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  • जादुई दुनियां का अनचाहा मेहमान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई दुनिया का अनचाहा मेहमान

     

    रवि एक साधारण लड़का था। उसकी उम्र लगभग पच्चीस साल थी। वह अपने छोटे से गांव में अपनी माँ के साथ रहता था। खेती करके और कभी-कभी शहर जाकर मजदूरी करके घर चलाता था। उसकी जिंदगी बिल्कुल आम थी। लेकिन उसे बचपन से ही रहस्यमयी जगहों की कहानियां सुनना बहुत पसंद था।

     

    एक दिन शाम के समय रवि जंगल की तरफ लकड़ियां लेने गया। उस दिन मौसम भी कुछ अजीब था। आसमान पर काले बादल थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। जंगल के अंदर जाते-जाते उसे एक ऐसी जगह दिखी जहां वह पहले कभी नहीं गया था।

     

    उसके सामने दो बहुत बड़े पत्थर खड़े थे। दोनों पत्थरों के बीच एक चमकता हुआ गोल दरवाजा दिखाई दे रहा था। उस दरवाजे से नीली और सुनहरी रोशनी निकल रही थी। रवि ने सोचा कि शायद कोई सपना देख रहा है।

     

    उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर दरवाजे को छुआ।

     

    जैसे ही उसका हाथ दरवाजे से लगा, तेज हवा चली और अगले ही पल वह दरवाजे के अंदर खिंच गया।

     

    जब रवि ने आंखें खोलीं तो वह किसी दूसरी ही दुनिया में था।

     

    चारों तरफ सुंदर महल थे। पेड़ चमक रहे थे। आसमान हल्के बैंगनी रंग का था। नदियों का पानी चांदी की तरह चमक रहा था। वहां के लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए थे और हर किसी के हाथ में एक चमकती हुई जादुई छड़ी थी।

     

    रवि हैरानी से सब कुछ देख रहा था।

     

    उसी समय कुछ लोग उसके पास आए।

     

    एक आदमी बोला, “तुम कौन हो? तुम्हारे पास जादुई छड़ी क्यों नहीं है?”

     

    रवि घबरा गया।

     

    “मैं… मैं रवि हूं। मैं तो बस जंगल में गया था। पता नहीं यहां कैसे आ गया।”

     

    सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उनमें से एक बूढ़ा आदमी बोला, “लगता है जादुई दरवाजा गलती से किसी इंसानी दुनिया के व्यक्ति को यहां ले आया है।”

     

    रवि को वे लोग अपने राजा के महल में ले गए।

     

    महल बहुत बड़ा था। वहां का राजा उम्र में लगभग पचास साल का था। उसके सिर पर चमकता हुआ मुकुट था।

     

    राजा ने रवि से पूछा,

    “क्या तुम्हारी दुनिया में सचमुच जादू नहीं होता?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “नहीं महाराज। वहां लोग मेहनत करके अपना काम करते हैं। खेत जोतते हैं, खाना बनाते हैं, पढ़ाई करते हैं और काम करके पैसे कमाते हैं।”

     

    पूरे दरबार में शांति का माहौल छा गया 

     

    क्योंकि वहां तो हर छोटा-बड़ा काम जादू से होता था।

     

    खाना बनाना हो तो जादू।

     

    घर साफ करना हो तो जादू।

     

    खेती करनी हो तो जादू।

     

    यहां तक कि बच्चे पढ़ाई भी जादू से याद कर लेते थे।

     

    राजा ने कहा,

    “तुम कुछ दिन हमारे मेहमान बनकर रहो।”

     

    रवि ने हां कर दी।

     

    धीरे-धीरे उसने उस दुनिया को समझना शुरू किया।

     

    वहां किसी को मेहनत करने की आदत ही नहीं थी।

     

    अगर किसी की किताब गिर जाए तो जादू।

     

    अगर कपड़े गंदे हो जाएं तो जादू।

     

    अगर किसी को कहीं जाना हो तो जादू।

     

    रवि को यह सब देखकर अजीब लगता था।

     

    एक दिन वह महल के बगीचे में गया।

     

    वहां उसने देखा कि एक छोटा बच्चा रो रहा था।

     

    रवि ने पूछा,

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा,

    “मेरी जादुई छड़ी खो गई है। अब मैं कुछ भी नहीं कर सकता।”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    उसने बच्चे का हाथ पकड़ा और बोला,

    “आओ, बिना जादू के खेलते हैं।”

     

    दोनों ने मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाए। पत्थरों से खेल खेले और पेड़ के नीचे बैठकर बातें कीं।

     

    बच्चा पहली बार इतना खुश हुआ।

     

    धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी वहां आ गए।

     

    सब बिना जादू के खेलने लगे।

     

    महल की रानी ने यह सब देखा तो वह भी हैरान रह गई।

     

    कुछ दिनों बाद उस दुनिया में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    हर साल वहां एक जादुई ऊर्जा का स्रोत पूरे राज्य को शक्ति देता था।

     

    लेकिन इस बार वह अचानक बंद हो गया।

     

    अब किसी का जादू काम नहीं कर रहा था।

     

    पूरा राज्य घबरा गया।

     

    लोग खाना तक नहीं बना पा रहे थे।

     

    किसानों को समझ नहीं आ रहा था कि खेती कैसे करें।

     

    बच्चे रोने लगे।

     

    राजा परेशान हो गया।

     

    तभी रवि ने कहा,

    “अगर आप लोग चाहें तो मैं एक तरीका बता सकता हूं।”

     

    राजा ने तुरंत कहा,

    “बताओ।”

     

    रवि लोगों को खेतों में ले गया।

     

    उसने अपने हाथ से मिट्टी खोदी।

     

    बीज बोए।

     

    लोगों को सिखाया कि बिना जादू के भी खेती की जा सकती है।

     

    फिर उसने कुछ लोगों के साथ मिलकर लकड़ियां इकट्ठी कीं और आग जलाकर खाना बनाया।

     

    औरतों ने पहली बार अपने हाथों से रोटी बनाई।

     

    बच्चों ने मिलकर पानी भरा।

     

    सभी लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।

     

    शुरुआत में सबको मुश्किल हुई।

     

    लेकिन कुछ ही दिनों में पूरा राज्य मेहनत करना सीख गया।

    सबको समझ आने लगा कि केवल जादू ही सब कुछ नहीं होता।

    मेहनत की अपनी अलग ताकत होती है।

    राजा रोज रवि को देखता और मन ही मन उसकी इज्जत करने लगा।

    कुछ दिनों बाद अचानक पूरे राज्य में फिर वही सुनहरी रोशनी फैल गई।

    जादुई ऊर्जा वापस लौट आई।

    सबका जादू फिर से चलने लगा।

    लेकिन इस बार किसी ने पहले की तरह हर काम जादू से नहीं किया।

    लोग जरूरत पड़ने पर ही जादू का इस्तेमाल करने लगे।

    बाकी काम अपने हाथों से करने लगे।

    राजा ने पूरे राज्य के सामने कहा,

    “आज हमने सीखा है कि जादू हमें सुविधा दे सकता है, लेकिन मेहनत हमें मजबूत बनाती है।”

    अब रवि के वापस जाने का समय आ गया था।

    वही जादुई दरवाजा फिर से खुल चुका था।

    राजा, रानी और पूरे राज्य के लोग उसे विदा करने आए।

    राजा ने कहा,

    “तुम हमारे लिए किसी जादूगर से कम नहीं हो। तुमने हमें मेहनत की असली ताकत सिखाई है।”

    रवि मुस्कुराया।

    “मैंने तो सिर्फ वही सिखाया जो हमारी दुनिया का हर इंसान बचपन से सीखता है।”

    रवि दरवाजे के अंदर चला गया।

    अगले ही पल वह फिर उसी जंगल में था।

    ऐसा लग रहा था जैसे केवल कुछ मिनट ही बीते हों।

    वह घर पहुंचा तो उसकी माँ ने पूछा,

    “इतनी देर कहां रह गए थे?”

    रवि मुस्कुराया और बोला,

    “माँ… आज बहुत दूर चला गया था।”

    उसने पूरी बात किसी को नहीं बताई।

    क्योंकि उसे पता था कि कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा।

     

    लेकिन जब भी वह उस जंगल के पास से गुजरता, एक पल के लिए रुककर मुस्कुरा देता।

     

    शायद कहीं न कहीं वह जादुई दरवाजा आज भी उसका इंतजार कर रहा था।

     

  • प्यार में धोखा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    जिसने किया सच्चा प्यार

     

    राघव तीस साल का एक सफल बिजनेसमैन था। कभी उसके नाम से पूरा शहर उसे पहचानता था। करोड़ों का कारोबार, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस… उसके पास हर वह चीज़ थी जिसकी लोग सिर्फ कल्पना करते हैं। लेकिन इतनी दौलत होने के बाद भी उसके दिल में एक खालीपन था। वह चाहता था कि कोई उसे उसके पैसों के लिए नहीं, बल्कि उसके दिल के लिए प्यार करे।

     

    एक दिन उसकी मुलाकात नंदिनी से हुई। नंदिनी खूबसूरत होने के साथ-साथ बातों की भी बहुत तेज थी। वह इतनी मीठी बातें करती कि सामने वाला आसानी से उस पर भरोसा कर ले। राघव भी उसके प्यार में पूरी तरह डूब गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों रोज मिलने लगे। नंदिनी हर बार कहती, “राघव, तुम मेरी जिंदगी हो। तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूँ।”

     

    ये बातें सुनकर राघव का दिल खुशी से भर जाता। उसने पहली बार किसी पर इतना भरोसा किया था।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने उससे कहा, “मम्मी की तबीयत बहुत खराब है। इलाज के लिए पैसों की जरूरत है।”

     

    राघव ने बिना कुछ पूछे लाखों रुपये दे दिए।

     

    फिर कभी उसने बिजनेस शुरू करने के लिए पैसे मांगे, कभी फ्लैट खरीदने के लिए, तो कभी किसी रिश्तेदार की मदद के नाम पर। हर बार राघव ने मुस्कुराते हुए उसकी मदद की। उसे लगता था कि आखिर वह अपनी होने वाली पत्नी के लिए ही तो सब कर रहा है।

     

    धीरे-धीरे राघव ने अपनी कई प्रॉपर्टी, निवेश और कंपनी के शेयर भी नंदिनी के नाम कर दिए।

     

    दो साल गुजर गए।

     

    एक शाम राघव ने एक खूबसूरत अंगूठी खरीदी और नंदिनी के पास पहुंचा।

     

    वह मुस्कुराते हुए बोला, “अब हमें शादी कर लेनी चाहिए।”

     

    नंदिनी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसने ठंडी आवाज़ में कहा, “शादी? मैं तुमसे शादी क्यों करूँ?”

     

    राघव हैरान रह गया।

     

    “लेकिन… तुम तो मुझसे प्यार करती हो।”

     

    नंदिनी हंस पड़ी।

     

    “मैंने तुमसे नहीं, तुम्हारे पैसों से प्यार किया था। अब मेरे पास सब कुछ है। तुम्हारी जरूरत खत्म हो चुकी है।”

     

    इतना कहकर उसने एक अमीर आदमी का हाथ पकड़ा और वहां से चली गई।

     

    राघव वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी आंखों के सामने सब खत्म हो चुका था।

     

    कुछ ही दिनों में उसे पता चला कि उसके नाम पर भारी कर्ज भी चढ़ चुका है। कंपनी हाथ से निकल गई। बंगला बिक गया। बैंक अकाउंट खाली हो गए।

     

    जिस इंसान ने दूसरों की मदद की थी, आज वही खुद मदद मांगने लायक भी नहीं बचा।

     

    धीरे-धीरे वह सदमे में डूब गया।

     

    उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा।

     

    वह सड़कों पर भटकने लगा। कभी किसी पार्क में बैठ जाता, कभी किसी मंदिर की सीढ़ियों पर रात गुजार देता।

     

    उसके बाल बिखरे रहते, कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर हमेशा खोई हुई नजरें रहतीं।

     

    वह हर आने-जाने वाली लड़की को देखकर बस एक ही नाम पुकारता—

     

    “नंदिनी… तुम लौट आई क्या?”

     

    लोग उसे पागल समझकर हंसते।

     

    कुछ बच्चे उसके पीछे पत्थर फेंकते।

     

    कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते और मजाक उड़ाते।

     

    लेकिन किसी ने उसके टूटे हुए दिल को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी।

     

    राघव सड़क किनारे भीगा हुआ बैठा था। कई दिनों से उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था।

     

    उसी समय वहां से पच्चीस साल की एक लड़की गुजरी।

     

    उसका नाम मीरा था।

     

    मीरा बचपन से अनाथ थी। उसने अनाथ आश्रम में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की थी और अब एक छोटे अस्पताल में नर्स की नौकरी करती थी।

     

    उसने जैसे ही राघव को देखा, उसके कदम वहीं रुक गए।

     

    उसकी आंखों में दया नहीं, अपनापन था।

     

    वह पास आई और धीरे से बोली,

    “भैया… आपने कुछ खाया है?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।

     

    मीरा पास की दुकान से खाना और पानी लेकर आई।

     

    राघव पहले तो चुपचाप उसे देखता रहा, फिर धीरे-धीरे खाना खाने लगा।

     

    उस दिन के बाद मीरा रोज उसी रास्ते से आने लगी। हर शाम वह उसके लिए खाना लेकर आती, दवा लाती और कुछ देर उसके पास बैठती।

     

    उसे नहीं पता था कि यह आदमी कौन है। बस इतना जानती थी कि यह इंसान बहुत गहरे दर्द में है।

     

    एक दिन राघव तेज बुखार में सड़क पर बेहोश हो गया।

     

    मीरा घबरा गई।

     

    उसने लोगों से मदद मांगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया।

     

    आखिर वह अकेले ही एक रिक्शा बुलाकर राघव को अस्पताल ले गई।

     

    वहीं से उसकी जिंदगी बदलने लगी…

     

    अस्पताल में डॉक्टर ने राघव की जांच करने के बाद कहा, “इन्हें सिर्फ बुखार नहीं है, ये बहुत गहरे मानसिक सदमे से भी गुजर रहे हैं। अगर इनकी ठीक से देखभाल नहीं हुई तो इनकी हालत और बिगड़ सकती है।”

     

    मीरा ने बिना एक पल सोचे कहा, “इनका इलाज शुरू कीजिए डॉक्टर साहब।”

     

    डॉक्टर ने पूछा, “इनके घर वाले कहाँ हैं?”

     

    मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “आज से मैं ही इनकी जिम्मेदारी हूँ।”

     

    इलाज के बाद मीरा राघव को अपने छोटे-से किराए के घर ले आई। घर में सिर्फ एक कमरा था, एक छोटी-सी रसोई और कुछ जरूरी सामान। लेकिन उस छोटे से घर में अपनापन बहुत था।

     

    पड़ोसियों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं।

     

    “एक अनजान पागल आदमी को घर में रख लिया है।”

     

    “कल को कोई मुसीबत आ गई तो?”

     

    लेकिन मीरा ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।

     

    वह रोज समय पर राघव को दवा देती, खाना खिलाती और उससे बातें करने की कोशिश करती। कई बार राघव घंटों तक चुप बैठा रहता। कभी अचानक रोने लगता, तो कभी नंदिनी का नाम लेकर चीख उठता।

     

    मीरा बस उसके पास बैठ जाती और कहती, “रो लो… कभी-कभी आँसू ही सबसे बड़ी दवा होते हैं।”

     

    धीरे-धीरे कई महीने बीत गए।

     

    राघव की हालत पहले से काफी बेहतर होने लगी। अब वह लोगों को पहचानने लगा था। एक दिन उसने पहली बार मीरा से पूछा,

     

    “तुम मेरे लिए इतना सब क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारा कौन लगता हूँ?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। कभी-कभी इंसानियत भी दो अजनबियों को अपना बना देती है।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    उसने कांपती आवाज़ में अपनी पूरी कहानी मीरा को सुनाई। कैसे उसने अपने प्यार पर भरोसा किया, कैसे सब कुछ उसके नाम कर दिया और कैसे उसी इंसान ने उसे सड़क पर ला खड़ा किया।

     

    सब सुनने के बाद मीरा ने सिर्फ इतना कहा,

     

    “गलती तुम्हारी नहीं थी। तुमने प्यार किया था, सौदा नहीं।”

     

    ये शब्द राघव के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अब अपनी जिंदगी फिर से शुरू करेगा।

     

    मीरा ने उसकी हिम्मत बढ़ाई। उसने अपने कुछ जान-पहचान वालों से बात की और राघव को एक छोटी कंपनी में नौकरी दिलवा दी।

     

    राघव ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया। वह सुबह से रात तक मेहनत करता। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा फिर से जीतने लगा।

     

    कुछ सालों बाद उसने अपनी बचत से एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया। इस बार उसने हर कदम बहुत सोच-समझकर रखा।

     

    उसका काम धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पहली कमाई से मीरा के लिए एक साधारण-सी साड़ी खरीदी।

     

    मीरा ने साड़ी हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती तोहफा है।”

     

    राघव बोला,

     

    “क्योंकि इसमें करोड़ों रुपये नहीं, मेरी मेहनत और तुम्हारे विश्वास की खुशबू है।”

     

    समय के साथ दोनों एक-दूसरे के और करीब आ गए।

     

    एक शाम राघव उसी सड़क पर मीरा को ले गया, जहाँ उसने पहली बार उसे खाना खिलाया था।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया और जेब से एक छोटी-सी अंगूठी निकालते हुए बोला,

     

    “जब सबने मेरा साथ छोड़ दिया था, तब तुमने मेरा हाथ थामा। मेरे पास अब पहले जैसी दौलत नहीं है, लेकिन एक सच्चा दिल जरूर है। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “मैंने तुमसे कभी तुम्हारी दौलत की वजह से प्यार नहीं किया। मुझे तो उस इंसान से प्यार हो गया, जो टूटकर भी किसी से नफरत करना नहीं सीख पाया।”

     

    राघव ने कांपते हाथों से उसे अंगूठी पहना दी।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों की बहुत सादगी से शादी हुई। न कोई शोर, न कोई दिखावा। सिर्फ कुछ अपने लोग और ढेर सारी दुआएँ।

     

    शादी के बाद राघव और मीरा ने मिलकर एक छोटा-सा सेवा केंद्र शुरू किया, जहाँ सड़क पर रहने वाले बेसहारा लोगों को मुफ्त खाना, कपड़े और दवाइयाँ दी जाती थीं। राघव जब भी किसी टूटे हुए इंसान को देखता, उसे अपना पुराना समय याद आ जाता। वह हर किसी से कहता, “मुश्किल वक्त हमेशा नहीं रहता, लेकिन हिम्मत रखने वाले लोग जरूर टिके रहते हैं।” मीरा उसके साथ खड़ी मुस्कुराती रहती। दोनों ने मिलकर कई अनाथ बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया। अब उनकी सबसे बड़ी खुशी दौलत कमाना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में उम्मीद की नई किरण जगाना बन चुकी थी।

     

    कुछ समय बाद राघव ने उसी अनाथ आश्रम में एक बड़ा पुस्तकालय बनवाया, जहाँ मीरा ने अपना बचपन बिताया था। उसने वहाँ पढ़ने वाले हर बच्चे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का संकल्प लिया। जब बच्चों ने उसे “राघव भैया” कहकर गले लगाया, तो उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा कि भगवान ने उससे सब कुछ छीनकर उसे उससे भी बड़ी दौलत दे दी है लोगों की दुआएँ और मीरा जैसा सच्चा जीवनसाथी।

     

    एक दिन मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे राघव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर उस दिन मुझे धोखा न मिलता, तो शायद मैं कभी सच्चे प्यार की पहचान नहीं कर पाता।”

     

    मीरा ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,

    “भगवान कभी-कभी हमारी राह मुश्किल जरूर बनाते हैं, लेकिन मंजिल हमेशा खूबसूरत देते हैं।”

     

    राघव ने आसमान की ओर देखा। उसके चेहरे पर इस बार दर्द नहीं, सुकून था।

     

    उसे आखिरकार वह मिल चुका था जिसकी तलाश उसे बरसों से थी सच्चा प्यार, जो पैसों से नहीं, दिल से किया जाता है।

  • अरबपति सफाईवाला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अरबपति सफाईवाला

     

    सुबह के सात बजे थे। शहर की सबसे बड़ी कंपनी मेहरा ग्रुप के बाहर एक दुबला-पतला लड़का झाड़ू लगा रहा था। उसके कपड़े पुराने थे, हाथों में दस्ताने थे और सिर पर एक साधारण-सी टोपी।

     

    उसका नाम साहिल था।

     

    कंपनी के कर्मचारी रोज़ उसके सामने से गुजरते, लेकिन कोई उसे देखता तक नहीं था। कुछ लोग कूड़ा उसके सामने ही फेंक देते, तो कुछ उसे डाँट देते।

     

    साहिल हर बार बस मुस्कुरा देता।

     

    कंपनी का मालिक विक्रम मेहरा भी अक्सर उसे देखकर कहता, “अरे लड़के, जल्दी सफाई कर। यहाँ गंदगी बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    साहिल सिर झुकाकर “जी साहब” कह देता।

     

    किसी को नहीं पता था कि जिस लड़के को सब एक मामूली सफाईकर्मी समझते हैं, उसकी अपनी दौलत इस पूरी कंपनी से कई गुना ज़्यादा है।

     

    वह करोड़पति ही नहीं, अरबों की संपत्ति का असली मालिक था।

     

    लेकिन फिर भी वह यहाँ झाड़ू क्यों लगा रहा था?

     

    यह सवाल किसी के मन में कभी नहीं आया।

     

    क्योंकि किसी ने उसकी कहानी जानने की कोशिश ही नहीं की।

     

    बीस साल पहले…

     

    बारिश की एक रात शहर के अनाथालय के बाहर एक नवजात बच्चा मिला था।

     

    उसके साथ सिर्फ़ एक चाँदी का लॉकेट था, जिस पर लिखा था—

     

    “सच्चाई मिलते ही यह तुम्हारी पहचान बन जाएगा।”

     

    अनाथालय के संचालक ने उसका नाम साहिल रख दिया।

     

    साहिल वहीं बड़ा हुआ। पढ़ाई में तेज़ था और मेहनती भी।

     

    अठारह साल का होने पर उसे एक वकील मिला।

     

    वकील ने बताया कि एक उद्योगपति धर्मवीर सिंह ने अपनी वसीयत में अपनी सारी संपत्ति एक अनाथ बच्चे के नाम कर दी थी। पहचान के लिए उसी चाँदी के लॉकेट का ज़िक्र था।

     

    जाँच हुई।

     

    लॉकेट वही निकला।

     

    और देखते ही देखते साहिल अरबों की संपत्ति का मालिक बन गया।

     

    लेकिन वकील ने एक और राज़ बताया।

     

    धर्मवीर सिंह की मौत हादसा नहीं थी।

     

    किसी ने उनकी हत्या की थी।

     

    और उनकी सबसे अहम फ़ाइलें आख़िरी बार मेहरा ग्रुप के दफ्तर में देखी गई थीं।

     

    साहिल ने उसी दिन फैसला कर लिया।

     

    वह अपनी पहचान छिपाकर उसी कंपनी में नौकरी करेगा।

     

    सफाईवाले की।

     

    क्योंकि सफाईकर्मी ही ऐसा इंसान होता है जिसे हर कमरे में जाने की इजाज़त होती है, लेकिन कोई उस पर ध्यान नहीं देता।

     

    छह महीने तक साहिल चुपचाप सब देखता रहा।

     

    किस कमरे में कौन आता है…

     

    कौन किससे छिपकर मिलता है…

     

    कौन देर रात तक ऑफिस में रुकता है…

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात अपनी डायरी में लिखता जाता।

     

    एक रात सफाई करते समय उसने कंपनी के पुराने रिकॉर्ड रूम से किसी की बहस की आवाज़ सुनी।

     

    वह दरवाज़े के पीछे छिप गया।

     

    अंदर विक्रम मेहरा और कंपनी का कानूनी सलाहकार बात कर रहे थे।

     

    विक्रम गुस्से में बोला,

     

    “अगर तीस साल पुरानी फ़ाइल किसी को मिल गई, तो सब खत्म हो जाएगा।”

     

    साहिल चौकन्ना हो गया।

     

    यही वह सुराग था जिसकी उसे तलाश थी।

     

    अगले दिन उसने रिकॉर्ड रूम की सफाई का बहाना बनाया।

     

    घंटों खोजने के बाद उसे दीवार के पीछे बना एक छोटा-सा गुप्त लॉकर मिला।

     

    लेकिन लॉकर बंद था।

     

    उसके पास चाबी नहीं थी।

     

    इसी बीच कंपनी का एक बुज़ुर्ग चौकीदार उसके पास आया।

     

    धीरे से बोला,

     

    “बेटा… तुम सफाईवाले नहीं हो, है ना?”

     

    साहिल चौंक गया।

     

    “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    चौकीदार मुस्कुराया।

     

    “सफाईवाले लोग फ़र्श देखते हैं… तुम लोगों के चेहरे पढ़ते हो।”

     

    साहिल ने पहली बार किसी को अपनी सच्चाई बताई।

     

    बुज़ुर्ग की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैं धर्मवीर सिंह के समय से यहाँ हूँ। उनकी मौत हादसा नहीं थी। मैंने सब देखा था, लेकिन डर के कारण कभी बोल नहीं पाया।”

     

    उन्होंने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “यह उसी लॉकर की चाबी है।”

     

    रात होते ही साहिल ने लॉकर खोला।

     

    अंदर कुछ फ़ाइलें, एक पेन ड्राइव और एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    डायरी पढ़ते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    उसमें लिखा था कि धर्मवीर सिंह ने अपनी कंपनी गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए ट्रस्ट को देने का फैसला किया था।

     

    लेकिन उनके सबसे भरोसेमंद साथी विक्रम मेहरा को यह मंजूर नहीं था।

     

    उसने धोखे से दस्तावेज़ बदलवाए, फिर धर्मवीर की हत्या करवा दी और हादसे का रूप दे दिया।

     

    सबूत मिटाने के लिए उसने सारी फ़ाइलें छिपा दीं।

     

    साहिल की आँखों में आँसू आ गए।

     

    जिस इंसान ने उसे बिना देखे अपनी दौलत सौंप दी, उसके साथ इतना बड़ा विश्वासघात हुआ था।

     

    लेकिन अभी सबसे बड़ा सबूत बचा था।

     

    पेन ड्राइव।

     

    उसमें ऑफिस के पुराने कैमरों की रिकॉर्डिंग थी।

     

    वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था कि हादसे वाली रात विक्रम मेहरा और उसके दो साथी धर्मवीर सिंह के कमरे में गए थे।

     

    कुछ देर बाद वे घबराए हुए बाहर निकले।

     

    अगले दिन धर्मवीर की मौत की खबर फैल गई।

     

    अब सच्चाई सामने लाने का समय था।

     

    साहिल ने पुलिस को सबूत सौंप दिए।

     

    अगली सुबह जब पूरी कंपनी के कर्मचारी इकट्ठा हुए, तब पुलिस भी वहाँ पहुँच गई।

     

    सबके सामने विक्रम मेहरा को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    वह चिल्लाने लगा,

     

    “तुम जानते भी हो मैं कौन हूँ?”

     

    तभी साहिल आगे बढ़ा।

     

    उसने अपनी सफाईकर्मी वाली टोपी उतार दी।

     

    जेब से वह पुराना लॉकेट निकाला।

     

    और बोला,

     

    “आज सबको यह भी पता चल जाएगा कि मैं कौन हूँ।”

     

    उसने अदालत के दस्तावेज़, वसीयत और पहचान के कागज़ सबके सामने रख दिए।

     

    पूरा हॉल शांत रह गया।

     

    जिस लड़के को लोग रोज़ झाड़ू लगाने वाला समझते थे…

     

    वह अरबों की संपत्ति का असली मालिक था।

     

    सभी कर्मचारियों को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    जो लोग उसे अपमानित करते थे, वे शर्म से सिर झुकाकर खड़े थे।

     

    लेकिन साहिल ने किसी से बदला नहीं लिया।

     

    उसने सिर्फ़ इतना कहा,

     

    “इंसान की पहचान उसके कपड़ों या नौकरी से नहीं होती। अगर होती, तो शायद मैं कभी सच तक पहुँच ही नहीं पाता।”

     

    कुछ महीनों बाद अदालत ने धर्मवीर सिंह की संपत्ति और ट्रस्ट से जुड़े सभी अधिकार साहिल को सौंप दिए।

     

    साहिल ने सबसे पहला काम वही किया, जिसका सपना धर्मवीर ने देखा था।

     

    उसने अनाथ बच्चों के लिए स्कूल, छात्रवृत्ति और रहने की व्यवस्था शुरू करवाई।

     

    और सबसे खास बात…

     

    उसने मेहरा ग्रुप में सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाई, उनके लिए बीमा और सम्मानजनक सुविधाएँ शुरू कीं।

     

    उद्घाटन के दिन वही बुज़ुर्ग चौकीदार मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बेटा, अब तो मालिक बन गए हो… झाड़ू छोड़ दो।”

     

    साहिल ने मुस्कुराकर झाड़ू उठाई और कंपनी के मुख्य द्वार पर दो मिनट सफाई की।

     

    फिर बोला,

     

    “जिस काम ने मुझे सच तक पहुँचाया, उसे मैं कभी छोटा नहीं कहूँगा।”

     

    उस दिन वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने पहली बार समझा कि बड़ा इंसान वह नहीं होता जिसके पास सबसे ज़्यादा दौलत हो…

     

    बड़ा इंसान वह होता है जो सच, मेहनत और इंसानियत को कभी नहीं छोड़ता।

     

  • अधूरी इबादत भाग~30

    अधूरी इबादत भाग~30

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~30 अद्वैत गया कहाँ? 

     

    अद्वैत की ज़िंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने को था, जैसे किसी शांत सागर की सतह पर अचानक हल्की सी लहरें उठने लगें। 

    उसी शाम, जब घर में एक अजीब सी बेचैनी थी और मन कई सवालों के बीच उलझा हुआ था, उसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी ने कमरे की सन्नाटे को तोड़ दिया। 

    अद्वैत ने फोन उठाया तो एक अनजानी लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ने उसे चौका दिया… “नमस्ते, मैं नेहा बोल रही हूँ, शब्दांजलि पब्लिकेशन की मैनेजर। उम्मीद है आप मेरी बात से अचानक परेशान नहीं होंगे?” 

    अद्वैत ने हौले से मुस्कुरा कर जवाब दिया, “नहीं, बिल्कुल नहीं… कहिए।” 

    मन ही मन उसका दिल धड़कने लगा था, जैसे किसी भूले-बिसरे ख़्वाब की दस्तक मिल रही हो।

    नेहा की आवाज़ में उत्साह था, “हमने आपकी किताब ‘यादों से परे’ पढ़ी है… और यकीन मानिए, जितनी बार पढ़ी, उतनी बार महसूस किया कि हम किसी कहानी को नहीं, किसी की अधूरी साँसों को पढ़ रहे हैं। इसी गहराई के चलते हम आपको और आपकी पत्नी को हमारे सालाना साहित्यिक समारोह में आमंत्रित करना चाहते हैं, जहाँ आपकी मौजूदगी से यह आयोजन और भी खास बन जाएगा।”

    पत्नी शब्द सुनते ही अद्वैत के भीतर कुछ धीमे से दरक गया, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से सांस लेने लगा हो। लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “कब और कहाँ?”

    “अगले रविवार, दोपहर तीन बजे। जगह – साहित्य भवन ऑडिटोरियम, कोरेगांव पार्क, पुणे। हमें उम्मीद है कि आप दोनों ज़रूर आएँगे।”

    अद्वैत ने सिर झुकाकर कहा, “हम कोशिश करेंगे, मेल कर दीजिएगा।”

    थोड़ी देर ठहराव के बाद उसने सवाल किया, “वैसे, आपको मेरे मैनेजर से बात करनी चाहिए थी, जो मेरे सारे काम देखते हैं।”

    नेहा ने हँसते हुए जवाब दिया, “हमने ही तो आपके मैनेजर से आपका नंबर लिया है, पर हमें लगा कि आपको खुद ही व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना बेहतर रहेगा। इसीलिए मैंने सीधे आपसे ही बात की।”

    फोन रखते ही वो कुछ पलों तक सन्न खड़ा रहा। कमरे की हल्की रोशनी में अद्वैत का चेहरा आधे उजाले और आधी छाया में ढला हुआ था, जैसे उसके भीतर उठते भाव भी दो ध्रुवों पर झूल रहे हों… स्पष्टता और संशय के। 

    खिड़की से आती हवा परदों को हौले से हिलाती, जैसे वे भी उसकी उलझनों की फुसफुसाहट दोहरा रहे हों। बाहर का शांत आसमान उसके भीतर के शोर से बिल्कुल विपरीत था।

    टेबल पर फैले दस्तावेज़ अब भी वहीं थे, लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे को टुकड़ों में रोशन कर रही थी, और कोने में पड़ी चाय की कप… जो अब ठंडी हो चुकी थी… जैसे उसके भीतर की उलझनों की प्रतीक बन गई हो।

    उसके अंदर एक खामोश उथल-पुथल चल रही थी — “कैसे कहूँ रूहानी से? क्या वो तैयार होगी? क्या उसे बुरा तो नहीं लगेगा?” 

    वह जानता था कि यह शादी सिर्फ एक समझौता थी, एक काग़ज़ी डोर जिसने दोनों को किसी ज़रूरत की वजह से बाँध रखा था। लेकिन अब हालात कुछ और माँग रहे थे।

    वो जानता था, यह न्योता किसी आम किताब के लेखक को नहीं मिला था… ये एक लेखक को मिला था जो अपने पाठकों की आत्मा को छू चुका था और उसी लेखक के साथ उसकी “पत्नी” को भी आमंत्रित किया गया था… जो असल में उसकी जिंदगी का एक किरदार थी, एक सहयात्री, लेकिन अभी भी एक अनकहा सवाल।

    अद्वैत के मन में विचारों की परतें खुलने लगीं “कहीं ये सब उसे बोझ तो नहीं लगेगा? पर अगर मैं उसे नहीं ले गया तो… ये मौका ही अधूरा रह जाएगा और इस समझौते की पहली शर्त ही तो यही थी कि बाहर की दुनिया के सामने हम एक साथ दिखेंगे… एक पति-पत्नी की तरह।”

    पर अब सवाल काग़ज़ों का नहीं था… सवाल उस मौन का था, जो उनके बीच धीरे-धीरे बोलने लगा था।

    और उस एक क्षण में, जब हवा ने परदे को हौले से छुआ… अद्वैत को लगा, शायद उसे रूहानी से ये बात कहनी ही होगी… चाहे जैसे भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    धूप धीमे-धीमे ढल रही थी और आसमान हल्के नारंगी रंग में रंग चुका था, जैसे कोई उम्मीद फिर से उग आई हो। रूहानी, मीना के साथ, वेस्‍ट धनोरी की ओर जा रही थी…. एक ऐसा इलाका जो उसके लिए अब तक सिर्फ नक्शे की रेखा भर था, लेकिन आज वह वहाँ अपने सपनों की नींव रखने चली थी। 

    कैब की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी, लेकिन आँखों में चमक थी…. वो चमक जो तब आती है जब किसी टूटी चीज़ को फिर से जोड़ने की जिद भीतर सांस ले रही हो।

    रास्ते भर वो खामोश नहीं रही। उसने मीना की तरफ देख कर कहा, “मीना, तुम्हें याद है तुमने आज सुबह मुझसे पूछा था कि मैं आसपास में कुछ ढूँढ रही हूँ क्या? तब मैं नहीं बता पाई… अब बताती हूँ… मैं अपना खुद का ड्रेस डिज़ाइनिंग स्टूडियो खोलना चाहती हूँ। वही सपना जिसे मैंने किसी वजह से कहीं गुम कर दिया था, शायद अब वक्त आ गया है कि उसे फिर से जिया जाए।”

    मीना चौंक गई, “सच में, मैडम? आप… खुद का बुटीक?”

    रूहानी की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभर आई, जो उम्मीद और जज़्बातों के बीच झलक रही थी। उसने धीमे से कहा, “हाँ मीना, मैंने बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया है। अब वक्त आ गया है कि मैं अपनी पहचान खुद बनाऊं, अपनी कला को अपनी मर्जी से उड़ान दूं। ये सिर्फ एक दुकान नहीं, मेरे सपनों का घर होगा, जहाँ मैं अपने दिल की हर कहानी कपड़ों में बुन सकूँ।” 

    वो सोच रही थी—कितनी बार खुद को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों के लिए। पहले पिता की उम्मीदें, फिर समाज के ताने और फिर एक ऐसा रिश्ता, जो नाम तो पाता रहा लेकिन रंग कभी न चढ़ा। 

    जैसे ही वो धनोरी पहुँची, मीना ने उसे एक दुकान दिखाई। पुराने ज़माने की मिठाई की दुकान, जो अब लगभग बंद सी पड़ी थी। लेकिन उसकी जगह में वो ताजगी और खुलापन था, जिसे देखकर रूहानी की आँखें चमक उठीं।

    “यही है जगह,” मीना ने कहा।

    रूहानी उतरी, चारों ओर देखा…. दायीं ओर सब्ज़ी मंडी थी, बायीं तरफ़ एक पार्क। दुकान की छत पर पुराना सा बोर्ड अब भी झूल रहा था। पर उसकी कल्पना में, वहाँ रैक थे, फैब्रिक्स थे, स्केचिंग टेबल थी, दीवारों पर डिजाइन के फ्रेम थे और खिड़कियों से झांकती धूप थी।

    वो बोली, “मुझे यही चाहिए।”

    मीना ने तुरंत ज़मीन मालिक को कॉल किया। थोड़ी देर में ही एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। बातों का सिलसिला चला…. किराया, शर्तें, दस्तावेज़ और तभी रूहानी ने कहा, “नहीं, मैं इसे खरीदना चाहती हूँ, किराए पर नहीं।”

    बुजुर्ग मालिक चौंक गए। उन्होंने सोचा कि एक युवा महिला, वो भी अकेली, इतनी जल्दी फैसला कैसे ले सकती है। लेकिन रूहानी की आँखों में जो संकल्प था, उसने किसी भी तर्क को पीछे छोड़ दिया। थोड़ी बहस के बाद, अगली सुबह के लिए मीटिंग तय हो गई।

    मीना ने कहा, “मैडम, आप तो बिलकुल जैसे फिल्म की हीरोइन लग रही हो….. एकदम ठान लेती हो, और फिर कर दिखाती हो।”

    रूहानी मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी आत्मा कांप रही थी। कितनी हिम्मत जुटाई थी इस एक कदम के लिए। 

    लौटते वक़्त, वो मीना को सब्ज़ी मंडी ले गई। हल्के भाव से बोली, “चलो कुछ ऐसा खरीदते हैं, जो शाम को पकाकर लगे कि सच में ज़िंदगी में कुछ नया हुआ है।”

    घर लौटते वक़्त, गाड़ी की खिड़की से बाहर दिख रहा शाम का झुटपुटा…. ठीक वैसा ही था जैसा उसके दिल में था। अंधेरे और रौशनी के बीच झूलता हुआ, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने को हो… लेकिन पन्ने अभी खुले नहीं थे।

    उसने खामोशी से अपने हाथ की मुट्ठी कस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हो—“अब पीछे नहीं हटूंगी।”

    अगली सुबह उसे तय करनी थी ज़मीन की डील… और शायद अपनी तक़दीर की भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब मीना और रूहानी घर पहुँचीं, तो सामने एक नजारा था जिसने दोनों के दिल की धड़कनें रोक दीं। मीना की मासूम बेटी, गुनगुन, और छोटा भाई चीकू, जो अक्सर शरारती तो थे लेकिन कभी बुरी नियत के नहीं। 

    वे दोनों डरे हुए, खामोश और एक अजीब सी बेचैनी लिए खड़े थे। रूहानी की नज़रें सीधे उस कोने की ओर गईं जहाँ अद्वैत बैठा हुआ था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।

    दरवाज़ा खुलते ही मीना के चेहरे पर चिंता के बादल घिर आए। “ये क्या हुआ? तुम दोनों ऐसे क्यों खड़े हो?”

    —————

    अद्वैत के कमरे में उठी बेचैनी के बीच, क्या वह सच में रूहानी को इस न्योते की खबर देगा? 

    क्या उनकी अधूरी ज़िंदगी की डोर इस बार मजबूत होगी, या फिर टूट जाएगी? 

    उस खाली कोने में अद्वैत के न होने का रहस्य क्या छुपा था?

  • अधूरी इबादत भाग~29

    अधूरी इबादत भाग~29

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~29 मुस्कुराते जख्म

     

    मीना का अचानक अपने दोनों बच्चों के साथ घर आ जाना अद्वैत और रूहानी के लिए किसी अनचाही दस्तक की तरह था। दोनों ही उस क्षण के लिए तैयार नहीं थे और उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाला था उसका बेझिझक सवाल, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?” 

    उस एक वाक्य ने जैसे रूहानी की रगों में ठंडा लावा भर दिया। उसकी साँस अटक गई, दिल धड़कने के बजाय थम सा गया और पल भर के लिए उसकी सोचने-समझने की ताकत जैसे वहीं कहीं गुम हो गई।

    वो पल, जब उसका दिल और दिमाग एक-दूसरे से सवाल करने लगे….. अगर अब सच सामने आ गया तो? अगर मीना ने बात आगे बढ़ा दी तो? क्या उसका करियर जो अभी दोबारा सांस लेना शुरू ही कर रहा है, फिर से खत्म हो जाएगा? क्या वो फिर वहीं लौट जाएगी जहां से वो आई थी… अकेलेपन, असुरक्षा और असफलता के अंधेरे में?

    रूहानी की आँखें अद्वैत की तरफ उठीं, जिसमें डर, उलझन और एक खामोश मदद की गुहार थी। अद्वैत ने उसकी ओर देखा और जैसे ही मीना के सवाल की गंभीरता को उसने समझा, उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें नाटक था, समझदारी थी और समय की नजाकत को पकड़ लेने की कला भी।

    “अरे मीना,” अद्वैत ने एकदम सहजता से कहा, “ये तो मेरी नई कहानी की स्क्रिप्ट थी। रूहानी को बस वही पढ़ने दी थी, उसका फीडबैक लेना था।”

    उसके कहते ही जैसे रूहानी को भी अपनी आवाज़ वापस मिल गई। वो तुरंत बात को पकड़ते हुए मुस्कुरा कर बोली, “हाँ, अद्वैत ने इतना अच्छा लिखा है कि तुम भी कन्फ्यूज़ हो गई।”

    उन दोनों के बीच एक नजरों की मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मानो उस छोटे से झूठ ने एक बड़ा तूफान टाल दिया हो। अद्वैत ने बिना कुछ कहे ही सारे दस्तावेज़ समेट लिए…. पर उस कमरे में कुछ था जो अब भी अधूरा था… एक अनकहा सच, जो बस एक और सवाल की दूरी पर था।

    मीना ने जैसे ही ‘हाँ’ में सिर हिलाया, माहौल में एक हल्की सी सहजता लौटती दिखाई दी। वो मुस्कुराते हुए सोफे के पास आई और रूहानी के पास बैठते हुए बोली, “यही मेरी बेटी है, इसी का जन्मदिन आने वाला है, जिसके लिए मुझे कपड़े बनवाने थे।”

    रूहानी ने अपनी आंखें धीरे से उस बच्ची की ओर घुमाईं। लगभग दस-ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में जिज्ञासा और सादगी का उजाला था। उसके पास खड़ा उसका छोटा भाई, करीब छह-सात साल का, अपनी बहन की उंगलियों में उंगलियाँ फंसाए, थोड़ा सकुचाया हुआ लेकिन उतना ही प्यारा।

    रूहानी को अपनी ओर यूँ देखते पाकर दोनों बच्चों ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते।” उनके भोलेपन से उसका दिल भी एक पल को हल्का हो गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से पूछा, “क्या नाम है तुम दोनों का?”

    बच्ची ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नाम गुनगुन है।” लड़के ने झेंपते हुए जवाब दिया, “मेरा नाम चीकू है।”

    रूहानी ने हल्के अंदाज़ में ताली बजाते हुए कहा, “अरे, कितने प्यारे नाम हैं तुम दोनों के! बिलकुल तुम लोगों जैसे ही खुशबूदार और मीठे।”

    तभी रूहानी से थोड़ी दूरी पर बैठा अद्वैत, जो यह दृश्य चुपचाप देख रहा था, मीना की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, “पहले बच्चों के लिए कुछ स्नैक्स तो ले आओ, मीना।”

    अद्वैत की आवाज़ में अपनापन और ज़िम्मेदारी का मेल था, जिसने मीना को जैसे नींद से जगाया। वो तुरंत हड़बड़ाते हुए बोली, “जी सर, अभी लाती हूँ।” और जल्दी से किचन की ओर बढ़ गई।

    उस एक नज़र में रूहानी की आंखों में जो नूर था, वो किसी अनकहे एहसास का आईना था… शायद अधूरी ममता की वो आवाज़, जो दिल के किसी कोने में गूँज रही थी, या फिर कोई ऐसा जज़्बा जो अभी लबों तक आना चाहता था, मगर शब्दों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था।

    जब दोनों बच्चे खुशी-खुशी स्नैक्स में मगन हो गए, तो मीना ने थोड़ी झिझक के साथ रूहानी की ओर देखा और बोली, “मेरे पास उस ड्रेस का कोई फोटो तो नहीं है, मैडम… लेकिन मैं आपको बता सकती हूं कि वो कैसी दिखती थी।”

    रूहानी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तुम बताओ, मैं उसका स्केच बना लेती हूं।”

    मीना की आंखें चमक उठीं और वो अपने शब्दों से एक तस्वीर गढ़ने लगी, “मैडम, वो एक लाल रंग का बड़ा सा फ्रॉक था… छम-छम करता हुआ, जैसे शाम के वक्त ढलते सूरज की रोशनी में आसमान रंगीन हो जाता है। उस पर छोटी-छोटी सुनहरी कलियाँ थीं, जो बिल्कुल अमावस की रात में टिमटिमाते तारों जैसे लगती थीं। और उसकी चुनरी… वो अलग से नहीं थी, कंधे से जड़ी थी, बहुत हल्की… जैसे कोई धुंधली बदली हो, लेकिन मोतियों के तारों से सजी हुई।”

    मीना के शब्दों से जैसे रंग झरने लगे और रूहानी का हाथ खुद-ब-खुद चलने लगा। वह बड़ी तल्लीनता से स्केच बना रही थी। उसकी उंगलियाँ कागज़ पर नर्म लकीरें खींच रही थीं और उसकी आंखें उस कल्पना को सच में ढाल रही थीं।

    उस पल अद्वैत चुपचाप बैठा, सिर्फ रूहानी को ही देख रहा था। उसके चेहरे की एक-एक रेखा, उसके हिलते होंठ, उसके पलकें झपकाने का अंदाज़… सब कुछ उसे असामान्य रूप से आकर्षित कर रहा था। वो उस पल की मासूमियत और रूहानी की गंभीरता में कहीं गुम होता जा रहा था। लेकिन रूहानी को इस टकटकी का कोई आभास नहीं था।

    जब स्केच पूरा हुआ, तो रूहानी ने गुनगुन को पास बुलाया और उसका नाप भी बड़े प्यार से लिया। अद्वैत बस बैठा रहा, जैसे वो उस दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई दर्शक हो… मगर उसके भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे खिंचता चला जा रहा था…. अदृश्य डोर सा।

    इस सबके बाद रूहानी ने मीना के साथ किचन में जाकर धीरे से पूछा, “मैंने तुमसे सुबह पूछा था, यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली? तुम्हें पता चला क्या?” उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी, जो कहीं दबे हुए बोझ से निकल रही थी।

    मीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, एक जगह तो है, लेकिन यहाँ से 10-15 मिनट की दूरी पर।” रूहानी की आंखों में एक हल्की सी चमक आई, मानो एक दरवाजा खुलने वाला हो। 

    उसने तुरंत कहा, “क्या तुम अभी चल सकती हो? तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, अद्वैत के पास।”

    मीना ने थोड़ा हिचकते हुए हामी भरी और कुछ कहने लगी, तभी रूहानी बिना किसी देरी के अद्वैत के पास गई और बोली, “हमें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना है, तुम जब तक बच्चों को देख लेना।” 

    अद्वैत पहले तो अचानक चौंक गया, उसकी सांसों में अचानक रुकावट सी आई, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसने मान लिया हो कि ये जरूरी है।

    मीना बार-बार पूछती रही, “सच में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, सर?” और रूहानी ने उसका हाथ पकड़ते हुए हल्का सा खींचा, दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा, “हम दोनों बस आधे घंटे में आ जाएंगे, तब तक अद्वैत अंकल के साथ मस्ती करना।” मीना ने राहत भरी सांस ली और दोनों बहार निकल गईं।

    दरवाजा बंद होते ही, अद्वैत की आँखों में एक अनकही बेचैनी और सवालों की गूंज थी, जो हवा में तैर रही थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी, जैसे कोई अनजाना तूफ़ान उसके अंदर उठ रहा हो। वह उन क्षणों को समझने की कोशिश था। 

    “क्या ये सच में इतना कठिन है?” अद्वैत खुद से कहता हुआ, अपने दिल की गहराई में कहीं एक तूफान उठने लगा था। बाहर की ठंडी हवा की तरह, जो आंधी में बदलने को हो, जैसे किसी बड़े बदलाव की आहट हो।

    और तभी, अद्वैत के मोबाइल की घंटी ने कमरे की चुप्पी को तोड़ा…. एक अनजान नंबर से कॉल आ रही थी, जिससे उनकी ज़िंदगियाँ एक नई मुड़ाव लेने वाली थीं…

    ————

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच जो मुस्कुराहट थी, वह सच में एक झूठ छुपा रही थी? 

    वह अनजान नंबर… क्या वह कॉल उनके अब तक छुपे हुए अतीत की कोई भूली हुई कहानी वापस लेकर आने वाली थी?

    किस्मत के इस नए मोड़ पर, क्या वे तैयार थे सच का सामना करने के लिए?

     

  • अधूरी इबादत भाग~28

    अधूरी इबादत भाग~28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~28 तुम-मैं… और बीच की दीवार 

     

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत की आवाज़ सुनी, वैसे ही उसका बेकाबू रोना एकदम से थम गया, मानो उस आवाज़ ने उसके भीतर चल रही हर गूंज को पलभर में बाँध दिया हो।

    उसने पलकों के पीछे ठहरे आँसुओं को सँभालते हुए, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ चेहरे से हटा ली। आँखें अब भी लाल थीं, लेकिन उन आँखों में कुछ पल पहले की बेबसी की जगह अब एक चुप्पी थी…. भारी, गूढ़ और बेहद निजी।

    सामने अद्वैत खड़ा था, उसके बिखरे बालों में, चेहरे पर बेचैनी थी और तेज़ साँसों में चिंता की महक। रूहानी को उम्मीद नहीं थी कि वह इस वक़्त घर पर होगा। 

    उसका मन पहले ही हज़ार उलझनों से भरा था, और अद्वैत का इस तरह अचानक सामने होना जैसे उसके भीतर एक और तह खोल गया।

    रूहानी ने अपने आँसू जल्दबाज़ी में पोंछे, और कुछ कहने की कोशिश में खुद को संयत किया। वो जानती थी कि उसके चेहरे पर जो गुज़रा है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता और न ही वो बाँधना चाहती थी। 

    उसने बस हवा में कुछ हलकापन घोलने की कोशिश की। अद्वैत की आँखों में अब भी सवाल थे, लेकिन वो सवाल रूहानी ने जैसे हवा में भंग कर दिए।

    “आज तुम घर पर?” उसके स्वर में हैरानी थी, मगर आवाज़ में झूठी सादगी की परत भी थी।

    फिर थोड़ी कोशिश से मुस्कराते हुए बोली, “अरे वाह… Mr. Writer के पास फुर्सत का भी कोई कोना होता है क्या?”

    उसने जान-बूझकर अपनी थकी हुई आत्मा को एक मुस्कान ओढ़ा दी थी… एक ऐसी मुस्कान जो अद्वैत की बेचैनी को ढकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की बिखरी हुई चुप्पियों को बचाने के लिए थी।

    अद्वैत रूहानी के अजीब बर्ताव पर अपनी भौंहें तिरछी करता है, उसका चेहरा उलझन में डूबा हुआ था। 

    हल्के स्वर में मगर साफ चिंता के साथ वह बोला, “तुम ठीक तो हो ना?”

    रूहानी ने बिना उसकी आंखों में देखे, जल्दबाज़ी में खुद को संभालते हुए जवाब दिया, “हां, बिल्कुल ठीक हूं मैं।”

    फिर, एक अलग ही दिशा में बातचीत मोड़ते हुए उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”

    अद्वैत ने बिना शब्दों के केवल सिर हिला दिया, ‘ना’ में।

    “मैं चेंज करके आती हूं,” रूहानी ने कहा, उसकी आवाज़ में अब थोड़ी कृत्रिम चंचलता थी। “दोपहर हो गई है… तब खाना खा लेते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लग रही है।”

    इतना कहते हुए वो तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके पाँव भारी थे, मगर चाल में हल्की जल्दी थी—जैसे वो उस क्षण से दूर भागना चाहती हो।

    जब रूहानी कमरे में चली गई, अद्वैत वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। उसका दिल अब भी धड़क रहा था, लेकिन धड़कनों के पीछे कुछ और भी था… एक बेचैन सोच, एक अनकही पीड़ा।

    उसके मन में सवालों की बारिश होने लगी थी… “वो क्यों रो रही थी?” 

    “क्या हुआ उसे बाहर?” 

    “उसने बात क्यों बदल दी इतनी जल्दी?”

    उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गई थीं, और होंठ एक रेखा में सिमट गए थे।

    वो चाहता था कि उसके पीछे जाए, उसका हाथ थामे और पूछे—”क्या हुआ है, रूहानी?” लेकिन उसका दिल रुक गया… पाँव ज़मीन में जड़ हो गए।

    वो बस एक गहरी सांस लेकर खुद से बुदबुदाया—”क्यों हर बार जब वो रोती है, मेरा सीना इतना भारी हो जाता है… जैसे उसके आँसू मेरी रूह तक पहुंचते हों?”

    उस एक क्षण में, दोनों कमरों के बीच खड़ी दीवार से एक और दीवार बन चुकी थी…. खामोशी की, और अधूरी बातों की।

    जब रूहानी अपने कमरे से निकली तो उसकी आँखों में अब भी हल्की सी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान टिकी हुई थी।

    उसने खुद को साधारण से सफेद कुर्ती और हल्के नीले प्लाज़ो में ढाल लिया था… कुछ ऐसा पहनावा जो उसकी सादगी और थकान दोनों को बख़ूबी बयां कर रहा था। 

    वह धीमे कदमों से किचन की ओर बढ़ी और सीधे फ्रिज का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का हल्का झोंका उसके चेहरे से टकराया, पर अंदर कुछ नहीं था…. ना कोई टिफिन, ना कोई कटोरी, बस खालीपन।

    उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं और पाया कि सारा खाना डाइनिंग टेबल पर बाहर ही रखा हुआ है। किचन ओपन था, इसलिए उसकी नज़रें फौरन सामने बैठे अद्वैत से टकराईं जो टेबल पर बैठा, फोन में कुछ पढ़ रहा था।

    “आज मीना ने खाना बनाकर बाहर ही क्यों छोड़ दिया, फ्रिज में क्यों नहीं रखा?” उसने हल्के उलझे स्वर में पूछा।

    अद्वैत ने नजरें उठाईं और बिना किसी खास भाव के जवाब दिया, “उसने मुझसे पूछा था कि मैं घर पर ही हूँ। खाना बहुत गरम था, इसलिए उसने फ्रिज में नहीं रखा।”

    रूहानी ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और प्लेट पर खाना परोसने लगी। फिर दोनों टेबल पर आमने-सामने बैठकर खाना खाने लगे। चम्मच की हल्की खनक और कभी-कभी अद्वैत की कुर्सी की सरसराहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी।

    कुछ मिनटों बाद, जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला, रूहानी को अचानक कुछ याद आया। उसने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “डॉक्युमेंट तो बन गए होंगे ना?”

    अद्वैत ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में हल्की हैरानी थी, शायद इसलिए भी कि अचानक रूहानी ने वही बात छेड़ दी थी जिसे वह खुद टालना चाहता था। 

    उसके होंठ खुलने ही वाले थे कि रूहानी ने झट से बात काट दी, “ओह! सॉरी, मैं भूल गई थी कि तुम्हें खाते समय बोलना पसंद नहीं है। खाना खाने के बाद बात करूंगी।”

    अद्वैत ने धीरे से साँस ली, लेकिन रूहानी की बात उसे भीतर तक चुभ गई। वो कोई बड़ी बात नहीं थी, पर उसमें छुपी वो अनदेखी, वो दूरी उसे बेचैन कर गई। 

    और तभी उसे याद आया… जब रूहानी दरवाज़े से घुसते ही टूटी थी, और वो जवाब देने के बजाय चुप रह गया था, जैसे उसका दर्द उसके मौन में दम तोड़ गया हो।

    शायद उसे भी उसी तरह बुरा लगा था… जैसे अभी उसे लग रहा था। उस एहसास ने अद्वैत को खामोशी में डुबो दिया….. क्योंकि अब बात सिर्फ खाने या बात करने की नहीं थी, ये उन अनकहे जज़्बातों की लकीरें थीं जो दोनों के बीच धीरे-धीरे खिंचती जा रही थीं।

    रूहानी ने जैसे ही अपनी प्लेट धोकर रखी और पलटी, ठीक उसी पल अद्वैत भी अपनी प्लेट लेकर सिंक की ओर बढ़ रहा था। दोनों के कंधे अचानक से एक-दूसरे से टकरा गए।

    टकराने की वो हल्की सी टक्कर, किसी साधारण टकराव से कहीं ज़्यादा असर छोड़ गई थी। जैसे किसी ठहरे हुए तालाब में कोई नन्हा कंकड़ गिर जाए और उसकी लहरें दो किनारों तक जा पहुँचें। 

    एक पल के लिए दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई—वो सिहरन जो अजनबियों के बीच नहीं, सिर्फ दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनके बीच कुछ अनकहा बाकी हो।

    दोनो की ज़ुबान से एक ही साथ “सॉरी” निकला और फिर अनायास ही दोनों मुस्कुरा दिए। वो मुस्कान जानी-पहचानी थी…. हल्की सी, लेकिन बहुत कुछ कहने वाली।

    रूहानी जाकर सोफ़े पर बैठ गई और अद्वैत ने भी प्लेट धोकर थोड़ी दूरी बनाकर उसके बगल में जगह ले ली। अद्वैत ने चुपचाप अपने लैपटॉप के नीचे से कुछ दस्तावेज़ निकाले और रूहानी की ओर बढ़ा दिए।

    रूहानी ने ध्यान से उन कागज़ों को पढ़ना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ पन्नों को सावधानी से पलट रही थीं, मानो हर शब्द को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही हो। 

    तभी अचानक एक जगह उसकी नज़र ठहर गई। कुछ ऐसा था जिसने उसके चेहरे पर हैरानी और उलझन दोनों को साथ ला दिया।

    उसने पन्ना थामे हुए ही अपना चेहरा अद्वैत की ओर घुमाया और धीमे स्वर में पूछा, “तुम इतनी बड़ी अमाउंट दे रहे हो और फिर भी एक प्रतिशत ब्याज तक नहीं ले रहे? क्यों?”

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी पीछे से मीना की आवाज़ आई। वो अपने दोनों बच्चों के साथ खड़ी थी और मुस्कराते हुए बोली, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?”

    मीना की बात ने एक पल में कमरे की हवा बदल दी। रूहानी का चेहरा एकदम से स्थिर हो गया, उसकी आँखें अद्वैत की ओर टिक गईं और अद्वैत… वो जैसे इस सवाल के लिए तैयार ही नहीं था। 

    —————–

    रूहानी की आँखों में जो सवाल ठहरा था, क्या उसका जवाब सिर्फ अद्वैत के शब्दों में था… या उसके उन खामोश इरादों में, जिन्हें उसने कभी कहा ही नहीं?

    मीना की उस मासूम सी बात ने… क्या सचमुच अनजाने में उनके कागजी रिश्ते की परतें उघाड़ दी थीं?

  • भूतिया रास्ता

    भूतिया रास्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भूतिया रास्ता

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना रास्ता था। लोग उसे “भूतिया रास्ता” कहते थे। वह रास्ता घने पेड़ों के बीच से होकर गुजरता था। दिन में भी वहाँ अजीब-सी खामोशी रहती और शाम ढलते ही कोई उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा कहते थे, “इस रास्ते से रोज़ सिर्फ एक इंसान गुजरता है… और उसी दिन एक भूत अपना नया शिकार चुन लेता है।”

     

    पहले तो लोगों को यह सिर्फ एक कहानी लगती थी, लेकिन पिछले कई सालों से हर महीने कोई न कोई इंसान उस रास्ते से गुजरने के बाद गायब हो जाता था। उसकी लाश भी कभी नहीं मिलती थी।

     

    गाँव का एक लड़का था रोहित। वह शहर में पढ़ाई करता था। उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। छुट्टियों में जब वह गाँव लौटा तो उसने भी लोगों से इस रास्ते की कहानी सुनी।

     

    रोहित हँसते हुए बोला, “अगर सच में वहाँ भूत है तो मैं आज रात उसी रास्ते से होकर जाऊँगा। देखता हूँ कौन मेरा क्या बिगाड़ लेता है।”

     

    उसकी माँ डर गई।

     

    “बेटा, जिद मत कर। तेरे ताऊ भी इसी रास्ते से गए थे… फिर कभी वापस नहीं आए।”

     

    लेकिन रोहित ने किसी की बात नहीं मानी।

     

    रात के करीब नौ बजे उसने टॉर्च उठाई और अकेला ही उस रास्ते की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी। अचानक उसकी टॉर्च कई बार अपने-आप जलने-बुझने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही होगी,” उसने खुद को समझाया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    रोहित तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह दोबारा चलने लगा। इस बार उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे चल रहा है।

     

    उसने तेज़ी से कदम बढ़ाए।

     

    अचानक उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी।

     

    उसके लंबे सफेद बाल चेहरे पर फैले हुए थे।

     

    “बेटा… मुझे मेरे घर तक छोड़ देगा?” उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।

     

    रोहित ने राहत की साँस ली।

     

    “अरे, मैं तो डर ही गया था। आइए दादी, कहाँ जाना है?”

     

    औरत मुस्कुराई।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी।

     

    उसके दाँत बेहद लंबे और काले थे।

     

    रोहित घबरा गया।

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    इतने में वह औरत पल भर में उसकी आँखों के सामने से गायब हो गई।

     

    “ये… ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

     

    वह भागने लगा।

     

    लेकिन जितना भागता, रास्ता उतना ही लंबा होता जाता।

     

    कुछ दूर जाकर उसे लगा कि वह फिर उसी जगह आ गया है जहाँ से चला था।

     

    अब उसे समझ आ गया था कि कुछ बहुत गलत हो रहा है।

     

    तभी पेड़ों के ऊपर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।

     

    “हा… हा… हा…”

     

    रोहित ने ऊपर देखा।

     

    एक भयानक चेहरा पेड़ की डाल पर उल्टा लटका हुआ था।

     

    उसकी आँखें पूरी काली थीं और चेहरा जला हुआ था।

     

    रोहित चीख पड़ा।

     

    वह फिर भागा।

     

    इस बार उसके सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    “भैया… मेरी माँ खो गई है…”

     

    रोहित उसके पास जाने लगा।

     

    अचानक बच्चे ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं… सिर्फ काले गड्ढे थे।

     

    उसका मुँह धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि पूरा चेहरा उसी में बदल गया।

     

    रोहित पीछे गिर पड़ा।

     

    उसी समय किसी ने उसका पैर पकड़ लिया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    मिट्टी के अंदर से दर्जनों हाथ निकलकर उसके पैरों को पकड़ रहे थे।

     

    रोहित पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने लगा।

    किसी तरह उसने पैर छुड़ाया और भाग निकला।

    अब उसकी साँसें फूल चुकी थीं।

    तभी उसे दूर एक मंदिर दिखाई दिया।

    “बस… वहाँ पहुँच गया तो बच जाऊँगा।”

    वह पूरी ताकत से मंदिर की ओर दौड़ा।

    लेकिन जैसे ही पास पहुँचा, मंदिर अचानक गायब हो गया।

    उसकी जगह एक टूटा हुआ कुआँ था।

    रोहित समय रहते रुक गया, नहीं तो सीधे कुएँ में गिर जाता।

    तभी पीछे से किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया”आज का शिकार… मिल गया…”

    रोहित ने पीछे देखा।

    वहीं वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

    लेकिन अब उसका पूरा शरीर हवा में तैर रहा था।

    उसके पैर उल्टे थे।

    आँखों से खून बह रहा था।

    और उसके पीछे दर्जनों डरावनी परछाइयाँ खड़ी थीं।

    रोहित डर के मारे काँपने लगा।

    वह हाथ जोड़कर बोला, “मुझे छोड़ दो… मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

    बूढ़ी औरत बोली,

    “मैं अकेली नहीं हूँ… इस रास्ते पर मारे गए सभी लोग अब मेरे साथ हैं। हर दिन हममें से किसी एक को नई आत्मा चाहिए… तभी हमारा श्राप अधूरा नहीं रहता।”

    रोहित रोने लगा।

    “मैं वापस चला जाऊँगा… कभी नहीं आऊँगा।”

    लेकिन भूत हँसने लगे।

    धीरे-धीरे चारों तरफ धुंध फैल गई।

    सभी परछाइयाँ उसकी ओर बढ़ने लगीं।

    रोहित भागना चाहता था।

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जम गए।

    एक-एक करके सभी भूत उसके चारों तरफ खड़े हो गए।

    उनकी आँखें सिर्फ उसी को देख रही थीं।

    फिर अचानक सबने एक साथ उसका नाम पुकारा 

    “रोहित…”

    उसकी चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।

    अगली सुबह गाँव वालों ने देखा कि रास्ते के बीच रोहित की टॉर्च और उसके जूते पड़े थे।

    लेकिन रोहित कहीं नहीं मिला।

    उस दिन के बाद गाँव में किसी ने उस रास्ते की तरफ जाना छोड़ दिया।

    समय बीतता गया।

    कई साल बाद शहर से एक सरकारी अधिकारी उस इलाके में नई सड़क बनाने पहुँचा।

    गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया।

    “साहब… उधर मत जाइए।”

    लेकिन उसने किसी की बात नहीं सुनी।

    वह शाम होते-होते उसी रास्ते पर पहुँच गया।

    रास्ते के बीच उसे एक युवक खड़ा दिखाई दिया।

    उसने कहा,

    “भाई साहब… क्या आप मुझे गाँव तक छोड़ देंगे? मैं रास्ता भूल गया हूँ।”

    अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ, आ जाओ।”

    जैसे ही वह युवक उसकी गाड़ी में बैठा, अधिकारी ने शीशे में उसकी परछाईं देखी।

    पीछे कोई नहीं था।

    घबराकर उसने तुरंत मुड़कर देखा।सीट खाली थी।

    उसी समय पीछे से वही आवाज़ आई”आज का शिकार… मिल गया…”

    अगले दिन वह अधिकारी भी रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया।

    आज भी उस गाँव के लोग कहते हैं कि सूरज ढलने के बाद उस रास्ते से कभी मत गुजरना।

    क्योंकि वहाँ रहने वाला भूत आज भी हर दिन सिर्फ एक इंसान का इंतज़ार करता है… और जो उसकी नज़र में आ गया, वह फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौटता।

  • अधूरी इबादत भाग~27

    अधूरी इबादत भाग~27

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~27 अतीत फिर लौटा 

     

    रूहानी के सामने जब उसके अतीत का वो पन्ना अचानक आकर खुल गया, तो उसकी आंखों को यक़ीन ही नहीं हुआ।

    कुछ क्षण के लिए वो वहीं सन्न सी खड़ी रह गई, मानो शहर की आवाज़ें, लोग, गाड़ियाँ सब धीमे पड़ गए हों… और वक़्त की सुइयाँ एकदम थम गई हों।

    उसके होंठ जो “सॉरी” कहने को खुले थे, धीरे-धीरे बंद हो गए, और गले में कुछ भारी सा अटक गया। वो टकराहट केवल जिस्मों की नहीं थी, वो तो जैसे एक भूले हुए दर्द की दस्तक थी।

    “नहीं… ये सपना है,” रूहानी ने मन ही मन कहा, और अपनी पलकों को ज़ोर से भींच लिया, जैसे यूँ आंखें बंद करने से ये चेहरा ओझल हो जाएगा।

    क्योंकि जिस शख़्स ने उसके विश्वास को अपने स्वार्थ की मिट्टी में रौंदा था, वो इतनी आसानी से इस तरह राह चलते मिल जाए… ये मुमकिन नहीं था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जैसे भीतर कोई पुराना जख्म फिर से खुल गया हो। उस इंसान की मौजूदगी, उसकी वो जानी-पहचानी खामोशी, सबकुछ उसे वहीं खींच लाया जहाँ से वो सालों पहले निकल चुकी थी।

    पर आज… वही साया फिर सामने था।

    और रूहानी की आंखों में एक साथ कई भाव उमड़ आए…. हैरानी, ग़ुस्सा, तकलीफ़, और कहीं बहुत गहराई में… एक छुपा हुआ डर।

    उसने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, मगर शरीर जैसे जड़ हो गया था।

    रूहानी अब भी अपनी सोच में डूबी हुई थी। सामने खड़ा अतीत उसकी आंखों में उतर चुका था, और भीतर कहीं एक पुराना दर्द फिर से करवटें ले रहा था। वो कुछ कहती, उससे पहले सामने वाला शख़्स, जिसे उसने सालों पहले खुद से दूर कर दिया था, धीमे से मुस्कराते हुए बोला, “अरे, शादी भी कर ली तुमने? कौन है वो बदनसीब?”

    वो शब्द, जैसे किसी नश्तर की तरह रूहानी के सीने में चुभ गए। 

    “बदनसीब?” बस यही एक लफ्ज़ काफी था उसे हिला देने के लिए।

    उसने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में पल भर को झिझक की जगह अब स्पष्ट आग थी। भले ही अद्वैत से उसकी शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ थी, पर जब उसे सबसे ज़्यादा किसी की ज़रूरत थी, तो वही शख़्स उसकी ढाल बनकर खड़ा था।

    और आज… रूहानी जानती थी, ये वक्त है उसका कर्ज़ चुकाने का, उसका साथ देने का, उसका सम्मान करने का।

    उसने अपनी आंखों में गुस्से की चमक लिए हुए, उस शख़्स की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा, “वो बदनसीब हो या ना हो… तुम्हारी तरह धोखेबाज़ तो बिलकुल नहीं है, Mr. Ekansh Rathore।”

    उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। हर शब्द जैसे आत्मा से निकलकर सीधे सामने वाले के दिल को चीरते हुए जा रहे थे।

    रूहानी की आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं, पर उसके भीतर अब कोई डर नहीं बचा था… सिर्फ़ एक सच्चाई, जिसे वो बिना झुके आज कह चुकी थी।

    एकांश को रूहानी का पलटवार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

    उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में फीकी पड़ गई। होंठ तन गए, आंखों की कोर में तिरस्कार उतर आया, और आवाज़ में एक जानी-पहचानी तल्ख़ी घुल गई… वही अहंकार, वही खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली हवा।

    वो एक कदम आगे बढ़ा, जैसे रूहानी को फिर से वही पुराना एहसास दिलाना चाहता हो जिसमें वो खुद को हमेशा ऊँचा और दूसरों को कमतर मानता था।

    वो रूहानी की आंखों में झांकते हुए धीमे मगर तीखे स्वर में बोला, “तुम अब भी वैसी ही हो रूहानी… जितनी ज़िद्दी थीं, उतनी ही तल्ख़ भी। बस फ़र्क ये है कि तब तुम्हारे पास कुछ सपने थे, और आज… बस एक रिश्ता है, जिसके पीछे तुम अपनी कमज़ोरियां छुपा रही हो।”

    उसने एक हल्की हँसी में ज़हर घोलते हुए कहा, “किसी से शादी कर लेना उस दर्द से भागने का तरीका नहीं होता, जिसे तुमने खुद चुना था।”

    फिर उसने कुछ पल ठहरकर, और भी गहरे वार के लिए अतीत को उघाड़ते हुए कहा, “याद है वो रात, जब तुमने कहा था कि तुम्हें सिर्फ़ आज़ादी चाहिए… किसी का सहारा नहीं? फिर क्या हुआ उस आज़ादी का? या फिर… किसी की बाहों में गिरकर तुमने उसे नाम दे दिया ‘हमसफ़र’ का?”

    उसकी आवाज़ अब नर्म नहीं रही थी, उसमें एक कटाक्ष था, एक ताना, और एक अधूरा हिसाब।

    “तुम्हारी आंखों में जो गुस्सा है, वो खुद पर है रूहानी… मुझ पर नहीं। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने अपना सच छुपाकर, सिर्फ़ किसी से बचने के लिए किसी और को ढाल बना लिया।”

    रूहानी की रग-रग में उस वक़्त जैसे कोई ज़हर उतर गया था। एकांश के शब्दों ने उसके भीतर की सारी चुप्पियों को तोड़ने की कोशिश की थी, मगर वो अब टूटने के लिए नहीं बनी थी। 

    उसके हर शब्द, हर ताना, हर ज़हरीली मुस्कान… रूहानी के दिल को छलनी कर रही थी, लेकिन वो अपनी पीड़ा को आँखों की नमी से बहने नहीं देना चाहती थी। 

    वो स्तब्ध थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही इंसान है, जिसे उसने कभी टूटकर चाहा था, जिसके लिए उसने अपनी दुनिया की सीमाओं को लांघ दिया था। 

    “यही है वो?” उसके मन ने पूछा। “यही है वो एकांश, जिसके लिए तूने सारी हदें पार कर दी थीं? जिसके इंतज़ार में तूने ख़ुद को भुला दिया था?”

    वह एकांश, जो कभी उसकी हँसी का कारण था, आज उसी की आँखों में उसे असहाय, कमज़ोर और झूठा दिखाने की कोशिश कर रहा था।

    उसकी रगों में उबाल था, लेकिन चेहरा शांत था। वो चुप थी, मगर उसकी आँखों में आग साफ़ झलक रही थी।

    एकांश की आंखों में भरी वो कड़वाहट, और उसकी बातों में छुपा ताना… ये सब कुछ रूहानी को ऐसा महसूस करवा रहा था जैसे उसकी हर कमजोरी, हर अधूरी कोशिश, उसे खुद की नज़रों में गिरा रही हो। और सबसे ज़्यादा चुभन उसे इस बात की थी कि जिसे उसने अपनी मोहब्बत कहा था, वही आज उसे नीचा दिखाने पर उतारू था। 

    पर रूहानी जानती थी… ये वही पल है जब उसे पीछे नहीं हटना है। उसे खुद के लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए, और अद्वैत के लिए खड़ा होना है।

    उसने गहरी साँस ली। आसपास की आवाज़ें अब भीड़ के शोर में खो चुकी थीं, पर उसके भीतर एक स्पष्टता जन्म ले रही थी… अब और नहीं। अब किसी के शब्द उसे तोड़ नहीं सकते। 

    वो एक कदम पीछे हटी, फिर अपनी नमी भरी, मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “तुम्हें भी तुम्हारी शादी की बहुत-बहुत बधाई हो, मिस्टर एकांश। जब तुमसे मुझे धोखा मिला था, तब मेरे मन में सैकड़ों सवाल थे। मैं रात-रात भर जागकर ये सोचती रही कि आख़िर तुमने मुझसे ऐसा क्यों किया? किस बात की नाराज़गी थी तुम्हें, जो बिना कुछ कहे इस तरह चले गए?” 

    वो एक क्षण के लिए रुकी, उसकी आंखें अब एकांश की आंखों से सीधे भिड़ रही थीं…. जैसी नज़रें जवाब नहीं चाहतीं, बस सच्चाई थमा देती हैं।

    “अपने सवालों के जवाब मैं तुमसे नहीं पा सकी, इसलिए जब मैं तुम्हारे दिए उस पते पर पहुँची और तुम्हें किसी और से शादी करते देखा, तो सारे सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो गए।”

    रूहानी की सांसें अब गहरी थीं, उसके चेहरे पर अब न कोई मासूमियत थी, न ही कोई बेबसी…. बस एक संपूर्ण स्त्री का साहस था, जो अपने अतीत से आंखें मिलाकर आगे बढ़ने को तैयार थी।

    “उसी वक़्त समझ आ गया कि मैं कभी थी ही नहीं तुम्हारे लिए ज़रूरी। शायद एक विकल्प थी, या सिर्फ़ एक वक़्त की पसंद। लेकिन एक चीज़ जो तुम आज तक नहीं समझ सके, वो ये कि मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, एकांश। मैं रिश्तों को खेल नहीं मानती।”

    उसने एक क्षण को आँखें बंद की, मानो खुद को समेट रही हो, फिर बोली, “और इसीलिए… अब मुझे किसी ऐसे इंसान से बात करना ज़रूरी नहीं लगता जो मेरी ज़िंदगी में अब कोई महत्व नहीं रखता।” 

    एकांश के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि रूहानी यूँ जवाब देगी या शायद वो अब तक उसे उसी कमजोर, प्रेम में डूबी लड़की समझ रहा था, जो उसकी यादों में छूट गई थी। मगर रूहानी अब वो नहीं थी। 

    रूहानी बिना एक भी पल रुके, बिना एकांश के किसी जवाब या प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, पीछे मुड़ी और सीधी कदम बढ़ा दिए….. अपने रास्ते की ओर।

    उसकी चाल में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदमों में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ध्वनि थी…… जैसे वो हर कदम पर अपने आत्मसम्मान को वापस समेट रही हो।

    आसमान पर बादल थे, हल्के-हल्के हवा चल रही थी, और शहर की भीड़ में गुम होती रूहानी की परछाई, उस दिन के साथ उसका अतीत भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही थी।

    और एकांश… वो वहीं खड़ा रह गया, उन शब्दों की गूंज में जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेंगे।

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत के घर का दरवाज़ा खोला, उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं, आँखों में बवंडर थमे हुए थे। उसने दरवाज़ा बंद किया और बिना एक पल की देरी किए, अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी और बिना किसी सोच-विचार के धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। 

    धम्म से बैठते ही, उसकी छाती से एक टूटा हुआ, बेकाबू रुदन फूट पड़ा। 

    “आहह्ह्हह्हह्ह्ह्ह !” एक दर्द भरी चीख, एक ऐसी चीख जिसमें न केवल दुख था, बल्कि बरसों की चुप्पी, टूटी उम्मीदें और एक अजीब सी हार थी। फिर वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जैसे कोई बाँध टूटा हो… आँसुओं का नहीं, बल्कि आत्मा का। 

    उसका शरीर कांपने लगा, चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा लिया पर सिसकियाँ दीवारों से टकराकर पूरे घर में गूंज रही थीं। 

    तभी सामने से दौड़ते कदमों की आहट हुई। अद्वैत रूहानी के सामने आ खड़ा हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, सांसें तेज़, और चेहरे पर बेचैनी साफ़ थी। 

    “रूहानी?” उसकी आवाज़ काँपी, जैसे उसने पहली बार उसके भीतर की दरारों को साफ देखा हो।

    “क्या हुआ, रूहानी? ऐसे क्यों रो रही हो?”

    ————–

    क्या रूहानी अद्वैत को उस रात का सच बता पाएगी… या उसकी चुप्पी ही एक और तूफ़ान को जन्म देगी? 

    उसके आँसू सिर्फ़ अतीत की राख थे… या किसी नई आग का इशारा?  

    जब अद्वैत उसकी आंखों में उस दर्द को पढ़ेगा….. क्या वो समझ पाएगा कि ये कहानी अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही?

     

  • अधूरी इबादत भाग~26

    अधूरी इबादत भाग~26

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~26 सिर्फ़ एक “Okay” 

     

    मीना के सवाल पर रूहानी एक क्षण को रुकी, जैसे किसी अंदरूनी द्वंद्व में फँस गई हो। आँखों में हल्की झुँझलाहट तैर गई, पर चेहरा अब भी संयमित रहा। वो जानती थी कि सवाल साधारण था, पर जवाब में जो कुछ भी छिपा था, वो साधारण नहीं था। 

    मन तो किया कि मीना को सब कुछ बता दे….. अपने नए स्टूडियो का सपना, अपनी हिम्मत से भरी जद्दोजहद, वो अकेलेपन की घुटन जिसे कला के ज़रिए साँस देना चाहती थी। पर वक्त नहीं था। घड़ी की सुइयों की तरह उसके भीतर भी एक दौड़ चल रही थी।

    उसने जल्दी से कॉफी का आखिरी घूँट पिया, जैसे उस गर्माहट में कुछ पल की राहत ढूंढ रही हो। फिर कप टेबल पर रखा और बोल पड़ी, “मीना, मुझे अपना कॉन्टैक्ट नंबर दे दो… सारी बातें बाद में बताऊँगी, नहीं तो बहुत लेट हो जाऊँगी।”

    मीना ने थोड़ा हैरानी से देखा, पर चुपचाप सिर हिलाया। फिर अपने छोटे से पर्स से एक पुराना, घिसा हुआ कीपैड फ़ोन निकाला। रूहानी ने नंबर डायल किया और मिस्ड कॉल दी। 

    स्क्रीन पर नंबर चमका…. अनजान पर तयशुदा।

    “ये रहा मेरा नंबर,” रूहानी ने धीमे से कहा। 

    मीना ने जैसे ही “रूहानी मैडम” नाम दर्ज किया, रूहानी ने एक हल्की सी मुस्कान दी। पर उस मुस्कान के पीछे एक बेचैनी थी, एक जल्दी में छुपा सपना। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था….. वो कुछ नया शुरू करने की दहलीज़ पर खड़ी है, पर रास्ता अभी बना नहीं है।

    दरवाज़ा खोलते हुए उसके पाँव तेज़ थे, लेकिन दिल भारी। जैसे हर कदम के साथ वो अपने अंदर किसी पुराने डर को पीछे छोड़ रही हो।

    रूहानी के घर से निकलते ही अद्वैत धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर गया। नहा-धोकर आया तो उसने कोई फैंसी कपड़े नहीं पहने…. सिर्फ़ एक सादा कुर्ता और पायजामा। बाल भीगी हुई हालत में बेतरतीब से थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर आंखों में थकी हुई सोचों की परतें थीं। जैसे हर बूंद पानी के साथ उसके भीतर कुछ और बह गया हो।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और आकर सीधे सोफे पर बैठ गया। फ़ोन पास में था, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं… जैसे अब किसी बात की गूंज से भी खुद को दूर रखना चाहता हो। सिर्फ़ एक शांत, ठहरी हुई उपस्थिति। उसके बैठते ही जैसे पूरे घर की हवा पलभर को थम गई। 

    तब तक मीना पूरे घर की सफाई कर चुकी थी, रसोई में हल्दी और जीरे की महक भरने लगी थी। मगर अद्वैत को यूं अचानक बैठे देख वह थोड़ी हिचकिचाई। ये रोज़ का दृश्य नहीं था। उसकी आदत थी सुबह जल्दी घर छोड़ देने की, एक अजीब सी दूरी बनाए रखने की। पहली पत्नी के जाने के बाद, वो खुद से भी दूर हो गया था।

    मीना, जो अब तक उसे बस एक परछाई की तरह देखती थी, चुपचाप उसके पास आई और बोली, “आपकी तबीयत तो ठीक है ना, सर? कुछ बना दूँ जल्दी से?”

    अद्वैत ने उसकी बात पर हल्की सी मुस्कान दी…. वो मुस्कान जिसमें न तो कोई मज़ाक था, न गर्मजोशी, बस एक स्वीकार थी। “अरे मीना, ठीक हूँ मैं। बस आज कहीं जाना नहीं है, इसलिए बैठा हूँ। और हाँ… कुछ भारी नाश्ता बना दो।” 

    मीना ने सिर हिलाया, “ठीक है, सर,” कहकर चुपचाप रसोई की ओर लौट गई।

    अद्वैत वहीं बैठा रहा, अब अपनी गोद में लैपटॉप लिए, पर उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड से दूर थीं। जैसे कुछ लिखना चाहता हो, पर शब्द अब भी उसकी आत्मा में कहीं अटके हों। घर में सब कुछ था….. साफ़ फर्श, ताज़ा हवा, पकती हुई रोटी की खुशबू…..पर उसके भीतर एक खाली कमरा अब भी बंद पड़ा था।

    अद्वैत सोफे पर ही बैठा था, सामने लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे पर अजीब सी परछाई डाल रही थी। उंगलियाँ की-बोर्ड पर थीं, मगर दिमाग कहीं और। अपनी नई किताब की शुरुआत के कुछ पन्ने उसने टाइप कर लिए थे, लेकिन उस रचना में वो गहराई नहीं थी जिसे वो महसूस कर रहा था। 

    अचानक उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी…… रूहानी आज सुबह से दिखी क्यों नहीं?

    उसने आंखों को स्क्रीन से हटाकर कमरे में एक नजर डाली, जैसे किसी आभासी उपस्थिति को ढूंढ़ रहा हो, जो वहां होनी चाहिए थी। फिर आवाज़ लगाई, “मीना, तुम्हारी रूहानी मैडम कहाँ हैं? दिख नहीं रही आज।”

    मीना रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर हल्का सा विस्मय था। “आपकी पत्नी हैं मैडम, आपके साथ तो कल से ही होंगी। रात में भी नहीं बताया क्या? सुबह तो बहुत जल्दी निकल गईं।”

    अद्वैत के भीतर कुछ सिहर उठा। उस एक वाक्य में कितना कुछ छुपा था….. एक सवाल, एक शक, और एक अनकहा सच। पर चेहरा उसने शांत रखा, शब्दों को सजाया ताकि कोई दरार न दिखे।

    “वो कल थक कर जल्दी सो गई थीं, तो मैंने जगाना सही नहीं समझा। और सुबह मैं गहरी नींद में था, शायद उसने मुझे परेशान करना ठीक नहीं समझा।”

    मीना ने उसकी बात पर सिर हिलाया और रसोई में लौटते हुए बोली, “सही कहा आपने, सर। बहुत जल्दी में थी मैडम, मुझसे पूछ रही थीं कि आसपास कोई जगह या दुकान खाली है क्या।”

    अद्वैत एक पल को वहीं थम गया। शब्द खत्म हो गए थे, पर भीतर कोई शोर उठ रहा था। उसके सीने में एक सवाल रह गया था, जो उसने किसी से नहीं पूछा…. रूहानी क्या खोज रही थी, और क्यूँ? क्या इसलिए रूहानी ने उससे पच्चीस लाख रूपए मांगे थे? 

    अद्वैत की निगाहें जैसे हवा में किसी अनकही बात को टटोल रही थीं। वो मीना से कुछ पूछने ही वाला था, आवाज़ उसके गले में ही अटक गई थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। 

    उसने अनमने मन से फोन उठाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उंगली रखी जा रही हो। स्क्रीन पर एक मैसेज था…… 

    “उम्मीद है डॉक्युमेंट्स बन गए होंगे, मैं आते ही साइन कर दूंगी। प्लीज़ कल तक मुझे सारे पैसे कैश में चाहिए और मैं सच कह रही हूँ, 6 महीने के बाद से इंस्टॉलमेंट में सारे पैसे दे दूंगी, जो इंटरेस्ट लगाना हो लगा लेना।”

    वो चुप रहा। उसका गला थोड़ा सूख गया। कुछ पल तक उसने फोन हाथ में थामे रखा, जैसे शब्दों का वजन महसूस कर रहा हो। फिर अचानक होठों पर एक हल्की, लगभग मायूस मुस्कान आई। 

    उसकी उंगलियों ने बड़ी नर्मी से स्क्रीन पर “okay” टाइप किया और भेज दिया।

    कभी-कभी किसी के कहे आखिरी वाक्य में पूरा अतीत लिपटा होता है। और वो “मैं सच कह रही हूँ” उस एक वाक्य में जैसे रूहानी की सारी थकान, सारी सच्चाई, सारी उम्मीद समा गई हो। 

    उसी वक्त मीना चुपचाप उसके सामने आकर पोहे की प्लेट रखी। “बाकी खाना गर्म है, इसलिए मैंने बाहर ही ढककर छोड़ दिया है, अब मैं घर चलती हूँ” कहकर मीना अद्वैत के घर से निकल गई। 

    अद्वैत ने उस थाली को देखा, फिर अपनी हथेलियों को। जैसे सोच रहा हो…. जिन हाथों में किसी का भरोसा हो, क्या वो वाकई खाली रह सकते हैं? कमरा शांत था, पर भीतर एक तूफान अब भी धीमे-धीमे बह रहा था।

    उधर,

    रूहानी ने सुबह-सुबह अपने पुराने स्टूडियो के मालिक से मुलाक़ात की। सारे कागज़ात तैयार थे… बकाया पेमेंट का अंतिम बिल, एक पुरानी जगह को अलविदा कहने की औपचारिकता और उस दरवाज़े की चाभी जो कभी उसके ख्वाबों का पहला दरवाज़ा हुआ करती थी। 

    उसने धीमे से चाभी उनके हाथों में रख दी, जैसे कोई बीता हुआ हिस्सा खुद से अलग कर रही हो। उसकी आंखों में न नम थी, न मुस्कान…… बस एक सूनापन, जो कुछ खत्म हो जाने पर आता है।

    कागज़ उसके बैग में रखकर वह अद्वैत के घर के लिए निकल पड़ी। कैब से उतरते ही शहर की भीड़ और धूप में घुला हुआ दिन उसे छूने लगा। वह तेज़ी से मुख्य चौराहे से गुजर रही थी, तभी अचानक उसकी जूती में कुछ अटक गया। 

    एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ वह झुकी, जूती ठीक की, और उठते ही जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, अचानक किसी से ज़ोरदार टक्कर हो गई।

    “सॉरी…” शब्द उसके होंठों पर ही थे कि जैसे ही उसने चेहरा घुमाया, उसकी सांस अटक गई।

    सामने जो खड़ा था, उसकी आंखों में कोई अजनबीपन नहीं था… बल्कि वो नज़रों की पहचान इतनी तेज़ थी कि रूहानी एक पल के लिए जैसे ठिठक गई।

    उसका “सॉरी” वहीं गले में अटक गया, क्योंकि जिसे देखकर वो पलटी थी… उसे वो बहुत अच्छी तरह जानती थी।

    इतनी अच्छी तरह… कि अब उसका यूँ अचानक सामने आ जाना, एक अजीब सी सिहरन बनकर उसकी रीढ़ में उतर गया।

    ————-

    क्या रूहानी को वाकई मालूम था कि वो किससे टकराई है… या किस अतीत ने उसे फिर से घेर लिया?

    अद्वैत की आंखें किस सच को तलाश रही थीं… रूहानी के ख्वाब, या खुद के खोए हुए हिस्से?

    क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था… या कोई पुराना सिरा फिर से खुलने वाला था?

  • अधूरी इबादत भाग~25

    अधूरी इबादत भाग~25

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~25 उधार जज़्बातों का 

     

    रात का सन्नाटा एक गूंगी चीख की तरह पूरे घर में पसरा हुआ था। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ी की सुइयाँ जैसे समय को खींचती हुई चल रही थीं…. हर टिक-टिक के साथ अद्वैत के भीतर एक नया सवाल जन्म ले रहा था, एक नया संशय, एक नया द्वंद्व। 

    उसके ठीक सामने खड़ी रूहानी का चेहरा जैसे किसी धुँधली तस्वीर की तरह था—आधी साफ़, आधी धुँधलायी हुई। उसकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था, शब्दों में बाँध पाना मुश्किल था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन ज़ुबान साथ न दे रही हो। जैसे कोई टूटन हो उसके भीतर, जो हर मुस्कान के पीछे छिपी बैठी हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, जैसे कोई ताला खोलना चाहता हो जिसकी चाबी गुम हो गई हो। मगर वहाँ कुछ था… एक दीवार, एक नमी, एक कहानी जो वह कह नहीं पा रही थी। 

    फिर, अचानक, उस चुप्पी को तोड़ते हुए रूहानी की आवाज़ आई…. थोड़ी घबरायी हुई, थोड़ी ठहरी हुई, “उधार माँग रही हूँ तुमसे, छह महीने के बाद से तुम्हें इंस्टॉलमेंट पर वापस भी कर दूँगी।”

    अद्वैत को यह सुनते ही जैसे किसी अदृश्य करंट ने छू लिया हो। यह सवाल नहीं था, न ही विनती। यह एक निश्चय था जो रूहानी ने बहुत सोच-समझकर किया था। उसकी आवाज़ में एक डर छुपा था…. कहीं इनकार न हो जाए, कहीं अद्वैत उस पर शक न करे। 

    अद्वैत बस उसे देखता रहा… न आँखों में ग़ुस्सा, न सवाल। सिर्फ एक गहरी नज़र, जो अंदर तक झाँकने की कोशिश कर रही थी।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी को अपनी बात की नाकामी समझा और जल्दी से बोली, “तुम तो इतने फेमस और बेस्टसेलिंग राइटर हो, तो इतने पैसे तो तुम दे ही सकते हो मुझे अभी। मैं सच्ची कह रही हूँ, मैं सारे पैसे लौटा दूँगी। अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो बता दो, कितना इंटरेस्ट रेट लोगे, मैं वो भी चुका दूँगी।”

    यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे—ये उसके आत्मसम्मान की अंतिम कोशिशें थीं। जैसे वह खुद को गिरने से बचाना चाह रही हो, और जानती हो कि अद्वैत ही वह आख़िरी डोर है जिसे वह थाम सकती है। मगर अद्वैत अब भी स्थिर था….. जैसे सोच रहा हो, समझ रहा हो, तौल रहा हो कि यह माँग सिर्फ पैसों की है या उससे कहीं ज़्यादा की।

    धीरे से उसने कहा, “लेकिन रुपये माँगना या इंटरेस्ट रेट के साथ वापस करना, ये सब कुछ तो कॉन्ट्रैक्ट में कहीं नहीं लिखा है और न ही तुमने एग्रीमेंट बनवाते समय इन सब बातों का ज़िक्र भी किया।”

    रूहानी को जैसे किसी ने उसकी हड्डियों तक सुन्न कर दिया हो। उसने कुछ पल सोचा, फिर अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाए रखते हुए कहा, “तो क्या नया एग्रीमेंट बनवाना पड़ेगा या पुराने वाले में ही मॉडिफाई करोगे?”

    अद्वैत उसकी इस मासूमियत पर अनायास मुस्कुरा दिया। एक कोना उसके भीतर था जो शायद यह चाहता था कि रूहानी उससे कुछ माँगे, उससे जुड़े, उससे कुछ उम्मीद रखे। फिर भी, चेहरा न्यूट्रल बनाए रखते हुए बोला, “ऑफकोर्स, इसके लिए न्यू डॉक्युमेंट बनवाने पड़ेंगे, पूरे 25 लाख की बात है।”

    रूहानी ने सिर हिलाया, फिर एक पल चुप रही और आखिर में पूछ ही लिया, “पूछोगे नहीं कि क्यों चाहिए?”

    अद्वैत की आवाज़ अब थोड़ी ठंडी हो चली थी, “शायद तुम भूल चुकी हो कि, हम दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के पर्सनल मैटर्स में दखल देने का कोई हक़ नहीं।”

    ये शब्द जैसे रूहानी के सीने में कहीं चुभ गए। उसके चेहरे पर उभर आई नमी… नहीं, ये आँसू नहीं थे, मगर आँसुओं से कम भी नहीं। वह कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में जो कहानियाँ तैर रही थीं, वे अद्वैत से छिपी नहीं थीं।

    शायद यही वजह थी कि अद्वैत ने तुरंत ही हल्के अंदाज़ में बात मोड़ दी, “आई होप कहीं कोई गैम्बलिंग नहीं कर रही होगी या किसी को मारने की सुपारी तो नहीं दे रही होगी, है ना?” और मुस्कुरा दिया…. एक जानबूझ कर फैलाई गई गर्माहट, ताकि उस ठंडी चुप्पी को पिघलाया जा सके।

    रूहानी भी मुस्कुरा दी, मजबूर होकर नहीं… बल्कि उस पल के सौजन्य में, जो दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए सहज हो गया था। 

    अद्वैत ने कहा, “रात बहुत हो गई है, अब मैं सोने जा रहा हूँ।” और बस इतना कहकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया, बिना पलटे, बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए।

    रूहानी वहीं खड़ी रही… कमरे की दीवारों के बीच, उस अधूरे संवाद की गूंज के साथ। उसकी आँखें अब स्थिर नहीं थीं, उनमें तूफान था, एक ऐसा तूफान जो बहुत देर से दबा रखा गया था। वह जानती थी कि क्यों चाहिए उसे वो पैसे… उसका सपना, उसका स्टूडियो, उसका सम्मान… सब कुछ दाँव पर था। 

    वह यह भी जानती थी कि अद्वैत को बताना आसान नहीं होगा कि कैसे उसका पूर्व प्रेमी उसके डिज़ाइन्स चुरा कर अपनी मंगेतर को दे गया और कैसे एक झूठी बदनामी ने उसकी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।

    लेकिन अब नहीं। अब उसे लड़ना था। उठना था। और इस बार वह किसी पर भरोसा करके नहीं, बल्कि खुद के दम पर जीतना चाहती थी।

    उसने एक गहरी साँस ली। फिर खुद से कहा, “मैं इसे टूटने नहीं दूँगी। मुझे फिर से अपने नाम का एक सच बनाना होगा… बिना किसी की परछाई के, बिना किसी की रहमत के।”

    और उस रात, जब पूरा घर नींद में डूबा था, रूहानी की आँखों में नींद नहीं, आग थी।

    ————-

    अद्वैत आज पूरी तरह ख़ामोश था, जैसे किसी अनसुने सन्नाटे में घुल जाना चाहता हो। कमरे की हवा भारी थी, धूप फीकी लग रही थी और उसकी आँखें बंद… मगर मन पूरी तरह जागा हुआ। 

    पिछले कुछ दिनों से जितनी तेज़ी से चीज़ें बदली थीं, उतनी ही चुपचाप आज सब कुछ ठहर गया था। न उसने किसी से बात की, न ही कमरे से बाहर निकला। उसकी डायरी भी आज ख़ाली थी। शब्द नहीं थे… सिर्फ़ भारीपन था।

    उधर रूहानी की सुबह बिल्कुल उलटी दिशा में चल रही थी। उसका हर कदम किसी अदृश्य घड़ी की टिक-टिक से बंधा हुआ था। जैसे भीतर कुछ था जो अब और रुकने नहीं देना चाहता था। 

    उसने हल्का गुलाबी कुर्ता पहना, बालों को कसकर गूंथा और आईने में खुद को बिना मुस्कराए देखा…. एक शांत चेहरा, जिसमें अब हारने की कोई जगह नहीं थी।

    मीना जैसे ही घर पहुँची, रूहानी सीधे किचन की ओर बढ़ी, “मेरे लिए जल्दी से एक कॉफी बना दो मीना, मुझे निकलना है फ़ौरन। उसके बाद ही सफ़ाई शुरू करना।”

    मीना ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और कॉफी बनाने लगी। भाप ने रसोई में एक गर्मी फैलाई, और उस गर्मी में रूहानी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई थी।

    तभी रूहानी ने धीमे से पूछा, “यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली?”

    मीना अचानक रुकी, चौंकी, फिर धीरे से बोली, “क्यों? कुछ काम है क्या, मैडम?”

    ———-

    क्या मीना को अंदाज़ा था कि रूहानी के इस सवाल के पीछे कोई मामूली वजह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की जिद छुपी है?

    क्या अद्वैत की चुप्पी महज़ थकावट थी, या फिर कोई ऐसा फैसला जो सब कुछ बदल सकता है?

    क्या रूहानी सच में सिर्फ एक दुकान ढूँढ रही थी, या फिर अपनी खोई हुई पहचान की ज़मीन तलाश रही थी…?