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भाग 5 — आखिरी रात

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

आईना टूट चुका था।

सावित्री की आत्मा मुक्त हो चुकी थी।

रवि भी चला गया था।

और आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया है।

लेकिन उसके पिता को यकीन नहीं था।

उन्होंने कहा—

“जब तक कालिका का नाम इस घर से पूरी तरह मिट नहीं जाता, खतरा खत्म नहीं हुआ है।”

आरव ने पूछा—

“हम उसे कैसे खत्म करेंगे?”

पापा ने कहा—

“मुझे नहीं पता।”

दोनों ने साधु को फोन किया।

साधु ने कहा—

“आज रात घर में मत रहना।”

पापा ने पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि आज अमावस्या है।”

आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

आसमान पर बादल छाए थे।

रात करीब दस बजे अचानक बिजली चली गई।

पापा ने कहा—

“हम अभी निकलते हैं।”

लेकिन जैसे ही उन्होंने मुख्य दरवाजा खोला, बाहर घना कोहरा था।

सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

ठक!

आरव ने कहा—

“पापा…”

पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“डरो मत।”

तभी घर में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

“माँ…”

आरव चौंका।

यह रवि की आवाज थी।

“लेकिन रवि तो मुक्त हो गया था।”

पापा ने कहा—

“यह रवि नहीं है।”

आवाज फिर आई—

“माँ…”

फिर उसी आवाज ने कहा—

“आरव…”

आरव पीछे हट गया।

आवाज बदलने लगी।

पहले रवि।

फिर उसकी माँ।

फिर सावित्री।

फिर कई लोगों की आवाजें एक साथ।

“आरव…”

दीवारों पर काले हाथों के निशान दिखाई देने लगे।

पापा ने मंदिर से मिला पवित्र धागा आरव की कलाई पर बांध दिया।

“जब तक यह तुम्हारे हाथ में है, वह तुम्हें छू नहीं पाएगी।”

तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

धड़धड़धड़…

पापा ने कहा—

“हमें ऊपर जाना होगा।”

आरव डर गया।

“फिर से?”

“हाँ। इस बार हमें इसे हमेशा के लिए खत्म करना होगा।”

दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।

ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि टूटा हुआ आईना पूरी तरह गायब था।

उसकी जगह फर्श पर एक गोल काला निशान बना हुआ था।

निशान के बीच एक पुराना दीपक रखा था।

दीपक अपने आप जल उठा।

और उसके पीछे एक आवाज आई—

“आखिर तुम आ ही गए।”

कालिका सामने खड़ी थी।

अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

वह किसी बूढ़ी औरत जैसी दिखती थी।

उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

पापा ने पूछा—

“तुम्हें क्या चाहिए?”

“वही जो मुझे कभी नहीं मिला।”

“क्या?”

“एक शरीर।”

आरव ने डरते हुए पूछा—

“किसका?”

कालिका मुस्कुराई।

“तुम्हारा।”

आरव पीछे हट गया।

“मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूंगा।”

“तुम्हें देना नहीं पड़ेगा।”

उसने हाथ उठाया।

आरव की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

उसे लगा जैसे वह किसी दूसरी जगह पहुंच गया है।

उसने खुद को एक पुराने घर में देखा।

वहां एक छोटा बच्चा खेल रहा था।

एक महिला उसे खाना खिला रही थी।

वह सावित्री थी।

बच्चा रवि था।

दृश्य बदल गया।

रवि सड़क पर खेल रहा था।

एक तेज आवाज हुई।

फिर सब अंधेरा।

सावित्री अपने बेटे को ढूंढते हुए रो रही थी।

फिर देवदत्त आया।

उसने कहा—

“मैं उसे वापस लाऊंगा।”

फिर उसने कालिका को बुलाया।

लेकिन कालिका कोई साधारण आत्मा नहीं थी।

वह उस घर में पहले से मौजूद एक भटकती शक्ति थी।

उसने देवदत्त से कहा—

“मैं तुम्हारे बेटे की याद दे सकती हूँ, जीवन नहीं।”

देवदत्त ने फिर भी अनुष्ठान किया।

और उस दिन से घर अभिशप्त हो गया।

आरव ने सब कुछ देखा।

फिर उसने कालिका से कहा—

“तुम्हें रवि नहीं चाहिए था। तुम्हें लोगों का दुःख चाहिए था।”

कालिका कुछ क्षण शांत रही।

फिर बोली—

“दुःख सबसे शक्तिशाली भावना है।”

आरव ने कहा—

“लेकिन प्यार उससे ज्यादा शक्तिशाली है।”

उसी समय उसकी कलाई पर बंधा धागा चमकने लगा।

आरव को अपनी माँ की आवाज सुनाई दी—

“बेटा, डर को जितना ताकत दोगे, वह उतना बड़ा होगा।”

आरव ने आंखें बंद कीं।

उसे माँ की सारी बातें याद आने लगीं।

वह रातें जब माँ उसे कहानी सुनाती थीं।

उसकी पहली स्कूल ड्रेस।

उसका जन्मदिन।

माँ का माथे पर हाथ रखना।

धीरे-धीरे उसके अंदर का डर कम होने लगा।

कालिका पीछे हटने लगी।

“नहीं…”

आरव ने कहा—

“तुम मेरे डर से ताकत लेती हो। लेकिन मैं अब तुमसे नहीं डरता।”

कालिका चीखी।

कमरे की दीवारें कांपने लगीं।

पापा ने किताब में लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया।

आरव ने लकड़ी का वह खिलौना जमीन पर रखा जो उसकी माँ ने बनाया था।

उसने कहा—

“यह मेरी माँ की याद है। इसे कोई नहीं छीन सकता।”

अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

मीरा की आत्मा दिखाई दी।

उसके पीछे सावित्री और रवि भी थे।

सावित्री ने कालिका से कहा—

“तुमने मेरे दुःख का इस्तेमाल किया। अब मेरा दुःख तुम्हारी ताकत नहीं है।”

रवि ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

कालिका कमजोर पड़ने लगी।

मीरा ने आरव की ओर देखा।

“अब आखिरी काम तुम्हें करना होगा।”

“क्या?”

“उसे माफ कर दो।”

आरव चौंक गया।

“जिसने आपको और इतने लोगों को परेशान किया, उसे?”

मीरा ने कहा—

“माफी उसके लिए नहीं होती। कभी-कभी माफी अपने दिल को आजाद करने के लिए होती है।”

आरव ने कालिका की ओर देखा।

“मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

कालिका चीखने लगी।

उसका शरीर धुएं में बदलने लगा।

फिर वह पूरी तरह गायब हो गई।

घर में पहली बार शांति छा गई।

सुबह सूरज की रोशनी खिड़की से अंदर आई।

पापा ने आरव को गले लगा लिया।

दोनों रो रहे थे।

उस दिन उन्होंने वह घर छोड़ने का फैसला किया।

लेकिन जाने से पहले आरव आखिरी बार ऊपर वाले कमरे में गया।

कमरा अब बिल्कुल सामान्य था।

दीवार पर उसकी माँ की एक तस्वीर लगी थी।

आरव ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

“माँ, अब मैं डरूंगा नहीं।”

तस्वीर के होंठों पर हल्की मुस्कान दिखाई दी।

आरव नीचे लौट आया।

जब वह घर से बाहर निकला, उसने पीछे मुड़कर देखा।

खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।

वह हाथ हिला रही थी।

आरव ने भी हाथ हिलाया।

फिर उसने पलक झपकाई।

खिड़की खाली थी।

उस दिन के बाद उस घर में कभी किसी ने भूत नहीं देखा।

लेकिन मोहल्ले के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि अमावस्या की रात उस घर की ऊपरी खिड़की में कभी-कभी हल्की रोशनी दिखाई देती है।

लोग कहते हैं, वह किसी भूत की रोशनी नहीं है।

वह एक माँ का प्यार 

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