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श्री कृष्ण ओर सुदामा की मित्रता की कहानी

पढ़ने का समय : 7 मिनट

अध्याय 1 — दो मित्रों की पहली मुलाकात

बहुत समय पहले की बात है। भारत की धरती पर अनेक छोटे-बड़े राज्य बसे हुए थे। उन्हीं दिनों दो ऐसे बालक थे, जिनकी जिंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। एक ओर थे द्वारका के भावी नायक, वसुदेव और देवकी के पुत्र श्री कृष्ण, जिनका बचपन गोकुल और वृंदावन की गलियों में बीता था। दूसरी ओर था एक साधारण ब्राह्मण बालक—सुदामा।

 

सुदामा का जीवन बहुत साधारण था। उसके पास धन-दौलत नहीं थी, न ही सुंदर वस्त्र और न ही कोई बड़ा घर। लेकिन उसके पास एक बहुत बड़ी चीज थी—ज्ञान पाने की इच्छा और एक सच्चा, निर्मल हृदय।

 

जब सुदामा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माता-पिता ने सोचा कि उसे शिक्षा के लिए एक अच्छे गुरु के आश्रम में भेजना चाहिए। उस समय गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती थी। वहाँ बच्चों को जीवन जीना, मेहनत करना, बड़ों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना भी सिखाया जाता था।

 

इसलिए एक दिन सुदामा अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर गुरु सांदीपनि के आश्रम की ओर चल पड़ा।

 

उसके पास सामान के नाम पर बहुत कम चीजें थीं। एक छोटा सा कपड़े का थैला, पहनने के लिए साधारण वस्त्र और मन में ज्ञान पाने का सपना।

 

कई दिनों की यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचा।

 

आश्रम प्रकृति के बीच बसा हुआ था। वहाँ अनेक बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। कोई जल भर रहा था, कोई लकड़ियाँ ला रहा था और कोई गुरु के सामने बैठकर पाठ सीख रहा था।

 

सुदामा ने आश्रम में प्रवेश किया और गुरु सांदीपनि के सामने जाकर हाथ जोड़ दिए।

 

“गुरुदेव, मैं आपके पास शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ।”

 

गुरु सांदीपनि ने उस दुबले-पतले बालक को ध्यान से देखा।

 

“तुम्हारा नाम क्या है, पुत्र?”

 

“सुदामा।”

 

“और तुम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हो?”

 

सुदामा ने बिना देर किए उत्तर दिया, “ताकि मैं ज्ञानवान बन सकूँ और जीवन में सही मार्ग पर चल सकूँ।”

 

गुरु सांदीपनि मुस्कुरा दिए।

 

“ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं मिलता, सुदामा। ज्ञान पाने के लिए मन को भी सच्चा रखना पड़ता है।”

 

सुदामा ने सिर झुका दिया।

 

“मैं प्रयास करूँगा, गुरुदेव।”

 

उसी दिन सुदामा को आश्रम में रहने की अनुमति मिल गई।

 

उस शाम वह अपने नए स्थान को समझने की कोशिश कर रहा था। बहुत से बालक आपस में पहले से मित्र थे। कोई खेल रहा था, कोई बातें कर रहा था। सुदामा थोड़ा संकोची स्वभाव का था। वह चुपचाप एक पेड़ के पास बैठ गया।

 

तभी उसके पास एक बालक आया।

 

उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी आँखों में शरारत भी थी और एक अजीब सी अपनापन भी।

 

उसने सुदामा के पास बैठते हुए पूछा, “तुम नए आए हो?”

 

सुदामा ने उसकी ओर देखा।

 

“हाँ।”

 

“नाम?”

 

“सुदामा।”

 

बालक मुस्कुराया।

 

“मैं कृष्ण हूँ।”

 

सुदामा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम भी आज ही आए हो?”

 

कृष्ण ने हँसते हुए कहा, “नहीं, लेकिन हर दिन नया ही लगता है।”

 

सुदामा को उसका उत्तर समझ नहीं आया, लेकिन वह मुस्कुरा दिया।

 

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

 

फिर कृष्ण ने सुदामा के कपड़ों की ओर देखा। वे साधारण और पुराने थे। सुदामा को लगा कि शायद अब यह बालक भी उसका मजाक उड़ाएगा, जैसे कई बच्चे कभी-कभी करते थे।

 

लेकिन कृष्ण ने कुछ नहीं कहा।

 

उन्होंने अपने पास रखा फल निकालकर सुदामा की ओर बढ़ाया।

 

“भूख लगी है?”

 

सुदामा ने संकोच से कहा, “नहीं।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“अगर तुम्हें नहीं चाहिए तो मैं अकेले खा लूँगा। लेकिन फिर मुझे बहुत बुरा लगेगा।”

 

सुदामा उनकी बात सुनकर हँस पड़ा।

 

“तुम अजीब हो।”

 

“और तुम बहुत चुप रहते हो,” कृष्ण ने तुरंत कहा।

 

दोनों हँस पड़े।

 

शायद उसी छोटी सी हँसी के साथ एक ऐसी मित्रता की शुरुआत हुई, जो समय के साथ और गहरी होने वाली थी।

 

अगले दिन से दोनों का साथ बढ़ने लगा।

 

सुबह जल्दी उठना, नदी से जल लाना, आश्रम की सफाई करना, गुरु के पास बैठकर शिक्षा लेना—धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ करने लगे।

 

कृष्ण किसी भी काम को बोझ की तरह नहीं लेते थे।

 

एक दिन गुरु माता ने सभी बालकों से कहा कि आश्रम के लिए जंगल से सूखी लकड़ियाँ लेकर आनी हैं।

 

कई बालक अपने-अपने साथियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

 

कृष्ण ने सुदामा से कहा, “चलो, हम भी चलते हैं।”

 

सुदामा ने लकड़ियाँ बाँधने के लिए रस्सी उठाई और दोनों जंगल की ओर चल पड़े।

 

रास्ते में कृष्ण कभी पेड़ों को देखते, कभी पक्षियों की आवाज सुनते और कभी कोई मजेदार बात कह देते।

 

सुदामा ने पूछा, “तुम हर समय इतने खुश कैसे रहते हो?”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखकर कहा, “क्योंकि दुख आने से पहले ही अगर हम दुखी हो जाएँ, तो खुशी कब मिलेगी?”

 

सुदामा कुछ देर तक उस बात को सोचता रहा।

 

जंगल पहुँचकर दोनों लकड़ियाँ इकट्ठा करने लगे।

 

कुछ समय बाद अचानक आसमान में बादल घिर आए।

 

तेज हवा चलने लगी।

 

सुदामा ने चिंतित होकर कहा, “कृष्ण, हमें जल्दी वापस चलना चाहिए।”

 

लेकिन देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई।

 

दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

 

बारिश तेज होती जा रही थी।

 

सुदामा ने अपने छोटे से कपड़े के थैले को सीने से लगा लिया।

 

कृष्ण ने पूछा, “उसमें क्या है?”

 

सुदामा थोड़ा घबरा गया।

 

“कुछ नहीं।”

 

कृष्ण ने शरारत से कहा, “कुछ नहीं है तो इतनी मजबूती से क्यों पकड़ा हुआ है?”

 

सुदामा चुप रहा।

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“अच्छा, ठीक है। मत बताओ।”

 

कुछ देर बाद सुदामा ने धीरे से कहा, “मेरी माँ ने रास्ते के लिए थोड़े से चने दिए हैं।”

 

कृष्ण ने उसकी ओर देखा।

 

“तो हम दोनों मिलकर खाएँगे।”

 

सुदामा ने कहा, “लेकिन ये बहुत कम हैं।”

 

कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, “जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

 

सुदामा ने थैले से चने निकाले और दोनों ने उन्हें बाँटकर खा लिया।

 

उस दिन पहली बार सुदामा ने महसूस किया कि उसके सामने बैठा यह मित्र दूसरे लोगों से अलग है।

 

कृष्ण ने कभी उससे यह नहीं पूछा कि वह गरीब क्यों है।

 

कभी उसके कपड़ों पर हँसे नहीं।

 

कभी यह नहीं कहा कि उसके पास क्या नहीं है।

 

वह बस उसके साथ रहते थे।

 

बारिश कम हुई तो दोनों आश्रम लौट आए।

 

लेकिन आश्रम पहुँचने पर पता चला कि गुरु माता चिंतित थीं।

 

“तुम दोनों कहाँ रह गए थे?”

 

सुदामा ने सिर झुका लिया।

 

“माता, जंगल में बारिश आ गई थी।”

 

कृष्ण तुरंत बोले, “गलती मेरी है। मैं रास्ते में बातें करता रहा और हमें देर हो गई।”

 

सुदामा ने कृष्ण की ओर देखा।

 

उसे पता था कि कृष्ण ऐसा क्यों कह रहे हैं।

 

वह अपने मित्र को डाँट से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

 

सुदामा ने तुरंत कहा, “नहीं, माता। गलती हम दोनों की है।”

 

गुरु माता ने दोनों को देखा।

 

फिर मुस्कुराते हुए कहा, “मित्रता में एक-दूसरे का साथ देना अच्छी बात है, लेकिन सच्चाई से दूर नहीं जाना चाहिए।”

 

दोनों ने सिर झुका दिया।

 

उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

 

कृष्ण उसके पास ही लेटे हुए थे।

 

सुदामा ने धीरे से पूछा, “कृष्ण?”

 

“हूँ?”

 

“अगर एक दिन हम दोनों अलग हो गए तो?”

 

कृष्ण कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर उन्होंने कहा, “सच्चे मित्र पास रहने से मित्र नहीं होते, सुदामा। अगर मन में प्रेम और विश्वास हो, तो दूरी भी मित्रता को अलग नहीं कर सकती।”

 

सुदामा ने कहा, “लेकिन मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”

 

कृष्ण मुस्कुराए।

 

“तो मत भूलना।”

 

“और तुम?”

 

“मैं भी नहीं भूलूँगा।”

 

सुदामा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

उसे नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में जीवन दोनों को कितनी दूर ले जाएगा।

 

उसे यह भी नहीं पता था कि एक दिन यही कृष्ण एक महान राजा के रूप में पहचाने जाएँगे और वह स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताएगा।

 

लेकिन उस समय…

 

वे दोनों केवल दो बालक थे।

 

एक साधारण ब्राह्मण पुत्र।

 

और दूसरा उसका प्यारा मित्र कृष्ण।

 

अगली सुबह सूर्य की किरणों के साथ दोनों फिर से आश्रम के कार्यों में लग गए।

 

उन्हें नहीं पता था कि उनकी मित्रता की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

 

कुछ ही समय बाद गुरु सांदीपनि दोनों को एक ऐसा कार्य सौंपने वाले थे, जो उनकी दोस्ती को और गहरा कर देगा।

 

और उस दिन सुदामा को पहली बार समझ आएगा कि कृष्ण केवल एक अच्छे मित्र ही नहीं…

 

बल्कि एक ऐसे साथी हैं, जो हर कठिन समय में उसका हाथ थामकर खड़े रहेंगे।

 

क्रमशः…

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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