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Dil sabhal ja jara part – 13

पढ़ने का समय : 7 मिनट

Part – 13 dil ka jang 

 

 

 

 

शिमला की बर्फीली रातें अब और लंबी लगने लगी थीं। ठाकुर हाउस में हर कमरे में हीटर चल रहा था, लेकिन आरव के दिल में एक अलग ही ठंडक फैल गई थी। वो रातों में सो नहीं पाता था। बालकनी में खड़ा होकर बर्फ गिरते देखता, और मन में तूफान मचता। प्रिया… उसका नाम ही अब उसके लिए एक पहेली बन गया था। वो प्रिया जिसे उसने सालों खोया मानकर जिया, जिसे वापस पाकर लगा था जिंदगी पूरी हो गई। लेकिन अब? अब वो एहसास जो दिल में धीरे-धीरे पनप रहा था, वो उसे खुद से ही लड़वा रहा था।

 

आरव अपने कमरे में लेटा था। छत को घूर रहा था। यादें एक-एक करके आ रही थीं। बचपन की वो शामें, जब मम्मी रानी उसे और छोटी प्रिया को बगीचे में घुमाती थीं। प्रिया तब मुश्किल से चार साल की थी – छोटी सी गुड़िया, जो आरव की उंगली पकड़कर चलती। “भैया… झूला झुलाओ ना!” उसकी मासूम आवाज अभी भी कानों में गूंजती। आरव मुस्कुराया, लेकिन मुस्कान में दर्द था। वो समय जब एक्सीडेंट हुआ, प्रिया लापता हो गई – वो रातें जब वो रोता रहता, पापा उदास रहते। सालों तक वो खुद को दोष देता रहा – अगर मैं प्रिया को टाइटली पकड़ता तो शायद…

 

लेकिन अब प्रिया वापस थी। बड़ी हो गई थी। उसकी आंखों में वही चमक, वही स्ट्रेंथ। आरव ने उसे बहन की तरह अपनाया था। लेकिन डायरी का वो राज़ – कि वो खून का भाई नहीं – सब बदल दिया। पहले तो लगा बस रिश्ता नाम का है, दिल से तो बहन ही है। लेकिन धीरे-धीरे वो नजरें बदलने लगीं। प्रिया को देखकर दिल का धड़कना तेज़ हो जाता। उसकी हंसी पर मन बहक जाता। वो छोटी-छोटी बातें – प्रिया का बालों को कान के पीछे करना, उसका शॉल ओढ़ना – सब आरव को अजीब सा सुकून देतीं। लेकिन साथ ही गिल्ट। “ये गलत है। वो मुझे भाई मानती है। मैं उसका सहारा हूं, प्यार नहीं।”

 

आरव उठा और खिड़की के पास गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो सिगरेट जलाई – ये आदत नई थी, तनाव कम करने की कोशिश में। धुंआ बाहर निकाला और खुद से बोला, “आरव, क्या हो रहा है तुझे? प्रिया तेरी बहन है। दिल से। उसे ऐसा कुछ मत फील कर। वो विक्रांत से दोस्ती कर रही है, तुझे खुश होना चाहिए।” लेकिन अंदर ही अंदर जलन थी। विक्रांत का नाम सुनते ही मन में आग लग जाती। “क्यों? क्यों मुझे बुरा लगता है जब वो विक्रांत से बात करती है?”

 

अगली सुबह ठाकुर हाउस में ब्रेकफास्ट की टेबल पर सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पेपर पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, रिया जैम लगाकर टोस्ट खा रही थी। प्रिया नीचे आई – सादे स्वेटर में, बाल खुले। आरव की नजर उस पर टिक गई। प्रिया मुस्कुराई। “गुड मॉर्निंग भैया।”

आरव की आवाज कांपी। “गुड मॉर्निंग प्रिया। सोई अच्छे से?”

“हां भैया। लेकिन रात को बर्फ की आवाज से नींद टूटी।”

आरव ने उसके लिए चाय बनाई। “ले, गरम चाय। ठंड न लग जाए।”

प्रिया ने लिया। उनके हाथ छुए। आरव का दिल धड़का। वो जल्दी से मुड़ा। रिया ने नोटिस किया। “भैया, आजकल आप प्रिया को स्पेशल ट्रीटमेंट दे रहे हो। चाय खुद बना रहे हो?”

आरव ने हंसने की कोशिश की। “रिया, बहन है ना। केयर तो करूंगा।”

लेकिन अंदर वो लड़ रहा था। “ये केयर भाई वाली है या…?”

कॉलेज में प्रिया और विक्रांत फिर मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वो लेटर विक्रम का झूठ है। मैंने चेक किया – मेरी दादी की डायरी में कोई ऐसा जिक्र नहीं। वो हमें अलग करना चाहता है।”

 

प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे पता है विक्रांत। लेकिन अवनी ने ये अफवाह फैलाई है। लोग बातें कर रहे हैं।”

विक्रांत ने उसका कंधा थपथपाया। “चिंता मत कर। हम साथ हैं। दोस्त की तरह।”

प्रिया मुस्कुराई। लेकिन मन में आरव था। “क्यों भैया के बारे में सोच रही हूं?”

 

शाम को घर लौटते वक्त आरव फिर कार लेकर आया। आज रिया नहीं थी। सिर्फ आरव और प्रिया। रास्ते में सन्नाटा था। प्रिया ने चुप्पी तोड़ा। “भैया, आज तुम चुप क्यों हो?”

आरव ने कार साइड में रोकी। “प्रिया… मुझे कुछ कहना है।”

 

प्रिया का दिल धड़का। “क्या भैया?”

आरव ने उसकी आंखों में देखा। “तू खुश है ना? विक्रांत से मिलकर?”

प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा दोस्त है। लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो?”

आरव ने सांस ली। “प्रिया, मैं… मैं तुझे देखकर खुश हूं। लेकिन कभी-कभी लगता है कि तू दूर जा रही है। 

 

प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया, तुम मेरे सबसे करीब हो। कोई नहीं आएगा हमारे बीच।”

आरव का दिल पिघल गया। वो प्रिया के हाथ को देखता रहा। उस स्पर्श में कुछ था – गर्माहट, जो भाई-बहन वाली नहीं लग रही थी। वो खुद से लड़ रहा था। “प्रिया, अगर मैं कहूं कि मैं तुझे… बहन से ज्यादा मानता हूं?”

प्रिया चौंकी। “भैया…?”

 

आरव ने सिर झुका लिया। “सॉरी। भूल जा। मैं कन्फ्यूज हूं। सालों से तुझे बहन माना, अब राज़ खुलने के बाद… दिल नहीं मानता। लेकिन मैं गलत हूं। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ूंगा।”

 

प्रिया की आंखें नम हो गईं। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सब कुछ हो। लेकिन ये नया एहसास… मुझे डर लगता है। अगर हमारा रिश्ता बदल गया तो?”

 

आरव ने उसे गले लगा लिया। “कुछ नहीं बदलेगा प्रिया। मैं तुझे कभी दुख नहीं दूंगा। लेकिन ये एहसास… ये मुझे अंदर से खा रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं।”

 

दोनों रो पड़े। कार में सन्नाटा था, बाहर बर्फ गिर रही थी। आरव का इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट अब पीक पर था – प्यार का एहसास, गिल्ट का बोझ, और रिश्ते को बचाने की जंग। वो जानता था कि प्रिया को दबाव नहीं दे सकता, लेकिन दिल नहीं मान रहा था।

 

अगले दिनों आरव ने दूरी बनाने की कोशिश की। प्रिया से कम बात करता, घर से जल्दी निकलता। लेकिन प्रिया नोटिस कर रही थी। एक रात प्रिया उसके कमरे में गई। “भैया, क्या हुआ? तुम मुझसे दूर क्यों हो रहे हो?”

आरव ने किताब बंद की। “प्रिया… मैं तुझे दुख नहीं देना चाहता। मेरे एहसास… वो तेरे लिए बोझ हैं।”

 

प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारे एहसास मेरे लिए बोझ नहीं। मैं भी सोच रही हूं। लेकिन धीरे-धीरे। हमें वक्त चाहिए।”

 

आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू मेरी जिंदगी है। मैं तुझे खो नहीं सकता।”

प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “तुम भी मेरी हो भैया।”

उस रात आरव ने डायरी में लिखा – “प्रिया, मैं तुझे प्यार करता हूं। लेकिन ये प्यार रिश्ते को तोड़ेगा या जोड़ेगा? मैं लड़ रहा हूं – खुद से, समाज से, पुराने रिश्तों से। लेकिन तेरी खुशी से ऊपर कुछ नहीं।”

 

दूसरी तरफ विक्रांत प्रिया को मैसेज करता रहा। “प्रिया, क्या हुआ? मिलना क्यों नहीं?”

प्रिया ने जवाब दिया, “बिजी हूं। बाद में बात करते हैं।”

अवनी का प्लान काम कर रहा था। वो विक्रम से मिलकर आई थी। “विक्रम, आरव और प्रिया के बीच कुछ हो रहा है। अगर वो मिल गए तो ठाकुर प्रॉपर्टी हमारी नहीं रहेगी।”

विक्रम ने हंसकर कहा, आरव को बताओ कि विक्रांत का बैकग्राउंड संदिग्ध है।”

अगले दिन कॉलेज में अवनी ने आरव को एक फाइल दी। “आरव, विक्रांत की दादी ने तुम्हारी मां की मौत में हाथ था। प्रूफ देखो।”

आरव ने फाइल पढ़ी। पुराने लेटर्स, जो दिखाते थे कि राठौर फैमिली ने ठाकुरों को बदनाम करने की साजिश की थी। आरव का गुस्सा फूट पड़ा। वो घर आया और प्रिया से कहा, “विक्रांत से दूर रह। वो दुश्मन है।”

प्रिया ने कहा, “भैया, वो झूठ है।”

लेकिन आरव चीखा, “नहीं प्रिया! मैं तुझे खो नहीं सकता। वो तुझे चोट पहुंचाएगा।”

 

प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का है या कुछ और का?”

आरव चुप हो गया। उसका कॉन्फ्लिक्ट अब बाहर आ रहा था – प्यार, जलन, प्रोटेक्शन। वो खुद से हार रहा था।

 

रात को बर्फ गिर रही थी। आरव बाहर खड़ा था। प्रिया आई। “भैया… हम बात करेंगे?”

आरव ने उसे देखा। “प्रिया… मैं नहीं लड़ सकता अब। मैं तुझे प्यार करता हूं। बहन से ज्यादा। लेकिन ये गलत है।”

प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया…?”

आरव रो पड़ा। “सॉरी प्रिया। मैं दूर जाऊंगा। तुझे दुख नहीं दूंगा।”

 

प्रिया ने उसे रोका। “नहीं भैया। मैं भी… मैं भी कुछ फील कर रही हूं। लेकिन डर लगता है।”

दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी। दिल की जंग शुरू हो चुकी थी – इमोशंस की, रिश्तों की। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अब खुला था – प्यार का बोझ, गिल्ट की चुभन, और प्रिया को खोने का डर। वो धीरे-धीरे उस एहसास को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन स्ट्रगल खत्म नहीं हुआ था।

विक्रांत का फोन फिर बजा। प्रिया ने उठाया नहीं।

 

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