आरव और कबीर फर्श टूटने के बाद एक गहरे गड्ढे में जा गिरे।
कुछ क्षण तक दोनों को कुछ समझ नहीं आया।
आरव ने उठने की कोशिश की तो उसके हाथ में पत्थर की नुकीली चीज़ चुभ गई।
उसने टॉर्च जलाई।
वह एक विशाल भूमिगत कक्ष में था।
कबीर कुछ दूरी पर गिरा पड़ा था।
“कबीर!”
“मैं ठीक हूँ,” उसने कराहते हुए कहा।
आरव ने ऊपर देखा।
जहाँ से वे गिरे थे, वहाँ अब सिर्फ काला अँधेरा था।
कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी सामने दीवार पर एक अजीब आकृति चमकी।
वह वही निशान था जो मृणालिनी की डायरी के आखिरी पन्ने पर बना था।
आरव उसके पास गया।
दीवार पर कई नाम लिखे थे।
रुद्रगढ़ परिवार के लोगों के नाम।
हर नाम के सामने एक तारीख थी।
और सबसे नीचे नया नाम लिखा था—
आरव।
उसके सामने तारीख थी—
15 अगस्त 2026।
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“ये कैसे संभव है?”
कबीर ने काँपते हुए कहा—
“किसी ने आज ही लिखा है।”
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“नहीं।”
दोनों पलटे।
मृणालिनी वहाँ खड़ी थी।
लेकिन इस बार वह डरावनी नहीं लग रही थी।
उसके चेहरे पर उदासी थी।
आरव ने पूछा—
“तुम हमें मारना चाहती हो?”
मृणालिनी ने सिर हिलाया।
“नहीं। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ।”
कबीर ने पूछा—
“तो फिर हमें यहाँ क्यों लाया?”
मृणालिनी ने सामने की दीवार की ओर देखा।
“क्योंकि जो चीज़ इस हवेली में कैद है, वह अब जाग चुकी है।”
अचानक जमीन हिलने लगी।
दीवारों से धूल गिरने लगी।
दूर से किसी के भारी कदमों की आवाज़ आई।
धम… धम… धम…
मृणालिनी ने कहा—
“वह आ रहा है।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
उसने जवाब दिया—
“जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने भगवान समझकर बुलाया था।”
कक्ष के दूसरे छोर पर एक विशाल दरवाज़ा था।
उसके पीछे से काली धुंध बाहर आने लगी।
कबीर पीछे हट गया।
“ये क्या है?”
मृणालिनी ने कहा—
“लालच का रूप।”
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अंदर कोई इंसान नहीं था।
सिर्फ एक विशाल काली परछाईं।
उसके भीतर कई चेहरे दिखाई दे रहे थे।
बूढ़े।
बच्चे।
औरतें।
पुरुष।
जिन्होंने कभी इस हवेली में प्रवेश किया था।
काली परछाईं ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।
तभी मृणालिनी उसके सामने आ गई।
“इसे मत छूना।”
परछाईं से भारी आवाज़ निकली—
“तुमने मुझे अस्सी वर्ष कैद रखा।”
मृणालिनी ने कहा—
“क्योंकि तुमने मेरे परिवार को खा लिया।”
परछाईं हँसी।
“तुम्हारे परिवार ने खुद को मुझे सौंपा था।”
आरव समझ गया कि असली श्राप मृणालिनी नहीं थी।
असली श्राप वह शक्ति थी, जिसे रुद्रगढ़ परिवार ने लालच के कारण बुलाया था।
लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।
“मृणालिनी,” आरव ने पूछा, “तुम हमें बचाकर खुद क्यों नहीं निकल जाती?”
मृणालिनी की आँखों में आँसू आ गए।
“क्योंकि मैं इस हवेली से बंधी हूँ। मेरी आत्मा तभी मुक्त होगी जब कोई जीवित इंसान इस श्राप को तोड़ेगा।”
“कैसे?”
“धरोहर को नष्ट करके नहीं।”
उसने एक पत्थर की दीवार की ओर इशारा किया।
“सच को बाहर लाकर।”
आरव ने तुरंत समझ लिया।
उसे परिवार के अपराध का सच दुनिया के सामने लाना होगा।
उसने अपने कैमरे की ओर देखा।
कैमरा अभी भी उसके बैग में था।
लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता नहीं था।
तभी कबीर ने देखा कि कमरे के एक कोने में लोहे की सीढ़ी लगी है।
“उधर!”
दोनों सीढ़ी की ओर भागे।
काली परछाईं उनके पीछे बढ़ने लगी।
मृणालिनी उसे रोक रही थी।
“जल्दी करो!”
आरव और कबीर ऊपर चढ़ने लगे।
सीढ़ी उन्हें एक पुराने भंडारघर में ले आई।
आरव ने बैग उठाया।
कैमरा सुरक्षित था।
उसने तुरंत रिकॉर्डिंग शुरू की।
“अगर यह वीडियो किसी को मिले, तो रुद्रगढ़ हवेली के बारे में सच्चाई—”
अचानक पीछे से हरिदास की आवाज़ आई।
“तुम सच बाहर नहीं ले जा सकते।”
आरव पलटा।
हरिदास हाथ में पुरानी तलवार लिए खड़ा था।
उसके पीछे मृणालिनी थी।
हरिदास ने कहा—
“यह हवेली सिर्फ रहस्य नहीं छिपाती। यह हमारे पाप छिपाती है।”
आरव ने कहा—
“अब ये पाप नहीं छिपेंगे।”
हरिदास ने तलवार उठाई।
तभी मृणालिनी ने उसे रोक लिया।
“बस।”
हरिदास ने उसकी ओर देखा।
मृणालिनी ने कहा—
“अस्सी साल से तुम इसी डर में जी रहे हो कि सच बाहर आ जाएगा। लेकिन सच से डरने वाला ही असली कैदी होता है।”
हरिदास की आँखों से आँसू निकलने लगे।
उसने तलवार नीचे कर दी।
और उसी क्षण पूरी हवेली हिलने लगी।
दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
काली धुंध पूरे गलियारे में फैल गई।
मृणालिनी ने आरव से कहा—
“अब आखिरी काम बाकी है।”
“क्या?”
“हवेली के मुख्य आँगन में जाओ। वहाँ जो पत्थर का स्तंभ है, उसके नीचे मेरे पिता की आखिरी निशानी है। उसे बाहर निकालो।”
आरव और कबीर नीचे भागे।
आँगन में पहुँचकर उन्होंने पत्थर हटाया।
नीचे एक पुराना लोहे का बक्सा था।
बक्से के अंदर एक पत्र था।
पत्र पढ़ते ही आरव की आँखें फैल गईं।
वह पत्र राजेंद्र सिंह का था।
उसमें लिखा था—
“मैंने अपनी बेटी को बलि दी, लेकिन असली बलि उस रात नहीं हुई। मैंने अपनी आत्मा उसी दिन खो दी थी।”
आरव ने पत्र कैमरे के सामने पढ़ना शुरू किया।
जैसे ही उसने आखिरी शब्द पढ़े—
पूरी हवेली में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।
“अब सच पूरा हुआ।”
मृणालिनी आँगन के बीच खड़ी थी।
उसका चेहरा अब शांत था।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“धन्यवाद।”
फिर उसके पीछे खड़ी काली परछाईं चीखने लगी।
हवेली की दीवारें टूटने लगीं।
और अगली सुबह…
रुद्रगढ़ हवेली का पश्चिमी हिस्सा पूरी तरह गिर चुका था।
लेकिन मलबे के बीच एक चीज़ बिल्कुल सही सलामत थी—
मृणालिनी की तस्वीर।
आरव ने सोचा कि श्राप खत्म हो चुका है।
लेकिन जब उसने तस्वीर कैमरे में देखी…
तो मृणालिनी के पास एक नया चेहरा खड़ा था।
वह चेहरा…
कबीर का था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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