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पीछे देखना मना है..!!

पढ़ने का समय : 8 मिनट

घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बारह बजाने लगीं।

 

टन…

 

टन…

 

टन…

 

हर घंटी के साथ घर की दीवारें जैसे काँप रही थीं।

 

अमित कमरे के बीचोंबीच खड़ा था।

 

एक तरफ नैना थी।

 

दूसरी तरफ उसका दूसरा रूप।

 

और फर्श के नीचे से अब भी किसी चीज के खरोंचने की आवाज आ रही थी।

 

खर्र…

 

खर्र…

 

खर्र…

 

अमित ने नैना की तरफ देखा।

 

“तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें मार दूँ?”

 

नैना ने आँसू पोंछे।

 

“हाँ।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मेरे अंदर जो है, वह अब पूरी तरह जाग चुकी है।”

 

“अगर मैं तुम्हें मार दूँ तो वह भी मर जाएगी?”

 

नैना ने सिर हिलाया।

 

“शायद।”

 

दूसरा अमित हँस पड़ा।

 

“झूठ बोल रही है।”

 

नैना ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम चुप रहो।”

 

दूसरा अमित बोला,

 

“तुम्हें पता है वह क्या चाहती है?”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारी आत्मा।”

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

“मेरी?”

 

“हाँ।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुम उसके लिए सिर्फ एक इंसान नहीं हो।”

 

दूसरा अमित धीरे-धीरे अमित के करीब आया।

 

“तुम उस रात बच गए थे। तुम्हारी आत्मा का आधा हिस्सा आईने में बंद कर दिया गया। और वही आधा हिस्सा मैं हूँ।”

 

अमित ने कहा,

 

“तो?”

 

“तो अब तुम्हारी आत्मा अधूरी है।”

 

“इससे क्या होगा?”

 

दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

 

“अगर मैं तुम्हारे अंदर वापस आ गया, तो तुम पूरे हो जाओगे।”

 

अमित ने उसकी आँखों में देखा।

 

“और फिर?”

 

“फिर तुम और मैं एक हो जाएँगे।”

 

“और अवनि?”

 

दूसरा अमित कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“वह भी यही चाहती है।”

 

अचानक घर के अंदर एक तेज हवा चली।

 

सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

 

लालटेन की लौ बुझ गई।

 

अंधेरे में नैना की आवाज आई—

 

“भैया… भागो!”

 

अमित ने उसकी आवाज की दिशा में हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन उसी समय किसी ने उसकी कलाई पकड़ ली।

 

पकड़ बहुत ठंडी थी।

 

अमित ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

 

“कौन?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

 

“पीछे मत देखना।”

 

अमित जम गया।

 

यह वही नियम था।

 

वही शब्द।

 

लेकिन इस बार आवाज उसकी अपनी थी।

 

उसने धीरे-धीरे आँखें बंद कर लीं।

 

“मैं पीछे नहीं देखूँगा।”

 

फुसफुसाहट हँसी।

 

“तुमने हमेशा यही कहा।”

 

अमित ने पूछा,

 

“तू कौन है?”

 

“तुम्हारी पहली याद।”

 

अचानक अमित के दिमाग में एक दृश्य चमका।

 

वह बहुत छोटा था।

 

शायद तीन साल का।

 

उसकी माँ उसे गोद में लिए बैठी थीं।

 

सामने नैना खड़ी थी।

 

लेकिन नैना तब सिर्फ एक नवजात बच्ची थी।

 

अमित की माँ ने उसे देखते हुए कहा था—

 

“इसे किसी कीमत पर आईने के सामने मत ले जाना।”

 

फिर दृश्य बदल गया।

 

अमित के पिता एक पुराने मंदिर में बैठे थे।

 

उनके सामने एक साधु था।

 

साधु ने कहा—

 

“आपकी बेटी साधारण बच्ची नहीं है।”

 

पिता ने पूछा—

 

“फिर?”

 

“उसके जन्म के समय कुछ उसके साथ आया है।”

 

“क्या?”

 

साधु ने जवाब नहीं दिया।

 

फिर उसने जमीन पर एक वृत्त बनाया।

 

“इसे आईने में बाँधना होगा।”

 

अमित की आँखें खुल गईं।

 

“तो यह सब नैना के जन्म से शुरू हुआ था।”

 

बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा,

 

“हाँ।”

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

“आप उस साधु को जानती थीं?”

 

बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

 

“वह मेरा पति था।”

 

अमित स्तब्ध रह गया।

 

“क्या?”

 

“मैंने तुम्हारे परिवार को यह सब शुरू करने में मदद की थी।”

 

अमित की माँ ने कहा,

 

“हमारे पास कोई रास्ता नहीं था।”

 

अमित गुस्से में बोला,

 

“हर कोई यही कहता है! कोई रास्ता नहीं था!”

 

वह चीखा—

 

“लेकिन किसी ने मुझसे नहीं पूछा!”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

अमित की माँ रोने लगीं।

 

“तुम सही हो।”

 

“नैना को क्यों चुना?”

 

“क्योंकि वह सबसे कमजोर थी।”

 

अमित ने माँ की तरफ देखा।

 

“वह मेरी बहन थी!”

 

“मुझे पता है।”

 

“फिर आपने उसे मरने दिया?”

 

माँ ने सिर झुका लिया।

 

“मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

 

नैना की आवाज आई—

 

“माँ झूठ नहीं बोल रही।”

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

नैना अब पहले से ज्यादा धुंधली दिखाई दे रही थी।

 

“उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

 

“लेकिन?”

 

“लेकिन पापा ने उन्हें रोक दिया।”

 

अमित की मुट्ठियाँ कस गईं।

 

“पापा ने ऐसा क्यों किया?”

 

नैना ने कहा,

 

“क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर मैं उसके साथ रहूँगी, तो तुम बच जाओगे।”

 

“और तुम?”

 

“मैंने मान लिया।”

 

“क्यों?”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“क्योंकि मैं बड़ी बहन थी।”

 

अमित की आँखों में आँसू आ गए।

 

“लेकिन तुम तो मुझसे छोटी थीं।”

 

नैना चुप हो गई।

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

फिर अचानक उसे एक बात समझ आई।

 

“रुको…”

 

“क्या?”

 

“मैं तुमसे छोटा था।”

 

नैना ने कुछ नहीं कहा।

 

अमित ने माँ की तरफ देखा।

 

“लेकिन मेरी यादों में नैना हमेशा मुझसे बड़ी थी।”

 

माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

अमित ने पूछा—

 

“असल में नैना कौन थी?”

 

कमरे में एक तेज चीख गूँजी।

 

सारी दीवारें काँपने लगीं।

 

और नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

 

अब वह छोटी बच्ची नहीं थी।

 

वह एक वयस्क महिला जैसी दिख रही थी।

 

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

वह बोली—

 

“तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

 

अमित पीछे हट गया।

 

“तू नैना नहीं है।”

 

वह मुस्कुराई।

 

“बहुत देर से समझे।”

 

बूढ़ी औरत ने लालटेन जला दी।

 

पीली रोशनी में सामने खड़ी आकृति साफ दिखाई देने लगी।

 

उसके शरीर का आधा हिस्सा नैना जैसा था।

 

दूसरा आधा काली परछाईं जैसा।

 

बूढ़ी औरत ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

 

आकृति पीछे हटने लगी।

 

अमित ने पूछा,

 

“इसे कैसे रोकें?”

 

“तुम्हें अपना नाम बोलना होगा।”

 

“मेरा नाम?”

 

“हाँ।”

 

“बस इतना?”

 

“नहीं।”

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“पहले अपना नाम।”

 

फिर उसने अमित की माँ की तरफ देखा।

 

“फिर अपनी बहन का।”

 

फिर टूटे आईने की तरफ।

 

“और अंत में उसका।”

 

अमित ने पूछा,

 

“उसका नाम अवनि है।”

 

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“तो?”

 

“अवनि उसका झूठा नाम है।”

 

अमित चौंक गया।

 

“फिर असली नाम?”

 

बूढ़ी औरत ने फुसफुसाकर कहा—

 

“मृत्यु।”

 

कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।

 

अमित ने यह शब्द दोहराया—

 

“मृत्यु?”

 

बूढ़ी औरत ने कहा,

 

“उसका कोई इंसानी नाम नहीं है। तुम्हारे पिता ने उसे अवनि इसलिए कहा था क्योंकि असली नाम बोलते ही उसका दरवाजा खुल जाता है।”

 

अचानक फर्श पर पड़ी दरार चौड़ी हो गई।

 

उसमें से काली धुंध बाहर आने लगी।

 

नैना की आकृति चीखने लगी।

 

“भैया! अब!”

 

अमित ने अपनी पूरी ताकत से कहा—

 

“मैं अमित हूँ!”

 

घर में एक तेज धमाका हुआ।

 

दूसरा अमित पीछे हट गया।

 

अमित ने फिर कहा—

 

“मैं नैना का भाई हूँ!”

 

नैना के चेहरे पर पहली बार शांति आई।

 

काली धुंध पीछे हटने लगी।

 

अमित ने आखिरी शब्द बोलने के लिए मुँह खोला।

 

लेकिन तभी माँ ने उसका मुँह पकड़ लिया।

 

“मत बोलो!”

 

अमित ने हैरानी से उन्हें देखा।

 

माँ चिल्लाईं—

 

“अगर तुमने उसका असली नाम लिया, तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे अंदर आ जाएगी!”

 

अमित रुक गया।

 

बूढ़ी औरत ने कहा—

 

“नहीं! यही आखिरी परीक्षा है!”

 

अमित दोनों की बातों के बीच फँस गया।

 

काली धुंध अब उसकी तरफ बढ़ रही थी।

 

नैना चीख रही थी—

 

“भैया, भरोसा करो!”

 

दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

 

“किसी पर भरोसा मत करना।”

 

अमित ने आँखें बंद कर लीं।

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

 

सब शांत हो गया।

 

उसने आँखें खोलीं।

 

“मुझे अपने ऊपर भरोसा करना है।”

 

उसने फर्श पर पड़ा टूटा हुआ आईने का सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया।

 

और उसे अपने सामने कर लिया।

 

आईने के टुकड़े में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

 

लेकिन इस बार प्रतिबिंब मुस्कुरा नहीं रहा था।

 

वह रो रहा था।

 

और उसके पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

 

नैना।

 

उसने हाथ जोड़कर कहा—

 

“भैया… मुझे घर जाना है।”

 

अमित ने आईने को जमीन पर रख दिया।

 

“तो चलो।”

 

जैसे ही उसने नैना का हाथ पकड़ने की कोशिश की, काली धुंध ने उसे चारों तरफ से घेर लिया।

 

एक भयानक आवाज आई—

 

“तुमने नियम तोड़ा।”

 

अमित ने पूछा—

 

“कौन सा?”

 

आवाज आई—

 

“तुमने पीछे देखा।”

 

अमित ने पीछे देखा।

 

और इस बार…

 

उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

 

सिर्फ एक खुला दरवाजा।

 

दरवाजे के बाहर सुबह की हल्की रोशनी थी।

 

बूढ़ी औरत चीखी—

 

“भागो!”

 

अमित नैना का हाथ पकड़कर दरवाजे की ओर दौड़ा।

 

लेकिन बाहर निकलने से ठीक पहले नैना रुक गई।

 

“भैया…”

 

“क्या हुआ?”

 

उसने पीछे देखा।

 

“मुझे लगता है…”

 

वह काँपने लगी।

 

“…वह तुम्हारे साथ बाहर आ गई है।”

 

अमित ने उसकी तरफ देखा।

 

“कौन?”

 

नैना ने उसके पीछे इशारा किया।

 

अमित धीरे-धीरे मुड़ा।

 

और उसने देखा—

 

उसकी अपनी परछाईं जमीन पर नहीं थी।

 

वहाँ एक नहीं, दो परछाइयाँ थीं।

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