आरव और उसके पापा ने पूरी रात घर से बाहर रहने का फैसला किया।
सुबह होते ही वे पुराने मंदिर गए, जहां पापा ने एक बुजुर्ग साधु से पूरी घटना बताई।
साधु ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर उन्होंने पूछा—
“यह घर तुम्हारे परिवार ने खरीदा था?”
पापा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“किससे?”
पापा ने कहा, “एक बूढ़े आदमी से। उसने बताया था कि घर कई साल से खाली पड़ा था।”
साधु ने गंभीर होकर कहा—
“उसने झूठ बोला।”
पापा चौंक गए।
“आप उसे जानते हैं?”
साधु ने कहा—
“मैंने उस घर का इतिहास सुना है। सावित्री अकेली नहीं थी।”
आरव ने पूछा—
“कौन था उसके साथ?”
साधु ने कहा—
“उसका पति।”
पापा चुप हो गए।
“सावित्री के पति का नाम देवदत्त था। वह तांत्रिक विद्या में विश्वास करता था। अपने बेटे की मौत के बाद उसने सावित्री को समझाया कि वह आत्माओं की मदद से रवि को वापस ला सकता है।”
आरव ने डरते हुए पूछा—
“क्या उसने सच में ऐसा किया?”
“उसने कोशिश की।”
साधु ने आगे कहा—
“लेकिन आत्मा को वापस लाने के बजाय उसने कई आत्माओं को उस घर में बांध दिया।”
पापा ने पूछा—
“तो सावित्री?”
“वह अपने बेटे के दुःख में धीरे-धीरे उस शक्ति का हिस्सा बन गई।”
आरव को पिछली रात का कागज याद आया।
“सावित्री अकेली नहीं थी…”
साधु ने कहा—
“उस घर में कई आत्माएं कैद थीं।”
यह सुनकर आरव के रोंगटे खड़े हो गए।
साधु ने उन्हें एक पुरानी किताब दी।
“इसे अपने साथ ले जाओ। लेकिन ध्यान रखना—घर के अंदर इसे आधी रात के बाद मत पढ़ना।”
पापा ने किताब ले ली।
घर लौटने के बाद उन्होंने दिन के उजाले में किताब पढ़नी शुरू की।
उसमें लिखा था कि देवदत्त ने एक कमरे में एक विशेष अनुष्ठान किया था। उसका उद्देश्य मृत आत्मा को वापस बुलाना था।
लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया।
रवि की आत्मा तो वापस नहीं आई, लेकिन घर में कई भटकी आत्माएं फंस गईं।
सावित्री उनमें से एक बन गई।
आरव ने पूछा—
“अगर वह आत्मा मुक्त हो गई, तो बाकी आत्माओं का क्या होगा?”
पापा ने किताब पलटी।
एक पन्ने पर लिखा था—
“जब तक घर की अंतिम स्मृति नष्ट नहीं होती, आत्माएं मुक्त नहीं होंगी।”
“अंतिम स्मृति क्या है?”
पापा ने जवाब पढ़ा।
“वह वस्तु जिसमें सबसे ज्यादा दुःख और मृत्यु की ऊर्जा बंधी हो।”
आरव को समझ आ गया।
“वह संदूक?”
पापा ने कहा—
“शायद।”
दोनों ऊपर गए।
कमरा पहले जैसा नहीं था।
दीवारों पर बने पुराने चित्र गायब हो चुके थे।
लेकिन कमरे के बीच में एक चीज रखी थी—
एक बड़ा आईना।
आरव ने आईने में देखा।
उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।
उसमें उसकी माँ खड़ी थी।
“आरव…”
वह पीछे हट गया।
“माँ?”
आईने में मीरा ने सिर हिलाया।
“बेटा, आईने को मत तोड़ना।”
पापा ने पूछा—
“मीरा, क्या इसमें आत्माएं कैद हैं?”
मीरा ने कहा—
“यह आईना सिर्फ प्रतिबिंब नहीं दिखाता। यह उन लोगों की यादें दिखाता है जिन्हें इस घर ने खोया है।”
अचानक आईने में दृश्य बदल गया।
एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।
वह रवि था।
फिर एक आदमी आया।
देवदत्त।
उसने कुछ मंत्र पढ़े और आईने के सामने एक काला दीपक जलाया।
फिर दृश्य बदल गया।
सावित्री रो रही थी।
उसकी गोद में रवि की तस्वीर थी।
देवदत्त ने कहा—
“मैं रवि को वापस लाऊंगा।”
लेकिन उसी समय कमरे में तेज हवा चली।
दीपक बुझ गया।
आईने में कई काली परछाइयां दिखाई दीं।
देवदत्त डरकर भाग गया।
सावित्री अकेली रह गई।
तभी एक परछाईं उसके पीछे आकर खड़ी हो गई।
उसने सावित्री के कान में कुछ कहा।
सावित्री ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आंखें बदल गईं।
दृश्य समाप्त हो गया।
आरव कांपने लगा।
“माँ, वह परछाईं कौन थी?”
मीरा ने कहा—
“वही असली आत्मा है जिसने सबको बांध रखा है।”
“उसका नाम?”
मीरा ने कहा—
“कालिका।”
कमरे में अचानक तापमान गिर गया।
आईना काला पड़ गया।
और एक आवाज गूंजी—
“मीरा…”
मीरा की आत्मा घबरा गई।
“आरव, भागो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
आईने से एक काली आकृति बाहर निकल आई।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने हाथ बढ़ाया।
पापा पीछे गिर गए।
आरव भागने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए।
काली आकृति ने कहा—
“तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत सालों तक रोका है।”
मीरा ने कहा—
“मैंने तुम्हें नहीं रोका। मैंने आरव को बचाया है।”
कालिका हंसी।
“अब तुम्हारा बेटा मेरे पास आएगा।”
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
उसे माँ की बात याद आई—
“सच से कभी मत भागना।”
उसने आंखें खोलीं।
“तुम चाहती क्या हो?”
कालिका शांत हो गई।
“मुझे वह चाहिए जो तुम्हारी माँ ने छिपाया।”
“क्या?”
“तुम्हारी माँ की आखिरी याद।”
पापा ने कहा—
“मीरा की आखिरी याद तो…”
अचानक उन्हें कुछ याद आया।
माँ की मृत्यु से पहले उसने आरव के लिए एक छोटा-सा लकड़ी का खिलौना बनाया था।
वह खिलौना हमेशा आरव के पास रहता था।
आरव ने जेब से उसे निकाला।
कालिका की आंखें चमक उठीं।
“यही है।”
मीरा चीखी—
“आरव, इसे मत देना!”
कालिका आगे बढ़ी।
आरव ने खिलौना पीछे कर लिया।
“यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है। मैं इसे तुम्हें नहीं दूंगा।”
कालिका का चेहरा विकृत हो गया।
“फिर तुम्हें भी यहीं रहना होगा!”
अचानक आईना टूटने लगा।
कांच की दरारों से सैकड़ों आवाजें आने लगीं।
“बचाओ…”
“हमें मुक्त करो…”
“हमें बाहर जाने दो…”
आरव ने समझ लिया कि कालिका उन सभी आत्माओं को कैद करके रखे हुए थी।
उसने पापा से कहा—
“हमें इस आईने को नष्ट करना होगा।”
पापा ने मंदिर से मिली किताब खोली।
उसमें लिखा था कि आईने को तोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।
उसे उस जगह ले जाकर तोड़ना होगा जहां पहला अनुष्ठान हुआ था।
यानी—
ऊपर वाले कमरे के बीचोंबीच।
पापा ने आईना उठाया।
लेकिन कालिका ने रास्ता रोक लिया।
मीरा ने अपनी पूरी शक्ति से उसे रोकने की कोशिश की।
“आरव, अभी!”
आरव ने लकड़ी का खिलौना जमीन पर रखा।
फिर उसने आईने को दोनों हाथों से उठाया।
और पूरी ताकत से उसे फर्श पर पटक दिया।
छन्न्न्न!
आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।
एक भयानक चीख पूरे घर में गूंज उठी।
खिड़कियां टूट गईं।
दीवारों में दरारें पड़ गईं।
काली आकृति हवा में तड़पने लगी।
फिर एक-एक करके सारी आत्माएं रोशनी में बदलने लगीं।
रवि भी उनमें था।
उसने अपनी माँ की तरफ देखा।
“माँ…”
सावित्री की आत्मा भी दिखाई दी।
वह मुस्कुराई।
और फिर दोनों रोशनी में बदल गए।
लेकिन कालिका अभी भी खत्म नहीं हुई थी।
उसने आखिरी बार आरव की तरफ देखा।
“तुमने मुझे रोका है… खत्म नहीं किया।”
और वह अंधेरे में गायब हो गई।
घर फिर शांत हो गया।
मीरा की आत्मा ने आरव को देखा।
“अब मुझे जाना होगा।”
आरव ने पूछा—
“क्या आप फिर कभी आएंगी?”
मीरा ने कहा—
“जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम्हें मेरी आवाज अपने दिल में सुनाई देगी।”
और वह भी रोशनी बनकर गायब हो गई।
आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
उस रात पहली बार घर में कोई आवाज नहीं आई।
लेकिन अगले दिन जब पापा ने टूटा हुआ आईना देखा, तो उसके एक छोटे से टुकड़े में अभी भी कुछ दिखाई दे रहा था।
एक काला चेहरा।
और उसके नीचे लिखा था—
“मैं अभी यहीं हूँ।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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