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समाज का आईना भाग 4

पढ़ने का समय : 4 मिनट

 

 

सूरजपुर का प्रधान देवेंद्र चौहान बाहर से बहुत सम्मानित आदमी था।

 

हर धार्मिक आयोजन में सबसे आगे।

 

गरीबों के लिए भाषण।

 

बेटियों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावे।

 

और हर चुनाव में एक ही वादा—

 

“मैं इस कस्बे को बदल दूँगा।”

 

लेकिन लाल डायरी में उसका नाम देखकर आरव को यकीन हो गया कि असली कहानी कुछ और थी।

 

डायरी में लिखा था—

 

“देवेंद्र ने ठाकुर के बाद भी वही खेल जारी रखा। जमीनें हड़पीं। सरकारी पैसे खाए। गरीबों को कागजों में मरा हुआ दिखाकर योजनाओं का पैसा खाया।”

 

आरव ने दस्तावेजों की तस्वीरें खींच लीं।

 

उसने तय किया कि अब वह सबके सामने सच लाएगा।

 

लेकिन उसी शाम पूरे कस्बे में एक खबर फैल गई—

 

आरव झूठी खबरें फैलाकर लोगों को बदनाम कर रहा है।

 

कुछ ही घंटों में उसके खिलाफ लोग जमा हो गए।

 

जो लोग कल तक उसे ईमानदार पत्रकार कहते थे, वही आज उसे गालियाँ दे रहे थे।

 

कबीर ने कहा—

 

“देख रहा है? यही समाज है।”

 

आरव ने भीड़ की तरफ देखा।

 

उसे लगा जैसे हर चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा छिपा है।

 

फिर अचानक उसे कुछ दिखाई दिया।

 

भीड़ के बीच एक आदमी था।

 

उसकी परछाईं बाकी सबकी तुलना में बहुत बड़ी थी।

 

आरव ने ध्यान से देखा।

 

वह देवेंद्र नहीं था।

 

वह एक साधारण आदमी था—रमेश, जो रोज मंदिर में दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता था।

 

लेकिन उसकी परछाईं के हाथ में पत्थर था।

 

आरव समझ गया।

 

समाज हमेशा अपराधी को अकेले पैदा नहीं करता।

 

कई बार समाज अपराधी को भीड़ देता है।

 

रात में आरव फिर हवेली पहुँचा।

 

इस बार उसके साथ कबीर, हरिदास बाबा और कुछ अन्य लोग भी थे।

 

आईना कमरे के बीच में था।

 

हरिदास बाबा बोले—

 

“अब यह सिर्फ तुम्हारा मामला नहीं है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो इसे खत्म कैसे करेंगे?”

 

बाबा ने कहा—

 

“आईने को तोड़कर नहीं।”

 

“फिर?”

 

“सच बोलकर।”

 

अचानक हवेली में तेज हवा चली।

 

आईने पर धुंध जम गई।

 

फिर उस धुंध में एक-एक करके लोगों के चेहरे दिखाई देने लगे।

 

सबसे पहले देवेंद्र।

 

फिर शंभूनाथ।

 

फिर ठाकुर।

 

फिर हरिदास।

 

फिर कबीर।

 

और अंत में आरव।

 

हर व्यक्ति के पीछे उसके कर्मों की तस्वीरें चलने लगीं।

 

देवेंद्र पैसे लेते हुए।

 

शंभूनाथ मजदूरों को डाँटते हुए।

 

ठाकुर जमीन हड़पते हुए।

 

हरिदास चुप खड़े हुए।

 

कबीर किसी पुराने झगड़े में झूठ बोलते हुए।

 

और आरव—

 

वह खुद को पैसे लेकर खबर रोकते हुए देख रहा था।

 

कमरे में खामोशी छा गई।

 

आरव ने सिर झुका लिया।

 

“हाँ,” उसने कहा। “मैं भी दोषी हूँ।”

 

आईने की सतह काँपने लगी।

 

हरिदास ने कहा—

 

“बस यही चाहिए था।”

 

“क्या?”

 

“स्वीकार करना।”

 

अचानक हवेली के बाहर हजारों लोगों की आवाज सुनाई दी।

 

पूरा कस्बा वहाँ जमा था।

 

देवेंद्र भी।

 

उसने चिल्लाकर कहा—

 

“यह सब जादू है! इसे बंद करो!”

 

आईने ने अचानक उसकी तरफ रुख किया।

 

देवेंद्र की परछाईं उसके पीछे खड़ी थी।

 

वह परछाईं धीरे-धीरे उससे अलग होने लगी।

 

देवेंद्र चीख पड़ा।

 

“नहीं!”

 

लोग पीछे हटने लगे।

 

परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

 

वह देवेंद्र जैसा ही था।

 

लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

 

उसने कहा—

 

“तुमने मुझे बनाया है।”

 

देवेंद्र जमीन पर गिर पड़ा।

 

“मैंने कुछ नहीं किया!”

 

आईने से आवाज आई—

 

“यही तो तुम्हारा सबसे बड़ा झूठ है।”

 

अचानक पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

 

लोगों ने अपनी-अपनी परछाइयाँ देखीं।

 

किसी ने अपने बेटे से झूठ बोला था।

 

किसी ने पड़ोसी की जमीन हड़पी थी।

 

किसी ने दहेज के लिए बहू को सताया था।

 

किसी ने गरीब को अपमानित किया था।

 

किसी ने अन्याय देखा था और चुप रहा था।

 

और कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए किसी को बुरा कहा था क्योंकि भीड़ ऐसा कह रही थी।

 

हर कोई डरने लगा।

 

किसी ने आईना तोड़ने के लिए पत्थर उठाया।

 

हरिदास चिल्लाए—

 

“रुको!”

 

लेकिन पत्थर आईने पर जा चुका था।

 

काँच में दरार पड़ गई।

 

और उसी क्षण हवेली की सारी दीवारें हिलने लगीं।

 

मीरा की आवाज पूरे कस्बे में गूँज उठी—

 

“तुमने आईना तोड़ दिया… अब तुम्हारा सच कहाँ छिपेगा?”

 

एक तेज चीख सुनाई दी।

 

आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

 

लेकिन हर टुकड़े में किसी न किसी इंसान का चेहरा दिखाई दे रहा था।

 

अब आईना एक नहीं था।

 

पूरा कस्बा आईना बन चुका था।

 

और अगले दिन सूरजपुर में जो हुआ, उसने सबकी नींद उड़ा दी।

 

हर घर के दरवाजे पर एक काँच का छोटा टुकड़ा पड़ा मिला।

 

हर टुकड़े में घर के किसी सदस्य का ऐसा सच दिखाई दे रहा था जिसे वह वर्षों से छिपा रहा था।

 

अब डर हवेली में नहीं था।

 

डर लोगों के अपने घरों में पहुँच चुका था।

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