🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • Dil sabhal ja jara part – 24

    Dil sabhal ja jara part – 24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 24: “नई शुरुआत की राह”

    मुंबई की वो शामें प्रिया के लिए कभी न खत्म होने वाली रातों जैसी लगती थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, लेकिन उन लहरों की आवाज प्रिया को आरव की हंसी की याद दिलाती थी। वो हंसी जो कभी शिमला के ठाकुर हाउस में गूंजती थी। प्रिया बालकनी में खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी फोटो – वो शादी वाली फोटो जहां आरव उसे रिंग पहना रहा था। उसकी आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो दर्द छिपाने की कोशिश में लगाई गई थी, लेकिन आंखों से झलकता दुख उसे धोखा दे रहा था। प्रिया की उंगलियां फोटो पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के चेहरे को छू रही हो। “आरव… कितनी खुश थी मैं उस दिन। तुम्हारी आंखों में वो चमक… वो प्यार। अब वो चमक कहां है? मैं यहां अकेली हूं, और तुम… तुम कहां हो?” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर फोटो पर गिर पड़े।

     

    अंदर से आदित्य पापा की आवाज आई। “प्रिया बेटी… शाम हो गई। अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। एक गहरी सांस ली और मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वो मुस्कान नकली थी, आंखों तक नहीं पहुंच रही थी। वो अंदर आई। लिविंग रूम में आदित्य पापा सोफे पर बैठे थे, चाय का ट्रे रखा था। उनका चेहरा प्रिया को देखकर और उदास हो गया। आदित्य की आंखें प्रिया के थके चेहरे पर टिक गईं – वो आंखें जो एक पिता की तरह दुख महसूस कर रही थीं। “बेटी… आज फिर बालकनी में खड़ी थी? कितना सोचेगी आरव के बारे में? कितना रोएगी?”

     

    प्रिया सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखें नीचे थीं, उंगलियां चाय के मग से खेल रही थीं। “पापा… क्या करूं? आरव… वो हर पल याद आता है। यहां मुंबई में आई हूं, लेकिन दिल शिमला में अटका है। वो ठाकुर हाउस, वो बर्फीली रातें, वो आरव की हंसी… सब मुझे सताता है। मैं भूलना चाहती हूं, लेकिन भूलती नहीं।”

     

    आदित्य ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं – वो लकीरें जो एक पिता के दिल का दर्द बयां कर रही थीं। वो प्रिया के करीब सरके और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो स्पर्श गर्म था, सहारे वाला। “प्रिया… मैं देख रहा हूं तुझे। रोज उदास रहती है। घर में अकेली बैठी, कुछ नहीं करती। बस यादों में खोई रहती है। बेटी, जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए। आरव चला गया, लेकिन तू तो है। तू क्यूं खुद को कैद करके रख रही है? तू कोई जॉब क्यों नहीं कर लेती? बाहर निकल, लोगों से मिल, काम कर। ऐसे घर में अकेली रहोगी तो कभी आरव को भूल नहीं पाओगी।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक जिद थी – वो जिद जो दर्द से पैदा हुई थी। वो मग रखी और आवाज कांपते हुए बोली, “पापा… जॉब? बाहर निकलूं? लेकिन पापा, मैं कहीं भी रहूं तो भी आरव को नहीं भूल सकती हूं। वो मेरी सांसों में है, मेरी हर याद में है। जॉब करूंगी तो क्या? दिन भर काम, लेकिन शाम को घर लौटूंगी तो फिर वही अकेलापन। आरव की यादें मुझे छोड़ेंगी नहीं। मैं भूलना भी नहीं चाहती। वो मेरा प्यार था, मेरा पति था। उसे भूलकर कैसे जिऊं?”

     

    आदित्य का चेहरा और गंभीर हो गया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकी थीं – वो आंखें जो एक पिता का दर्द और समझदारी दोनों बयां कर रही थीं। वो प्रिया का हाथ थामे। “बेटी… मैंने नहीं कहा भूल जा। ठीक है, मत भूलो। आरव को याद रखो। लेकिन क्या तू चाहती है कि आरव तुझे ऐसे उदास देखकर वो भी उदास रहे? क्योंकि आरव जहां भी होगा, तुझे देख रहा होगा। वो तेरी खुशी चाहता था, तेरी मुस्कान। अगर तू ऐसे उदास रही, तो उसकी आत्मा को दुख होगा। तू उसके लिए खुश होने की कोशिश कर। जॉब कर, नई जिंदगी बना। आरव को भूल मत, लेकिन उसके लिए जी।”

     

    प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। वो चुप हो गई। आदित्य की बातें उसके दिल में उतर रही थीं – धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से। उसका चेहरा उदास था, लेकिन अब उसमें एक सोच थी। वो मग उठाई और चाय पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। “पापा… आप सही कहते हैं। आरव… वो मुझे उदास नहीं देखना चाहते होंगे। वो कहते थे – ‘प्रिया, तू स्ट्रॉन्ग है।’ मैं कोशिश करूंगी। लेकिन पापा, आसान नहीं है। हर पल लगता है वो मेरे साथ है।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, आसान नहीं है। लेकिन शुरू कर। मैं तेरे साथ हूं। NGO में आ, काम कर। या कोई और जॉब ढूंढ। बाहर निकल।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में अब एक फैसला था – दर्द भरी, लेकिन मजबूत। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। आरव के लिए।”

     

    उसी समय दरवाजा खुला। रिया अंदर आई। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें सूजी। वो प्रिया के पास बैठी। “प्रिया… क्या बात हो रही है?”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… पापा कह रहे हैं जॉब कर लूं। उदास रहने से बेहतर है।”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था। वो आदित्य की ओर देखी। “हां प्रिया… अंकल सही कह रहे हैं। तू घर में बैठकर क्या करेगी? यादों में डूबकर खुद को तोड़ेगी? आरव भैया… वो चाहते होंगे हम आगे बढ़ें। मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जॉब ढूंढेंगे।”

     

    प्रिया ने रिया की आंखों में देखा। रिया हंस रही थी, लेकिन आंखें नम थीं। “रिया… तू भी उदास है ना? आरव… वो तेरे लिए भी भाई था। तू कहती नहीं, लेकिन मैं जानती हूं। रातों में रोती है ना?”

     

    रिया की आंखों से आंसू गिर पड़े। वो चुप हो गई। फिर बोली, “हां प्रिया… उदास हूं। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई जैसे थे। उनकी मौत… मुझे भी तोड़ गई। मैं हंसती हूं, लेकिन अंदर से खाली हूं। लेकिन मैं तेरे लिए स्ट्रॉन्ग बन रही हूं। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। आदित्य ने उन्हें देखा, उनका दिल भी भर आया। “बेटियों… रोओ नहीं। आगे बढ़ो। आरव की यादें साथ रखो, लेकिन जिंदगी जीओ।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब तय था। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। लेकिन रिया… तू भी। हम साथ करेंगे।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। साथ।”

     

    अगले दिन से प्रिया और रिया जॉब ढूंढने लगीं। प्रिया ने अपना रिज्यूम बनाया – कॉलेज की पढ़ाई, स्कॉलरशिप, NGO का एक्सपीरियंस। वो ऑनलाइन सर्च कर रही थी – टीचिंग जॉब्स, NGO पोजीशंस, काउंसलिंग। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन मन अभी भी आरव में था। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। तेरे लिए।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… ये जॉब देख। मुंबई में एक स्कूल में टीचर की वैकेंसी। तू बच्चों से प्यार करती है।”

     

    प्रिया ने देखा। उसकी आंखें चमकीं – पहली बार। “हां रिया… अप्लाई करती हूं।”

     

    आदित्य ने देखा। वो खुश हुए। “बेटी… अच्छा है। आगे बढ़ रही हो।”

     

     

    लेकिन शाम को प्रिया फिर उदास। बालकनी में खड़ी आरव की फोटो देख रही थी। “आरव… जॉब मिल जाएगी। लेकिन तू नहीं मिलेगा।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… चल, बाहर घूम आएं।”

     

    दोनों बाहर निकलीं। मुंबई की सड़कें – भीड़, लाइट्स। लेकिन प्रिया को आरव की कमी खल रही थी। “आरव… यहां सब भाग रहे हैं। लेकिन मेरा दिल रुका हुआ है।”

     

    धीरे-धीरे प्रिया इंटरव्यू देने लगी। पहला इंटरव्यू – NGO में। वो तैयार हुई – सादे कपड़े, बाल बंधे। इंटरव्यूअर ने पूछा, “आपका एक्सपीरियंस?”

     

    प्रिया ने कहा, “मैंने शिमला में NGO में काम किया। बच्चों को पढ़ाया।” लेकिन उसकी आवाज में दर्द था।

     

    इंटरव्यू के बाद प्रिया रो पड़ी। “रिया… मैं नहीं कर पाऊंगी। हर जगह आरव याद आता है।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… कोशिश कर। आरव चाहते होंगे।”

     

    प्रिया ने फिर कोशिश की। दूसरा इंटरव्यू – स्कूल में। वो बच्चों को देखकर मुस्कुराई – पहली बार सच्ची मुस्कान। “आरव… बच्चों में तुम्हारी हंसी है।”

     

    इंटरव्यूअर ने कहा, “आप सिलेक्टेड हैं।”

     

    प्रिया खुश हुई। लेकिन घर लौटकर रो पड़ी। “आरव… मैं जी रही हूं। लेकिन तेरे बिना।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जीएंगे।”

     

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Dil sabhal ja jara part – 23

    Dil sabhal ja jara part – 23

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 23 nai jagah ka akela pan 

     

    मुंबई की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। अप्रैल की गर्म हवा प्रिया और रिया के चेहरों पर लगी। शिमला की ठंडक से बिल्कुल उलट – यहां उमस थी, भीड़ थी, शोर था। प्रिया ने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। सफेद सलवार-कमीज पहनी थी – विधवा की तरह नहीं, लेकिन दिल से वो खुद को विधवा ही महसूस कर रही थी। गले में मंगलसूत्र अभी भी था, लेकिन वो अब यादों का बोझ लगता था। रिया उसके बगल में थी – उसका सूटकेस, और प्रिया का सहारा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और प्लेटफॉर्म से बाहर निकलीं।

     

    आदित्य पापा बाहर कार लेकर इंतजार कर रहे थे। उन्हें देखकर प्रिया की आंखें फिर भर आईं। वो दौड़ी और पापा से लिपट गई। “पापा…”

     

    आदित्य ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें भी नम थीं। “बेटी… आ गई। अब सब ठीक होगा।”

     

    रिया ने भी गले लगाया। “अंकल… थैंक्स कि हमें अपनाया।”

     

    कार में बैठे। मुंबई की सड़कें – ट्रैफिक, हॉर्न, ऊंची इमारतें। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसका मन शिमला में था – ठाकुर हाउस में, आरव के साथ। “आरव… तुम कहां हो? मुझे अकेला छोड़कर…”

     

    आदित्य पापा का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – छोटा, लेकिन आरामदायक। दो बेडरूम, बालकनी से समुद्र दिखता था। प्रिया को एक कमरा दिया गया। रिया को दूसरा। सामान रखते वक्त प्रिया ने अपना सूटकेस खोला। अंदर आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – जो एक्सीडेंट में बच गया था। प्रिया ने उसे छुआ और रो पड़ी। “आरव… तुम्हारी खुशबू अभी भी है।”

     

    रिया ने उसे गले लगाया। “प्रिया… रो मत। हम साथ हैं।”

     

    लेकिन रात हुई तो अकेलापन शुरू हो गया। प्रिया अपने कमरे में थी। नई जगह – नई दीवारें, नई छत, नई हवा। लेकिन दिल पुराना था। वो बिस्तर पर लेटी, छत को देख रही थी। आंसू बह रहे थे। “आरव… यहां सब नया है। लेकिन तुम नहीं हो। मुझे तुम्हारी कमी हर पल खल रही है। शिमला में तुम्हारी यादें थीं – वो लॉन जहां हम बर्फ में खेलते थे, वो हवेली जहां हमारा घर बनने वाला था, वो कमरा जहां हमारी पहली रात… लेकिन यहां? यहां सिर्फ अकेलापन है।”

     

    प्रिया उठी। बालकनी में गई। मुंबई की लाइट्स चमक रही थीं, दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। लेकिन प्रिया को शिमला की बर्फ याद आ रही थी। “आरव… याद है? वो रात जब तुमने मुझे प्रपोज किया था। बर्फ गिर रही थी, तुमने रिंग दी। मैं कितनी खुश थी। अब वो रिंग हाथ में है, लेकिन तुम नहीं।” प्रिया ने रिंग को चूमा। आंसू गिर पड़े। वो फर्श पर बैठ गई, घुटने मुंह से लगाए रोने लगी। “आरव… मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई देती है। ‘प्रिया… मेरी जान।’ लेकिन अब वो आवाज सिर्फ याद है।”

     

    रिया कमरे में आई। प्रिया को बालकनी में रोते देखा। वो पास बैठी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी नींद नहीं आ रही। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई थे। उनकी हंसी, उनकी चिढ़ाना… सब याद आता है।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “रिया… यहां सब नया है। लेकिन दिल पुराना दर्द लिए बैठा है। मैं सोचती हूं – आरव अगर होते तो क्या कहते? ‘प्रिया, मुंबई एंजॉय कर। मैं तेरे साथ हूं।’ लेकिन वो नहीं हैं।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन नहीं मान रहा था। वो रात भर जागती रही। आरव की यादें उसे सताती रहीं – वो पहली मुलाकात कॉलेज में, वो डांस पार्टी, वो हवेली की रातें, वो किस, वो गले लगना। “आरव… तुमने कहा था हमारा घर बनेगा। बच्चे होंगे। लेकिन अब? अब सिर्फ मैं हूं। अकेली।”

     

    सुबह हुई। आदित्य पापा NGO ले गए। ‘हृदय सेवा’ – गरीब बच्चों और दिल के मरीजों के लिए। प्रिया ने काम शुरू किया – बच्चों को पढ़ाना, मरीजों से बात करना। लेकिन हर चेहरे में आरव दिखता। एक बच्चा हंसा तो आरव की हंसी याद आई। प्रिया रो पड़ी। आदित्य ने पूछा, “बेटी… क्या हुआ?”

     

    “पापा… सबमें आरव दिखता है।”

     

    आदित्य ने गले लगाया। “समय लगेगा बेटी। लेकिन तू मजबूत है।”

     

    रिया भी NGO में मदद करने लगी। दोनों शाम को घर लौटतीं। मुंबई की भीड़ में खो जातीं, लेकिन अकेलापन नहीं जाता। प्रिया समुद्र किनारे जाती। लहरें देखती। “आरव… शिमला में बर्फ थी, यहां लहरें।

    लेकिन तुम्हारी कमी हर जगह है।”

     

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नंदी की वजह से महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। माता पार्वती पूजा की तैयारी कर रही थीं। गणेश जी पास में बैठे मोदक खा रहे थे और कार्तिकेय जी अपने काम में व्यस्त थे। वहीं नंदी हमेशा की तरह महादेव के पास बैठे उनकी सेवा में लगे थे।

     

    महादेव ध्यान में बैठे थे।

     

    माता पार्वती ने पूजा की सारी तैयारी पूरी की और महादेव को आवाज दी,

     

    “महादेव, पूजा का समय हो गया है।”

     

    महादेव ने आँखें खोलीं।

     

    “अभी आया देवी।”

     

    लेकिन तभी नंदी महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने नंदी को देखा और फिर महादेव की तरफ।

     

    “आप पहले नंदी के साथ बैठेंगे या मेरे साथ पूजा करने आएँगे?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, नंदी तो मेरे पास आए हैं। इन्हें कैसे भेज दूँ?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “जब भी मैं आपको बुलाती हूँ, नंदी बीच में आ जाते हैं।”

     

    नंदी ने यह सुना तो तुरंत उठकर दूसरी तरफ जाने लगे।

     

    महादेव बोले,

     

    “अरे नंदी, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “देखा! मैंने कहा था ना?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    “देवी, नंदी ने तो कुछ किया ही नहीं।”

     

    “इसीलिए तो कह रही हूँ। आप ही उन्हें हर बार बुलाते हैं।”

     

    नंदी चुपचाप खड़े रहे।

     

    गणेश जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने हँसते हुए कहा,

     

    “माता, आज तो नंदी फँस गए।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “बिल्कुल।”

     

    महादेव बोले,

     

    “गणेश, तुम भी अपनी माता का साथ दे रहे हो?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “मैं तो सच का साथ दे रहा हूँ पिता।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    पूजा के बाद माता पार्वती भोजन बनाने चली गईं। उन्होंने सोचा कि आज महादेव को अपने हाथों से भोजन खिलाएँगी। उन्होंने प्रेम से भोजन तैयार किया।

     

    उन्होंने महादेव को बुलाया,

     

    “महादेव, भोजन तैयार है।”

     

    महादेव आने ही वाले थे कि नंदी उनके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नंदी, तुम भी भोजन करना चाहते हो?”

     

    पार्वती जी ने दूर से यह देखा।

     

    “फिर से!”

     

    महादेव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ देवी?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    महादेव समझ गए कि कुछ तो हुआ है।

     

    “देवी, आप नाराज़ हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “जब आप ‘कुछ नहीं’ कहती हैं, तब अक्सर कुछ न कुछ जरूर होता है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको सब पता है फिर भी पूछते हैं।”

     

    महादेव नंदी की ओर देखने लगे।

     

    “क्या नंदी की वजह से?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    नंदी ने तुरंत अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव बोले,

     

    “बेचारे नंदी को क्यों दोष दे रही हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “मैं नंदी को दोष नहीं दे रही। मैं आपको कह रही हूँ।”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको पता है मैंने कितने प्रेम से भोजन बनाया है?”

     

    “हाँ देवी।”

     

    “फिर भी आप नंदी को देखते ही सब भूल जाते हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “ऐसा नहीं है।”

     

    “तो फिर?”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “मैं आपको भी उतना ही महत्व देता हूँ और नंदी को भी।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मुझे नंदी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि आप उनके साथ इतना समय बिताते हैं कि मेरे लिए समय ही नहीं बचता।”

     

    महादेव ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    फिर बोले,

     

    “देवी, आपने कभी सोचा है कि नंदी मेरे लिए क्या हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ, मैं जानती हूँ। वह आपके भक्त हैं, आपके वाहन हैं और आपके बहुत प्रिय हैं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और आप?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं?”

     

    “आप तो मेरे हृदय में हैं।”

     

    पार्वती जी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनकी नाराज़गी थोड़ी कम हो गई।

     

    तभी नंदी धीरे-धीरे उनके पास आए और अपना सिर माता पार्वती के चरणों के पास रख दिया।

     

    पार्वती जी ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “अरे नंदी, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।”

     

    नंदी ने जैसे राहत की साँस ली।

     

    महादेव हँसते हुए बोले,

     

    “देखा नंदी, तुम्हारी माता तुम्हें कितना प्रेम करती हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ, लेकिन तुम मेरी शिकायत महादेव से मत करना।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, नंदी आपकी शिकायत करेंगे भी तो मैं आपकी ही बात मानूँगा।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    नंदी ने महादेव की ओर देखा।

     

    महादेव बोले,

     

    “नंदी, आज से तुम्हें देवी की अनुमति के बिना मुझे कहीं भी ले जाने की जरूरत नहीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “मैंने ऐसा कब कहा कि नंदी आपको कहीं ले जाते हैं?”

     

    महादेव बोले,

     

    “आपने तो कहा था कि वह हर बार बीच में आ जाते हैं।”

     

    “वो तो मैंने मजाक में कहा था।”

     

    “तो फिर मैं भी मजाक कर रहा था।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    लेकिन नंदी अचानक महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “देखिए, फिर आ गए।”

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम आज सच में मेरी परीक्षा ले रहे हो।”

     

    गणेश जी हँसते हुए बोले,

     

    “पिता, नंदी तो कुछ नहीं कर रहे। असली समस्या तो आप दोनों की नोक-झोंक है।”

     

    कार्तिकेय जी भी वहाँ आ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “आज नंदी माता और पिता के बीच फँस गए हैं।”

     

    कार्तिकेय जी हँस पड़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तुम दोनों हँसो मत।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, अब तो पूरा परिवार हमारी बात सुन रहा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तो अच्छी बात है। सबको पता चले कि आप कितने भोले हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और सबको यह भी पता चले कि आप कितनी जल्दी नाराज़ हो जाती हैं।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं जल्दी नाराज़ होती हूँ?”

     

    “हाँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर आज मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने तुरंत कहा,

     

    “देवी, मैंने तो मजाक किया था।”

     

    पार्वती जी दूसरी तरफ देखने लगीं।

     

    गणेश जी ने धीरे से महादेव से कहा,

     

    “पिता, अब आपको ही संभालना होगा।”

     

    महादेव पार्वती जी के पास गए।

     

    “देवी, क्षमा कीजिए।”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “मैंने मजाक किया था।”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, अब तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    नंदी माता पार्वती के पास जाकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी नंदी को देखकर मुस्कुरा दीं।

     

    महादेव बोले,

     

    “देखा, नंदी ने भी मेरी मदद कर दी।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “नंदी अच्छे हैं, इसलिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आप भी बुरे नहीं हैं।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “बस इतना ही?”

     

    “अभी इतना ही।”

     

    फिर माता पार्वती ने नंदी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “नंदी, आज से तुम जब चाहो महादेव के पास आ सकते हो। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    “आपको भी अनुमति है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    उस दिन कैलाश पर एक छोटी-सी बात ने सबको हँसा दिया। नंदी के कारण शुरू हुई नोक-झोंक आखिर में माता पार्वती और महादेव की मुस्कान में बदल गई।

     

    महादेव ने नंदी को प्यार से देखा और बोले,

     

    “नंदी, आज तुम्हारी वजह से मुझे देवी को मनाने का अवसर मिला।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “और मेरी वजह से आपको यह याद रहा कि मुझे समय देना भी जरूरी है।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह बात मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    नंदी ने खुशी से अपना सिर झुका दिया।

     

    और कैलाश पर फिर वही शांति लौट आईजहाँ महादेव का भोला स्वभाव, माता पार्वती की प्यारी नाराज़गी और नंदी की भक्ति मिलकर एक ऐसा परिवार बनाते थे, जहाँ छोटी-सी नोक-झोंक भी अंत में प्रेम की मुस्कान बन जाती थी।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Dil sabhal ja jara part – 22

    Dil sabhal ja jara part – 22

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 22: “अंत की शुरुआत”

     

    शिमला का अस्पताल रात के तीन बजे भी जगमगा रहा था। इमरजेंसी वार्ड की लाइट्स कड़क थीं, और हवा में दवाइयों और डिसइन्फेक्टेंट की तेज़ महक फैली थी। प्रिया, रिया, राजेश पापा और आदित्य अंकल हॉस्पिटल के गलियारे में दौड़ते हुए आए थे। प्रिया की लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मंगलसूत्र गले में लटक रहा था, लेकिन चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ कांप रहे थे, आंखें सूजी हुईं। वो रोते हुए चीख रही थी, “आरव… आरव कहां है?”

     

    रिया उसे सहारा दे रही थी। “प्रिया… शांत हो। वो ठीक होगा।”

     

    राजेश पापा डॉक्टर से बात कर रहे थे। डॉक्टर – मिडिल एज, सफेद कोट, थका हुआ चेहरा – ने गहरी सांस ली। “मिस्टर ठाकुर… बहुत अफसोस की बात है। पेशेंट को हम बचा नहीं पाए। एक्सीडेंट बहुत गंभीर था। कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हेड इंजरी, इंटरनल ब्लीडिंग… हमने पूरी कोशिश की, लेकिन…”

     

    प्रिया की चीख गलियारे में गूंज गई। “नहीं! ये झूठ है! आरव… वो मर नहीं सकता! वो मुझसे वादा करके गया था!”

     

    वो डॉक्टर के सामने गिर पड़ी। रिया ने उसे संभाला। राजेश पापा का चेहरा पत्थर हो गया। आदित्य अंकल रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    डॉक्टर ने कहा, “और एक बात… एक्सीडेंट इतना भयानक था कि पेशेंट का चेहरा… पूरी तरह खराब हो गया है। पहचानना मुश्किल है। सिर्फ कपड़ों और कार से हमने कन्फर्म किया। बॉडी… देखना चाहेंगे?”

     

    प्रिया चीखी, “नहीं! मैं नहीं देखूंगी! आरव जिंदा है! वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    लेकिन राजेश पापा ने कहा, “देखना पड़ेगा।”

     

    वे सब मोर्चरी की ओर गए। ठंडी, सफेद जगह। एक बॉडी ट्रॉली पर पड़ी थी, सफेद चादर से ढकी। डॉक्टर ने चादर हटाई। चेहरा… कुचला हुआ, खून से सना, पहचान के बाहर। सिर्फ शेरवानी के टुकड़े, पगड़ी का हिस्सा।

     

    प्रिया ने देखा और बेहोश हो गई। रिया ने पकड़ा। “प्रिया!”

     

    राजेश पापा रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    आदित्य अंकल ने चादर फिर ढकी। “ये आरव है।”

     

    सब रो रहे थे। प्रिया को व्हीलचेयर पर बिठाया गया। वो बुदबुदा रही थी, “आरव… तुम वादा करके गए थे। आज हमारी पहली रात थी। तुम मुझे छोड़कर कैसे चले गए?”

     

    रिया रोते हुए बोली, “प्रिया… संभल। आरव भैया… वो हमें देख रहे होंगे।”

     

    घर लौटे। ठाकुर हाउस अब सूना लग रहा था। प्रिया अपने कमरे में थी – वही कमरा जो कल तक खुशियों से भरा था। अब वो बिस्तर पर लेटी रो रही थी। “आरव… तुम झूठे हो। वादा किया था ना… हमेशा साथ रहने का।”

     

    रिया उसके पास बैठी। “प्रिया… भगवान की मर्जी। लेकिन आरव भैया की आत्मा को शांति मिलेगी अगर तू स्ट्रॉन्ग रहेगी।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… वो कॉल… वो कुछ गलत था। आरव परेशान था। किसी ने बुलाया था उसे।”

     

    राजेश पापा कमरे में आए। “प्रिया बेटी… आरव का फोन मिला है कार में। अनजान कॉल्स थे। पुलिस जांच कर रही है।”

     

    प्रिया उठी। “पापा… ये एक्सीडेंट नहीं। मर्डर है। कोई साजिश है।”

     

    लेकिन सब थके हुए थे। रात गुजर गई। सुबह हुई। अंतिम संस्कार की तैयारियां। प्रिया सफेद साड़ी में। चेहरा सूजा हुआ। वो अर्थी के पास खड़ी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर।”

     

    अग्नि जली। सब रो रहे थे। प्रिया ने चंदन की लकड़ी डाली। “आरव… मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी?”

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल – “क्या सच में आरव था वो? चेहरा… पहचान नहीं हो रही थी।”

     

     

     

    ठाकुर हाउस अब सूना और उदास लग रहा था। वो घर जो कल तक शादी की रौनक से गूंज रहा था, आज मातम में डूबा हुआ था। दीवारों पर अभी भी फूलों की मालाएं लटक रही थीं, लेकिन उनकी खुशबू अब दर्द की तरह चुभ रही थी। हॉल में आरव की बड़ी सी फोटो लगी थी – शादी वाली, मुस्कुराते हुए। उसके सामने अगरबत्ती जल रही थी, और फूल चढ़ाए गए थे। प्रिया सफेद साड़ी में, सिर पर पल्लू, फोटो के सामने बैठी थी। उसकी आंखें सूजी हुईं, चेहरा सफेद, होंठ कांप रहे थे। वो घंटों से वहीं बैठी थी, जैसे कोई प्रतिमा। हाथ में आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – वो जो एक्सीडेंट से बचकर मिला था। वो उसे छाती से लगाए बैठी थी, आंसू लगातार बह रहे थे, लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर। हमारी शादी… हमारी पहली रात… सब अधूरा रह गया।”

     

    रिया उसके पास बैठी थी। उसकी आंखें भी लाल थीं, लेकिन वो खुद को संभाल रही थी – प्रिया के लिए। वो प्रिया का हाथ थामे थी। “प्रिया… कुछ खा ले। कल से कुछ नहीं खाया तूने।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। सिर्फ आंसू। रिया की आंखें भी भर आईं। “आरव भैया… वो हमें देख रहे हैं। वो नहीं चाहेंगे कि तू ऐसे टूट जाए।”

     

    लेकिन प्रिया का दिल मान नहीं रहा था। वो फोटो को देख रही थी। “रिया… वो झूठ बोलकर गया था। कहा था काम का कॉल। लेकिन वो… वो किसी खतरे में गया। और मैं रोक नहीं पाई।”

     

    आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा उदास था, लेकिन आंखों में दृढ़ता। वो प्रिया के पास बैठे। “बेटी… मैं जानता हूं दर्द क्या होता है। रानी को खोया था मैंने। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं। तू मेरे साथ मुंबई चल। वहां नई शुरुआत करेंगे। मैं अकेला हूं, तू अकेली। साथ रहेंगे।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आंखें नम, लेकिन आवाज में कमजोरी। “पापा… मैं यहां से नहीं जा सकती। ये घर… आरव का घर है। यहां उसकी हर याद है। मैं कैसे छोड़ दूं?”

     

    आदित्य अंकल ने उसका कंधा थामा। “बेटी… यादें दिल में रहती हैं। यहां रहकर तू खुद को और दुख देगी। मुंबई में नया जीवन। मैं तेरी देखभाल करूंगा। तू मेरी इकलौती बेटी है।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… मैं टूट गई हूं। आरव के बिना… कुछ नहीं बचा। लेकिन यहां उसकी खुशबू है, उसकी यादें हैं। मैं नहीं जा पाऊंगी।”

     

    राजेश पापा (आरव के पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा बुझा हुआ था। वो प्रिया के सामने बैठे। “प्रिया बेटी… आदित्य जी सही कह रहे हैं। यहां रहकर तू खुद को सजा देगी। आरव नहीं चाहेगा कि तू ऐसे जिए।”

     

    प्रिया ने राजेश पापा की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “पापा… आप भी मुझे छोड़ देंगे? ये घर… आरव का घर। मैं अकेली कैसे रहूंगी?”

     

    राजेश पापा की आंखें भर आईं। वो प्रिया को गले लगा लिया। “बेटी… तू मेरी बेटी है। हमेशा रहेगी। लेकिन आदित्य जी तेरे असली पिता हैं। उनके साथ जा। नई जिंदगी शुरू कर। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”

     

    प्रिया सिसकियां ले रही थी। “पापा… मैं अकेली नहीं जा सकती। रिया… रिया भी मेरे साथ जाएगी। वो भी टूट गई है। आरव उसका भी भाई था। वो बाहर से मजबूत दिखाती है, लेकिन अंदर से… वो भी रो रही है हर रात।”

     

    सबने रिया की ओर देखा। रिया की आंखें नीची थीं। वो चुप थी, लेकिन कंधे कांप रहे थे। राजेश पापा ने रिया के पास जाकर कहा, “रिया बेटी… सच्च है?”

     

    रिया ने सिर उठाया। आंसू बह रहे थे। “पापा… हां। आरव भैया मेरे भी भाई थे। प्रिया की तरह। मैं मजबूत दिखाती हूं, लेकिन अंदर से… सब खाली हो गया।”

     

    राजेश पापा ने रिया को गले लगाया। “बेटी… अगर प्रिया जाना चाहती है तो तू भी जा। दोनों साथ रहोगी। मैं अकेला रह लूंगा। लेकिन तुम्हारी खुशी महत्वपूर्ण है।”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… चल ना। मुंबई। नई शुरुआत। यहां हर कोना आरव की याद दिलाता है। हम साथ रहेंगे।”

     

    रिया ने प्रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “हां प्रिया… चलते हैं। लेकिन दिल यहां रह जाएगा।”

     

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटियां… मैं खुश हूं। मुंबई में हमारा घर तुम्हारा घर है।”

     

    राजेश पापा ने कहा, “ठीक है। पैकिंग शुरू करो। मैं टिकट बुक करवाता हूं।”

     

    प्रिया उठी। कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… मैं जा रही हूं। लेकिन तू मेरे दिल में है। हमेशा।”

     

    रिया ने सामान पैक करना शुरू किया। दोनों साथ थीं। टूटे हुए, लेकिन एक-दूसरे का सहारा।

     

    घर अब और सूना हो गया। राजेश पापा अकेले हॉल में बैठे। आरव की फोटो देख रहे थे। “आरव… प्रिया… माफ करना। मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    प्रिया और रिया मुंबई जाने वाली थीं। नई जिंदगी। लेकिन दिलों में आरव की याद हमेशा रहेगी।

     

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Dil sabhal ja jara part – 21

    Dil sabhal ja jara part – 21

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part- 21: “टूटते रिश्ते का दर्द”

    आरव ठाकुर हाउस के गलियारे में तेज़ कदमों से चल रहा था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगता था छाती से बाहर निकल आएगी। वो कॉल… वो लिफाफा… वो शब्द – “प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।” उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहे थे। वो आदमी कौन था? वो चेहरा… वो आवाज… सब धुंधला था। लेकिन शब्द साफ थे, जैसे चाकू की धार। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया था, हाथ कांप रहे थे। वो सीढ़ियां उतरते हुए खुद से बुदबुदाया, “ये नहीं हो सकता। झूठ है। सब झूठ। प्रिया… मेरी प्रिया… मेरी पत्नी। वो मेरी बहन नहीं हो सकती।”

    लेकिन वो लेटर… वो फोटो… सब कुछ इतना असली लग रहा था। आरव कार की ओर बढ़ा। बाहर रात का सन्नाटा था, बर्फ हल्की-हल्की गिर रही थी, जैसे आसमान भी उसके दर्द पर रो रहा हो। वो कार में बैठा, इंजन स्टार्ट किया। दिमाग में तूफान था। “अगर ये सच है तो… हमारी शादी… हमारा प्यार… सब गलत। मैंने क्या कर दिया? प्रिया… वो निर्दोष है। वो नहीं जानती। मैं उसे कैसे बताऊं? कैसे सहूं?”

    आरव ने कार तेज़ चलाई। सड़कें खाली थीं, शिमला की पहाड़ी रोड्स पर बर्फ की पतली परत थी, जो गाड़ी के टायरों से चिपक रही थी। वो स्पीड बढ़ाता गया – 60, 80, 100। हवा कान में सीटी बजा रही थी। उसके दिमाग में फ्लैशबैक्स आने लगे। बचपन की वो शामें, जब प्रिया छोटी सी थी। “भैया… मुझे गोद लो ना!” वो हंसती, दौड़ती। आरव उसे उठाता, घुमाता। “प्रिया, तू मेरी छोटी राजकुमारी है।” फिर वो रात – एक्सीडेंट की खबर। “प्रिया लापता है।” सालों का दर्द, इंतजार। फिर प्रिया की वापसी। “आरव… मैं तेरी बहन हूं?” नहीं, वो राज़ खुला – खून का रिश्ता नहीं। फिर प्यार… वो किस, वो स्पर्श, वो रातें। “प्रिया… तू मेरी है।” लेकिन अब? “अगर वो मेरी असली बहन है तो… मैंने क्या कर दिया? हमने क्या कर दिया?”

    आरव की आंखें नम हो गईं। वो चीखा, “नहीं! ये झूठ है!” कार और तेज़। पहाड़ी मोड़ आ रहा था, लेकिन वो ब्रेक नहीं लगाया। दिमाग में सिर्फ एक सवाल – “क्या करूं? प्रिया से कहूं? या चुप रहूं? शादी हो गई। वो मेरी पत्नी है। लेकिन अगर सच है तो… गलत है। पाप है। मैं उसे दुख नहीं दे सकता। खुद को मार लूं? या भाग जाऊं?” वो रो रहा था। आंसू गालों पर बह रहे थे, कार की विंडस्क्रीन धुंधली हो रही थी। “प्रिया… सॉरी। मैं तुझे खुश रखना चाहता था। लेकिन अब…”

    वहीं कमरे में प्रिया बिस्तर पर बैठी थी। लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मेहंदी की खुशबू कमरे में फैली हुई थी। वो इंतजार कर रही थी – आरव का। उसका दिल उछल रहा था। “आरव… जल्दी आओ ना। आज हमारी पहली रात है।” लेकिन समय गुजर रहा था। घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी। प्रिया का मन घबरा रहा था। “क्यों इतनी देर? वो कॉल… कौन था? आरव का चेहरा… कुछ गलत लग रहा था।” वो उठी, खिड़की के पास गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। दिल में एक अजीब सी बेचैनी। “कुछ गलत होने वाला है। मुझे पता है। आरव… कहां हो तुम?”

    प्रिया ने फोन उठाया। आरव को कॉल किया। रिंग जा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। “आरव… पिक करो ना।” बेचैनी बढ़ गई। वो कमरे में चक्कर लगाने लगी। मंगलसूत्र को छू रही थी। “आरव… तुम ठीक हो ना? वो कॉल… काम का था? लेकिन इतनी रात को कौन काम?” मन में बुरे ख्याल आने लगे। “कहीं कोई खतरा तो नहीं? विक्रम? या कोई और?” प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो दरवाजे की ओर गई। “आरव… जल्दी आओ। मुझे डर लग रहा है।”

    आरव की कार अब पहाड़ी रोड पर थी। स्पीड 120। मोड़ आया। वो ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन दिमाग कहीं और था। “प्रिया… अगर सच है तो मैं उसे देख नहीं सकता। मैं खुद को सजा दूंगा।” कार स्लिप हुई। बर्फ की वजह से। वो स्टियरिंग संभालने की कोशिश की, लेकिन देर हो गई। कार सड़क से उतरी, पेड़ से टकराई। धमाका। कांच टूटा, कार पलटी। आरव का सिर स्टीयरिंग से टकराया। खून बहने लगा। दर्द। अंधेरा। “प्रिया… सॉरी…”

    प्रिया कमरे में थी। फोन फिर बजाया। कोई जवाब नहीं। दिल जोरों से धड़क रहा था। “आरव… कुछ गलत हुआ है। मुझे पता है।” वो बाहर निकली। रिया के कमरे में गई। “रिया… उठ। आरव… वो कहीं गया है।”

    रिया उठी। “क्या? कहां?”

    प्रिया रो रही थी। “पता नहीं। एक कॉल आया था। उसके बाद चला गया। फोन नहीं उठा रहा।”

    रिया ने कहा, “चल, पापा को बताते हैं।”

    लेकिन तभी फोन आया। हॉस्पिटल से। “आरव ठाकुर का एक्सीडेंट हो गया है। जल्दी आएं।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। “आरव…”

     

    Avatar photo

    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • नन्हे कान्हा की बाल लीलाएं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ कान्हा और यशोदा मैया की रंगोली

     

    वृंदावन में सुबह होते ही हर तरफ चहल-पहल शुरू हो गई थी। गोपियाँ अपने घरों के बाहर आँगन साफ कर रही थीं। कोई फूलों की माला बना रही थी तो कोई घर के दरवाजे पर सुंदर रंगोली सजा रही थी।

     

    उस दिन नंद भवन के पास रहने वाली गोपी राधिका ने अपने आँगन में बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी। उसने कई रंगों से फूल, पत्तियाँ और बीच में एक बड़ा सा मोर बनाया था।

     

    राधिका रंगोली पूरी करके पीछे हटी और खुशी से बोली—

     

    “आज तो मेरी रंगोली सबसे सुंदर लग रही है।”

     

    पास खड़ी दूसरी गोपी ने कहा—

     

    “सच में बहुत सुंदर है। बस इसे कान्हा से बचाकर रखना।”

     

    राधिका का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे हाँ! कान्हा ने देख लिया तो मेरी सारी मेहनत खराब कर देगा।”

     

    उधर थोड़ी दूरी पर खड़े कान्हा अपने दोस्तों के साथ यह बात सुन रहे थे।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “तुमने सुना?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो कह रही है कि मैं उसकी रंगोली खराब कर दूँगा।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने आँखों में शरारत भरकर कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारे चेहरे से तो लग रहा है कि जरूर कुछ करोगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद राधिका घर के अंदर चली गई।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उसके आँगन के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने रंगोली को देखा।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    उनके दोस्त भी पास आ गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे मत छूना। बहुत मेहनत से बनाई है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं खराब थोड़ी करूँगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी सी उंगली रंग के पास ले जाकर रोक ली।

     

    फिर अचानक उन्होंने रंगोली के बीच एक छोटा सा बांसुरी का निशान बना दिया।

     

    दोस्तों ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी रोक ली।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब ये मेरी भी हो गई।”

     

    तभी राधिका बाहर आ गई।

     

    उसने रंगोली देखी।

     

    पहले तो वह चौंकी।

     

    फिर कान्हा को देखकर बोली—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा भागने लगे।

     

    राधिका उनके पीछे दौड़ी।

     

    “रुको! आज तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “मैंने रंगोली खराब नहीं की। मैंने तो उसमें बांसुरी बनाई है।”

     

    “तुमने मेरी पूरी रंगोली में अपनी बांसुरी क्यों बना दी?”

     

    “क्योंकि तुमने मोर बनाया था। मोर को भी तो बांसुरी सुननी चाहिए।”

     

    राधिका कुछ बोल नहीं पाई।

     

    पास खड़े बच्चे हँसने लगे।

     

    राधिका ने कहा—

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर गुस्सा मत करो।”

     

    राधिका ने हाथ में थोड़ा रंग लिया और कान्हा के गाल पर लगा दिया।

     

    “अब बराबर!”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने भी रंग उठाया और राधिका के गाल पर लगा दिया।

     

    अब बाकी बच्चे भी रंग लगाने लगे।

     

    कुछ ही पल में पूरा आँगन रंगों से भर गया।

     

    राधिका की सुंदर रंगोली जरूर खराब हो गई थी, लेकिन आँगन में बच्चों की हँसी गूँज रही थी।

     

    तभी वहाँ यशोदा मैया आ गईं।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सब बच्चे एकदम शांत हो गए।

     

    यशोदा ने रंगोली की तरफ देखा।

     

    फिर कान्हा की तरफ।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तो ये रंग तुम्हारे गाल पर कैसे आया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “राधिका ने लगाया।”

     

    राधिका तुरंत बोली—

     

    “पहले कान्हा ने लगाया था!”

     

    यशोदा मुस्कुराने लगीं।

     

    उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़ा।

     

    “चलो मेरे साथ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “घर।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारे कपड़े देखे हैं?”

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    उनका पूरा कुर्ता रंगों से भर गया था।

     

    वह हँसने लगे।

     

    “मैया, आज तो मैं बहुत सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, बिल्कुल रंगों की पोटली जैसे।”

     

    कान्हा हँसते हुए उनके साथ चल दिए।

     

    घर पहुँचकर यशोदा ने उन्हें पानी से साफ किया।

     

    कान्हा बार-बार पानी से बचने की कोशिश करते।

     

    “मैया, ठंडा पानी है!”

     

    “चुपचाप बैठो।”

     

    “मैया, आँख में चला गया।”

     

    “आँखें बंद कर लो।”

     

    “मैया, कान में चला गया।”

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    उन्होंने कान्हा के बाल साफ किए और कपड़े बदलाए।

     

    फिर उन्हें पास बैठाकर बोलीं—

     

    “कान्हा, किसी की मेहनत खराब नहीं करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझसे गलती हो गई।”

     

    “अगर तुम्हें रंगोली पसंद आई थी तो तुम राधिका से पूछ सकते थे।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं उससे माफी माँगूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस यही बात अच्छी है।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा वापस राधिका के घर पहुँचे।

     

    राधिका नई रंगोली बना रही थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “राधिका।”

     

    राधिका ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    राधिका मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

     

    राधिका ने सोचा।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन इस बार रंगोली खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं करूँगा।”

     

    दोनों मिलकर रंगोली बनाने लगे।

     

    कान्हा ने फूलों के लिए पीला रंग दिया।

     

    राधिका ने नीला रंग लगाया।

     

    कुछ देर बाद रंगोली पहले से भी सुंदर बन गई।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अब ये सच में सुंदर है।”

     

    राधिका बोली—

     

    “क्योंकि इस बार तुमने इसे बिगाड़ा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी उनके दोस्त आ गए।

     

    एक बोला—

     

    “कान्हा, चलो! नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम लोग जाओ, मैं अभी आता हूँ।”

     

    दोस्तों के जाते ही राधिका ने पूछा—

     

    “तुम्हें इतनी शरारत करने की जरूरत क्यों पड़ती है?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि जब सब हँसते हैं ना, तो मुझे अच्छा लगता है।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शरारत से किसी को दुख भी हो सकता है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अब ध्यान रखूँगा।”

     

    शाम को यशोदा ने कान्हा को बुलाया।

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज मैंने रंगोली बनाई।”

     

    “खराब तो नहीं की?”

     

    “नहीं मैया। इस बार मैंने बनवाई है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “सच?”

     

    कान्हा ने गर्व से सिर हिलाया।

     

    “हाँ। और राधिका ने मुझे माफ भी कर दिया।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरा कान्हा बड़ा हो रहा है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “नहीं मैया, मैं बड़ा नहीं होना चाहता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बड़ा हो गया तो आप मुझे गोद में नहीं उठाओगी।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “तुम चाहे कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए हमेशा मेरे नन्हे कान्हा ही रहोगे।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डाल दिया।

     

    बाहर शाम की हवा चल रही थी और वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा के दोस्तों ने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    कान्हा ने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, जाऊँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जाओ, लेकिन आज कोई नई शरारत मत करना।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैं कोशिश करूँगा।”

     

    और यह कहते ही वह दौड़ते हुए बाहर निकल गए।

     

    यशोदा उन्हें जाते हुए देखती रहीं और मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “ये ‘कोशिश’ कह रहा है… मतलब आज फिर कोई शरारत होने वाली है।”

     

    और सच में, अगले दिन कान्हा की शरारत वृंदावन की रंगोली से निकलकर यमुना किनारे तक पहुँचने वाली थी।

     

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • नन्हा कान्हा और यशोदा मैया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यशोदा मैया की छुपी हुई मटकी

     

    वृंदावन में उस दिन सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। कहीं मटकी में दही जम रहा था तो कहीं मक्खन निकाला जा रहा था। नंद भवन में भी यशोदा मैया सुबह से काम में लगी हुई थीं।

     

    यशोदा मैया को अब अपने कान्हा की माखन चोरी की आदत अच्छी तरह पता चल चुकी थी।

     

    इसलिए उन्होंने आज एक नई योजना बनाई।

     

    उन्होंने खूब सारा ताजा माखन निकाला और उसे एक बड़ी मटकी में भर दिया। फिर उस मटकी को घर के ऐसे कमरे में रख दिया जहाँ कान्हा की नजर आसानी से न पहुँच सके।

     

    यशोदा ने मन ही मन कहा—

     

    “आज देखती हूँ मेरा नटखट कान्हा माखन कैसे ढूँढ़ता है।”

     

    उन्हें क्या पता था कि कान्हा को रोकना इतना आसान नहीं था।

     

    उसी समय कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में खेल रहे थे।

     

    एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला—

     

    “कान्हा! आज मैया ने माखन कहीं छिपा दिया है।”

     

    कान्हा ने खेलना छोड़ दिया।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैंने देखा है। मैया मटकी लेकर अंदर गई थीं।”

     

    कान्हा ने आँखें सिकोड़कर कहा—

     

    “तो आज माखन ढूँढ़ने का खेल खेलेंगे।”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन अगर यशोदा मैया ने पकड़ लिया तो?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “पकड़ लिया तो कह देंगे हम तो छुपन-छुपाई खेल रहे थे।”

     

    सब बच्चे धीरे-धीरे घर के अंदर जाने लगे।

     

    कान्हा सबसे आगे थे।

     

    उन्होंने पहले रसोई में देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    फिर उन्होंने अनाज वाले कमरे में देखा।

     

    वहाँ भी कुछ नहीं मिला।

     

    फिर एक छोटे कमरे में गए।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “यहाँ भी नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कहीं मैया ने मटकी बाहर तो नहीं रख दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। माखन घर के अंदर ही है। मुझे इसकी खुशबू आ रही है।”

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    तभी उन्हें एक बंद दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    एक दोस्त डरते हुए बोला—

     

    “कान्हा, इसे मत खोलो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “माखन यहीं है।”

     

    उन्होंने दरवाजा खटखटाया।

     

    अंदर से कोई आवाज नहीं आई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “तुम सब पीछे हटो।”

     

    फिर उन्होंने धीरे से दरवाजे की कुंडी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    कान्हा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    एक कोने में बड़ी सी मटकी रखी थी।

     

    कान्हा के चेहरे पर चमक आ गई।

     

    “मिल गया!”

     

    सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।

     

    कान्हा मटकी के पास गए।

     

    उन्होंने ढक्कन हटाया।

     

    ताजा सफेद माखन देखकर उनकी आँखें चमकने लगीं।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, जल्दी करो। मैया आ जाएँगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पहले सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने हाथ से माखन निकाला और दोस्तों को देने लगे।

     

    तभी बाहर से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    सभी बच्चों के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कान्हा ने जल्दी से कहा—

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    कोई परदे के पीछे छिप गया।

     

    कोई संदूक के पीछे।

     

    कान्हा खुद मटकी के पीछे बैठ गए।

     

    यशोदा कमरे के पास पहुँचीं।

     

    उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।

     

    वह समझ गईं कि उनकी योजना पकड़ ली गई है।

     

    उन्होंने अंदर जाकर कहा—

     

    “कान्हा, बाहर आ जाओ।”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं हो।”

     

    फिर भी चुप्पी।

     

    यशोदा ने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “अच्छा, अगर कान्हा नहीं निकले तो मैं ये माखन किसी और को दे दूँगी।”

     

    मटकी के पीछे से तुरंत आवाज आई—

     

    “नहीं!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा धीरे-धीरे बाहर निकले।

     

    उनके हाथ और गाल माखन से भरे थे।

     

    यशोदा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।

     

    “तो तुम यहाँ माखन ढूँढ़ रहे थे?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “जी मैया।”

     

    “मैंने माखन छिपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी तुमने ढूँढ़ लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैया, आप माखन छिपा सकती हो, लेकिन उसकी खुशबू नहीं।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “और ये सारे बच्चे?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे बाहर आ गए।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, गलती हमारी नहीं थी। कान्हा हमें लेकर आए थे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “अरे! दोस्ती में सबकी गलती बराबर होती है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब दोस्ती भी याद आ रही है?”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी उठाई।

     

    “ठीक है। आज मैं तुम्हें माखन दूँगी।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “पहले तुम मेरे लिए एक काम करोगे।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    “आँगन में जो मटके पड़े हैं, उन्हें सही जगह रखना होगा।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “माखन कितना मिलेगा?”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “काम के हिसाब से।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “चलो, काम करते हैं।”

     

    बच्चे मटके उठाने लगे।

     

    कुछ ही देर में आँगन साफ हो गया।

     

    यशोदा ने देखा तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

     

    उन्होंने सब बच्चों को माखन और मिश्री दी।

     

    कान्हा ने अपना हिस्सा लिया और आधा अपने दोस्तों को दे दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम अपना माखन भी बाँट देते हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अकेले खाने में क्या मजा है?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “लेकिन ये बात मैया को मत बताना।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मैंने सुन लिया है।”

     

    सभी बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    शाम को जब नंद बाबा घर लौटे तो उन्होंने देखा कि आँगन बहुत साफ था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज माखन चुराया भी और घर का काम भी किया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “क्यों बेटा, आज क्या कारनामा किया?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “कुछ नहीं बाबा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “मटकी ढूँढ़ निकाली।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “वाह! तुम्हारी नाक तो बहुत तेज है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, माखन की खुशबू मुझे दूर से बुलाती है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    रात को कान्हा यशोदा की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

     

    यशोदा उनके बाल सहला रही थीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम इतना माखन क्यों खाते हो?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि माखन मीठा होता है।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और माँ का प्यार?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वो माखन से भी ज्यादा मीठा है।”

     

    यशोदा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को सीने से लगा लिया।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन सोने से पहले उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “कल माखन कहाँ छिपाओगी?”

     

    यशोदा ने हँसते हुए कहा—

     

    “अब तो मैं तुम्हारे सामने ही रखूँगी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर कल चोरी करने में मजा नहीं आएगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारी शरारतें भी ना!”

     

    कान्हा हँसते हुए माँ से लिपट गए।

     

    उस रात नंद भवन में शांति थी।

     

    लेकिन यशोदा जानती थीं कि अगले दिन उनका नन्हा कान्हा फिर कोई नई शरारत करने वाला है।

     

    और इस बार उसकी शरारत सिर्फ माखन की मटकी तक सीमित नहीं रहने वाली थी।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • नन्हे कान्हा ओर माखन की मटकी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    नन्हे कान्हा और माखन की मटकी

     

    वृंदावन में सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ बज रही थीं और गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। लेकिन नंद भवन में आज यशोदा मैया कुछ ज्यादा ही परेशान थीं।

     

    उन्होंने सुबह-सुबह माखन की मटकी खोली तो उसमें माखन बहुत कम था।

     

    यशोदा ने हैरानी से मटकी देखी।

     

    “कल तो मैंने पूरी मटकी भरी थी। इतनी जल्दी माखन खत्म कैसे हो गया?”

     

    उन्होंने घर में काम करने वाली गोपी से पूछा—

     

    “तुमने माखन निकाला था?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया। मैंने तो मटकी को हाथ तक नहीं लगाया।”

     

    यशोदा कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    तभी उन्हें बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    उन्होंने धीरे से दरवाजे के पास जाकर देखा।

     

    आँगन में कान्हा अपने दोस्तों के साथ बैठे थे। सभी बच्चे कुछ खाने में व्यस्त थे।

     

    यशोदा ने ध्यान से देखा।

     

    कान्हा के हाथ में माखन था।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत माखन पीछे कर लिया।

     

    “जी मैया?”

     

    “इधर आओ।”

     

    कान्हा धीरे-धीरे उनके पास आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हारे हाथ में क्या है?”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “अच्छा? हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने धीरे से हाथ आगे किया।

     

    उसमें सफेद माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “ये क्या है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “माखन।”

     

    “और ये तुम्हारे हाथ में कैसे आया?”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, मैं तो बस देख रहा था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”

     

    यशोदा हँसते-हँसते बोलीं—

     

    “माखन देखकर हाथ में कैसे आ गया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “वो… हाथ खुद चला गया।”

     

    पास खड़े ग्वाल-बाल हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कान्हा तुरंत भाग गए।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कान्हा आँगन के एक कोने से दूसरे कोने तक भागने लगे।

     

    यशोदा उनके पीछे दौड़ती रहीं।

     

    आखिर कान्हा एक बड़े घड़े के पीछे छिप गए।

     

    यशोदा ने जानबूझकर कहा—

     

    “लगता है मेरा कान्हा कहीं चला गया।”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    यशोदा दूसरी तरफ जाने लगीं।

     

    कान्हा धीरे से बाहर निकले।

     

    जैसे ही उन्होंने भागने के लिए कदम बढ़ाया, यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “अब बताओ, माखन किसने खाया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने नहीं खाया।”

     

    “तो?”

     

    “मेरे दोस्तों ने खाया।”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा ने ही हमें बुलाया था।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी शिकायत कर दी?”

     

    बच्चा हँसने लगा।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “कान्हा, अगर तुम्हें माखन चाहिए तो मुझसे माँग लिया करो। चोरी क्यों करते हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “माँगने पर तो आप थोड़ा देती हो। मटकी में बहुत सारा होता है।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, तो अब मटकी खाली कर दोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    अगले दिन यशोदा ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर रख दी।

     

    उन्होंने सोचा कि अब कान्हा वहाँ तक नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन कान्हा ने मटकी देखी तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “आज मटकी बहुत ऊपर है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो आज माखन नहीं मिलेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्यों नहीं मिलेगा? बस तरीका बदलना पड़ेगा।”

     

    उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर खड़ा किया।

     

    सबसे ऊपर कान्हा चढ़ गए।

     

    कान्हा ने मटकी पकड़ ली।

     

    “देखा! मैंने कहा था ना, माखन मिलेगा।”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “लेकिन मैया पकड़ लेंगी।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “पहले माखन तो निकालो।”

     

    मटकी नीचे उतारी गई।

     

    कान्हा ने उसे खोला।

     

    माखन की खुशबू फैल गई।

     

    सभी बच्चे खुशी से झूम उठे।

     

    कान्हा ने माखन बाँटा।

     

    किसी को थोड़ा मिला, किसी को ज्यादा।

     

    तभी एक बंदर भी वहाँ आ गया।

     

    कान्हा ने उसे भी माखन दे दिया।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम बंदर को क्यों दे रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “उसे भी भूख लगी है।”

     

    बंदर माखन लेकर पेड़ पर चढ़ गया।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने सब देख लिया था।

     

    “कान्हा!”

     

    बच्चे भाग गए।

     

    कान्हा वहीं खड़े रह गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “फिर माखन चोरी?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मैया…”

     

    “आज तो तुम्हें सजा मिलेगी।”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कैसी सजा?”

     

    “आज तुम्हें मेरे साथ बैठकर पूरा माखन खाना होगा।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हें लगा मैं तुम्हें सच में सजा दूँगी?”

     

    कान्हा दौड़कर उनकी गोद में बैठ गए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी सामने रख दी।

     

    कान्हा ने पहला निवाला लिया और फिर अपनी माँ को खिलाया।

     

    “पहले आप।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि माखन आपने बनाया है।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    उस दिन शाम को कई गोपियाँ फिर शिकायत लेकर आईं।

     

    एक बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कान्हा हमारे घर की मटकी भी खाली कर गया।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और मेरे घर तो बंदरों को भी बुला लाया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की ओर देखा।

     

    कान्हा धीरे से मुस्कुराए।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लेकिन सच कहूँ तो जब से कान्हा हमारे घर आने लगा है, घर में रौनक हो गई है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “पहले हम माखन बनाकर रखती थीं, अब बनाते ही सोचती हैं कि कान्हा कब आएगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    कान्हा गोपियों की तरफ देखकर बोले—

     

    “तो कल से मैं सबके घर आऊँगा।”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ बोलीं—

     

    “नहीं!”

     

    पूरा आँगन हँसी से भर गया।

     

    कान्हा भी खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “मेरे नटखट कान्हा, तुम्हारी शरारतों से पूरा वृंदावन परेशान भी है और खुश भी।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डालकर कहा—

     

    “मैया, मैं शरारत नहीं करता। मैं तो सबको खुश करता हूँ।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    और सच ही तो था।

     

    कान्हा की माखन चोरी सिर्फ माखन की चोरी नहीं थी। उनके बहाने हर घर में हँसी पहुँचती थी, हर आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी और हर गोपी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    इसीलिए वृंदावन में जब भी कोई माखन की खाली मटकी देखता, तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहता—

     

    “लगता है कान्हा यहाँ होकर गए हैं।”

     

     

    . नन्हे कान्हा और खोया हुआ बछड़ा

     

    एक सुबह नंद बाबा ने कान्हा से कहा—

     

    “कान्हा, आज तुम अपने दोस्तों के साथ बछड़ों को चराने ले जाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच बाबा?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना। कोई बछड़ा झुंड से अलग नहीं होना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ बछड़ों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते में बच्चे खेलते रहे।

     

    कोई पेड़ से फल तोड़ता, कोई फूल इकट्ठा करता और कान्हा कभी बांसुरी बजाते तो कभी बछड़ों के साथ दौड़ते।

     

    जंगल के पास पहुँचकर उन्होंने बछड़ों को हरी घास वाले मैदान में छोड़ दिया।

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाने लगे।

     

    सभी बछड़े उनकी आवाज सुनकर शांत हो गए।

     

    कुछ देर बाद एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, चलो नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पहले बछड़ों को देख लो।”

     

    सभी बच्चों ने बछड़ों को गिना।

     

    एक कम था।

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “एक बछड़ा कहाँ गया?”

     

    सब बच्चे परेशान हो गए।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    लेकिन बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद जंगल की तरफ चला गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो, उसे ढूँढ़ते हैं।”

     

    सब बच्चे अलग-अलग दिशा में फैल गए।

     

    कान्हा ने बछड़े को आवाज दी—

     

    “आ जा… आ जा…”

     

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    तभी उन्हें झाड़ियों के पीछे से हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “कान्हा, इधर!”

     

    कान्हा दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक छोटा बछड़ा झाड़ियों में फँसा हुआ था।

     

    उसका पैर एक बेल में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठ गए।

     

    “डर मत। मैं तुम्हें निकालता हूँ।”

     

    उन्होंने बेल को सावधानी से हटाया।

     

    बछड़ा आजाद हो गया।

     

    लेकिन वह बहुत डरा हुआ था।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “अब ठीक है।”

     

    बछड़ा कान्हा के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो, इसे वापस झुंड में ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, बछड़ा एक दिशा में देखने लगा।

     

    कान्हा समझ गए कि शायद उसकी माँ उसी तरफ होगी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ को ढूँढ़ना होगा।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम ज्यादा दूर गए तो बाबा चिंता करेंगे।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम जल्दी वापस आ जाएँगे।”

     

    वे बछड़े के पीछे चल पड़े।

     

    काफी देर तक जंगल में घूमने के बाद उन्हें घंटियों की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “सुनो!”

     

    सबने ध्यान लगाया।

     

    घंटियों की आवाज लगातार आ रही थी।

     

    वे उसी दिशा में दौड़े।

     

    वहाँ गायों का एक बड़ा झुंड था।

     

    बछड़े ने अपनी माँ को देखते ही आवाज लगाई और दौड़कर उसके पास चला गया।

     

    गाय ने अपने बछड़े को प्यार से चाटा।

     

    कान्हा यह देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब इसे यहीं छोड़ दें?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। इसे अपनी माँ के साथ वापस ले चलेंगे।”

     

    वे दोनों को लेकर वापस लौटने लगे।

     

    जब वे मैदान में पहुँचे तो बाकी बछड़े भी उनके पास आ गए।

     

    लेकिन शाम होने तक कान्हा घर नहीं लौटे थे।

     

    यशोदा मैया चिंतित हो गईं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से पूछा—

     

    “कान्हा अभी तक क्यों नहीं आया?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद बच्चों के साथ खेल रहा होगा।”

     

    लेकिन थोड़ी देर बाद बच्चे वापस आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कान्हा कहाँ है?”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा एक बछड़े को उसकी माँ तक पहुँचाने गए थे।”

     

    यशोदा की चिंता और बढ़ गई।

     

    “कहाँ गए हैं?”

     

    “बस आते होंगे।”

     

    कुछ देर बाद दूर से कान्हा दिखाई दिए।

     

    उनके कपड़े मिट्टी से भरे थे।

     

    बालों में पत्ते लगे थे और कंधे पर बांसुरी लटकी हुई थी।

     

    यशोदा दौड़कर उनके पास पहुँचीं।

     

    “कहाँ चले गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, एक बछड़ा खो गया था।”

     

    “तो तुम अकेले इतनी दूर चले गए?”

     

    “मैं अकेला नहीं था। मेरे दोस्त भी थे।”

     

    यशोदा ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान थी?”

     

    कान्हा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माफ कर दो मैया। अगली बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा का गुस्सा तुरंत गायब हो गया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “बस अपना ध्यान रखा करो।”

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मजबूरी में बनी नाचने वाली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मजबूरी में नचनिया बनी राधा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा कस्बा था, जहाँ लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। उसी कस्बे के किनारे एक पुराने से घर में राधा अपनी माँ और छोटे भाई मोहन के साथ रहती थी।

     

    राधा को बचपन से नृत्य का बहुत शौक था। जब भी मंदिर में भजन होता या किसी शादी में ढोलक बजती, उसके पैर अपने आप थिरकने लगते। उसकी माँ अक्सर मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “बेटी, तेरे पैरों में तो जैसे घुंघरू बंधे हैं।”

     

    राधा हँसकर कहती—

     

    “माँ, एक दिन मैं बहुत बड़ा मंच ढूँढ़ूँगी और वहाँ नाचूँगी।”

     

    लेकिन राधा की जिंदगी में सपनों से ज्यादा मजबूरियाँ थीं।

     

    उसके पिता पहले मजदूरी करते थे। एक दुर्घटना के बाद उनका काम छूट गया। घर की थोड़ी-सी बचत इलाज में खत्म हो गई। कुछ ही समय बाद पिता चल बसे।

     

    घर की सारी जिम्मेदारी माँ पर आ गई।

     

    माँ दूसरों के घरों में काम करने लगीं, लेकिन इतनी कम कमाई में घर चलाना मुश्किल था। ऊपर से मोहन की पढ़ाई और माँ की दवाइयों का खर्च अलग था।

     

    राधा ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

     

    माँ ने बहुत रोका।

     

    “तू पढ़ ले बेटी। तेरे पिता का सपना था कि तू खूब पढ़े।”

     

    राधा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “माँ, पहले घर संभालना जरूरी है। पढ़ाई बाद में कर लूँगी।”

     

    एक दिन कस्बे में एक कार्यक्रम हुआ। वहाँ नृत्य करने वाली लड़कियों की जरूरत थी। राधा की पड़ोसन ने उसे बताया।

     

    “राधा, तू तो अच्छा नाचती है। वहाँ काम मिल जाएगा। कुछ पैसे भी मिलेंगे।”

     

    राधा पहले झिझकी।

     

    “लेकिन मैं ऐसे कार्यक्रमों में कभी नहीं गई।”

     

    पड़ोसन ने कहा—

     

    “नाचना ही तो है। अगर इससे घर चल सकता है तो बुरा क्या है?”

     

    राधा अपनी माँ की दवाइयों को देखकर चुप हो गई।

     

    उसने कार्यक्रम में जाने का फैसला कर लिया।

     

    उस रात उसने पहली बार मंच पर नृत्य किया।

     

    लोगों ने तालियाँ बजाईं।

     

    उसे पैसे मिले।

     

    घर लौटकर उसने पैसे माँ के हाथ में रख दिए।

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “बेटी, तूने आज मेरा बोझ हल्का कर दिया।”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मोहन की फीस समय पर जाएगी।”

     

    धीरे-धीरे राधा को अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा।

     

    लोग उसे “नचनिया” कहने लगे।

     

    शुरुआत में राधा को यह शब्द बुरा लगता था।

     

    कई लोग उसके काम को सम्मान की नजर से नहीं देखते थे।

     

    एक दिन बाजार में किसी ने उसे देखकर अपने साथी से कहा—

     

    “देखो, यही है वो नचनिया।”

     

    राधा ने सुन लिया।

     

    उसके कदम रुक गए।

     

    घर लौटकर वह देर तक चुप बैठी रही।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राधा बोली—

     

    “माँ, क्या मैं गलत काम कर रही हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बेटी। मेहनत करके घर चलाना गलत नहीं होता। गलत तो लोगों की सोच है, जो बिना किसी की मजबूरी जाने फैसला कर देती है।”

     

    राधा ने माँ की बात दिल में रख ली।

     

    लेकिन कुछ समय बाद हालात और मुश्किल हो गए।

     

    जिस कार्यक्रम में वह काम करती थी, वहाँ आयोजक ने उससे कहा—

     

    “अब तुम्हें ज्यादा कार्यक्रम करने होंगे। तभी ज्यादा पैसे मिलेंगे।”

     

    राधा ने कहा—

     

    “मैं जितना काम कर सकती हूँ, करूँगी। लेकिन अपनी मर्यादा के खिलाफ कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उसने साफ मना कर दिया।

     

    आयोजक नाराज हो गया।

     

    “फिर तुम्हें काम नहीं मिलेगा।”

     

    राधा ने शांत होकर जवाब दिया—

     

    “काम जाएगा तो दूसरा ढूँढ़ लूँगी। लेकिन अपने सम्मान से समझौता नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन उसे काम नहीं मिला।

     

    घर की हालत फिर खराब होने लगी।

     

    लेकिन राधा ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपने नृत्य को सिर्फ मजबूरी नहीं, अपनी कला बनाने का फैसला किया।

     

    उसने पुराने गुरुजी से संपर्क किया, जो कभी मंदिर में बच्चों को नृत्य सिखाते थे।

     

    “गुरुजी, क्या आप मुझे फिर से सिखाएँगे?”

     

    गुरुजी ने पूछा—

     

    “तुम्हें नृत्य सीखना है या सिर्फ पैसे कमाने हैं?”

     

    राधा ने कहा—

     

    “अब मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे मेरी मजबूरी से नहीं, मेरी कला से पहचानें।”

     

    गुरुजी मुस्कुराए।

     

    “तो कल से आ जाना।”

     

    राधा ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    सुबह घर का काम।

     

    दोपहर में छोटे कार्यक्रम।

     

    शाम को नृत्य की कक्षा।

     

    रात को माँ और भाई की देखभाल।

     

    कुछ महीनों बाद राधा की कला में बहुत सुधार आया।

     

    एक दिन शहर में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम होने वाला था। गुरुजी ने राधा का नाम वहाँ भेज दिया।

     

    राधा का चयन हो गया।

     

    कार्यक्रम वाले दिन वह मंच के पीछे खड़ी थी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “डर क्यों रही हो?”

     

    राधा बोली—

     

    “आज पहली बार लग रहा है कि मैं अपनी मजबूरी के लिए नहीं, अपने सपने के लिए मंच पर जा रही हूँ।”

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “यही फर्क तुम्हें आगे ले जाएगा।”

     

    राधा मंच पर पहुँची।

     

    संगीत शुरू हुआ।

     

    उसने नृत्य करना शुरू किया।

     

    इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

     

    उसके हर कदम में उसकी कहानी थी—पिता की याद, माँ की मेहनत, भाई की पढ़ाई, लोगों के ताने और उसके अपने सपने।

     

    पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

     

    कार्यक्रम के बाद एक बड़ी संस्था ने उसे अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “हम चाहते हैं कि आप बच्चों को नृत्य सिखाएँ।”

     

    राधा कुछ पल चुप रही।

     

    “क्या मैं भी बच्चों को सिखा सकती हूँ?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्यों नहीं?”

     

    उस दिन राधा की जिंदगी बदल गई।

     

    अब वह सिर्फ कार्यक्रमों में नाचने वाली लड़की नहीं थी।

     

    वह एक नृत्य शिक्षिका थी।

     

    उसने अपने कस्बे में गरीब बच्चों के लिए एक छोटी-सी नृत्य कक्षा शुरू की।

     

    एक दिन वही पड़ोसन, जिसने उसे पहली बार कार्यक्रम में भेजा था, उससे मिलने आई।

     

    उसने कहा—

     

    “राधा, मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “मैंने बस इतना सीखा है कि मजबूरी इंसान को रास्ता दिखा सकती है, लेकिन मंजिल उसे खुद चुननी पड़ती है।”

     

    कुछ समय बाद राधा ने अपने भाई मोहन की पढ़ाई पूरी करवाई।

     

    माँ की दवाइयाँ भी नियमित चलने लगीं।

     

    एक शाम माँ ने राधा को घुंघरू बाँधते हुए देखा।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “याद है, बचपन में मैं कहती थी तेरे पैरों में घुंघरू बंधे हैं?”

     

    राधा हँस पड़ी।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तब मुझे नहीं पता था कि यही घुंघरू एक दिन हमारे घर की उम्मीद बनेंगे।”

     

    राधा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने माँ को गले लगा लिया।

     

    अब जब कोई उसे “नचनिया” कहता, तो वह बुरा नहीं मानती थी।

     

    वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “हाँ, मैं नृत्य करती हूँ। क्योंकि नृत्य मेरी कला है, मेरी मेहनत है और मेरे सपनों का रास्ता है।”

     

    राधा ने अपनी मजबूरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

     

    उसने उसे अपनी ताकत बना लिया।

     

    और उसकी कहानी ने पूरे कस्बे को एक बात सिखा दी—

     

    किसी इंसान के काम को देखकर उसके चरित्र या उसकी मजबूरी का फैसला नहीं करना चाहिए। हर मेहनत के पीछे एक कहानी होती है, और हर इंसान सम्मान का हकदार होता है।

     

     

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • ज़िंदगी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 2

     

    आरव घर पहुँचा तो उसकी माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं।

     

    उसे देखते ही माँ ने पूछा—

     

    “बेटा, खाना खाएगा?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कुछ नहीं पूछा।

     

    वह समझ गई थीं कि आज उनका बेटा पहले से थोड़ा बेहतर है।

     

    रात को खाना खाने के बाद आरव अपनी माँ के पास बैठ गया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “माँ, क्या आपको कभी लगा कि मैं नाकाम हो गया हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कभी नहीं।”

     

    “लेकिन मैं तो बार-बार हार रहा हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हारने वाला इंसान वह नहीं होता जो कोशिश करके असफल हो जाए। हारने वाला वह होता है जो अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ दे।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे बहुत डर लगता है माँ।”

     

    “किस बात से?”

     

    “इस बात से कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “भविष्य की चिंता में आज की जिंदगी मत खो देना।”

     

    ये बात आरव के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन वह फिर उसी पार्क में गया।

     

    वही बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वापस आ गया।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “मुझे उम्मीद थी।”

     

    आरव उनके पास बैठ गया।

     

    “मैंने फैसला किया है कि मैं फिर कोशिश करूँगा। लेकिन इस बार सिर्फ एक परीक्षा के भरोसे नहीं बैठूँगा। मैं कोई काम भी सीखूँगा।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अब तुम सही रास्ते पर हो।”

     

    आरव ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की।

     

    सुबह पढ़ाई करता, दोपहर में एक दुकान पर काम सीखता और शाम को अपने दोस्त रोहित से मिलता।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।

     

    समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।

     

    पैसे अभी भी कम थे।

     

    परीक्षा का डर अभी भी था।

     

    लेकिन अब आरव हर समस्या को अपनी पूरी जिंदगी नहीं समझता था।

     

    एक दिन रोहित ने पूछा—

     

    “तुझे याद है कुछ महीने पहले तू कितना परेशान था?”

     

    आरव हँसते हुए बोला—

     

    “हाँ। लगता था मेरी जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “और अब?”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “अब लगता है कि जिंदगी में बहुत कुछ बाकी है।”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने अपनी मेहनत से एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया। उसे शुरुआत में बहुत कम पैसे मिले।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    उसने नई चीजें सीखीं, गलतियाँ कीं और फिर उन्हें सुधारा।

     

    एक साल बाद उसकी आमदनी इतनी हो गई कि वह घर के खर्च में माँ की मदद करने लगा।

     

    पिता भी धीरे-धीरे अपना काम शुरू करने लगे।

     

    आरव की छोटी बहन की पढ़ाई जारी रही।

     

    एक शाम आरव उसी पार्क में बैठा था।

     

    वही बुजुर्ग उसके पास आए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “अब भी लगता है कि जिंदगी बेकार है?”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “नहीं। अब तो लगता है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “यही समझ सबसे जरूरी है।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “अगर उस दिन मैं आपसे नहीं मिला होता तो शायद मैं अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता।”

     

    बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—

     

    “इसलिए हमेशा याद रखना, जब मन बहुत भारी हो जाए तो अकेले मत रहना। अपने परिवार, दोस्त, शिक्षक या किसी भरोसेमंद बड़े इंसान से बात करना। मदद माँगना कमजोरी नहीं है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि मुश्किल समय में सबसे जरूरी चीज समाधान नहीं, बल्कि साथ और बातचीत भी होती है।

     

    कुछ दिनों बाद आरव ने अपने मोहल्ले के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की कक्षा शुरू की।

     

    वह उन्हें पढ़ाने लगा।

     

    एक दिन एक बच्चा उससे बोला—

     

    “भैया, मैं गणित में बहुत कमजोर हूँ। मुझसे नहीं होगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “ऐसा मत बोलो। अभी नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि कभी नहीं आएगा।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “अगर मैं फेल हो गया तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो फिर से कोशिश करेंगे। एक नतीजा तुम्हारी पूरी जिंदगी तय नहीं करता।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    आरव ने उसे देखकर सोचा—

     

    “काश मैंने ये बात खुद को भी उस समय समझाई होती।”

     

    समय बीतता गया।

     

    आरव ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी।

     

    उसके पहले पन्ने पर आज भी वही लाइन लिखी थी—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    उसने उसके नीचे एक नई लाइन जोड़ दी—

     

    “और रास्ता कितना भी मुश्किल हो, मैं अपनी जिंदगी को बेकार नहीं जाने दूँगा।”

     

    उस दिन आरव ने अपनी कहानी बच्चों को सुनाई।

     

    उसने कहा—

     

    “जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल। कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारे खिलाफ हो जाती हैं। लेकिन इन सबका मतलब ये नहीं कि हमारी जिंदगी की कीमत कम हो गई।”

     

    बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत ज्यादा परेशान हो, तो अकेले मत रहना। किसी भरोसेमंद इंसान से बात करना। अपने मन की बात कहना। मदद माँगना। एक मुश्किल दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत बनने देना।”

     

    पार्क की वही बेंच दूर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे याद आया कि कभी वह उसी बेंच पर बैठकर सोचता था कि उसकी जिंदगी में कुछ नहीं बचा।

     

    आज उसे पता था—

     

    बहुत कुछ बचा था।

     

    सपने बाकी थे।

     

    परिवार बाकी था।

     

    दोस्त बाकी थे।

     

    नई शुरुआत बाकी थी।

     

    और सबसे जरूरी—

     

    जिंदगी बाकी थी।

     

    इसलिए जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, खुद को अकेला मत समझो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करो, मदद लो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो।

     

    क्योंकि जिंदगी में बुरे दिन आ सकते हैं, लेकिन वे हमेशा नहीं रहते।

     

    जिंदगी सच में अनमोल है। इसे किसी एक हार, एक गलती या एक बुरे दौर के नाम मत कर दो।

     

    कहानी समाप्त।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं