एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?
स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।
वो चेहरा…
जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।
जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।
उसके नाना।
लेकिन आज वो सामने थे।
जिंदा।
और किसी अनजान जगह पर कैद।
नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
“पापा…”
स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।
फिर धीरे से कहा—
“नैना… मेरी बच्ची।”
नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।
“आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”
वो कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”
आरव आगे बढ़ा।
“नाना… आपको किसने कैद किया है?”
स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।
“अभी इतनी जल्दी क्यों?”
आरव ने गुस्से में कहा—
“विक्रम!”
“उन्हें छोड़ दो।”
विक्रम ने कहा—
“तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”
“तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”
अमन ने पूछा—
“कौन-सा राज?”
विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हारे जन्म का।”
नाना ने बताई सच्चाई
आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“नाना, क्या ये सच कह रहा है?”
नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—
“हां।”
तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।
नाना ने कहा—
“तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”
“लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”
विहान ने पूछा—
“किसका?”
“विक्रम का।”
विक्रम हंसा।
“अधूरी कहानी मत सुनाओ।”
नाना ने उसकी तरफ देखा।
“आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”
विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।
पच्चीस साल पुराना राज
नाना ने कहा—
“तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”
“दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”
आरव ने पूछा—
“फिर?”
“विक्रम को इसका पता चल गया।”
“उसने पहले समर को निशाना बनाया।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“मेरे पापा…”
नाना ने कहा—
“समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”
“लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”
आरोही ने पूछा—
“तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”
नाना ने कहा—
“क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”
आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।
अभय की बारी
नाना आगे बोले—
“जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”
अभय ने सिर झुका लिया।
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“पापा…”
अभय ने कहा—
“मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”
आरव की आवाज भर्रा गई।
“आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”
अभय ने कहा—
“क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”
“मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”
आरव ने कहा—
“लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”
“मुझे आपकी जरूरत थी।”
अभय की आंखें भर आईं।
“मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”
कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।
फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।
अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।
नाना की असली योजना
अमन ने पूछा—
“अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”
नाना मुस्कुराए।
“क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”
“इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”
विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।
“और ये तीसरी चाबी?”
नाना ने कहा—
“हां।”
“तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”
आरव ने पूछा—
“कहां का?”
नाना ने कहा—
“पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”
देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—
“वही तहखाना?”
नाना ने उसकी तरफ देखा।
“हां, देवेंद्र।”
देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।
आरव ने पूछा—
“आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”
देवेंद्र ने कहा—
“हां।”
“लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”
नाना ने कहा—
“वो कभी बंद नहीं हुई।”
“वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”
विक्रम क्यों डरा हुआ था?
आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”
विक्रम ने तुरंत कहा—
“क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”
आरव मुस्कुराया।
“मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”
विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।
नाना ने कहा—
“बिल्कुल।”
“वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”
“नाम।”
“हिसाब।”
“कागजात।”
“और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”
अमन ने कहा—
“तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”
नाना ने कहा—
“अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”
विक्रम का आखिरी दांव
विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।
“तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”
“लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”
नैना ने गुस्से में कहा—
“उन्हें छोड़ दो।”
“तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”
विक्रम हंसा।
“मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”
“मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”
नैना चौंक गईं।
“आरव?”
विक्रम ने कहा—
“हां।”
“क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”
आरव ने पूछा—
“मैं?”
नाना ने आंखें बंद कर लीं।
“मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”
आरव ने पूछा—
“क्यों?”
नाना ने कहा—
“क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव की विरासत
आरव ने अविश्वास से पूछा—
“मेरे खून का?”
“हां।”
“क्यों?”
नाना ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”
अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने कहा—
“लेकिन हम तीनों भाई हैं।”
“हां।”
“तो सिर्फ मैं क्यों?”
नाना ने कहा—
“क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”
“तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”
“लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”
“तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”
अमन ने कहा—
“तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”
नाना मुस्कुराए।
“यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”
आरोही का सच
अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।
“और तुम।”
आरोही चौंक गई।
“जी?”
नाना ने कहा—
“तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”
“उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”
आरोही ने पूछा—
“क्या?”
नाना ने कहा—
“तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”
आरव ने चौंककर पूछा—
“तो?”
“वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”
“और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”
“तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”
आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।
नाना ने मुस्कुराकर कहा—
“शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”
आरोही की आंखें नम हो गईं।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”
आरोही ने धीरे से कहा—
“मैं भी नहीं।”
तहखाने का रास्ता
नाना ने कहा—
“अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”
“पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”
“उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”
“वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”
आरव ने पूछा—
“और तीन चाबियां?”
“पहली चाबी तुम्हारे पास।”
“दूसरी अमन के पास।”
“तीसरी आरोही के लॉकेट में।”
विहान चौंका।
“लेकिन मेरी चाबी?”
नाना ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”
“वो उस दरवाजे का कोड है।”
विहान ने अपने लॉकेट को देखा।
उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।
1-7-2-5
देवेंद्र ने कहा—
“ये वही नंबर है!”
आरव ने पूछा—
“क्या?”
देवेंद्र ने कहा—
“अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”
नाना की आखिरी चेतावनी
नाना ने गंभीर होकर कहा—
“लेकिन ध्यान रखना।”
“तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”
“वहां एक इंसान भी है।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
नाना ने कहा—
“वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”
नैना चौंक गईं।
“पापा!”
“आपने मुझे कभी नहीं बताया।”
नाना ने कहा—
“क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”
आरव ने पूछा—
“कौन है वो?”
नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।
“तुम उसे जानते हो।”
“बहुत करीब से।”
अमन ने पूछा—
“कौन?”
नाना ने सिर्फ इतना कहा—
“देवेंद्र।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।
देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।
नैना ने अविश्वास से कहा—
“देवेंद्र?”
देवेंद्र ने सिर झुका लिया।
आरव ने बंदूक निकाल ली।
“पापा के दोस्त…”
“क्या आप गद्दार हैं?”
देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।
“आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”
अभय भी चौंक गया।
“देवेंद्र?”
नाना ने कहा—
“उसने मुझे धोखा दिया था।”
देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—
“मैंने धोखा नहीं दिया था।”
“मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”
आरव ने पूछा—
“किसे?”
देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।
नैना की आंखें फैल गईं।
देवेंद्र ने कहा—
“नैना को।”
नैना स्तब्ध रह गईं।
और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।
विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—
“अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”
स्क्रीन काली हो गई।
आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।
उसे पहली बार लगा—
शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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