किसी ने पूछा मुझसे
“पसंदीदा औरत कैसी होती है?”
मैंने हँसकर कहा
वो,
जिससे बहस करते-करते भी
आख़िर में दिल उसी की बात मान ले।
जिसकी नाराज़गी
दिन भर जेब में रखे किसी पत्थर जैसी लगे…
हर काम के बीच
चुभती हुई।
और जिसकी हँसी
थके हुए दिन पर
बारिश की पहली बूँद जैसी उतरती हो।
वो,
जिसके होते हुए
घर सिर्फ़ घर नहीं रहता,
एक सुकून बन जाता है।
जिसे दुख दो
तो सबसे पहले
अपनी ही आँखें झुक जाएँ।
जिसकी कुछ बातें
होंठों पर मुस्कान रख जाएँ,
और कुछ ख़ामोशियाँ
रात भर जगाए रखें।
पसंदीदा औरत
सिर्फ़ ख़ूबसूरत नहीं होती…
वो धीरे-धीरे
तुम्हारी आदत बन जाती है।
तुम्हारी रूह में
ऐसे उतरती है
जैसे चाय में घुली शक्कर
दिखती नहीं,
पर हर घूँट में महसूस होती है।
और फिर एक दिन
उसके बिना सब कुछ तो होता है…
मगर ज़िंदगी नहीं होती।
…….. ✍️
किसी ने बहुत खूबसूरत कहीं अपनी बातें… जहाँ भर की गहराई समेटी है सारी जज्बाते…
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