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  • Part 5 गुरुकुल से विदाई

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    अध्याय 5 — गुरुकुल से विदाई और दो राहों का सफर

     

    समय किसी के लिए नहीं रुकता।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में बिताए हुए दिन कब बीत गए, कृष्ण और सुदामा को स्वयं भी पता नहीं चला। कभी जो दोनों बालक पहली बार आश्रम में मिले थे, अब वे युवावस्था की ओर बढ़ चुके थे।

     

    उनके पास यादों का एक पूरा संसार था।

     

    कभी साथ मिलकर नदी से जल लाना, कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करना, कभी गुरु माता के लिए काम करना, तो कभी रात को देर तक बैठकर जीवन और भविष्य के बारे में बातें करना।

     

    लेकिन अब उन दिनों के समाप्त होने का समय आ गया था।

     

    उस सुबह आश्रम का वातावरण कुछ अलग था।

     

    सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए थे। कई लोगों के चेहरों पर खुशी थी कि उनकी शिक्षा पूरी होने वाली है, लेकिन कुछ की आँखों में अपने आश्रम को छोड़ने का दुख भी था।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठे थे।

     

    सुदामा चुप था।

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा, “आज तुम बहुत शांत हो।”

     

    सुदामा ने बिना उनकी ओर देखे कहा, “आज तुम भी बहुत ज्यादा बातें नहीं कर रहे।”

     

    कृष्ण हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तो तुम्हें पता है कि मैं भी समझ रहा हूँ।”

     

    सुदामा ने उनकी ओर देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है।”

     

    सुदामा ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी गुरु सांदीपनि की आवाज गूँजी।

     

    “मेरे प्रिय शिष्यों।”

     

    सभी शांत हो गए।

     

    गुरु सांदीपनि ने एक-एक करके अपने सामने बैठे शिष्यों को देखा।

     

    “जब तुम इस आश्रम में आए थे, तब तुममें से अधिकांश बच्चे थे। तुम यहाँ ज्ञान पाने आए थे। लेकिन आज मैं तुम्हें देखकर केवल अपने शिष्य नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य देख रहा हूँ जो जीवन की राह पर चलने के लिए तैयार हैं।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    “याद रखना, शिक्षा का अंत किसी आश्रम से विदा लेने पर नहीं होता। असली शिक्षा तो उसके बाद शुरू होती है, जब जीवन तुम्हारी परीक्षा लेता है।”

     

    सुदामा ने सिर झुका लिया।

     

    गुरु की बातें उसके मन को छू रही थीं।

     

    गुरु आगे बोले, “जीवन में तुम्हें सुख भी मिलेगा और दुख भी। सम्मान भी मिलेगा और अपमान भी। कभी तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा और कभी बहुत कम। लेकिन किसी भी परिस्थिति को अपने मन से बड़ा मत होने देना।”

     

    फिर उन्होंने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ और अपने ज्ञान से केवल अपना नहीं, दूसरों का जीवन भी बेहतर बनाने का प्रयास करो।”

     

    शिष्यों ने एक साथ गुरु के चरणों में प्रणाम किया।

     

    अब विदाई का समय सचमुच आ चुका था।

     

    सभी शिष्य अपने-अपने सामान को समेटने लगे।

     

    किसी के पास अधिक सामान था, किसी के पास कम।

     

    सुदामा के पास हमेशा की तरह एक छोटा सा कपड़े का थैला था।

     

    वह उसे उठाकर कुछ देर तक देखता रहा।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “चलो?”

     

    सुदामा ने धीरे से कहा, “इतनी जल्दी?”

     

    कृष्ण ने चारों ओर देखा।

     

    “समय जल्दी नहीं जा रहा, सुदामा। हम बस उसे रोक नहीं सकते।”

     

    सुदामा की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैंने सोचा था कि यह दिन बहुत दूर है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “मैंने भी।”

     

    दोनों कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने वर्ष बिताए थे।

     

    फिर गुरु माता उनके पास आईं।

     

    उन्होंने सबसे पहले सुदामा को अपने पास बुलाया।

     

    सुदामा ने उनके चरण छुए।

     

    गुरु माता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम हमेशा शांत और सरल रहे हो, पुत्र। जीवन चाहे तुम्हें कितनी भी कठिनाइयाँ दे, अपने मन की सच्चाई मत खोना।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “माता, आपने मुझे माँ जैसा प्रेम दिया।”

     

    गुरु माता मुस्कुराईं।

     

    “तो फिर मुझे भूलना मत।”

     

    सुदामा ने तुरंत कहा, “कभी नहीं।”

     

    फिर कृष्ण उनके चरणों में झुके।

     

    गुरु माता ने उन्हें देखते हुए कहा, “और तुम…”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं क्या, माता?”

     

    गुरु माता ने कहा, “तुम्हारी मुस्कान कभी खत्म नहीं होगी, यह मुझे पता है। लेकिन याद रखना, जहाँ भी जाओ, लोगों के जीवन में वही प्रेम बाँटना जो तुमने इस आश्रम में बाँटा है।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा।”

     

    गुरु माता ने दोनों मित्रों को एक साथ देखा।

     

    उनकी आँखों में भी भावनाएँ थीं।

     

    “तुम दोनों की मित्रता ऐसी ही बनी रहे।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “यह तो बनी ही रहेगी।”

     

    लेकिन अब सबसे कठिन क्षण आने वाला था।

     

    दोनों को अलग-अलग दिशाओं में जाना था।

     

    सुदामा को अपने गाँव लौटना था।

     

    वहीं कृष्ण को अपने परिवार और अपने जीवन की राह की ओर बढ़ना था।

     

    आश्रम से बाहर निकलते ही रास्ता दो दिशाओं में बँट जाता था।

     

    एक रास्ता सुदामा के गाँव की ओर जाता था।

     

    दूसरा रास्ता कृष्ण की यात्रा की ओर।

     

    दोनों धीरे-धीरे उस मोड़ तक पहुँचे।

     

    सुदामा के कदम भारी होते जा रहे थे।

     

    वह बार-बार कुछ कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में ही रुक जाते।

     

    आखिरकार वह रुक गया।

     

    कृष्ण भी रुक गए।

     

    दोनों कुछ क्षण तक एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    सुदामा ने धीमी आवाज में कहा, “तो… अब हमें जाना होगा?”

     

    कृष्ण ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    उसने जल्दी से अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    कृष्ण ने कहा, “सुदामा।”

     

    “हूँ?”

     

    “मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे हो?”

     

    सुदामा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे रोते हुए देखो।”

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे हँसते हुए याद रखो।”

     

    कृष्ण की मुस्कान हल्की हो गई।

     

    “मैं तुम्हें वैसे ही याद रखूँगा जैसे तुम हो।”

     

    सुदामा की आँखें फिर भर आईं।

     

    उसने कहा, “कृष्ण, तुम कहाँ जाओगे? तुम्हारा जीवन कैसा होगा? क्या मैं कभी तुम्हें फिर देख पाऊँगा?”

     

    कृष्ण कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर बोले, “जीवन हमें कहाँ ले जाएगा, यह मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। लेकिन एक बात जानता हूँ।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर तुम्हारे मन में मेरे लिए सच्ची मित्रता रहेगी, तो तुम मुझे कभी खो नहीं सकते।”

     

    सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें ढूँढूँगा कहाँ?”

     

    कृष्ण ने अपने हृदय पर हाथ रखा।

     

    “यहाँ।”

     

    सुदामा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “कृष्ण…”

     

    कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “और जब भी जीवन में तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

     

    सुदामा ने कहा, “तुम वादा करो कि अगर मैं तुम्हारे पास कभी आऊँ तो तुम मुझे पहचानोगे।”

     

    कृष्ण ने तुरंत कहा, “क्या तुम सच में सोचते हो कि मैं अपने मित्र को नहीं पहचानूँगा?”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने आगे कहा, “समय हमारे वस्त्र बदल सकता है, हमारे बाल बदल सकता है, हमारे घर और जीवन बदल सकता है। लेकिन सच्चे मित्र की पहचान चेहरे से नहीं, दिल से होती है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो फिर एक बात और वादा करो।”

     

    “कहो।”

     

    “हमारी मित्रता कभी नहीं बदलेगी।”

     

    कृष्ण ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया।

     

    “मित्रता बदलने वाली चीज नहीं होती, सुदामा। अगर वह बदल जाए तो शायद वह सच्ची मित्रता थी ही नहीं।”

     

    दोनों कुछ देर तक चुप रहे।

     

    फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “अब चलो।”

     

    सुदामा का मन नहीं मान रहा था।

     

    लेकिन वह जानता था कि अब रुकना संभव नहीं था।

     

    उसने कृष्ण को गले लगा लिया।

     

    दोनों मित्र कुछ क्षण तक वैसे ही खड़े रहे।

     

    उनके बीच कोई शब्द नहीं थे।

     

    लेकिन उस मौन में वर्षों की यादें थीं।

     

    आश्रम था।

     

    गुरु माता थीं।

     

    जंगल की बारिश थी।

     

    साथ बाँटा हुआ भोजन था।

     

    हँसी थी।

     

    छोटी-छोटी बहसें थीं।

     

    और एक ऐसी मित्रता थी, जिसे दोनों अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानते थे।

     

    कुछ देर बाद दोनों अलग हुए।

     

    सुदामा ने आँसू पोंछे।

     

    “फिर मिलेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “जरूर मिलेंगे।”

     

    सुदामा ने एक बार फिर कृष्ण को देखा।

     

    फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    कृष्ण भी दूसरी दिशा में आगे बढ़ गए।

     

    सुदामा कुछ दूर चला।

     

    लेकिन उसके कदम रुक गए।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कृष्ण भी पीछे मुड़कर उसे देख रहे थे।

     

    दोनों मुस्कुराए।

     

    फिर धीरे-धीरे वे अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ गए।

     

    समय बीतने लगा।

     

    सुदामा अपने गाँव पहुँचा।

     

    उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।

     

    वह पहले से अधिक समझदार हो चुका था।

     

    उसने अपने घर के साधारण जीवन को अपनाया।

     

    वह लोगों को ज्ञान देता, बच्चों को पढ़ाता और अपने जीवन को सरलता से जीने का प्रयास करता।

     

    लेकिन हर शाम…

     

    जब वह अकेला बैठता…

     

    उसे कृष्ण की याद आती।

     

    कभी किसी बात पर मुस्कान आ जाती।

     

    कभी आँखें नम हो जातीं।

     

    वह सोचता—

     

    कृष्ण कहाँ होंगे?

     

    क्या वह मुझे याद करते होंगे?

     

    उधर कृष्ण का जीवन भी तेजी से बदल रहा था।

     

    उनके सामने बड़ी जिम्मेदारियाँ आने वाली थीं।

     

    जीवन उन्हें कई नए संघर्षों की ओर ले जाने वाला था।

     

    लेकिन समय की तेज रफ्तार में भी कुछ रिश्ते पीछे नहीं छूटते।

     

    कृष्ण के मन में भी सुदामा की याद हमेशा बनी रही।

     

    वर्ष बीत गए।

     

    दोनों मित्र अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन उनके जीवन एक जैसे नहीं थे।

     

    एक ओर कृष्ण का जीवन धीरे-धीरे महान जिम्मेदारियों और राजसी वैभव की ओर बढ़ रहा था।

     

    दूसरी ओर सुदामा का जीवन सादगी और संघर्षों से भरा था।

     

    फिर भी…

     

    एक समय था जब दोनों के बीच कोई अंतर नहीं था।

     

    वे बस दो मित्र थे।

     

    दो बालक।

     

    जो बारिश में भीगते हुए साथ खड़े रहते थे।

     

    जो थोड़ा सा भोजन भी बाँटकर खाते थे।

     

    जो एक-दूसरे के बिना अपने दिन की कल्पना भी नहीं करते थे।

     

    लेकिन अब जीवन उन्हें एक ऐसी दूरी तक ले जा चुका था, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    और बहुत जल्द…

     

    वह समय आने वाला था जब सुदामा का जीवन कठिनाइयों से भर जाएगा।

     

    उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आएँगी, जब उसे अपने पुराने मित्र कृष्ण की याद पहले से भी अधिक आएगी।

     

    लेकिन क्या सुदामा इतने वर्षों बाद कृष्ण के पास जा पाएगा?

     

    क्या वह अपने पुराने मित्र को वैसे ही पा सकेगा?

     

    या समय और परिस्थितियाँ उनके बीच इतनी दूरी बना चुकी होंगी कि मिलना केवल एक सपना रह जाएगा?

     

    इन सवालों का जवाब अभी भविष्य के पास था।

     

    लेकिन एक बात निश्चित थी—

     

    उनकी मित्रता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

     

    असल में…

     

    उनकी मित्रता की सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Part 4 गुरुकुल की अंतिम परीक्षा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    श्री कृष्ण और सुदामा — अटूट मित्रता की कहानी

    अध्याय 4 — गुरुकुल की अंतिम परीक्षा और बिछड़ने का डर

     

    समय धीरे-धीरे बीत रहा था।

     

    गुरु सांदीपनि के आश्रम में आए हुए कृष्ण और सुदामा को कई वर्ष बीत चुके थे। जो दो बालक पहली बार एक-दूसरे से मिले थे, अब बड़े हो रहे थे। उनकी समझ बढ़ चुकी थी, उनके विचार बदल रहे थे, लेकिन एक चीज बिल्कुल नहीं बदली थी—उनकी मित्रता।

     

    हर सुबह दोनों साथ उठते।

     

    नदी तक जाते।

     

    आश्रम के कार्य करते।

     

    गुरु के सामने बैठकर शिक्षा प्राप्त करते।

     

    और शाम होते ही दिनभर की बातें करते हुए एक-दूसरे के पास बैठ जाते।

     

    लेकिन अब आश्रम का वातावरण थोड़ा बदलने लगा था।

     

    कई शिष्यों की शिक्षा पूरी हो चुकी थी और वे अपने घर लौटने लगे थे।

     

    जब भी कोई शिष्य गुरु सांदीपनि और गुरु माता का आशीर्वाद लेकर आश्रम से विदा होता, सुदामा उसे चुपचाप देखता रहता।

     

    एक दिन कृष्ण ने उससे पूछा, “तुम इतने शांत क्यों हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा यह ‘कुछ नहीं’ हमेशा बहुत कुछ होता है।”

     

    सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें सब पता चल जाता है।”

     

    “क्योंकि तुम मेरे मित्र हो।”

     

    कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने सामने जाते हुए एक शिष्य को देखा और धीरे से कहा, “कृष्ण, एक दिन हमें भी जाना होगा ना?”

     

    कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

     

    सुदामा आगे बोला, “एक दिन हमारी शिक्षा भी पूरी होगी। फिर तुम अपने घर चले जाओगे और मैं अपने घर।”

     

    कृष्ण ने कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    सुदामा ने कहा, “तुम्हें कभी इस बात का डर नहीं लगता?”

     

    कृष्ण ने शांत स्वर में कहा, “डर लगता है।”

     

    सुदामा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें?”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “मैं भी तुम्हारी तरह ही हूँ।”

     

    सुदामा हँस पड़ा।

     

    “नहीं, तुम मेरी तरह बिल्कुल नहीं हो।”

     

    कृष्ण ने कहा, “ठीक है, लेकिन मित्र को खोने का डर मुझे भी होता है।”

     

    सुदामा का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “तो फिर क्या होगा?”

     

    कृष्ण ने पूछा, “किसका?”

     

    “हमारी मित्रता का।”

     

    कृष्ण ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “क्या तुम रोज सूरज को देखते हो?”

     

    “हाँ।”

     

    “और रात को?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर भी तुम्हें विश्वास होता है कि सुबह सूरज वापस आएगा?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    कृष्ण बोले, “मित्रता भी ऐसी ही होती है। कभी-कभी जीवन की रात हमें अलग कर देती है, लेकिन सच्चा प्रेम फिर भी मन में बना रहता है।”

     

    सुदामा कुछ देर तक कृष्ण की बात सोचता रहा।

     

    उसने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें रोज देखना चाहता हूँ।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए।

     

    “तो मेरी यादों को अपने पास रखना।”

     

    “और अगर यादें कम पड़ गईं तो?”

     

    “तो फिर मुझे ढूँढने आ जाना।”

     

    सुदामा ने पहली बार खुलकर हँसते हुए कहा, “तुम्हें ढूँढना आसान होगा?”

     

    कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा, “नहीं, लेकिन तुम मेरे मित्र हो। तुम्हें रास्ता मिल जाएगा।”

     

    दोनों की हँसी आश्रम के शांत वातावरण में फैल गई।

     

    लेकिन सुदामा के मन में बिछड़ने का डर फिर भी कहीं न कहीं बना रहा।

     

    कुछ दिनों बाद गुरु सांदीपनि ने सभी बड़े शिष्यों को अपने पास बुलाया।

     

    उनके चेहरे पर गंभीरता थी।

     

    कृष्ण और सुदामा एक-दूसरे के पास बैठ गए।

     

    गुरु ने कहा, “तुम सभी कई वर्षों से इस आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे हो। अब समय आ गया है कि तुम अपनी शिक्षा के अंतिम चरण में प्रवेश करो।”

     

    सभी शिष्य ध्यान से सुनने लगे।

     

    “शिक्षा केवल शास्त्र पढ़ लेने से पूरी नहीं होती। मनुष्य को अपने ज्ञान की परीक्षा जीवन में देनी पड़ती है।”

     

    एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमें कोई परीक्षा देनी होगी?”

     

    गुरु सांदीपनि ने कहा, “हाँ। लेकिन यह परीक्षा केवल पुस्तकों की नहीं होगी।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    कृष्ण मुस्कुरा रहे थे, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कुछ रोचक होने वाला है।

     

    गुरु सांदीपनि आगे बोले, “तुम सभी को अलग-अलग कार्य दिए जाएँगे। उन कार्यों के माध्यम से मैं देखूँगा कि तुमने यहाँ केवल ज्ञान सीखा है या जीवन को भी समझा है।”

     

    कुछ शिष्यों के चेहरे पर उत्साह था और कुछ चिंतित हो गए।

     

    सुदामा के मन में भी हल्की चिंता थी।

     

    उस रात वह देर तक सो नहीं सका।

     

    कृष्ण ने पूछा, “अब क्या सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “परीक्षा के बारे में।”

     

    कृष्ण ने करवट बदलते हुए कहा, “तुम हर आने वाली बात से पहले ही डर क्यों जाते हो?”

     

    “क्योंकि मुझे सब कुछ सही करना है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “हर समय सही होने की कोशिश करने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान रहता है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “तो क्या गलतियाँ करनी चाहिए?”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “नहीं, लेकिन गलती के डर से काम करना छोड़ भी नहीं देना चाहिए।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद कृष्ण ने कहा, “कल जो होगा, देखा जाएगा। आज आराम करो।”

     

    अगली सुबह सभी शिष्य गुरु सांदीपनि के सामने एकत्र हुए।

     

    गुरु ने एक-एक करके सभी को उनके कार्य बताए।

     

    कुछ को दूर गाँवों में जाकर लोगों की सहायता करनी थी।

     

    कुछ को कठिन विषयों पर अध्ययन करना था।

     

    कुछ को आश्रम की जिम्मेदारियाँ संभालनी थीं।

     

    फिर गुरु ने कृष्ण और सुदामा की ओर देखा।

     

    “तुम दोनों…”

     

    सुदामा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम दोनों को साथ में एक कार्य करना होगा।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर सुदामा की ओर देखा।

     

    सुदामा के चेहरे पर राहत आ गई।

     

    गुरु ने कहा, “तुम्हें तीन दिनों के लिए आश्रम से दूर एक गाँव जाना होगा। वहाँ के लोग पानी की कमी से परेशान हैं। पास की एक पुरानी जलधारा मिट्टी और पत्थरों से बंद हो गई है।”

     

    सुदामा ध्यान से सुन रहा था।

     

    गुरु ने आगे कहा, “तुम दोनों वहाँ जाकर लोगों की सहायता करोगे। लेकिन याद रखना, तुम्हें यह काम केवल अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि लोगों को साथ लेकर करना होगा।”

     

    कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा, “जैसी आज्ञा, गुरुदेव।”

     

    दोनों उसी दिन यात्रा पर निकल पड़े।

     

    रास्ता लंबा था।

     

    कृष्ण पूरे रास्ते बातें करते रहे, लेकिन सुदामा इस बार कुछ ज्यादा ही चुप था।

     

    कुछ समय बाद कृष्ण ने पूछा, “अब क्या हुआ?”

     

    सुदामा ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम इतने बड़े काम को कैसे पूरा करेंगे।”

     

    कृष्ण ने कहा, “पहले गाँव पहुँचते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “सुदामा।”

     

    सुदामा चुप हो गया।

     

    कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भविष्य की चिंता करते-करते वर्तमान को थका देते हो।”

     

    सुदामा ने कहा, “और तुम वर्तमान में इतने खुश रहते हो कि कभी भविष्य की चिंता ही नहीं करते।”

     

    कृष्ण हँस पड़े।

     

    “शायद इसीलिए हम मित्र हैं। तुम मुझे सावधान रखते हो और मैं तुम्हें मुस्कुराना सिखाता हूँ।”

     

    दोनों आगे बढ़ते गए।

     

    शाम तक वे उस गाँव में पहुँच गए।

     

    गाँव छोटा था।

     

    वहाँ के लोग परेशान दिखाई दे रहे थे।

     

    एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें बताया कि पहले गाँव के पास एक छोटी जलधारा बहती थी, लेकिन कई महीनों पहले तेज बारिश और मिट्टी के बहाव से उसका रास्ता बंद हो गया।

     

    अब लोगों को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था।

     

    सुदामा ने जलधारा का रास्ता देखा।

     

    वहाँ बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी जमा थी।

     

    वह चिंतित हो गया।

     

    “यह काम बहुत कठिन है।”

     

    कृष्ण ने कहा, “तो कठिन काम शुरू करते हैं।”

     

    अगली सुबह दोनों गाँव वालों के साथ वहाँ पहुँचे।

     

    कृष्ण ने कहा, “अगर हम सब मिलकर काम करें, तो यह काम जल्दी पूरा हो सकता है।”

     

    कुछ लोग तैयार हो गए।

     

    कुछ ने कहा, “यह बहुत बड़ा काम है।”

     

    कुछ लोग निराश थे।

     

    सुदामा को लगा कि शायद यह कार्य पूरा नहीं होगा।

     

    लेकिन कृष्ण ने हार नहीं मानी।

     

    उन्होंने सबसे पहले स्वयं मिट्टी हटानी शुरू कर दी।

     

    उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी आ गए।

     

    फिर कुछ युवक।

     

    फिर धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी जुड़ने लगे।

     

    सुदामा ने देखा कि कृष्ण केवल बातें नहीं कर रहे थे।

     

    वह सबसे पहले स्वयं काम कर रहे थे।

     

    सुदामा भी उनके साथ लग गया।

     

    पूरा दिन मिट्टी हटाने में निकल गया।

     

    शाम तक सब थक चुके थे।

     

    लेकिन जलधारा का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था।

     

    सुदामा ने थके हुए स्वर में कहा, “शायद हमसे नहीं होगा।”

     

    कृष्ण ने कहा, “आज नहीं हुआ तो कल होगा।”

     

    “लेकिन तीन दिन में?”

     

    “तो तीन दिन तक पूरी कोशिश करेंगे।”

     

    दूसरे दिन सुबह सभी फिर जुट गए।

     

    इस बार काम पहले से तेज हुआ।

     

    कृष्ण और सुदामा ने लोगों को अलग-अलग काम बाँट दिए।

     

    कोई मिट्टी हटा रहा था।

     

    कोई पत्थर सरका रहा था।

     

    कोई रास्ता साफ कर रहा था।

     

    दोपहर तक अचानक मिट्टी के नीचे से पानी की एक छोटी धारा दिखाई देने लगी।

     

    सभी लोग उत्साहित हो गए।

     

    “पानी!”

     

    बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे।

     

    लेकिन अभी रास्ता पूरी तरह खुला नहीं था।

     

    कृष्ण ने कहा, “रुकना मत।”

     

    सबने फिर काम शुरू कर दिया।

     

    कुछ देर बाद आखिरी बड़ा पत्थर हटाया गया।

     

    और उसके साथ ही पानी तेजी से बहने लगा।

     

    पूरा गाँव खुशी से भर गया।

     

    लोगों ने कृष्ण और सुदामा का धन्यवाद किया।

     

    लेकिन कृष्ण ने कहा, “हम दोनों ने नहीं किया। यह काम आप सबने मिलकर किया है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

     

    उसे समझ आया कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जो दूसरों को अपनी शक्ति का एहसास करा दे।

     

    तीन दिन बाद दोनों आश्रम लौट आए।

     

    गुरु सांदीपनि ने उनसे पूछा, “कार्य पूरा हुआ?”

     

    कृष्ण ने कहा, “हाँ, गुरुदेव।”

     

    सुदामा ने पूरी घटना विस्तार से बताई।

     

    गुरु ध्यान से सुनते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों ने अपनी परीक्षा में बहुत कुछ सीखा है।”

     

    सुदामा ने पूछा, “गुरुदेव, क्या हमारी शिक्षा अब पूरी हो गई?”

     

    गुरु सांदीपनि कुछ क्षण शांत रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “अभी नहीं… लेकिन वह दिन अब दूर भी नहीं है।”

     

    सुदामा का मन अचानक भारी हो गया।

     

    वही बात…

     

    जिससे वह इतने दिनों से डर रहा था।

     

    गुरुकुल छोड़ना।

     

    कृष्ण से अलग होना।

     

    उस रात वह फिर से चुप बैठा था।

     

    कृष्ण उसके पास आए।

     

    “तुम फिर सोच रहे हो?”

     

    सुदामा ने कहा, “हाँ।”

     

    “बिछड़ने के बारे में?”

     

    सुदामा ने सिर हिला दिया।

     

    कृष्ण उसके पास बैठ गए।

     

    कुछ देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर सुदामा ने कहा, “कृष्ण, अगर हमारे जीवन की राहें सच में अलग हो गईं तो?”

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “तो हमारी राहें अलग होंगी… हम नहीं।”

     

    सुदामा की आँखें भर आईं।

     

    “मुझसे वादा करो कि चाहे कुछ भी हो जाए, तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे।”

     

    कृष्ण ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    “सुदामा, मित्र को याद रखने के लिए वादा नहीं करना पड़ता। सच्चा मित्र मन में रहता है।”

     

    सुदामा ने कृष्ण का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    उसे नहीं पता था कि आने वाला समय उनकी परीक्षा सचमुच लेने वाला है।

     

    बहुत जल्द…

     

    गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने वाली थी।

     

    और उसके बाद…

     

    दोनों मित्रों के सामने जीवन की दो अलग-अलग राहें खड़ी थीं।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दोनों ने आसमान में चमकते तारों को देखा।

     

    और मन ही मन एक ही बात महसूस की—

     

    समय चाहे उन्हें कितनी भी दूर ले जाए, उनकी मित्रता की डोर कभी नहीं टूटेगी।

     

    क्रमशः…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं