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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 4

पढ़ने का समय : 10 मिनट

तेरी मेरी दास्तान

 

एपिसोड 4 — एक अनकहा एहसास

 

आरव कुछ देर तक अपने हाथ में पकड़ी तस्वीर को देखता रहा।

 

तस्वीर में वह और आरोही आमने-सामने बैठे थे।

 

दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी।

 

उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था कि दोनों के बीच कुछ खास है।

 

लेकिन आरव की नजर तस्वीर पर नहीं, उसके पीछे लिखे शब्दों पर अटक गई थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

 

उसकी मुट्ठी कस गई।

 

“कबीर ने जो कहा… उसका मतलब क्या है?”

 

आरव ने तुरंत अपना फोन उठाया और कबीर को कॉल किया।

 

“कबीर, तुम अभी कहां हो?”

 

“अपने ऑफिस में।”

 

“मैं आ रहा हूं।”

 

“आरव, अकेले मत आना।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि जो पता चला है, वो थोड़ा गंभीर है।”

 

आरव ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया।

 

वह कुर्सी से उठा और ऑफिस से बाहर निकल गया।

 

लेकिन जैसे ही वह लिफ्ट की तरफ बढ़ा, उसके फोन पर आरोही का मैसेज आया।

 

“आज शाम झील चलोगे?”

 

आरव के कदम रुक गए।

 

कुछ सेकंड तक वह उस मैसेज को देखता रहा।

 

उसके चेहरे पर तनाव के बीच हल्की मुस्कान आ गई।

 

उसने जवाब लिखा “तुम बुलाओ और मैं ना आऊं, ऐसा हो सकता है?”

 

कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “तो फिर शाम 6 बजे।”

 

आरव ने लिखा “पक्का।”

 

फोन जेब में रखते ही उसकी मुस्कान गायब हो गई।

 

उसे कबीर से मिलने जाना था।

 

क्योंकि अब उसे जानना था आखिर आरोही कौन थी?

 

कबीर के ऑफिस में पहुंचते ही आरव ने बिना समय गंवाए पूछा,

 

“क्या पता चला?”

 

कबीर ने दरवाजा बंद किया।

 

फिर टेबल पर एक फाइल रख दी।

 

“पहले बैठ।”

 

आरव ने फाइल खोली।

 

अंदर कुछ पुराने दस्तावेज और तस्वीरें थीं।

 

सबसे ऊपर एक तस्वीर लगी थी।

 

एक छोटी बच्ची की।

 

आरव ने तस्वीर हाथ में उठाई।

 

“ये कौन है?”

 

कबीर ने धीमी आवाज में कहा,

 

“आरोही।”

 

आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

 

बच्ची की आंखें बिल्कुल वैसी ही थीं।

 

“ये कितने साल पुरानी है?”

 

“लगभग बीस साल।”

 

आरव ने अगला कागज उठाया।

 

“यहां नाम… आरोही मेहरा लिखा है।”

 

कबीर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“लेकिन आरोही ने मुझे बताया था कि उसका नाम आरोही शर्मा है।”

 

“यही तो समस्या है।”

 

कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

 

“लगभग दस साल पहले उसके पिता की मौत एक कार दुर्घटना में हुई थी। उसके बाद उसकी मां उसे लेकर शहर छोड़कर चली गईं।”

 

आरव ने पूछा,

 

“फिर?”

 

“फिर कुछ साल बाद दोनों वापस आईं। लेकिन उन्होंने अपना सरनेम बदल लिया।”

 

“क्यों?”

 

कबीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“यही हमें पता नहीं।”

 

आरव चुप हो गया।

 

कबीर ने एक और फोटो उसके सामने रखी।

 

आरव की आंखें अचानक ठहर गईं।

 

फोटो में एक आदमी था।

 

वह आदमी उसे पहचानता था।

 

“ये…”

 

“हां।”

 

कबीर ने कहा,

 

“इसी आदमी का नाम पिछले कई सालों से तुम्हारे परिवार के दुश्मनों की लिस्ट में है।”

 

आरव ने फोटो को कसकर पकड़ लिया।

 

“लेकिन इसका आरोही से क्या संबंध है?”

 

कबीर ने कहा,

 

“यही सबसे बड़ा सवाल है।”

 

कुछ पल दोनों चुप रहे।

 

फिर आरव ने धीरे से कहा,

 

“मुझे आरोही से मिलना होगा।”

 

कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“आरव, सोच-समझकर।”

 

“मैं सोच चुका हूं।”

 

“तू भावनाओं में फैसला मत ले।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“अगर वो इस सब में फंसी है, तो मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

 

कबीर ने गहरी सांस ली।

 

“और अगर वही इस कहानी की वजह निकली तो?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“तो सच सामने आने तक मैं उसका साथ नहीं छोड़ूंगा।”

 

शाम के छह बजने में कुछ मिनट बाकी थे।

 

आरोही झील के किनारे खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

 

आज उसने हल्के गुलाबी रंग का सूट पहना था।

 

उसके हाथ में वही डायरी थी।

 

वह बार-बार घड़ी देख रही थी।

 

“छह बजने वाले हैं…”

 

उसने धीरे से कहा।

 

तभी पीछे से आवाज आई “किसका इंतजार हो रहा है?”

 

आरोही ने पलटकर देखा।

 

आरव खड़ा था।

 

सफेद शर्ट और काली जींस में।

 

चेहरे पर वही मुस्कान थी।

 

आरोही ने राहत की सांस ली।

 

“आपका।”

 

आरव ने भौंह उठाई।

 

“इतनी आसानी से मान लिया?”

 

“क्या?”

 

“कि आप मेरा इंतजार कर रही थीं।”

 

आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

 

“आपको कोई गलतफहमी है तो मैं जा सकती हूं।”

 

वह जाने के लिए मुड़ी ही थी कि आरव ने कहा,

 

“रुको।”

 

आरोही रुक गई।

 

आरव उसके पास आया।

 

“मजाक कर रहा था।”

 

“बहुत खराब मजाक है आपका।”

 

“लेकिन तुम मुस्कुरा रही हो।”

 

आरोही ने महसूस किया कि सच में उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

 

“आपको हर चीज कैसे पता चल जाती है?”

 

आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“तुम्हें देखकर पता चल जाता है।”

 

आरोही कुछ पल चुप रही।

 

दोनों झील के किनारे चलने लगे।

 

कुछ दूर जाने के बाद आरोही ने अपनी डायरी आरव की तरफ बढ़ाई।

 

“ये पढ़ोगे?”

 

आरव ने हैरानी से पूछा,

 

“तुम्हारी डायरी?”

 

“हां।”

 

“मैं तुम्हारी निजी बातें नहीं पढ़ूंगा।”

 

आरोही मुस्कुराई।

 

“जिस पन्ने पर मैंने तुम्हारे बारे में लिखा है, वो पढ़ सकते हो।”

 

आरव ने डायरी ले ली।

 

पन्ना खोला।

 

उस पर लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं।

पहले अजनबी लगते हैं,

फिर दोस्त बन जाते हैं।

और पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

 

आरव ने पढ़ना बंद कर दिया।

 

उसने धीरे से पूछा,

 

“ये मेरे बारे में है?”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

“शायद।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“तुम्हारा ये ‘शायद’ बहुत खतरनाक है।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि हर बार मुझे उम्मीद दे देता है।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“किस चीज की उम्मीद?”

 

आरव कुछ बोलने ही वाला था कि उसका फोन बज उठा।

 

कबीर का कॉल था।

 

आरव ने फोन देखा और कॉल काट दी।

 

आरोही ने पूछा,

 

“किसका फोन था?”

 

“कबीर का।”

 

“उठाया क्यों नहीं?”

 

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

 

“क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ हूं।”

 

आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

“आरव…”

 

“हम्म?”

 

“तुम्हें कभी लगता है कि हम बहुत जल्दी करीब आ रहे हैं?”

 

आरव ने कुछ पल सोचा।

 

“हां।”

 

“और डर नहीं लगता?”

 

“किससे?”

 

“कि अगर ये रिश्ता टूट गया तो?”

 

आरव की आंखों में अचानक गंभीरता आ गई।

 

“हर खूबसूरत चीज के खत्म होने का डर होता है।”

 

“फिर?”

 

“फिर भी इंसान उसे जीता है।”

 

आरोही की आंखें नम हो गईं।

 

“तुम बहुत अजीब हो।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“तुम भी।”

 

तभी अचानक तेज हवा चली।

 

आरोही के हाथ से डायरी छूटकर नीचे गिर गई।

 

आरव उसे उठाने झुका।

 

लेकिन उसी वक्त उसे डायरी के अंदर से एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

 

एक आदमी और एक छोटी बच्ची।

 

आरव की नजर उस आदमी के चेहरे पर पड़ी।

 

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

 

वही आदमी।

 

वही चेहरा।

 

जो कुछ देर पहले कबीर की फाइल में था।

 

आरोही के पिता।

 

आरव ने तस्वीर हाथ में उठा ली।

 

“ये कौन हैं?”

 

आरोही अचानक घबरा गई।

 

उसने तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

 

“मेरे पापा।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तुम्हारे पापा का नाम क्या था?”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

कुछ पल चुप रही।

 

फिर बोली,

 

“विनय मेहरा।”

 

आरव के दिल की धड़कन तेज हो गई।

 

“तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारा सरनेम मेहरा है।”

 

आरोही का चेहरा उतर गया।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

आरव चुप हो गया।

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“आरव… तुम्हें क्या पता चला है?”

 

आरव उसे देखता रहा।

 

वह सच बताना चाहता था।

 

लेकिन उसी वक्त उसका फोन फिर बजा।

 

इस बार एक अनजान नंबर था।

 

आरव ने कॉल उठाई।

 

“हैलो?”

 

दूसरी तरफ वही भारी आवाज थी।

 

“मैंने कहा था ना… लड़की से दूर रहो।”

 

आरव की आंखों में गुस्सा आ गया।

 

“तुम हो कौन?”

 

“जिस सच की तलाश तुम कर रहे हो, वो तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा।”

 

“सामने आकर बात करो।”

 

“जल्द ही।”

 

कॉल कट हो गई।

 

आरोही ने घबराकर पूछा,

 

“कौन था?”

 

आरव ने फोन नीचे किया।

 

“कोई नहीं।”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“झूठ मत बोलो।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“आरोही…”

 

“तुम कुछ जानते हो।”

 

“हां।”

 

“क्या?”

 

आरव ने गहरी सांस ली।

 

“तुम्हारे पिता के बारे में।”

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“मेरे पापा?”

 

“हां।”

 

“क्या हुआ था उन्हें?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“मुझे अभी पूरी बात नहीं पता।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“लेकिन तुम कुछ जानते हो।”

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“इतना जानता हूं कि तुम्हारे पापा की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं थी।”

 

आरोही जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।

 

“क्या?”

 

“मुझे शक है कि उनकी मौत के पीछे वही लोग हैं जो आज हमें धमका रहे हैं।”

 

आरोही ने अपना सिर पकड़ लिया।

 

“नहीं…”

 

“आरोही, मेरी बात सुनो।”

 

“नहीं!”

 

वह पीछे हट गई।

 

“मेरी मां ने हमेशा कहा था कि वो हादसा था।”

 

आरव ने कहा,

 

“हो सकता है उन्हें भी पूरी सच्चाई न पता हो।”

 

आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

 

“तो इतने सालों से… मैं जिस सच को मानती आई… वो झूठ था?”

 

आरव उसके पास आया।

 

“मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्यों?”

 

आरव ने बिना सोचे जवाब दिया,

 

“क्योंकि अब तुम सिर्फ मेरी दोस्त नहीं हो।”

 

आरोही की सांस रुक गई।

 

“तो क्या हूं?”

 

आरव कुछ पल उसकी आंखों में देखता रहा।

 

उसके पास जवाब था।

 

लेकिन शब्द नहीं थे।

 

वह बस इतना कह पाया “तुम… मेरे लिए बहुत खास हो।”

 

आरोही की आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“बस खास?”

 

आरव भी मुस्कुरा दिया।

 

“शायद उससे भी ज्यादा।”

 

दोनों के बीच कुछ पल की खामोशी छा गई।

 

इस बार वह खामोशी अजीब नहीं थी।

 

उसमें एक नया एहसास था।

 

एक ऐसा एहसास जिसे दोनों महसूस कर रहे थे…

 

लेकिन कोई नाम नहीं दे रहा था।

 

उसी रात आरोही घर पहुंची तो उसकी मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

 

आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

 

“कहां थी?”

 

“झील के पास।”

 

मां का चेहरा अचानक बदल गया।

 

“किसके साथ?”

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“आरव के साथ।”

 

मां के हाथ से चाय का कप लगभग गिर गया।

 

“आरव?”

 

“हां।”

 

“उससे दूर रहो।”

 

आरोही चौंक गई।

 

“आप भी यही क्यों कह रही हैं?”

 

मां की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

“क्योंकि मैं उसे जानती हूं।”

 

“कैसे?”

 

मां चुप हो गईं।

 

आरोही उनके पास आकर बैठ गई।

 

“मां, सच बताइए।”

 

मां ने उसकी तरफ देखा।

 

उनकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

 

आरोही जैसे सुनकर जम गई।

 

“क्या?”

 

मां ने कांपती आवाज में कहा,

 

“तुम्हें उससे दूर रहना होगा।”

 

आरोही के हाथ कांपने लगे।

 

“लेकिन क्यों?”

 

मां ने सिर्फ इतना कहा “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारे पापा और आरव के परिवार के बीच क्या हुआ था… तो तुम खुद उससे नफरत करने लगोगी।”

 

आरोही की आंखों के सामने आरव का चेहरा घूमने लगा।

 

उसकी मुस्कान…

 

उसकी बातें…

 

उसका हाथ पकड़कर कहना “मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

 

और अब…

 

उसके पिता की मौत का संबंध उसी परिवार से था।

 

आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

 

उसने खुद से पूछा “क्या मैं आरव से प्यार करने लगी हूं?”

 

और इस सवाल का जवाब…

 

उसके दिल ने बिना किसी झिझक के दे दिया।

 

“हां।”

 

लेकिन अब एक नई मुश्किल सामने थी।

 

जिस इंसान से उसका दिल प्यार करने लगा था… शायद उसी के परिवार ने उसके पिता को उससे छीन लिया था।

 

जारी रहेगा…

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