तेरी मेरी दास्तान
एपिसोड 5 — एक सच, दो दिल
आरोही अपनी मां के सामने बिल्कुल खामोश बैठी थी।
मां के मुंह से निकले शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”
आरोही को लग रहा था जैसे उसके आसपास की सारी आवाजें अचानक बंद हो गई हों।
उसने मां की तरफ देखा।
“मां… आप क्या कह रही हैं?”
उसकी आवाज कांप रही थी।
मां ने नजरें झुका लीं।
“मैं वही कह रही हूं जो इतने सालों से अपने दिल में दबाकर बैठी हूं।”
“लेकिन पापा की मौत तो एक एक्सीडेंट में हुई थी।”
“हां… यही मैंने तुम्हें बताया था।”
“तो फिर सच क्या है?”
मां की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“सच ये है कि तुम्हारे पापा का एक्सीडेंट करवाया गया था।”
आरोही की सांस अटक गई।
“किसने?”
मां ने कोई जवाब नहीं दिया।
“मां!”
आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे सच जानना है।”
मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
“तुम्हारे पापा और आरव के पिता के बीच बहुत पुरानी दुश्मनी थी।”
“लेकिन क्यों?”
“बिजनेस।”
“बस बिजनेस के लिए कोई किसी को मार देगा?”
मां ने धीरे से सिर हिलाया।
“बात सिर्फ बिजनेस की नहीं थी।”
आरोही ध्यान से उनकी तरफ देखने लगी।
“तो फिर?”
मां कुछ कहने ही वाली थीं कि अचानक उनकी नजर दरवाजे की तरफ चली गई।
वह तुरंत चुप हो गईं।
आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाजा बंद था।
“क्या हुआ मां?”
“कुछ नहीं।”
“आप कुछ छुपा रही हैं।”
“आरोही, मेरी बात सुन।”
मां ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
“आरव से दूर रहो।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“मैं ऐसा नहीं कर सकती।”
“क्यों?”
आरोही चुप हो गई।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
वह कैसे कहती कि आरव अब उसके लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं था?
कि उसकी आवाज सुनते ही उसके दिल की धड़कन बदल जाती थी।
कि उसके साथ बिताया हर पल उसे याद रहता था।
कि आज पहली बार जब आरव ने कहा था “तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”
तो उसके दिल ने उसी पल उसे अपना मान लिया था।
मां उसकी खामोशी समझ गईं।
उन्होंने धीरे से पूछा,
“तुम उससे प्यार करने लगी हो?”
आरोही की आंखें भर आईं।
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।
मां ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
“नहीं…”
आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।
“मां, प्यार को मैं आदेश देकर खत्म नहीं कर सकती।”
“लेकिन ये प्यार तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगा।”
“अगर आरव दोषी नहीं हुआ तो?”
मां चुप हो गईं।
आरोही ने कहा,
“आपने कहा कि उसके परिवार की वजह से पापा की मौत हुई। लेकिन क्या आरव उस वक्त वहां था?”
मां ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो फिर उसकी क्या गलती है?”
मां के पास कोई जवाब नहीं था।
आरोही उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई।
दरवाजे पर पहुंचकर वह रुकी।
“मां।”
“हां?”
“मैं आरव से दूर नहीं जाऊंगी… जब तक मुझे खुद ये यकीन न हो जाए कि वो मेरे पापा की मौत के लिए जिम्मेदार है।”
मां ने आंखें बंद कर लीं।
“तुम नहीं जानती कि तुम किस आग से खेल रही हो।”
आरोही ने धीरे से कहा,
“शायद।”
फिर वह कमरे में चली गई।
अपने कमरे में पहुंचते ही आरोही ने दरवाजा बंद कर लिया।
उसने खुद को आईने में देखा।
आंखों में आंसू थे।
उसने मोबाइल उठाया।
आरव का नाम स्क्रीन पर था।
कुछ पल तक वह उसे देखती रही।
फिर कॉल कर दिया।
पहली घंटी।
दूसरी घंटी।
तीसरी घंटी।
आरव ने फोन उठा लिया।
“आरोही?”
उसकी आवाज सुनते ही आरोही की आंखों से आंसू गिर पड़े।
“हां।”
आरव तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।
“क्या हुआ?”
“तुम कहां हो?”
“घर पर।”
“मुझसे मिलोगे?”
कुछ पल की खामोशी रही।
फिर आरव ने पूछा,
“अभी?”
“हां।”
“सब ठीक है?”
आरोही ने आंखें बंद कर लीं।
“नहीं।”
आरव की आवाज गंभीर हो गई।
“मैं आ रहा हूं।”
करीब आधे घंटे बाद आरव अपनी कार लेकर आरोही के घर के बाहर पहुंच गया।
आरोही पहले से बाहर खड़ी थी।
उसने आरव को देखते ही महसूस किया कि उसके अंदर का सारा डर अचानक थोड़ा कम हो गया।
आरव उसके पास आया।
“क्या हुआ?”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
कुछ सेकंड तक वह कुछ बोल नहीं पाई।
फिर अचानक उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
आरव घबरा गया।
“आरोही!”
वह उसके करीब आया।
“क्या हुआ?”
आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,
“क्या तुम्हारे परिवार ने मेरे पापा को मारा था?”
आरव बिल्कुल जम गया।
उसने उसे देखा।
आरोही की आंखों में दर्द था।
“मेरी मां ने कहा है कि मेरे पापा की मौत के पीछे तुम्हारे परिवार का हाथ था।”
आरव ने धीरे से सांस छोड़ी।
“मुझे इसका अंदाजा था।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“तुम्हें पता था?”
“आज ही कुछ बातें पता चली थीं।”
“और तुमने मुझे बताया नहीं?”
“मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता था।”
“लेकिन मुझे सच जानने का हक था।”
“हां।”
आरव ने सिर झुका लिया।
“मुझे बताना चाहिए था।”
आरोही ने आंसू पोंछे।
“अब बताओ।”
आरव ने उसकी आंखों में देखा।
“मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पापा की मौत के पीछे कौन था।”
“लेकिन?”
“इतना जरूर जानता हूं कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता के बीच बहुत बड़ा विवाद था।”
“किस बात पर?”
आरव चुप हो गया।
“आरव!”
“एक प्रोजेक्ट को लेकर।”
“कौन सा प्रोजेक्ट?”
आरव ने कहा,
“एक ऐसी जमीन का मामला था जिस पर दोनों परिवारों की नजर थी।”
आरोही ने पूछा,
“और मेरे पापा हार गए?”
“नहीं।”
आरव की आवाज भारी हो गई।
“तुम्हारे पापा ने वो जमीन मेरे पिता से बचा ली थी।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“फिर?”
“उसके कुछ ही दिन बाद उनका एक्सीडेंट हुआ।”
दोनों के बीच खामोशी छा गई।
आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।
“तो क्या मेरे पापा को तुम्हारे पिता ने मरवाया?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“मैं नहीं जानता।”
“लेकिन शक है?”
“हां।”
आरोही ने नजरें झुका लीं।
कुछ पल बाद उसने पूछा,
“और अगर सच में ऐसा हुआ?”
आरव की आंखों में दर्द उतर आया।
“तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर अपने परिवार का बचाव नहीं करूंगा।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
“अगर मेरे परिवार ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है… तो मैं उसका हिस्सा नहीं बनूंगा।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगे?”
आरव ने कहा,
“सच के खिलाफ नहीं जा सकता।”
आरोही उसके पास आ गई।
“आरव…”
आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
“एक बात कहूं?”
“हां।”
“तुम मुझसे नाराज हो सकती हो।”
“हम्म।”
“मुझसे दूर भी जा सकती हो।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“लेकिन?”
आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,
“मुझ पर उस गलती की सजा मत देना जो मैंने की ही नहीं।”
आरोही कुछ नहीं बोली।
उसने बस अपना हाथ उसके हाथ में रहने दिया।
उस पल दोनों के बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी।
अचानक आरोही के फोन पर एक मैसेज आया।
उसने स्क्रीन देखी।
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“अगर आरव पर भरोसा किया, तो अपनी मां को खो दोगी।”
आरोही के हाथ कांपने लगे।
आरव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
आरोही ने फोन उसे दिखा दिया।
मैसेज पढ़ते ही आरव का चेहरा सख्त हो गया।
“ये नंबर मुझे दो।”
“क्यों?”
“मैं पता लगाऊंगा कि ये कौन है।”
आरव ने नंबर अपने फोन में सेव कर लिया।
तभी पीछे से एक कार तेजी से उनके पास से गुजरी।
आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।
“सावधान!”
कार कुछ दूर जाकर रुक गई।
दोनों ने उसकी तरफ देखा।
कार की खिड़की थोड़ी खुली।
अंदर कोई बैठा था।
लेकिन चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।
आरव ने तुरंत कहा,
“तुम अंदर जाओ।”
“लेकिन”
“आरोही, अभी।”
उसकी आवाज में ऐसी सख्ती थी कि आरोही बिना कुछ कहे घर के अंदर चली गई।
आरव वहीं खड़ा कार को जाते हुए देखता रहा।
उसने नंबर नोट करने की कोशिश की।
लेकिन कार इतनी दूर निकल चुकी थी कि नंबर साफ नहीं दिखा।
उसने कबीर को फोन किया।
“कबीर, मुझे अभी तुम्हारी मदद चाहिए।”
“क्या हुआ?”
“आरोही को धमकी मिल रही है।”
“क्या?”
“और कोई हमारा पीछा कर रहा है।”
कबीर कुछ पल चुप रहा।
“मैं अभी आता हूं।”
रात के करीब ग्यारह बजे।
आरोही अपने कमरे में बैठी थी।
मां सो चुकी थीं।
लेकिन आरोही की आंखों में नींद नहीं थी।
वह बार-बार आरव के बारे में सोच रही थी।
उसने मोबाइल उठाया।
आरव का मैसेज था “सो जाना। मैं हूं।”
आरोही ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “तुम हमेशा रहोगे?”
कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “अगर तुमने साथ दिया तो।”
आरोही के दिल की धड़कन तेज हो गई।
उसने लिखा “और अगर मैंने साथ नहीं दिया?”
आरव का जवाब आया “फिर भी।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
उसने फोन सीने से लगा लिया।
उसे अब खुद से सच स्वीकार करना पड़ा।
वह आरव से प्यार करने लगी थी।
लेकिन उसी प्यार के साथ एक डर भी था।
अगर उसकी मां की बात सच हुई…
अगर सच में आरव के परिवार ने उसके पिता को मारा था…
तो क्या उनका प्यार इस सच के सामने टिक पाएगा?
उधर आरव और कबीर एक सुनसान ऑफिस में बैठे थे।
कबीर ने लैपटॉप पर कुछ तस्वीरें खोल रखी थीं।
“ये देख।”
आरव स्क्रीन के करीब आया।
एक पुरानी फोटो थी।
उसमें आरव के पिता राजवीर सिंह और आरोही के पिता विनय मेहरा एक साथ खड़े थे।
लेकिन फोटो के पीछे एक तीसरा आदमी भी था।
आरव ने उसे गौर से देखा।
“इसे मैं पहचानता हूं।”
कबीर ने पूछा,
“कौन?”
“मेरे पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर… विक्रम सूद।”
कबीर ने दूसरी फाइल खोली।
“और सबसे बड़ी बात?”
“क्या?”
“तुम्हारे पिता की मौत के बाद कंपनी का सबसे बड़ा फायदा इसी आदमी को हुआ था।”
आरव की आंखें सिकुड़ गईं।
“मतलब?”
कबीर ने कहा,
“हो सकता है हम इतने सालों से गलत इंसान पर शक कर रहे हों।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
“अगर विक्रम सूद ने ये सब किया है… तो उसने मेरे परिवार और आरोही के परिवार के बीच दुश्मनी क्यों पैदा की?”
कबीर ने कहा,
“यही पता करना होगा।”
आरव ने कुर्सी से उठते हुए कहा,
“कल से नहीं।”
कबीर ने उसे देखा।
“क्या?”
“अभी से।”
उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक आलीशान घर के अंदर एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।
उसके हाथ में वही तस्वीर थी जिसमें आरव और आरोही कैफे में बैठे थे।
वह तस्वीर को देखकर मुस्कुराया।
“तुम दोनों जितना करीब आओगे…”
उसने धीरे से कहा,
“मेरे लिए खेल उतना ही आसान होता जाएगा।”
तभी पीछे से एक आदमी ने पूछा,
“सर, क्या करें?”
उसने तस्वीर टेबल पर रख दी।
“पहले आरव को उसके पिता के खिलाफ करो।”
“और लड़की?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“आरोही को उसके पिता के सच तक पहुंचने दो।”
“अगर वो सच तक पहुंच गई तो?”
उस आदमी की मुस्कान और गहरी हो गई।
“तभी तो असली खेल शुरू होगा।”
अगली सुबह आरोही की मां अपने कमरे में पुरानी अलमारी खोल रही थीं।
अचानक उन्हें नीचे रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा दिखाई दिया।
उन्होंने उसे बाहर निकाला।
डिब्बे में कुछ पुराने कागज और एक चाबी थी।
लेकिन सबसे नीचे एक लिफाफा था।
लिफाफे पर लिखा था “आरोही के लिए जब उसे सच्चाई जानने का समय आए।”
मां की आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने लिफाफा हाथ में लिया।
“शायद अब वो समय आ गया है।”
लेकिन उन्हें नहीं पता था उस लिफाफे के अंदर सिर्फ आरोही के पिता की मौत का राज नहीं था।
उसमें एक ऐसा सच था जो आरव और आरोही के रिश्ते की पूरी नींव हिला देने वाला था।
और शायद उस सच के सामने आने के बाद दोनों के लिए एक-दूसरे से प्यार करना सबसे मुश्किल काम होने वाला था।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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