🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

पढ़ने का समय : 6 मिनट

बारिश में कैलाश की नोक-झोंक

कैलाश पर्वत पर उस दिन सुबह से ही बादल घिरे हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और थोड़ी देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं। कैलाश का वातावरण और भी सुंदर हो गया था।

 

माता पार्वती कैलाश के बाहर बैठकर बारिश देख रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। तभी उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। महादेव हमेशा की तरह शांत बैठे ध्यान में मग्न थे।

 

पार्वती जी ने कुछ देर उन्हें देखा और फिर बोलीं,

“महादेव!”

 

महादेव ने आँखें नहीं खोलीं।

 

“महादेव…!”

 

फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

 

पार्वती जी थोड़ा पास गईं और बोलीं,

“मैं आपसे बात कर रही हूँ।”

 

महादेव ने धीरे से आँखें खोलीं।

 

“कहो देवी।”

 

पार्वती जी ने बाहर होती बारिश की ओर इशारा किया।

“देखिए कितनी सुंदर बारिश हो रही है। चलिए बाहर चलते हैं।”

 

महादेव ने शांत स्वर में कहा,

“देवी, आप बाहर जाइए। मैं यहीं ठीक हूँ।”

 

पार्वती जी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

 

“आप यहीं ठीक हैं? मतलब मेरे साथ बारिश में चलना आपको अच्छा नहीं लगता?”

 

महादेव मुस्कुराए।

 

“ऐसी बात नहीं है।”

 

“तो फिर चलिए।”

 

“लेकिन मैं अभी ध्यान कर रहा था।”

 

पार्वती जी ने तुरंत कहा,

“आपका ध्यान तो हर समय चलता रहता है। कभी मेरे लिए भी समय निकाल लिया कीजिए।”

 

महादेव कुछ बोलते, उससे पहले ही माता पार्वती उठकर बाहर चली गईं।

 

वहाँ खड़े नंदी यह सब देख रहे थे। उन्होंने महादेव की तरफ देखा और फिर धीरे से अपना सिर हिला दिया।

 

महादेव बोले,

“नंदी, देवी आज कुछ अधिक ही नाराज़ लग रही हैं।”

 

नंदी ने जैसे मन ही मन कहा हो—‘स्वामी, यह तो आपको ही समझना होगा।’

 

महादेव बाहर आए। पार्वती जी बारिश में कुछ दूर खड़ी थीं। उन्होंने महादेव को आते देखा तो मुस्कुराने लगीं, लेकिन तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

 

महादेव उनके पास जाकर बोले,

“देवी, अब तो मैं आ गया।”

 

पार्वती जी बोलीं,

“अब आने का क्या फायदा?”

 

“क्यों?”

 

“जब मैंने बुलाया था तब नहीं आए।”

 

महादेव हँस पड़े।

 

“तो क्या अब वापस चला जाऊँ?”

 

पार्वती जी ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

 

“आपको बस मौका चाहिए वापस जाने का!”

 

महादेव ने हँसते हुए कहा,

“नहीं देवी, मैं तो बस पूछ रहा था।”

 

पार्वती जी ने बारिश की बूंदों को हथेली पर लेते हुए कहा,

“मुझे बारिश बहुत पसंद है।”

 

महादेव बोले,

“यह तो मैं जानता हूँ।”

 

“फिर भी आप मेरे साथ नहीं आए।”

 

“अब तो आ गया।”

 

“वो भी मेरे नाराज़ होने के बाद।”

 

महादेव कुछ पल चुप रहे।

 

फिर बोले,

“देवी, अगर आप नाराज़ न होतीं तो शायद मुझे अपनी गलती का पता ही नहीं चलता।”

 

पार्वती जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

 

“अच्छा! तो आपको मानना है कि गलती आपकी थी?”

 

महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

“हाँ।”

 

पार्वती जी ने तुरंत कहा,

“तो फिर क्षमा माँगिए।”

 

महादेव ने हाथ जोड़ लिए।

 

“क्षमा कीजिए देवी।”

 

पार्वती जी मुस्कुराने लगीं।

 

“इतनी जल्दी?”

 

“आपको मनाने में देर करूँगा तो बारिश खत्म हो जाएगी।”

 

माता पार्वती हँस पड़ीं।

 

तभी तेज हवा चली और बारिश की कुछ बूंदें महादेव के चेहरे पर पड़ीं। महादेव ने ऊपर देखा।

 

“लगता है आज बादल भी बहुत प्रसन्न हैं।”

 

पार्वती जी बोलीं,

“बादल प्रसन्न हैं या आपको देखकर हँस रहे हैं?”

 

महादेव ने पूछा,

“मुझे देखकर क्यों?”

 

“क्योंकि आप बारिश में भी ऐसे ही बैठे रहेंगे जैसे ध्यान में बैठे हों।”

 

महादेव हँसने लगे।

 

“देवी, आप आज मेरी बहुत परीक्षा ले रही हैं।”

 

“और आप हमेशा की तरह भोले बने हुए हैं।”

 

दोनों कुछ देर बारिश में चलते रहे।

 

अचानक पार्वती जी ने पीछे से पानी की कुछ बूंदें महादेव पर उछाल दीं।

 

महादेव ने पलटकर देखा।

 

“देवी!”

 

पार्वती जी मासूम बनकर बोलीं,

“क्या हुआ?”

 

“आपने मुझ पर पानी डाला?”

 

“मैंने? नहीं तो।”

 

महादेव ने आसपास देखा।

 

“यह पानी फिर कहाँ से आया?”

 

पार्वती जी हँसने लगीं।

 

“बारिश हो रही है महादेव। पानी तो आएगा ही।”

 

महादेव समझ गए कि यह माता की शरारत थी।

 

उन्होंने भी हाथ से थोड़ा पानी उठाया और पार्वती जी की ओर उछाल दिया।

 

पार्वती जी पीछे हट गईं।

 

“महादेव! आपने मुझ पर पानी डाला?”

 

महादेव बोले,

“मैंने? नहीं तो।”

 

“अभी आपने ही डाला!”

 

“बारिश हो रही है देवी। पानी तो आएगा ही।”

 

पार्वती जी उनकी नकल सुनकर हँस पड़ीं।

 

“आप भी ना!”

 

तभी नंदी दूर से यह सब देख रहे थे। महादेव ने उन्हें देखा।

 

“नंदी, तुम भी आ जाओ।”

 

नंदी धीरे-धीरे आगे बढ़े।

 

पार्वती जी बोलीं,

“नंदी को बीच में मत लाइए।”

 

महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

“क्यों?”

 

“क्योंकि ये हमेशा आपका साथ देते हैं।”

 

महादेव बोले,

“नंदी मेरे वाहन हैं।”

 

पार्वती जी ने कहा,

“और मैं आपकी पत्नी हूँ।”

 

महादेव तुरंत बोले,

“इसमें कोई संदेह नहीं देवी।”

 

“तो फिर कभी मेरा पक्ष भी लिया कीजिए।”

 

महादेव ने गंभीर होकर कहा,

“मैं तो हमेशा आपका ही पक्ष लेता हूँ।”

 

पार्वती जी ने आश्चर्य से पूछा,

“सच?”

 

“हाँ।”

 

“फिर अभी मेरी बात क्यों नहीं मान रहे थे?”

 

महादेव कुछ क्षण चुप रहे।

 

फिर बोले,

“क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद मुझे बाहर लेकर आएँ।”

 

पार्वती जी ने पूछा,

“क्यों?”

 

महादेव मुस्कुराए।

 

“क्योंकि जब आप मुझे अपने साथ चलने के लिए कहती हैं, तब कैलाश की सारी शांति भी मुझे छोटी लगने लगती है।”

 

पार्वती जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।

 

उनके चेहरे की नाराज़गी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

“आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें भी कर लेते हैं।”

 

महादेव बोले,

“कभी-कभी?”

 

“हाँ, कभी-कभी।”

 

महादेव हँस पड़े।

 

बारिश अब और तेज हो चुकी थी। चारों ओर पानी की बूंदों की आवाज गूँज रही थी।

 

पार्वती जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

 

“महादेव, चलिए।”

 

महादेव ने उनका हाथ थाम लिया।

 

“कहाँ?”

 

“बारिश में थोड़ा और घूमने।”

 

“अभी तो आप कह रही थीं कि मैं आपके साथ नहीं आया।”

 

“अब शिकायत खत्म।”

 

“इतनी जल्दी?”

 

पार्वती जी बोलीं,

“हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

 

“क्या?”

 

“आज आप ध्यान नहीं करेंगे।”

 

महादेव मुस्कुराए।

 

“ठीक है।”

 

“और मुझे अकेला भी नहीं छोड़ेंगे।”

 

“यह भी ठीक है।”

 

“और…”

 

महादेव ने हँसकर पूछा,

“और कितनी शर्तें हैं देवी?”

 

पार्वती जी भी मुस्कुरा दीं।

“बस एक आखिरी।”

“कहो।”

“आज की बारिश मेरे साथ देखेंगे।”

 

महादेव ने उनकी ओर देखा और बोले,

“यह शर्त तो मैं हर जन्म में मान लूँगा।”

माता पार्वती मुस्कुरा उठीं।

कैलाश पर बारिश होती रही। नंदी कुछ दूर खड़े उन्हें देखते रहे और शायद सोच रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ा रहस्य कोई मंत्र नहीं, बल्कि महादेव और माता पार्वती की यह छोटी-छोटी नोक-झोंक है, जिसमें नाराज़गी भी प्रेम होती है और मनाना भी प्रेम।

 

उस दिन कैलाश की बारिश कुछ ज्यादा ही सुंदर थी, क्योंकि उसमें बादलों की बूंदों के साथ महादेव और माता पार्वती की हँसी भी घुली हुई थी।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *