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एक राखी हजारों यादें

पढ़ने का समय : 7 मिनट

एक राखी, हजारों यादें

 

“भैया की अलमारी खोलने की इजाजत मुझे कभी नहीं थी।”

 

मीरा ने अलमारी के सामने खड़े होकर धीरे से खुद से कहा।

 

आज कई साल बाद वह अपने पुराने घर में आई थी। माँ ने उसे फोन करके कहा था कि कमरे की सफाई कर दे, क्योंकि काफी समय से बंद पड़ा था।

 

अलमारी खोलते ही पुराने कपड़ों की खुशबू कमरे में फैल गई।

 

मीरा कपड़े निकालकर अलग कर रही थी कि अचानक पीछे की तरफ रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा नीचे गिर पड़ा।

 

उसने डिब्बा उठाया।

 

ऊपर धूल जमी थी।

 

मीरा ने अपनी हथेली से धूल हटाई।

 

डिब्बे पर छोटे अक्षरों में लिखा था—

 

“मेरी छोटी बहन के लिए।”

 

मीरा का हाथ रुक गया।

 

यह उसके भाई आरव की लिखावट थी।

 

वही आरव, जो छह साल पहले घर छोड़कर चला गया था।

 

उसके बाद कभी वापस नहीं आया।

 

घरवालों से उसकी आखिरी मुलाकात भी बहुत अच्छी नहीं रही थी।

 

मीरा ने डिब्बा खोला।

 

अंदर कई पुरानी राखियां रखी थीं।

 

कुछ टूट चुकी थीं, कुछ के रंग फीके पड़ गए थे।

 

सबसे ऊपर एक छोटी-सी राखी रखी थी, जो शायद मीरा ने बचपन में बनाई थी।

 

उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया।

 

वह आठ साल की थी और आरव उससे छह साल बड़ा था।

 

हर रक्षाबंधन पर वह भाई के पीछे भागती थी।

 

“भैया, हाथ आगे करो।”

 

आरव हाथ पीछे कर लेता।

 

“पहले बताओ गिफ्ट क्या चाहिए?”

 

मीरा मुंह बनाकर कहती,

 

“आप पहले राखी बंधवाओ।”

 

“नहीं। पहले गिफ्ट।”

 

“ठीक है, इस बार गिफ्ट नहीं दूंगी।”

 

“तो राखी भी नहीं बंधवाऊंगा।”

 

दोनों की नोकझोंक चलती रहती।

 

फिर आखिर में आरव खुद हाथ आगे कर देता।

 

“चल, बांध दे।”

 

मीरा हंसते हुए राखी बांधती और आरव उसके सिर पर हाथ रखकर कहता,

 

“हमेशा खुश रहना।”

 

मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

 

उसने अगली राखी उठाई।

 

उसके साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

 

“ये राखी उस साल की है, जब मीरा की स्कूल फीस भरने के लिए मैंने अपनी नई साइकिल नहीं खरीदी थी।”

 

मीरा चौंक गई।

 

उसे वह बात कभी पता नहीं थी।

 

उसे हमेशा लगा था कि आरव ने साइकिल खरीदी ही नहीं क्योंकि उसे साइकिल पसंद नहीं थी।

 

उसने अगली पर्ची उठाई।

 

“ये राखी उस साल की है, जब मीरा को तेज बुखार था और मैंने पूरी रात उसके पास बैठकर बिताई थी।”

 

मीरा की आंखें भर आईं।

 

उसे याद था।

 

उस रात वह बार-बार कह रही थी,

 

“भैया, मुझे डर लग रहा है।”

 

आरव उसका हाथ पकड़कर कह रहा था,

 

“मैं हूं ना। तू सो जा।”

 

मीरा ने अगली राखी उठाई।

 

फिर एक और।

 

हर राखी के साथ एक याद जुड़ी थी।

 

कहीं उसने मीरा की स्कूल फीस के लिए अपनी चीज बेची थी।

 

कहीं उसकी किताबें खरीदी थीं।

 

कहीं उसकी गलती छिपाकर उसे पापा की डांट से बचाया था।

 

मीरा डिब्बे के नीचे तक पहुंच गई।

 

वहां एक बंद लिफाफा रखा था।

 

लिफाफे पर लिखा था—

 

“मीरा को तभी देना, जब उसे लगे कि उसका भाई उसे छोड़कर चला गया।”

 

मीरा के हाथ कांपने लगे।

 

उसने लिफाफा खोला।

 

अंदर एक पत्र था।

 

उसने पढ़ना शुरू किया।

 

“मीरा,

 

अगर तू ये पत्र पढ़ रही है, तो शायद तू मुझसे बहुत नाराज होगी।

 

तुझे लगेगा कि मैं बिना कुछ कहे घर छोड़कर चला गया।

 

तुझे लगेगा कि मुझे तुझसे कोई प्यार नहीं था।

 

लेकिन सच कुछ और है।

 

पापा की बीमारी के बाद घर पर बहुत कर्ज हो गया था। मैं चाहता था कि तेरी पढ़ाई किसी भी हालत में न रुके।

 

मुझे शहर से बाहर नौकरी मिली थी।

 

मैं जानता था कि अगर मैं चला गया तो तू मुझसे नाराज होगी।

 

लेकिन अगर मैं नहीं जाता, तो शायद तेरी पढ़ाई रुक जाती।

 

इसलिए मैंने जाने का फैसला किया।

 

माँ से कहा कि तुझे मत बताना।

 

मैं चाहता था कि तू पढ़ाई करे और अपने सपने पूरे करे।

 

मैंने कभी तुझे अकेला छोड़ना नहीं चाहा।

 

बस चाहता था कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

 

और हां…

 

हर रक्षाबंधन पर मैं तेरी राखी लेने आता था।

 

तू मुझे देख नहीं पाती थी, क्योंकि मैं दूर से माँ को राखी दे जाता था।

 

मुझे डर था कि अगर मैं सामने आ गया तो शायद वापस जाने की हिम्मत नहीं कर पाऊंगा।

 

तू मुझे याद करती होगी।

 

मैं भी तुझे हर दिन याद करता हूं।

 

तेरा भाई।”

 

मीरा पत्र को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।

 

तभी पीछे से माँ की आवाज आई,

 

“तुझे मिल गया?”

 

मीरा ने पलटकर देखा।

 

“माँ… आपने मुझसे ये सब क्यों छिपाया?”

 

माँ की आंखें भी भर आईं।

 

“क्योंकि ये आरव की इच्छा थी।”

 

“वो कहां है?”

 

माँ कुछ पल चुप रहीं।

 

फिर बोलीं,

 

“पता नहीं।”

 

मीरा ने हैरानी से पूछा,

 

“क्या मतलब?”

 

“पिछले साल तक वह कभी-कभी फोन करता था। फिर उसका फोन बंद हो गया।”

 

मीरा का दिल बैठ गया।

 

उसने तुरंत भाई का पुराना नंबर मिलाया।

 

फोन बंद था।

 

वह पूरी रात आरव की तस्वीरें देखती रही।

 

बचपन की तस्वीरें।

 

स्कूल की तस्वीरें।

 

रक्षाबंधन की तस्वीरें।

 

हर तस्वीर में एक ही चीज दिखाई दे रही थी—

 

आरव की कलाई पर राखी।

 

अगली सुबह मीरा ने फैसला किया।

 

“माँ, मैं भैया को ढूंढने जाऊंगी।”

 

“लेकिन कहां?”

 

“जहां से उनका आखिरी फोन आया था।”

 

कई घंटों की तलाश के बाद उसे पता चला कि आरव जिस शहर में काम करता था, वहां एक छोटी-सी दुकान थी जहां वह अक्सर जाया करता था।

 

मीरा वहां पहुंची।

 

दुकानदार ने उसे देखते ही पूछा,

 

“आप आरव की बहन हैं?”

 

मीरा की आंखें चमक उठीं।

 

“जी! आपको पता है वो कहां हैं?”

 

दुकानदार मुस्कुराया।

 

“वो कुछ महीने पहले यहां से गया था। लेकिन जाने से पहले एक चीज मेरे पास छोड़ गया था।”

 

उसने दराज से एक छोटा डिब्बा निकाला।

 

मीरा ने डिब्बा खोला।

 

अंदर एक नई राखी थी।

 

और एक छोटी-सी पर्ची।

 

“इस बार शायद मैं घर न आ पाऊं। लेकिन मेरी बहन राखी बांधना मत भूलना।”

 

मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।

 

वह उसी समय घर लौट आई।

 

माँ के सामने बैठकर उसने राखी उठाई।

 

“भैया जहां भी होंगे, आज मैं उन्हें राखी बांधूंगी।”

 

उसने राखी अपनी कलाई पर बांधी।

 

फिर आंखें बंद करके बोली,

 

“भैया, आपने कहा था ना कि मैं हमेशा खुश रहूं?”

 

उसकी आवाज भर्रा गई।

 

“तो आप भी जहां हैं, खुश रहना।”

 

अचानक बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

माँ ने दरवाजा खोला।

 

सामने एक आदमी खड़ा था।

 

हाथ में छोटा-सा बैग था।

 

चेहरे पर हल्की मुस्कान।

 

मीरा ने उसे देखा।

 

कुछ सेकंड तक वह उसे पहचान ही नहीं पाई।

 

फिर उसकी आंखें फैल गईं।

 

“भैया…!”

 

आरव ने मुस्कुराकर हाथ आगे कर दिया।

 

“राखी लाई है?”

 

मीरा दौड़कर उसके गले लग गई।

 

दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

कुछ देर बाद मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

 

“इतने साल कहां थे?”

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“तेरी यादों में।”

 

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब कहीं मत जाना।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“अब नहीं जाऊंगा।”

 

मीरा ने पुराने लकड़ी के डिब्बे को देखा।

 

उसमें पड़ी हर राखी अब उसे सिर्फ धागा नहीं लग रही थी।

 

हर राखी में उसके भाई का एक त्याग था।

 

एक कहानी थी।

 

एक याद थी।

 

और सबसे बढ़कर…

 

एक ऐसा प्यार था, जिसे दूरी भी खत्म नहीं कर सकी।

 

उसने डिब्बा बंद किया और मुस्कुराते हुए कहा—

 

“भैया, अब समझ आया… एक राखी में सिर्फ एक धागा नहीं होता। उसमें बचपन की शरारतें, लड़ाइयां, आंसू, त्याग और हजारों यादें बंधी होती हैं।”

आरव ने उसकी कलाई पर हाथ रखा।

“और उन यादों में सबसे खूबसूरत तू है।”

मीरा मुस्कुरा दी।

 

उस दिन दोनों भाई-बहन ने सिर्फ राखी का त्योहार नहीं मनाया।

उन्होंने उन छह सालों को फिर से जी लिया…

जिनमें दूरी बहुत थी,लेकिन प्यार उससे भी ज्यादा था।

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