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एपिसोड 4: रुक्मिणी का प्रश्न – क्या प्रेमिका पत्नी से बड़ी होती है?

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

द्वारका का वह संध्याकाल अत्यंत शांत था। समुद्र की लहरें महल की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। आकाश में तारे धीरे-धीरे चमकने लगे थे। महल के भीतरी कक्ष में दीपक जल रहे थे। सोने के सिंहासन पर श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनके मुख पर वह शांत मुस्कान थी जो सदैव उनके चेहरे पर रहती थी। गले में वैजयन्ती माला और हाथ में बाँसुरी थी, पर वे बाँसुरी नहीं बजा रहे थे। बस समुद्र की ओर देखते हुए मौन बैठे थे।

 

रुक्मिणी देवी उस समय अपने कक्ष में थीं। पर उनका मन व्याकुल था। कई दिनों से उनके कानों में एक नाम बार-बार गूँज रहा था – राधा। दासी लोग बातें करतीं, सैनिक गोकुल की कथाएँ सुनाते, और कभी-कभी स्वयं कृष्ण भी किसी प्रसंग में ब्रज और राधा का नाम ले लेते। हर बार जब वह नाम आता, रुक्मिणी के हृदय में एक अजीब सा दर्द उठता। वे जानती थीं कि वे कृष्ण की धर्मपत्नी हैं, उनकी प्रधान रानी हैं, लक्ष्मी रूप हैं। फिर भी वह नाम… वह राधा नाम उनके मन को क्यों मथ देता था?

 

आज वे अधिक देर तक सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया, माथे पर चंदन का टीका लगाया और धीरे-धीरे कृष्ण के कक्ष की ओर चल दीं। द्वार पर पहुँचकर उन्होंने संकेत किया। कृष्ण ने दृष्टि उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “आओ रुक्मिणी। आज तुम्हारे मुख पर कुछ चिंता की रेखाएँ दिख रही हैं। क्या बात है?”

 

रुक्मिणी अंदर आईं। उन्होंने कृष्ण के चरणों में अपना सिर रख दिया। कृष्ण ने उन्हें उठाया और पास बिठाया। रुक्मिणी कुछ देर तक चुप रहीं। उनकी आँखों में अश्रु की रेखाएँ थीं, पर वे बह नहीं रहे थे। फिर उन्होंने धीरे से अपना सिर उठाया और कृष्ण की आँखों में आँखें डालकर कहा –

 

“स्वामी… मैं आपकी पत्नी हूँ। आपने मुझे कुंडिनपुर से उठाकर यहाँ लाया। आपने मुझे अपनी रानी बनाया। मैं आपके घर की लक्ष्मी हूँ। मैंने आपको अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। फिर भी… आपके हृदय में वह नाम क्यों बसा रहता है?”

 

कृष्ण शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस रुक्मिणी को देखते रहे।

 

रुक्मिणी की आवाज काँप उठी। वे आगे बोलीं, “राधा… वह राधा। ब्रज की वह गोपिका। मैंने सुना है कि आप उसके नाम से ही भर जाते हैं। कभी-कभी रात को जब आप बाँसुरी बजाते हैं तो उस धुन में भी वही नाम छिपा लगता है। स्वामी, मैं पूछना चाहती हूँ… क्या एक प्रेमिका का रिश्ता पत्नी से बड़ा होता है? क्या मेरा पतिधर्म, मेरा समर्पण, मेरा प्रेम… उस प्रेमिका के प्रेम से छोटा है?”

 

कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल समुद्र की लहरों की आवाज दूर से आ रही थी। कृष्ण ने धीरे से रुक्मिणी का हाथ अपने हाथ में लिया। उनके स्पर्श में वह वही ममता थी जो सदैव रहती थी। फिर वे बोले –

 

“रुक्मिणी, तुम्हारा प्रश्न केवल तुम्हारा नहीं है। यह प्रश्न उस हर आत्मा का है जो प्रेम के दो रूपों के बीच उलझ जाती है। तुम सुनो… मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ।”

 

कृष्ण की आवाज बहुत धीमी और गहरी थी। वे बोले, “राधा और तुम… दोनों मेरे जीवन के दो अलग-अलग अध्याय हो। तुम मेरी धर्मपत्नी हो। तुमने समाज के सामने मेरे साथ गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। तुमने मुझे पुत्र दिए। तुमने द्वारका के राज्य को लक्ष्मी का आशीर्वाद दिया। तुम्हारा प्रेम जिम्मेदारी से भरा है, कर्तव्य से भरा है, और त्याग से भरा है। जब मैं युद्ध पर जाता हूँ तो तुम मंदिर में बैठकर मेरी विजय की प्रार्थना करती हो। जब मैं लौटता हूँ तो पहले तुम्हारे चरण छूता हूँ। तुम मेरी अर्धांगिनी हो। यह सच है।”

 

रुक्मिणी की आँखों में आँसू आ गए। वे बोलीं, “फिर वह राधा क्या है स्वामी? वह आपके हृदय में क्यों बसती है?”

 

कृष्ण ने दृष्टि समुद्र की ओर कर ली। मानो वे दूर ब्रज को देख रहे हों। फिर बोले, “राधा… राधा प्रेम का वह रूप है जो किसी बंधन में नहीं बँधता। उसने मुझसे विवाह नहीं किया। उसने मुझसे कोई माँग नहीं की। उसने मुझसे राज्य नहीं माँगा, पुत्र नहीं माँगे, सुख नहीं माँगा। उसने केवल अपना हृदय दे दिया। जब मैं ब्रज छोड़कर आया तो वह रोई, पर उसने मुझे रोका नहीं। उसने कहा – ‘जाओ कान्हा, अपना धर्म निभाओ।’ जिस प्रेम में त्याग इतना गहरा हो कि वह अपने प्रिय को अपने पास बाँधने की इच्छा तक न करे… वह प्रेम साधारण नहीं होता।”

 

रुक्मिणी अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बोलीं, “तो क्या मेरा प्रेम छोटा है? क्या मैंने कम त्याग किया? मैंने अपने भाई को छोड़ा, अपने पिता का राज्य छोड़ा, सब कुछ छोड़कर आपके रथ पर बैठ गई। क्या वह त्याग कुछ नहीं?”

 

कृष्ण ने दोनों हाथों से रुक्मिणी के आँसू पोंछे। उनकी आवाज में अपार कोमलता थी। “नहीं मेरी रानी। तुम्हारा त्याग छोटा नहीं है। तुम्हारा प्रेम भी महान है। पर दोनों प्रेम की दिशा अलग है। तुम्हारा प्रेम जैसे नदी का है जो किनारे बाँधकर बहती है – सुंदर, जीवनदायिनी और स्थिर। राधा का प्रेम जैसे वर्षा का है जो आकाश से बिना किसी बाँध के बरसती है। वह जहाँ गिरती है वहाँ सब कुछ उगा देती है, पर खुद किसी खेत की सीमा में नहीं बँधती।”

 

कृष्ण थोड़ा रुके। फिर बोले, “रुक्मिणी, जब मैं बाँसुरी बजाता हूँ तो वह धुन ब्रज की याद दिलाती है। वह याद मुझे कमजोर नहीं करती। वह मुझे याद दिलाती है कि प्रेम कितना निर्मल हो सकता है। राधा ने मुझे सिखाया कि असली प्रेम वह है जिसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ नहीं होता। केवल ‘तुम’ होता है। तुमने मुझे सिखाया कि प्रेम जिम्मेदारी भी होता है, साथ निभाना भी होता है, और समाज के बीच धर्मपूर्वक रहना भी होता है। दोनों आवश्यक हैं।”

 

रुक्मिणी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें समझ की एक हल्की सी रोशनी भी थी। वे बोलीं, “स्वामी… क्या आप कभी राधा को भूल सकते हैं?”

 

कृष्ण ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं। जैसे मैं तुम्हें नहीं भूल सकता, वैसे ही उसे भी नहीं भूल सकता। पर भूलने और हृदय में स्थान देने में अंतर है। राधा मेरे हृदय के उस हिस्से में है जहाँ कोई दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता। वह हिस्सा केवल प्रेम के लिए है – निर्गुण, निराकार और अनंत। और तुम मेरे जीवन के उस हिस्से में हो जहाँ मैं पति हूँ, राजा हूँ और गृहस्थ हूँ। तुम मेरे दिन हो, राधा मेरी रात की स्मृति है। दोनों मिलकर ही मैं पूरा होता हूँ।”

 

रुक्मिणी अब शांत हो चली थीं। उन्होंने कृष्ण का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया और बोलीं, “मुझे ईर्ष्या होती थी स्वामी। मुझे लगता था कि मैं अधूरी हूँ। लगता था कि आपकी पत्नी होकर भी मैं आपकी सबसे प्रिय नहीं हूँ। पर अब समझ में आया… प्रेम की तुलना नहीं होती। नदी और वर्षा दोनों जल देते हैं, पर उनका ढंग अलग है।”

 

कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने रुक्मिणी को अपने वक्ष से लगा लिया। “ठीक कहा तुमने। तुलना करना ही सबसे बड़ा भ्रम है। तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण का वास अधूरा है। राधा मेरी भक्ति है। जहाँ भक्ति नहीं, वहाँ भगवान भी अधूरे हैं। तुम दोनों मिलकर मेरी लीला को पूर्ण करती हो।”

 

कक्ष में दीपक की लौ हिल रही थी। बाहर समुद्र और जोर से गरज रहा था। रुक्मिणी ने कृष्ण के गले में बाहें डाल दीं और बोलीं, “स्वामी, आज के बाद मैं राधा के नाम से नहीं डरसँगी। मैं उन्हें प्रणाम करूँगी। क्योंकि उन्होंने आपको वह प्रेम दिया जो मैं नहीं दे सकती थी। और मैं आपको वह साथ देती हूँ जो वे नहीं दे सकती थीं। दोनों जरूरी हैं।”

 

कृष्ण ने रुक्मिणी के माथे पर अपने होंठ रखे और बोले, “तुम सच्ची रानी हो रुक्मिणी। केवल द्वारका की नहीं, मेरे हृदय की भी। आज तुमने जो प्रश्न पूछा, उसने तुम्हें और महान बना दिया। ईर्ष्या से ऊपर उठकर समझ तक पहुँचना… यही तो सच्चा प्रेम है।”

 

दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई और शब्द नहीं बोला गया। केवल मौन था – वह मौन जिसमें सब कुछ कह दिया गया था। रुक्मिणी अब शांत थीं। उनके हृदय से वह काँटा निकल चुका था जो कई दिनों से चुभ रहा था। और कृष्ण… कृष्ण जानते थे कि उनकी पत्नी ने आज एक और सीढ़ी चढ़ ली है – प्रेम की उस सीढ़ी पर जहाँ केवल समझने वाले ही पहुँचते हैं।

 

रात गहराती गई। दीपक धीरे-धीरे बुझने लगे। पर उस कक्ष में एक नई रोशनी जल उठी थी – समझ की, स्वीकार की और गहरे प्रेम की।

 

रुक्मिणी ने अंतिम बार कहा, “स्वामी, अब आप बाँसुरी बजा सकते हैं। यदि उसमें राधा का नाम भी हो… तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि अब मैं जान गई हूँ कि वह नाम आपके हृदय का हिस्सा है, मेरे विरुद्ध नहीं।”

 

कृष्ण ने बाँसुरी उठाई। और उस रात द्वारका के महल में जो धुन निकली, उसमें ब्रज भी था, द्वारका भी था… राधा भी थीं, और रुक्मिणी भी थीं।

 

 

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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