बहुत मुश्किल है।”

     

    “हां।”

     

    “शायद नामुमकिन भी।”

     

    तपिश ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “लेकिन तुमसे मोहब्बत करना तो मेरे हाथ में भी नहीं था।”

     

    आलिया की आंखें भर आईं।

     

    “तुम जानते हो ना कि हमारे परिवार कभी हमें स्वीकार नहीं करेंगे?”

     

    “जानता हूं।”

     

    “फिर भी?”

     

    तपिश ने धीरे से कहा,

     

    “फिर भी।”

     

    उस दिन दोनों ने पहली बार एक-दूसरे का हाथ पकड़ा था।

     

    दोनों जानते थे कि उनका मिलना शायद इस जन्म में संभव नहीं था।

     

    फिर भी दोनों ने मोहब्बत कर ली।

     

    क्योंकि कुछ मोहब्बतें सोच-समझकर नहीं होतीं।

     

    वो बस हो जाती हैं।

     

    और फिर इंसान चाहे पूरी दुनिया से लड़ ले… अपने दिल से नहीं लड़ पाता।

     

    कुछ महीनों बाद उनके रिश्ते की खबर दोनों परिवारों तक पहुंच गई।

     

    आलिया के घर में तूफान आ गया।

     

    उसके पिता ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम उस लड़के से दोबारा नहीं मिलोगी।”

     

    आलिया चुप रही।

     

    “मैं तुमसे बात कर रहा हूं!”

     

    आलिया की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “पापा… मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

     

    फिर उसके पिता ने कहा,

     

    “प्यार? ये प्यार नहीं है। ये हमारे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलाने की जिद है।”

     

    उधर तपिश के घर में भी वही हाल था।

     

    उसके पिता ने उसे साफ शब्दों में कह दिया,

     

    “उस लड़की को भूल जाओ।”

     

    तपिश ने पहली बार अपने पिता के सामने सिर उठाकर कहा,

     

    “मैं उसे भूल नहीं सकता।”

     

    “तो फिर इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं।”

     

    तपिश कुछ देर तक अपने पिता को देखता रहा।

     

    फिर उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर मेरी मोहब्बत इतनी बड़ी गलती है… तो मैं ये गलती जिंदगी भर करूंगा।”

     

    उस रात दोनों ने फोन पर बात की।

     

    आलिया बहुत रो रही थी।

     

    “तपिश… शायद हमें अलग होना पड़ेगा।”

     

    तपिश चुप था।

     

    “कुछ बोलो ना…”

     

    तपिश ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

     

    “मैं भी नहीं।”

     

    “तो फिर मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    आलिया रोते हुए बोली,

     

    “मैं जाना नहीं चाहती तपिश… लेकिन शायद हमारी किस्मत हमें साथ नहीं देखना चाहती।”

     

    तपिश ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “अगर इस जन्म में हम नहीं मिल सके…”

     

    आलिया ने रोते हुए पूछा,

     

    “तो?”

     

    तपिश ने कहा,

     

    “तो अगले जन्म में मैं तुम्हें पहले ढूंढूंगा।”

     

    आलिया ने धीमे से पूछा,

     

    “और अगर मैं तुम्हें पहचान न पाई तो?”

     

    तपिश मुस्कुराया, लेकिन उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “तो मैं फिर से तुमसे प्यार कर लूंगा।”

     

    दोनों ने तय किया कि वे आखिरी बार मिलेंगे।

     

    उस रात आलिया अपने घर से चुपचाप निकली और शहर के बाहर उसी सुनसान सड़क पर पहुंची, जहां तपिश उसका इंतजार कर रहा था।

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे।

     

    काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आलिया ने कहा,

     

    “तपिश… क्या हम सच में इतने गलत थे?”

     

    तपिश ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर हमें सजा क्यों मिल रही है?”

     

    तपिश के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    आलिया उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “काश हम किसी ऐसी दुनिया में मिले होते जहां हमारे नाम से पहले हमारा परिवार न पूछा जाता।”

     

    तपिश की आंखें भर आईं।

     

    “काश…”

     

    “काश हम बस आलिया और तपिश होते।”

     

    दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े रहे।

     

    फिर अचानक दूर से तेज रोशनी उनकी ओर बढ़ी।

     

    एक तेज रफ्तार गाड़ी सड़क पर बेकाबू होकर उनकी तरफ आ रही थी।

     

    तपिश ने आलिया को धक्का देकर सड़क से दूर कर दिया।

     

    आलिया गिर गई।

     

    और अगले ही पल…

     

    तपिश उस गाड़ी की चपेट में आ गया।

     

    “तपिश!”

     

    आलिया चीखते हुए उसके पास भागी।

     

    तपिश सड़क पर पड़ा था।

     

    आलिया ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।

     

    “तपिश… आंखें खोलो… प्लीज आंखें खोलो…”

     

    तपिश ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    उसने आलिया की तरफ देखा।

     

    “तुम… ठीक हो?”

     

    आलिया जोर-जोर से रोने लगी।

     

    “तुम मुझे बचाकर खुद क्यों चले गए?”

     

    तपिश ने बहुत मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “क्योंकि… तुमसे ज्यादा जरूरी… मेरे लिए कुछ नहीं था।”

     

    आलिया उसके हाथ को कसकर पकड़कर बोली,

     

    “मुझे छोड़कर मत जाओ… मैंने तुम्हें अगले जन्म में ढूंढना है।”

     

    तपिश की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं… इंतजार करूंगा।”

     

    “तपिश…”

     

    “आलिया…”

     

    “हां?”

     

    “अगर… अगले जन्म में भी हमारे परिवार अलग हुए…”

     

    आलिया रोते हुए बोली,

     

    “तो?”

     

    तपिश ने बहुत धीमी आवाज में कहा,

     

    “तो इस बार… तुम मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    आलिया ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “नहीं छोड़ूंगी।”

     

    तपिश की आंखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।

     

    आलिया चीखती रही।

     

    “तपिश… उठो ना…”

     

    लेकिन तपिश नहीं उठा।

     

    उस रात दो परिवारों की नफरत ने अपने बच्चों से उनकी मोहब्बत छीन ली थी।

     

    तपिश चला गया।

     

    और आलिया…

     

    वो जिंदा तो रही, लेकिन उसके अंदर कुछ हमेशा के लिए मर गया।

     

    कई साल बाद भी आलिया उसी सड़क के किनारे हर साल उसी दिन जाकर बैठती थी।

     

    उसके हाथ में वही पुराना छाता होता था, जो तपिश ने उसे पहली बारिश में दिया था।

     

    लोग पूछते,

     

    “तुम अब तक उसका इंतजार क्यों करती हो?”

     

    आलिया मुस्कुराकर कहती,

     

    “क्योंकि उसने कहा था… वो इंतजार करेगा।”

     

    और फिर वो आसमान की तरफ देखकर धीरे से कहती,

     

    “तपिश… अगर सच में कोई अगला जन्म होता है ना…”

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगते।

    “तो इस बार मुझे ढूंढने में देर मत करना।”

    कहते हैं, कुछ प्रेम कहानियां शादी तक पहुंचकर पूरी नहीं होतीं।

    कुछ प्रेम कहानियां साथ जीकर पूरी नहीं होतीं।

    कुछ मोहब्बतें तो मौत के बाद भी अधूरी रह जाती हैं…

     

    क्योंकि दो लोग एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं,

    लेकिन उनकी किस्मत…

    उन्हें एक-दूसरे का होकर भी…

    एक-दूसरे के साथ जीने नहीं देती।

     

  • एक सफर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अमन को ट्रैवल करना बहुत पसंद था। उसे किसी एक जगह टिककर रहना बिल्कुल पसंद नहीं था। जैसे ही उसे कुछ दिनों की छुट्टी मिलती, वह अपना बैग उठाता और किसी नई जगह निकल जाता।

     

    कभी पहाड़ों पर, कभी समुद्र के किनारे, कभी किसी छोटे से गाँव में।

     

    लेकिन उसकी जिंदगी में एक अजीब सी परेशानी थी।

     

    एक लड़की।

     

    वो लड़की बार-बार उसके सामने आ जाती थी।

     

    पहली बार अमन ने उसे जयपुर की एक सड़क पर देखा था। वह अपने कैमरे से एक पुरानी हवेली की तस्वीर ले रहा था कि अचानक वही लड़की उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

     

    अमन ने उसे देखकर भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “तुम?”

     

    लड़की ने उसे देखा और बोली, “क्या हुआ?”

     

    “तुम यहाँ कैसे?”

     

    “मैं यहाँ घूमने आई हूँ।”

     

    “लेकिन मैं भी यहाँ घूमने आया हूँ।”

     

    लड़की ने उसे अजीब नजरों से देखा। “तो?”

     

    अमन ने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।

     

    उसने सोचा, बस एक बार मिली है। दुनिया इतनी बड़ी है, दोबारा कहाँ मिलेगी।

     

    लेकिन उसी शाम जब वह एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था, वही लड़की उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थी।

     

    अमन ने चाय का कप नीचे रखा।

     

    “तुम मेरा पीछा कर रही हो?”

     

    लड़की ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

     

    “मैं? तुम्हारा पीछा क्यों करूंगी?”

     

    “तो फिर तुम यहाँ भी कैसे?”

     

    “मैं पहले से यहाँ बैठी हूँ।”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    लड़की मुस्कुराकर बोली, “तुम्हें शायद लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ तुम्हारे लिए बनी है।”

     

    “मुझे ऐसा नहीं लगता।”

     

    “तो फिर परेशान क्यों हो रहे हो?”

     

    अमन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस लड़की का नाम मीरा था।

     

    अमन ने सोचा कि जयपुर के बाद वह उससे कभी नहीं मिलेगा।

     

    लेकिन कुछ दिनों बाद वह ऋषिकेश चला गया।

     

    सुबह-सुबह वह गंगा किनारे बैठा था। चारों तरफ शांति थी। अमन ने राहत की सांस ली।

     

    “आखिरकार… अकेला।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई।

     

    “किससे अकेले?”

     

    अमन ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    अमन के चेहरे का रंग ही बदल गया।

     

    “तुम यहाँ भी?”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ। तुम यहाँ भी?”

     

    “मैं पहले आया था।”

     

    “तो मैंने कब कहा कि तुम मेरे पीछे आए हो?”

     

    अमन ने अपना माथा पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें पता है, ये बहुत अजीब है।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं जहाँ जाता हूँ, तुम वहाँ मिल जाती हो।”

     

    मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “शायद तुम्हारी किस्मत खराब है।”

     

    अमन ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम्हें ये मजाक बहुत अच्छा लगता है, है ना?”

     

    “बहुत।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें और भी अजीब होती चली गईं।

     

    अमन किसी पहाड़ी रास्ते पर जाता, मीरा वहाँ मिल जाती।

     

    वह बस में बैठता, मीरा उसी बस में होती।

     

    वह किसी छोटे से गाँव की चाय की दुकान पर रुकता, मीरा वहाँ पहले से चाय पी रही होती।

     

    एक बार तो अमन ने जानबूझकर किसी को बताए बिना एक छोटी सी पहाड़ी जगह जाने का फैसला किया।

     

    उसने सोचा, “इस बार तो मीरा बिल्कुल नहीं मिलेगी।”

     

    लेकिन जैसे ही वह पहाड़ी सड़क के एक मोड़ पर पहुँचा, सामने मीरा खड़ी थी।

     

    अमन ने बाइक रोक दी।

     

    “तुम यहाँ कैसे?”

     

    मीरा ने कंधे उचकाए।

     

    “मैं भी घूमने आई हूँ।”

     

    “तुम्हें हर बार वही जगह क्यों पसंद आती है, जहाँ मैं जाता हूँ?”

     

    “शायद हमारी पसंद मिलती है।”

     

    अमन ने तुरंत कहा, “हमारी पसंद बिल्कुल नहीं मिलती।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर तुम हर बार मुझे देखकर रुक क्यों जाते हो?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    धीरे-धीरे मीरा उसकी परेशानी से उसकी आदत बनने लगी।

     

    पहले अमन उसे देखकर परेशान होता था।

     

    फिर उसे देखकर चिढ़ता था।

     

    फिर उसे देखकर मुस्कुराने लगा।

     

    और कुछ समय बाद…

     

    जब वह कहीं जाता और मीरा दिखाई नहीं देती, तो उसे खुद अजीब लगने लगता।

     

    एक बार अमन अकेला मनाली चला गया।

     

    पहला दिन उसे बहुत अच्छा लगा।

     

    दूसरे दिन भी।

     

    लेकिन तीसरे दिन वह एक खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर बैठा था और अचानक उसे महसूस हुआ कि कुछ कमी है।

     

    कोई उससे बहस नहीं कर रहा था।

     

    कोई उसकी चाय नहीं छीन रहा था।

     

    कोई उसके कैमरे के सामने आकर उसकी तस्वीर खराब नहीं कर रहा था।

     

    अमन ने धीरे से कहा, “मीरा होती तो अब तक परेशान कर चुकी होती।”

     

    “अच्छा?”

     

    अमन उछल पड़ा।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    अमन कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    “तुम यहाँ भी?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम सच में मेरा पीछा करती हो।”

     

    “मैंने कहा ना, मैं बस घूमने आती हूँ।”

     

    अमन उसके पास जाकर बैठ गया।

     

    “तुम्हें पता है, पहले मुझे तुमसे बहुत परेशानी होती थी।”

     

    “पहले?”

     

    अमन चुप हो गया।

     

    मीरा ने उसे देखा।

     

    “अब नहीं होती?”

     

    अमन ने सामने पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा, “अब… जब तुम नहीं होती, तब होती है।”

     

    मीरा पहली बार चुप हो गई।

     

    दोनों के बीच कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई।

     

    बस पहाड़ों से आती ठंडी हवा चलती रही।

     

    फिर मीरा ने धीरे से पूछा, “तो अब मैं तुम्हारा पीछा करूँ तो तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा।

     

    “अगर तुम मेरे पीछे नहीं आओगी…”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर पूछा, “तो?”

     

    अमन ने नजरें चुरा लीं।

     

    “तो शायद मैं खुद तुम्हारे पीछे आ जाऊँगा।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    अमन भी मुस्कुरा दिया।

     

    लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    क्योंकि कुछ दिनों बाद अमन अपने घर वापस आ गया।

     

    वह सुबह-सुबह नींद में अपने बाथरूम की ओर गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला…

     

    अंदर मीरा खड़ी थी।

     

    अमन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

     

    फिर जोर से चिल्लाया।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

    मीरा भी डर गई।

     

    “ये तुम्हारा घर है?”

     

    “हाँ!”

     

    “मुझे लगा ये मेरा कमरा है!”

     

    अमन ने बाहर जाकर देखा।

     

    वह सच में गलत कमरे में आ गया था।

     

    मीरा कुछ पल उसे देखती रही और फिर जोर-जोर से हँसने लगी।

     

    अमन ने शर्मिंदा होकर कहा, “किसी को बताना मत।”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो मैं जिंदगी भर बताऊँगी।”

     

    अमन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुमसे पीछा छुड़ाना असंभव है।”

     

    मीरा उसके पास आई और बोली,

     

    “किसने कहा कि तुम्हें मेरा पीछा छुड़ाना है?”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा।

     

    इस बार उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था।

     

    बस एक हल्की सी मुस्कान थी।

     

    उसे समझ आ गया था कि मीरा सच में उसका पीछा नहीं कर रही थी।

     

    बस हर सफर में उसके रास्ते उससे मिल जाते थे।

     

    कभी किसी सड़क पर…

     

    कभी किसी पहाड़ पर…

     

    कभी किसी अनजान शहर में…

     

    और कभी-कभी उसके अपने घर के

    बाथरूम में भी।

     

    पहले अमन को लगता था कि मीरा उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानी है।

     

    लेकिन अब वह जान चुका था…

     

    कुछ लोग हमारी जिंदगी में अचानक नहीं आते।

     

    वो बार-बार हमारे सामने आते हैं।

     

    जब तक हम ये समझ न जाएँ कि शायद…

     

    वो रास्ते का हिस्सा नहीं,

     

    बल्कि हमारी मंजिल का हिस्सा हैं।

     

  • अधूरी इबादत भाग~4

    अधूरी इबादत भाग~4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~4 शब्दों का वार

    रूहानी की नज़र अचानक अपने हाथों पर पड़ी। एक अनजाना अहसास उसके भीतर सिर उठा रहा था। उसे याद आया कि जब वह पुल से गिरने वाली थी, तब उसका मोबाइल उसकी सलवार की जेब में था।  

    लेकिन अब…  

    उसका हाथ अपने आप जेब में चला गया और अगले ही पल उसकी साँसें रुक-सी गईं। मोबाइल वहाँ नहीं था।  

    उसके अंदर एक अजीब-सी बेचैनी दौड़ गई। उसने जल्दी से अपने चारों ओर देखा, लेकिन कोई हलचल नहीं थी। कमरे में वही पुराना सन्नाटा पसरा था, जो पिछले कुछ घंटों से उसकी हमसफ़र बना हुआ था।  

    फिर अचानक, उसकी नज़र सोफे के बगल में रखी साइड टेबल पर गई। वहाँ, उसका मोबाइल रखा हुआ था।  

    एक पल के लिए उसे अपनी ही नज़रों पर यकीन नहीं हुआ। उसने धीमे-धीमे कदम बढ़ाए और मोबाइल की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के काँप रही थीं।  

    रूहानी ने जैसे ही अपना मोबाइल उठाया, स्क्रीन पर ढेरों नोटिफिकेशन झिलमिला उठे।

    पर रूहानी यह सोच रही थी कि उसका मोबाइल जेब से यहाँ आया कैसे? 

    शायद इस अद्वैत ने ……… 

    उसने फिर अपना सिर झटकाया।

    उसकी आंखें हल्की-सी सिकुड़ गईं, उसने देखा— उसका फोन अभी भी साइलेंट पर था। शायद इसीलिए उसे इतनी देर तक कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। लेकिन अब, उस चमकती हुई स्क्रीन के पीछे कुछ ऐसा था, जिसे देखकर उसके अंदर अजीब-सी बेचैनी उठने लगी।  

    उसकी उंगलियां धीमे-धीमे स्क्रीन पर सरक रही थीं। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला और जैसे ही उसकी नज़र अपने नाम पर पड़े #चीटर #धोखेबाज #फेक जैसे शब्दों पर गई, उसके दिल में कुछ टूटने जैसा महसूस हुआ।  

    सैकड़ों, शायद हज़ारों कमेंट्स थे। हर पोस्ट, हर स्टोरी में वही बातें— नफरत, ताने, अपमान। किसी ने उसकी तस्वीरों के नीचे आग उगलते शब्द छोड़े थे, किसी ने उसके कैप्शन्स का मज़ाक उड़ाया था, तो किसी ने सीधे-सीधे उसे दोषी ठहराया था।  

    उसकी आँखें तेजी से स्क्रीन पर दौड़ने लगीं, हर कमेंट को पढ़ने लगीं, लेकिन हर शब्द एक नया ज़हर था, एक नई चोट।  

    “इसने किसी और के डिज़ाइन्स चुराए हैं!”  

    “यह लड़की झूठी है, इसके सारे काम चोरी के हैं!”

    “छोटे शहरों की लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं।”  

    “बड़ी आई थी डिज़ाइनर बनने।”

    “इसे ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए!” 

    उसकी पूरी दुनिया, उसकी मेहनत, उसके सपने— सब एक झटके में धूल में मिल चुके थे।  

    उसे यकीन नहीं हो रहा था कि लोग उसके बारे में इतनी नफरत से लिख सकते हैं। जिन लोगों ने कभी उसके डिज़ाइन्स की तारीफ की थी, वही अब उसे घृणा से देख रहे थे।    

    रूहानी ने कंपकंपाते हाथों से मोबाइल को कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें स्क्रीन पर टिकी थीं, लेकिन शब्द धुंधले होते जा रहे थे। सांसें तेज़ हो गई थीं, उंगलियाँ काँप रही थीं, और दिल एक अजीब-सी बेचैनी के साथ धड़क रहा था।  

    उसने धीरे-से स्क्रीन ऊपर स्क्रॉल किया, जहां किसी ने उसकी एक पुरानी तस्वीर पोस्ट करके उसके नाम के आगे ‘फ्रॉड’ लिख दिया था।  

    यह सब जो हो रहा था? इससे उसकी आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा। ऐसा लगा जैसे वह किसी बहुत ऊंचे पुल से नीचे गिर रही हो— वही पुल, जहां वह कल रात खड़ी थी।  

    रूहानी ने एक लंबी, कांपती हुई साँस ली। गला सूख गया था। उसने जल्दी से अपना इंस्टाग्राम इनबॉक्स खोला।  

    वह उस एक अकाउंट पर गई, जो उसके लिए सबसे ज़्यादा मायने रखता था।  

    उसने उंगलियों से स्क्रीन पर उस नाम को छुआ— वही नाम, जिसने कभी उसके ख्वाबों को पंख दिए थे।  

    लेकिन वहाँ… कुछ नहीं था। 

    आखिरी मैसेज दो दिन पुराना था।  

    कहीं कोई सन्देश नहीं, कोई समर्थन नहीं, कोई आवाज़ नहीं।  

    वही शख्स, जिससे उसने सबसे ज्यादा उम्मीद की थी, जिसने उसे इस इंडस्ट्री में आगे बढ़ने की हिम्मत दी थी, जिसने कहा था कि वह उसके टैलेंट पर भरोसा करता था – वही अब खामोश था।  

    उसने एक बार फिर उस शख्स के कमेंट्स ढूँढने की कोशिश की, शायद उसने कहीं कुछ कहा हो, शायद कहीं उसके पक्ष में कोई सफाई दी हो…  

    लेकिन नहीं।  

    कोई शब्द नहीं, कोई बचाव नहीं, कोई सफाई नहीं।  

    बस एक भारी खामोशी।  

    उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने मोबाइल को कसकर पकड़ लिया, जैसे वह उसे और तकलीफ़ न दे सके, लेकिन उसका दिमाग इन सब बातो से पीछे नहीं हट पा रहा था।  

    उसे वह सभी बातें याद आने लगी, जब वह घंटों तक अपने डिज़ाइन्स पर मेहनत करती थी, जब वह खुद को पूरी तरह झोंक देती थी, जब वह बस यह सोचती थी कि एक दिन उसका नाम होगा, उसकी पहचान होगी।  

    और अब? 

    अब उसका नाम कीचड़ में घसीटा जा रहा था।  

    “लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    “कैसे इतनी आसानी से उसकी पूरी मेहनत को झूठ कह सकते हैं?”

    “और वो…? उसने कुछ क्यों नहीं कहा?”

    उसकी साँस भारी हो गई। आँसू उसकी आँखों के कोरों तक आ चुके थे, लेकिन वह उन्हें बहने नहीं देना चाहती थी। वह टूटने नहीं देना चाहती थी खुद को, लेकिन सच तो यह था कि वह पहले ही टूट चुकी थी।  

    उसने फोन को टेबल पर पटक दिया और अपने बालों में उंगलियाँ फिराने लगी। 

    उसे तरह-तरह की आवाज़ें सुनाई देने लगी। वो एक जानी-पहचानी आवाज़ थी, एक ऐसी आवाज़ जिसने बचपन से उसके दिल में घाव किए थे।  

    “मैंने समझाया था ना कि लड़कियों को सिर्फ़ घर के काम करने चाहिए?” 

    “बहुत उड़ने की कोशिश कर रही थी!”  

    “परायों के साथ कंधे से कंधा मिलाने चली थी, अब भुगत!”

    “मुँह काला हो गया ना? यही अंजाम होता है लड़कियों का!”

    रूहानी ने घबराकर अपनी हथेलियों से कानों को दबा लिया।  

    लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।  

    एक पल वो आवाज़ें बाहर से आ रही थीं, अगले ही पल वो उसके अंदर गूंजने लगीं।  

    वह चाह रही थी कि इस कमरे से भाग जाए। कहीं दूर, जहां ये सब नहीं पहुंचे, जहां ये नाम, ये आवाज़ें, ये ताने उसका पीछा न करें।  

    जहाँ उसे कोई नाम से ना पुकारे।  

    जहाँ कोई उसे पहचानता ना हो।  

    लेकिन वह भागकर भी कहां जाती? अब कोई ठिकाना नहीं बचा था। अब उसका कोई अपना नहीं था।  

    वह अपने घुटनों को समेटकर बैठ गई, सिर झुका लिया और गहरी सांस लेने की कोशिश करने लगी, लेकिन अंदर कोई सुनामी उठ चुकी थी।  

    “मैंने इतना भरोसा किया… इतनी उम्मीदें रखीं… और बदले में यह मिला?”

    कमरे की खामोशी अब बोझ बन चुकी थी। घड़ी की टिक-टिक, हवा की सरसराहट— सब कुछ उसके अंदर की बेचैनी को और बढ़ा रहे थे।  

    उसने उठकर पानी का गिलास उठाया, लेकिन हाथ इतने कांप रहे थे कि गिलास हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।  

    छन्न ……

    कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।  

    रूहानी ने नीचे देखा। 

    कांच के बिखरे हुए टुकड़े…  

    वैसे ही जैसे उसके सपने।  

    वैसे ही जैसे उसका भरोसा।  

    वैसे ही जैसे वह खुद।  

    इस पूरी दुनिया में, इस पूरे शहर में, इस पूरे घर में—  

    कोई नहीं था।  

    वह अचानक से उठी और उन कांच के टुकड़ों पर चलने लगी। उसकी नंगे पाँव एड़ी से लेकर उंगलियों तक काँच चुभने लगा, पर दर्द का अहसास मर चुका था। पैरों के नीचे हल्की-सी गर्माहट महसूस हुई— खून की।

    वह एक कदम और बढ़ाने ही वाली थी कि किसी ने उसे पीछे खींच लिया।

    एक झटके से।

    इतनी तेज़ी से कि उसका संतुलन बिगड़ गया और वह किसी की बाहों में समा गई। उसकी सांसें थम गईं।

    वह हाथ अब भी उसकी बाहों को जकड़े हुए थे, जैसे उसे गिरने से बचा रहे हों।

    वह आँखें बंद किए हुए थी, लेकिन महसूस कर सकती थी— किसी की गर्म साँसें उसके करीब थीं।

    लेकिन कौन?

    —————-

    अगर कमरे में सिर्फ़ वही थी, तो फिर वो बाहें किसकी थीं, जो उसे थामे हुए थीं?

    क्या यह वही था, जिससे उसने सबसे ज़्यादा उम्मीदें रखी थीं—या कोई और?

    अगर कोई था, तो वह कौन था—कोई अपना, कोई अजनबी… या कोई ऐसा, जिसका यहाँ होना नामुमकिन था?

  • अधूरी इबादत भाग~3

    अधूरी इबादत भाग~3

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~3 रूहानी की उलझन

    मीना की बात सुनकर रूहानी की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। वह उत्सुकता से पूछ बैठी, “वैसे तुम्हारे सर का क्या नाम है?”

    मीना, जो अब अपने काम में व्यस्त हो चुकी थी, मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “अद्वैत अवस्थी।”  

    रूहानी ने अगला सवाल किया, “क्या करते हैं वे?”

    मीना के चेहरे पर सम्मान झलक उठा। उसने झाड़ू लगाना छोड़कर सीधा होकर गर्व से कहा, “अरे, हमारे सर बहुत बड़े लेखक हैं! बहुत नाम कमाया है उन्होंने!”

    लेकिन रूहानी के लिए यह सब नया था। उसने कभी किताबों में दिलचस्पी नहीं ली थी, पढ़ने का शौक उसमें कभी जागा ही नहीं था, न ही किसी लेखक के बारे में ज्यादा सुना था। जब स्कूल में थी, तब भी सिर्फ़ उतना ही पढ़ती थी, जितना ज़रूरी था। साहित्य, कविताएँ, उपन्यास – इन सबसे उसका कभी कोई जुड़ाव नहीं रहा।

    लेकिन इस समय, मीना की बातों से ज़्यादा, उसे अद्वैत अवस्थी को लेकर खुद में बढ़ती जिज्ञासा महसूस हो रही थी।

    कैसा होगा वो इंसान जो इतनी कहानियाँ लिखता है? 

    क्या वो अपनी कहानियों में खुद को छुपा लेता होगा या फिर उनमें अपनी कोई सच्चाई बयां करता होगा?

    मीना ने हैरानी से पूछा, “लेकिन आप मुझसे सर के बारे में इतना क्यों पूछ रही हो? कल उनसे बात नहीं कर पाई थी क्या?”  

    रूहानी ने गहरी साँस ली। उसकी उंगलियाँ मेज़ के किनारे को हल्के-हल्के सहला रही थीं, “नहीं… कल मैं बेहोश हो गई थी और जब सुबह होश आया, तो तुम्हारे सर यहाँ नहीं थे।”

    मीना को यह सुनकर हल्की हैरानी हुई, लेकिन बातचीत का सिलसिला उसे अच्छा लग रहा था। उसने रुचि लेते हुए कहा, “सर तो अपने काम के चलते ज़्यादातर बाहर ही रहते हैं। कभी कोई नई किताब प्रकाशित करनी होती है, तो कभी किसी बड़े लेखक से मिलने जाना पड़ता है। मगर जब भी यहाँ होते हैं, तो बस अपने कमरे में ही बंद रहते हैं, लिखने में डूबे रहते हैं।”

    रूहानी खिड़की के बाहर देखने लगी। 

    एक प्रसिद्ध लेखक… और यहाँ इस सूने घर में एक अजीब से अकेलेपन में रहता है। ये घर उसे अपनी ओर खींच रहा था, जैसे यहाँ की हर दीवार में कोई अनकही दास्तान क़ैद थी।

    मीना अब अपनी सफाई का काम लगभग पूरा कर चुकी थी। उसने टेबल पर कपड़ा मारा और एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैं तो तब से यहाँ हूँ, जब सर शादी करके आए थे। शादी के एक साल बाद ही मैडम दुनिया छोड़कर चली गईं।”

    रूहानी को यह सुनकर अजीब-सा महसूस हुआ। उसने अद्वैत अवस्थी के चेहरे को याद करने की कोशिश की— वो खाली, गहरी आँखें, जिसमें दर्द की परतें बिछी हुई थीं। 

    क्या उस दर्द की वजह उसकी पत्नी की मौत थी? 

    या कोई और ज़ख्म भी था, जो उसने किसी से साझा नहीं किया?

    मीना की आवाज़ में हल्की उदासी आ गई, मगर जब उसने कहा, “मैडम ने ही मुझे यहाँ काम करने के लिए चुना था,” तो उसके चेहरे पर गर्व की चमक आ गई। शायद वो खुद को इस घर का एक हिस्सा मानने लगी थी, जैसे उसकी पहचान अद्वैत अवस्थी और उनकी पत्नी से जुड़ी हो।

    रूहानी भी उसकी बातों में थोड़ी देर के लिए खो गई। एक लेखक, जो अपनी पत्नी को शादी के साल भर बाद ही खो चुका था। उस दर्द का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था।

    किसी की ज़िंदगी में इतना बड़ा बदलाव सिर्फ़ साल भर में कैसे आ सकता है? 

    कोई इतना अकेला कैसे हो सकता है कि सालों तक किसी से बात न करे? 

    या फिर वो भी उन्हीं लोगों में से था, जो सिर्फ़ दिखावे की शादी करते हैं?

    विचारों में डूबी रूहानी अचानक चौंकी, जब मीना ने उसके सामने चुटकी बजाई, “कहाँ खो गईं आप?”

    रूहानी चौंक गई। उसने अपनी पलकों को झपकाया और हल्का मुस्कुरा दिया, “नहीं, बस ऐसे ही…”

    मीना भी मुस्कुराई, “अच्छा, बाकी बातें कल करेंगे। मुझे अभी घर जाना है, नहीं तो मेरे बच्चे मुझे खोजने लगेंगे।”

    रूहानी ने अनायास ही पूछ लिया, “तुम्हारी शादी कब हुई?”

    मीना ने हड़बड़ी में कपड़े ठीक करते हुए कहा, “अरे, वो सब फिर कभी। अभी तो मुझे जाना होगा, बच्चे राह देख रहे होंगे।”

    इतना कहकर वह तेजी से बर्तन समेटने लगी। उसने चाय और नाश्ता रूहानी के सामने रखते हुए कहा, “ये खा लीजिएगा, मैडम। और सर के इंतजार मत कीजिएगा, उनका कोई ठिकाना नहीं। कभी आधी रात को आते हैं, तो कभी अगली सुबह तक।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिला दिया। मीना ने एक अंतिम मुस्कान दी और दरवाज़ा बंद करके चली गई।

    अब फिर वही खामोशी।

    कमरे की हर चीज़ वैसी ही थी, लेकिन अब ये खामोशी और गहरी हो गई थी। रूहानी ने चाय का कप उठाया, लेकिन पीने का मन नहीं था। वह सोफे पर बैठी रही, अपनी ही उलझनों में घिरी हुई।

    उसकी आँखें दीवार पर टंगी घड़ी पर चली गईं।

    टिक… टिक… टिक…

    समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, मगर इस घर के भीतर सब कुछ रुका हुआ महसूस हो रहा था।

    उसका मन कह रहा था कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए था। उसे वापस जाना चाहिए। लेकिन वापस कहाँ?

    उसकी ज़िंदगी में पीछे मुड़कर देखने के लिए अब कुछ भी नहीं था। ना कोई घर, ना कोई ऐसा जिसे वह अपना कह सके। 

    एक अजनबी ने उसे बचाया और अब वह उसी अजनबी के घर में बैठी थी, उसके बारे में सोचते हुए।

    उसे महसूस हो रहा था कि यह जगह उसे खींच रही थी, लेकिन क्यों? वह खुद नहीं समझ पा रही थी।

    बाहर से हवा का हल्का झोंका आया और पर्दे धीरे-धीरे हिलने लगे। उस हवा में एक ठंडक थी, जो उसकी रूह तक महसूस हो रही थी।

    वह उठी और धीरे-धीरे हॉल में चहलकदमी करने लगी। उसकी नज़र किताबों की शेल्फ़ पर पड़ी।

    उसने धीरे से एक किताब उठाई। उस किताब के कवर पर लेखक का नाम लिखा था, लेकिन उसकी आँखें सिर्फ़ उन मोटे अक्षरों को देख रही थीं—”अद्वैत अवस्थी”

     

    उसने उंगलियों से नाम को छुआ। उसकी लिखी हुई किताबें…

    उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए। उसकी नज़र एक पंक्ति पर ठहर गई—  

    “कुछ जख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें वक़्त नहीं भरता, बस इन्सान उनके साथ जीना सीख जाता है।” 

    उसका दिल एक पल के लिए ठहर गया।

    यह कैसा संयोग था कि उस इंसान की किताब में उसे खुद का अक्स मिल रहा था, जिसने उसे मौत के करीब से बचाया था?  

    पन्ने आगे बढ़ते गए और हर शब्द जैसे किसी भूली हुई वेदना को फिर से उभार रहा था—  

    “कभी-कभी हम अपनी तकलीफ़ें किसी से बाँटते नहीं, क्योंकि हमें डर होता है कि कोई समझेगा ही नहीं। लेकिन सच तो यह है कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बाँटा नहीं जा सकता।”

    रूहानी को महसूस हुआ कि उसकी आँखें हल्की-सी नम हो गई थीं।

    क्या अद्वैत अवस्थी ने अपनी कहानियों में खुद को छुपा लिया था?  

    या फिर वो अपनी किसी सच्चाई को इन शब्दों के पीछे किसी अनकही टीस की तरह छोड़ गया था?  

    उसने किताब धीरे से बंद कर दी, फिर धीरे से वापस शेल्फ़ में रख दी लेकिन वो पंक्तियाँ अब भी उसके दिल के भीतर गूंज रही थीं।  

    वह खिड़की के पास गई और पर्दा थोड़ा हटाया।

    वह सोचने लगी— क्या उसे भी अकेलेपन से डर लगता होगा?

    या फिर उसने इस अकेलेपन को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया है?

    उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं थे।

    कमरे में घड़ी की टिक-टिक जारी थी।

    वह धीरे-धीरे सोफे पर बैठ गई, अपने घुटनों को समेटते हुए।

    उसकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि यह किसलिए थी।

    क्या अपने लिए? या उस अजनबी के लिए, जो अब उसके सवालों के घेरे में था?

    क्या वह सच में किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बनने जा रही थी, जिसके अंत से वह अनजान थी?

    —————-

    उसने धीरे-धीरे अपनी जगह से उठकर इधर-उधर नजर दौड़ाई। कहीं कुछ तो था जो उसे बेचैन कर रहा था। तभी अचानक उसे अहसास हुआ— उसका मोबाइल!  

    वो तेजी से अपना फोन ढूंढने लगी। नोटिफिकेशन लाइट टिमटिमा रही थी… लेकिन ये संदेश किसके थे?  

  • अधूरी इबादत भाग~2

    अधूरी इबादत भाग~2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~2 सवालों से भरा अजनबी घर

    सूरज की हल्की किरणें खिड़की के झीने पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थीं। हल्की हवा में पर्दे हौले-हौले हिल रहे थे, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें छू लिया हो। धूप की पतली रेखाओं के बीच, हवा में तैरते धूल के महीन कण, किसी भूली-बिसरी याद की तरह दिख रहे थे। रूहानी की पलकें भारी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आत्मा किसी गहरे कुएं में डूब गई हो।

    उसकी सांसें धीमी थीं, जैसे उसका भीतर से सारा जोश कहीं खो गया हो। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पहली चीज़ जो उसकी धुंधली दृष्टि में आई, वो थी छत पर घूमता हुआ पंखा। उसकी ब्लेड धीमी चाल में गोल-गोल घूम रही थीं, जैसे वक़्त खुद भी थम जाना चाहता हो।

    रूहानी ने अपना सिर घुमाया, कमरे का जायज़ा लिया। यह कोई होटल का कमरा नहीं था, ना ही अस्पताल का—बल्कि यह एक घर का हॉल था। एक ऐसा घर, जो बड़ा तो नहीं था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी शांति पसरी हुई थी। दीवारें हल्के रंग की थीं, लेकिन उन पर हल्की उदासी का साया था। एक तरफ़ लकड़ी की बुकशेल्फ़ थी, जिसमें किताबें करीने से सजी हुई थीं। उन किताबों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ का मालिक कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अपने ही ख्यालों में खोया रहने वाला कोई शख्स होगा।

    रूहानी ने माथे पर हाथ फेरा। उसे हल्का दर्द महसूस हो रहा था। और फिर… वो पल दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधा।

    पुल…

    वो ठंडी हवा…

    उसका लड़खड़ाते हुए रेलिंग पर चढ़ना…

    फिर अचानक कोई उसे खींचता है… एक जोड़ी मजबूत बाहें…

    “कौन था वो?”

    वो बुदबुदाई।

    उसने धीरे से अपना हाथ सोफे से हटाया और पैर नीचे रखे। फर्श पर पैर रखते ही लकड़ी के ठंडेपन का एहसास हुआ। पूरा घर नीरव था, मगर यह खामोशी कानों में अजीब-सा सन्नाटा भर रही थी। एक सन्नाटा, जो कानों में सन्नाटे की तरह गूंज रही थी।

    हॉल से दाएँ एक छोटा-सा कॉरिडोर था। रूहानी ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।

    कॉरिडोर संकरा था, मगर साफ़-सुथरा। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—धुंधली और मोनोक्रोम—जैसे किसी बीते हुए अतीत की परछाइयाँ कैद हों। एक कोने में लकड़ी की एक छोटी-सी मूर्ति रखी थी। वह किसी औरत की आकृति थी—गर्दन झुकी हुई, आँखों में कोई गहरी उदासी। रूहानी ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ और उसकी उंगलियों के नीचे, लकड़ी की सतह पर न जाने क्यों ठंडापन नहीं, बल्कि एक हल्की-सी सिहरन महसूस हुई।

    उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।

    रूहानी आगे बढ़ी। पूरा घर शांत था, मानो दीवारों ने सदियों से कोई आवाज़ नहीं सुनी हो। उसे घर बड़ा नहीं लगा, मगर इसमें एक गहरा खालीपन था, जो उसकी रूह तक महसूस हो रहा था।

    वो हॉल में लौट आई। वहाँ एक कोने में डाइनिंग टेबल रखी थी और दूसरी तरफ़ सोफे और सेंटर टेबल। दीवार पर एक बड़ी-सी घड़ी टंगी थी, जिसकी सूइयाँ बिल्कुल धीमे-धीमे खिसक रही थीं। टिक-टिक की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत हर गुजरते पल को दर्ज कर रही हो।

    फिर उसकी नज़र ऊपर की तरफ़ गई—सीढ़ियाँ।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    ऊपर पहुँचते ही उसने देखा कि दो दरवाज़े बंद थे। एक दरवाजे पर हल्की धूल की परत जमी थी, जैसे वहां बहुत समय से कोई गया ही न हो। उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई। वो दरवाज़े कुछ छुपा रहे थे।

    वह नीचे आकर हॉल के सोफे पर धीरे से बैठ गई, उसकी उंगलियां आपस में उलझ रही थीं। 

    घर में कोई नहीं था। न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि वह किसी अजनबी जगह पर नहीं, बल्कि कहीं बहुत गहरे दर्द के बीच बैठी थी।

    तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।

    रूहानी का दिल धक् से रह गया। उसके अंदर डर जागने लगा। इस अजनबी के घर पर पता नहीं कौन आ जाए।

    दरवाज़ा खुला और एक साधारण सी औरत अंदर आई—हाथ में थैला पकड़े, चेहरे पर थोड़ी थकान। मगर जैसे ही उसकी नज़र रूहानी पर पड़ी, वो एकदम से चौंक गई।

    “अरे…!”

    “आप कौन हैं?” वह जोर से चीखी।

    रूहानी भी घबरा गई, मगर खुद को संभालते हुए बोली, “वो… मैं…” उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।

    “आप यहाँ आईं कैसे?” औरत अभी भी सहमी हुई थी।

    “मैं…” रूहानी को समझ नहीं आया कि क्या कहे। “वो… कल… एक्सीडेंट…”

    “एक्सीडेंट?” औरत के चेहरे पर संदेह उभर आया।

    “हाँ… वो इंसान… जिन्होंने मुझे बचाया था ….”

    औरत ने कुछ पल उसे ध्यान से देखा, फिर सहज होकर बोली, “ओह… अच्छा… सर ने आपको बचाया है?”

    रूहानी ने सिर हिलाया।

    “तुम कौन हो?” रूहानी ने पूछा।

    “मैं यहाँ की मेड हूँ। दो साल से काम कर रही हूँ। सफाई, खाना बनाना… बस यही।”

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

    “मीना,” औरत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

    “और… वो तुम्हारे सर… वो कहाँ हैं?”

    “सर तो सुबह-सुबह निकल गए होंगे। वैसे आपका नाम क्या है?”

    रूहानी चुप हो गई।

    फिर धीरे से कहा, “रूहानी।”

    मीना ने थोड़ी देर तक उसे घूरा। फिर अचानक बोली,

    “बुरा मत मानिएगा, मैडम… मगर मैंने यहाँ पिछले एक साल में किसी औरत को आते नहीं देखा। खासकर सर की पत्नी के जाने के बाद तो बिल्कुल नहीं…”

    रूहानी के भीतर भूचाल आ गया।

    “उनकी पत्नी?”

    “हाँ… सर की पत्नी का तो पिछले साल ही देहांत हो गया था। बहुत ही अच्छी और शांत स्वभाव की थीं। उनके जाने के बाद से सर बिल्कुल बदल गए हैं… ना किसी से बात करते हैं, ना किसी को घर पर बुलाते हैं…”

    रूहानी की आँखें धीरे-धीरे चौड़ी हो गईं।

    “मर… गईं?” उसके होठों पर बस यही शब्द फिसले।

    मीना ने हल्की सहानुभूति जताते हुए सिर हिलाया, “बहुत मुश्किल वक़्त था उनके लिए।”

    रूहानी का मन डगमगाने लगा।

    उस आदमी की आँखों का खालीपन…

    उसकी उदासी…

    और अब ये सुनना कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं रही…

    सब कुछ किसी उलझे हुए रहस्य की तरह लगने लगा।

    रूहानी की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी ऐसी कहानी का हिस्सा बन गई है, जिसमें न चाहते हुए भी उसे शामिल होना पड़ रहा है।

    “मैडम… आप ठीक हैं?” मीना की आवाज़ ने उसे चौंका दिया।

    “हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ…” रूहानी ने खुद को संभालते हुए कहा।

    मगर उसकी आँखों में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था —

    वो कौन था?

    उसकी आँखों में वो खालीपन क्यों था?

    क्या ये घर सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का बना था, या इसमें कोई अनकहा दर्द दफ़न था?

    उसके दिल में इस अजनबी शख्स को लेकर एक अजीब-सा खिंचाव महसूस हो रहा था — ऐसा खिंचाव जो डर के साथ-साथ किसी अनकही कहानी को जानने की बेचैनी से भरा हुआ था।

    उसका मन कह रहा था—यह कहानी सिर्फ़ उसकी नहीं थी। वह किसी और की जिंदगी के ऐसे पन्ने में दाखिल हो गई थी, जहां से वापस लौटना अब शायद उसके बस में नहीं था।

    ——–

    दरवाज़े के पीछे आखिर क्या था, जिसे वक़्त की धूल ने ढक रखा था?

    उस आदमी की आँखों का खालीपन… क्या वो सिर्फ़ ग़म था, या किसी छुपे हुए राज़ की परछाई?

    इस घर की खामोशी में कोई अनसुनी दास्तान थी, मगर क्या रूहानी उसे सुनने के लिए तैयार थी?

  • अधूरी इबादत

    अधूरी इबादत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     भाग~1 अद्वैत और वो अनजान लड़की

    ————

    रात अपने सन्नाटे में डूबी थी। सड़कों पर दूर-दूर तक वीरानी पसरी थी, बस कभी-कभी किसी गाड़ी के गुजरने की हल्की सी आवाज़ उस खामोशी को तोड़ देती थी। अद्वैत अपनी कार चलाते हुए ख्यालों में गुम था। उसका मन उस रात किसी उलझन में था, जैसे कोई अधूरी बात ज़हन के किसी कोने में अटकी हो, बार-बार लौटकर उसे बेचैन कर रही हो।

    उसके भीतर का तूफान उससे कहीं ज़्यादा शोर मचा रहा था, जितना बाहर की खामोशी में मुमकिन था। उसकी आंखें सड़क पर थीं, मगर दिमाग कहीं और भटक रहा था। अतीत की परछाइयाँ उसकी सोच पर हावी थीं — कुछ बातें जिन्हें वह भुला देना चाहता था, मगर वे हर बार नए ज़ख्म खोल जाती थीं।

    उसकी उंगलियां स्टीयरिंग पर कसकर जकड़ी हुई थीं, जैसे अगर उसने अपनी पकड़ ढीली की तो उसके भीतर का दर्द अचानक उबल पड़ेगा। सड़क किनारे जलती स्ट्रीट लाइट्स उसकी कार की खिड़की पर छोटे-छोटे प्रतिबिंब बनाती और फिर ग़ायब हो जातीं, ठीक वैसे ही जैसे उसकी ज़िन्दगी के वो पल, जो कभी चमकदार थे, मगर अब सिर्फ धुंधली यादों के अक्स बनकर रह गए थे।

    हवा ठंडी थी, लेकिन उसके माथे पर पसीने की हल्की बूँदें थीं। ना जाने क्यों, उसके दिल में एक अनजानी बेचैनी दौड़ रही थी — बिना वजह, बिना नाम की।  

    तभी उसकी नज़र सामने पुल पर पड़ी। वहाँ एक लड़की खड़ी थी….. 

    सफ़ेद सलवार-कुर्ते में लिपटी, उसके बाल हवा में बेतरतीब लहरा रहे थे। उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे उसकी आत्मा ही उसका भार संभालने से इनकार कर रही हो। उसकी नज़रें नीचे गहरी खाई में टिकी थीं — एक भयावह खालीपन, जिसमें गिरने के बाद शायद कुछ भी बाकी न रहे।

    उसकी चाल में ठहराव नहीं था, वो बस किसी खयाल में डूबी आगे बढ़ती जा रही थी — सीधा पुल के किनारे की तरफ। अद्वैत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। लड़की का चेहरा आधा छुपा था, मगर उसके कंधे पर बिखरे बाल और काँपती देह साफ दिख रही थी। 

    अद्वैत के भीतर कुछ धड़क उठा। उसके मन में अजीब-सी बैचेनी थी।

    “ये क्या कर रही है?” उसने खुद से कहा और बिना सोचे समझे तेज़ी से ब्रेक पर पैर मारा। टायरों की चीखती आवाज़ सन्नाटे को चीर गई।  

    वो कार से उतरकर लगभग दौड़ते हुए पुल की ओर भागा। लड़की अब पुल की रेलिंग पर खड़ी थी — आगे झुकी हुई, बस एक हल्की हवा के झोंके में गिर जाने को तैयार।  

    “रुको!” अद्वैत की आवाज़ अचानक फट पड़ी, मगर लड़की ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।  

    उसके कदम तेज़ हुए। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह उस लड़की की तरफ़ क्यों खींचा चला जा रहा है — शायद यह डर था कि वो किसी की जान जाते हुए अब नहीं देख पाएगा या फिर कहीं भीतर दबा वो दर्द जो किसी को भी टूटता हुआ देखना और सहन नहीं कर सकता था।

    “रुको, सुनो!” उसने फिर पुकारा।  

    लड़की ने धीरे-से उसकी तरफ देखा — उसकी आँखें सूनी थीं, जैसे भीतर सब कुछ टूट चुका हो। उसके होठों पर कंपन था और चेहरे पर आँसुओं की गीली लकीरें। वो इतनी खोई हुई थी कि उसके कानों तक अद्वैत की आवाज़ ठीक से पहुंच भी नहीं पा रही थी।  

    लड़की ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को आगे झुका लिया।  

    अद्वैत ने बिना कुछ सोचे हल्का दौड़कर उसे पीछे खींच लिया। लड़की का हल्का शरीर उसकी बाहों में झूल गया। दोनों का संतुलन बिगड़ा और वे वहीं पुल के फर्श पर गिर पड़े।  

    अद्वैत का सिर हल्का-सा घूम गया था, मगर उसकी बाहों में लड़की का चेहरा था — ठंडा और बेजान-सा, मगर उसकी साँसें अब भी चल रही थीं।  

    उसके भीगे बाल अद्वैत के हाथों में उलझ गए थे। अद्वैत ने उसके चेहरे को गौर से देखा — चेहरा इतना मासूम था कि उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यही लड़की अभी कुछ ही पल पहले अपनी जान देने जा रही थी। उसकी आँखें सुर्ख थीं, शायद कई रातों से सोई नहीं थी। उसकी पलकें आधी खुली थीं, बाल बिखरे हुए थे और होंठ सफ़ेद हो चुके थे… मानो उसकी आत्मा धीरे-धीरे उसके जिस्म से अलग हो रही हो। 

    “तुम ठीक हो?” अद्वैत ने उसके चेहरे पर हाथ रखते हुए पूछा, मगर लड़की की पलकें धीरे-धीरे झपकने लगीं।

    “शिट!” अद्वैत फुसफुसाया।।  

    “सुनो….. सुनो!” अद्वैत ने हल्के से उसे झिंझोड़ा, मगर कोई जवाब नहीं आया।  

    उसका मन घबराने लगा। उसे समझ नहीं आया कि क्या करे। आसपास कोई और दिखाई नहीं दे रहा था। वो लड़की को इस हालत में यूँ ही वहाँ नहीं छोड़ सकता था।  

    “अब क्या करूँ?” उसके मन में सवाल घूमने लगे।

    लड़की की हालत देखकर उसे यकीन हो गया कि उसे उसकी देखभाल की ज़रूरत है। बिना ज्यादा सोचे, थोड़ा हिचकिचाते हुए उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और उसे कार में ले आया। उसके कपड़े बर्फ जैसे ठंडे हो चुके थे। अद्वैत ने अपना जैकेट उसके ऊपर डाल दिया और गाड़ी स्टार्ट कर दी।  

    रास्ते भर उसके मन में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था — “ये लड़की कौन है? इसके साथ ऐसा क्या हुआ होगा? और किस बात ने उसे इतना तोड़ दिया था कि ख़ुदकुशी ही उसे आखिरी रास्ता लगी?”

    लड़की का चेहरा कार की रोशनी में हल्का-हल्का चमक रहा था — उस चेहरे पर कुछ ऐसा था जो अद्वैत को बेचैन कर रहा था… एक मासूमियत, एक खोखली उदासी….. कुछ ऐसा जिसे देखकर लगता था कि ये लड़की बहुत कुछ सह चुकी है।  

    अपने अपार्टमेंट पर पहुँचकर अद्वैत ने उसे गोद में उठाया और अंदर ले आया। कमरे का अंधेरा उसे आज ज़्यादा ठंडा और सुनसान लगा। उसने लड़की को धीरे-से सोफे पर लिटाया और उसे ढकने के लिए चादर ढूंढने लगा।  

    अपने कमरे से एक अतिरिक्त मुलायम चादर लाकर अद्वैत ने उसे पूरी तरह ढक दिया। तभी अद्वैत का हाथ उसकी ब्रेसलैट से टकराया, जिसमे सुन्दर सी कैलीग्राफी में “रूहानी” नाम लिखा हुआ था। 

     

    “रूहानी” उसने फुसफुसाते हुए दोहराया, मानो कोई मंत्र उच्चारण कर रहा हो।  

    अद्वैत ने धीरे-से उसके हाथों को अपने हाथ में लिया — उसकी उंगलियाँ सख्त और ठंडी थीं। वो उस हाथ को अपने हाथों में मसलने लगा ताकि उसकी ठंडक कुछ कम हो सके।  

    रूहानी की आँखें हल्की-सी खुलीं, मगर वो उसे देख भी नहीं पाई। उसके होंठ हिले, मगर कोई आवाज़ नहीं निकली।  

    “तुम. … ठीक हो?” अद्वैत ने झुककर पूछा।  

    रूहानी के होंठ काँप रहे थे, जैसे किसी डर ने उसकी आवाज़ छीन ली हो।  

    “मैं…. मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगा,” अद्वैत की आवाज़ में अजीब-सा अपनापन था, जिसे सुनकर लड़की के चेहरे पर हल्की राहत की परछाई उभरी।  

    वो धीरे से पास वाले सोफे पर बैठ गया, उसके चेहरे की ओर देखते हुए।   

    कमरे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। अद्वैत का दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था। 

    आखिर रूहानी के साथ क्या हुआ होगा? उसकी आँखों में जो खालीपन था, उसमें कितनी कहानियाँ दबी थीं… अद्वैत जानना चाहता था, मगर इस वक्त सबसे ज़रूरी था कि वो सुरक्षित रहे।  

    “शायद कल सुबह ही सब कुछ समझ आए…” उसने खुद को दिलासा दिया और अपने कमरे में चले गया सोने के लिए मगर उस रात नींद उसके लिए दूर की चीज़ थी…

    —————

    क्या अद्वैत ने सच में रूहानी को बचा लिया, या वो सिर्फ एक परछाई थी जो उसकी ज़िंदगी में अचानक दाखिल हो गई?

    रूहानी की आँखों में जो डर था, वो किसी एक रात की देन था या एक लंबे अतीत का बोझ?

    क्या अद्वैत सच में जानना चाहता था कि रूहानी की कहानी क्या है, या वो बस उसकी उदासी में खुद को देख रहा था?

  • जिसे हम लड़ाई समझते रहे

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    जिसे हम लड़ाई समझते रहे

     

    “तुमने फिर मेरी किताब छुपाई?”

     

    सिया ने गुस्से में आरव के कमरे का दरवाज़ा खोलते हुए पूछा।

     

    आरव बिल्कुल आराम से कुर्सी पर बैठा था और उसके हाथ में वही किताब थी, जिसे सिया पिछले दस मिनट से पूरे घर में ढूंढ रही थी।

     

    “मैंने नहीं छुपाई,” आरव ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “बस तुम्हारी किताब को थोड़ी देर के लिए मुझसे मिलने का मौका दिया था।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आरव!”

     

    “क्या?”

    “तुम कभी बड़े नहीं हो सकते?”

     

    आरव हंस पड़ा।

    “और तुम कभी गुस्सा करना बंद नहीं कर सकती?”

     

    सिया ने उसके हाथ से किताब छीनी और पैर पटकती हुई बाहर जाने लगी।

     

    “वैसे गणित का होमवर्क कर लिया?” आरव ने पीछे से पूछा।

     

    सिया अचानक रुक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि नहीं किया?”

     

    “तुम्हारी शक्ल देखकर।”

     

    “तुम बहुत परेशान करते हो!”

     

    “पता है।”

     

    “फिर भी नहीं सुधरते?”

     

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारे साथ रहने की आदत है।”

     

    सिया कुछ पल उसे देखती रही। फिर बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

     

    लेकिन उस दिन आरव की वह बात उसके मन में बहुत देर तक घूमती रही।

     

    आरव और सिया बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। उनके घर आमने-सामने थे और दोनों की जिंदगी में एक-दूसरे की मौजूदगी हमेशा से थी। बचपन में उनकी लड़ाई किसी भी बात पर शुरू हो जाती थी।

     

    कभी आरव सिया की चोटी खींच देता।

     

    कभी सिया उसकी कॉपी पर पेन से मूंछें बना देती।

     

    कभी आरव उसका टिफिन खा जाता और मासूम बनकर कहता, “मुझे लगा ये मेरा है।”

     

    सिया गुस्से में कहती, “तुम्हें हर चीज़ अपना ही क्यों लगती है?”

     

    आरव हंसते हुए जवाब देता, “क्योंकि तुम मेरी पड़ोसन हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो पड़ोसी की चीज़ें आधी अपनी होती हैं।”

     

    “मैं कोई चीज़ नहीं हूं!”

     

    “हां, तुम तो पूरी आफत हो।”

     

    और फिर दोनों लड़ते-लड़ते खुद ही हंसने लगते।

     

    समय बीतता गया। बचपन पीछे छूट गया। स्कूल खत्म हुआ और कॉलेज शुरू हो गया। उनकी लड़ाइयां अब भी खत्म नहीं हुई थीं, बस उनका तरीका बदल गया था।

     

    पहले आरव सिया की चोटी खींचता था, अब उसके हाथ से फोन छीनकर भाग जाता था।

     

    पहले सिया उसकी कॉपी फाड़ देती थी, अब उसके सोशल मीडिया पर अजीब-अजीब तस्वीरें लगा देती थी।

     

    लेकिन इन सबके बीच कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।

     

    अब अगर आरव एक दिन सिया से बात न करे, तो सिया को अजीब-सा लगने लगता।

     

    वह खुद से पूछती, “आज ये चुप क्यों है?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती, “मुझे क्या फर्क पड़ता है?”

     

    लेकिन फर्क पड़ता था।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    एक दिन कॉलेज से लौटते समय सिया का पैर सड़क पर फिसल गया। वह गिरते-गिरते बची। आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “देखकर नहीं चल सकती?”

     

    सिया ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, “मैं ठीक हूं।”

     

    “हां, दिख रहा है। गिरते-गिरते भी तुम्हें अपनी अकड़ की चिंता है।”

     

    “तुम मदद कर रहे हो या ताना मार रहे हो?”

     

    “दोनों।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    आरव अब भी उसका हाथ पकड़े हुए था।

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर सिया ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “छोड़ो।”

     

    आरव ने तुरंत हाथ छोड़ दिया।

     

    लेकिन उस दिन दोनों के बीच कुछ बदल गया था।

     

    सिया ने पहली बार महसूस किया कि आरव का हाथ पकड़ना उसे बुरा नहीं लगा था।

     

    बल्कि अच्छा लगा था।

     

    बहुत अच्छा।

     

    लेकिन उसने इस एहसास को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    क्योंकि आरव और सिया के बीच प्यार जैसी कोई चीज़ हो सकती है, यह सोच भी उन्हें अजीब लगती थी।

     

    वे तो बचपन से लड़ते आए थे।

     

    कुछ दिनों बाद आरव की तबीयत खराब हो गई। सिया को पता चला तो वह शाम को उसके घर पहुंच गई।

     

    आरव बिस्तर पर लेटा था।

     

    सिया दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, “क्या हुआ?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर उसे देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां, मैं। तुम्हें देखने आई हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम बीमार हो।”

     

    “तो?”

     

    “तो क्या?”

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    सिया ने तुरंत मुंह बनाया।

     

    “बिल्कुल नहीं। मैं तो बस देखने आई हूं कि तुम सच में बीमार हो या नाटक कर रहे हो।”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मेरी चिंता होती है।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    “होती है।”

     

    “नहीं होती।”

     

    “बहुत होती है।”

     

    “चुप रहो!”

     

    आरव हंसने लगा, लेकिन हंसते-हंसते खांस पड़ा।

     

    सिया का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “आरव!”

     

    वह उसके पास बैठ गई।

     

    “पानी चाहिए?”

     

    आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    सिया ने उसे पानी दिया और फिर उसका माथा छूकर बोली, “तुम्हें बुखार है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा, “तुम मेरे लिए इतनी परेशान क्यों हो रही हो?”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    वह बस धीरे से बोली, “पता नहीं।”

     

    और शायद यही सच था।

     

    उसे सच में नहीं पता था।

     

    आरव ठीक हो गया, लेकिन उसके बाद उनके बीच कुछ बदल गया।

     

    अब वे पहले की तरह लड़ते तो थे, लेकिन लड़ाई के बाद दोनों एक-दूसरे को देखने लगते।

     

    आरव कभी-कभी बिना किसी वजह के सिया के घर के बाहर खड़ा रहता।

     

    सिया खिड़की से उसे देखकर पूछती, “क्या चाहिए?”

     

    आरव कहता, “कुछ नहीं।”

     

    “फिर यहां क्यों खड़े हो?”

     

    “पता नहीं।”

     

    और दोनों कुछ देर चुप रहते।

     

    कभी-कभी उन्हें खुद समझ नहीं आता था कि वे एक-दूसरे के पास क्यों रहना चाहते हैं।

     

    जब आरव कहीं बाहर जाता, तो सिया बार-बार अपना फोन देखती।

     

    जब सिया किसी दोस्त के साथ ज्यादा देर बात करती, तो आरव का मूड खराब हो जाता।

     

    “क्या हुआ?” सिया पूछती।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर मुंह क्यों बना रखा है?”

     

    “मैंने कब मुंह बनाया?”

     

    “अभी बना रखा है।”

     

    “तुम्हें बहुत ध्यान रहता है मेरे चेहरे का।”

     

    “क्योंकि तुम हर समय अजीब शक्ल बनाते रहते हो।”

     

    “तुम जल रही हो क्या?”

     

    “तुमसे? बिल्कुल नहीं।”

     

    “मैंने तो पूछा भी नहीं था।”

     

    सिया चुप हो जाती और आरव मुस्कुराने लगता।

     

    लेकिन दोनों के दिल में कुछ ऐसा था, जिसका नाम वे नहीं जानते थे।

     

    एक शाम दोनों छत पर बैठे थे। सिया चुपचाप सामने देख रही थी।

     

    आरव ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे इतना जानते कब से हो?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पता नहीं।”

     

    “तुम्हें कुछ पता भी है?”

     

    आरव हल्का-सा हंसा।

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “जब तुम परेशान होती हो तो ज्यादा चुप हो जाती हो। जब तुम्हें डर लगता है तो गुस्सा करने लगती हो। और जब तुम खुश होती हो तो बिना वजह बहुत बोलती हो।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं हमेशा बोलती हूं।”

     

    “हां, वो भी सही है।”

     

    सिया हंस दी।

     

    आरव भी मुस्कुराया।

     

    कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।

     

    वह चुप्पी अजीब नहीं थी।

     

    अच्छी थी।

     

    सुकून देने वाली।

     

    सिया ने धीरे से पूछा, “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

     

    आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कहां?”

     

    “कहीं भी।”

     

    “तो वापस आ जाना।”

     

    “अगर नहीं आ पाई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला, “तो मैं लेने आ जाऊंगा।”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने जवाब देने के लिए मुंह खोला, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।

     

    क्यों?

     

    वह खुद नहीं जानता था।

     

    बस इतना जानता था कि सिया अगर उससे दूर चली गई, तो उसकी जिंदगी में कुछ बहुत जरूरी चीज़ कम हो जाएगी।

     

    शायद उसकी सबसे बड़ी लड़ाई।

     

    शायद उसकी सबसे अच्छी दोस्त।

     

    या शायद कुछ और।

     

    समय आगे बढ़ता गया।

     

    आरव और सिया की जिंदगी में बहुत कुछ बदला, लेकिन उनका रिश्ता नहीं बदला।

     

    वे आज भी लड़ते थे।

     

    छोटी-छोटी बातों पर बहस करते थे।

     

    एक-दूसरे को चिढ़ाते थे।

     

    लेकिन अब दोनों को एक-दूसरे की आदत हो चुकी थी।

     

    ऐसी आदत, जिसके बिना दिन अधूरा लगता था।

     

    एक दिन आरव ने सिया से पूछा, “तुम्हें कभी लगता है कि हम दोनों कुछ ज्यादा ही साथ रहते हैं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “तुम्हें कोई परेशानी है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “बस पूछ रहा था।”

     

    सिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “तुम्हारे बिना रहना मुश्किल होगा।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    सिया तुरंत संभल गई।

     

    “मतलब… लड़ने के लिए कोई और मिलेगा नहीं न।”

     

    आरव मुस्कुरा दिया।

     

    “हां, मैं भी यही सोच रहा था।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन उस हंसी के पीछे एक सच्चाई थी।

     

    वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे।

     

    बस उन्हें इसका एहसास नहीं था।

     

    उन्हें लगता था कि यह दोस्ती है।

     

    आदत है।

     

    रोज़ की लड़ाई है।

     

    एक-दूसरे की चिंता करने की आदत है।

     

    लेकिन शायद प्यार हमेशा अचानक नहीं होता।

     

    कभी-कभी प्यार धीरे-धीरे आता है।

     

    बचपन की छोटी-छोटी लड़ाइयों के साथ।

     

    किसी की किताब छुपाने से।

     

    किसी का टिफिन चुराने से।

     

    किसी के बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंच जाने से।

     

    और फिर एक दिन अचानक पता चलता है कि जिस इंसान से हम सबसे ज्यादा लड़ते हैं, वही हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी बन चुका है।

     

    कुछ साल बाद आरव और सिया की शादी तय हो गई।

     

    दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था।

     

    लेकिन सिया उस दिन सुबह से ही बहुत चुप थी।

     

    आरव ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ?”

     

    सिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ आज भी बहुत कुछ है।”

     

    सिया ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आज भी परेशान करोगे?”

     

    “आदत है।”

     

    सिया की आंखें भर आईं।

     

    आरव का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे… रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने अपनी आंखें पोंछते हुए कहा, “पता नहीं।”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “आज तो तुम्हें खुश होना चाहिए।”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    “हां… खुश हूं।”

     

    “फिर रो क्यों रही हो?”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    शायद उसे अपने बचपन की सारी बातें याद आ रही थीं।

     

    वह लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    जो उसका टिफिन खा जाता था।

     

    जो उसे हर बात पर परेशान करता था।

     

    जो उसके दुखी होने पर खुद परेशान हो जाता था।

     

    जिसके साथ उसने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल बिताए थे।

     

    आज वही आरव उसका जीवनसाथी बनने वाला था।

     

    शादी के दिन जब सिया दुल्हन बनकर मंडप में आई, तो आरव उसे देखकर कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।

     

    सिया ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    वही आरव।

     

    वही आंखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    बस आज उसके चेहरे पर बचपन वाली शरारत थोड़ी कम थी।

     

    पंडित जी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए।

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा।

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच हल्की-सी मुस्कान दी।

     

    “पता नहीं।”

     

    आरव धीरे से बोला, “आज भी तुम्हें कुछ पता नहीं?”

     

    सिया ने उसे देखा।

     

    फिर धीरे से बोली, “शायद आज पता चल गया।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “क्या?”

     

    सिया की आंखों से आंसू फिर बह निकले।

     

    “कि मैं तुमसे बचपन से ही प्यार करती थी।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

     

    “मुझे भी आज ही पता चला।”

     

    “झूठे।”

     

    “सच में।”

     

    “तुम तो हमेशा कहते थे कि मैं आफत हूं।”

     

    “हां, हो।”

     

    सिया ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा, “फिर शादी क्यों कर रहे हो?”

     

    आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “क्योंकि पूरी जिंदगी इस आफत के साथ लड़ना है।”

     

    सिया हंसते-हंसते रो पड़ी।

     

    फेरे शुरू हुए।

     

    हर फेरे के साथ सिया आरव की ओर देखती रही।

     

    उसकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    आरव कभी उसे देखता, कभी मुस्कुराता, कभी चुपचाप उसकी आंखों से आंसू पोंछ देता।

     

    सिया उसे देखती रही।

     

    उसे याद आ रहा था—

     

    वह छोटा-सा लड़का, जो उसकी चोटी खींचकर भाग जाता था।

     

    वह लड़का, जिससे वह हर छोटी बात पर लड़ती थी।

     

    वह लड़का, जिसके बिना एक दिन भी अब अधूरा लगता था।

     

    आज वही उसके सामने बैठा था।

     

    उसका हाथ थामे।

     

    उसके साथ सात फेरे ले रहा था।

     

    सिया की आंखों से आंसू बहते रहे।

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ दबाया।

     

    सिया ने उसकी ओर देखा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे मुस्कुराकर उसे भरोसा दिया।

     

    और उस पल सिया समझ गई—

     

    कुछ रिश्ते अचानक प्यार नहीं बनते।

     

    वे बचपन से धीरे-धीरे हमारे साथ बड़े होते हैं।

     

    पहले लड़ाई बनकर।

     

    फिर दोस्ती बनकर।

     

    फिर आदत बनकर।

     

    और एक दिन…

     

    चुपचाप प्यार बन जाते हैं।

     

    आरव और सिया ने कभी नहीं जाना कि उन्हें एक-दूसरे से प्यार कब हुआ था।

     

    शायद उस दिन…

     

    जब आरव ने पहली बार सिया की चोटी खींची थी।

     

    या उस दिन…

     

    जब सिया उसके बीमार होने पर बिना बुलाए उसके घर पहुंची थी।

     

    या फिर उन हजारों छोटी-छोटी लड़ाइयों के बीच…

     

    जिन्हें वे हमेशा लड़ाई समझते रहे।

     

    लेकिन सच तो यह था—

     

    उनकी हर लड़ाई में थोड़ा-सा प्यार छुपा था।

     

    और आखिरकार उसी प्यार ने उन्हें एक-दूसरे का बना दिया।