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रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 5: आखिरी यात्री

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

आरव काफी देर तक रेलवे स्टेशन की पटरी के पास खड़ा रहा।

 

उसके हाथ में वही पुराना टिकट था।

 

मोबाइल जमीन पर पड़ा था और स्क्रीन पर अभी भी वही मैसेज चमक रहा था—

 

“आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

 

आरव ने मोबाइल उठाया।

 

उसने मैसेज डिलीट कर दिया।

 

फिर दोबारा स्क्रीन देखी।

 

मैसेज गायब था।

 

उसने राहत की सांस ली।

 

“सब खत्म हो गया।”

 

लेकिन उसे नहीं पता था कि असली कहानी अभी बाकी थी।

 

आरव घर पहुंचा तो उसकी माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

 

उन्हें देखते ही आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

वह दौड़कर माँ से लिपट गया।

 

माँ ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

आरव कुछ नहीं बोल पाया।

 

उसने बस उन्हें कसकर पकड़ लिया।

 

उस रात आरव ने अपनी माँ को ट्रेन के बारे में सब कुछ बताया।

 

निशा।

 

बूढ़ा यात्री।

 

उसके पिता।

 

और वह आखिरी यात्रा।

 

माँ चुपचाप सुनती रहीं।

 

कहानी खत्म होने के बाद उन्होंने एक सवाल पूछा—

 

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें कुछ दिया?”

 

आरव ने कहा—

 

“हाँ।”

 

उसने जेब से पुरानी चाबी निकाली।

 

माँ ने चाबी देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

 

उनकी आँखों में आँसू आ गए।

 

“तुम्हें यह कहाँ मिली?”

 

“पापा ने दी थी।”

 

माँ ने कहा—

 

“नहीं।”

 

आरव चौंका।

 

“क्या मतलब?”

 

माँ ने धीरे से बताया—

 

“यह चाबी तुम्हारे पिता की नहीं थी।”

 

“तो किसकी थी?”

 

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उस रात आरव सो नहीं पाया।

 

करीब दो बजे उसे ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

 

फूँऽऽऽ…

 

वह तुरंत खिड़की के पास गया।

 

बाहर सड़क खाली थी।

 

लेकिन दूर आसमान में काले धुएँ जैसी एक लकीर दिखाई दे रही थी।

 

फिर उसकी खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरव पीछे हट गया।

 

फिर दस्तक हुई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

उसने पर्दा थोड़ा हटाया।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

लेकिन कांच पर भाप से एक शब्द लिखा हुआ था—

 

“स्टेशन।”

 

आरव ने खिड़की बंद कर दी।

 

सुबह उसने माँ को यह बात बताई।

 

माँ ने तुरंत कहा—

 

“आज घर से बाहर मत जाना।”

 

लेकिन उसी समय दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर आया।

 

लिफाफे पर आरव का नाम लिखा था।

 

उसने खोला।

 

अंदर एक रेलवे टिकट था।

 

यात्री: आरव

 

ट्रेन: निशा एक्सप्रेस

 

समय: 11:55 PM

 

प्लेटफॉर्म: 6

 

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

माँ ने टिकट देखते ही कहा—

 

“तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए।”

 

“लेकिन क्यों?”

 

माँ ने आखिरकार वह राज बताया जो उन्होंने दस साल से छिपाकर रखा था।

 

आरव के पिता की मृत्यु के बाद उन्हें एक पत्र मिला था।

 

उस पत्र में लिखा था—

 

“अगर कभी आरव को 14 अगस्त की रात ट्रेन का टिकट मिले, तो उसे जाने देना। क्योंकि इस ट्रेन का आखिरी यात्री अभी बाकी है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“आखिरी यात्री कौन है?”

 

माँ ने उसकी आँखों में देखा।

 

“तुम्हारे पिता नहीं।”

 

“तो कौन?”

 

माँ ने धीरे से कहा—

 

“तुम।”

 

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

रात 11:30 बजे वह फिर उसी पुराने स्टेशन पर पहुंच गया।

 

प्लेटफॉर्म नंबर 6 बिल्कुल खाली था।

 

घड़ी में 11:55 बज रहे थे।

 

ठीक उसी तरह जैसे पहली बार।

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

इस बार उसे डर नहीं लग रहा था।

 

उसे पता था कि उसे क्या करना है।

 

11:55 पर ट्रेन दिखाई दी।

 

वही काली ट्रेन।

 

वही खिड़कियाँ।

 

वही दरवाजे।

 

लेकिन इस बार ट्रेन में एक भी यात्री नहीं था।

 

आरव अंदर चढ़ गया।

 

दरवाजा बंद हुआ।

 

ट्रेन चल पड़ी।

 

कुछ देर बाद लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में एक आवाज आई—

 

“तुम वापस क्यों आए?”

 

आरव ने कहा—

 

“क्योंकि कहानी अधूरी थी।”

 

अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

 

वह नैना थी।

 

लेकिन इस बार उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

 

“भैया…”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“अब तुम असली हो?”

 

नैना ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“तुम्हें किसने बुलाया?”

 

नैना ने पीछे देखा।

 

डिब्बे के आखिरी हिस्से में एक आदमी खड़ा था।

 

रेलवे की वर्दी।

 

आरव ने उसे देखते ही पहचान लिया।

 

उसके पिता।

 

लेकिन इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

 

उन्होंने कहा—

 

“बेटा, तुम्हें वापस नहीं आना चाहिए था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“आखिरी यात्री कौन है?”

 

पिता ने जवाब दिया—

 

“मैं।”

 

आरव चौंक गया।

 

“लेकिन आप तो आजाद हो चुके हैं।”

 

पिता ने सिर हिलाया।

 

“मैं सिर्फ अपनी आत्मा का एक हिस्सा आजाद कर पाया था।”

 

“बाकी?”

 

“वह इस ट्रेन में है।”

 

तभी ट्रेन के सभी दरवाजे अपने आप खुल गए।

 

बाहर अनंत अंधेरा था।

 

पिता ने कहा—

 

“यह ट्रेन तब तक चलती रहेगी जब तक कोई इसे पूरी तरह खत्म नहीं करता।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कैसे?”

 

पिता ने कहा—

 

“जिसने इसे बनाया था, उसे ढूंढना होगा।”

 

आरव ने पूछा—

 

“किसने?”

 

पिता ने सामने देखा।

 

एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे डिब्बे में आ रहा था।

 

आरव उसे देखते ही पहचान गया।

 

वही बूढ़ा यात्री।

 

लेकिन वह तो पहले ही आजाद हो चुका था।

 

आरव ने कहा—

 

“आप?”

 

बूढ़ा मुस्कुराया।

 

“मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं इस ट्रेन का यात्री हूँ।”

 

आरव का चेहरा बदल गया।

 

“तो आप कौन हैं?”

 

बूढ़े ने अपनी पुरानी टोपी उतारी।

 

उसके नीचे कोई चेहरा नहीं था।

 

सिर्फ काला अंधेरा।

 

“मैं इस ट्रेन का पहला ड्राइवर हूँ।”

 

आरव पीछे हट गया।

 

बूढ़े ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

 

आरव ने पूछा—

 

“आप लोगों की आत्माएँ क्यों लेते हैं?”

 

वह हँसा।

 

“मैं आत्माएँ नहीं लेता। लोग खुद अपनी यादें मेरे पास छोड़ जाते हैं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि हर इंसान अपने किसी प्रिय व्यक्ति को खोने से डरता है।”

 

बूढ़े ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

 

“तुमने अपनी माँ की याद छोड़ दी थी।”

 

आरव ने कहा—

 

“लेकिन मैंने उन्हें वापस पा लिया।”

 

बूढ़ा हँसा।

 

“तुमने चेहरा खो दिया है।”

 

आरव के शरीर में ठंड दौड़ गई।

 

उसे अचानक एहसास हुआ।

 

उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं था।

 

वह माँ को पहचानता था।

 

उनकी आवाज पहचानता था।

 

लेकिन चेहरा…

 

वह भूल चुका था।

 

नैना ने कहा—

 

“भैया, यही आखिरी जाल है।”

 

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसने माँ की आवाज याद की।

 

फिर उनके हाथ।

 

फिर उनका स्पर्श।

 

धीरे-धीरे चेहरा उसकी याद में वापस आने लगा।

 

बूढ़ा चीखा—

 

“नहीं!”

 

आरव ने आँखें खोलीं।

 

“यादें किसी की संपत्ति नहीं होतीं।”

 

उसने अपनी जेब से वह पुरानी चाबी निकाली।

 

अचानक चाबी चमकने लगी।

 

इंजन के पीछे एक दरवाजा दिखाई दिया।

 

उसने चाबी उस दरवाजे में लगा दी।

 

दरवाजा खुलते ही तेज सफेद रोशनी निकली।

 

हजारों आत्माएँ ट्रेन से बाहर निकलने लगीं।

 

बूढ़ा चीखने लगा।

 

निशा की आत्मा भी दिखाई दी।

 

उसने आरव को मुस्कुराकर देखा।

 

उसके पीछे आरव के पिता खड़े थे।

 

पिता ने कहा—

 

“अब आखिरी दरवाजा बंद कर दो।”

 

आरव ने दरवाजा बंद कर दिया।

 

पूरी ट्रेन कांपने लगी।

 

फिर एक जोरदार विस्फोट हुआ।

 

धड़ाम!

 

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

 

जब उसने आँखें खोलीं…

 

वह उसी पुराने स्टेशन पर खड़ा था।

 

सुबह हो चुकी थी।

 

प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर लोग आ-जा रहे थे।

 

सब कुछ सामान्य था।

 

उसकी माँ सामने खड़ी थीं।

 

आरव दौड़कर उनके पास गया।

 

इस बार उसने उनका चेहरा साफ देखा।

 

वही चेहरा।

 

वही आँखें।

 

वही मुस्कान।

 

माँ ने पूछा—

 

“अब सब खत्म हो गया?”

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ।”

 

उस रात के बाद कई साल बीत गए।

 

आरव ने कभी वह ट्रेन नहीं देखी।

 

प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अब नई लाइटें लग गईं।

 

पुरानी रेल लाइन बंद कर दी गई।

 

लोग उस घटना को भूल गए।

 

लेकिन एक रात…

 

रेलवे के एक नए कर्मचारी को पुराने रिकॉर्ड रूम में एक टिकट मिला।

 

उस टिकट पर लिखा था—

 

“निशा एक्सप्रेस — अंतिम यात्रा।”

 

कर्मचारी ने टिकट पलटा।

 

पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे व्यक्ति को भूल जाता है, ट्रेन फिर लौट आती है।”

 

और उसी समय स्टेशन के पुराने स्पीकर से एक आवाज आई—

 

“यात्रियों से अनुरोध है…”

 

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज पूरी हुई—

 

“प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली आखिरी ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

 

दूर अंधेरे में ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

 

फूँऽऽऽ…

 

और प्लेटफॉर्म की घड़ी…

 

धीरे-धीरे पीछे घूमने लगी।

 

11:55।

 

समाप्त।

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