हवेली के मुख्य दरवाजे पर लगातार दस्तक हो रही थी।
ठक…
ठक…
ठक…
फिर वही आवाज आई—
“विवेक… बेटा, दरवाजा खोलो।”
आवाज बिल्कुल किसी बूढ़े पिता जैसी थी।
विवेक दरवाजे के पास खड़ा काँप रहा था।
आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दरवाजा मत खोलना।”
कमला जमीन पर बैठी बुदबुदा रही थी—
“हे भगवान… वह वापस आ गया…”
विवेक ने माँ की तरफ देखा।
“माँ, आखिर सच क्या है?”
कमला ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में पंद्रह साल पुराना डर फिर से लौट आया था।
“तेरे पिता जिंदा थे।”
“लेकिन आपने मुझे बताया कि उनकी मौत हो गई थी।”
“मैंने झूठ बोला था।”
“क्यों?”
कमला रोने लगी।
“क्योंकि अगर मैं सच बता देती तो शायद तू भी मर जाता।”
आरती ने पूछा—
“राघव ने नंदिनी को क्यों मारा?”
कमला ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“पैसों के लिए।”
हवेली के बाहर दस्तक और तेज हो गई।
ठक! ठक! ठक!
“विवेक… मैं तुम्हारा पिता हूँ।”
विवेक ने दरवाजे की तरफ देखा।
फिर माँ से पूछा—
“अगर वह मेरे पिता हैं, तो आप उन्हें अंदर आने से क्यों रोक रही हैं?”
कमला ने काँपती आवाज में कहा—
“क्योंकि राघव अब इंसान नहीं रहा।”
अचानक दरवाजे के नीचे से काला धुआँ अंदर आने लगा।
आरती पीछे हट गई।
धुआँ धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा।
उसके बीच एक आकृति बनने लगी।
एक आदमी…
लंबा कद…
झुका हुआ चेहरा…
और आँखें पूरी तरह काली।
आरती चीख पड़ी।
कमला ने कहा—
“मत देखो उसकी आँखों में!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
विवेक ने उस आकृति की तरफ देख लिया।
अचानक वह आदमी गायब हो गया।
और विवेक जमीन पर गिर पड़ा।
आरती उसके पास पहुँची।
“विवेक!”
उसकी आँखें बंद थीं।
लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।
“पिताजी… मुझे माफ कर दीजिए…”
आरती घबरा गई।
“विवेक! होश में आओ!”
कुछ सेकंड बाद विवेक ने आँखें खोलीं।
उसने डरते हुए कहा—
“मैंने उन्हें देखा।”
“किसे?”
“अपने पिता को।”
“उन्होंने क्या कहा?”
विवेक का चेहरा पीला पड़ गया।
“उन्होंने कहा… नंदिनी को उन्होंने नहीं मारा।”
कमला अचानक चिल्लाई—
“झूठ!”
विवेक ने माँ की तरफ देखा।
“उन्होंने कहा कि नंदिनी की मौत के पीछे कोई और था।”
आरती ने पूछा—
“कौन?”
विवेक कुछ बोलता, उससे पहले ऊपर से भारी चीज गिरने की आवाज आई।
धड़ाम!
तीनों ऊपर की तरफ भागे।
पुराने कमरे का दरवाजा खुला था।
अंदर दीवार पर नंदिनी की तस्वीर लगी थी।
लेकिन तस्वीर बदल चुकी थी।
अब नंदिनी की गोद में एक छोटी बच्ची दिखाई दे रही थी।
आरती के रोंगटे खड़े हो गए।
“ये बच्ची कौन है?”
कमला ने रोते हुए कहा—
“नंदिनी की बेटी।”
आरती ने चौंककर पूछा—
“लेकिन आपने कहा था कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया था।”
कमला ने सिर झुका लिया।
“मैंने कहा था कि बच्चा मर गया था… लेकिन मुझे नहीं पता था कि सच क्या है।”
तभी पीछे से नंदिनी की आवाज आई—
“वह मरी नहीं थी।”
कमरे में अचानक ठंडी हवा भर गई।
नंदिनी सामने दिखाई दी।
इस बार उसके चेहरे पर डरावनी मुस्कान नहीं थी।
उसकी आँखों में माँ का दर्द था।
“मेरी बेटी जिंदा थी।”
आरती की आँखें भर आईं।
“फिर कहाँ है वह?”
नंदिनी ने अपनी उँगली हवेली के पुराने कुएँ की तरफ कर दी।
“उस रात मुझे रसोई में ले जाया गया था।”
उसकी आवाज काँपने लगी।
“राघव ने मुझसे कहा था कि मेरे पिता पैसे नहीं देंगे, इसलिए मुझे इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।”
आरती सुनती रही।
“मैंने उसके सामने हाथ जोड़कर कहा था कि मुझे मत मारो।”
नंदिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे।
“लेकिन लालच इंसान से उसकी आत्मा छीन लेता है।”
कमला रोते हुए बोली—
“बस करो नंदिनी…”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
“तुमने देखा था कमला।”
कमला काँपने लगी।
“हाँ… मैंने सब देखा था।”
“फिर तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं?”
कमला जमीन पर गिर गई।
“मैं डर गई थी।”
नंदिनी की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी—
“तुम डर गई थीं… और मेरी जिंदगी खत्म हो गई।”
आरती ने नंदिनी से पूछा—
“उस रात आखिर हुआ क्या था?”
नंदिनी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
“राघव ने मुझे रसोई में बंद कर दिया था। वह मुझसे दो लाख रुपये माँग रहा था। मैंने कहा कि मेरे पिता के पास कुछ नहीं है।”
“फिर?”
“उसने मेरे ऊपर मिट्टी का तेल डाल दिया।”
कमरा अचानक धुएँ से भरने लगा।
आरती ने अपनी नाक ढक ली।
नंदिनी की आवाज और धीमी हो गई।
“लेकिन आग लगने से पहले मैंने अपनी बेटी को बचा लिया।”
आरती ने आश्चर्य से पूछा—
“कैसे?”
“मैंने उसे पुराने कपड़ों में लपेटकर पिछली खिड़की से बाहर फेंक दिया था।”
आरती के आँसू निकल आए।
“फिर बच्ची कहाँ गई?”
नंदिनी ने कहा—
“एक बूढ़ी औरत ने उसे उठा लिया।”
कमला ने अचानक सिर उठाया।
“नहीं…”
आरती ने उसकी तरफ देखा।
“आप उस बूढ़ी औरत को जानती हैं?”
कमला ने कुछ नहीं कहा।
तभी हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।
धीरे…
बहुत धीरे…
जैसे कोई लकड़ी की छड़ी के सहारे चल रहा हो।
ठक…
ठक…
ठक…
विवेक ने खिड़की से बाहर देखा।
हवेली के कुएँ के पास एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुराना लाल कपड़ा था।
वह ऊपर देखकर हवेली की तरफ मुस्कुरा रही थी।
आरती ने पूछा—
“कौन है वह?”
कमला के मुँह से धीरे से निकला—
“वही…”
“कौन?”
“वही औरत… जिसने नंदिनी की बच्ची को बचाया था।”
आरती नीचे जाने लगी।
विवेक ने उसे रोकना चाहा।
“रुको।”
लेकिन आरती ने कहा—
“अगर वह बच्ची आज भी जिंदा है, तो हमें उसे ढूँढना होगा।”
तीनों हवेली से बाहर निकले।
बूढ़ी औरत कुएँ के पास खड़ी थी।
उसने आरती को देखकर कहा—
“तुम नंदिनी की बहू हो?”
आरती ने सिर हिलाया।
बूढ़ी औरत मुस्कुराई।
“नहीं… तुम उसकी बेटी जैसी हो।”
आरती ने पूछा—
“आप नंदिनी की बच्ची को जानती हैं?”
बूढ़ी औरत ने अपनी मुट्ठी खोली।
उसमें एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट था।
“यह उसकी माँ ने मुझे दिया था।”
आरती ने लॉकेट देखा।
उस पर लिखा था—
“मेरी गुड़िया।”
“वह बच्ची कहाँ है?”
बूढ़ी औरत ने सामने सड़क की तरफ देखा।
“बहुत दूर नहीं।”
“कहाँ?”
“शहर में।”
“उसका नाम?”
बूढ़ी औरत ने आरती की आँखों में देखा।
फिर कहा—
“उसका नाम… आरती है।”
आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।
“क्या?”
विवेक ने उसकी तरफ देखा।
कमला के चेहरे पर डर जम गया।
बूढ़ी औरत ने कहा—
“हाँ बेटी… तुम ही नंदिनी की बेटी हो।”
हवा जैसे एक पल के लिए रुक गई।
आरती के हाथ से लॉकेट गिर गया।
“नहीं… यह सच नहीं हो सकता।”
बूढ़ी औरत ने कहा—
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें मरने से बचाया था।”
आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तो मेरे पिता कौन हैं?”
बूढ़ी औरत ने जवाब देने के बजाय पीछे देखा।
हवेली के दरवाजे पर एक काली आकृति खड़ी थी।
राघव।
वह मुस्कुरा रहा था।
उसने कहा—
“अब मेरी बेटी को कोई मुझसे नहीं छीन सकता।”
आरती पीछे हट गई।
“आप… मेरे पिता हैं?”
राघव ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
आरती के भीतर वर्षों का खालीपन अचानक भर गया।
लेकिन वह खुशी नहीं थी।
वह डर था।
नफरत थी।
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर राघव उसका पिता था…
तो उसने उसकी माँ को क्यों मारा?
राघव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें मुझसे छीन लिया था।”
आरती चिल्लाई—
“आपने मेरी माँ को मारा!”
राघव की मुस्कान गायब हो गई।
“नहीं।”
“तो किसने?”
राघव ने हवेली की तरफ देखा।
“इस घर ने।”
आरती कुछ समझ नहीं पाई।
राघव ने कहा—
“दहेज के लालच ने नंदिनी को मारा था। लेकिन उसके पीछे सिर्फ मैं नहीं था।”
कमला रोते हुए बोली—
“राघव, सच मत बताओ।”
राघव ने उसकी तरफ देखा।
“अब सच छिपाने का समय खत्म हो गया है।”
वह आरती के पास आया।
“तुम्हारी माँ को मारने के बाद मैंने उसकी आत्मा को हवेली में कैद कर दिया था।”
आरती ने काँपते हुए पूछा—
“क्यों?”
“ताकि उसका दर्द हमेशा इस घर में रहे।”
नंदिनी अचानक प्रकट हुई।
उसने राघव की तरफ देखा।
“तुमने मुझे कैद नहीं किया था।”
राघव पीछे हट गया।
नंदिनी बोली—
“मेरे दर्द को इस घर की दीवारों ने कैद किया था।”
फिर उसकी नजर आरती पर पड़ी।
“लेकिन अब मेरी बेटी आ गई है।”
नंदिनी ने हाथ बढ़ाया।
आरती धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।
माँ और बेटी के बीच केवल कुछ कदम का फासला था।
आरती ने रोते हुए कहा—
“माँ…”
नंदिनी ने उसे गले लगाने की कोशिश की।
लेकिन उसका शरीर धुएँ में बदल गया।
आरती ने हवा को पकड़ने की कोशिश की।
“माँ!”
नंदिनी की आवाज दूर से आई—
“बेटी… मुझे मुक्त करने के लिए मेरा बदला मत लेना।”
आरती रोते हुए बोली—
“फिर क्या करूँ?”
नंदिनी ने कहा—
“दहेज के खिलाफ लड़ना।”
“लोगों को बताना कि मेरी मौत सिर्फ मेरी नहीं थी।”
“हर उस बेटी की आवाज बनना, जो दहेज के कारण चुप है।”
अचानक हवेली में तेज रोशनी हुई।
राघव जमीन पर गिर पड़ा।
कमला ने पुलिस को फोन कर दिया।
कुछ ही देर में पुलिस हवेली पहुँच गई।
पुराने कमरे की तलाशी ली गई।
दीवार के पीछे से नंदिनी की डायरी, पुराने कागजात और कई ऐसे सबूत मिले जिनसे साबित हो गया कि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।
राघव को गिरफ्तार कर लिया गया।
कमला ने अदालत में सच बयान दिया।
पंद्रह साल बाद नंदिनी को इंसाफ मिलने की उम्मीद जगी।
लेकिन आरती के लिए असली लड़ाई अब शुरू हुई थी।
उसने अपने पति विवेक से कहा—
“मैं इस घर में नहीं रहूँगी।”
विवेक ने पूछा—
“फिर कहाँ जाओगी?”
आरती ने नंदिनी की तस्वीर हाथ में लेते हुए कहा—
“जहाँ मेरी माँ का सपना पूरा हो सके।”
“मैं उन बेटियों के लिए काम करूँगी जिन्हें दहेज के नाम पर डराया जाता है।”
विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
आरती ने हवेली की तरफ आखिरी बार देखा।
ऊपर की खिड़की में नंदिनी दिखाई दी।
वह मुस्कुरा रही थी।
उसकी पायल की आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई।
छन…
छन…
छन…
और फिर हवेली हमेशा के लिए शांत हो गई।
लेकिन जाते-जाते आरती को एक आवाज सुनाई दी—
“बेटी… अब किसी और माँ को अपनी बेटी के लिए रोने मत देना।”
आरती ने आँखें बंद कर लीं।
उसके आँसू गालों पर थे।
लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं था।
एक संकल्प था।
दहेज के खिलाफ लड़ने का संकल्प।
क्रमशः… भाग 4 में।
इस भाग की सीख
किसी भी अन्याय को केवल इसलिए स्वीकार मत कीजिए क्योंकि वह वर्षों से चला आ रहा है।
नंदिनी की सबसे बड़ी जीत यह नहीं थी कि उसके हत्यारे को सजा मिली।
उसकी असली जीत यह थी कि उसकी बेटी ने उसके दर्द को अपनी ताकत बना लिया।
दहेज की बेड़ियाँ तभी टूटेंगी, जब बेटियाँ अपने अधिकार के लिए आवाज उठाएँगी और परिवार उनका साथ देगा।
याद रखिए—
शादी दो परिवारों का रिश्ता है, सौदेबाजी नहीं।
बेटी कोई सामान नहीं, एक इंसान है।
और इंसान की कीमत कभी दहेज से नहीं लगाई जा सकती।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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