Part – 22: “अंत की शुरुआत”
शिमला का अस्पताल रात के तीन बजे भी जगमगा रहा था। इमरजेंसी वार्ड की लाइट्स कड़क थीं, और हवा में दवाइयों और डिसइन्फेक्टेंट की तेज़ महक फैली थी। प्रिया, रिया, राजेश पापा और आदित्य अंकल हॉस्पिटल के गलियारे में दौड़ते हुए आए थे। प्रिया की लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मंगलसूत्र गले में लटक रहा था, लेकिन चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ कांप रहे थे, आंखें सूजी हुईं। वो रोते हुए चीख रही थी, “आरव… आरव कहां है?”
रिया उसे सहारा दे रही थी। “प्रिया… शांत हो। वो ठीक होगा।”
राजेश पापा डॉक्टर से बात कर रहे थे। डॉक्टर – मिडिल एज, सफेद कोट, थका हुआ चेहरा – ने गहरी सांस ली। “मिस्टर ठाकुर… बहुत अफसोस की बात है। पेशेंट को हम बचा नहीं पाए। एक्सीडेंट बहुत गंभीर था। कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हेड इंजरी, इंटरनल ब्लीडिंग… हमने पूरी कोशिश की, लेकिन…”
प्रिया की चीख गलियारे में गूंज गई। “नहीं! ये झूठ है! आरव… वो मर नहीं सकता! वो मुझसे वादा करके गया था!”
वो डॉक्टर के सामने गिर पड़ी। रिया ने उसे संभाला। राजेश पापा का चेहरा पत्थर हो गया। आदित्य अंकल रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”
डॉक्टर ने कहा, “और एक बात… एक्सीडेंट इतना भयानक था कि पेशेंट का चेहरा… पूरी तरह खराब हो गया है। पहचानना मुश्किल है। सिर्फ कपड़ों और कार से हमने कन्फर्म किया। बॉडी… देखना चाहेंगे?”
प्रिया चीखी, “नहीं! मैं नहीं देखूंगी! आरव जिंदा है! वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”
लेकिन राजेश पापा ने कहा, “देखना पड़ेगा।”
वे सब मोर्चरी की ओर गए। ठंडी, सफेद जगह। एक बॉडी ट्रॉली पर पड़ी थी, सफेद चादर से ढकी। डॉक्टर ने चादर हटाई। चेहरा… कुचला हुआ, खून से सना, पहचान के बाहर। सिर्फ शेरवानी के टुकड़े, पगड़ी का हिस्सा।
प्रिया ने देखा और बेहोश हो गई। रिया ने पकड़ा। “प्रिया!”
राजेश पापा रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”
आदित्य अंकल ने चादर फिर ढकी। “ये आरव है।”
सब रो रहे थे। प्रिया को व्हीलचेयर पर बिठाया गया। वो बुदबुदा रही थी, “आरव… तुम वादा करके गए थे। आज हमारी पहली रात थी। तुम मुझे छोड़कर कैसे चले गए?”
रिया रोते हुए बोली, “प्रिया… संभल। आरव भैया… वो हमें देख रहे होंगे।”
घर लौटे। ठाकुर हाउस अब सूना लग रहा था। प्रिया अपने कमरे में थी – वही कमरा जो कल तक खुशियों से भरा था। अब वो बिस्तर पर लेटी रो रही थी। “आरव… तुम झूठे हो। वादा किया था ना… हमेशा साथ रहने का।”
रिया उसके पास बैठी। “प्रिया… भगवान की मर्जी। लेकिन आरव भैया की आत्मा को शांति मिलेगी अगर तू स्ट्रॉन्ग रहेगी।”
प्रिया ने कहा, “रिया… वो कॉल… वो कुछ गलत था। आरव परेशान था। किसी ने बुलाया था उसे।”
राजेश पापा कमरे में आए। “प्रिया बेटी… आरव का फोन मिला है कार में। अनजान कॉल्स थे। पुलिस जांच कर रही है।”
प्रिया उठी। “पापा… ये एक्सीडेंट नहीं। मर्डर है। कोई साजिश है।”
लेकिन सब थके हुए थे। रात गुजर गई। सुबह हुई। अंतिम संस्कार की तैयारियां। प्रिया सफेद साड़ी में। चेहरा सूजा हुआ। वो अर्थी के पास खड़ी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर।”
अग्नि जली। सब रो रहे थे। प्रिया ने चंदन की लकड़ी डाली। “आरव… मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी?”
लेकिन उसके मन में एक सवाल – “क्या सच में आरव था वो? चेहरा… पहचान नहीं हो रही थी।”
ठाकुर हाउस अब सूना और उदास लग रहा था। वो घर जो कल तक शादी की रौनक से गूंज रहा था, आज मातम में डूबा हुआ था। दीवारों पर अभी भी फूलों की मालाएं लटक रही थीं, लेकिन उनकी खुशबू अब दर्द की तरह चुभ रही थी। हॉल में आरव की बड़ी सी फोटो लगी थी – शादी वाली, मुस्कुराते हुए। उसके सामने अगरबत्ती जल रही थी, और फूल चढ़ाए गए थे। प्रिया सफेद साड़ी में, सिर पर पल्लू, फोटो के सामने बैठी थी। उसकी आंखें सूजी हुईं, चेहरा सफेद, होंठ कांप रहे थे। वो घंटों से वहीं बैठी थी, जैसे कोई प्रतिमा। हाथ में आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – वो जो एक्सीडेंट से बचकर मिला था। वो उसे छाती से लगाए बैठी थी, आंसू लगातार बह रहे थे, लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर। हमारी शादी… हमारी पहली रात… सब अधूरा रह गया।”
रिया उसके पास बैठी थी। उसकी आंखें भी लाल थीं, लेकिन वो खुद को संभाल रही थी – प्रिया के लिए। वो प्रिया का हाथ थामे थी। “प्रिया… कुछ खा ले। कल से कुछ नहीं खाया तूने।”
प्रिया ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। सिर्फ आंसू। रिया की आंखें भी भर आईं। “आरव भैया… वो हमें देख रहे हैं। वो नहीं चाहेंगे कि तू ऐसे टूट जाए।”
लेकिन प्रिया का दिल मान नहीं रहा था। वो फोटो को देख रही थी। “रिया… वो झूठ बोलकर गया था। कहा था काम का कॉल। लेकिन वो… वो किसी खतरे में गया। और मैं रोक नहीं पाई।”
आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा उदास था, लेकिन आंखों में दृढ़ता। वो प्रिया के पास बैठे। “बेटी… मैं जानता हूं दर्द क्या होता है। रानी को खोया था मैंने। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं। तू मेरे साथ मुंबई चल। वहां नई शुरुआत करेंगे। मैं अकेला हूं, तू अकेली। साथ रहेंगे।”
प्रिया ने सिर उठाया। आंखें नम, लेकिन आवाज में कमजोरी। “पापा… मैं यहां से नहीं जा सकती। ये घर… आरव का घर है। यहां उसकी हर याद है। मैं कैसे छोड़ दूं?”
आदित्य अंकल ने उसका कंधा थामा। “बेटी… यादें दिल में रहती हैं। यहां रहकर तू खुद को और दुख देगी। मुंबई में नया जीवन। मैं तेरी देखभाल करूंगा। तू मेरी इकलौती बेटी है।”
प्रिया रो पड़ी। “पापा… मैं टूट गई हूं। आरव के बिना… कुछ नहीं बचा। लेकिन यहां उसकी खुशबू है, उसकी यादें हैं। मैं नहीं जा पाऊंगी।”
राजेश पापा (आरव के पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा बुझा हुआ था। वो प्रिया के सामने बैठे। “प्रिया बेटी… आदित्य जी सही कह रहे हैं। यहां रहकर तू खुद को सजा देगी। आरव नहीं चाहेगा कि तू ऐसे जिए।”
प्रिया ने राजेश पापा की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “पापा… आप भी मुझे छोड़ देंगे? ये घर… आरव का घर। मैं अकेली कैसे रहूंगी?”
राजेश पापा की आंखें भर आईं। वो प्रिया को गले लगा लिया। “बेटी… तू मेरी बेटी है। हमेशा रहेगी। लेकिन आदित्य जी तेरे असली पिता हैं। उनके साथ जा। नई जिंदगी शुरू कर। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”
प्रिया सिसकियां ले रही थी। “पापा… मैं अकेली नहीं जा सकती। रिया… रिया भी मेरे साथ जाएगी। वो भी टूट गई है। आरव उसका भी भाई था। वो बाहर से मजबूत दिखाती है, लेकिन अंदर से… वो भी रो रही है हर रात।”
सबने रिया की ओर देखा। रिया की आंखें नीची थीं। वो चुप थी, लेकिन कंधे कांप रहे थे। राजेश पापा ने रिया के पास जाकर कहा, “रिया बेटी… सच्च है?”
रिया ने सिर उठाया। आंसू बह रहे थे। “पापा… हां। आरव भैया मेरे भी भाई थे। प्रिया की तरह। मैं मजबूत दिखाती हूं, लेकिन अंदर से… सब खाली हो गया।”
राजेश पापा ने रिया को गले लगाया। “बेटी… अगर प्रिया जाना चाहती है तो तू भी जा। दोनों साथ रहोगी। मैं अकेला रह लूंगा। लेकिन तुम्हारी खुशी महत्वपूर्ण है।”
प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… चल ना। मुंबई। नई शुरुआत। यहां हर कोना आरव की याद दिलाता है। हम साथ रहेंगे।”
रिया ने प्रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “हां प्रिया… चलते हैं। लेकिन दिल यहां रह जाएगा।”
आदित्य अंकल ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटियां… मैं खुश हूं। मुंबई में हमारा घर तुम्हारा घर है।”
राजेश पापा ने कहा, “ठीक है। पैकिंग शुरू करो। मैं टिकट बुक करवाता हूं।”
प्रिया उठी। कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… मैं जा रही हूं। लेकिन तू मेरे दिल में है। हमेशा।”
रिया ने सामान पैक करना शुरू किया। दोनों साथ थीं। टूटे हुए, लेकिन एक-दूसरे का सहारा।
घर अब और सूना हो गया। राजेश पापा अकेले हॉल में बैठे। आरव की फोटो देख रहे थे। “आरव… प्रिया… माफ करना। मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”
प्रिया और रिया मुंबई जाने वाली थीं। नई जिंदगी। लेकिन दिलों में आरव की याद हमेशा रहेगी।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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