दीनानाथ की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उसे देखता रहा।
“देवेंद्र वापस आ गया है… इसका मतलब क्या है?”
दीनानाथ ने दरवाज़ा बंद किया और धीरे से कहा—
“जिसे तुमने तहखाने में देखा, वह देवेंद्र की आत्मा थी।”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं। मैंने उसे देखा था। वह इंसान की तरह था।”
“यही तो उसकी ताकत है।”
दीनानाथ ने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।
“लेकिन अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”
“कहाँ जाना है?”
“तुम्हारे पिता के कमरे में।”
दोनों हवेली के दूसरी मंज़िल पर पहुँचे।
दीनानाथ ने एक पुराने कमरे का ताला खोला।
कमरे में एक बड़ी मेज़, पुरानी किताबें और लकड़ी की अलमारी थी।
आरव ने दीवार पर अपने पिता की तस्वीर देखी।
उसके नीचे एक तारीख लिखी थी—
18 जुलाई 1998।
दीनानाथ ने कहा—
“तुम्हारे पिता ने मीरा को मारने की कोशिश नहीं की थी। वह उसे बचाना चाहते थे।”
“तो फिर मीरा मरी कैसे?”
दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।
“उस रात देवेंद्र को पता चल गया था कि मीरा माँ बनने वाली है।”
आरव ध्यान से सुनने लगा।
“देवेंद्र तुम्हारे पिता का बड़ा भाई था। उसे लगता था कि परिवार की सारी संपत्ति उसी की होगी। लेकिन तुम्हारे दादा ने अपनी वसीयत बदल दी थी। उन्होंने तय किया था कि पूरी संपत्ति उस बच्चे के नाम होगी जो मीरा से पैदा होने वाला था।”
आरव की आँखें फैल गईं।
“इसलिए उसने बच्चे को मारने की कोशिश की?”
“हाँ।”
“फिर?”
दीनानाथ ने एक पुरानी डायरी मेज़ पर रख दी।
“यह तुम्हारे पिता की डायरी है।”
आरव ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“17 जुलाई की रात।”
“आज मीरा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डॉक्टर को हवेली तक आने में देर हो रही है। देवेंद्र लगातार घर के आसपास घूम रहा है। मुझे डर है कि वह कुछ कर सकता है।”
अगले पन्ने पर लिखा था—
“रात 11:40 बजे।”
“बच्चा पैदा हो चुका है। मीरा और बच्चा सुरक्षित हैं। लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।”
फिर एक पन्ना खाली था।
उसके बाद लिखा था—
“रात 12:05 बजे।”
“देवेंद्र अंदर आ गया। उसने बच्चे को छीनने की कोशिश की। मीरा ने बच्चे को बचाने के लिए खुद को उसके सामने खड़ा कर दिया।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
अगले शब्द पढ़ते हुए उसके हाथ काँपने लगे।
“देवेंद्र ने मीरा को धक्का दिया। उसका सिर पत्थर की मेज़ से टकराया। वह वहीं गिर गई।”
आरव ने डायरी बंद कर दी।
“और मेरे पिता?”
दीनानाथ ने कहा—
“तुम्हारे पिता देवेंद्र से लड़ने लगे। लेकिन तब तक मीरा की साँसें बंद हो चुकी थीं।”
आरव की आँखों के सामने मीरा का चेहरा घूमने लगा।
“फिर मुझे किसने बचाया?”
दीनानाथ ने उत्तर दिया—
“तुम्हारे पिता ने।”
“लेकिन मेरी परवरिश तो मेरी माँ ने की थी।”
दीनानाथ ने धीरे से कहा—
“जिसे तुम माँ समझते रहे… वह मीरा की बड़ी बहन थी।”
आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई।
“क्या?”
“मीरा की बहन ने तुम्हें अपना बच्चा बनाकर पाला। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी पहचान छिपा दी ताकि देवेंद्र तुम्हें कभी ढूँढ़ न सके।”
आरव कुछ बोल नहीं पाया।
तभी कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई।
धड़ाम!
दीनानाथ ने तुरंत पीछे देखा।
कमरे के कोने में किसी की परछाईं खड़ी थी।
“वह आ गया।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
वही आदमी।
देवेंद्र।
उसका चेहरा अब पहले से भी ज्यादा डरावना था।
“तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”
आरव पीछे हट गया।
दीनानाथ ने बंदूक उठाई और गोली चला दी।
धाँय!
गोली देवेंद्र के शरीर से आर-पार निकल गई।
लेकिन वह वहीं खड़ा रहा।
उसने दीनानाथ की ओर देखा।
“तुमने उस रात भी मुझे रोकने की कोशिश की थी।”
दीनानाथ काँपने लगा।
“मैंने गलती की थी।”
देवेंद्र हँसा।
“गलती?”
अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।
दीनानाथ हवा में उठ गया और दीवार से जा टकराया।
आरव ने चिल्लाकर कहा—
“उसे छोड़ दो!”
देवेंद्र उसकी ओर मुड़ा।
“तुम्हारे पिता ने मुझे हराने की कोशिश की थी। उन्होंने मुझे इस हवेली के तहखाने में बंद कर दिया था। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि मैं मरने के बाद भी वापस आ सकता हूँ।”
“तुम मुझसे क्या चाहते हो?”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“तुम्हारा खून।”
आरव पीछे हट गया।
“क्यों?”
“क्योंकि संपत्ति का अधिकार तुम्हारे पास है। तुम्हारे मरते ही वह अधिकार खत्म हो जाएगा।”
देवेंद्र ने हाथ उठाया।
आरव अचानक जमीन से उठने लगा।
उसकी साँस रुकने लगी।
तभी कमरे में मीरा की आवाज़ गूँजी—
“उसे मत छूना!”
देवेंद्र रुक गया।
कमरे में ठंडी हवा फैल गई।
मीरा की आत्मा आरव और देवेंद्र के बीच खड़ी थी।
“तुमने मेरा बच्चा मुझसे छीना था।”
देवेंद्र हँसा।
“और अब मैं उसे भी छीन लूँगा।”
मीरा की आँखें लाल हो गईं।
अचानक दीवारों से कई हाथ निकलने लगे।
देवेंद्र पीछे हट गया।
“नहीं!”
मीरा ने आरव से कहा—
“भागो!”
आरव ने दीनानाथ को उठाया और दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े।
लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले ही मीरा ने चीखकर कहा—
“आरव, अपने पिता की कब्र के नीचे देखना!”
दरवाज़ा खुल गया।
आरव और दीनानाथ बाहर निकल गए।
कुछ देर बाद पीछे से जोरदार धमाका हुआ।
पूरी हवेली काँप उठी।
आरव ने पीछे देखा।
तीसरी मंज़िल की खिड़की में मीरा खड़ी थी।
उसने हाथ उठाकर आरव को इशारा किया।
फिर खिड़की के पीछे अंधेरा छा गया।
दीनानाथ ने कहा—
“अब तुम्हें अपने पिता की कब्र पर जाना होगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि इस पूरी कहानी का आखिरी सच वहीं छिपा है।”
अगली सुबह दोनों कब्रिस्तान पहुँचे।
आरव अपने पिता की कब्र के सामने खड़ा था।
उसने मिट्टी हटानी शुरू की।
कुछ देर बाद फावड़ा किसी लोहे की चीज़ से टकराया।
ठन!
आरव ने मिट्टी हटाई।
वहाँ एक लोहे का छोटा संदूक था।
उस पर लिखा था—
“आरव के लिए — जब वह सच जानने के योग्य हो जाए।”
आरव ने संदूक खोला।
अंदर एक वीडियो कैमरा, कुछ कागज़ और एक छोटी सी चाबी थी।
लेकिन सबसे ऊपर एक चिट्ठी रखी थी।
आरव ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।
पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई—
“आरव, अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि मीरा अब तुम्हें बचाने के लिए वापस आ चुकी है।”
लेकिन चिट्ठी की आखिरी लाइन ने आरव को अंदर तक हिला दिया—
“देवेंद्र से तुम्हारा रिश्ता जितना तुम सोचते हो, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।”
आरव ने सिर उठाकर दीनानाथ की ओर देखा।
दीनानाथ के चेहरे पर डर था।
“इसका मतलब क्या है?”
दीनानाथ ने काँपती आवाज़ में कहा—
“इसका मतलब… देवेंद्र सिर्फ तुम्हारे चाचा नहीं थे।”
अचानक पीछे से वही आहट सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
आरव ने पलटकर देखा।
कब्रिस्तान में कोई नहीं था।
लेकिन उसके पिता की कब्र के पीछे एक नई कब्र दिखाई दे रही थी।
उस पर नाम लिखा था—
“देवेंद्र राघव सिंह।”
और नीचे तारीख थी—
17 जुलाई 1998।
आरव के हाथ से चिट्ठी गिर गई।
क्योंकि उसी क्षण उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“बेटा…”
आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
और वहाँ…
उसका अपना पिता खड़ा था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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