part – 23 nai jagah ka akela pan
मुंबई की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। अप्रैल की गर्म हवा प्रिया और रिया के चेहरों पर लगी। शिमला की ठंडक से बिल्कुल उलट – यहां उमस थी, भीड़ थी, शोर था। प्रिया ने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। सफेद सलवार-कमीज पहनी थी – विधवा की तरह नहीं, लेकिन दिल से वो खुद को विधवा ही महसूस कर रही थी। गले में मंगलसूत्र अभी भी था, लेकिन वो अब यादों का बोझ लगता था। रिया उसके बगल में थी – उसका सूटकेस, और प्रिया का सहारा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और प्लेटफॉर्म से बाहर निकलीं।
आदित्य पापा बाहर कार लेकर इंतजार कर रहे थे। उन्हें देखकर प्रिया की आंखें फिर भर आईं। वो दौड़ी और पापा से लिपट गई। “पापा…”
आदित्य ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें भी नम थीं। “बेटी… आ गई। अब सब ठीक होगा।”
रिया ने भी गले लगाया। “अंकल… थैंक्स कि हमें अपनाया।”
कार में बैठे। मुंबई की सड़कें – ट्रैफिक, हॉर्न, ऊंची इमारतें। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसका मन शिमला में था – ठाकुर हाउस में, आरव के साथ। “आरव… तुम कहां हो? मुझे अकेला छोड़कर…”
आदित्य पापा का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – छोटा, लेकिन आरामदायक। दो बेडरूम, बालकनी से समुद्र दिखता था। प्रिया को एक कमरा दिया गया। रिया को दूसरा। सामान रखते वक्त प्रिया ने अपना सूटकेस खोला। अंदर आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – जो एक्सीडेंट में बच गया था। प्रिया ने उसे छुआ और रो पड़ी। “आरव… तुम्हारी खुशबू अभी भी है।”
रिया ने उसे गले लगाया। “प्रिया… रो मत। हम साथ हैं।”
लेकिन रात हुई तो अकेलापन शुरू हो गया। प्रिया अपने कमरे में थी। नई जगह – नई दीवारें, नई छत, नई हवा। लेकिन दिल पुराना था। वो बिस्तर पर लेटी, छत को देख रही थी। आंसू बह रहे थे। “आरव… यहां सब नया है। लेकिन तुम नहीं हो। मुझे तुम्हारी कमी हर पल खल रही है। शिमला में तुम्हारी यादें थीं – वो लॉन जहां हम बर्फ में खेलते थे, वो हवेली जहां हमारा घर बनने वाला था, वो कमरा जहां हमारी पहली रात… लेकिन यहां? यहां सिर्फ अकेलापन है।”
प्रिया उठी। बालकनी में गई। मुंबई की लाइट्स चमक रही थीं, दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। लेकिन प्रिया को शिमला की बर्फ याद आ रही थी। “आरव… याद है? वो रात जब तुमने मुझे प्रपोज किया था। बर्फ गिर रही थी, तुमने रिंग दी। मैं कितनी खुश थी। अब वो रिंग हाथ में है, लेकिन तुम नहीं।” प्रिया ने रिंग को चूमा। आंसू गिर पड़े। वो फर्श पर बैठ गई, घुटने मुंह से लगाए रोने लगी। “आरव… मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई देती है। ‘प्रिया… मेरी जान।’ लेकिन अब वो आवाज सिर्फ याद है।”
रिया कमरे में आई। प्रिया को बालकनी में रोते देखा। वो पास बैठी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी नींद नहीं आ रही। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई थे। उनकी हंसी, उनकी चिढ़ाना… सब याद आता है।”
प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “रिया… यहां सब नया है। लेकिन दिल पुराना दर्द लिए बैठा है। मैं सोचती हूं – आरव अगर होते तो क्या कहते? ‘प्रिया, मुंबई एंजॉय कर। मैं तेरे साथ हूं।’ लेकिन वो नहीं हैं।”
रिया ने कहा, “प्रिया… हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक होगा।”
लेकिन प्रिया का मन नहीं मान रहा था। वो रात भर जागती रही। आरव की यादें उसे सताती रहीं – वो पहली मुलाकात कॉलेज में, वो डांस पार्टी, वो हवेली की रातें, वो किस, वो गले लगना। “आरव… तुमने कहा था हमारा घर बनेगा। बच्चे होंगे। लेकिन अब? अब सिर्फ मैं हूं। अकेली।”
सुबह हुई। आदित्य पापा NGO ले गए। ‘हृदय सेवा’ – गरीब बच्चों और दिल के मरीजों के लिए। प्रिया ने काम शुरू किया – बच्चों को पढ़ाना, मरीजों से बात करना। लेकिन हर चेहरे में आरव दिखता। एक बच्चा हंसा तो आरव की हंसी याद आई। प्रिया रो पड़ी। आदित्य ने पूछा, “बेटी… क्या हुआ?”
“पापा… सबमें आरव दिखता है।”
आदित्य ने गले लगाया। “समय लगेगा बेटी। लेकिन तू मजबूत है।”
रिया भी NGO में मदद करने लगी। दोनों शाम को घर लौटतीं। मुंबई की भीड़ में खो जातीं, लेकिन अकेलापन नहीं जाता। प्रिया समुद्र किनारे जाती। लहरें देखती। “आरव… शिमला में बर्फ थी, यहां लहरें।
लेकिन तुम्हारी कमी हर जगह है।”

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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