सुनहरी हिरनी और मायावी शिकारी
बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने पेड़ों से घिरे एक जंगल में एक छोटी सी सुनहरी हिरनी रहती थी। उसका नाम कनक था। उसका शरीर हल्की सुनहरी रोशनी जैसा चमकता था और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में मासूमियत थी।
जंगल के जानवर कहते थे कि कनक साधारण हिरनी नहीं थी। जब वह सुबह की धूप में दौड़ती, तो उसके शरीर से सुनहरी चमक फैल जाती और उसके पैरों के निशान कुछ देर तक जमीन पर चमकते रहते।
लेकिन जंगल में एक मायावी शिकारी भी रहता था—मायासुर।
वह किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए जंगल में नहीं रहता था, बल्कि उसे कनक की सुनहरी शक्ति चाहिए थी। उसे विश्वास था कि अगर वह कनक को पकड़ लेगा, तो उसकी जादुई शक्ति से वह पूरे जंगल पर अपना अधिकार कर सकता है।
एक सुबह कनक नदी के किनारे पानी पी रही थी। अचानक उसे झाड़ियों के पीछे किसी की आहट सुनाई दी।
वह चौकन्नी हुई।
जैसे ही उसने पीछे देखा, वहाँ कोई नहीं था।
कनक तेजी से जंगल की ओर भागी।
उसके पीछे से एक आवाज आई, “भाग लो कनक… लेकिन मुझसे ज्यादा देर तक नहीं भाग पाओगी।”
कनक समझ गई कि मायासुर फिर उसके पीछे पड़ चुका है।
वह जंगल के सबसे पुराने हिस्से की ओर दौड़ी। वहाँ एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसकी जड़ों के नीचे जंगल की रक्षा करने वाली शक्ति रहती है।
कनक उस पेड़ के पीछे छिप गई।
कुछ ही देर में मायासुर वहाँ पहुँचा।
उसने चारों तरफ देखा और मुस्कुराया।
“मुझे पता है तुम यहीं कहीं हो।”
उसने अपनी जादुई छड़ी घुमाई।
अचानक जंगल की सारी पगडंडियाँ बदल गईं। जहाँ रास्ता था, वहाँ घनी झाड़ियाँ उग आईं और जहाँ झाड़ियाँ थीं, वहाँ रास्ता बन गया।
कनक डर गई।
मायासुर बोला, “अब देखता हूँ तुम कहाँ जाती हो।”
कनक ने हिम्मत जुटाई और एक संकरी पगडंडी पर दौड़ पड़ी।
मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति से उसके आगे एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी।
कनक रुक गई।
मायासुर धीरे-धीरे उसके पास आने लगा।
“अब तुम बच नहीं सकती।”
तभी कनक ने ऊपर देखा। पेड़ की एक मजबूत डाल ठीक उसके सिर के ऊपर थी।
वह तेजी से पीछे हटी और छलांग लगाकर डाल के ऊपर चढ़ गई।
मायासुर नीचे खड़ा रह गया।
“तुम पेड़ पर चढ़ सकती हो?” वह गुस्से में बोला।
कनक दूसरी डाल पर कूद गई और फिर पेड़ों के बीच से भागती हुई दूर निकल गई।
लेकिन मायासुर ने हार नहीं मानी।
उसने अपना रूप बदल लिया।
कुछ ही क्षण में वह एक बूढ़े साधु के रूप में कनक के सामने दिखाई दिया।
“बेटी, तुम बहुत डरी हुई लग रही हो। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें सुरक्षित जगह पहुँचा दूँगा।”
कनक कुछ पल उसे देखती रही।
तभी उसे साधु के पैरों के पास पड़ी छाया दिखाई दी। बूढ़े साधु की छाया के बजाय वहाँ किसी लंबे राक्षस जैसी आकृति थी।
कनक समझ गई कि यह मायासुर है।
वह बिना कुछ बोले दूसरी दिशा में भाग गई।
मायासुर का चेहरा बदल गया।
“तुम इतनी आसानी से मेरी चाल समझ गई?”
कनक जंगल के अंदर और गहराई में चली गई।
भागते-भागते उसे एक घायल खरगोश दिखाई दिया।
खरगोश काँटों में फँसा था।
कनक रुक गई।
उसने अपने सींगों से काँटों को हटाया और खरगोश को बाहर निकाला।
खरगोश ने कहा, “तुम्हें रुकना नहीं चाहिए था। मायासुर तुम्हारे पीछे है।”
कनक ने कहा, “अगर मैं इसे छोड़ देती तो यह मर जाता। डर के कारण किसी की मदद करना नहीं छोड़ सकती।”
खरगोश ने उसे जंगल के एक गुप्त रास्ते के बारे में बताया।
“उस रास्ते से पहाड़ के पीछे एक पुरानी गुफा है। वहाँ जंगल की रक्षक देवी की शक्ति है। शायद वही तुम्हारी मदद कर सके।”
कनक उस रास्ते पर चल पड़ी।
लेकिन मायासुर को भी उसकी दिशा का पता चल गया।
वह गरजते हुए बोला, “तुम उस गुफा तक नहीं पहुँचोगी!”
उसने अपने मंत्र से तेज हवा पैदा कर दी।
पेड़ हिलने लगे। पत्ते उड़ने लगे।
कनक कई बार गिरते-गिरते बची, लेकिन उसने दौड़ना नहीं छोड़ा।
आखिरकार वह गुफा तक पहुँच गई।
अंदर एक बड़ा पत्थर था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
“जिसके मन में डर से बड़ा साहस हो, वही इस शक्ति को जगा सकता है।”
कनक ने पत्थर को छुआ।
अचानक पूरी गुफा सुनहरी रोशनी से भर गई।
एक शांत आवाज सुनाई दी, “कनक, तुम्हारी शक्ति तुम्हारे शरीर की चमक में नहीं, तुम्हारे दिल की अच्छाई में है।”
कनक ने पूछा, “क्या मैं मायासुर को हरा सकती हूँ?”
आवाज आई, “उसे उसकी ही माया से हराना होगा।”
उसी समय मायासुर गुफा में पहुँच गया।
“आखिर तुम यहाँ आ ही गई!”
उसने हाथ उठाया और चारों तरफ अंधेरा छा गया।
कनक ने आँखें बंद कर लीं।
उसने डरने के बजाय अपने मन में जंगल के सभी जानवरों को याद किया—वह खरगोश जिसे उसने बचाया था, पक्षी, पेड़ और वे छोटे जीव जो हमेशा उसकी रक्षा करते थे।
अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति बढ़ाई, लेकिन सुनहरी रोशनी उसके चारों तरफ फैल गई।
उसकी बनाई हुई सारी मायावी तस्वीरें टूटने लगीं।
मायासुर घबरा गया।
“यह कैसे हो सकता है?”
कनक ने कहा, “तुम दूसरों को डराकर शक्तिशाली बनना चाहते थे। लेकिन असली शक्ति किसी को डराने में नहीं, किसी की मदद करने में होती है।”
मायासुर ने आखिरी बार हमला करने की कोशिश की।
लेकिन इस बार जंगल के सारे जानवर गुफा के बाहर आ गए।
हजारों पक्षी आसमान में उड़ने लगे। हिरणों का झुंड उसके सामने खड़ा हो गया और हाथियों ने जोर से चिंघाड़कर उसका रास्ता रोक दिया।
मायासुर की माया कमजोर पड़ने लगी।
उसकी जादुई छड़ी जमीन पर गिर गई।
जैसे ही उसने उसे उठाने की कोशिश की, वह पत्थर बन गई।
मायासुर की सारी शक्ति खत्म हो गई।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
“मैं हार गया।”
कनक उसके पास गई और बोली, “अगर तुम अपनी शक्ति का इस्तेमाल दूसरों की रक्षा के लिए करोगे, तो शायद जंगल तुम्हें माफ कर दे।”
मायासुर ने पहली बार सिर झुका लिया।
उस दिन के बाद वह जंगल छोड़कर दूर पहाड़ों में चला गया। कहते हैं कि उसने अपनी बाकी जिंदगी अपनी मायावी शक्तियों से लोगों को डराने के बजाय जरूरतमंदों की मदद करने में लगा दी।
और कनक?
वह जंगल की सबसे प्रिय हिरनी बन गई।
अब जब वह सुबह जंगल में दौड़ती, तो उसकी सुनहरी चमक पहले से भी ज्यादा दिखाई देती।
जानवर उसे देखकर कहते—
“कनक सिर्फ सुनहरी हिरनी नहीं है। वह हमारे जंगल की बहादुर रक्षक है।”
कनक मुस्कुराती और खुले जंगल में दौड़ जाती।
उसकी चमकती हुई चाल जैसे हर किसी को एक ही बात सिखाती थी—
सच्ची ताकत उस जादू में नहीं होती जो दूसरों को अपने वश में कर ले, बल्कि उस दिल में होती है जो डर के बावजूद सही काम करने का साहस रखता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
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