रामसेवक की बात सुनकर पूरा गाँव सन्न रह गया।
उस रात पंचायत बुलाई गई।
रामसेवक ने सबके सामने अपनी कहानी बताई।
पचास साल पहले वह जवान था। उसके साथ गाँव के दो और आदमी—लालमन और जग्गा—भैरव के दोस्त थे।
भैरव ने गौरी को मारने की योजना बनाई थी।
लेकिन जब गौरी ने विरोध किया तो मामला बिगड़ गया।
रामसेवक ने बताया—
“हमने गौरी को डराने के लिए श्मशान तक ले गए थे। हमारा इरादा उसे मारने का नहीं था। लेकिन भैरव ने गुस्से में उसका गला दबा दिया।”
गाँव के लोग स्तब्ध रह गए।
“फिर क्या हुआ?” रघु ने पूछा।
रामसेवक रोते हुए बोला—
“गौरी मर चुकी थी। हम तीनों डर गए। हमने उसे बरगद के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। भैरव ने हमसे कहा कि अगर किसी को बताया तो वह हम सबको बर्बाद कर देगा।”
“फिर भैरव कहाँ गया?”
“वह रातों-रात गाँव छोड़कर चला गया।”
उसके बाद लालमन और जग्गा भी धीरे-धीरे गाँव छोड़ गए।
रामसेवक अकेला रह गया।
उसने इतने वर्षों तक किसी को सच नहीं बताया।
पंडित हरिदास ने कहा—
“शायद गौरी की आत्मा इसी वजह से भटक रही है। उसे न्याय नहीं मिला।”
अगले दिन गाँव वालों ने गौरी की हड्डियों को विधि-विधान से निकाला।
श्मशान घाट की सफाई की गई।
गौरी के नाम से पूजा रखी गई।
लेकिन रात होते ही फिर वही डरावनी घटना शुरू हो गई।
आसमान में अचानक बादल घिर आए।
तेज हवा चलने लगी।
बरगद का पेड़ बुरी तरह हिलने लगा।
गाँव के लोगों ने देखा कि पेड़ की शाखाओं पर सफेद कपड़े लटक रहे हैं।
और फिर…
एक-एक करके श्मशान की सारी चिताओं की राख हवा में उड़ने लगी।
लोग डरकर पीछे हट गए।
पेड़ के नीचे सफेद साड़ी वाली गौरी दिखाई दी।
इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।
वह बहुत उदास लग रही थी।
उसने रामसेवक की तरफ देखा।
रामसेवक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
“गौरी… मुझे माफ कर दो।”
गौरी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
रामसेवक की आँखों के सामने अचानक पचास साल पुराना दृश्य दिखाई देने लगा।
गौरी रो रही थी।
वह मदद के लिए पुकार रही थी।
और रामसेवक खड़ा होकर सब देख रहा था।
रामसेवक जमीन पर गिर पड़ा।
“मुझे माफ कर दो!”
गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे।
फिर उसने पीछे मुड़कर बरगद के पेड़ को देखा।
अचानक पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर जमीन पर गिर गई।
शाखा के नीचे से एक पुरानी लोहे की पेटी दिखाई दी।
रघु ने पेटी खोली।
उसमें भैरव की एक चिट्ठी थी।
चिट्ठी में लिखा था—
“गौरी की मौत का जिम्मेदार मैं हूँ। अगर कभी यह चिट्ठी किसी को मिले तो समझ लेना कि रामसेवक, लालमन और जग्गा ने सिर्फ मेरी मदद की थी। असली अपराधी मैं हूँ।”
यह चिट्ठी सबूत बन गई।
गाँव के लोगों ने गौरी के लिए न्याय की प्रार्थना की।
उसी रात पहली बार श्मशान में अजीब शांति थी।
हवा बंद हो गई।
कुत्तों का भौंकना बंद हो गया।
पेड़ की शाखाएँ बिल्कुल स्थिर थीं।
गौरी की आत्मा आखिरी बार दिखाई दी।
उसने रघु की तरफ देखा।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
फिर उसने धीरे से कहा—
“अब… मुझे जाने दो।”
रघु ने हाथ जोड़ लिए।
“तुम्हें न्याय मिलेगा।”
गौरी की आकृति धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।
कुछ ही क्षणों में वह धुएँ की तरह हवा में घुल गई।
उस रात के बाद किसी ने श्मशान से रोने की आवाज नहीं सुनी।
लेकिन बरगद का पेड़ फिर भी वहीं खड़ा रहा।
गाँव वालों ने उसे काटने का फैसला किया।
पंडित हरिदास ने मना कर दिया।
उन्होंने कहा—
“इसे मत काटो। यह पेड़ अब डर की निशानी नहीं, बल्कि हमें हमारे कर्मों की याद दिलाने वाली निशानी है।”
तब से गाँव वालों ने उस जगह पर एक छोटा-सा पत्थर लगाया।
उस पर लिखा—
“अन्याय को देखकर चुप रहना भी अपराध है।”
कई साल बीत गए।
रघु बड़ा होकर शहर चला गया।
मुन्ना और छोटू भी अपने-अपने काम में लग गए।
लेकिन श्मशान का पेड़ आज भी बरवा गाँव में खड़ा है।
गाँव के बच्चे आज भी उसकी कहानी सुनते हैं।
लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात कभी-कभी पेड़ की शाखाओं के बीच सफेद रोशनी दिखाई देती है।
लेकिन अब किसी को डर नहीं लगता।
क्योंकि गाँव वाले जानते हैं कि वह गौरी की आत्मा नहीं…
बल्कि उस पुराने इतिहास की याद है।
इस कहानी की सीख यह है कि अंधविश्वास और डर के पीछे भागने के बजाय सच को समझना जरूरी है। उससे भी बड़ी बात—अगर हमारे सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, तो चुप रहना उस अन्याय को बढ़ावा देना है। गलत काम कितना भी पुराना क्यों न हो, एक दिन उसका सच सामने आता ही है। इसलिए डर से नहीं, बल्कि सच्चाई, इंसानियत और साहस से काम लेना चाहिए।
और बरवा गाँव के लोग आज भी बच्चों से कहते हैं—
“श्मशान के पेड़ से मत डरो… उस गलती से डरो, जो इंसान को इंसान के खिलाफ खड़ा कर दे।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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