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रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 4: मृत्यु जंक्शन

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

आरव के कानों में बूढ़े की बात गूंजती रही—

 

“इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है… तुम्हारे पिता हैं।”

 

आरव ने तुरंत पूछा—

 

“मेरे पिता तो दस साल पहले मर चुके हैं।”

 

बूढ़े ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“तो फिर ट्रेन कौन चला रहा है?”

 

बूढ़े ने सामने की ओर इशारा किया।

 

“तुम्हारे पिता की आत्मा।”

 

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

 

ट्रेन अब पहले से कहीं ज्यादा तेज दौड़ रही थी।

 

खिड़की के बाहर कोई शहर नहीं था।

 

सिर्फ काला धुआँ और हजारों सफेद चेहरे ट्रेन के साथ दौड़ रहे थे।

 

लाउडस्पीकर से आवाज आई—

 

“मृत्यु जंक्शन आने वाला है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“अगर हम वहाँ पहुंच गए तो?”

 

बूढ़े ने कहा—

 

“जो ट्रेन से उतर गया, वह वापस नहीं लौटता।”

 

“और जो नहीं उतरा?”

 

“वह हमेशा के लिए यात्री बन जाता है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो बचने का रास्ता क्या है?”

 

बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

 

“इंजन तक जाओ।”

 

“इससे क्या होगा?”

 

“तुम्हारे पिता ने इसे मेरे पास छोड़ा था।”

 

आरव ने चाबी हाथ में ली।

 

उस पर एक छोटा-सा अक्षर बना था—

 

A

 

आरव ने पूछा—

 

“उन्होंने आपको यह कब दिया?”

 

बूढ़े ने कहा—

 

“जिस रात उनकी मृत्यु हुई।”

 

आरव चौंका।

 

“आप मेरे पिता को जानते थे?”

 

“बहुत अच्छी तरह।”

 

बूढ़े ने बताया कि आरव के पिता रेलवे में काम करते थे। दस साल पहले एक रात उनकी ड्यूटी इसी रेल लाइन पर थी।

 

उस रात एक ट्रेन पटरी से उतर गई थी।

 

कई यात्रियों की मौत हुई।

 

आरव के पिता ने लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

 

लेकिन मरने के बाद उनकी आत्मा उसी ट्रेन में फंस गई।

 

बूढ़े ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता हर रात इस ट्रेन को चलाते हैं ताकि कोई और उसी हादसे में न मरे।”

 

आरव ने पूछा—

 

“फिर निशा?”

 

“निशा इस ट्रेन को रोकना चाहती है।”

 

अचानक ट्रेन इतनी जोर से हिली कि आरव गिरते-गिरते बचा।

 

बूढ़ा चिल्लाया—

 

“समय कम है!”

 

दोनों आगे की ओर दौड़ने लगे।

 

रास्ते में कई डिब्बे पार करने पड़े।

 

पहले डिब्बे में सैकड़ों खाली सीटें थीं।

 

दूसरे में सभी खिड़कियों पर खून से हाथों के निशान थे।

 

तीसरे डिब्बे में बच्चों के खिलौने पड़े थे।

 

चौथे में आरव ने अपने बचपन का घर देखा।

 

वह कुछ पल के लिए रुक गया।

 

खिड़की के अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

 

“आरव…”

 

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

वह आगे बढ़ना चाहता था।

 

लेकिन बूढ़े ने कहा—

 

“यह असली नहीं है।”

 

आरव ने मुट्ठी बांध ली।

 

“मुझे पता है।”

 

वे आगे बढ़े।

 

आखिरकार इंजन का दरवाजा दिखाई दिया।

 

आरव ने चाबी लगाई।

 

दरवाजा खुल गया।

 

अंदर एक आदमी बैठा था।

 

रेलवे की पुरानी वर्दी।

 

सफेद बाल।

 

कांपते हुए हाथ।

 

आरव वहीं जम गया।

 

“पापा…”

 

आदमी ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

 

वह सच में आरव के पिता थे।

 

उनकी आँखों में वही प्यार था जो आरव ने बचपन में देखा था।

 

“बेटा…”

 

आरव दौड़कर उनके पास जाना चाहता था।

 

लेकिन उसके पिता ने हाथ उठाकर रोक दिया।

 

“पास मत आना।”

 

“पापा!”

 

“यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है।”

 

आरव रोते हुए बोला—

 

“आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

 

पिता ने कहा—

 

“क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

 

“माँ को पता था?”

 

पिता ने चुपचाप सिर झुका लिया।

 

आरव समझ गया।

 

उसकी माँ को सब पता था।

 

“माँ ने मुझे यहाँ क्यों भेजा?”

 

पिता ने कहा—

 

“क्योंकि अब मेरी ताकत खत्म हो रही है।”

 

अचानक इंजन के पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी।

 

निशा सामने खड़ी थी।

 

उसने कहा—

 

“बहुत हो गया।”

 

पिता ने तुरंत ट्रेन की गति बढ़ा दी।

 

निशा चिल्लाई—

 

“तुम मुझे हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकते!”

 

पिता ने जवाब दिया—

 

“जब तक मैं जिंदा हूँ—”

 

फिर वह रुक गए।

 

आरव ने कहा—

 

“आप तो जिंदा नहीं हैं।”

 

पिता ने उसकी तरफ देखा।

 

“यही समस्या है।”

 

निशा धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी।

 

“तुम्हारी आत्मा खत्म हो रही है।”

 

पिता ने आरव से कहा—

 

“बेटा, मुझे इंजन से निकालने का एक ही रास्ता है।”

 

“क्या?”

 

“ट्रेन रोक दो।”

 

“कैसे?”

 

पिता ने सामने लगे एक लाल लीवर की तरफ इशारा किया।

 

“उसे खींचना होगा।”

 

आरव ने लीवर पकड़ लिया।

 

लेकिन निशा ने उसे रोक लिया।

 

“अगर तुमने इसे खींचा… तो ट्रेन में मौजूद सभी आत्माएँ आजाद हो जाएँगी।”

 

आरव ने कहा—

 

“यही तो चाहिए।”

 

निशा मुस्कुराई।

 

“लेकिन तुम्हारे पिता भी।”

 

आरव की आँखें भर आईं।

 

“मैं उन्हें जाने दूँगा।”

 

उसने पूरी ताकत से लीवर खींच दिया।

 

धड़ाम!

 

ट्रेन की गति कम होने लगी।

 

हजारों चीखें एक साथ सुनाई देने लगीं।

 

सभी डिब्बों की खिड़कियाँ खुल गईं।

 

सफेद धुएँ जैसी आत्माएँ बाहर निकलने लगीं।

 

बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

 

“आखिरकार…”

 

उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगा।

 

आरव ने कहा—

 

“आप कहाँ जा रहे हैं?”

 

बूढ़े ने कहा—

 

“घर।”

 

और वह गायब हो गया।

 

निशा चीखती हुई पीछे हटने लगी।

 

उसका शरीर टूटने लगा।

 

लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखा।

 

“तुमने मेरी यादें लौटा दीं।”

 

आरव चौंका।

 

निशा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

 

“मेरे भाई की याद… मुझे वापस मिल गई।”

 

वह मुस्कुराई।

 

फिर उसका शरीर भी रोशनी में बदल गया।

 

इंजन में अब सिर्फ आरव और उसके पिता थे।

 

पिता ने कहा—

 

“अब तुम्हें उतरना होगा।”

 

आरव रोते हुए बोला—

 

“मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता।”

 

पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“बेटा… कुछ सफर ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पूरा करना पड़ता है।”

 

ट्रेन रुक गई।

 

बाहर सुबह की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

 

पिता ने कहा—

 

“जाओ।”

 

आरव ट्रेन से उतर गया।

 

जैसे ही उसने पीछे देखा…

 

ट्रेन गायब हो चुकी थी।

 

पटरी खाली थी।

 

सिर्फ जमीन पर एक पुराना टिकट पड़ा था।

 

आरव ने उसे उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“वापसी — सफल।”

 

लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन थी—

 

“यात्रा समाप्त नहीं हुई।”

 

आरव ने वह लाइन पढ़ी ही थी कि दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

 

फूँऽऽऽ…

 

वह पलटकर देखने लगा।

 

पटरी खाली थी।

 

फिर उसके मोबाइल में एक मैसेज आया।

 

“आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

 

आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

 

क्योंकि आज भी तारीख थी—

 

14 अगस्त।

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