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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • तीखी मिर्ची का अनोखा राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    तीखी मिर्ची का अनोखा राज

     

    एक छोटे से गांव का नाम था हरियापुर। गांव के चारों तरफ खेत थे और उन्हीं खेतों के बीच एक बूढ़े किसान जॉर्ज का छोटा-सा खेत था। जॉर्ज के खेत में तरह-तरह की सब्जियां उगती थीं, लेकिन उसकी सबसे खास फसल थी—हरी मिर्च।

     

    जॉर्ज की मिर्चें पूरे इलाके में मशहूर थीं।

     

    लोग कहते थे कि उसकी एक मिर्च खा लो तो पानी पीते-पीते पूरा घड़ा खाली कर दो, फिर भी जीभ की जलन कम नहीं होती।

     

    लेकिन जॉर्ज को अपनी मिर्चों पर बहुत गर्व था।

     

    वह हमेशा कहता—

     

    “मेरे खेत की मिर्च सिर्फ तीखी नहीं है, इसमें मेहनत का स्वाद है।”

     

    उसका पोता लुकास शहर से छुट्टियों में गांव आया हुआ था।

     

    एक सुबह वह खेत में दादा के साथ घूम रहा था।

     

    लुकास ने एक बड़ी-सी चमकदार हरी मिर्च देखकर पूछा—

     

    “दादा, ये इतनी बड़ी और चमकदार क्यों है?”

     

    जॉर्ज ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसे मत छूना।”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “क्यों? मिर्च है, कोई सांप थोड़ी है।”

     

    जॉर्ज ने गंभीर होकर कहा—

     

    “वह साधारण मिर्च नहीं है।”

     

    लुकास की उत्सुकता बढ़ गई।

     

    “फिर कैसी है?”

     

    जॉर्ज ने आसपास देखा और धीरे से कहा—

     

    “यह मेरे खेत की सबसे तीखी मिर्च है। इसे मैंने बीस साल पहले एक बूढ़े साधु से मिले बीज से उगाया था।”

     

    “तो?”

     

    “जिसने भी इसे खाया, उसे अपने अंदर छिपा सच बोलना पड़ा।”

     

    लुकास हंसने लगा।

     

    “दादा, आप भी ना! मिर्च खाने से कोई सच कैसे बोल सकता है?”

     

    जॉर्ज ने कुछ नहीं कहा।

     

    लुकास को लगा दादा उसे डराने की कोशिश कर रहे हैं।

     

    दोपहर को जब जॉर्ज खाना खाने घर गया, लुकास चुपके से खेत में वापस आया।

     

    उसने वही मिर्च तोड़ी।

     

    “आज पता चल ही जाएगा कि दादा सच बोल रहे थे या नहीं।”

     

    उसने मिर्च का छोटा-सा टुकड़ा मुंह में डाल लिया।

     

    पहले कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “आह! ये क्या है!”

     

    उसका मुंह जलने लगा।

     

    वह पानी की तरफ भागा।

     

    एक गिलास पानी पिया।

     

    फिर दूसरा।

     

    लेकिन जलन कम नहीं हुई।

     

    तभी उसके मुंह से अचानक निकल गया—

     

    “मैंने दादा की अलमारी से पैसे चुराए थे!”

     

    लुकास खुद चौंक गया।

     

    “मैंने ये क्या बोल दिया?”

     

    उसे पिछले साल की बात याद आ गई।

     

    उसने सच में दादा की अलमारी से कुछ पैसे लिए थे और कभी किसी को नहीं बताया था।

     

    जलन धीरे-धीरे कम हुई।

     

    लुकास डर गया।

     

    “दादा सच बोल रहे थे!”

     

    वह तुरंत घर पहुंचा और जॉर्ज के सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “दादा…”

     

    जॉर्ज ने उसे देखते ही समझ लिया।

     

    “तुमने मिर्च खा ली?”

     

    लुकास ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    लुकास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझसे गलती हुई थी। मैंने पिछले साल आपके पैसे लिए थे।”

     

    जॉर्ज कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “मुझे पता था।”

     

    लुकास ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको पता था?”

     

    “हां। लेकिन मैं चाहता था कि तुम खुद एक दिन सच बताओ।”

     

    लुकास ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे गले लगा लिया।

     

    “गलती से बड़ा इंसान होता है वह, जो अपनी गलती मान ले।”

     

    लेकिन इस अजीब मिर्च का राज जल्द ही पूरे गांव में फैल गया।

     

    गांव का दुकानदार मार्टिन सबसे पहले जॉर्ज के पास आया।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे एक मिर्च चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    मार्टिन ने हंसकर कहा—

     

    “बस मजे के लिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे मिर्च दे दी।

     

    मार्टिन ने जैसे ही थोड़ा सा टुकड़ा खाया, उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “मैंने पिछले महीने तुम्हारी दुकान से उधार लिए पैसे वापस नहीं किए क्योंकि मैंने वो पैसे खुद रख लिए थे!”

     

    जॉर्ज ने माथा पकड़ लिया।

     

    गांव वाले हैरान रह गए।

     

    अब हर कोई उस मिर्च को लेकर उत्सुक हो गया।

     

    किसी ने सोचा कि इससे झूठ पकड़ना आसान होगा।

     

    किसी ने सोचा कि गांव के सारे राज सामने आ जाएंगे।

     

    लेकिन जॉर्ज ने मिर्च देना बंद कर दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच जानने के लिए किसी को जलाना जरूरी नहीं।”

     

    लेकिन गांव का सबसे चालाक आदमी हेनरी इस मिर्च का फायदा उठाना चाहता था।

     

    वह जॉर्ज के पास आया।

     

    “तुम्हें इस मिर्च से बहुत पैसा कमाना चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “मैं इसे बेचने के लिए नहीं उगाता।”

     

    हेनरी ने लालच दिया—

     

    “मैं तुम्हें बहुत पैसे दूंगा।”

     

    जॉर्ज ने मना कर दिया।

     

    उस रात हेनरी चोरी-छिपे खेत में घुस गया।

     

    उसने पूरी मिर्च की बेल उखाड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मिर्च तोड़ी, उसे तेज जलन महसूस हुई।

     

    वह चीख पड़ा—

     

    “मैंने गांव के लोगों से झूठ बोलकर उनकी जमीन के कागज हथियाने की कोशिश की है!”

     

    सुबह तक गांव वालों को सब पता चल गया।

     

    हेनरी की सारी चाल सामने आ गई।

     

    लोग जॉर्ज के पास आए।

     

    “आपने ये मिर्च बचाकर बहुत अच्छा किया।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “नहीं। असली बात मिर्च में नहीं है।”

     

    सबने पूछा—

     

    “तो फिर?”

     

    जॉर्ज ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मिर्च सिर्फ वही सच बाहर निकालती है, जिसे इंसान खुद अपने अंदर दबाकर बैठा होता है। सच पहले से उसके अंदर होता है।”

     

    लुकास ने दादा की बात ध्यान से सुनी।

     

    उस दिन से वह दादा के खेत में काम करने लगा।

     

    कुछ महीनों बाद एक दिन जॉर्ज ने उसे एक छोटा-सा बीज दिया।

     

    “इसे संभालकर रखना।”

     

    लुकास ने पूछा—

     

    “क्या यह उसी तीखी मिर्च का बीज है?”

     

    जॉर्ज मुस्कुराए।

     

    “हां।”

     

    “क्या मैं इसे उगा सकता हूं?”

     

    “उगा सकते हो। लेकिन याद रखना, इसकी ताकत का इस्तेमाल किसी को शर्मिंदा करने के लिए मत करना।”

     

    लुकास ने बीज संभालकर रख लिया।

     

    साल बीत गए।

     

    जॉर्ज बूढ़ा होता गया और एक दिन उसने खेती की जिम्मेदारी लुकास को सौंप दी।

     

    लुकास ने उस मिर्च की खेती जारी रखी, लेकिन उसने उसे कभी बाजार में नहीं बेचा।

     

    वह गांव के बच्चों को एक ही बात सिखाता—

     

    “सच बोलने के लिए किसी जादुई मिर्च की जरूरत नहीं होती।”

     

    एक दिन गांव में एक छोटा बच्चा उसके पास आया।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर कोई झूठ बोलता है तो क्या उसे वो मिर्च खिला देंगे?”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सच किसी के मुंह से जबरदस्ती नहीं निकलवाना चाहिए।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “फिर मिर्च किस काम की है?”

     

    लुकास ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “ये हमें सिर्फ एक बात याद दिलाती है।”

     

    “क्या?”

     

    लुकास मुस्कुराया।

     

    “झूठ कितना भी छिपा लो, सबसे ज्यादा मुश्किल उसे अपने ही दिल से छिपाना होता है।”

     

    उस दिन से गांव में उस मिर्च को लोग “सच वाली मिर्च” कहने लगे।

     

    लेकिन लुकास के लिए वह सिर्फ एक मिर्च थी।

     

    उसे पता था कि असली तीखापन उस मिर्च में नहीं था।

     

    असली तीखापन उस सच में था, जिसे इंसान अपने फायदे के लिए छिपाता रहता है।

     

    और यही उस छोटी-सी हरी मिर्च ने पूरे गांव को सिखाया था—

    सच कभी-कभी तीखा जरूर होता है, लेकिन झूठ से कहीं बेहतर होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • सुनसान रास्ते पर सोम्या

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुनसान रास्ते पर सोम्या

     

    शाम ढल चुकी थी। आसमान पर बादल थे और सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ खड़े थे। दूर तक कोई घर दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सोम्या अकेली उस सुनसान रास्ते पर चली जा रही थी।

     

    उसकी उम्र करीब बीस साल थी। वह शहर से अपने गांव जा रही थी, लेकिन बस उसे मुख्य सड़क से कुछ दूर छोड़कर चली गई थी। गांव तक पहुंचने के लिए उसे करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना था।

     

    सोम्या ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “बस थोड़ा रास्ता और है,” उसने खुद से कहा।

     

    उसने बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    उसने कदम धीमे कर दिए।

     

    पीछे से भी कदमों की आवाज धीमी हो गई।

     

    सोम्या ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    सिर्फ हवा से पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं।

     

    उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ गई।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    जैसे कोई उसके पीछे धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    सोम्या ने इस बार बिना पीछे देखे तेज कदम बढ़ा दिए।

     

    आवाज भी तेज हो गई।

     

    अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सड़क के किनारे उसे एक पुराना पत्थर दिखाई दिया। उस पर गांव का नाम लिखा था।

     

    “बस दो किलोमीटर…”

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी सामने उसे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    सोम्या कुछ पल के लिए रुक गई।

     

    बूढ़े ने पूछा—

     

    “बेटी, कहां जा रही हो?”

     

    “गांव जा रही हूं।”

     

    “इस रास्ते से?”

     

    “जी।”

     

    बूढ़े ने चिंता से कहा—

     

    “अंधेरा होने से पहले पहुंच जाओ।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “क्या इस रास्ते पर कोई परेशानी है?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “परेशानी रास्ते में नहीं है।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ा कुछ बोलता, उससे पहले दूर से किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई दी।

     

    बूढ़ा तुरंत सड़क से हट गया।

     

    गाड़ी पास आई और बिना रुके आगे निकल गई।

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    जब उसने पीछे मुड़कर बूढ़े को देखना चाहा तो वहां कोई नहीं था।

     

    वह चौंक गई।

     

    “अभी तो यहीं थे…”

     

    उसने आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    अब सोम्या के मन में डर बैठ चुका था।

     

    वह तेजी से आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाकर उसे एक छोटा-सा पुराना मंदिर दिखाई दिया।

     

    मंदिर के बाहर एक लालटेन जल रही थी।

     

    सोम्या अंदर चली गई।

     

    वहां एक बुजुर्ग महिला बैठी थी।

     

    महिला ने उसे देखते ही कहा—

     

    “तुम देर से निकली हो।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “इस रास्ते से गुजरने वाले हर इंसान के चेहरे पर डर देखकर पता चल जाता है।”

     

    सोम्या बैठ गई।

     

    “मुझे लग रहा है कोई मेरा पीछा कर रहा है।”

     

    महिला ने तुरंत बाहर देखा।

     

    “किसी को देखा?”

     

    “नहीं। बस कदमों की आवाज आती है।”

     

    महिला कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “यह रास्ता पुराना है। पहले यहां से गांव के लोग पैदल आया-जाया करते थे।”

     

    “फिर अब इतना सुनसान क्यों है?”

     

    “क्योंकि लोगों ने नया रास्ता बना लिया।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “और पुराना रास्ता?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “पुराने रास्ते पर चलने वाले अक्सर अपने डर के साथ चलते हैं।”

     

    सोम्या को बात समझ नहीं आई।

     

    महिला ने उसे पानी दिया।

     

    “कुछ देर यहीं बैठ जाओ। अंधेरा थोड़ा कम होने दो।”

     

    सोम्या ने मोबाइल देखा।

     

    अचानक उसमें नेटवर्क आ गया।

     

    उसने तुरंत अपनी मां को फोन किया।

     

    “मां, मैं रास्ते में हूं।”

     

    उधर से मां की घबराई आवाज आई—

     

    “तुम अभी तक नहीं पहुंची?”

     

    “नहीं, बस थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगी।”

     

    मां ने कहा—

     

    “सोम्या, तुम पुराने रास्ते से तो नहीं आ रही?”

     

    सोम्या चौंक गई।

     

    “हां। क्यों?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें पता नहीं इस रास्ते के बारे में?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे नाना इसी रास्ते से गांव लौटते समय कई साल पहले गायब हो गए थे।”

     

    सोम्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    “हमें बाद में उनका सामान मिला था। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।”

     

    सोम्या ने फोन काट दिया।

     

    उसने मंदिर में बैठी महिला की तरफ देखा।

     

    “आपको मेरे नाना के बारे में पता है?”

     

    महिला ने शांत स्वर में पूछा—

     

    “तुम्हारे नाना का नाम क्या था?”

     

    सोम्या ने नाम बताया।

     

    महिला की आंखें भर आईं।

     

    “वह मेरे भाई थे।”

     

    सोम्या जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “क्या?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “उस रात भी बहुत अंधेरा था। तुम्हारे नाना इस रास्ते से लौट रहे थे। उन्हें किसी ने रास्ते में रोक लिया था।”

     

    “कौन?”

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    सोम्या की आंखों में डर था।

     

    “फिर उनकी मौत…?”

     

    महिला ने सिर हिलाया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा कि वह मर गए थे।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “तो क्या वह जिंदा थे?”

     

    महिला ने मंदिर के पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    “उनका सामान वहां मिला था। लेकिन अगले दिन से वह गायब हो गए।”

     

    अचानक मंदिर के बाहर फिर वही आवाज सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    सोम्या का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    महिला ने कहा—

     

    “डरो मत।”

     

    आवाज मंदिर के पास आ रही थी।

     

    फिर दरवाजे के सामने वही बूढ़ा आदमी दिखाई दिया जिसे सोम्या ने सड़क पर देखा था।

     

    सोम्या डर गई।

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “सोम्या?”

     

    सोम्या पीछे हट गई।

     

    “आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने अपना चेहरा उठाया।

     

    सोम्या की आंखें फैल गईं।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी अंगूठी थी, जो उसकी मां ने उसे अपने नाना की निशानी के रूप में दिखाई थी।

     

    बूढ़ा बोला—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    सोम्या की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नाना…?”

     

    बूढ़े ने सिर हिला दिया।

     

    वह उसका नाना ही था।

     

    वह कई साल पहले इस रास्ते पर हुई एक घटना के बाद गांव से दूर चला गया था। उसने अपनी पहचान छिपाकर जिंदगी बिताई थी, क्योंकि उस समय कुछ गलत लोगों से उसकी दुश्मनी हो गई थी और उसे डर था कि उसकी वजह से परिवार खतरे में पड़ सकता है।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हें अपने पास बुला नहीं सकता था। लेकिन आज जब मैंने तुम्हें इस रास्ते पर अकेले देखा, तो मैं तुम्हें यहां से सुरक्षित ले जाना चाहता था।”

     

    सोम्या रोते हुए उनके पास गई।

     

    “आप इतने साल कहां थे?”

     

    “बहुत दूर।”

     

    “हमने आपको मरा हुआ समझ लिया था।”

     

    बूढ़े की आंखें भी नम हो गईं।

     

    “मुझे पता था।”

     

    तभी मंदिर में बैठी महिला भी उठ खड़ी हुई।

     

    वह दोनों को देखकर मुस्कुराई।

     

    “अब मेरा काम पूरा हुआ।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “जिसने इतने साल तुम्हारे नाना का इंतजार किया।”

     

    वह सोम्या के नाना की बहन थी।

     

    अगली सुबह सोम्या अपने नाना के साथ गांव पहुंची।

     

    मां ने दरवाजा खोला।

     

    सामने अपने पिता को देखकर वह कुछ पल तक बोल ही नहीं पाईं।

     

    फिर वह दौड़कर उनसे लिपट गईं।

     

    घर में सालों से जमा इंतजार उस दिन आंसुओं में बह निकला।

     

    सोम्या चुपचाप यह सब देखती रही।

     

    उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी सुनसान रास्ते सिर्फ डर की तरफ नहीं ले जाते।

     

    कुछ रास्ते हमें उन लोगों तक भी पहुंचा देते हैं, जिन्हें हम जिंदगी भर खोया हुआ समझते रहे।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस पुराने रास्ते को फिर से ठीक करवाया।

     

    लेकिन सोम्या जब भी वहां से गुजरती, कुछ पल रुकती जरूर थी।

     

    वह उस पुराने मंदिर की तरफ देखती और मुस्कुरा देती।

     

    क्योंकि उसके लिए वह सुनसान रास्ता अब डर की जगह नहीं था।

     

    वह रास्ता उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खोई हुई खुशी तक पहुंचने का रास्ता बन चुका था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दिखावे की दुनियां में शौर्य

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    दिखावे की दुनिया में शौर्य

     

    शौर्य एक छोटे से शहर में रहने वाला 21 साल का लड़का था। उसके पिता एक छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। परिवार की हालत ठीक थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि शौर्य अपनी हर इच्छा आसानी से पूरी कर सके।

     

    लेकिन शौर्य को एक चीज बहुत पसंद थी—दिखावा।

     

    उसे हमेशा लगता था कि लोग उसे देखकर यही सोचें कि वह बहुत पैसे वाला है।

     

    महंगे ब्रांड जैसे कपड़े पहनना, दोस्तों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करना, महंगे कैफे में बैठकर तस्वीरें खींचना और सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी को किसी बड़े अमीर लड़के जैसा दिखाना—ये सब उसकी आदत बन चुकी थी।

     

    असलियत यह थी कि उसके पास जेब में कई बार सौ-दो सौ रुपये भी नहीं होते थे।

     

    एक दिन उसका दोस्त कबीर उसके घर आया।

     

    उसने शौर्य को आईने के सामने खड़े देखा।

     

    शौर्य एक महंगी दिखने वाली जैकेट पहन रहा था।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “नई जैकेट?”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां, पंद्रह हजार की है।”

     

    कबीर ने जैकेट को गौर से देखा।

     

    “पंद्रह हजार?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    उसे पता था कि यह जैकेट शौर्य ने किस्तों पर खरीदी थी।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “घर में पापा की दुकान ठीक चल रही है?”

     

    शौर्य का चेहरा थोड़ा उतर गया।

     

    “बस ठीक ही है।”

     

    “तो फिर इतनी महंगी चीजें क्यों खरीदते हो?”

     

    शौर्य ने आईने में खुद को देखते हुए कहा—

     

    “लोगों को पता चलना चाहिए कि मैं कौन हूं।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन लोग वही देखते हैं जो तुम दिखाते हो।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “बस मुझे यही चाहिए।”

     

    एक दिन कॉलेज में उसके दोस्तों ने शहर के सबसे महंगे होटल में पार्टी रखने की योजना बनाई।

     

    सबने पैसे मिलाने की बात की।

     

    जब शौर्य की बारी आई तो उसने कहा—

     

    “पूरी पार्टी का खर्च मैं कर दूंगा।”

     

    दोस्तों ने तालियां बजाईं।

     

    “वाह शौर्य!”

     

    शौर्य का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

     

    लेकिन उसी रात वह घर पहुंचा तो उसके पास पैसे नहीं थे।

     

    उसने मां से कहा—

     

    “मां, मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    मां ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “दस हजार।”

     

    मां घबरा गई।

     

    “इतने पैसे किसलिए?”

     

    शौर्य ने झूठ बोला—

     

    “कॉलेज का जरूरी काम है।”

     

    मां ने अपनी बचत में से पैसे निकाल दिए।

     

    अगले दिन शौर्य ने पार्टी कर दी।

     

    दोस्तों ने उसकी खूब तारीफ की।

     

    “शौर्य, तू तो बड़ा आदमी निकला!”

     

    वह मुस्कुराता रहा।

     

    लेकिन उसे यह नहीं दिखा कि उन्हीं पैसों से उसकी मां घर का राशन खरीदने वाली थी।

     

    कुछ दिनों बाद घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया।

     

    पिता ने पूछा—

     

    “इस महीने पैसे कम पड़ रहे हैं। कुछ ज्यादा खर्च हुआ क्या?”

     

    मां चुप रही।

     

    शौर्य ने सब सुन लिया।

     

    उस रात उसे थोड़ी शर्म महसूस हुई, लेकिन अगले दिन फिर वही पुरानी आदत लौट आई।

     

    कुछ समय बाद कॉलेज में एक नई लड़की आई—आन्या।

     

    वह शांत स्वभाव की थी और पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    शौर्य को वह पसंद आ गई।

     

    उसने आन्या के सामने भी अपनी अमीरी का दिखावा शुरू कर दिया।

     

    “मेरे पास अपनी कार है।”

     

    असल में वह उसके चाचा की कार थी।

     

    “मैं हर महीने विदेश घूमने जाता हूं।”

     

    असल में वह बचपन में एक बार अपने परिवार के साथ पड़ोसी देश गया था।

     

    “हमारे पास शहर में बड़ा घर है।”

     

    असल में वह घर किराए का था।

     

    आन्या उसकी बातें सुनती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “तुम बहुत खुश रहते हो।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “मेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं है।”

     

    आन्या मुस्कुराई।

     

    “अच्छा है।”

     

    शौर्य को लगा कि वह प्रभावित हो गई है।

     

    उसने उसे महंगे रेस्तरां में ले जाना शुरू किया।

     

    हर बार बिल देखकर उसके हाथ कांपते, लेकिन वह चेहरे पर मुस्कान रखता।

     

    एक दिन आन्या ने पूछा—

     

    “तुम इतना खर्च क्यों करते हो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें अच्छी जिंदगी देना चाहता हूं।”

     

    आन्या ने कुछ नहीं कहा।

     

    कुछ दिनों बाद शौर्य के पिता की दुकान में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    घर में पैसे की जरूरत थी।

     

    पिता ने शौर्य से कहा—

     

    “बेटा, इस महीने घर में हाथ थोड़ा तंग है। अगर तुम्हारे पास पैसे हों तो मदद कर देना।”

     

    शौर्य के पास पैसे नहीं थे।

     

    लेकिन उसने पिता से कहा—

     

    “मैं देखता हूं।”

     

    उसी शाम उसके दोस्तों ने एक और पार्टी की योजना बनाई।

     

    सबने शौर्य की तरफ देखा।

     

    “इस बार भी तू ही करवा दे।”

     

    शौर्य के पास कोई रास्ता नहीं था।

     

    उसने अपने मोबाइल से एक महंगा फोन बेच दिया।

     

    पार्टी हुई।

     

    दोस्तों ने फिर कहा—

     

    “शौर्य जैसा दोस्त किस्मत वालों को मिलता है।”

     

    लेकिन उस रात घर लौटते समय उसे पहली बार अपने ही ऊपर गुस्सा आया।

     

    उसने सोचा—

     

    “मैं किसे खुश करने के लिए यह सब कर रहा हूं?”

     

    अगले दिन उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया।

     

    उसके पिता दुकान पर काम करते समय अचानक बेहोश हो गए।

     

    शौर्य उन्हें अस्पताल लेकर गया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “कुछ दिनों तक इन्हें आराम की जरूरत है।”

     

    अस्पताल का खर्च देखकर शौर्य के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने दोस्तों को फोन किया।

     

    “मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “भाई, अभी मेरे पास नहीं हैं।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “मैं अगले महीने दे दूंगा।”

     

    तीसरे ने फोन ही नहीं उठाया।

     

    शौर्य घंटों अस्पताल की कुर्सी पर बैठा रहा।

     

    तभी आन्या वहां आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    शौर्य ने पहली बार उससे कोई झूठ नहीं बोला।

     

    “मैं अमीर नहीं हूं।”

     

    आन्या शांत रही।

     

    “मुझे पता है।”

     

    शौर्य चौंका।

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “हां। तुम्हारी बातें बहुत बड़ी थीं, लेकिन तुम्हारी आंखों में हमेशा पैसे की चिंता दिखती थी।”

     

    शौर्य की आंखें भर आईं।

     

    “फिर तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पैसे नहीं, तुम्हारी सच्चाई देखनी थी।”

     

    शौर्य ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने पूरी जिंदगी लोगों को दिखाने में लगा दी कि मैं अमीर हूं। लेकिन जब सच में जरूरत पड़ी तो मेरे पास कुछ भी नहीं था।”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास परिवार है। तुम्हारे पास मेहनत करने की क्षमता है। ये किसी भी दिखावे से बड़ी चीजें हैं।”

     

    उस दिन शौर्य ने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया।

     

    उसने सोशल मीडिया से अपनी झूठी अमीरी वाली तस्वीरें हटा दीं।

     

    महंगे कपड़े खरीदना बंद किया।

     

    पार्टी में पैसे उड़ाना बंद किया।

     

    और सबसे जरूरी—उसने अपने पिता से सच बोल दिया।

     

    “पापा, मैंने बहुत पैसे बर्बाद किए हैं। मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    पिता ने कुछ देर उसे देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “गलती करने वाला बेटा बुरा नहीं होता। लेकिन गलती समझ आने के बाद भी उसे दोहराना गलत होता है।”

     

    शौर्य ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

     

    उसने दुकान संभालनी शुरू की।

     

    सुबह कॉलेज और शाम दुकान।

     

    धीरे-धीरे उसने परिवार का कर्ज चुकाना शुरू किया।

     

    कई महीने बाद कबीर उससे मिला।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ? आजकल तू महंगे कपड़े नहीं पहनता?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “अब मुझे अच्छा दिखने से ज्यादा अच्छा इंसान बनना जरूरी लगता है।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आखिर समझ गया।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “पहले मैं लोगों को अपनी जिंदगी दिखाता था। अब मैं अपनी जिंदगी जीता हूं।”

     

    उधर आन्या अब भी उसके साथ थी।

     

    एक दिन उसने शौर्य से कहा—

     

    “तुम अब पहले से ज्यादा खुश लगते हो।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि अब मुझे किसी को साबित नहीं करना कि मैं अमीर हूं।”

     

    उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले।

     

    “देखो, आज मेरे पास सिर्फ पांच सौ रुपये हैं।”

     

    आन्या हंसने लगी।

     

    “तो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “लेकिन ये पैसे मेरे हैं। मैंने खुद कमाए हैं। अब इनसे मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना।”

     

    आन्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब तुम सच में बड़े आदमी लगते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    बड़ा दिखने और बड़ा होने में बहुत फर्क होता है।

     

    दिखावे से कुछ समय के लिए लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन असली सम्मान मेहनत, सच्चाई और अपने परिवार के लिए खड़े होने से मिलता है।

     

    और शौर्य ने तय कर लिया था कि अब उसकी जिंदगी तस्वीरों में अमीर नहीं, बल्कि असल में मजबूत होगी।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पेसो की भूखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    पैसों की भूखी लड़की

     

    शहर में कियारा नाम की एक लड़की रहती थी। देखने में वह बहुत शांत और समझदार लगती थी, लेकिन उसके दिल में एक ही चाहत थी—बहुत सारा पैसा।

     

    कियारा का मानना था कि दुनिया में इज्जत, प्यार और रिश्ते सब पैसों से खरीदे जा सकते हैं।

     

    वह अक्सर अपनी सहेलियों से कहती—

     

    “जिसके पास पैसा है, उसी की दुनिया में कीमत है।”

     

    उसका परिवार बहुत अमीर नहीं था। पिता छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से कियारा को अच्छी परवरिश दी थी, लेकिन कियारा को हमेशा लगता था कि उसे इससे कहीं ज्यादा मिलना चाहिए।

     

    कॉलेज खत्म करने के बाद उसने नौकरी करने की कोशिश की, लेकिन कुछ महीनों में ही उसे नौकरी छोटी लगने लगी।

     

    तभी उसने एक अलग रास्ता चुन लिया।

     

    वह अमीर लड़कों से दोस्ती करने लगी।

     

    पहली बार उसकी मुलाकात एडवर्ड से हुई। एडवर्ड एक बड़े कारोबारी का बेटा था। महंगी कार, अच्छे कपड़े और हर समय दोस्तों से घिरा रहता था।

     

    कियारा ने उससे दोस्ती की।

     

    कुछ ही दिनों में एडवर्ड को कियारा पसंद आने लगी।

     

    एक शाम कियारा ने उदास चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मेरी मां की तबीयत बहुत खराब है।”

     

    एडवर्ड तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “डॉक्टर ने कुछ महंगी दवाइयां लिखी हैं। लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड ने बिना ज्यादा सवाल किए पैसे दे दिए।

     

    कियारा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कुछ दिनों बाद उसने फिर पैसे मांगे।

     

    फिर एक नया बहाना।

     

    फिर एक नई जरूरत।

     

    धीरे-धीरे एडवर्ड ने कियारा पर हजारों रुपये खर्च कर दिए।

     

    एक दिन जब एडवर्ड ने उससे शादी की बात की तो कियारा ने अचानक कहा—

     

    “मुझे लगता है हम दोनों एक-दूसरे के लिए सही नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड हैरान रह गया।

     

    “लेकिन तुम तो कहती थी कि तुम मुझे पसंद करती हो।”

     

    कियारा ने ठंडी आवाज में कहा—

     

    “पसंद करना और शादी करना अलग बातें हैं।”

     

    और अगले ही दिन वह शहर छोड़कर चली गई।

     

    एडवर्ड को बाद में समझ आया कि कियारा को उससे प्यार नहीं था।

     

    उसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब था।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    कियारा नए शहर में पहुंची।

     

    वहां उसकी मुलाकात लियाम से हुई।

     

    लियाम एक साधारण परिवार से था। वह नौकरी करता था और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने माता-पिता को भेजता था।

     

    कियारा ने जब यह जाना कि लियाम अमीर नहीं है तो पहले उसने उससे दूरी बनाई।

     

    लेकिन लियाम का स्वभाव अच्छा था।

     

    वह हमेशा दूसरों की मदद करता।

     

    धीरे-धीरे कियारा ने सोचा—

     

    “अगर इसे मेरे लिए थोड़ा खर्च करने की आदत पड़ जाए तो?”

     

    उसने लियाम से दोस्ती शुरू कर दी।

     

    लियाम जल्दी ही उसे पसंद करने लगा।

     

    वह अपनी छोटी-सी सैलरी में भी कियारा को खुश करने की कोशिश करता।

     

    कभी उसके लिए फूल लाता।

     

    कभी छोटा-सा उपहार।

     

    कियारा को यह सब पसंद तो नहीं था, लेकिन वह उसे उम्मीद देती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “मेरे पास एक जरूरी काम है, लेकिन मुझे पैसे चाहिए।”

     

    लियाम ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “जितने तुम दे सको।”

     

    लियाम ने अपनी कई महीनों की बचत में से कुछ पैसे उसे दे दिए।

     

    उसके पास ज्यादा नहीं था, फिर भी उसने अपनी जरूरतें रोक दीं।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा ने फिर पैसे मांगे।

     

    इस बार लियाम ने कहा—

     

    “कियारा, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    कियारा नाराज हो गई।

     

    “तो फिर तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?”

     

    लियाम चुप हो गया।

     

    उस दिन पहली बार उसे कियारा की बातों में प्यार नहीं, लालच दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद वह किसी परेशानी में होगी।”

     

    कुछ समय बाद कियारा ने लियाम से और पैसे मांगे।

     

    लियाम ने मना कर दिया।

     

    “मेरे पिता की दवाइयां भी चल रही हैं। मैं अभी और पैसे नहीं दे सकता।”

     

    कियारा ने बिना सोचे कहा—

     

    “तुम इतने भी अच्छे नहीं हो जितना मैं समझती थी।”

     

    लियाम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हारे लिए अपनी क्षमता से ज्यादा किया है।”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “लेकिन मुझे उससे क्या?”

     

    लियाम का दिल टूट गया।

     

    उसे समझ आ गया कि वह जिस लड़की के लिए इतना कुछ कर रहा था, उसके लिए वह सिर्फ पैसे देने वाला इंसान था।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा वहां से भी चली गई।

     

    लेकिन इस बार वह किसी अमीर लड़के की तलाश में नहीं थी।

     

    वह एक बड़े शहर में पहुंची, जहां उसकी मुलाकात नोलन नाम के एक बहुत अमीर युवक से हुई।

     

    नोलन को कियारा बहुत पसंद आई।

     

    उसने उसे महंगे उपहार दिए।

     

    कियारा को लगा कि अब उसकी जिंदगी बदल गई है।

     

    उसने नोलन के साथ महंगे होटल, पार्टियां और यात्राएं शुरू कर दीं।

     

    लेकिन नोलन बहुत समझदार था।

     

    उसने जल्दी ही समझ लिया कि कियारा की दिलचस्पी उसमें नहीं, उसके पैसे में है।

     

    एक दिन उसने जानबूझकर कहा—

     

    “मेरे सारे पैसे खत्म हो गए हैं।”

     

    कियारा चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    “मेरी कंपनी में बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।”

     

    कियारा का व्यवहार उसी दिन बदल गया।

     

    वह बोली—

     

    “तो अब हमें अलग हो जाना चाहिए।”

     

    नोलन ने पूछा—

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “मैं ऐसी जिंदगी नहीं जी सकती।”

     

    नोलन मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हें मुझसे नहीं, मेरे पैसों से प्यार था।”

     

    कियारा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नोलन ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें परखने के लिए झूठ बोला था। मेरे पैसे खत्म नहीं हुए।”

     

    कियारा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।

     

    “नोलन, मेरी बात सुनो…”

     

    “नहीं।”

     

    नोलन ने उसे रोक दिया।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम लोगों को छोड़कर आगे बढ़ रही हो। लेकिन असल में तुम हर बार अपने अंदर कुछ खोती जा रही हो।”

     

    कियारा वहां से चली गई।

     

    पहली बार उसे किसी ने उसके लालच का आईना दिखाया था।

     

    कुछ दिनों तक वह अकेली रही।

     

    उसके पास पैसे थे, कपड़े थे, गहने थे, लेकिन कोई ऐसा इंसान नहीं था जिसे वह अपना कह सके।

     

    उसे एडवर्ड याद आया।

     

    लियाम याद आया।

     

    उनकी छोटी-छोटी बातें याद आईं।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने हर रिश्ते की कीमत पैसे से लगाई थी।

     

    एक दिन उसे खबर मिली कि लियाम की मां बीमार हैं।

     

    कियारा अचानक उसके शहर पहुंच गई।

     

    लियाम ने दरवाजा खोला तो उसे देखकर हैरान रह गया।

     

    “तुम यहां?”

     

    कियारा की आंखों में आंसू थे।

     

    “मैं माफी मांगने आई हूं।”

     

    लियाम कुछ नहीं बोला।

     

    “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। तुमने मेरे लिए अपनी जरूरतें तक रोक दीं और मैंने तुम्हारे प्यार की कीमत पैसे से लगा दी।”

     

    लियाम ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

     

    कियारा ने पूछा—

     

    “क्या तुम मुझे फिर से अपनी जिंदगी में जगह दोगे?”

     

    लियाम ने सिर हिला दिया।

     

    “माफ करना और वापस स्वीकार करना दो अलग बातें हैं।”

     

    कियारा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसे उस दिन समझ आया कि पैसा खोने का डर जितना बड़ा नहीं होता, उससे कहीं बड़ा डर होता है किसी का भरोसा खो देना।

     

    कियारा ने पहली बार खुद के लिए नौकरी शुरू की।

     

    शुरुआत में उसे छोटी नौकरी मिली।

     

    उसने शिकायत नहीं की।

     

    वह मेहनत करने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसने अपने खर्च खुद उठाने शुरू किए।

     

    अब अगर कोई उसे महंगा उपहार देता तो वह पहले पूछती—

     

    “क्यों?”

     

    उसके लिए प्यार का मतलब बदल चुका था।

     

    कई साल बाद एक दिन वह उसी शहर के एक छोटे कैफे में बैठी थी।

     

    सामने एक गरीब बच्ची अपनी मां के साथ खाना खा रही थी।

     

    बच्ची की नजर कियारा के महंगे बैग पर थी।

     

    कियारा ने अपना बैग देखा और मुस्कुराई।

     

    उसने बैग नहीं दिया।

     

    बल्कि बच्ची के लिए खाना मंगवाया।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    कियारा के मन को पहली बार किसी चीज से सुकून मिला।

     

    उसे समझ आ गया था—

     

    पैसा जिंदगी को आराम दे सकता है, लेकिन किसी के दिल में अपनी जगह नहीं खरीद सकता।

     

    और जो इंसान हर रिश्ते को पैसों के तराजू पर तौलता है, एक दिन उसके पास बहुत कुछ होते हुए भी ऐसा कुछ नहीं बचता जिसे वह अपना कह सके।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 5 

    No love clause 

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”

     

    “तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

    “मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”

     

    विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।

    “और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”

    कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”

     

    “नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”

     

    अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”

     

    विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”

     

    विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”

     

    विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”

     

    अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”

     

    विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”

     

    अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”

     

    विक्रम जी “नहीं।”

     

    अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”

     

    विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”

     

    अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”

     

    अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”

     

    विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”

     

    फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”

    अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    अग्नि “मैं जानता हूँ।”

     

    “नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”

     

    विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।

    बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”

     

    अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

    वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”

     

    उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”

     

    फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,

    “लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”

     

    अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”

     

    विक्रम जी, “हूँ?”

     

    अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।

    “तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”

     

    विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।

    उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।

     

    छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।

    विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।

    उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।

    अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।

    अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।

     

    अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

    “अग्नि…”

     

    सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी। 

     

    उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,

    “माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”

     

    अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”

     

    सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”

    उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”

     

    अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया। 

     

    “अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।

     

    लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।

    उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।

     

    लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”

     

    सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”

     

    सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”

     

    सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”

     

    सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।

    लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था। 

     

    वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।

     

    ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़

    एक ही बात घूम रही थी… शादी।

    कहानी आगे जारी रहेगी।

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • अधूरी इबादत भाग~52

    अधूरी इबादत भाग~52

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~52 गुलाब जैसा केक

    रूहानी धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी, उसके बाल अभी तक भीगे थे, जैसे उसके भीतर की हलचल अब भी सिमटी हो आँखों के कोनों में। 

    अद्वैत टेबल के पास बैठा था, उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक अजीब सी बेचैनी जो किसी अनकहे इंतज़ार को ओढ़े हुए थी।

    “गुड मॉर्निंग…” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

    “गुड मॉर्निंग,” रूहानी ने जवाब दिया, अपनी नज़र उसके चेहरे पर टिकाए रखी। उसने अपना पर्स कुर्सी पर रखा और पूछा, “मीना दिखाई नहीं दे रही?”

    अद्वैत ने अपनी कुहनी टेबल पर टिकाई और गर्दन हल्की सी झुकाकर कहा, “थोड़ी देर पहले ही गई है… अपना काम खत्म करके।”

    रूहानी की आवाज़ में अचानक एक संकोच की परत उभर आई, “उसे ये तो पता था न कि मैं नीचे वाले कमरे में अकेली थी… और तुम….”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में ही थाम ली, उसकी आँखों में एक सच्ची सी तसल्ली थी, “घबराओ मत… मैं मीना के आने से पहले ही जाग गया था। और उसे कह दिया है कि नीचे वाला कमरा और first floor पर मेरा कमरा और स्टडी रूम छोड़कर बाकी सब साफ कर ले। काम आसान रहेगा उसका।”

    उसकी आवाज़ में कोई दावा नहीं था, कोई बचाव नहीं… बस एक खामोश समझ थी, जैसे वो उसकी उलझन को बिना कहे समझ गया हो।

    फिर बिना किसी और शब्द के, वो उठा और किचन की ओर गया। कुछ पल बाद वो एक प्लेट में गरम-गरम चॉकलेट लावा केक लेकर आया… उसकी खुशबू हवा में जैसे किसी भूली हुई याद की तरह घुल गई।

    उसने केक रूहानी के सामने रख दिया, उसकी आँखों में कुछ चमक जैसी थी, वह dining chair पर बैठते हुए बोला, “टेस्ट तो करो… बताओ कैसा बना है?”

    रूहानी कुछ पल उसे देखती रही, उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी चुप्पी ने उसे छुआ। जैसे हर परत उस लावा केक की तरह थी, बाहर से सलीकेदार, अंदर से पिघली हुई। 

    रूहानी की नज़रें उस गुलाब की पंखुड़ियों जैसे सजे हुए केक पर टिकी थीं। जैसे हर क्रीम की परत में कोई भूला हुआ एहसास दफ़न था। उसकी साँसें हल्की-हल्की तेज़ हो रही थीं, और आँखें नमी से भरने लगी थीं। उस शांत कमरे में अचानक बहुत कुछ बोलता हुआ सा लग रहा था।

    अद्वैत ने जब देखा कि रूहानी एकटक उस केक को देखे जा रही है, उसके होठ ज़रा भी नहीं हिले, बस पलकों की कोर हल्की सी चमक रही थी, वो समझ गया, ये स्वाद भर का मामला नहीं, ये यादों का कोई भारी झोंका है।

    वो उसके पास जाकर धीरे से उसकी आँखों के सामने उँगलियाँ चटकाया, “कहाँ खो गई हो?”

    रूहानी चौंक सी गई, जैसे किसी पुराने ख्वाब से अचानक बाहर आई हो। “कहीं नहीं… बस… ये केक गुलाब के फूल जैसा क्यों है?”

    अद्वैत कुछ याद करते हुए मुस्कुराया, “ये मेरी माँ का signature style है। जब भी कोई खुशी का पल होता था तो मां जरूर बनाती थी… खैर….. तुम taste तो करो।”

    उसने धीरे से केक काटा और एक छोटा सा टुकड़ा उसकी प्लेट में रख दिया। रूहानी ने उस टुकड़े को चम्मच से उठाया और जैसे ही मुँह में डाला… उसकी पलके अपने आप बंद हो गईं। 

    स्वाद जैसे उसके भीतर किसी भूले हुए आलिंगन की तरह समा गया हो। और फिर… एक गर्म आँसू पलकों से निकलकर गाल पर बह निकला।

    उसे याद आया… उसके पापा का घर, जहाँ बेटी को मीठा और चॉकलेट खाते वक्त भी टोकी जाती थीं। और यहाँ… एक अनजान घर में, बिना कोई रोक, बिना कोई सवाल, ये मीठा जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुपचाप गले लगा रहा था।

    अद्वैत ने तुरंत पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया, “क्या हुआ? अच्छा नहीं बना क्या? मीठा कम हो गया या… कुछ ज़्यादा ही कड़वा?”

    रूहानी ने थोड़ा पानी पीते हुए धीमे स्वर में कहा, “नहीं, बहुत अच्छा बना है… तुम्हारी माँ को भी यही पसंद था?”

    अद्वैत की आँखें हल्का सा धुंधला गईं, “मुझे उतना ठीक से याद नहीं… पर जब भी मैं कुछ अचीव करता था, माँ यही केक बनाती थीं… कहती थीं जीत का स्वाद ज़ुबान से पहले दिल में जाना चाहिए।”

    रूहानी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन आँखों में एक टीस सी उतर आई, “लेकिन आज तो कोई खुशी का दिन नहीं… आज तो तुम्हारी माँ की बरसी…..”

    उसकी आवाज़ टूट गई। वाक्य अधूरा रह गया।

    और उसी पल, उसकी जेब में रखा मोबाइल काँपने लगा।

    रूहानी ने कॉल उठाया और अपनी वो मासूम, चुलबुली आवाज़ जिसमें हर बार एक नया रंग भरता था, गुनगुनाने लगी, “हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… माय लवली ब्रदर यशवर्धन…” वो सुर में नहीं थी, फिर भी दिल से थी।

    फोन की दूसरी तरफ यश की आवाज़ आई, थोड़ी नखरे से भरी हुई, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं दीदी, आपने इस बार मुझे सबसे पहले विश नहीं किया।”

    रूहानी का चेहरा एकदम से उतर गया, जैसे सच में गलती कर दी हो। उसने एक हाथ से कान पकड़कर बोला, “सॉरी यशु… अपनी दीदी को माफ कर दो इस बार, अब से कभी ऐसा नहीं होगा। सच में भूल गई थी… पर अब नहीं भूलूंगी, वादा।”

    वो मुस्कुरा रही थी और मुस्कराहट उसके गालों से झलक रही थी। पर उसे एहसास नहीं था कि उसके सामने बैठा अद्वैत बड़ी देर से उसे ऐसे देख रहा था…. उसकी आंखों में राहत का एक साया था कि रूहानी के चेहरे पर छाई मुस्कुराहट की वजह आखिरकार वो था।

    यश ने कॉल पर ही कहा, “मैंने आपका इंस्टा पोस्ट देखा था… आपके कमबैक के लिए… congratulations didi.”

    रूहानी ने थोड़ी भावुकता में कहा, “Thank you so much Yash.”

    फिर यश की आवाज़ हल्की शरारत से भरी हुई आई, “जीजू हैं आपके बगल में?”

    रूहानी ने एक पल को अद्वैत की ओर देखा, उसने पलके झपकीं और धीमे से कहा, “हां… यहीं हैं।”

    “उन्हें दीजिए ना… उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा, आप ही को याद नहीं था तो…” यश ने छेड़ते हुए कहा।

    रूहानी हँसी और बोली, “ठीक है, देती हूं।”

    अद्वैत ने मोबाइल हाथ में लिया और आवाज़ में वही ठहराव रखा जो उसकी आदत बन चुका था, “Happy birthday champ. So, what’s the plan for today?”

    यश ने कहा, “thank you जीजू, अभी तो कोचिंग आया हूं। मम्मी-पापा ने कहा है पढ़ाई पर फोकस करो, 10वीं का बोर्ड है ना इस बार। लेकिन फिर भी छोटी सी पार्टी तो रखी है… और… मैं पूछना चाहता हूं दीदी से… लेकिन मम्मी-पापा के कारण पूछ नहीं पा रहा कि वो आएगी या नहीं।”

    अद्वैत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, मैं बात करता हूं उससे।”

    कॉल कटते ही सन्नाटा सा छा गया। 

    रूहानी अब टेबल के किनारे रखे केक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धीरे-धीरे खा रही थी। उसके चेहरे पर नज़ाकत थी… लेकिन कहीं गहराई में एक हिचक भी छिपी थी।

    अद्वैत कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर उसी नरम आवाज़ में बोला, “है तो आज खुशी का दिन… क्या तुम जाना चाहती हो यश से मिलने?”

    रूहानी के चम्मच की चाल एक पल को रुक गई… उसने अद्वैत को देखा और सोच में पड़ गई।

    ———-

    क्या रूहानी के चेहरे पर फैली वो मुस्कान सिर्फ यश की मासूमियत के लिए थी… या किसी बीती टीस को छिपाने की आख़िरी कोशिश?

    और अद्वैत की आँखों में जो ठहराव था, क्या वो वाक़ई सुकून था… या किसी इंतज़ार की थकी हुई चुप्पी?

    क्या ये सिर्फ एक सुबह थी… या किसी अधूरी कहानी की शुरुआत फिर से हो रही थी?

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अधूरी इबादत भाग~51

    अधूरी इबादत भाग~51

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~51 पहली बार भूली? 

     

    पिछली रात…

    रूहानी बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी पलकों से कोसों दूर थी। तकिये पर सिर रखते ही आँखें बंद तो हो जातीं, पर भीतर चलती अशांत तस्वीरें उन्हें फिर से खोल देती थीं।

    दिन भर का हर एक लम्हा जैसे उलझ कर उसकी साँसों में अटक गया था….. अपने नए स्टूडियो की चमकती शुरुआत, फिर अचानक एकांश राठौड़ और काम्या रैना की मौजूदगी, उन दोनों के शब्दों की वह छुपी हुई नश्तर-सी चुभन, और फिर लौटते वक़्त वो सड़क पर हुआ हल्का-सा एक्सिडेंट… सब कुछ जैसे किसी भारी चादर की तरह उस पर लिपट गया था।

    पलंग पर लेटी रूहानी करवट पर करवट बदल रही थी, जैसे उसका जिस्म बिस्तर पर था, पर रूह उसके ही अंदर किसी और समय में लौट गया हो। चादर के नीचे उसकी उंगलियां एक-दूसरे में उलझी हुई थीं, और उसके सीने में बेचैनी किसी अनसुने संगीत की तरह बज रही थी। बाहर रात चुप थी, पर उसके भीतर हज़ार आवाज़ें चल रही थीं। 

    उसने आँखें बंद कीं, लेकिन उस अंधेरे में एक दृश्य चमकने लगा…. वही शाम, जब पहली बार एकांश ने उसे इस तरह छुआ था कि उसकी साँसें थम गई थीं। 

    flashback 

    India Fashion Week के सेमी-फाइनल की रात थी। होटल के उस रूम में बस सिलाई मशीन की टकटक और रूहानी की सांसों की आवाज़ थी। 

    उसके हाथ लगातार काम में लगे थे….. कभी कपड़ों की तह जांचती, तो कभी स्केच पैड पर कुछ जोड़ती घटाती। आँखों में नींद नहीं थी, बस जूनून था। 

    उसके चेहरे पर पसीने की हल्की परत थी, पर आंखों में कोई थकान नहीं…. सिर्फ़ जीत की ललक।

    उसी कमरे के एक कोने में, एकांश बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसका कैमरा हाथ में था, जिसमें वो बार-बार वो तस्वीर देख रहा था जो उसने चुपके से खींची थी…. रूहानी की। उसकी आंखें उस फोटो में कुछ ढूंढ रही थीं… शायद वो मासूमियत जो उसे रूहानी में सबसे पहले दिखी थी।

    कुछ पल बाद, वो उठकर उसके पास आया। कैमरा टेबल पर रखा और बिना कुछ कहे, धीरे से उसका हाथ थामा। रूहानी चौंकी, उसके हाथ रुक गए। उसने सिर उठाकर देखा और एक प्रश्न भरी नज़र उसकी आंखों में तैर गई।

    “थोड़ा आराम कर लो, रूहानी,” एकांश ने धीमे से कहा और उसके हाथों को पकड़कर बिस्तर तक ले आया। उसके पास बैठकर उसके गाल को अपनी हथेली से सहलाया। 

    “अब भी काफ़ी समय है,” उसकी आवाज़ में एक अजीब नरमी थी, जो रूहानी को और बेचैन कर गई।

    “नहीं, एकांश,” रूहानी ने घबराई सी आवाज़ में कहा, “ज़्यादा समय नहीं है। मुझे किसी भी हालत में ये प्रतियोगिता जीतनी है। ये मेरा सपना है… मेरा सब कुछ।”

    “रूहानी… listen… listen… मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम जरूर जीतोगी। लेकिन कभी-कभी बस एक पल को जी लेना भी ज़रूरी होता है। कम से कम, इस मोड़ तक पहुँचने का एहसास तो करो।”

    वो कुछ कह नहीं पाई, बस मासूमियत से बोली, “क्या कहना चाह रहे हो, एकांश?”

    एकांश ने उसके दोनों गालों को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसकी आंखें बहुत पास थीं अब।

    “हमें मिले कितना वक़्त हो गया, रूहानी?”

    रूहानी ने धीमे से कहा, “मुझे ठीक से याद नहीं… शायद बारह या पंद्रह महीने।”

    “Do you have any feeling for me?” एकांश की आवाज़ हल्की, पर सीधी थी।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे, धीरे से हां में सिर हिला दिया और अपनी नज़रें झुका लीं। वो उसकी ज़िंदगी का पहला ऐसा इंसान था, जिसके लिए उसने इतना गहरा महसूस किया था…. दिल से, आत्मा से। 

    अगले ही पल, एकांश ने उसके चेहरे को अपने और नज़दीक खींच लिया, और उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया।

    रूहानी का शरीर अकड़ गया। उसने चादर के दोनों किनारों को कसकर पकड़ लिया। उसकी पलकों में हलचल थी, सांसें उलझी हुई, और मन भीतर से कांप उठा। 

    ये सब उसके लिए बहुत नया था… बहुत अजीब। वो न तो जवाब दे पा रही थी, न खुद को पूरी तरह उस पल में छोड़ पा रही थी।

    पर एकांश को शायद इसका एहसास नहीं था। वो बस उसी लम्हे में डूबा रहा…. बिना यह देखे कि रूहानी के होंठ सिर्फ़ चुप थे, जवाब नहीं दे रहे थे।

    वो इस खामोश असहजता को प्रेम का पल समझता रहा… और रूहानी, उस चुप्पी में खुद से कुछ खोती रही।

    कुछ देर रूहानी के होंठो को चूसने के बाद एकांश उसके गर्दन पर चला गया और अपने हाथों से रूहानी के टॉप को उसके कमर के पास से उठने लगा। 

    तभी रूहानी जैसे किसी नींद से जागी, उसने तुरंत एकांश के हाथ को अपनी कमर पर से झटके से हटाया और उठ खड़ी हुई। 

    तभी एकांश ने उसे बिस्तर पर पटक दिया, उसके ऊपर आकर बोला, “everything is fine ruhani” 

    रूहानी की आंखे भरने लगी, वो एक ही बात दोहराए जा रही थी, “नहीं एकांश, ये सही नहीं है, मैं हमारी शादी के बाद सब कुछ करूंगी लेकिन अभी नहीं……”

    एकांश बोला, “रूहानी! I’m aroused now, what should I do, please”

    और इतना बोलकर एकांश रूहानी के कॉलरबोन को चुमना शुरू कर दिया। 

    रुहानी घबराने लगी थी, उसने अपना पूरा जोर लगाकर एकांश को खुद के ऊपर से हटा दिया और एक जोरदार तमाचा एकांश के गाल पर जड़ दिया। 

    एकांश की आंखे गुस्से से लाल हो गई थी, वो जैसी ही रूहानी की तरफ बढ़ा, रूहानी बिना एक पल की देरी किए बाथरूम में घुस गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। 

    एकांश कुछ देर गेट खटखटया, लेकिन रूहानी नहीं निकली। वो पूरी रात उसके वॉशरूम में रोते-रोते सो गई थी। 

    Flashback end

    और फिर… पता नहीं कब, रूहानी करवट बदलते-बदलते उठी। आँखें अधखुली थीं, मगर बदन नींद में डूबा हुआ।

    वो बिस्तर से उतरी। नंगे पाँव, बिना किसी शोर के, जैसे कोई परछाई चल रही हो। हल्की रोशनी में उसका चेहरा थका हुआ नहीं, खोया हुआ लग रहा था। वो धीरे-धीरे बाहर निकली… और वहीं, किचन के पास, किसी को खड़ा देखा।

    उसकी आँखों ने पहचान नहीं की…. उसका दिल ही था जिसने कहा, “यश…..”

    वो चली गई उस साये की ओर और गले लग गई। जैसे किसी भुला दिए गए रिश्ते की गर्माहट तलाश रही हो। जैसे कोई बच्ची अपने पुराने तकिये को ढूँढ रही हो, जिसमें उसकी माँ की महक थी।

    उसने कसकर पकड़ लिया… और फिर वहीँ, बिना कुछ कहे, कुछ और सोचे, उसकी आँखें बंद हो गईं।

    कुछ देर ऐसे ही गुज़रा… फिर जैसे किसी डोर ने उसे वापस खींचा हो, रूहानी ने धीरे से अपनी पकड़ ढीली की, और उसी गति से वापस मुड़ गई। बिना किसी सवाल, बिना किसी आवाज़, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और वो चली गई। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    आज सुबह…

    जब अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..” तो रूहानी का गला भर आया था। 

    उसने जल्दी से “मैं फ्रेश हो कर आती हूँ” कहकर अद्वैत के चेहरे पर ही दरवाजा बंद कर लिया था। 

    उसने तुरंत बेड साइड टेबल पर से अपना मोबाइल उठाया और बिना देरी किए इंस्टाग्राम खोला और पिछले दिन की opening ceremony की कुछ तस्वीरें अपलोड कर दीं……

    studio की चमकदार तस्वीरें, cake-cutting की खुशी, gungun के साथ candid moments

    और लिखा:

    “Chapter 3 – From Ruins to Radiance ✨ #StitchAndSoul #GrandOpening”

    जैसे ही उसने पोस्ट किया, स्क्रीन पर एक reminder pop‑up आया:

    “मेरे प्यारे भाई यश का जन्मदिन”

    उसके होंठों के बीच फुसफुसाहट थी, “मुझे याद क्यों नहीं रहा?”

    उसकी आँखों में guilt का कांटा घुसा, और दिल एक अजीब तरह की बेचैनी से भर गया। 

    वह खुद से बोली, “पहली बार… मैं कैसे… ये भूल गई?”

    वह इस सोच में डूब गई की अब वह अपने छोटे भाई से क्या बोलेगी?

    ——————

    क्या एकांश उस खामोशी को अब भी इश्क़ मानता है… या उसने जानबूझकर अनदेखा किया था रूहानी की कांपती रूह को?

    क्या यश सच में वहीं था… या ये सिर्फ़ रूहानी की थकी हुई तन्हाई का एक वहम था?  

    क्या वाकई गलती से भूली थी रूहानी उसका जन्मदिन… या वो कुछ ऐसा भूल जाना चाहती थी, जिसे याद करना अब सिर्फ दर्द देता है?

     

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

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  • अधूरी इबादत भाग~50

    अधूरी इबादत भाग~50

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~50 उसने शर्ट क्यों भीगने दी? 

     

    सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी और एक तीखी हॉर्न की आवाज़ ने रात के सीने को चीरते हुए सब कुछ झकझोर दिया। 

    रुहानी ने एक झटके में आँखें बंद कर लीं और दोनों हाथों से डैशबोर्ड को पकड़ लिया। अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं, जैसे वक़्त को वहीं थाम लेना चाहता हो।

    सामने से आती गाड़ी, नशे में चूर किसी ड्राइवर के हाथों से लगभग बेकाबू थी। वो बेतहाशा झूलती हुई सीधे उनकी ओर बढ़ रही थी जैसे किस्मत ने अचानक अपनी चाल बदल ली हो। 

    रुहानी की सांस जैसे गले में अटक गई, और अद्वैत के चेहरे पर आया पसीना रात की ठंडी हवा में भी सर्द नहीं हो रहा था।

    लेकिन… ठीक उस अंतिम सेकंड में, जब दो ज़िंदगियाँ किसी अनजाने मोड़ पर थमने को थीं…. अद्वैत ने ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा और गाड़ी को एक मोड़ पर दाईं ओर घुमा दिया।

    टायरों की चीख़ती आवाज़ सड़क की रगों में उतर गई और उस दूसरी कार की हेडलाइट्स उनकी विंडशील्ड पर एक पल के लिए ठहरकर पीछे निकल गईं… बिना टकराए, बिना छुए… सिर्फ़ एक डर बनकर।

    अंदर, कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया।

    रुहानी की साँस अब भी अधूरी थी, आँखें फटी की फटी। अद्वैत की उंगलियाँ अब भी स्टीयरिंग पर जमी थीं, पर पकड़ अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही थी।

    “रुहानी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर थमी नहीं, “तुम ठीक हो?”

    रुहानी ने बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सिर हिलाया, फिर कांपते होंठों से फुसफुसाई, “बस… एक पल लगा था कि सब खत्म हो जाएगा…”

    अद्वैत ने गाड़ी को एक किनारे रोक दिया, इंजन बंद कर दिया… लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वो अब डर से नहीं, राहत से भरी थी। दो धड़कनों ने एक ही समय पर महसूस किया कि ज़िंदगी अभी बाकी है।

    अद्वैत ने देखा, रूहानी का हाथ अब भी हल्का कांप रहा था। 

    “सब ठीक हैं, रूहानी” अद्वैत ने धीमे से कहा। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात के ढाई बज चुके थे। घर की हर दीवार जैसे नींद में डूबी हुई थी। सिर्फ़ किचन में लगी हल्की पीली रौशनी जग रही थी… उतनी ही चुप, जितना अद्वैत का मन। 

    वो काउंटर के पास खड़ा अपनी पानी की बोतल भर रहा था, जैसे उस सन्नाटे को किसी छोटे से काम से तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।

    उसने जैसे ही फ्रिज का दरवाज़ा बंद किया, पीछे से आती किसी धीमी, नंगे पाँव की आहट ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। 

    उसने मुड़कर देखा…. रूहानी।

    वो थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे नींद में चल रही हो, या किसी भारी याद के बोझ से दब गई हो। उसकी आँखें अधखुली थीं, पाँव धीरे-धीरे फर्श पर सरकते हुए बढ़ रहे थे। कोई सजगता नहीं, कोई हड़बड़ाहट नहीं…. बस एक थकी हुई सी मौजूदगी।

    “रूहानी?” अद्वैत ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”

    कोई जवाब नहीं।

    और फिर अचानक… जैसे किसी टूटे हुए पल ने खुद को समेट लिया हो…. रूहानी उसके सीने से आकर लग गई। उसके हाथ अद्वैत की नाइट शर्ट को कस के पकड़ चुके थे, जैसे वो उसे छोड़ देगी तो गिर जाएगी, टूट जाएगी, फिर कभी उठ नहीं पाएगी।

    अद्वैत एकदम जड़ हो गया। उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली और नसें जैसे सख्त हो गईं हों। उसने खुद को पीछे हटाने की कोशिश की…. हड़बड़ाहट नहीं थी, बस उलझन थी…. पर रूहानी की पकड़ और भी मज़बूत हो गई। 

    वो काँप रही थी, उसकी साँसों में बिखरी कोई पुरानी बेचैनी थी और आँखों से आंसू लगातार उसके सीने में भीग रहे थे।

    “रूहानी… क्या हुआ?” अद्वैत ने फिर कोशिश की, आवाज़ इस बार ज़रा कम सख्त थी।

    लेकिन लब अब भी ख़ामोश थे। जैसे कोई आवाज़ थी, जो भीतर से उठ तो रही थी, पर रास्ता नहीं मिल रहा था।

    अद्वैत के भीतर जैसे कुछ खामोश सा चटक गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो लड़की, जिससे उसने सिर्फ़ साथ रहने का समझौता किया था, बिना पास आए….. किसी दिन ऐसे, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी नज़दीकियों में उतर जाएगी। 

    ये नज़दीकियाँ जिस्म की नहीं थीं… ये उस ख़ामोशी की थीं, जहाँ कोई कुछ कहे बिना सब कह जाता है। रूहानी उस पल उसकी बाहों में नहीं थी…. वो उसके अंतर्मन की चौखट पर बैठी थी, बिना इजाज़त मांगे।

    और फिर भी, वो उसे छूने से डर रहा था…. जैसे उसके दुःख को छू लेने से कहीं वो भी चुपचाप उसमें डूब न जाए।

    कुछ पलों बाद, रूहानी की उंगलियों ने उसकी शर्ट को धीरे-धीरे छोड़ा और वो उसी नंगे पाँव, उसी धीमी चाल से अपने कमरे की तरफ़ लौट गई। बिना कुछ कहे। जैसे आई थी, वैसे ही।

    अद्वैत वहीं खड़ा रहा, अपनी भीगी हुई शर्ट को देखते हुए, जैसे उसमें कोई उत्तर दर्ज हो जिसे वो पढ़ नहीं पा रहा।

    उसके ज़हन में सिर्फ़ एक सवाल अटका था….. “उसके कदमों की खामोशी ज़्यादा कह गई…. क्या वो मेरी बाँहों में सुकून ढूंढने आई थी, या अपने ही डर से छुपने?”

    और उस सवाल के जवाब में बस सन्नाटा था… लंबा, अनकहा, गहरा।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे की बत्तियाँ बुझी थीं, सवेरा हो चुका था। 

    रुहानी बिस्तर पर थी, करवट लेकर सो रही थी, पर उसे लगा जैसे वह सपने में जी रही थी।

    अचानक… एक जानी-पहचानी खुशबू ने उसे अपने आगोश में भर लिया।

    गर्म चॉकलेट की महक… पिघली हुई मिठास… हल्की-सी vanilla की परत।

    उसकी आँखे बंद थी लेकिन उसे लगा कि वो अपने पुराने घर के किचन में खड़ी थी। 

    वही टाइल्स, वही खिड़की से आती हल्की धूप और सामने उसकी माँ, apron पहने, बाल बांधे, और ओवन खोलते हुए।

    माँ का चेहरा धुंधला था, पर आवाज़ साफ़ थी, “लड़कियाँ रोज़-रोज़ मीठा खाएँगी तो मोटी हो जाएगी। चेहरे पर पिम्पल और एक्ने हो जायेंगे…. वो अलग। तुम लड़की हो और लड़कियों को control में रहना चाहिए।”

    एक अजीब-सी टीस ने रुहानी की दिल में गहराई तक जगह बना ली।

    “मम्मा, बस एक बार taste करना है…”

    “नहीं रूहानी! तुम नहीं खाओगी। ये यश के लिए है। आज उसका जन्मदिन है।”

    “मेरे जन्मदिन पर तो आप कुछ खास नहीं बनाती हो” रूहानी ने अपनी माँ से शिकायती लहजे में कहा। 

    “क्योंकि बेटी पराई अमानत होती है और हमारे यहाँ बेटियों का जन्मदिन नहीं बनाया जाता”

    माँ की बात से रूहानी की आँखे छलछला गयी थी। 

    तभी अचानक वो महक और तेज़ हो गई। रुहानी हड़बड़ा कर उठी। 

    उसकी सांस तेज़ थी, माथे पर पसीना… उसने हाथ से बिस्तर के पास की दीवार को छुआ जैसे यकीन करना चाहती हो — क्या वो अभी भी वहीं है?

    कमरे के बाहर से अब भी वही महक आ रही थी…. chocolate lava cake की। इतनी सजीव, इतनी सच्ची… कि अब ये सपना नहीं लग रहा था।

    वो दरवाज़े तक पहुँची, दबे पाँव, धीरे-धीरे, जैसे अतीत की दहलीज़ पर कदम रख रही हो। दरवाज़ा हल्का खोलकर उसने hallway की ओर देखा और वहीं से उसकी नज़र किचन में गई, जहाँ मीना cake ओवन से निकाल रही थी।

    वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने हल्के से पुकारा, “रूहानी?”

    उसने पलटकर देखा… अद्वैत दरवाज़े की चौखट पर था, उसके चेहरे पर कुछ अनकहा सा था।

    “तुम ठीक हो?”

    रूहानी कुछ पल चुप रही, फिर उसके होंठ हिले, “हाँ, मुझे क्या हुआ है?”

    अद्वैत ने अपने गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, “वो कल रात…. तुम…. वो….”

    रूहानी तुरंत से बोली, “मैं क्या……?”

    अद्वैत तुरंत बात बदल कर बोला, “कुछ नहीं……. फ्रेश होकर आ जाओ। मैंने मीना से स्पेशल चॉकलेट लावा केक बनवाया है।”

    रूहानी पूछ पड़ी, “कोई खास वजह?” 

    अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..”

    एक पल को सब कुछ रुक गया। रूहानी की आँखें एकाएक नम हो गईं। 

    ———————-

    क्या ये सिर्फ़ एक तारीख थी, या उस दिन कुछ ऐसा था जो अब तक दफ़न था? क्या ये महज़ संयोग था कि उस रात भी चॉकलेट लावा केक बना था? 

    जब रात में वो उसके सीने से लिपट गई थी….. क्या वो सिर्फ़ डर था? या कोई पुरानी याद उसकी आत्मा से लिपटी हुई थी… जिसे अद्वैत छू भी नहीं पाया?

    क्या सच में रूहानी सब भूल पाई थी जो रात के सन्नाटे में उसके भीतर उतर चुका था? 

     

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

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  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 4

    No love clause 

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।”उसकी ठंडी निगाहें सीधे विक्रम जी की आँखों में टिकी थीं।

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

    कमरे में मौजूद बाकी लोगों को शायद अग्नि की यह बेबाकी बदतमीजी लग रही थी, लेकिन विक्रम राजावत उसे बस देखते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा जरूर था, मगर आँखों में कुछ और ही था, जिसे वहाँ मौजूद कोई भी पढ़ नहीं पाया।

     

    आखिरकार उन्होंने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए कहा, “स्टडी में चलो। हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” कहकर वो हाथ पीछे बांधे आगे बढ़ गए। 

    अग्नि ने एक पल के लिए उनकी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ा।

    दोनों पहली मंजिल पर बनी स्टडी की तरफ बढ़ गए।

    कुछ ही देर में विक्रम जी ने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला और अंदर चले गए। अग्नि भी उनके पीछे कमरे में दाखिल हुआ।

    राजावत मेंशन की बाकी जगहों की तरह यह कमरा भी बेहद आलीशान था, लेकिन इसमें दिखावे से ज्यादा एक अलग तरह की गंभीरता थी।

     

    कमरे की एक पूरी दीवार पर लकड़ी की बनी खूबसूरत लाइब्रेरी थी। उसमें लगी लंबी-लंबी रैक में बिजनेस और मैनेजमेंट की किताबों से लेकर इतिहास, राजनीति, साहित्य और पुराने उपन्यास तक करीने से सजे हुए थे।

    हर किताब अपनी जगह पर थी।

     

    कुछ किताबों के किनारों पर हल्की धूल जरूर जमी थी, लेकिन उन्हें देखकर साफ पता चलता था कि इस कमरे में किताबें सिर्फ सजावट के लिए नहीं रखी गई थीं।

    लाइब्रेरी के सामने एक बड़ी-सी आरामदायक विंग चेयर रखी थी, जिसके पास एक छोटा-सा लैम्प रखा हुआ था।

    कमरे के बीचों-बीच गहरे रंग की लकड़ी की एक बड़ी मेज थी। उस पर कुछ जरूरी दस्तावेज, एक खुली हुई डायरी, चश्मे का केस और एक पुरानी चांदी की स्याहीदानी रखी थी।

     

    कमरे की दूसरी दीवार पर राजावत परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में युवा विक्रम राजावत अपने बेटे के साथ खड़े थे।

    दूसरी तस्वीर में उनकी पत्नी थीं।

     

    और एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें बहुत छोटा-सा अग्नि अपने दादा की उंगली पकड़े खड़ा था।

    अग्नि की नजर अनायास उस तस्वीर पर चली गई।

    कुछ पल के लिए उसके चेहरे की कठोरता गायब हुई।

     

    वह तस्वीर…

    उसकी जिंदगी के उन कुछ खूबसूरत पलों में से एक थी, जिन्हें वह चाहकर भी भूल नहीं पाया था।

    विक्रम जी ने उसकी नजर तस्वीर पर जाते देख ली।

    लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

    बस धीरे से अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े।

    अग्नि भी तस्वीर से नजर हटाकर उनकी तरफ देखने लगा।

     

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

    फिर अग्नि धीरे-धीरे आगे बढ़ा। और अचानक…

    वह झुक गया। उसने विक्रम राजावत के पैर छू लिए।

    विक्रम जी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गए।

    शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अग्नि, जो कुछ सेकंड पहले तक उनसे इतनी नाराज़गी से बात कर रहा था, इस तरह उनके पैर छुएगा।

     

    उनकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उन्होंने तुरंत अग्नि को उठाया और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।

    “मेरा बच्चा…” उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।

    सिर्फ़ अपनापन था।

     

    अग्नि ने भी आँखें बंद कर लीं। उस पल में वह राजावत ग्रुप का करोड़ों का मालिक या सख्त CEO नहीं था।

    वह बस अपने दादा का पोता था।

     

    वही बच्चा…

    जो कभी उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था।

     

    लेकिन अगले ही पल अग्नि के चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य हो जायेंगे। “ दादा जी, आप शादी करने के लिए मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते। शादी करना या ना करना ये मेरा निजी फैसला है।”

     

    अग्नि की बात सुनकर विक्रम जी के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, वो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “कभी कभी हमें कुछ पहले लेने से पहले समय की नजाकत को देखना होता है।”

    कहकर उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अग्नि ने भौहें उचकाई, “ मैं आपकी शर्तें पढ़ चुका हूँ, बार बार मेरे सामने ये फाइल मत लाइए।”

     

    विक्रम जी बोले, “ ये वो फाइल नहीं है, जो तुम समझ रहे हो।”

     

    अग्नि के पहले विक्रम जी को देखा और फिर उनके हाथ में मौजूद फाइल को, फिर उसने वो फाइल अपने हाथों में पकड़ ली।

    और चेयर खींचकर उसपर बैठ गया। 

     

    अग्नि ने फाइल अपने हाथों में ली और चेयर खींचकर उस पर बैठ गया। उसने फाइल को कुछ पल तक बिना खोले देखा।

    फिर उसकी नजर अपने दादा जी पर गई। “अब इसमें और क्या है?”

     

    विक्रम जी अपनी जगह खड़े रहे। “पहले पढ़ो।”

     

    अग्नि ने हल्की-सी साँस छोड़ी और फाइल खोल दी।

    पहले पन्ने पर वही वसीयत थी, जिसे वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। उसकी नजर तेजी से उन पंक्तियों पर दौड़ी। राजावत परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने के लिए अग्नि सिंह राजावत को अपने सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले विवाह करना अनिवार्य होगा।

    अग्नि के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “मैंने कहा था ना दादा जी… मैं ये सब पहले ही पढ़ चुका हूँ।”

     

    विक्रम जी ने कोई जवाब नहीं दिया। अग्नि ने अगला पन्ना पलटा। फिर एक और फिर…

    उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।

    उसके चेहरे पर आई हल्की-सी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

    “ये क्या है?”

     

    विक्रम जी ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    अग्नि ने फाइल से नजर उठाई। “ये हिस्सा पहले इस फाइल में नहीं था।”

     

    विक्रम जी धीरे-धीरे उसके सामने रखी दूसरी चेयर पर जाकर बैठ गए। “क्योंकि तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।”

     

    अग्नि की आँखें सिकुड़ गईं। “और अब पड़ गई?”

     

    “हाँ।” कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    अग्नि ने उस पन्ने को दोबारा पढ़ा। उसमें वसीयत की संपत्ति से ज्यादा परिवार की कुछ जिम्मेदारियों और अधिकारों का उल्लेख था।

     

    कुछ ऐसी बातें… जिन्हें पढ़कर अग्नि समझ गया था कि मामला सिर्फ़ पैसों का नहीं है। उसने फाइल बंद कर दी। “दादा जी, आप आखिर चाहते क्या हैं?”

     

    विक्रम जी ने कुछ पल तक उसे देखा। “मैं चाहता हूँ कि तुम शादी करो।”

     

    अग्नि ठंडी साँस छोड़ते हुए, “क्यों?”

     

    विक्रम जी, “क्योंकि अब समय आ गया है।”

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे

    । अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    कहानी आगे जारी रहेगी।

     

    Plz अगर आप इसी तरह अच्छी अच्छी कहानियां पढ़ना चाहते हैं तो मुझे फॉलो जरूर कीजिए।

     

     

     

     

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • समाज का आईना भाग 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कई मिनट तक उस काँच के टुकड़े को देखता रहा।

     

    उसमें दिखाई देने वाला बच्चा लगातार उसकी तरफ देख रहा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    फिर आईने में एक और दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक स्कूल।

     

    बच्चे हँस रहे थे।

     

    एक गरीब बच्चा अकेला बैठा था।

     

    बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    शिक्षक सब देख रहा था।

     

    लेकिन उसने आँखें फेर लीं।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक सड़क।

     

    एक घायल आदमी पड़ा था।

     

    लोग वीडियो बना रहे थे।

     

    लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था।

     

    दृश्य फिर बदला।

     

    एक घर।

     

    एक लड़की रो रही थी।

     

    परिवार वाले उसे चुप करा रहे थे।

     

    “लोग क्या कहेंगे?”

     

    दृश्य बदलता गया।

     

    हर जगह एक ही चीज थी—

     

    लोग गलत देख रहे थे, लेकिन चुप थे।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब उसे समझ आ चुका था कि आईना किसी भूत की कहानी नहीं था।

     

    यह इंसान की उस आदत की कहानी था जिसमें वह दूसरों के पाप देखता है, लेकिन अपने हिस्से की चुप्पी भूल जाता है।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    पहली बार वह पूरी तरह शांत लग रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या तुम्हें अब मुक्ति मिल गई?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती थी जब तक मेरी कहानी झूठ के नीचे दबाई गई थी।”

     

    “अब?”

     

    “अब सच सामने है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आईना खत्म?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आईना कभी खत्म नहीं होता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि समाज बदलता रहता है… लेकिन इंसान के भीतर का लालच, डर और अहंकार भी साथ बदलते हैं।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    अगली सुबह आरव सूरजपुर के चौक पर पहुँचा।

     

    वहाँ उसने वह बड़ा आईना लगवाया जो हवेली के टूटे हुए टुकड़ों से बचा था।

     

    लोग उसके चारों तरफ जमा हो गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यह आईना किसी को डराने के लिए नहीं है।”

     

    लोग चुप रहे।

     

    “यह हमें याद दिलाने के लिए है कि हम दूसरों को जिस नजर से देखते हैं, कभी उसी नजर से खुद को भी देखें।”

     

    एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर कोई अपना सच देखकर बदल जाए तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो आईना सफल है।”

     

    एक महिला ने पूछा—

     

    “और अगर कोई सच देखकर भी न बदले?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “तो आईना दोषी नहीं होगा।”

     

    उसी समय हवा चली।

     

    आईने की सतह पर हल्की धुंध छा गई।

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    फिर आईने में पूरे कस्बे का चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावना चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ इंसान थे।

     

    थके हुए।

     

    डरे हुए।

     

    गलतियाँ किए हुए।

     

    लेकिन सच स्वीकार करने की कोशिश करते हुए।

     

    हरिदास बाबा आगे आए।

     

    उन्होंने आईने को देखा।

     

    “अब यह शांत है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि अब लोग इससे डर नहीं रहे।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वे खुद को देखने लगे हैं।”

     

    सूरजपुर की कहानी वहीं खत्म हो गई।

     

    लेकिन आरव की नहीं।

     

    कुछ महीने बाद वह शहर चला गया।

     

    उसने एक नई किताब लिखनी शुरू की।

     

    नाम था—

     

    “समाज का आईना।”

     

    उसने किताब की शुरुआत एक लाइन से की—

     

    “हम राक्षसों को जंगलों में ढूँढते रहे, जबकि वे हमारे डर, लालच और चुप्पी के पीछे छिपे थे।”

     

    किताब के आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—

     

    “अगर कभी आपको लगे कि दुनिया बहुत बुरी हो गई है, तो दूसरों के चेहरे देखने से पहले अपना चेहरा देखिए।”

     

    उस रात आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था।

     

    उसके सामने वही काँच का छोटा टुकड़ा रखा था।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    इस बार उसमें सिर्फ उसका चेहरा था।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “सब खत्म।”

     

    तभी काँच पर एक छोटी-सी दरार पड़ी।

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    दरार धीरे-धीरे फैलने लगी।

     

    और उसके बीच एक शब्द उभरा—

     

    “नहीं।”

     

    कमरे की बत्ती अपने आप बुझ गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “आईना अभी जाग रहा है।”

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन काँच के टुकड़े में अब उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ हजारों लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    अलग-अलग शहर।

     

    अलग-अलग चेहरे।

     

    अलग-अलग कहानियाँ।

     

    और उन सबके पीछे…

     

    एक ही काली परछाईं।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आईने में परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    और पहली बार उसने साफ आवाज में जवाब दिया—

     

    “मैं समाज हूँ।”

     

    आरव के हाथ से काँच गिर गया।

     

    काँच फर्श पर टूट गया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावनी आवाज नहीं आई।

     

    सिर्फ एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “जब तक इंसान खुद को दूसरों से बेहतर समझता रहेगा… मैं जिंदा रहूँगा।”

     

    सुबह जब सूरज निकला, आरव ने खिड़की खोली।

     

    बाहर लोग अपने काम पर जा रहे थे।

     

    दुकानें खुल रही थीं।

     

    बच्चे स्कूल जा रहे थे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    लेकिन अब आरव जानता था—

     

    हर चेहरे के पीछे एक कहानी है।

     

    हर मुस्कान के पीछे एक दर्द हो सकता है।

     

    हर अच्छाई के पीछे कोई स्वार्थ छिपा हो सकता है।

     

    और हर बुरे इंसान के भीतर भी बदलने की संभावना होती है।

     

    उसने आखिरी बार आईने में खुद को देखा।

     

    इस बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा—

     

    “अगर पूरा समाज मेरा आईना है… तो मैं समाज को क्या चेहरा दिखा रहा हूँ?”

     

    आईने ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि जवाब आरव को खुद देना था।

     

    और शायद यही इस कहानी का सबसे डरावना सच था—

     

    भूतों से डरना आसान है।

    अपने असली चेहरे से डरना मुश्किल।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇

    चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं

    शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।