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  • बस महसूस होती है अब…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    फिर एक दिन सब धूमिल हो जायेगा..जैसे कुछ कहानियां पूरी होने के लिए नहीं, 

    *बस महसूस करने के लिए लिखी जाती हैं….😐🌻*

  • जो है अब तू है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    *तुझे एक बार फिर बता दूँ…. तेरे अलावा कोई नहीं है मेरा…*

     

    न कोई ऐसा जिससे दिल की बात कह सकूँ, न *कोई ऐसा जिसके सामने बिना डरे टूट सकूँ..*.. 

    दुनिया में लोग बहुत हैं, पर अपना सिर्फ तुझे माना है मैंने…

     

    *शायद इसी लिए तेरी छोटी सी बेरुख़ी भी दिल को बहुत तकलीफ़ देती है…*

     

    क्योंकि जहाँ पूरा भरोसा होता है, वहीं सबसे ज़्यादा डर भी होता है…

     

    तू साथ रहे या न रहे, ये तेरी मर्जी है….

     

    *मगर सच इतना सा है कि मेरे दिल ने तेरे बाद किसी और को अपना माना ही नहीं…*💝💕💘

  • बहुत कम बोलता हु…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    धीरे धीरे सबसे बात करना छोड़ दिया है,

     

    *अब खुद से भी बहुत कम बोलता हूं..!!*

  • संभाल के रखो यार…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    संभाल कर रखो जो भी हासिल है,

     

    *बाद में वो मन्नतों से भी नहीं मिलता दोस्त..*

     

     

    ❤️😇

  • महफ़िल से गुजर गए…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी एक जान होने का दावा करने वाले,

    *आज अनजान बनकर महफ़िल से गुज़र गए।*💕💕💕

  • मौन रह कर रहना है 🤫…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कुछ पीड़ाएं चीखने की इजाजत नहीं देती…🤫

     

    *उन्हें मौन रहके ही स्वीकारना पड़ता हैं..!!!😔*

  • किस्मत मे नहीं होते…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    फिर सुबह ये एहसास हुआ मुझे,

    कुछ रिश्ते साथ होकर भी साथ नहीं होते,

     

    जो ख्वाबों में भी हाथ छोड़ जाए,

    वो अक्सर किस्मत में नहीं होते…!!

    🥀✨

  • अजीबो गरीब है रित ये…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अजीबो-गरीब दस्तूर है इस दुनिया का भी यारों,

    *दिल साफ़ रखो तो लोग रूह पर ही दाग़ लगा देते हैं।*

  • आवाज़

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     “

    गाँव का नाम था “शिवपुर” — एक साधारण सा गाँव, जहाँ की मिट्टी में अनाज कम और चुप्पी ज़्यादा उगती थी। यह चुप्पी सदियों से वहाँ के लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। वे अन्याय सहते थे, लेकिन उसका विरोध नहीं करते थे। ज़मींदार की लाठी और सरपंच के हुक्म ने लोगों की रीढ़ को इतना झुका दिया था कि कोई सिर उठाने का साहस ही नहीं करता।

    लेकिन एक दिन शिवपुर की मिट्टी ने एक नई कहानी लिखी  विरोध की कहानी।

    बिंदु, एक 22 वर्षीय युवती, शिवपुर के स्कूल में अस्थायी शिक्षिका थी। शहर से पढ़कर लौटी थी, पिता की इच्छा के कारण। माँ पहले ही नहीं रही थी, और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। बिंदु ने किताबों से जो रोशनी पाई थी, वह उसे गाँव के अंधेरों में बाँटना चाहती थी।

    पर गाँव में पढ़ाई का मतलब था—लड़कियाँ बस नाम भर स्कूल आएँ, लड़के इधर-उधर बैठकर समय बिताएँ और शिक्षक अनुपस्थित रहें। स्कूल भवन खंडहर था, और किताबें सिर्फ रिकॉर्ड में थीं।

    बिंदु ने देखा कि यहाँ शिक्षा नहीं, केवल दिखावा था।

    एक दिन बिंदु ने गाँव के सरपंच, रघुवीर सिंह, से मिलकर स्कूल की दशा सुधारने की बात कही। रघुवीर ने मुस्कराकर कहा, “बिटिया, बहुत सोचती हो। यह गाँव है, शहर नहीं। यहाँ सब ऐसे ही चलता है।”

    बिंदु ने नम्रता से कहा, “अगर कुछ बदला नहीं गया, तो अगली पीढ़ी भी ऐसे ही अंधेरे में जिएगी।”

    रघुवीर की आँखें लाल हो गईं, “तू अपने काम से काम रख। ये सुधार-उधार तेरे बस की बात नहीं।”

    पर बिंदु चुप नहीं हुई। उसने स्कूल की तस्वीरें लीं, बच्चों के साथ बातचीत की, और ये सब सोशल मीडिया पर डाला। उसने ज़िला शिक्षा अधिकारी को शिकायत भेजी।

    यह पहला विरोध था — एक शिक्षिका का सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाना।

    बिंदु के विरोध की खबर पूरे गाँव में फैल गई। कुछ लोगों ने उसे ‘बदतमीज़’ कहा, कुछ ने कहा ‘शहर से पढ़कर आई है, अकड़ दिखा रही है’। उसके पिता को पंचायत में बुलाया गया, उन्हें चेतावनी दी गई कि बेटी को काबू में रखें।

    घर में तनाव बढ़ गया। पिता ने बिंदु से कहा, “बिटिया, तू क्यों झगड़े में पड़ती है? हमें शांति से जीना है।”

    बिंदु ने कहा, “बाबा, चुप रहने से कुछ नहीं बदलेगा। कोई तो बोले, कोई तो लड़े।”

    पिता ने सिर झुका लिया। वे जानते थे कि बेटी सही कह रही है, पर डर की बेड़ियाँ उन्हें बाँधे रखती थीं।

    बिंदु का असर स्कूल के बच्चों पर पड़ने लगा। कुछ लड़कियाँ अब नियमित आने लगीं। एक दिन, मीरा नाम की लड़की ने कहा, “दीदी, क्या मैं भी आपकी तरह मास्टरनी बन सकती हूँ?”

    बिंदु मुस्कराई, “क्यों नहीं? पर पहले तुम्हें डर से लड़ना होगा।”

    मीरा का पिता शराबी था, और लड़कियों को पढ़ाना पाप समझता था। एक दिन उसने मीरा को स्कूल जाते हुए पीटा। बिंदु को पता चला तो वह मीरा के घर गई और उसका विरोध किया। मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए

    बिंदु ने पहली बार खुलकर भीड़ से कहा:

    “हर बार चुप रहकर हमने औरत को बंदी बनाया है। क्या एक लड़की पढ़कर गाँव को रोशन नहीं कर सकती?”

    लोग चुप थे, पर इस बार उनकी चुप्पी में हलचल थी।

    रघुवीर सिंह को यह सब बर्दाश्त नहीं था। वह शिक्षा विभाग के लोगों को रिश्वत देता था, स्कूल के फंड हड़पता था। बिंदु उसके लिए खतरा बन गई थी। उसने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं — “बिंदु शहर से बदनाम होकर आई है”, “वह गाँव की लड़कियों को बिगाड़ रही है।”

    एक रात, बिंदु के घर की दीवार पर कालिख पोत दी गई, “शहर वापस जा, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।”

    बिंदु डरी, पर टूटी नहीं। उसने पुलिस में शिकायत की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई।

    बिंदु अब अकेली नहीं थी। मीरा, उसकी सहेलियाँ, कुछ नौजवान लड़के — सब उसके साथ आ गए। उन्होंने गाँव में पहली बार एक खुली बैठक रखी। इसमें बिंदु ने सबूतों के साथ बताया कि स्कूल का पैसा कैसे हड़प लिया गया।

    लोगों ने पहली बार विरोध में नारे लगाए:

    “अन्याय नहीं सहेंगे”,

    “शिक्षा का हक़ माँगेंगे।”

    रघुवीर सिंह चिढ़ गया। उसने गुंडों को भेजा, बिंदु को डराने के लिए। लेकिन इस बार पूरा गाँव उसकी रक्षा में खड़ा हो गया। महिलाओं ने लाठियाँ उठाईं, बुजुर्गों ने कहा, “अब बहुत हो गया।”

    जिला अधिकारी को दोबारा शिक़ायत भेजी गई, मीडिया को बुलाया गया। इस बार बिंदु के पास गाँव की आवाज़ थी। जब कैमरे गाँव पहुँचे, तो बिंदु ने सबके सामने कहा:

    “ये सिर्फ मेरा विरोध नहीं है। यह हर उस लड़की की आवाज़ है, जिसे चुप रहने को कहा गया। यह हर उस माँ का प्रतिकार है, जिसने अपनी बेटी को स्कूल भेजने का सपना देखा।”

    जाँच हुई। रघुवीर सिंह पकड़ा गया, स्कूल के फंड में घोटाला साबित हुआ। उसे पद से हटाया गया। स्कूल को नए शिक्षक मिले, भवन की मरम्मत शुरू हुई।

    बिंदु को सरकार ने सम्मानित किया, लेकिन वह शिवपुर नहीं छोड़ी। उसने एक लाइब्रेरी शुरू की, नाम रखा — “आवाज़।”

    मीरा अब स्कूल की टॉपर थी, और कहती थी, “मैं भी दीदी की तरह बनना चाहती हूँ — सवाल पूछने वाली।”

    गाँव में विरोध अब गुनाह नहीं, अधिकार बन चुका था। और यह सब हुआ एक लड़की के साहस से

    यह कहानी हमें यह सिखाती है कि विरोध सिर्फ ऊँची आवाज़ या झगड़ा नहीं होता — वह सच्चाई का साथ देना होता है। अगर एक आवाज़ उठे, तो कई जुड़ती हैं, और बदलाव की शुरुआत होती है।

     

     

  • “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी

    मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।

    राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।

    जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।

    ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”

    राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।

    लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”

    सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।

    राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।

    समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।

    एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।

    कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।

    उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”

    शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो

    जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।

    उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”

    जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।

    पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप

    जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”

    राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।

    जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”

    राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।

    सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।