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😱भूतिया पार्लर 👻💄(part-1)

पढ़ने का समय : 4 मिनट

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव रामपुरवा में शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। चारों तरफ खेत, आम के पेड़, मिट्टी की सड़कें और दूर तक फैले सरसों के खेत थे।

 

लेकिन गाँव की सबसे अजीब जगह थी—पुरानी हवेली के सामने बना एक छोटा-सा पार्लर।

 

उसका नाम था “सजनी ब्यूटी पार्लर”।

 

करीब दस साल पहले तक वहाँ खूब चहल-पहल रहती थी। गाँव की लड़कियाँ शादी-ब्याह और त्योहारों पर सजने के लिए वहीं जाती थीं।

 

पार्लर की मालकिन थी सजनी।

 

सजनी बहुत खूबसूरत और हँसमुख महिला थी। वह गाँव की लड़कियों को मेहंदी लगाती, बाल बनाती और दुल्हनों का श्रृंगार करती थी।

 

लेकिन एक रात अचानक सजनी गायब हो गई।

 

पार्लर खुला था।

 

अंदर कुर्सी पर एक दुल्हन बैठी थी।

 

लेकिन सजनी कहीं नहीं थी।

 

दुल्हन का नाम था कुसुम।

 

जब लोगों ने उसे देखा तो वह बेहोश थी।

 

उसके सामने शीशे पर लाल रंग से सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“दुल्हन अभी अधूरी है…”

 

उस दिन के बाद पार्लर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

 

गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि रात के समय बंद पार्लर के अंदर से कभी-कभी हेयर ड्रायर चलने की आवाज आती है।

 

कभी चूड़ियों की खनखनाहट।

 

और कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की आवाज।

 

लेकिन गाँव का 18 साल का लड़का अमन इन बातों को बकवास समझता था।

 

अमन शहर में पढ़ाई करता था और छुट्टियों में गाँव आया हुआ था।

 

उसके दोस्त थे—सोनू, दीपक और राकेश।

 

एक शाम चारों चाय की दुकान पर बैठे थे।

 

सोनू ने कहा—

 

“कल रात मैंने पुराने पार्लर की खिड़की में किसी को देखा था।”

 

अमन हँस पड़ा।

 

“बिल्ली होगी।”

 

दीपक बोला—

 

“बिल्ली चूड़ी पहनकर गाना गाती है क्या?”

 

अमन चुप हो गया।

 

राकेश ने कहा—

 

“मेरे दादा कहते हैं, सजनी की आत्मा अभी भी उस पार्लर में है।”

 

अमन ने हँसते हुए कहा—

 

“आज रात चलते हैं। देखते हैं कौन है अंदर।”

 

तीनों दोस्त पहले तो डर गए, लेकिन अमन के पीछे चल पड़े।

 

रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों गाँव से बाहर निकले।

 

आसमान में बादल थे।

 

हवा बिल्कुल शांत थी।

 

पुरानी हवेली के पास पहुँचते ही अमन की टॉर्च अचानक झपकने लगी।

 

“बैटरी खत्म हो रही है,” उसने कहा।

 

पार्लर सामने था।

 

दरवाजे पर मोटा ताला लगा हुआ था।

 

खिड़कियों पर धूल जमी थी।

 

अमन ने टॉर्च खिड़की के अंदर डाली।

 

अंदर एक पुरानी कुर्सी थी।

 

उसके सामने बड़ा-सा शीशा लगा था।

 

अचानक…

 

टक!

 

शीशे पर अंदर से किसी ने हाथ मारा।

 

चारों पीछे हट गए।

 

“चलो यहाँ से,” राकेश ने कहा।

 

लेकिन अमन ने खिड़की के पास जाकर फिर टॉर्च डाली।

 

इस बार शीशे में चारों लड़कों का प्रतिबिंब दिखाई दिया।

 

लेकिन उनके पीछे…

 

एक पाँचवीं औरत खड़ी थी।

 

लंबे काले बाल।

 

लाल साड़ी।

 

और हाथ में कंघी।

 

अमन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

 

कोई नहीं था।

 

उसने फिर शीशे की तरफ देखा।

 

औरत अब भी वहाँ थी।

 

वह धीरे-धीरे अपने बालों में कंघी कर रही थी।

 

फिर उसने शीशे के अंदर से अमन की तरफ देखकर मुस्कुराया।

 

अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

 

चारों भागकर गाँव की तरफ दौड़े।

 

घर पहुँचकर अमन ने सोचा कि शायद डर की वजह से उसे भ्रम हुआ होगा।

 

लेकिन अगली सुबह उसके कमरे में एक चीज पड़ी थी।

 

एक पुरानी कंघी।

 

उस कंघी में लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

 

और उसके नीचे एक छोटी-सी चिट्ठी थी—

 

“कल दुल्हन बनकर आना।”

 

अमन ने चिट्ठी पढ़ी तो उसके हाथ काँपने लगे।

 

तभी बाहर से सोनू की आवाज आई—

 

“अमन! जल्दी बाहर आ!”

 

अमन बाहर आया।

 

सोनू की हालत खराब थी।

 

उसने कहा—

 

“मेरे घर में भी यही कंघी मिली है।”

 

दीपक और राकेश भी वहाँ पहुँच गए।

 

तीनों के हाथ में भी वैसी ही कंघियाँ थीं।

 

और चारों कंघियों में…

 

एक जैसे लंबे काले बाल उलझे हुए थे।

 

तभी गाँव की सबसे बुजुर्ग महिला जमुना दादी उनके पास आईं।

 

उन्होंने कंघी देखते ही अपना चेहरा गंभीर कर लिया।

 

“तुम लोगों ने पार्लर खोल दिया है क्या?”

 

अमन ने कहा—

 

“नहीं दादी।”

 

जमुना दादी ने धीरे से कहा—

 

“तो फिर सजनी ने तुम्हें चुन लिया है।”

 

चारों लड़कों के चेहरों का रंग उड़ गया।

 

“किसलिए?”

 

दादी ने जवाब दिया—

 

“क्योंकि उस पार्लर की आखिरी दुल्हन आज तक घर नहीं पहुँची थी…”

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