अध्याय 5 — गुरुकुल से विदाई और दो राहों का सफर
समय किसी के लिए नहीं रुकता।
गुरु सांदीपनि के आश्रम में बिताए हुए दिन कब बीत गए, कृष्ण और सुदामा को स्वयं भी पता नहीं चला। कभी जो दोनों बालक पहली बार आश्रम में मिले थे, अब वे युवावस्था की ओर बढ़ चुके थे।
उनके पास यादों का एक पूरा संसार था।
कभी साथ मिलकर नदी से जल लाना, कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करना, कभी गुरु माता के लिए काम करना, तो कभी रात को देर तक बैठकर जीवन और भविष्य के बारे में बातें करना।
लेकिन अब उन दिनों के समाप्त होने का समय आ गया था।
उस सुबह आश्रम का वातावरण कुछ अलग था।
सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए थे। कई लोगों के चेहरों पर खुशी थी कि उनकी शिक्षा पूरी होने वाली है, लेकिन कुछ की आँखों में अपने आश्रम को छोड़ने का दुख भी था।
कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठे थे।
सुदामा चुप था।
कृष्ण ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “आज तुम बहुत शांत हो।”
सुदामा ने बिना उनकी ओर देखे कहा, “आज तुम भी बहुत ज्यादा बातें नहीं कर रहे।”
कृष्ण हल्का सा मुस्कुराए।
“तो तुम्हें पता है कि मैं भी समझ रहा हूँ।”
सुदामा ने उनकी ओर देखा।
“क्या?”
“कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है।”
सुदामा ने कुछ नहीं कहा।
तभी गुरु सांदीपनि की आवाज गूँजी।
“मेरे प्रिय शिष्यों।”
सभी शांत हो गए।
गुरु सांदीपनि ने एक-एक करके अपने सामने बैठे शिष्यों को देखा।
“जब तुम इस आश्रम में आए थे, तब तुममें से अधिकांश बच्चे थे। तुम यहाँ ज्ञान पाने आए थे। लेकिन आज मैं तुम्हें देखकर केवल अपने शिष्य नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य देख रहा हूँ जो जीवन की राह पर चलने के लिए तैयार हैं।”
सभी शिष्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।
“याद रखना, शिक्षा का अंत किसी आश्रम से विदा लेने पर नहीं होता। असली शिक्षा तो उसके बाद शुरू होती है, जब जीवन तुम्हारी परीक्षा लेता है।”
सुदामा ने सिर झुका लिया।
गुरु की बातें उसके मन को छू रही थीं।
गुरु आगे बोले, “जीवन में तुम्हें सुख भी मिलेगा और दुख भी। सम्मान भी मिलेगा और अपमान भी। कभी तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा और कभी बहुत कम। लेकिन किसी भी परिस्थिति को अपने मन से बड़ा मत होने देना।”
फिर उन्होंने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया।
“जाओ और अपने ज्ञान से केवल अपना नहीं, दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाने का प्रयास करो।”
शिष्यों ने एक साथ गुरु के चरणों में प्रणाम किया।
अब विदाई का समय सचमुच आ चुका था।
सभी शिष्य अपने-अपने सामान को समेटने लगे।
किसी के पास अधिक सामान था, किसी के पास कम।
सुदामा के पास हमेशा की तरह एक छोटा सा कपड़े का थैला था।
वह उसे उठाकर कुछ देर तक देखता रहा।
कृष्ण उसके पास आए।
“चलो?”
सुदामा ने धीरे से कहा, “इतनी जल्दी?”
कृष्ण ने चारों ओर देखा।
“समय जल्दी नहीं जा रहा, सुदामा। हम बस उसे रोक नहीं सकते।”
सुदामा की आँखें नम हो गईं।
“मैंने सोचा था कि यह दिन बहुत दूर है।”
कृष्ण ने कहा, “मैंने भी।”
दोनों कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने वर्ष बिताए थे।
फिर गुरु माता उनके पास आईं।
उन्होंने सबसे पहले सुदामा को अपने पास बुलाया।
सुदामा ने उनके चरण छुए।
गुरु माता ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुम हमेशा शांत और सरल रहे हो, पुत्र। जीवन चाहे तुम्हें कितनी भी कठिनाइयाँ दे, अपने मन की सच्चाई मत खोना।”
सुदामा की आँखें भर आईं।
“माता, आपने मुझे माँ जैसा प्रेम दिया।”
गुरु माता मुस्कुराईं।
“तो फिर मुझे भूलना मत।”
सुदामा ने तुरंत कहा, “कभी नहीं।”
फिर कृष्ण उनके चरणों में झुके।
गुरु माता ने उन्हें देखते हुए कहा, “और तुम…”
कृष्ण मुस्कुराए।
“मैं क्या, माता?”
गुरु माता ने कहा, “तुम्हारी मुस्कान कभी खत्म नहीं होगी, यह मुझे पता है। लेकिन याद रखना, जहाँ भी जाओ, लोगों के जीवन में वही प्रेम बाँटना जो तुमने इस आश्रम में बाँटा है।”
कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा।”
गुरु माता ने दोनों मित्रों को एक साथ देखा।
उनकी आँखों में भी भावनाएँ थीं।
“तुम दोनों की मित्रता ऐसी ही बनी रहे।”
सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “यह तो बनी ही रहेगी।”
लेकिन अब सबसे कठिन क्षण आने वाला था।
दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना था।
सुदामा को अपने गाँव लौटना था।
वहीं कृष्ण को अपने परिवार और अपने जीवन की राह की ओर बढ़ना था।
आश्रम से बाहर निकलते ही रास्ता दो दिशाओं में बँट जाता था।
एक रास्ता सुदामा के गाँव की ओर जाता था।
दूसरा रास्ता कृष्ण की यात्रा की ओर।
दोनों धीरे-धीरे उस मोड़ तक पहुँचे।
सुदामा के कदम भारी होते जा रहे थे।
वह बार-बार कुछ कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में ही रुक जाते।
आखिरकार वह रुक गया।
कृष्ण भी रुक गए।
दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।
सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “तो… अब हमें जाना होगा?”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।
उसने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
कृष्ण ने कहा, “सुदामा।”
“हूँ?”
“मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?”
सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे रोते हुए देखो।”
कृष्ण उसके पास आए।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे हँसते हुए याद रखो।”
कृष्ण की मुस्कान हल्की हो गई।
“मैं तुम्हें वैसे ही याद रखूँगा जैसे तुम हो।”
सुदामा की आँखें फिर भर आईं।
उसने कहा, “कृष्ण, तुम कहाँ जाओगे? तुम्हारा जीवन कैसा होगा? क्या मैं कभी तुम्हें फिर देख पाऊँगा?”
कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।
फिर बोले, “जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, यह मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। लेकिन एक बात जानता हूँ।”
“क्या?”
“अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए सच्ची मित्रता रहेगी, तो तुम मुझे कभी खो नहीं सकते।”
सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें ढूँढूँगा कहाँ?”
कृष्ण ने अपने हृदय पर हाथ रखा।
“यहाँ।”
सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“कृष्ण…”
कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“और जब भी जीवन में तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”
सुदामा ने कहा, “तुम वादा करो कि अगर मैं तुम्हारे पास कभी आऊँ तो तुम मुझे पहचानोगे।”
कृष्ण ने तुरंत कहा, “क्या तुम सच में सोचते हो कि मैं अपने मित्र को नहीं पहचानूँगा?”
सुदामा चुप हो गया।
कृष्ण ने आगे कहा, “समय हमारे वस्त्र बदल सकता है, हमारे बाल बदल सकता है, हमारे घर और जीवन बदल सकता है। लेकिन सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”
सुदामा ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।
“तो फिर एक बात और वादा करो।”
“कहो।”
“हमारी मित्रता कभी नहीं बदलेगी।”
कृष्ण ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।
“मित्रता बदलने वाली चीज नहीं होती, सुदामा। अगर वह बदल जाए तो शायद वह सच्ची मित्रता थी ही नहीं।”
दोनों कुछ देर तक चुप रहे।
फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “अब चलो।”
सुदामा का मन नहीं मान रहा था।
लेकिन वह जानता था कि अब रुकना संभव नहीं था।
उसने कृष्ण को गले लगा लिया।
दोनों मित्र कुछ क्षण तक वैसे ही खड़े रहे।
उनके बीच कोई शब्द नहीं थे।
लेकिन उस मौन में वर्षों की यादें थीं।
आश्रम था।
गुरु माता थीं।
जंगल की बारिश थी।
साथ बाँटा हुआ भोजन था।
हँसी थी।
छोटी-छोटी बहसें थीं।
और एक ऐसी मित्रता थी, जिसे दोनों अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानते थे।
कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।
सुदामा ने आँसू पोंछे।
“फिर मिलेंगे।”
कृष्ण ने कहा, “जरूर मिलेंगे।”
सुदामा ने एक बार फिर कृष्ण को देखा।
फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।
कृष्ण भी दूसरी दिशा में आगे बढ़ गए।
सुदामा कुछ दूर चला।
लेकिन उसके कदम रुक गए।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
कृष्ण भी पीछे मुड़कर उसे देख रहे थे।
दोनों मुस्कुराए।
फिर धीरे-धीरे वे अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए।
समय बीतने लगा।
सुदामा अपने गाँव पहुँचा।
उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।
वह पहले से अधिक समझदार हो चुका था।
उसने अपने घर के साधारण जीवन को अपनाया।
वह लोगों को ज्ञान देता, बच्चों को पढ़ाता और अपने जीवन को सरलता से जीने का प्रयास करता।
लेकिन हर शाम…
जब वह अकेला बैठता…
उसे कृष्ण की याद आती।
कभी किसी बात पर मुस्कान आ जाती।
कभी आँखें नम हो जातीं।
वह सोचता—
कृष्ण कहाँ होंगे?
क्या वह मुझे याद करते होंगे?
उधर कृष्ण का जीवन भी तेजी से बदल रहा था।
उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियाँ आने वाली थीं।
जीवन उन्हें कई नए संघर्षों की ओर ले जाने वाला था।
लेकिन समय की तेज रफ्तार में भी कुछ रिश्ते पीछे नहीं छूटते।
कृष्ण के मन में भी सुदामा की याद हमेशा बनी रही।
वर्ष बीत गए।
दोनों मित्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ते गए।
लेकिन उनके जीवन एक जैसे नहीं थे।
एक ओर कृष्ण का जीवन धीरे-धीरे महान जिम्मेदारियों और राजसी वैभव की ओर बढ़ रहा था।
दूसरी ओर सुदामा का जीवन सादगी और संघर्षों से भरा था।
फिर भी…
एक समय था जब दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।
वे बस दो मित्र थे।
दो बालक।
जो बारिश में भीगते हुए साथ खड़े रहते थे।
जो थोड़ा सा भोजन भी बाँटकर खाते थे।
जो एक-दूसरे के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं करते थे।
लेकिन अब जीवन उन्हें एक ऐसी दूरी तक ले जा चुका था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
और बहुत जल्द…
वह समय आने वाला था जब सुदामा का जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा।
उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जब उसे अपने पुराने मित्र कृष्ण की याद पहले से भी अधिक आएगी।
लेकिन क्या सुदामा इतने वर्षों बाद कृष्ण के पास जा पाएगा?
क्या वह अपने पुराने मित्र को वैसे ही पा सकेगा?
या समय और परिस्थितियाँ उनके बीच इतनी दूरी बना चुकी होंगी कि मिलना केवल एक सपना रह जाएगा?
इन सवालों का जवाब अभी भविष्य के पास था।
लेकिन एक बात निश्चित थी—
उनकी मित्रता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।
असल में…
उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।
क्रमशः…
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