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नंदलाल की मनमोहक बाल-लीलाएँ

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

(भाग 1 — गोकुल में नंदलाल का आगमन)

 

 

बहुत समय पहले की बात है। यमुना नदी के पवित्र तट के पास एक सुंदर-सा गाँव बसा हुआ था—गोकुल।

 

गोकुल कोई बहुत बड़ा नगर नहीं था, लेकिन उसकी सुंदरता ऐसी थी कि मानो स्वयं प्रकृति ने अपने हाथों से उसे सजाया हो। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, लताओं से ढकी हुई पगडंडियाँ, फूलों की सुगंध से महकती हवाएँ और यमुना जी की कल-कल करती धारा।

 

सुबह होते ही गोकुल में एक अलग ही जीवन दिखाई देता था।

 

कहीं गायों की घंटियाँ बजतीं, कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथतीं, कहीं बालक अपने मित्रों के साथ खेलते हुए गलियों में दौड़ते और कहीं ग्वाल अपने पशुओं को लेकर हरे-भरे मैदानों की ओर निकल जाते।

 

गोकुल के मुखिया थे—नंद बाबा।

 

नंद बाबा सरल हृदय, दयालु और धर्मात्मा थे। उनके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, उनके आँगन में असंख्य गायें थीं, परंतु उनके जीवन में एक कमी थी।

 

वह कमी थी—संतान की।

 

नंद बाबा और उनकी पत्नी यशोदा मैया के मन में एक ही इच्छा थी—

 

“काश! हमारे घर भी कोई बालक होता, जिसे हम अपनी गोद में खिलाते, जिसके नन्हे-नन्हे चरणों की आहट से हमारा आँगन गूँज उठता।”

 

यशोदा मैया जब कभी किसी अन्य माता को अपने बच्चे को गोद में खिलाते देखतीं, तो उनके हृदय में मातृत्व की लहर उठती।

 

वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करतीं—

 

“हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। न धन चाहिए, न वैभव। बस एक बार मुझे माँ कहकर पुकारने वाला कोई बालक दे दीजिए।”

 

नंद बाबा भी यशोदा की इस इच्छा को समझते थे।

 

वे उन्हें सांत्वना देते—

 

“यशोदा, धैर्य रखो। भगवान जब देंगे, तब ऐसा देंगे कि हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”

 

लेकिन उन्हें क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके घर आने वाले हैं।

 

—

 

कंस का अत्याचार

 

उधर मथुरा में राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था।

 

कंस अत्यंत शक्तिशाली था, परंतु उसके हृदय में दया का नाम तक नहीं था। वह अपने भय और अहंकार में इतना डूब गया था कि प्रजा उसके नाम से काँपती थी।

 

एक दिन कंस अपनी बहन देवकी के विवाह के बाद उसे और उसके पति वसुदेव को रथ में बैठाकर स्वयं विदा करने जा रहा था।

 

तभी आकाश में एक दिव्य वाणी गूँजी—

 

“हे कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी देवकी की आठवीं संतान तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

 

यह सुनते ही कंस के चेहरे का रंग बदल गया।

 

उसने तलवार निकाल ली और देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा।

 

वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

 

“हे कंस! तुम्हें देवकी से क्या भय है? आकाशवाणी ने केवल उसकी आठवीं संतान के विषय में कहा है। मैं तुम्हें उसकी प्रत्येक संतान तुम्हारे हाथों सौंप दूँगा।”

 

कंस ने वसुदेव की बात मान ली और दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

 

समय बीतता गया।

 

देवकी की एक-एक करके छह संतानों का जन्म हुआ और कंस ने निर्दयतापूर्वक उनका वध कर दिया।

 

सातवीं संतान के रूप में भगवान शेष के अंश बलराम जी प्रकट हुए, जिन्हें योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया।

 

अब आठवीं संतान का समय निकट आ चुका था।

 

मथुरा के कारागार में उस रात असाधारण शांति थी।

 

आकाश में बादल छाए हुए थे।

 

यमुना की धारा गंभीर होकर बह रही थी।

 

चारों ओर अंधकार था।

 

लेकिन उस अंधकार के भीतर एक ऐसी ज्योति जन्म लेने वाली थी, जो आने वाले युगों तक संसार को प्रकाशित करने वाली थी।

 

—

 

श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म

 

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात थी।

 

चारों ओर गहरा अंधकार था।

 

कारागार के भीतर देवकी और वसुदेव भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

 

तभी अचानक पूरा कारागार दिव्य प्रकाश से भर उठा।

 

देवकी ने देखा—उनके सामने एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ।

 

उस बालक के सिर पर मुकुट था, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।

 

देवकी और वसुदेव समझ गए—

 

स्वयं भगवान विष्णु उनके पुत्र के रूप में प्रकट हुए हैं।

 

वसुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—

 

“हे प्रभु! आप स्वयं हमारे सामने प्रकट हुए हैं। हम अत्यंत भाग्यशाली हैं।”

 

देवकी की आँखों से आँसू बहने लगे।

 

उन्होंने कहा—

 

“प्रभु! कंस को यदि आपके जन्म का पता चल गया तो वह आपको भी मारने का प्रयास करेगा। कृपा करके अपनी यह दिव्य छवि छिपा लीजिए।”

 

भगवान मुस्कुराए।

 

उन्होंने कहा—

 

“माता, मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में पृथ्वी पर आया हूँ। तुम चिंता मत करो। मुझे अभी गोकुल ले जाओ। वहाँ नंद बाबा के घर यशोदा के यहाँ एक कन्या जन्मी है। तुम मुझे वहाँ छोड़कर उस कन्या को यहाँ ले आना।”

 

इतना कहकर भगवान ने अपना दिव्य रूप त्याग दिया और एक साधारण नवजात शिशु के रूप में दिखाई देने लगे।

 

उसी क्षण कारागार के सभी द्वार अपने-आप खुल गए।

 

पहरेदार गहरी नींद में सो गए।

 

वसुदेव ने बालक को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।

 

वे कारागार से बाहर निकल पड़े।

 

—

 

यमुना की परीक्षा

 

बाहर भयंकर वर्षा हो रही थी।

 

बिजलियाँ चमक रही थीं।

 

वसुदेव जी बालक को लेकर यमुना की ओर बढ़ने लगे।

 

उनके मन में एक ही विचार था—

 

“मुझे किसी भी प्रकार इस बालक को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।”

 

जब वे यमुना जी के पास पहुँचे तो नदी उफान पर थी।

 

वसुदेव जी कुछ क्षण रुक गए।

 

लेकिन तभी उनके पीछे से एक दिव्य दृश्य दिखाई दिया।

 

शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर वसुदेव और बालक कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया।

 

तेज वर्षा होने के बाद भी बालक कृष्ण पर एक बूंद तक नहीं पड़ी।

 

वसुदेव जी यमुना में उतर गए।

 

यमुना का जल उनके कंधों तक पहुँचने लगा।

 

तभी यमुना जी ने जैसे अपने प्रियतम को पहचान लिया।

 

जल की एक लहर उठी और श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श कर गई।

 

मानो यमुना माता कह रही हों—

 

“प्रभु! इतने वर्षों से आपकी प्रतीक्षा थी। आज मेरे तट पर आपका आगमन हुआ है।”

 

वसुदेव जी सुरक्षित रूप से यमुना पार करके गोकुल पहुँच गए।

 

—

 

नंद भवन में आनंद

 

उस समय गोकुल में सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे।

 

नंद बाबा के घर भी एक बालिका का जन्म हुआ था।

 

योगमाया की शक्ति से सभी लोग निद्रा में थे।

 

वसुदेव जी ने देखा कि यशोदा मैया अपने शिशु के पास सो रही हैं।

 

उन्होंने धीरे से श्रीकृष्ण को वहाँ सुला दिया और वहाँ जन्मी कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।

 

उन्हें पता ही नहीं चला कि संसार का पालन करने वाला स्वयं उनके घर से होकर उनके घर को धन्य कर गया है।

 

वसुदेव जी वापस कारागार पहुँचे।

 

द्वार फिर अपने-आप बंद हो गए।

 

पहरेदार जाग गए।

 

और जैसे ही बालिका ने रोना आरंभ किया, कारागार में हलचल मच गई।

 

कंस को समाचार दिया गया—

 

“देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है।”

 

कंस तुरंत कारागार में पहुँचा।

 

उसने उस नवजात कन्या को उठाकर पत्थर पर पटकना चाहा।

 

लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

 

उसका रूप दिव्य हो गया।

 

उसने कहा—

 

“हे कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तेरा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है।”

 

यह कहकर वह देवी आकाश में विलीन हो गई।

 

कंस के चेहरे पर भय छा गया।

 

उधर गोकुल में किसी को कुछ पता नहीं था कि उनके बीच कौन आया है।

 

—

 

गोकुल में उत्सव

 

प्रातःकाल होते ही गोकुल में एक अद्भुत आनंद फैल गया।

 

यशोदा मैया की आँख खुली।

 

उन्होंने अपने पास एक सुंदर बालक को देखा।

 

बालक अत्यंत मनोहर था।

 

श्याम वर्ण, घुँघराले बाल, गुलाबी होंठ और बंद आँखों पर झुकी हुई लंबी पलकें।

 

यशोदा मैया कुछ क्षण तक उसे निहारती रह गईं।

 

फिर उनके हृदय में ऐसी ममता उमड़ी कि उन्होंने बालक को अपनी छाती से लगा लिया।

 

उनके मुख से अनायास निकला—

 

“मेरे लाल!”

 

जैसे ही यह समाचार गोकुल में फैला कि नंद बाबा के घर पुत्र हुआ है, पूरा गोकुल खुशी से झूम उठा।

 

गोपियाँ दौड़-दौड़कर नंद भवन आने लगीं।

 

कोई दही लेकर आई।

 

कोई माखन लेकर आई।

 

कोई शिशु के लिए सुंदर वस्त्र लेकर आई।

 

किसी ने कहा—

 

“अरे! नंद बाबा के घर तो चाँद उतर आया है!”

 

दूसरी गोपी बोली—

 

“नहीं-नहीं, चाँद तो आज फीका पड़ गया होगा। इतना सुंदर बालक उसने भी नहीं देखा होगा!”

 

तीसरी गोपी हँसते हुए बोली—

 

“देखना, यह बालक बड़ा होकर पूरे गोकुल की मटकी खाली कर देगा।”

 

तब किसे पता था कि उसकी यह बात एक दिन सच होने वाली है!

 

नंद बाबा तो आनंद से फूले नहीं समा रहे थे।

 

उन्होंने गोकुल के लोगों के लिए दान बाँटा।

 

गायों को सजाया गया।

 

घर-घर दीप जलाए गए।

 

ढोल और नगाड़े बजने लगे।

 

गोप और गोपियाँ नाचने लगे।

 

चारों ओर एक ही नाम गूँज रहा था—

 

“नंद के घर आनंद भयो!”

 

और उस दिन से वह नन्हा बालक सबके लिए बन गया—

 

नंदलाल।

 

—

 

पहली बार यशोदा ने कृष्ण को देखा

 

उत्सव समाप्त होने के बाद जब सब लोग चले गए, तब यशोदा मैया अपने लाल को लेकर अकेली बैठीं।

 

वे उसके छोटे-छोटे हाथों को देखतीं।

 

कभी उसके पैरों को चूमतीं।

 

कभी उसके माथे पर हाथ फेरतीं।

 

बालक कृष्ण ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।

 

उनकी आँखें इतनी सुंदर थीं कि यशोदा मैया उनमें खो गईं।

 

उन्होंने प्रेम से पूछा—

 

“लाला! तू कहाँ से आया है?”

 

बालक मुस्कुराया।

 

यशोदा मैया हँस पड़ीं।

 

“अच्छा! अभी से मुझसे बातें करेगा?”

 

उन्होंने उसे अपनी गोद में उठाया और धीरे-धीरे झुलाने लगीं।

 

उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वह अपनी गोद में झुला रही हैं, उसी के चरणों में अनंत ब्रह्मांड झूलते हैं।

 

जिसे वे अपना पुत्र समझकर दुलार रही हैं, वही समस्त संसार का पालनकर्ता है।

 

परंतु भगवान को भी तो यही चाहिए था।

 

उन्हें वैकुंठ का वैभव नहीं चाहिए था।

 

उन्हें चाहिए था—

 

माँ का प्रेम।

 

इसीलिए तो वे गोकुल आए थे।

 

—

 

गोकुल क्यों बना भगवान का घर?

 

भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल को इसलिए चुना क्योंकि वहाँ प्रेम था।

 

वहाँ छल नहीं था।

 

वहाँ अहंकार नहीं था।

 

वहाँ लोग भगवान को किसी स्वार्थ से नहीं, प्रेम से चाहते थे।

 

यशोदा के लिए कृष्ण भगवान नहीं थे।

 

वे उनके लाला थे।

 

नंद बाबा के लिए वे संसार के स्वामी नहीं थे।

 

वे उनके कन्हैया थे।

 

गोपियों के लिए वे कोई महान देवता नहीं थे।

 

वे उनके गोकुल के नटखट बालक थे।

 

और यही कृष्ण की सबसे सुंदर लीला थी—

 

भगवान होकर भी भक्तों के प्रेम के वश में हो जाना।

 

गोकुल की गलियों में अब एक नई चहल-पहल थी।

 

हर घर में कृष्ण की चर्चा होने लगी।

 

किसी को उनके सुंदर मुख की चिंता थी।

 

किसी को उनकी मुस्कान की।

 

कोई कहता—

 

“नंदलाल बहुत सुंदर हैं।”

 

कोई कहता—

 

“इनकी आँखें तो कमल जैसी हैं।”

 

और कोई हँसकर कहता—

 

“अभी से इतना सुंदर है, बड़ा होकर जाने कितनी गोपियों की मटकी फोड़ेगा!”

 

सभी हँस पड़ते।

 

लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही नन्हा बालक गोकुल की गलियों में ऐसी-ऐसी लीलाएँ करने वाला है कि लोग अपनी सारी चिंताएँ भूल जाएँगे।

 

वह कभी माखन चुराएगा।

 

कभी गोपियों को सताएगा।

 

कभी यशोदा मैया से डाँट खाएगा।

 

कभी ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने जाएगा।

 

और कभी अपनी छोटी-सी मुस्कान से पूरे ब्रज को मोहित कर देगा।

 

लेकिन अभी तो वह केवल एक नन्हा शिशु था।

 

यशोदा मैया की गोद में सोया हुआ।

 

उनकी उँगली पकड़े हुए।

 

और बाहर गोकुल की गलियों में गूँज रहा था—

 

“जय कन्हैया लाल की!”

 

यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं।

 

गायें रंभा रही थीं।

 

वृक्षों पर पक्षी मधुर स्वर में चहक रहे थे।

 

मानो पूरी प्रकृति स्वयं कह रही हो—

 

“गोकुल धन्य हो गया।”

 

और सचमुच उस दिन से गोकुल केवल एक गाँव नहीं रहा।

 

वह बन गया—

 

श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की पवित्र भूमि।

 

जहाँ भगवान ने ईश्वर बनकर नहीं,

एक नटखट बालक बनकर जीवन जिया।

 

जहाँ भक्तों ने उन्हें पूजा नहीं,

उन्हें प्रेम किया।

 

और जहाँ एक माँ ने संसार के स्वामी को अपनी गोद में लेकर कहा—

 

“सो जा मेरे लाल… मेरी आँखों के तारे, मेरे कान्हा।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

और उस मुस्कान में जैसे पूरा ब्रह्मांड समा गया।

 

यहीं से आरंभ होती है नंदलाल की अद्भुत बाल-लीलाओं की कथा…

 

लेकिन गोकुल को अभी कहाँ पता था कि उसके आँगन में आया यह नन्हा-सा बालक शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला है, जिससे एक भयानक राक्षसी का अंत होगा और पूरे ब्रज को पहली बार अपने कान्हा की दिव्यता का आभास होगा…|

 

 

Continue…. ✍️✍️(Story pasand are to comment jarur de🙏)

 

 

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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