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लाल चुड़ैल

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

(भाग 3)

 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

 

अमन और रवि लाल हवेली के सामने खड़े थे।

 

उनके पास हरिराम काका की पुरानी डायरी थी और वह लाल लॉकेट भी।

 

लेकिन इस बार वे अकेले नहीं थे।

 

गाँव के कुछ बुज़ुर्ग भी उनके साथ थे।

 

क्योंकि अब सबको समझ आ चुका था कि लाल हवेली की कहानी सिर्फ अंधविश्वास नहीं थी।

 

हरिराम काका गायब हो चुके थे।

 

और अगर डायरी सच थी, तो तहखाने में कोई ऐसा राज़ छिपा था जिसने तीस साल से पूरे गाँव को डर में रखा था।

 

हवेली का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

 

क्रीईईक…

 

अंदर घना अंधेरा था।

 

अमन ने टॉर्च जलाई।

 

सीढ़ियों के नीचे एक पत्थर की दीवार दिखाई दी।

 

डायरी में लिखे संकेत के अनुसार उन्होंने दीवार के एक पत्थर को दबाया।

 

घर्रर्र…

 

दीवार धीरे-धीरे पीछे हट गई।

 

नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

 

सीढ़ियों से ठंडी हवा ऊपर आ रही थी।

 

रवि ने कहा—

 

“मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“अब नहीं।”

 

दोनों नीचे उतरने लगे।

 

हर सीढ़ी के साथ हवा और ठंडी होती जा रही थी।

 

नीचे पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा मिला।

 

दीवारों पर पुराने हाथों के निशान थे।

 

कुछ छोटे।

 

कुछ बड़े।

 

और कई निशान लाल रंग के थे।

 

गलियारे के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

 

उस पर पुराने खून के निशान दिखाई दे रहे थे।

 

अमन ने दरवाज़ा खोला।

 

अंदर एक छोटा कमरा था।

 

कमरे के बीच में लोहे की जंजीर पड़ी थी।

 

और दीवार पर खरोंचों से कुछ लिखा हुआ था।

 

“मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

 

अमन की आँखें फैल गईं।

 

तभी उसके पीछे से आवाज़ आई—

 

“वह मेरी बेटी थी।”

 

दोनों मुड़े।

 

लाल साड़ी वाली औरत उनके सामने खड़ी थी।

 

इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

 

वह डरावनी नहीं लग रही थी।

 

बल्कि बेहद दुखी थी।

 

उसकी आँखों से खून के आँसू बह रहे थे।

 

अमन ने धीरे से पूछा—

 

“तुम चंद्रा हो?”

 

औरत ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“तुमने गाँव वालों को क्यों डराया?”

 

चंद्रा ने जवाब दिया—

 

“मैंने किसी को नहीं डराया। मैंने सिर्फ उन्हें सच याद दिलाया।”

 

“हरिराम काका कहाँ हैं?”

 

चंद्रा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

 

अमन और रवि वहाँ पहुँचे।

 

हरिराम काका दीवार के पास बैठे थे।

 

वह जीवित थे।

 

लेकिन बहुत कमजोर।

 

अमन ने उन्हें उठाया।

 

“काका, यहाँ क्या हुआ था?”

 

हरिराम काका रो पड़े।

 

“देवेंद्र ने चंद्रा को इस तहखाने में बंद किया था। उसकी बेटी गौरी सब देख रही थी। उसने अपनी माँ को बचाने की कोशिश की।”

 

“फिर?”

 

“देवेंद्र ने गौरी को भी यहाँ बंद कर दिया।”

 

रवि ने पूछा—

 

“फिर आग किसने लगाई?”

 

काका ने सिर झुका लिया।

 

“देवेंद्र ने।”

 

अमन ने गुस्से में कहा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि चंद्रा के पास उसके सारे अपराधों के सबूत थे। उसे डर था कि चंद्रा गाँव वालों को सब बता देगी।”

 

अमन ने पूछा—

 

“लेकिन चंद्रा और गौरी बच कैसे गईं?”

 

काका ने काँपती आवाज़ में कहा—

 

“वे नहीं बचीं।”

 

सन्नाटा छा गया।

 

तभी पीछे से बच्ची की आवाज़ आई—

 

“माँ… मुझे बहुत अंधेरा लगा था।”

 

चंद्रा की आँखों से आँसू बहने लगे।

 

गौरी उसके पास आकर खड़ी हो गई।

 

अमन को समझ आया कि यह बदला नहीं था।

 

यह अधूरी कहानी थी।

 

चंद्रा ने अमन की ओर देखा।

 

“मेरा लॉकेट खोलो।”

 

अमन ने लॉकेट खोला।

 

उसके अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा कागज़ छिपा हुआ था।

 

कागज़ पर देवेंद्र के अपराधों का पूरा विवरण लिखा था।

 

गाँव की जमीनों पर कब्ज़ा।

 

लोगों को धमकाना।

 

और चंद्रा तथा गौरी को तहखाने में बंद करना।

 

अमन ने कहा—

 

“तुम चाहती हो कि यह सच गाँव वालों के सामने आए?”

 

चंद्रा ने सिर हिला दिया।

 

“बस इतना ही।”

 

अचानक तहखाने की दीवारें हिलने लगीं।

 

ऊपर से तेज़ आवाज़ आने लगी।

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

रवि चिल्लाया—

 

“हमें यहाँ से निकलना होगा!”

 

लेकिन चंद्रा वहीं खड़ी रही।

 

अमन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।

 

उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

 

“तुम भी हमारे साथ चलो।”

 

चंद्रा हल्का-सा मुस्कुराई।

 

“मेरा रास्ता यहाँ खत्म होता है।”

 

गौरी ने पहली बार अमन की तरफ देखा।

 

उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।

 

वे सामान्य थीं।

 

वह मुस्कुराई।

 

“धन्यवाद।”

 

अगले ही पल चंद्रा और गौरी धुएँ में बदलने लगीं।

 

उनकी आकृतियाँ धीरे-धीरे गायब हो गईं।

 

तहखाने में सिर्फ लाल चूड़ी बची।

 

अमन ने चूड़ी उठाई।

 

और तभी पीछे से एक भयानक आवाज़ आई—

 

“नहीं!”

 

चारों तरफ अचानक आग की लपटें उठने लगीं।

 

हरिराम काका चिल्लाए—

 

“देवेंद्र!”

 

कमरे के बीचोंबीच एक काली आकृति दिखाई दी।

 

वह देवेंद्र की आत्मा थी।

 

उसका चेहरा जला हुआ था।

 

वह अमन की ओर बढ़ा।

 

“यह सच बाहर नहीं जाएगा!”

 

अमन पीछे हट गया।

 

देवेंद्र ने उसका गला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन तभी लाल चूड़ी चमकने लगी।

 

पूरे तहखाने में लाल रोशनी फैल गई।

 

चंद्रा की आवाज़ गूँजी—

 

“अब मेरा सच कोई नहीं रोक सकता।”

 

देवेंद्र की आत्मा चीखने लगी।

 

“नहीं!”

 

एक तेज़ हवा चली।

 

और वह काली आकृति धुएँ की तरह गायब हो गई।

 

तहखाना टूटने लगा।

 

अमन, रवि और हरिराम काका किसी तरह बाहर भागे।

 

सुबह होते ही अमन ने गाँव वालों के सामने डायरी और वह कागज़ रख दिया।

 

सालों से छिपा सच सबके सामने था।

 

लाल हवेली को बाद में गिरा दिया गया।

 

बरगद के पेड़ के नीचे चंद्रा और गौरी की याद में एक छोटा-सा दीपक जलाया जाने लगा।

 

कहा जाता है कि उसके बाद अमावस्या की रात पगडंडी पर लाल साड़ी वाली औरत दिखाई देना बंद हो गई।

 

गाँव में फिर से शांति लौट आई।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

 

एक साल बाद अमन शहर लौट चुका था।

 

एक रात उसके कमरे की खिड़की पर अचानक—

 

ठक… ठक… ठक…

 

उसकी आँख खुल गई।

 

वह कुछ पल चुपचाप खिड़की को देखता रहा।

 

फिर उसने खिड़की खोली।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

नीचे फर्श पर एक छोटी-सी लाल चूड़ी पड़ी थी।

 

अमन ने काँपते हुए उसे उठाया।

 

तभी उसके पीछे एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

 

“माँ को तो मुक्ति मिल गई…”

 

अमन धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

 

कमरे के कोने में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

 

गौरी।

 

उसने मुस्कुराते हुए कहा—

 

“लेकिन क्या तुम्हें सच में लगता है कि देवेंद्र अकेला था?”

 

अमन के हाथ से लाल चूड़ी गिर गई।

 

कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

और अंधेरे में कई आवाज़ें एक साथ फुसफुसाईं—

 

“अभी तो कहानी शुरू हुई !

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