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नसीब खराब

पढ़ने का समय : 6 मिनट

नसीब ही खराब है, क्या करूँ?

 

एक छोटे से गाँव में रघु नाम का एक लड़का रहता था। उसकी उम्र करीब सोलह साल थी। रघु मेहनती था, लेकिन उसकी जिंदगी में एक के बाद एक परेशानियाँ आती रहती थीं। वह अक्सर अपने दोस्तों से कहता—

 

“लगता है मेरा नसीब ही खराब है, मैं क्या करूँ?”

 

गाँव के लोग भी उसे देखकर कहते, “बेचारा रघु, इसके साथ तो हमेशा उल्टा ही होता है।”

 

रघु के पिता किसान थे। एक साल बारिश समय पर नहीं हुई और फसल खराब हो गई। अगले साल बारिश इतनी ज्यादा हुई कि खेत में पानी भर गया। तीसरे साल फसल अच्छी हुई तो बाजार में अनाज के दाम गिर गए।

 

रघु के पिता हर बार मेहनत करते, लेकिन घर की हालत वैसी ही रहती।

 

एक दिन रघु के पिता बीमार पड़ गए।

 

रघु ने स्कूल छोड़कर पिता के साथ खेत में काम करना शुरू कर दिया।

 

उसकी माँ ने कहा, “बेटा, पढ़ाई मत छोड़।”

 

रघु बोला, “माँ, घर कैसे चलेगा?”

 

माँ ने कहा, “मुश्किल समय हमेशा नहीं रहता।”

 

रघु ने सिर झुका लिया।

 

कुछ दिनों बाद गाँव में एक दुकानदार को काम करने वाले लड़के की जरूरत थी। रघु वहाँ काम करने लगा।

 

लेकिन पहले ही दिन उससे गलती से तेल की एक बोतल गिर गई।

 

दुकानदार गुस्से में बोला, “तुमसे तो एक काम भी ठीक से नहीं होता।”

 

रघु चुप रहा।

 

अगले दिन वह समय पर दुकान पहुँचा, लेकिन दुकान खुलने में देर हो गई। दुकानदार ने फिर उसे डाँट दिया।

 

तीसरे दिन दुकान के बाहर रखा सामान बारिश में भीग गया।

 

दुकानदार ने कहा, “बस बहुत हुआ। तुम काम छोड़ दो।”

 

रघु घर लौटते हुए रास्ते में बैठ गया।

 

उसकी आँखों में आँसू थे।

 

“नसीब ही खराब है मेरा। जहाँ जाता हूँ, वहीं परेशानी हो जाती है।”

 

तभी गाँव के बाहर रहने वाले हरिदास बाबा वहाँ से गुजरे।

 

उन्होंने रघु को उदास देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

रघु बोला, “कुछ नहीं बाबा। मेरा नसीब ही खराब है।”

 

बाबा मुस्कुराए।

 

“अच्छा? नसीब खराब है?”

 

“हाँ।”

 

“तो चल मेरे साथ।”

 

रघु उनके पीछे चल पड़ा।

 

बाबा उसे एक सूखे खेत के पास ले गए।

 

वहाँ जमीन बिल्कुल बंजर थी।

 

बाबा ने पूछा, “अगर मैं इस खेत में बीज डाल दूँ तो क्या तुरंत फसल उग जाएगी?”

 

रघु बोला, “नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि पानी देना होगा, मिट्टी तैयार करनी होगी और देखभाल करनी होगी।”

 

बाबा ने कहा, “तो फिर जिंदगी में भी सिर्फ बीज डालकर किस्मत को दोष क्यों देता है?”

 

रघु चुप हो गया।

 

बाबा ने कहा, “मुश्किलें तुम्हारा नसीब खराब होने का सबूत नहीं हैं। कई बार वे तुम्हें मजबूत बनाने का रास्ता होती हैं।”

 

रघु ने पूछा, “लेकिन मैं करूँ क्या?”

 

बाबा ने कहा, “जो कर सकते हो, वह करो। जो नहीं कर सकते, उसके लिए रोना बंद करो।”

 

रघु ने उस दिन से एक नया फैसला किया।

 

वह सुबह जल्दी उठता और खेत में पिता की मदद करता। दोपहर में पढ़ाई करता और शाम को गाँव के बढ़ई के पास काम सीखने जाता।

 

बढ़ई ने पूछा, “तुम सीखना क्यों चाहते हो?”

 

रघु बोला, “क्योंकि मैं सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं रहना चाहता।”

 

बढ़ई मुस्कुराया।

 

कुछ महीनों में रघु लकड़ी का छोटा-मोटा काम करने लगा।

 

उसने एक दिन गाँव के बच्चों के लिए लकड़ी की छोटी मेज और कुर्सियाँ बनाईं।

 

लोगों को उसका काम पसंद आया।

 

एक स्कूल शिक्षक ने उससे कहा, “तुम्हारे हाथ में हुनर है।”

 

रघु ने पहली बार महसूस किया कि शायद उसके अंदर भी कोई खासियत है।

 

धीरे-धीरे उसे छोटे-छोटे काम मिलने लगे।

 

एक दिन उसे पास के शहर से बड़ा काम मिला।

 

लेकिन काम शुरू करने से एक दिन पहले उसकी सारी लकड़ी बारिश में भीग गई।

 

रघु कुछ देर चुप रहा।

 

पहले वाला रघु होता तो कहता—

 

“नसीब ही खराब है।”

 

लेकिन इस बार उसने ऐसा नहीं कहा।

 

उसने खुद से कहा, “समस्या आई है, इसका रास्ता भी होगा।”

 

उसने गाँव वालों से मदद माँगी।

 

किसी ने सूखी लकड़ी दी, किसी ने औजार दिए और किसी ने काम में हाथ बँटाया।

 

रघु ने रात-दिन मेहनत करके काम पूरा कर दिया।

 

शहर का ग्राहक उसके काम से बहुत खुश हुआ।

 

उसने रघु को तय रकम से ज्यादा पैसे दिए।

 

रघु घर लौटकर पिता के हाथ में पैसे रखता हुआ बोला, “बाबा, आज समझ आया कि किस्मत से ज्यादा मेहनत काम आती है।”

 

पिता की आँखें भर आईं।

 

“मुझे तुम पर गर्व है।”

 

कुछ साल बीत गए।

 

रघु ने अपनी छोटी-सी लकड़ी की दुकान खोल ली।

 

अब गाँव के लोग उसके पास फर्नीचर बनवाने आते थे।

 

एक दिन वही दुकानदार, जिसने कभी उसे काम से निकाल दिया था, रघु की दुकान पर आया।

 

उसने कहा, “मुझे अपनी दुकान के लिए नई अलमारियाँ बनवानी हैं।”

 

रघु मुस्कुराया।

 

“जरूर बनाऊँगा।”

 

दुकानदार ने संकोच से पूछा, “तुमने मुझे माफ कर दिया?”

 

रघु ने कहा, “आपने मुझे काम से निकाला था, लेकिन उसी दिन मुझे समझ आया था कि मुझे अपना रास्ता खुद बनाना होगा।”

 

दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम सच में बदल गए हो।”

 

रघु बोला, “मैं बदला नहीं हूँ। बस अब हर परेशानी को नसीब का नाम नहीं देता।”

 

कुछ समय बाद गाँव में एक बड़ी समस्या आई। तेज बारिश से पुल टूट गया और कई घरों का रास्ता बंद हो गया।

 

रघु ने गाँव वालों के साथ मिलकर लकड़ी का अस्थायी पुल बनाया।

 

गाँव के मुखिया ने कहा, “रघु, तुमने आज पूरे गाँव की मदद की है।”

 

रघु ने मुस्कुराकर कहा, “जब मैं परेशान था, तब गाँव वालों ने भी मेरी मदद की थी।”

 

उस शाम रघु हरिदास बाबा से मिलने गया।

 

बाबा पेड़ के नीचे बैठे थे।

 

रघु ने कहा, “बाबा, आपने उस दिन मुझे जो बात बताई थी, वह मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

 

बाबा मुस्कुराए।

 

“क्या बात?”

 

रघु बोला, “नसीब खराब है या अच्छा, यह सोचते रहने से कुछ नहीं बदलता। असली सवाल यह है कि जो हमारे हाथ में है, उसे हम कितना अच्छा करते हैं।”

 

बाबा ने सिर हिलाया।

 

“अब तुम समझ गए हो।”

 

रघु आसमान की तरफ देखने लगा।

 

उसकी जिंदगी में अब भी परेशानियाँ आती थीं। कभी काम कम मिलता, कभी नुकसान होता, कभी कोई योजना सफल नहीं होती।

 

लेकिन अब वह हर बार एक ही बात कहता—

 

“नसीब को कोसने से अच्छा है, एक बार और कोशिश करूँ।”

 

और यही कोशिश धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलती गई।

 

क्योंकि रघु ने आखिर समझ लिया था—

 

नसीब रास्ता दिखा सकता है, लेकिन उस रास्ते पर चलना हमारे अपने हाथ में होता है।

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