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पोटली में छिपा था राज

पढ़ने का समय : 6 मिनट

अध्याय 11 — पोटली में छिपा था पुराना राज

सुदामा के हाथ में वह छोटी-सी पोटली थी।

 

उन्होंने उसे धीरे से खोला था।

 

अंदर एक पुरानी-सी चीज रखी थी।

 

उसे देखते ही सुदामा कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए।

 

उनकी आँखों के सामने गुरुकुल के दिन घूमने लगे।

 

वही मिट्टी का आँगन।

 

वही पेड़।

 

वही गुरुजी की आवाज।

 

और उनके साथ बैठा कृष्ण।

 

सुदामा ने उस चीज को हाथ में लेकर ध्यान से देखा।

 

“ये तो…”

 

उनकी आवाज वहीं रुक गई।

 

उनकी पत्नी पास आकर बैठ गईं।

 

“क्या है इसमें?”

 

सुदामा ने जवाब नहीं दिया।

 

वह बस उस चीज को देखते रहे।

 

कुछ देर बाद उन्होंने कहा,

 

“ये कृष्ण के पास थी।”

 

पत्नी ने हैरानी से पूछा,

 

“आपको पूरा यकीन है?”

 

“हाँ।”

 

सुदामा ने धीरे से कहा,

 

“गुरुकुल में हम दोनों के पास ऐसी ही चीज थी।”

 

“फिर ये कृष्ण ने आपको क्यों भेजी?”

 

सुदामा के पास इसका जवाब नहीं था।

 

उन्होंने पोटली में रखा छोटा-सा कागज उठाया।

 

कागज बहुत साधारण था।

 

उस पर बस कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।

 

सुदामा ने पढ़ना शुरू किया।

 

“मित्र, जो चीज तुम्हारे पास कभी थी, उसे मैंने इतने वर्षों से संभालकर रखा था। अब समय आ गया है कि वह तुम्हारे पास वापस आ जाए। लेकिन इसके साथ जुड़ी एक बात ऐसी है, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।”

 

सुदामा आगे पढ़ ही नहीं पाए।

 

उनके हाथ काँपने लगे।

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

सुदामा ने कागज उन्हें दे दिया।

 

उन्होंने भी पढ़ा।

 

दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

पत्नी ने पूछा,

 

“आखिर ऐसी कौन-सी बात है जो कृष्ण ने इतने साल छिपाकर रखी?”

 

सुदामा ने धीरे से कहा,

 

“मुझे नहीं पता।”

 

फिर उन्होंने कागज पलटा।

 

पीछे कुछ और लिखा था।

 

“जब तुम गुरुकुल से गए थे, उस दिन तुमने मुझसे एक बात कही थी। शायद तुम्हें वह याद भी न हो। लेकिन मैंने उसे कभी नहीं भुलाया।”

 

सुदामा अचानक उठकर खड़े हो गए।

 

“मैंने क्या कहा था?”

 

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

 

वह पुराने दिनों को याद करने लगे।

 

गुरुकुल से विदाई का दिन…

 

कृष्ण और सुदामा रास्ते के उस मोड़ पर खड़े थे जहाँ से दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे।

 

सुदामा ने तब कृष्ण से क्या कहा था?

 

बहुत सोचने के बाद उन्हें कुछ याद आया।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“मैंने कहा था…”

 

वह रुक गए।

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्या?”

 

सुदामा की आँखों में आँसू आ गए।

 

“मैंने कृष्ण से कहा था कि अगर कभी मेरी जिंदगी में ऐसा समय आए जब मैं अपने परिवार के लिए कुछ न कर पाऊँ… तो मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे कम से कम इतना जरूर जानें कि उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी।”

 

पत्नी चुप रह गईं।

 

सुदामा ने सिर झुका लिया।

 

“लेकिन मुझे नहीं लगता कि कृष्ण को वह बात याद होगी।”

 

तभी पीछे से उनके बेटे की आवाज आई,

 

“पिताजी, कृष्ण कौन हैं?”

 

सुदामा ने पलटकर बेटे को देखा।

 

उन्होंने उसे अपने पास बुलाया।

 

“कृष्ण मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं।”

 

बेटे ने पूछा,

 

“क्या वो वही हैं जिन्होंने हमारा घर दिया?”

 

सुदामा मुस्कुराए।

 

“हाँ।”

 

“तो क्या वो बहुत अच्छे हैं?”

 

सुदामा ने बिना सोचे कहा,

 

“बहुत अच्छे।”

 

बेटे ने फिर पूछा,

 

“क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?”

 

सुदामा कुछ पल चुप रहे।

 

फिर बोले,

 

“जरूर। कभी मौका मिला तो तुम्हें उनसे जरूर मिलवाऊँगा।”

 

उसी समय बाहर से आवाज आई।

 

“सुदामा जी!”

 

सुदामा बाहर आए।

 

वही आदमी खड़ा था जो पोटली लेकर आया था।

 

सुदामा ने पूछा,

 

“तुम कौन हो?”

 

उसने कहा,

 

“मैं द्वारका से आया हूँ।”

 

“लेकिन कृष्ण ने तुम्हें यहाँ क्यों भेजा?”

 

आदमी ने कहा,

 

“मुझे सिर्फ संदेश देने के लिए भेजा गया है।”

 

“कौन-सा संदेश?”

 

उसने कहा,

 

“कृष्ण ने कहा है कि अगर सुदामा पोटली खोल लें, तो उन्हें कहना कि वह उसमें रखी चीज को ध्यान से देखें।”

 

सुदामा ने वह चीज फिर हाथ में ली।

 

“इसमें ऐसा क्या है?”

 

आदमी ने कहा,

 

“मुझे नहीं पता।”

 

“तुम्हें कुछ भी नहीं बताया गया?”

 

“नहीं।”

 

सुदामा ने ध्यान से उस वस्तु को देखा।

 

वह बहुत पुरानी थी।

 

किनारे थोड़े घिस चुके थे।

 

लेकिन उस पर एक निशान बना हुआ था।

 

सुदामा ने निशान देखते ही उसे पहचान लिया।

 

“ये निशान…”

 

उनके चेहरे का रंग बदल गया।

 

आदमी ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

सुदामा ने तुरंत अंदर जाकर अपनी पुरानी संदूकची खोली।

 

उसमें उनके पास कुछ पुराने कपड़े और गुरुकुल की याद से जुड़ी छोटी-मोटी चीजें थीं।

 

उन्होंने उसमें से एक कपड़े में लिपटी चीज निकाली।

 

दोनों चीजों को पास रखकर देखा।

 

निशान बिल्कुल एक जैसा था।

 

सुदामा की साँस जैसे रुक गई।

 

“ये दोनों एक ही चीज का हिस्सा हैं।”

 

पत्नी ने पूछा,

 

“तो कृष्ण ने आपको इसका दूसरा हिस्सा भेजा है?”

 

सुदामा ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

अब रहस्य और गहरा हो चुका था।

 

कृष्ण ने वह चीज इतने साल संभालकर क्यों रखी?

 

और उसके दूसरे हिस्से को सुदामा के पास क्यों भेजा?

 

सुदामा ने तुरंत कागज उठाया और दोबारा पढ़ा।

 

इस बार नीचे एक और छोटी पंक्ति दिखाई दी, जो पहले उनकी नजर से छूट गई थी।

 

उन्होंने पढ़ा—

 

“जब समय सही होगा, तुम्हें समझ आएगा कि हमारी दोस्ती सिर्फ गुरुकुल की याद नहीं थी। उस दिन हमने एक वादा किया था… और वह वादा अभी पूरा होना बाकी है।”

 

सुदामा कुछ देर तक उस कागज को देखते रहे।

 

फिर उन्होंने धीरे से कहा,

 

“कृष्ण ने इतने साल बाद ये बात क्यों याद दिलाई?”

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्या आपको वह वादा याद है?”

 

सुदामा ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“तो फिर?”

 

सुदामा ने खिड़की से बाहर देखा।

 

“शायद कृष्ण चाहता है कि मैं खुद याद करूँ।”

 

उसी रात सुदामा सो नहीं पाए।

 

वह बार-बार उस पुरानी चीज को देखते रहे।

 

उन्हें गुरुकुल का हर छोटा-बड़ा पल याद आने लगा।

 

लेकिन वह वादा…

 

उन्हें कुछ भी याद नहीं आ रहा था।

 

आखिर आधी रात को उन्हें एक धुंधली-सी बात याद आई।

 

गुरुकुल के आखिरी दिन कृष्ण ने उनसे कहा था—

 

“सुदामा, एक दिन ऐसा आएगा जब हमारी जिंदगी बहुत बदल जाएगी।”

 

सुदामा ने तब हँसकर कहा था,

 

“तो क्या तुम मुझे भूल जाओगे?”

 

कृष्ण ने जवाब दिया था,

 

“अगर मैं तुम्हें भूल गया, तो मैं कृष्ण कैसे रहूँगा?”

 

सुदामा की आँखें भर आईं।

 

लेकिन उसके बाद क्या हुआ था?

 

उन्हें याद नहीं था।

 

अचानक उन्हें लगा कि शायद उस दिन की कोई बात उनके मन से जानबूझकर छूट गई है।

 

और अब कृष्ण ने वही पुराना राज फिर से उनके सामने रख दिया था।

 

सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

 

“कृष्ण… आखिर तुमने उस दिन मुझसे ऐसा क्या वादा किया था?”

 

दूर द्वारका में कृष्ण खिड़की के पास खड़े थे।

 

उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“अब समय आ गया है, सुदामा।”

 

“अब तुम्हें खुद याद करना होगा…”

 

क्रमशः…

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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