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  • अगर मेरी डायरी बोलती तो…

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी रिया नाम की एक युवती के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने विचारों, अनुभवों, सपनों और भावनाओं को अपनी डायरी में लिखती है। रिया एक साधारण-सी लड़की है, लेकिन उसकी सोच और जीवन को देखने का नज़रिया उसे सबसे अलग बनाता है। उसका जीवन सामान्य खुशियों और संघर्षों से भरा है, लेकिन उसकी डायरी का हर पन्ना एक नई दुनिया की कहानी कहता है।

     

    एक दिन रिया अपनी डायरी लेकर पार्क में बैठी थी। जैसे ही उसने अपनी कलम से पहला शब्द लिखा, उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी डायरी में कोई जादू जाग गया हो।

     

    अचानक डायरी से आवाज़ आई “नमस्ते, रिया! मैं तुम्हारी डायरी हूँ। आज से मैं तुमसे बातें करूँगी।”

     

    रिया यह सुनकर चौंक गई। उसने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या… तुम सचमुच बोल सकती हो?”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “हाँ। मैं तुम्हारे मन की आवाज़ हूँ। तुम्हारी खुशियों, दुखों, सपनों और संघर्षों की सच्ची साथी। तुम जो कुछ भी लिखती हो, मैं उसे महसूस करती हूँ।”

     

    रिया को अपनी बातों का एक नया साथी मिल गया। अब वह हर दिन अपनी डायरी से बातें करने लगी। वह अपने सपनों, डर, उम्मीदों और जीवन की हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती।

     

    एक दिन डायरी ने पूछा,

     

    “रिया, तुम्हारा सबसे बड़ा सपना क्या है?”

     

    रिया ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मैं अपना खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहती हूँ। मैं अपने हाथों से ऐसी सुंदर चीज़ें बनाना चाहती हूँ, जिन्हें लोग पसंद करें और जो उनके जीवन में खुशियाँ लाएँ।”

     

    डायरी ने उसे प्रेरित करते हुए कहा,

     

    “अपने सपनों को कभी मत छोड़ना। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे पूरे साहस और विश्वास के साथ लिखो।”

     

    धीरे-धीरे रिया का अपनी डायरी से गहरा रिश्ता बन गया। वह अपने सुख-दुख, असफलताएँ और उम्मीदें हर दिन उसके पन्नों पर उतारने लगी।

     

    जब भी वह निराश होती, डायरी उसे समझाती,

     

    “असफलता अंत नहीं होती। वह सफलता तक पहुँचने का पहला कदम होती है।”

     

    कुछ समय बाद रिया के जीवन में एक कठिन दौर आया। उसके पिता की तबीयत अचानक खराब हो गई। यह खबर सुनकर वह भीतर से टूट गई।

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली और लिखा “मुझे बहुत डर लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि सब कुछ बिखर जाएगा।”

     

    डायरी ने जैसे उसके आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “डरना स्वाभाविक है, लेकिन डर के आगे हार मान लेना सही नहीं। अपने भीतर की ताकत को पहचानो। हर अँधेरी रात के बाद नई सुबह ज़रूर आती है।”

     

    डायरी की बातों ने रिया को हिम्मत दी।

     

    उसने अपने पिता की देखभाल पूरे मन से की और उसी दिन एक नया संकल्प लिया।

     

    उसने लिखा “मैं इतनी मेहनत करूँगी कि मेरे परिवार को कभी किसी चीज़ की कमी न रहे।”

     

    कुछ महीनों बाद रिया ने अपने हाथों से सुंदर सजावटी सामान बनाना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। कई बार उसकी बनाई हुई चीज़ें नहीं बिकीं। कई लोगों ने उसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ कर दिया।

     

    लेकिन हर बार डायरी उसे याद दिलाती “हर बड़ी सफलता की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। हार मत मानो।”

     

    रिया ने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    उसने अपनी कला को सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों ने उसके काम को पसंद करना शुरू किया।

     

    एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा “आज मेरी पहली ग्राहक आई। उसने मेरी बनाई हुई चीज़ देखकर मुस्कुराते हुए कहा कि उसे यह बहुत पसंद आई। उसकी मुस्कान ने मेरी सारी मेहनत सफल बना दी।”

     

    डायरी ने जवाब दिया—

     

    “यह तो बस शुरुआत है। अभी तुम्हारी मंज़िल बहुत दूर है।”

     

    दिन बीतते गए।

     

    रिया लगातार मेहनत करती रही। वह रोज़ नई डिज़ाइन बनाती और ग्राहकों की पसंद को समझकर अपने काम में सुधार करती।

     

    साथ ही वह अपने पिता का भी पूरा ध्यान रखती। उनकी सेहत धीरे-धीरे ठीक होने लगी। जब भी वे रिया की मेहनत देखते, उनकी आँखों में गर्व साफ दिखाई देता।

     

    हर शाम रिया अपनी डायरी के साथ बैठती और पूरे दिन का अनुभव लिखती।

     

    एक दिन उसने लिखा “आज मैंने अपना पहला आर्ट शो लगाया। लोगों ने मेरी कला की बहुत सराहना की। जब मेरे माता-पिता ने गर्व से मेरी तारीफ़ की, तो मुझे लगा जैसे मैंने पूरी दुनिया जीत ली हो।”

     

    डायरी ने मुस्कुराकर कहा “यह तुम्हारी मेहनत, धैर्य और विश्वास का परिणाम है। अभी तुम्हें और भी ऊँचाइयाँ छूनी हैं।”

     

    देखते ही देखते एक साल बीत गया।

     

    रिया का छोटा-सा व्यवसाय अब एक सफल ब्रांड बन चुका था। उसकी बनाई हुई चीज़ें दूर-दूर तक पसंद की जाने लगीं।

     

    एक दिन उसने अपने नए कलेक्शन की प्रदर्शनी आयोजित की।

     

    प्रदर्शनी से एक रात पहले उसने अपनी डायरी में लिखा “मैं चाहती हूँ कि लोग सिर्फ मेरी कला ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी मेरी मेहनत, भावनाएँ और संघर्ष भी महसूस करें।”

     

    डायरी ने जवाब दिया “यही तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान है। जब दिल से बनाया गया काम लोगों तक पहुँचता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं रहता, बल्कि एक भावना बन जाता है।”

     

    प्रदर्शनी वाले दिन रिया बहुत उत्साहित थी, लेकिन थोड़ी घबराई हुई भी थी।

     

    जैसे ही लोगों ने उसकी कलाकृतियाँ देखीं, उनके चेहरों पर मुस्कान आ गई। सभी उसकी कला की प्रशंसा करने लगे।

     

    एक ग्राहक उसके पास आया और बोला—

     

    “आपकी कलाकृतियाँ सिर्फ सुंदर नहीं हैं, बल्कि इनमें आपकी मेहनत, संघर्ष और भावनाएँ साफ दिखाई देती हैं। यही इन्हें सबसे खास बनाता है।”

     

    उस दिन पूरी प्रदर्शनी का सीधा प्रसारण सोशल मीडिया पर किया गया। इससे रिया को और भी अधिक पहचान मिली।

     

    रात को घर लौटकर उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मुझे एहसास हुआ कि सपने तभी पूरे होते हैं, जब हम उन पर विश्वास करते हैं और हर मुश्किल के बावजूद आगे बढ़ते रहते हैं। मैंने केवल अपना सपना पूरा नहीं किया, बल्कि अपनी कला के माध्यम से लोगों के दिलों में भी एक छोटी-सी जगह बना ली।”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली “याद रखना, रिया… कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे अपने हौसले, मेहनत और मुस्कान से भरती रहना।”

     

    रिया मुस्कुराई, अपनी डायरी को सीने से लगाया और अगले पन्ने पर लिख दिया “मेरी कहानी अभी बाकी है…”

  • मोहन और झूमर की अनोखी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।

    लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।

    एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।

    अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

    उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

    मोहन ने धीरे से कहा,

    “डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।

    मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

    “आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”

    जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।

    उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।

    अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।

    दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।

    कभी नदी किनारे बैठते।

    कभी तितलियों के पीछे भागते।

    कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।

    जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।

    मोहन मुस्कुरा उठता।

    धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।

    लोग कहते,

    “ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”

    कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।

    गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।

    मोहन ने झूमर से कहा,

    “चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”

    झूमर खुशी से उछल पड़ा।

    मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।

    चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।

    बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।

    कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।

    मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।

    दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।

    रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।

    झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।

    तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।

    एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।

    उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।

    वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।

    मोहन ने यह देख लिया।

    वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।

    “रुक जाओ!”

    शिकारी हँसते हुए बोला,

    “हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”

    मोहन ने साहस से कहा,

    “यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”

    लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

    उसने जाल निकाल लिया।

    झूमर डरकर पीछे हटने लगा।

    मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।

    तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।

    उसके दिमाग में एक योजना आई।

    उसने झूमर से धीरे से कहा,

    “तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”

    झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।

    उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

    “अरे… बकरी भाग रही है!”

    शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।

    वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।

    इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।

    कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।

    उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।

    शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।

    गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।

    झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।

    जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।

    मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

    गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।

    उन्होंने कहा,

    “आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”

    उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।

    उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।

    वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।

    मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।

    अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।

    झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।

    समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।

    हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।

    दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।

    उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।

    लोग अपने बच्चों से कहते,

    “अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”

    मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।

    झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।

    इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।

    उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।

    और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

     

  • कर्मों का सच्चा फल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    एक समय की बात है। एक छोटे से गाँव में विक्रम नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत मेहनती, ईमानदार और संवेदनशील था, लेकिन उसके मन में एक सवाल हमेशा रहता था—क्या अच्छे कर्मों का फल सचमुच मिलता है?

     

    विक्रम का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी थीं। बचपन से ही उसने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया था, लेकिन उसने कभी मेहनत और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ा। वह गाँव के स्कूल में पढ़ता था और हमेशा अपने दोस्तों तथा ज़रूरतमंद लोगों की मदद करता था। फिर भी उसके मन में एक कसक रहती थी कि वह सबकी भलाई करता है, लेकिन उसके जीवन में कोई विशेष परिवर्तन क्यों नहीं आता।

     

    गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे, जिन्हें सभी बाबा कहकर बुलाते थे। लोग उनकी बुद्धिमानी और अनुभव का बहुत सम्मान करते थे।

     

    एक दिन विक्रम उनके पास पहुँचा और बोला,

    “बाबा, मैं हमेशा अच्छे कर्म करता हूँ, लोगों की मदद करता हूँ, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगता कि मुझे उसका फल मिला है। क्या मेरे कर्म व्यर्थ जा रहे हैं?”

     

    बाबा मुस्कुराए और बोले,

    “बेटा, कर्म का फल हमेशा तुरंत नहीं मिलता। कभी-कभी वह समय आने पर मिलता है, और कई बार उसका रूप भी वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं। इसलिए बिना किसी अपेक्षा के अच्छे कर्म करते रहो।”

     

    विक्रम ने उनकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन उसके मन के प्रश्न अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुए।

     

    अगली सुबह वह गाँव के तालाब के किनारे टहल रहा था। तभी उसकी नज़र एक सफेद बगुले पर पड़ी। बगुला पानी में खड़ा था और अचानक उसने एक मछली पकड़ ली।

     

    यह दृश्य देखकर विक्रम सोच में पड़ गया।

     

    उसने मन ही मन कहा,

    “प्रकृति का अपना एक नियम है। हर जीव अपना कर्तव्य निभा रहा है। शायद इंसान का कर्तव्य भी दूसरों के लिए उपयोगी बनना है।”

     

    उस दिन से उसने निश्चय कर लिया कि वह बिना किसी स्वार्थ के समाज की सेवा करेगा।

     

    उसने गरीबों को भोजन कराना शुरू किया, गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने लगा और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने लगा।

     

    हालाँकि उसकी राह आसान नहीं थी। कई लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे,

    “इतनी मेहनत करने से क्या मिलेगा?”

     

    कुछ लोग उसकी बातों को अनसुना कर देते थे। कई बार उसे निराशा भी होती थी।

     

    ऐसे समय में उसे बाबा की सीख याद आती,

     

    “धैर्य रखो, कर्म करते रहो।”

     

    विक्रम फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम में लग जाता।

     

    धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने उसके कार्यों का प्रभाव महसूस करना शुरू किया। बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे, गाँव साफ़-सुथरा रहने लगा और लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।

     

    अब विक्रम को समझ आने लगा कि लोगों के चेहरों पर मुस्कान ही उसके कर्मों का सबसे बड़ा फल है।

     

    कुछ वर्षों बाद गाँव में पानी की भारी कमी हो गई। कुएँ सूखने लगे और खेत बंजर होने लगे।

     

    गाँव के लोग परेशान थे।

     

    तब विक्रम ने जल संरक्षण का अभियान शुरू किया।

     

    उसने गाँव के लोगों को वर्षा जल संचयन, तालाबों की सफाई और पानी बचाने के महत्व के बारे में समझाया। उसने कई बैठकों और कार्यशालाओं का आयोजन किया।

     

    लेकिन कुछ लोगों ने उसका विरोध किया।

     

    वे बोले,

    “हम वर्षों से ऐसे ही जी रहे हैं। तुम्हारे नए तरीके हमारे किसी काम के नहीं हैं।”

     

    विक्रम ने शांत स्वर में कहा,

    “बदलाव एक दिन में नहीं आता। अगर हम आज प्रयास नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पानी के लिए तरसेंगी।”

     

    उसकी बातें धीरे-धीरे लोगों के दिल तक पहुँचने लगीं।

     

    कुछ युवाओं ने उसका साथ दिया। फिर महिलाएँ भी जुड़ गईं। देखते ही देखते पूरा गाँव इस अभियान का हिस्सा बन गया।

     

    सभी ने मिलकर तालाब की सफाई की, वर्षा जल संग्रहण के लिए गड्ढे बनाए और तालाब के चारों ओर सैकड़ों पेड़ लगाए।

     

    कुछ ही महीनों बाद बारिश हुई।

     

    इस बार बारिश का पानी व्यर्थ नहीं बहा। तालाब भर गए, कुओँ में पानी लौट आया और खेत फिर से हरे-भरे हो गए।

     

    पूरा गाँव खुशी से झूम उठा।

     

    गाँव के मुखिया ने सभा बुलाकर कहा,

    “आज हमारे गाँव की खुशहाली का सबसे बड़ा श्रेय विक्रम को जाता है। उसने हमें सिखाया कि मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है।”

     

    लेकिन विक्रम मुस्कुराकर बोला,

    “यह मेरी नहीं, हम सबकी मेहनत का परिणाम है।”

     

    उस दिन गाँव के लोगों ने मिलकर जल संरक्षण समिति बनाई, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कभी पानी की कमी का सामना न करना पड़े।

     

    एक सुबह विक्रम फिर उसी तालाब के किनारे बैठा था।

     

    सूरज की सुनहरी किरणें पानी पर चमक रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को मधुर बना रही थी।

     

    वह मुस्कुराया और मन ही मन बोला,

     

    “अब मैं समझ गया हूँ कि कर्मों का सच्चा फल धन या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में लाई गई खुशी, विश्वास और परिवर्तन है।”

     

    उसी समय बाबा वहाँ आए।

     

    उन्होंने विक्रम के कंधे पर हाथ रखकर कहा,

     

    “देखा बेटा, मैंने कहा था न… कर्मों का फल अवश्य मिलता है। बस उसे पहचानने की दृष्टि होनी चाहिए।”

     

    विक्रम ने आदरपूर्वक उनके चरण स्पर्श किए।

     

    अब उसके मन में कोई प्रश्न नहीं था, क्योंकि उसे अपने उत्तर मिल चुके थे।

     

    “शिक्षा”

    सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से किए गए कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। उनका फल कभी-न-कभी अवश्य मिलता है। इसलिए बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के सदैव अच्छे कर्म करते रहना चाहिए।

  • No love clause part 2

    No love clause part 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    दिन के करीब बारह बजे…

     

    वेदा अभी भी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। पूरी रात की जागी हुई आँखें लाल हो चुकी थीं।

     

    उसके हाथ में विहान की मेडिकल रिपोर्ट थी और दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था, एक करोड़ बीस लाख… आएँगे कहाँ से? उसके पास तो कोई सेविंग तक नहीं है क्योंकि सब पैसे घर के खर्चों में, रेंट के और विहान की दवाइयों में ही लग जाते थे। 

     

    वो गहरी सोच में बैठी थी…तभी उसके सामने एक कॉफी का कप आकर रुका। “पकड़…”

     

    वेदा ने सिर उठाया। “अपर्णा…” उसकी आवाज में नमी थी। 

     

    अगले ही पल वह उठकर अपनी सबसे अच्छी दोस्त के गले लग गई। जो आँसू अब तक उसने खुद में कैद कर रखे थे, वे अपर्णा के कंधे पर सिर रखते ही बह निकले।

     

    अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलाई। “सब ठीक हो जाएगा… यार “

     

    वेदा हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कुराहट ऐसी थी जैसे वो खुद पर हँस रही हो। “झूठ बोलना आज भी नहीं आया तुझे…”

    कहते हुए उसने अपर्णा को देखा।

     

    फिर दोनों कुर्सी पर बैठ गई।  अपर्णा भी फीकी-सी मुस्कुराई। “ झूठ बोलने से तसल्ली तो मिलती है , अगर सच बोल दूँ तो तू और टूट जाएगी… ना यार।” 

    अपर्णा ने वेदा के कंधे को सहलाते हुए कहा। 

     

    उसके बाद दोनों कुछ देर चुप रहीं। फिर अपर्णा ने धीरे से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”

     

    वेदा ने काँपते हाथों से रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

    अपर्णा ने जैसे-जैसे रिपोर्ट पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया।

    “ यार ये तो… खर्चा कितना आएगा?”

    उसने दबी हैरानी भरी आवाज में पूछा।

     

    वेदा काँपते होंठों से, “एक करोड़ बीस लाख…!”

     

    अपर्णा, “ क्या…? एक करोड़ बीस लाख…?”

     

    वेदा ने बस सिर झुका दिया। “मेरे पास सिर्फ़ बीस दिन हैं, अपर्णा।”

     

    “मैंने बैंक में बात की… लोन नहीं मिलेगा। माँ के इलाज में पहले ही सब कुछ बिक चुका है। रिश्तेदार हैं नहीं… और जिन लोगों को जानती हूँ, उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई भी इतनी नहीं होगी कि…”

    कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। 

     

    अपर्णा कुछ पल सोचती रही। अचानक उसे कुछ याद आया।  “सुन…”

     

    वेदा ने उसकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा, “हम HR से बात करते हैं। कंपनी की एम्प्लॉयी मेडिकल लोन पॉलिसी है ना… शायद कोई रास्ता निकल आए।”

     

    अपर्णा की बात सुनकर वेदा को कुछ उम्मीद जागी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपर्णा की तरफ देखा। “हाँ… कम्पनी में ये पॉलिसी है तो सही। लेकिन रकम बहुत बड़ी है।”

     

    अपर्णा ने उसे हिम्मत दी, “ कोशिश करके तो देख सकते हैं, वैसे भी तू कोई मामूली पोस्ट पर नहीं है। तू बॉस की सेक्रेटरी है।”

     

    वेदा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “चल… एक बार कोशिश करके देख लेते हैं। अगर किस्मत ने साथ दिया तो शायद…” 

     

    अपर्णा तुरंत उठ खड़ी हुई। “बस यही हुई ना मेरी शेरनी वाली बात। चल, अब देर मत कर।” 

     

    दोनों अस्पताल से बाहर निकल आईं।

     

    ——–

     

    वहीं दूसरी तरफ अग्नि सिंह राजावत अपनी आलीशान और लग्जरी केबिन में अपनी लेदर की चेयर पर बैठा हुआ था।

    उसकी नजर सामने टेबल पर रखी फाइल पर टिकी थी। 

     

    तभी उसके केबिन का डोर नॉक हुआ।

    और अगले ही पल दरवाजा खुला और अंदर अग्नि का मैनेजर निशांत आया।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी जिसपर उसे अग्नि के अर्जेंट साइन चाहिए थे।

     

    “ सर इस फाइल पर आपके साइन चाहिए।” उसने अग्नि के सामने फाइल रखते हुए कहा।

     

    अग्नि ने फाइल पढ़ी और उसपर अपने साइन कर दिए फिर जैसे ही निशांत जाने लगा, 

    “ वेदा को बोलो मेरे केबिन में आए।”

    अग्नि ने कहा।

     

    (असल में वेदा, अग्नि की कम्पनी में ही जॉब करती है और उसकी ही सेक्रेटरी है।)

     

    ये सुनते ही निशांत के चेहरे पर हल्की सी घबराहट आ गई। क्योंकि उसे पता था कि वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई और उसने इसका रीजन भी कुछ नहीं बताया।

     

    निशांत के चेहरे पर आई घबराहट अग्नि की तेज़ नज़रों से छिप नहीं सकी।

    अग्नि ने फाइल से नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”

     

    निशांत, “स… सर… वो…”

     

    “Speak.” उसने सख्त लहजे में कहा।

     

    निशांत बोला, “सर, मिस वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई हैं।”

    यह सुनते ही अग्नि का चेहरा और सख्त हो गया।

     

    “ What…! Nonsense…” उसने तेज आवाज में कहा। “ दोपहर के बारह बजने को आए हैं और तुम मुझे ये अभी बता रहे हो कि वो ऑफिस नहीं आई।”

     

    “ सर मुझे लगा आपको पता होगा क्योंकि वो सुबह सबसे पहले आकर आपको ही रिपोर्टिंग करती है।” निशांत ने कहा।

     

    उसकी बात सुनकर अग्नि को एहसास हुआ कि निशांत सही कह रहा है। वेदा उसकी सेक्रेटरी है और वो सुबह से उसके पास एक बार भी नहीं आई। तभी उसे महसूस हुआ कि सुबह से उसके केबिन में असामान्य-सी खामोशी थी। उसकी रोज़ की ब्रीफिंग भी नहीं हुई थी।

     

    उसने दो फिंगर उठाकर निशांत को जाने का इशारा किया। निशांत तुरंत ही केबिन से बाहर चला गया। 

     

    वहीं अग्नि सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो वेदा ऑफिस नहीं आई और उसने किसी को इनफॉर्म भी नहीं किया।

     

    वो सोच ही रहा था तभी बिना किसी सूचना के उसके केबिन का डोर खुला।

    अग्नि की आंखों में ये देख गुस्सा उतरा ही था तभी उसकी नजर सामने गई जहाँ उसका बचपन का दोस्त शुभम खन्ना खड़ा हुआ था। 

     

    उसे देख अग्नि ने अपनी आँखें बंद कर ली जैसे अपना गुस्सा शांत करने की कोशिश कर रहा हो।

     

    शुभम, “ क्या यार ऐसी सड़ी सी शक्ल बनाकर क्यों बैठा हुआ है?”

    उसने कुर्सी खींचते हुए कहा। और फिर पूरे एटिट्यूड के साथ बैठ गया।

     

    अग्नि ने अपनी नीली आंखों से उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और बोला, “ तुझे कोई काम वाम नहीं है क्या ? जो यहाँ टाइम पास करने चला आया।”

     

    शुभम ने आराम से कुर्सी पर पैर चढ़ाते हुए कहा, “काम ही तो है, तभी आया हूँ। वरना तेरी शक्ल देखने का शौक मुझे भी नहीं है।”

     

    अग्नि ने भौंहें चढ़ाईं। “जो कहना है, जल्दी बोल। मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।”

     

    “अरे बाबा… इतना गुस्सा किस बात का? सुबह-सुबह किसने तेरे कॉफी मग में ज़हर मिला दिया?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम…”

     

    “ओके… ओके…” शुभम ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। “सीरियस हो जाता हूँ।”

     

    उसने कुछ पल तक अग्नि को गौर से देखा। फिर बोला,

    “अब बता भी दे… बात क्या है? तेरे चेहरे पर साफ़ लिखा है कि अंदर कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि अपनी कुर्सी से उठकर केबिन की काँच की दीवार के सामने जाकर खड़ा हो गया। नीचे भागती हुई मुंबई की सड़कें दिखाई दे रही थीं, लेकिन उसकी नज़र कहीं और ही खोई हुई थी।

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,

     “आज शाम दादाजी ने मुझे राजावत मेंशन बुलाया है।”

     

    शुभम ने सहज भाव से पूछा, “कोई खास बात?”

     

    अग्नि हल्का-सा हँसा, लेकिन उस हँसी में व्यंग्य था। “खास… बहुत खास।”

     

    “मुझे पूरा यकीन है कि आज फिर वही पुराना मुद्दा उठेगा…”

     

    “शादी।”

     

    शुभम ने गहरी साँस छोड़ी। उसे पहले से अंदाज़ा था कि बात आखिर इसी तरफ जाएगी। “तो इस बार क्या सोच रखा है?”

     

    अग्नि की आँखों में ठंडक उतर आई। “जो भी होगा… मेरी शर्तों पर होगा।”

     

    उसने मुड़कर शुभम की तरफ देखा। “मैं किसी रिश्ते में बंधने नहीं जा रहा…”

    “अगर शादी करनी भी पड़ी… तो सिर्फ़ एक समझौता होगी, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने महसूस किया कि अग्नि के मन में शादी के लिए नफरत पहले से भी गहरी हो चुकी थी।

     

    उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। उसे पता था…

     

    अग्नि जब तक खुद न चाहे, उसके दिल की दीवारें कोई नहीं तोड़ सकता।

     

    क्रमशः 

     

    अगर आपको मेरी कहानी पसंद आ रही है तो लाइक जरूर करें।

    और मैं यहां नई हूँ, इसलिए मुझे यहाँ का थोड़ा समझने में प्रॉब्लम हो रही है और कमेंट सेक्शन भी नहीं दिखा 

    अगर हो तो कमेंट भी जरूर कीजिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻

     

  • नन्हा चाँद चमकीला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    बहुत समय पहले की बात है। नीले, अनंत आकाश में एक छोटा-सा, प्यारा-सा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। वह बाकी चाँदों से थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे चाँद अपनी रोशनी फैलाकर शांत रहते थे, वहीं चमकीला बहुत चंचल और जिज्ञासु था। उसे नई-नई बातें जानना, नए दोस्त बनाना और दूर-दूर तक झाँकना बहुत पसंद था।

     

    हर रात वह अपने सबसे अच्छे दोस्तों—छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों और मुलायम सफेद बादलों—के साथ खेलता था। कभी वे लुका-छिपी खेलते, कभी तारों की गिनती करते, तो कभी नीचे धरती पर रहने वाले लोगों को देखकर उनके बारे में बातें करते।

     

    एक रात चमकीला धरती की ओर देख रहा था। उसने देखा कि एक गाँव में बहुत सारे बच्चे चाँदनी रात में खेल रहे थे। कोई कबड्डी खेल रहा था, कोई रस्सी कूद रहा था, तो कोई दादी से कहानी सुन रहा था। बच्चों की हँसी पूरे वातावरण में गूँज रही थी।

     

    चमकीला उन्हें बड़े ध्यान से देखता रहा। उसके मन में एक इच्छा जागी।

     

    “काश… मैं भी उनके साथ खेल पाता!”

     

    उस रात वह यही सोचते-सोचते सो गया।

     

    सपने में उसने देखा कि वह धरती पर उतर गया है। बच्चे उसे देखकर खुशी से चिल्ला रहे हैं।

     

    “देखो… चाँद हमारे पास आ गया!”

     

    सभी बच्चे उसका हाथ पकड़कर उसे अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। कोई उसे पतंग उड़ाना सिखाता है, कोई पेड़ पर लगे झूले पर बैठाता है, तो कोई उसे आम खिलाता है।

     

    सपना इतना सुंदर था कि सुबह होने तक भी चमकीला उसी के बारे में सोचता रहा।

     

    अगली रात उसने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “तारों… बादलों… मुझे तुम सबसे एक ज़रूरी बात कहनी है।”

     

    सब उसके पास आ गए।

     

    एक तारे ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या बात है? आज तुम बहुत गंभीर लग रहे हो।”

     

    चमकीला बोला, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं बच्चों से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ खेलना चाहता हूँ।”

     

    सभी तारे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक छोटा तारा बोला, “लेकिन तुम तो चाँद हो। अगर तुम धरती पर चले गए, तो रात का क्या होगा?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “मैं थोड़ी देर के लिए जाऊँगा और सूरज निकलने से पहले वापस आ जाऊँगा।”

     

    तभी एक बड़ा-सा सफेद बादल आगे आया।

     

    “अगर तुम्हारी इच्छा सच्ची है, तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

     

    चमकीला खुशी से उछल पड़ा।

     

    “सच? तुम मेरी मदद करोगे?”

     

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “सूरज निकलने से पहले तुम्हें वापस लौटना होगा।”

     

    चमकीला तुरंत मान गया।

     

    उस रात जैसे ही पूरा आकाश शांत हुआ, बादल ने अपने नरम-नरम पंख फैलाए और चमकीला को प्यार से अपने ऊपर बैठा लिया।

     

    धीरे-धीरे दोनों धरती की ओर उतरने लगे।

     

    रास्ते में उन्होंने उड़ते हुए पक्षियों को देखा। दूर-दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दिए। चमकती नदियाँ चाँदी की तरह बह रही थीं। खेतों में हवा लहरें बना रही थी।

     

    चमकीला पहली बार धरती को इतने करीब से देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।

     

    कुछ ही देर में वे एक छोटे-से गाँव के पास उतर गए।

     

    गाँव के बच्चे अभी भी खेल रहे थे।

     

    जैसे ही उन्होंने चमकीला को देखा, वे हैरान रह गए।

     

    एक बच्चा बोला, “अरे… ये तो चाँद है!”

     

    दूसरा बोला, “क्या सचमुच चाँद हमारे गाँव आया है?”

     

    सभी बच्चे उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए।

     

    चमकीला मुस्कुराकर बोला,

     

    “हाँ… मैं तुम्हारा दोस्त बनने आया हूँ। क्या तुम मेरे साथ खेलोगे?”

     

    “हाँ…!”

     

    सभी बच्चे एक साथ चिल्लाए।

     

    फिर शुरू हुआ खेलों का मजेदार सिलसिला।

     

    किसी ने उसे पकड़म-पकड़ाई खिलाई।

     

    किसी ने आँख-मिचौली सिखाई।

     

    किसी ने उसे मिट्टी से खिलौने बनाना सिखाया।

     

    एक छोटी-सी बच्ची अपना रंग-बिरंगा गुब्बारा लेकर आई और बोली,

     

    “ये तुम्हारे लिए।”

     

    चमकीला ने पहली बार कोई उपहार पाया था।

     

    उसने गुब्बारे को बहुत प्यार से पकड़ लिया।

     

    थोड़ी देर बाद बच्चों ने उसे आम का मीठा रस चखाया।

     

    “वाह!” चमकीला बोला।

     

    “इतना स्वादिष्ट फल मैंने कभी नहीं खाया।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    फिर वे नदी किनारे गए।

     

    चमकीला ने पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं तो पानी में और भी सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद गाँव की दादी माँ वहाँ आईं।

     

    उन्होंने चमकीला को देखकर हाथ जोड़ लिए।

     

    “बेटा, तुम सचमुच चाँद हो?”

     

    चमकीला ने विनम्रता से सिर हिलाया।

     

    दादी माँ बोलीं,

     

    “आज हमारे गाँव का सौभाग्य है कि तुम हमारे बीच आए।”

     

    उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ और रोटी खिलाई।

     

    चमकीला ने भी पहली बार गुड़ का स्वाद चखा।

     

    उसे वह बहुत मीठा लगा।

     

    समय कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    तभी बादल धीरे से उसके पास आया।

     

    “चमकीला…”

     

    “हाँ?”

     

    “देखो… पूरब की ओर हल्की रोशनी फैलने लगी है। सूरज निकलने वाला है।”

     

    चमकीला का चेहरा उदास हो गया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    बच्चों ने भी आसमान की ओर देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि अब विदा का समय आ गया है।

     

    एक छोटा बच्चा रोते हुए बोला,

     

    “मत जाओ ना…”

     

    एक बच्ची ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या तुम फिर कभी आओगे?”

     

    चमकीला ने प्यार से सबकी ओर देखा।

     

    “मैं हर रात तुमसे मिलने आऊँगा। भले ही धरती पर न उतर सकूँ, लेकिन आसमान से तुम्हें देखूँगा। जब भी तुम मुस्कुराओगे, मैं और ज़्यादा चमकूँगा।”

     

    बच्चों की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

     

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने मुलायम पंखों पर बैठाया और धीरे-धीरे आसमान की ओर उड़ चला।

     

    कुछ ही देर में चमकीला फिर अपने स्थान पर पहुँच गया।

     

    तारे खुशी से उसके चारों ओर आ गए।

     

    “बताओ… धरती कैसी लगी?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “धरती बहुत सुंदर है। लेकिन सबसे सुंदर वहाँ रहने वाले बच्चों के दिल हैं। उनके पास महल नहीं थे, फिर भी वे खुश थे। उनके खिलौने महँगे नहीं थे, फिर भी वे सबसे अमीर थे… क्योंकि उनके पास प्यार था, दोस्ती थी और सच्ची मुस्कान थी।”

     

    तारे उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगे।

     

    उस दिन के बाद चमकीला हर रात पहले से ज़्यादा चमकने लगा।

     

    धरती के बच्चे भी हर रात सोने से पहले खिड़की से आसमान की ओर देखते।

     

    उन्हें लगता जैसे चमकीला उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा हो।

     

    और सच भी यही था।

     

    जब भी कोई बच्चा उदास होता, चमकीला अपनी रोशनी थोड़ी और बढ़ा देता, ताकि उसे लगे कि उसका दोस्त हमेशा उसके साथ है।

     

    धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई कि चाँद बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त है। हर बच्चा रात को उसे देखकर मुस्कुराता और अपने सपने उससे साझा करता।

     

    चमकीला भी मन ही मन हर बच्चे की खुशी की दुआ करता।

     

    “शिक्षा”

     

    हमें हमेशा बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। सच्ची दोस्ती, प्यार और खुशियाँ किसी जगह की मोहताज नहीं होतीं। जब हमारा दिल साफ़ होता है, तो पूरी दुनिया हमारे लिए अपने दरवाज़े खोल देती है।

  • सावरी का कॉलेज का पहला दिन

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    सावरी का कॉलेज का पहला दिन था। सुबह की हल्की धूप पूरे कैंपस में फैली हुई थी। नए छात्रों के चेहरों पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कोई नए दोस्तों से मिल रहा था, तो कोई अपनी क्लास ढूँढ़ने में व्यस्त था।

    इन्हीं भीड़भाड़ के बीच सावरी धीरे-धीरे कॉलेज के गेट से अंदर आई। उसकी नाक पर एक साधारण-सा चश्मा था और चेहरे पर एक हल्का-सा स्कार्फ़ बंधा हुआ था। वह हमेशा की तरह पूरे चेहरे को स्कार्फ़ से ढककर आई थी। यह स्कार्फ़ अब उसकी आदत नहीं, बल्कि उसकी पहचान बन चुका था। इसके पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था।

    जैसे ही वह कैंपस में पहुँची, कई निगाहें उसकी ओर उठ गईं।

    “देखो… इतनी गर्मी में भी स्कार्फ़ बाँध रखा है।”

    “लगता है मॉडल बनने आई है!”

    “शायद अपना चेहरा छिपा रही है…”

    लोगों की धीमी आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं। उसने अनसुना करने की कोशिश की, लेकिन हर शब्द उसके दिल में चुभ रहा था।

    वह जानती थी कि लोग उसके स्कार्फ़ को देखकर बातें कर रहे हैं, लेकिन उसके मन में सबसे बड़ा डर कुछ और था। उसे डर था कि अगर किसी ने उसके चेहरे पर पड़े एसिड अटैक के निशान देख लिए, तो लोग उससे नफ़रत करने लगेंगे।

    क्लास में उसकी मुलाकात जिया से हुई। जिया हँसमुख और मिलनसार लड़की थी। कुछ ही देर में दोनों की अच्छी बातचीत होने लगी।

    थोड़ी देर बाद जिया मुस्कुराकर बोली,
    “एक बात पूछूँ… अगर बुरा न मानो तो?”

    सावरी ने हल्के से सिर हिलाया।

    “तुम हमेशा स्कार्फ़ क्यों पहनती हो? यहाँ तो कोई भी इस तरह चेहरा ढककर नहीं आता।”

    सवाल सुनते ही सावरी कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने नज़रें झुका लीं। होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

    “बस… मेरी आदत है।”

    इतना कहकर उसने बात वहीं खत्म कर दी।

    कुछ दिनों बाद लाइब्रेरी में उसकी मुलाकात आयशा से हुई। आयशा बहुत समझदार और संवेदनशील लड़की थी।

    वह सावरी के पास आकर बोली,

    “क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकती हूँ?”

    “हाँ… बिल्कुल।”

    कुछ देर दोनों किताबें पढ़ती रहीं। फिर आयशा ने धीरे से पूछा,

    “तुम हमेशा खुद को क्यों छिपाती हो?”

    सावरी चौंक गई।

    “मैं… मैं कुछ नहीं छिपाती।”

    आयशा मुस्कुराई।

    “आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। तुम्हारी आँखों में बहुत दर्द है।”

    सावरी की आँखें भर आईं।

    आयशा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,

    “अगर हम अपनी पहचान छिपाते रहेंगे, तो दुनिया कभी हमें असली रूप में जान ही नहीं पाएगी।”

    उस दिन पहली बार किसी ने उसके दर्द को महसूस किया था।

    समय बीतता गया। सावरी ने कुछ अच्छे दोस्त बना लिए, लेकिन कॉलेज में उसकी पहचान अब भी “स्कार्फ़ वाली लड़की” बन चुकी थी।

    कुछ छात्र उसका मज़ाक उड़ाते।

    “अरे… स्कार्फ़ वाली मैडम आ गई।”

    वह मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर टूट जाती।

    कुछ हफ्तों बाद कॉलेज में “अपनी कहानी, अपनी पहचान” विषय पर एक वर्कशॉप आयोजित की गई। हर छात्र को अपनी ज़िंदगी का कोई ऐसा अनुभव साझा करना था जिसने उसे बदल दिया हो।

    जब सावरी का नाम पुकारा गया, तो उसके कदम जैसे रुक गए।

    उसका दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था।

    वह मंच पर पहुँची।

    कुछ क्षण तक पूरे हॉल में सन्नाटा छाया रहा।

    फिर उसने धीरे-धीरे अपने चेहरे से स्कार्फ़ हटा दिया।

    पूरा सभागार एकदम शांत हो गया।

    हर कोई उसके चेहरे पर पड़े गहरे जले हुए निशानों को देख रहा था।

    कुछ लोगों ने आश्चर्य से साँस रोक ली।

    कुछ की आँखें नम हो गईं।

    सावरी ने काँपती आवाज़ में कहना शुरू किया—

    “मेरा नाम सावरी है… और ये निशान मेरी हार नहीं, मेरी जीत की कहानी हैं।”

    वह कुछ पल रुकी।

    “कई साल पहले, जब मैं स्कूल जा रही थी, तब मेरे ही एक परिचित ने मेरे ऊपर एसिड फेंक दिया। उस एक पल ने मेरा चेहरा बदल दिया… लेकिन मेरे सपने नहीं बदल पाए।”

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उसने उन्हें पोंछा नहीं।

    वह आगे बोली—

    “मैंने खुद को आईने में देखना छोड़ दिया था। लोगों की नज़रों से डरने लगी थी। मुझे लगता था कि अगर दुनिया ने मेरा चेहरा देख लिया, तो कोई मुझे अपनाएगा नहीं। इसलिए मैंने इस स्कार्फ़ के पीछे खुद को छिपा लिया।”

    पूरा हॉल बिल्कुल शांत था।

    “लेकिन आज मुझे एहसास हुआ है कि मुझे अपने चेहरे से नहीं, अपने डर से लड़ना था।”

    उसने स्कार्फ़ को अपने हाथ में पकड़ लिया।

    “यह स्कार्फ़ कभी मेरी मजबूरी था, लेकिन आज यह मेरे संघर्ष की निशानी है। मैं अब अपने चेहरे से शर्मिंदा नहीं हूँ। क्योंकि ये निशान बताते हैं कि मैं टूटी नहीं… बल्कि हर दर्द से लड़कर और मज़बूत बनकर खड़ी हुई हूँ।”

    इतना सुनते ही पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।

    जिया की आँखों से आँसू बह रहे थे।

    आयशा गर्व से मुस्कुरा रही थी।

    एक छात्र खड़ा हुआ और बोला,

    “आज आपने हमें सिखाया है कि खूबसूरती चेहरे में नहीं, इंसान की हिम्मत में होती है।”

    धीरे-धीरे कई और छात्रों ने भी अपनी-अपनी कहानियाँ साझा कीं। किसी ने अपने रंग को लेकर मिले तानों के बारे में बताया, तो किसी ने गरीबी और संघर्ष की बात कही।

    उस दिन वह वर्कशॉप केवल एक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि आत्मस्वीकृति और हौसले का उत्सव बन गई।

    उस दिन के बाद कॉलेज में लोग सावरी को उसके चेहरे के निशानों से नहीं, बल्कि उसके साहस, आत्मविश्वास और मुस्कान से पहचानने लगे।

    सावरी ने भी तय कर लिया कि अब वह कभी अपने चेहरे को शर्म की वजह नहीं बनने देगी।

    क्योंकि उसने समझ लिया था—

    चेहरे पर पड़े निशान इंसान की पहचान नहीं होते, बल्कि उन निशानों के साथ जीने का साहस ही उसकी असली पहचान बनता है।

  • आखिरी मुलाकात का वादा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    वर्ष 1998 की एक ठंडी दिसंबर की शाम थी। लखनऊ के पुराने मोहल्ले में, नीम के पेड़ के नीचे बैठे दो दोस्त चुपचाप आसमान देख रहे थे। एक था अरुण, बाईस साल का, पतला-दुबला, आँखों में सपनों की चमक। दूसरा था विकास, उसी उम्र का, थोड़ा मोटा, लेकिन दिल का इतना बड़ा कि दुनिया समा जाए। दोनों बचपन से साथ थे—स्कूल, कॉलेज, गली के खेल, बारिश में भीगना, सब कुछ साझा।

     

    उस शाम विकास ने कहा, “अरुण, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। नौकरी मिल गई है। पता नहीं कब लौटूँ।”

     

    अरुण की आँखें गीली हो गईं। उसने कहा, “फिर हम कभी नहीं मिलेंगे?”

     

    विकास ने उसकी कंधे पर हाथ रखा, “मिलेंगे। वादा है। चाहे कितने भी साल बीत जाएँ, एक दिन हम यहीं, इसी नीम के नीचे मिलेंगे। आखिरी मुलाकात का वादा। अगर मैं नहीं आया, तो तू आ जाना। और अगर तू नहीं आया, तो मैं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिए। उस वादे को उन्होंने बहुत हल्के में लिया था, जैसे बच्चे कोई खेल खेल रहे हों। लेकिन समय ने उसे भारी बना दिया।

     

    विकास दिल्ली चला गया। अरुण लखनऊ में ही रह गया। पहले तो पत्र आते रहे, फिर फोन के जमाने में कभी-कभार बात होती। फिर दोनों की शादी हो गई। विकास की एक बेटी हुई, अरुण का एक बेटा। जिंदगी ने दोनों को अपने कामों में उलझा लिया। साल बीतते गए। 2005, 2010, 2015… वादे की बात धीरे-धीरे यादों के कोने में सिमटती चली गई।

     

    फिर 2020 आया। कोरोना की लहर। दुनिया थम गई। अरुण ने विकास को फोन किया। आवाज कमजोर थी।

     

    “यार, याद है हमारा वादा?” अरुण ने पूछा।

     

    विकास हँसा, “कौन सा? नीम वाले?”

     

    “हाँ। अब कब मिलेंगे?”

     

    “जल्दी। जैसे ही ये सब खत्म हो।”

     

    लेकिन खत्म होने में समय लगा। फिर विकास का ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। अरुण की माँ बीमार पड़ गईं। दोनों फिर बिछड़ गए।

     

    वर्ष 2024। अरुण अब अड़तालीस का हो चुका था। बाल सफेद होने लगे थे। उसकी पत्नी रेखा ने एक दिन कहा, “तुम हमेशा विकास की बात करते हो। मिल क्यों नहीं लेते?”

     

    अरुण चुप रहा। वह जानता था कि विकास की जिंदगी बदल चुकी है। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था कैंसर से। बेटी अमेरिका में पढ़ रही थी। विकास अकेला रह गया था।

     

    एक दिन अरुण को विकास का मैसेज आया—  

    “अरुण, याद है हमारा वादा? नीम के नीचे। इस साल 15 दिसंबर को। आखिरी मुलाकात। मैं आऊँगा।”

     

    अरुण का दिल जोर से धड़का। उसने तुरंत जवाब दिया—  

    “मैं भी आऊँगा। वादा निभाऊँगा।”

     

    15 दिसंबर की सुबह अरुण ने ट्रेन पकड़ी। लखनऊ स्टेशन पर भीड़ थी, लेकिन उसका मन शांत था। उसने वही पुरानी गली याद की, जहाँ दोनों बच्चे दौड़ते थे। नीम का पेड़ अब भी वहाँ था—बड़ा, घना, जैसे समय को चुनौती दे रहा हो।

     

    शाम के पाँच बजे अरुण नीम के नीचे पहुँचा। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। उसने बेंच पर बैठकर इंतजार किया।

     

    छह बजे हो गए। सात। अरुण की साँसें तेज हो गईं। क्या विकास नहीं आएगा? क्या वादा टूट जाएगा?

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण मुड़ा। विकास खड़ा था। बाल पूरी तरह सफेद, चेहरा दुबला, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर गले मिल गए। सालों का सन्नाटा टूट गया।

     

    “कितना बदल गया तू,” अरुण ने कहा।

     

    “तू भी,” विकास मुस्कुराया। “लेकिन नीम वही है।”

     

    दोनों बेंच पर बैठ गए। बातें होने लगीं—पुराने दिनों की, स्कूल के मजाक की, कॉलेज की रातों की, पहली नौकरी की। फिर धीरे-धीरे बातें मौन में बदल गईं। दोनों चुपचाप आसमान देख रहे थे, जैसे 1998 में देखा था।

     

    विकास ने कहा, “अरुण, मुझे कुछ बताना है।”

     

    “क्या?”

     

    “मुझे कैंसर है। अंतिम स्टेज। डॉक्टर कहते हैं, तीन-चार महीने।”

     

    अरुण की दुनिया थम गई। उसने विकास की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर शांति।

     

    “इसलिए तू आया?” अरुण की आवाज काँप गई।

     

    “हाँ। वादा निभाना था। आखिरी मुलाकात का। मैं नहीं चाहता था कि तू अकेला बैठे और इंतजार करे।”

     

    अरुण रो पड़ा। उसने विकास का हाथ पकड़ लिया। “तू मुझे क्यों नहीं बताया पहले?”

     

    “क्या फर्क पड़ता? जिंदगी तो वैसे भी चल रही थी। लेकिन ये वादा… ये अधूरा नहीं रहना चाहिए था।”

     

    रात गहराने लगी। दोनों ने पुरानी बातें दोहराईं। विकास ने अपनी बेटी की तस्वीर दिखाई। अरुण ने अपने बेटे की। दोनों ने हँसी, रोए, चुप रहे।

     

    विकास ने कहा, “अगर मैं चला गया, तो तू हर साल 15 दिसंबर को यहाँ आना। नीम के नीचे बैठना। और याद करना कि एक बार हमने वादा किया था।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “मैं आऊँगा। हमेशा।”

     

    रात के ग्यारह बजे विकास उठा। “अब जाना होगा। ट्रेन है।”

     

    अरुण उसके साथ स्टेशन तक गया। प्लेटफॉर्म पर दोनों फिर गले मिले।

     

    “अलविदा नहीं,” विकास ने कहा। “बस… अगली मुलाकात तक।”

     

    “अगली मुलाकात तक,” अरुण ने दोहराया।

     

    ट्रेन चल दी। अरुण प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा जब तक ट्रेन की रोशनी गायब नहीं हो गई।

     

    तीन महीने बाद, मार्च 2025 में, अरुण को फोन आया। विकास की बेटी की आवाज थी। “पापा चले गए… पिछले हफ्ते।”

     

    अरुण चुप रहा। आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने फोन रखा और सीधे उस गली में पहुँच गया। नीम के नीचे बैठ गया। ठंडी हवा चल रही थी। पत्तियाँ हिल रही थीं।

     

    उसने फुसफुसाया, “वादा निभ गया यार। तू आया। मैं भी आया।”

     

    उस दिन के बाद अरुण हर साल 15 दिसंबर को वहाँ आता। कभी अकेला, कभी पत्नी के साथ, कभी बेटे के साथ। वह बैठता, पुरानी बातें याद करता, और मुस्कुराता।

     

    एक साल, 2028 में, जब अरुण वहाँ बैठा था, तो एक युवती आई। विकास की बेटी। उसने कहा, “पापा ने कहा था कि अगर मैं कभी लखनऊ आऊँ, तो नीम के नीचे जरूर बैठूँ। और अंकल से मिलूँ।”

     

    दोनों ने बात की। अरुण ने उसे बचपन की कहानियाँ सुनाईं। युवती ने कहा, “पापा हमेशा कहते थे कि जिंदगी के सबसे बड़े वादे छोटे लगते हैं, लेकिन वही सबसे भारी होते हैं।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “सही कहा उन्होंने।”

     

    समय बीतता गया। अरुण बूढ़ा होता गया। उसके बाल और सफेद हो गए। शरीर कमजोर। लेकिन 15 दिसंबर का दिन वह कभी नहीं चूकता था।

     

    वर्ष 2035। अरुण अब उनसठ का था। स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि दिल कमजोर है। उस साल 15 दिसंबर को वह फिर नीम के नीचे पहुँचा। अकेला। बेंच पर बैठ गया। आँखें बंद कीं।

     

    हवा में जैसे कोई आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण की आँखें खुल गईं। सामने कोई नहीं था। लेकिन उसे लगा जैसे विकास वहीं बैठा हो।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं यार। इस बार मैं समय पर आ गया हूँ।”

     

    फिर वह लेट गया बेंच पर। आँखें बंद कीं। साँसें धीमी पड़ती गईं। नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। ठंडी हवा चलती रही।

     

    अगली सुबह जब लोग आए, तो अरुण वहीं सोया मिला। चेहरे पर शांति थी, जैसे कोई पुराना वादा पूरा करके सुस्ता रहा हो।

     

    लोगों ने कहा, “शायद दिल का दौरा पड़ा।”

     

    लेकिन अरुण की पत्नी ने समझ लिया। उसने नीम के पेड़ को छुआ और फुसफुसाई, “वादा निभ गया। दोनों की आखिरी मुलाकात… हमेशा के लिए।”

     

    उसके बाद भी हर साल 15 दिसंबर को लोग देखते कि नीम के नीचे कोई न कोई बैठता—कभी अरुण का बेटा, कभी विकास की बेटी, कभी उनके बच्चे। कोई कहता, “ये पेड़ वादा याद रखता है।”

     

    और सच में, जब भी ठंडी हवा चलती और पत्तियाँ हिलतीं, लगता जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहीं बैठे हों—हँस रहे हों, बात कर रहे हों, और एक अधूरा वादा बार-बार पूरा कर रहे हों।

     

    क्योंकि कुछ वादे समय से बड़े होते हैं।  

    कुछ मुलाकातें मौत से आगे भी चलती रहती हैं।  

    और कुछ नीम के पेड़… हमेशा खड़े रहते हैं, गवाह बनकर।

     

  • आत्मग्लानि

    आत्मग्लानि

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

                     आत्मग्लानि …  

    रीया! यहीं नाम है उसका , उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में अपने भरे पूरे परिवार के साथ हंसीं खुशी रहती है, अपने मम्मी पापा की इकलौती संतान, तो जाहिर सी बात है लाड प्यार से भरण पोषण हो रहा था, ताऊ जी और चाचा जी जान छिड़कते थे उसपर क्योंकि अपने परिवार में वही एकमात्र बेटी थी, भाई प्यार बहुत करते थे उससे इसलिए थोड़ी जिद्दी ज्यादा हो गई थी, जो बात ठान लें तो बस…. 

    इसी प्रकार हंसते खेलते उसने अपनी ग्यारहवीं कक्षा पास की और बारहवीं कक्षा में प्रवेश किया, पढ़ाई-लिखाई में भी अव्वल है तो शिक्षकों की भी पसंदीदा विद्यार्थी बनी रही । बारहवीं कक्षा में आने के कुछ दिनों बाद इंग्लिश सब्जेक्ट की माया मैडम का किसी और विद्यालय में ट्रांसफर हो गया । उनकी जगह एक दूसरे शिक्षक आये जिनका हाल -फिलहाल में इस जगह तबादला किया गया था.।।

    संजय व्यास…. विद्यालय में आते ही इनकी खूबसूरती के चर्चे होने लगे, 6.2  लम्बी हाईट , गोरा रंग, आंखों पर पतली फ्रेम का चश्मा लगाए रहते जिससे भी उनकी गहरी आंखों को छुपाना मुश्किल होता था, हंसमुख स्वभाव के धनी, पतली सी गर्दन, पढ़ाते वक्त कभी कभी अपनी शर्ट की आस्तीन की बाज़ू को कोहनी तक फोल्ड कर देते जिससे उनके हाथों की मांसपेशियों का कसाव दिखाई दे जाता, आते ही उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया विद्यार्थी तो विद्यार्थी कुछ मैडम भी उन्हें ठंडी आहें भरकर देखा करती थी., पर वो बिना किसी पर ध्यान दिए अपने पढ़ाने पर ध्यान देते, धीरे धीरे बात फैल गई कि शिक्षक महोदय विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिससे कयी मैडमों के अरमानों पर पानी फिर गया और वो सब अपनी अपनी किस्मत पर रश्क करके रह जाती..।।

    रीया भी उनकी दिवानी हुए बिना नहीं रह सकी, वो जब भी कक्षा में प्रवेश करते रीया की नजरें उनसे हटती ही नहीं, वो चोरी चोरी उनको देखा करती, उनके बोलने का अंदाज, उनके हाथों की कसावट, उनका पढ़ाते समय अपने चश्मे को ठीक करना, चाॅक को पढ़ाते समय हल्के से अपने मुंह में दबाना, ये सब रीया को उनकी ओर आकर्षित कर रहा था जिससे वो एकदम अंजान थे। रीया उनकी सुध – बुध में खोती चली गई और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना बंद कर दिया, टेस्ट पेपर में जब उसने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो उसकी विज्ञान की मैडम को हैरानी हुई क्योंकि ऐसा कोई विषय नहीं था जिसमें रीया अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई हो, मैडम ने उसे बुलाया और पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान केंद्रित करने की , रीया ने चुपचाप उनकी बातें सुन ली और आकर अपनी बैंच पर बैठकर किताब खोलकर पढ़ने लगी लेकिन वो अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही थी क्योंकि बार बार संजय व्यास जी का जादू उसके दिल दिमाग पर हावी हो गया था, उम्र कितनी है मासूम की, महज़ 19साल, इस उम्र में आकर्षित होना किसी के प्रति आम बात है..। वो सुनहरे सपने सजाती उनके जीवन के साथ अपने, ये न जाने कब उन्हें पाने की ज़िद बन गया खुद उसे पता नहीं चला। धीरे धीरे बात पूरी तरह विद्यालय में फैल गई कि रीया अपने शिक्षक महोदय को पसंद करती है और उनके साथ जीवन बिताना चाहती है, प्रिंसिपल ने संजय व्यास जी को बुलाया और बात की छानबीन की, संजय जी खुद हैरान रह गए ये जानकर कि जिस बच्चे को वो शिक्षा का ज्ञान देते हैं वो उनके लिए ऐसी भावनाएं रखती है, उन्होंने प्रिंसिपल की बात को सिरे से खारिज किया और खुद रीया से मुलाकात करने कक्षा में चले गए, इस समय छुट्टी का समय था तो सभी स्टूडेंट्स निकल गये कक्षा से, रीया भी जा रही थी जब संजय कक्षा में चले आये, उनको अपने सामने देखकर रीया की नजरें झुक गई और होंठों पर हसीन मुस्कान आ गई, इस लड़की की ऐसी हरकतें देखकर संजय जी हैरान रह गए और अपना गला साफ करके बोलें —

    रीया , क्या मैं जो बातें सुन रहा हूं वो सच है?? रीया ने चुपचाप नजरें झुकाई रखी और धीरे धीरे उनकी तरफ अपने कदम बढ़ा दिए जिससे संजय जी डर गये और खुद पीछे हो गये, उनके कदम पीछे लेने से रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और अपनी जगह खड़ी रही और बोली –” मुझे नहीं पता आपने किससे क्या सुना है” ” लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं आपको चाहने लगी हूं और आपसे शादी करके आपके साथ रहना चाहती हूं, मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं,  मैं आपके गले में हाथ डालकर आपको अपनी सांसों में बसाए रखना चाहती हूं, ” बोलिए करेंगे ना आप मुझसे शादी?? 

    संजय जी हैरान रह गए एक बच्ची के मुंह से अपने लिए ऐसे शब्द सुनकर, उन्होंने रीया को समझाया, ” देखो रीया, अभी तुम बच्ची हो, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए तुम्हें,ना कि इन फिजूल की बातों पर, मैं तुम्हारा अध्यापक हूं शिक्षा देना मेरा काम है, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और परीक्षा में सफल हो जाओ, मैं समझूंगा मेरी तपस्या सफल हो गयी, प्लीज़ अपने भविष्य को संवारने में जुटी रहो इन सब चक्करों में नहीं पड़ो, और मैं वैसे भी एक शादीशुदा इंसान हूं तो मेरे बारे में सोचना भी तुम्हारे लिए गलत है, अपनी बात कहकर वो कक्षा से बाहर निकल गये, रीया आंखों में आंसू लिए उन्हें जाते देखती रही और चुपचाप अपने घर निकल गई, घर में आकर उसने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर दिया और घंटों रोती रही, मां चाची ताई जी सबने दरवाजा खटखटाया और उसके व्यवहार से चिंतित हो गई कि क्या बात है जो घर की बेटी दरवाजा बंद करके रो रही है और बोलने से भी दरवाजा नहीं खोल रही,  सब बुलाती रही और हार ग्रीन शाम को पापा चाचा ताऊ जी के आने पर उनको बताया तो वो सब भी चिंता में पड़ गए कि न जाने क्या हुआ होगा 😔, दरवाजा खटखटाया गया और इस बार पापा ने स्नेह से अभिभूत होकर रीया से दरवाजा खोलने को कहा. । दरवाजा खुला….. और….

     

     

     

    आगे क्या हुआ होगा इसके लिए अगले अध्याय का इंतजार करें और हां प्लीज़ मेरी कहानी को लाईक कमेंट शेयर जरुर करें 🙏🙏☺️☺️……

  • श्रापित आईना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित आईना

     

    शहर से दूर, घने जंगलों के बीच एक विशाल लेकिन उजड़ा हुआ महल खड़ा था। लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। कहते थे कि उस हवेली में लगा एक पुराना आईना इंसान का चेहरा नहीं, बल्कि उसकी मौत दिखाता था।

     

    जो भी उस आईने में अपनी आखिरी झलक देख लेता, वह सात दिनों के भीतर रहस्यमयी तरीके से मर जाता।

     

    इसी वजह से कई सालों से उस हवेली के आसपास कोई नहीं जाता था।

     

    लेकिन अदिति इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी। वह इतिहास की शोधकर्ता थी और पुरानी हवेलियों के रहस्यों पर काम करती थी। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सच्चाई खोजने का शौक था।

     

    एक दिन उसे काली हवेली के बारे में पता चला।

     

    लोगों ने उसे बहुत समझाया।

     

    “बेटी, वहाँ मत जाना। जिसने भी उस आईने को देखा है, वह कभी नहीं बचा।”

     

    अदिति मुस्कुराई।

     

    “अगर हर अफवाह सच होती, तो दुनिया में कोई ज़िंदा नहीं बचता।”

     

    अगली सुबह वह कैमरा, डायरी और टॉर्च लेकर हवेली पहुँच गई।

     

    हवेली का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सदियों से वहाँ कोई आया ही न हो।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर बढ़ती गई।

     

    अचानक उसकी नज़र एक बड़े से कमरे पर पड़ी।

     

    कमरे के बीचोंबीच सोने की नक्काशी वाला एक विशाल आईना रखा था।

     

    उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।

     

    अदिति ने रूमाल से धूल साफ की।

     

    जैसे ही उसने आईने में देखा, उसका दिल धड़कना बंद होने जैसा हो गया।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ उसने खुद को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा देखा।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया।

     

    आईने में दिख रही अदिति चीखती हुई खाई में गिर गई।

     

    और उसी पल आईना फिर सामान्य हो गया।

     

    अदिति के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “यह… यह क्या था?”

     

    उसने खुद को समझाया कि शायद यह कोई भ्रम था।

     

    वह जल्दी से हवेली से बाहर निकल आई।

     

    लेकिन उसी रात उसे वही सपना आया।

     

    वही खाई…

     

    वही धक्का…

     

    वही चीख…

     

    अगले दिन उसने गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से मुलाकात की।

     

    बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।

     

    “तुमने उस आईने में देख लिया?”

     

    अदिति ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग बोले, “अब तुम्हारे पास सिर्फ़ सात दिन हैं।”

     

    “लेकिन यह सब होता क्यों है?”

     

    बुज़ुर्ग ने बताया कि बहुत साल पहले उस हवेली में राजा वीरेंद्र रहता था। उसे अपनी सुंदरता और शक्ति पर बहुत घमंड था।

     

    एक दिन एक साधु महल में आए और पानी माँगा।

     

    राजा ने उनका अपमान कर दिया।

     

    साधु ने क्रोधित होकर कहा,

     

    “जिस चेहरे पर तुझे इतना घमंड है, अब यही चेहरा हर उस इंसान की मौत का कारण बनेगा जो इस आईने में झाँकेगा।”

     

    उसी दिन से वह आईना श्रापित हो गया।

     

    अदिति अब भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही थी।

     

    उसने तय किया कि वह इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण ढूँढेगी।

     

    उसने हवेली के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    तीसरे दिन उसे तहखाने में एक गुप्त कमरा मिला।

     

    वहाँ सैकड़ों पुरानी डायरियाँ रखी थीं।

     

    एक डायरी राजा की बेटी राजकुमारी वैदेही की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “यह आईना मौत नहीं दिखाता… यह उस व्यक्ति को दिखाता है जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। अगर उसे समय रहते पहचान लिया जाए, तो श्राप टूट सकता है।”

     

    अदिति चौंक गई।

     

    यानी उसकी मौत तय नहीं थी।

     

    लेकिन उसे धक्का देने वाला कौन था?

     

    उसने आईने में दिखे चेहरे को याद करने की कोशिश की।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखा था।

     

    सिर्फ़ हाथ दिखाई दिया था।

     

    उस हाथ में एक चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर साँप बना हुआ था।

     

    अचानक अदिति को याद आया।

     

    ऐसी अंगूठी तो उसके साथ काम करने वाले उसके सहयोगी करण के हाथ में थी।

     

    लेकिन करण तो उसका सबसे अच्छा दोस्त था।

     

    क्या वह सचमुच उसे मार सकता था?

     

    अदिति को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने करण से इस बारे में कुछ नहीं कहा।

     

    छठे दिन करण अचानक उसके घर आया।

     

    “तुम फिर उस हवेली में चलोगी? मुझे भी देखना है।”

     

    अदिति ने हामी भर दी।

     

    दोनों शाम को हवेली पहुँचे।

     

    करण बार-बार उसी आईने के सामने जाने की ज़िद कर रहा था।

     

    अदिति अब सतर्क थी।

     

    जैसे ही वह खाई वाले कमरे के पास पहुँची, अचानक करण ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी आँखों में अजीब लालच था।

     

    “मुझे माफ़ कर देना अदिति।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    करण बोला,

     

    “मुझे हवेली का खज़ाना चाहिए। मैंने पुरानी किताबों में पढ़ा है कि यह खज़ाना तभी मिलेगा जब कोई उस आईने का श्राप अपने साथ ले जाएगा।”

     

    यह सुनकर अदिति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “तो तुम मुझे मारना चाहते थे?”

     

    करण हँसने लगा।

     

    “हाँ… क्योंकि आईने ने मुझे भी यही रास्ता बताया था।”

     

    इतना कहकर उसने अदिति को धक्का देने की कोशिश की।

     

    लेकिन अदिति पहले से तैयार थी।

     

    वह एक कदम पीछे हट गई।

     

    करण का संतुलन बिगड़ गया।

     

    वह खुद पुराने लकड़ी के फर्श पर गिर पड़ा।

     

    फर्श टूट गया और वह सीधे नीचे बने गहरे गड्ढे में जा गिरा।

     

    उसकी चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।

     

    कुछ ही सेकंड में सब शांत हो गया।

     

    अदिति काँपते हुए नीचे पहुँची।

     

    लेकिन करण की साँसें थम चुकी थीं।

     

    उसी समय हवेली ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी।

     

    वह भागकर फिर उसी आईने वाले कमरे में पहुँची।

     

    आईने में अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    पहली बार उसमें मौत की कोई तस्वीर नहीं थी।

     

    तभी आईने के अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।

     

    उस रोशनी में राजकुमारी वैदेही की आकृति दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “श्राप खत्म हो चुका है। यह आईना कभी मौत नहीं दिखाता था। यह सिर्फ़ इंसान के सबसे बड़े दुश्मन की पहचान कराता था। लेकिन लालच में अंधे लोगों ने इसे मौत का आईना समझ लिया।”

     

    इतना कहते ही आईने में दरार पड़ने लगी।

     

    कुछ ही पलों में वह हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।

     

    सदियों पुराना श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    अदिति हवेली से बाहर निकल आई।

     

    उसने पूरी घटना किसी को नहीं बताई।

     

    लोगों को सिर्फ़ इतना पता चला कि काली हवेली अब श्रापमुक्त हो चुकी है।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को एक ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर दिया गया।

    दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे।

     

    लेकिन अदिति ने कभी किसी को उस टूटे हुए आईने के बारे में नहीं बताया।

     

    क्योंकि वह जान चुकी थी कि दुनिया में सबसे खतरनाक श्राप किसी आईने में नहीं होता…

     

    वह इंसान के लालच और विश्वासघात में छिपा होता है।

     

  • घटती उम्र वाली लड़की

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीर्षक: हर जन्मदिन पर उम्र घटने वाली लड़की

     

    बारिश की हल्की बूंदें आसमान से गिर रही थीं। शहर के एक छोटे से घर में रहने वाली नायरा आज अपना अठारहवाँ जन्मदिन मना रही थी। घर में केक, मोमबत्तियाँ और खुशियों का माहौल था, लेकिन उसकी माँ मीरा के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखों में एक ऐसा डर था, जिसे वे हर साल छिपाने की कोशिश करती थीं।

     

    केक काटने के बाद जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए, अचानक नायरा को तेज़ चक्कर आने लगे। वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गई। कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो उसे अजीब महसूस हुआ। अगले दिन जब वह कॉलेज पहुँची, तो उसके दोस्तों ने हैरानी से कहा, नायरा, तू आज पहले से छोटी लग रही है।

     

    शुरुआत में सबने इसे मज़ाक समझा, लेकिन कुछ ही दिनों में सच सामने आ गया। उसका चेहरा सचमुच सोलह साल की लड़की जैसा दिखने लगा था। डॉक्टरों ने हर तरह की जाँच की, लेकिन सब रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य थीं।

    एक साल बीता।

     

    उन्नीसवें जन्मदिन की रात वही घटना दोबारा हुई। इस बार सुबह उठकर उसने आईने में देखा तो वह लगभग चौदह साल की बच्ची जैसी दिखाई दे रही थी।

    अब माँ मीरा का डर और बढ़ गया। उन्होंने नायरा को स्कूल या कॉलेज भेजना बंद कर दिया। लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया। पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाने लगे।

     

    इस लड़की पर कोई साया है।ज़रूर किसी ने टोना किया है।

     

    लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।

    एक दिन नायरा ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, मुझसे क्या छिपा रही हो? हर जन्मदिन पर मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी निकाली।

    “अब समय आ गया है कि तुझे सब सच बता दूँ।”

     

    डायरी नायरा के जन्म से भी पहले की थी। उसमें लिखा था कि मीरा और उनके पति कई साल तक संतान के लिए तरसते रहे। एक दिन वे पहाड़ों में रहने वाली एक रहस्यमयी साध्वी के पास पहुँचे।

     

    साध्वी ने कहा था, “तुम्हें बेटी मिलेगी, लेकिन उसकी ज़िंदगी साधारण नहीं होगी। अगर उसके जन्म का रहस्य कभी किसी लालची इंसान तक पहुँचा, तो उसकी उम्र हर जन्मदिन पर एक साल बढ़ने के बजाय दो साल घटती जाएगी।”

    मीरा ने उस समय इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था।

     

    लेकिन नायरा के दसवें जन्मदिन से ही यह अजीब बदलाव शुरू हो गया।

    नायरा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या इसका कोई इलाज है?”

     

    मीरा बोलीं, “डायरी में लिखा है कि पहाड़ों के उसी मंदिर में जवाब मिलेगा।”

     

    अगले ही दिन दोनों माँ-बेटी उस पुराने पहाड़ी मंदिर के लिए निकल पड़ीं।

    घने जंगल, ऊँचे पहाड़ और सुनसान रास्ते पार करने के बाद वे मंदिर पहुँचीं। वहाँ वही साध्वी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं।

     

    उन्होंने नायरा को देखते ही कहा, “मुझे पता था, तुम एक दिन ज़रूर आओगी।”

    नायरा ने उनसे सारी बात पूछी।

     

    साध्वी ने कहा, “तुम्हारी उम्र किसी बीमारी से नहीं घट रही। तुम्हारी जीवन-शक्ति कोई और चुरा रहा है।”

    “कौन?”

    “तुम्हारे पिता का अपना बड़ा भाई।”

    यह सुनकर मीरा दंग रह गईं।

     

    साध्वी ने बताया कि नायरा के चाचा ने वर्षों पहले तांत्रिक विद्या सीख ली थी। उसे पता चल गया था कि नायरा के जन्म के साथ एक दुर्लभ वरदान जुड़ा है। वह अपनी बढ़ती उम्र रोकने के लिए हर साल नायरा की एक-एक साल की जीवन-शक्ति चुरा रहा था।

    नायरा को विश्वास नहीं हुआ।

     

    “लेकिन चाचा तो हमेशा हमारे साथ अच्छे रहे हैं।”

    साध्वी बोलीं, “बुराई हमेशा मुस्कुराकर सामने आती है।”

     

    उन्होंने नायरा को एक ताबीज़ दिया और कहा, “अगले जन्मदिन की रात सच अपने आप सामने आ जाएगा।”

    एक साल बाद…

     

    नायरा का बीसवाँ जन्मदिन था, लेकिन उसका शरीर अब बारह साल की बच्ची जैसा दिखता था।

    रात के बारह बजते ही पूरे घर की बिजली चली गई। हवा तेज़ चलने लगी। तभी आँगन में काले कपड़ों में एक आदमी दिखाई दिया।

     

    वह कोई और नहीं, उसका चाचा था।

    वह हाथ में एक पुरानी माला लिए कुछ मंत्र पढ़ रहा था। जैसे ही उसने माला उठाई, नायरा के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

    उसी समय नायरा ने साध्वी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया।

     

    ताबीज़ तेज़ चमकने लगा।

    अचानक रोशनी वापस पलटी और सीधे उसके चाचा के ऊपर गिर गई।

     

    वह दर्द से चीख उठा।

    उसका असली चेहरा सामने आने लगा। कुछ ही सेकंड में वह बूढ़ा, कमजोर और झुर्रियों से भरा इंसान बन गया।वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

     

    रोते हुए बोला, “मैं मरना नहीं चाहता था… इसलिए हर साल इसकी उम्र चुराता रहा।”

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    उन्होंने कहा, “तुमने अपने ही भाई की बेटी के साथ ऐसा किया?”

    चाचा ने सिर झुका लिया।

    उसी समय तेज़ हवा चली और मंदिर की साध्वी वहाँ प्रकट हुईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिसने किसी और की ज़िंदगी चुराई, उसकी अपनी उम्र भी अब उसी पाप का हिसाब देगी।”

     

    अगले ही पल चाचा राख बनकर हवा में बिखर गया।

    घर में फिर से शांति लौट आई।

    धीरे-धीरे नायरा के शरीर में बदलाव आने लगे। पहली बार उसकी उम्र बढ़ने लगी। कुछ महीनों बाद वह फिर अपनी असली उम्र जैसी दिखने लगी।

    माँ ने राहत की साँस ली।

     

    नायरा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। उसने ठान लिया कि वह लोगों के शरीर ही नहीं, उनके टूटे हुए हौसलों का भी इलाज करेगी।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक दिन अस्पताल में काम करते हुए उसके पास एक सात साल की बच्ची लाई गई। उसकी माँ रोते हुए बोली, “डॉक्टर साहिबा… मेरी बेटी का हर जन्मदिन आने पर उसकी उम्र बढ़ने की बजाय कम होने लगती है…”

    नायरा के हाथ से फ़ाइल गिर गई।

    उसे अचानक वही पुराना ताबीज़ याद आया।

    उसने उसे वर्षों से संभालकर रखा था।

     

    उसकी नज़र खिड़की के बाहर गई। दूर पहाड़ों की दिशा में उसे ऐसा लगा जैसे वही बूढ़ी साध्वी मुस्कुरा रही हों।

     

    नायरा समझ गई कि उसका संघर्ष सिर्फ़ उसकी अपनी कहानी नहीं था। शायद अब उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वह उस रहस्य का हमेशा के लिए अंत करे, ताकि फिर कभी किसी मासूम की ज़िंदगी उसकी उम्र से न छीनी जाए।

     

    उसने बच्ची का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा,

    “डरो मत… इस बार तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

     

    यहीं से एक नई कहानी की शुरुआत हुई।