एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया
स्क्रीन बंद हो चुकी थी।
लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।
देवेंद्र।
कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।
आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।
“एक सवाल का जवाब दीजिए।”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
“पूछो।”
“क्या आप गद्दार हैं?”
देवेंद्र की आंखें भर आईं।
“नहीं।”
आरव ने गुस्से में कहा—
“तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”
देवेंद्र चुप रहा।
आरव एक कदम आगे बढ़ा।
“और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”
नैना ने कांपती आवाज में कहा—
“आरव…”
“मां, आप चुप रहिए।”
आरव की आवाज टूट गई।
“आज मुझे सब जानना है।”
“पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”
“पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”
“अब और नहीं।”
देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।
“ठीक है।”
“आज सब बता देता हूं।”
उन्होंने नैना की तरफ देखा।
“लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”
अमन ने कहा—
“हमें सच चाहिए।”
विहान ने भी कहा—
“चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”
देवेंद्र ने गहरी सांस ली।
“पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”
“उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”
“दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”
आरव ने पूछा—
“फिर?”
“फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”
“उसने अभय को मारने की कोशिश की।”
अभय ने आंखें बंद कर लीं।
“उस रात…”
देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।
“मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”
“लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”
नैना ने सिर झुका लिया।
देवेंद्र ने कहा—
“नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”
आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।
देवेंद्र आगे बोले—
“विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”
“उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”
आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।
नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।
“मैं डर गई थी।”
“मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”
देवेंद्र ने कहा—
“इसलिए हमने एक योजना बनाई।”
“नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”
आरव ने पूछा—
“लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”
देवेंद्र ने कहा—
“तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”
“ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”
अमन की आंखें नम हो गईं।
“इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“हां।”
देवेंद्र ने कहा—
“हमारी योजना लगभग सफल थी।”
“लेकिन एक गलती हो गई।”
आरव ने पूछा—
“क्या?”
“विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”
“उसने अभय का पीछा किया।”
अभय ने धीमी आवाज में कहा—
“और मैं पकड़ा गया।”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
“आपको किसने बचाया?”
अभय ने कहा—
“समर ने।”
आरोही अचानक चौंक गई।
“मेरे पापा?”
अभय ने सिर हिलाया।
“हां।”
“समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”
आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।
“तो पापा की मौत…”
अभय ने कहा—
“मेरी वजह से हुई।”
“नहीं।”
आरोही ने तुरंत कहा—
“ऐसा मत कहिए।”
अभय की आवाज टूट गई।
“अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”
आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।
“आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”
आरव ने देवेंद्र से पूछा—
“लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”
देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”
“क्या झूठ?”
“मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”
नैना ने आंखें बंद कर लीं।
आरव चौंक गया।
“लेकिन वो जिंदा थीं।”
“हां।”
“नाना को क्यों नहीं बताया?”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”
“मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”
“अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”
आरव कुछ देर चुप रहा।
“तो आपने नाना से झूठ बोला…”
“नैना को बचाने के लिए?”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“हां।”
नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।
“आरव…”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
नैना ने कहा—
“मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”
“मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”
विहान की आंखें भर आईं।
“मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”
नैना ने उसे गले लगा लिया।
“मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”
अमन भी उनके पास आ गया।
आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।
नैना ने हाथ बढ़ाया।
“गुड्डू…”
आरव की आंखों में आंसू आ गए।
वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।
“बस एक बात का वादा कीजिए।”
“क्या?”
“अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”
नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“वादा।”
आरोही अब भी चुप थी।
अभय ने उसकी तरफ देखा।
“बेटी।”
आरोही ने उनकी तरफ देखा।
“जी?”
“तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”
आरोही की सांस थम गई।
“क्या?”
अभय ने कहा—
“उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”
“आखिरी सांस तक।”
आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।
“अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”
“चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।
अमन ने विषय बदलते हुए कहा—
“अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”
विहान ने अपना लॉकेट निकाला।
“कोड मेरे पास है।”
आरव ने अपनी चाबी निकाली।
आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।
देवेंद्र ने कहा—
“लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”
अभय ने कहा—
“विक्रम भी वहीं जाएगा।”
आरव ने पूछा—
“उसे कैसे पता चलेगा?”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”
सब चौंक गए।
“क्या?”
अभय ने कहा—
“विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”
“लेकिन वो अधूरी थी।”
अमन ने पूछा—
“तो वो हमारे पीछे क्यों है?”
“क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”
आरव ने कहा—
“मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”
अभय ने सिर हिलाया।
“हां।”
रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।
महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।
टूटी हुई दीवारें।
बंद खिड़कियां।
और चारों तरफ घना अंधेरा।
विहान ने कहा—
“क्या सच में यहां तहखाना है?”
देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।
“वहीं।”
सभी कुएं के पास पहुंचे।
आरव ने नीचे देखा।
बहुत गहरा अंधेरा था।
अभय ने कहा—
“नीचे उतरना होगा।”
अमन ने रस्सी निकाली।
सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।
सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।
जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…
उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।
उस पर तीन निशान बने थे।
एक चाबी का।
एक सिक्के का।
और एक लॉकेट का।
आरव ने कहा—
“यही है।”
आरव ने पहली चाबी लगाई।
क्लिक।
अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।
क्लिक।
विहान ने कोड डाला—
1…7…2…5
आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर…
घर्ररर…
लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।
अंदर अंधेरा था।
लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।
वीडियो रिकॉर्डिंग।
पुराने कागजात।
तस्वीरें।
और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।
आरव ने कहा—
“ये सबूत हैं।”
अभय ने धीरे से कहा—
“हां।”
“यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”
आरोही एक फाइल उठाने लगी।
तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।
आरव ने तस्वीर उठाई।
उसमें चार लोग खड़े थे—
अभय।
समर।
देवेंद्र।
और…
विक्रम।
लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।
आरव ने पढ़ा—
“हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”
अमन ने हैरानी से कहा—
“मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”
देवेंद्र चुप था।
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“आप भी इसमें थे?”
देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।
“हां।”
आरव का चेहरा सख्त हो गया।
“फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”
देवेंद्र ने कहा—
“क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”
“लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”
“वो ताकत का भूखा हो गया।”
“और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”
आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।
तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।
ठक… ठक… ठक…
सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।
अभय ने धीरे से कहा—
“इसमें क्या है?”
आरव ने बॉक्स खोला।
अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।
उस पर एक कागज रखा था।
आरव ने कागज उठाया।
उस पर लिखा था—
“जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”
नीचे हस्ताक्षर थे—
अभय।
आरव ने रिकॉर्डर चलाया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।
फिर अभय की आवाज आई—
“आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”
आरव की सांस रुक गई।
अभय की आवाज आगे आई—
“हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”
रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।
और उसी क्षण…
तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।
धड़ाम!
अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—
“अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”
आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।
और उसे पहली बार एहसास हुआ—
असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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