रात धीरे-धीरे बीत रही थी।
पुराने मकान के नीचे बने उस कमरे में आरव और कबीर अब भी खड़े थे। टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे। हर टुकड़े में अलग-अलग परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।
एक टुकड़े में आरव था।
दूसरे में कबीर।
लेकिन तीसरे टुकड़े में वही काला साया था।
लंबा, बिना चेहरे का और इंसानी शरीर से कहीं अधिक डरावना।
अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
कबीर ने दरवाज़ा खींचा, लेकिन वह नहीं खुला।
“आरव… लगता है वह हमें जाने नहीं देगा।”
आरव ने दीपक को कसकर पकड़ लिया।
“हमें सुबह तक इंतज़ार करना होगा।”
तभी कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
फिर किसी बूढ़े के कराहने की।
फिर एक आदमी की चीख।
जैसे इस घर में वर्षों से दबे हुए सारे दर्द एक साथ बाहर निकल आए हों।
दीवारों पर काली परछाइयाँ दौड़ने लगीं।
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
तभी उसके कान के पास आवाज़ आई—
“सच बोलोगे?”
आरव ने आँखें खोलीं।
साया उसके सामने खड़ी थी।
इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।
सिर्फ़ थकान थी।
“तुम्हें डर लग रहा है?” उसने पूछा।
आरव ने कहा, “हाँ।”
साया बोली, “डरना गलत नहीं है। डर के कारण सच छिपाना गलत है।”
अचानक साया के पीछे काला धुआँ जमा होने लगा।
धुआँ धीरे-धीरे इंसानी आकार लेने लगा।
वह काला साया था।
उसने लंबा हाथ आरव की तरफ़ बढ़ाया।
दीपक की लौ काँपने लगी।
कबीर चिल्लाया, “आरव, दीपक बुझने मत देना!”
आरव ने दोनों हाथों से दीपक ढक लिया।
काला साया गुर्राया।
“तुम इंसान हो। तुम्हारे भीतर भी डर है… लालच है… झूठ है…”
आरव ने काँपते हुए कहा, “हाँ, मेरे अंदर भी डर है। लेकिन मैं तुम्हें अपना डर नहीं दूँगा।”
काला साया अचानक उसके ऊपर झपटा।
कमरा अँधेरे में डूब गया।
आरव को लगा जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो।
उसे साँस लेने में परेशानी होने लगी।
कबीर ने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन अदृश्य ताकत ने दोनों को दीवार से पटक दिया।
दीपक उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।
लौ बुझने ही वाली थी।
तभी साया ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ दीपक के ऊपर कर दिए।
दीपक फिर जल उठा।
काला साया पीछे हट गया।
साया की आवाज़ गूँजी—
“यह घर डर से नहीं… सच से मुक्त होगा।”
आरव ने डायरी उठा ली।
उसने उसमें लिखी साया की पूरी कहानी जोर से पढ़नी शुरू की।
उसका पति उसे इस कमरे में बंद करके गया था।
उसने साया को मारने की कोशिश की थी।
और बाद में गाँव वालों से झूठ कहा था कि साया भाग गई।
साया की हत्या का सच कभी सामने नहीं आया।
जैसे-जैसे आरव पढ़ता गया, कमरे की दीवारों पर बनी काली परछाइयाँ कमजोर होने लगीं।
काला साया चीखने लगा।
“चुप हो जाओ!”
आरव पढ़ता रहा।
“साया निर्दोष थी।”
काला साया पीछे हटने लगा।
“उसकी मृत्यु हत्या थी।”
कमरे में तेज़ हवा चलने लगी।
“और उसकी आत्मा को वर्षों तक झूठ के कारण भटकना पड़ा।”
अचानक ऊपर से बहुत तेज़ आवाज़ आई।
जैसे पूरा मकान हिल गया हो।
फर्श में दरार पड़ गई।
दरार के अंदर से काली राख निकलने लगी।
कबीर ने कहा, “आरव! शायद यही वह चीज़ है जिसे खत्म करना होगा।”
आरव ने दीपक उठाया।
वह राख के पास गया।
साया उसके सामने आ खड़ी हुई।
“मेरा असली नाम लो।”
आरव ने डायरी की तरफ़ देखा।
उस पर लिखा था—
“साया नहीं… मेरा नाम सावित्री है।”
आरव ने ऊँची आवाज़ में कहा—
“सावित्री!”
कमरा अचानक शांत हो गया।
उसने फिर कहा—
“सावित्री निर्दोष थी!”
तीसरी बार उसने कहा—
“सावित्री अब आज़ाद है!”
काले साये ने भयानक चीख मारी।
उसका शरीर धुएँ की तरह बिखरने लगा।
लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
उस हाथ की उँगलियाँ आरव की कलाई तक पहुँचीं।
उसका काला निशान अचानक जलने लगा।
आरव दर्द से चिल्लाया।
साया ने उसे देखा।
“डरो मत।”
उसने आरव की कलाई पर हाथ रखा।
काला निशान धीरे-धीरे मिटने लगा।
उसी क्षण सुबह की पहली किरण टूटी हुई खिड़की से कमरे में आई।
काला धुआँ गायब हो गया।
साया वहीं खड़ी थी।
अब उसके चेहरे पर शांति थी।
लेकिन उसने अभी तक पूरी तरह आँखें बंद नहीं की थीं।
“अभी एक काम बाकी है,” उसने कहा।
“क्या?”
“सच… गाँव तक पहुँचना चाहिए।”
इतना कहकर वह गायब हो गई।
दरवाज़ा खुल चुका था।
आरव और कबीर बाहर आए।
बारिश रुक चुकी थी।
आसमान में हल्की लालिमा दिखाई दे रही थी।
लेकिन पुराने मकान की सबसे ऊपरी खिड़की में उन्हें एक आखिरी बार साया दिखाई दी।
उसने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।
फिर अँधेरे में विलीन हो गई।
आरव ने समझ लिया कि असली मुक्ति अभी बाकी थी।
उसे पूरे गाँव के सामने सावित्री का सच बताना था।
और अगली सुबह गाँव की चौपाल में वर्षों पुराना राज़ खुलने वाला था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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