रात के बारह बज रहे थे।
कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। उसकी काँपती लौ दीवार पर मेरी परछाईं बना रही थी। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। मैं चारपाई पर बैठी थी। गोद में एक पुरानी चिट्ठी थी—उसकी लिखी हुई। किनारे मुड़े हुए, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।
मैं बार-बार वही पंक्ति पढ़ रही थी “जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए साजन।”
साजन।
वह मुझे यही कहकर बुलाता था।
मेरा नाम सुमित्रा है। इस गाँव में मेरा जन्म हुआ, यहीं मेरी शादी तय हुई, और यहीं मैं पिछले सात साल से उसका इंतजार कर रही हूँ। लोग कहते हैं कि इंतजार भी एक उम्र होती है। मेरी उम्र इंतजार में ही कट गई।
वह था किशन। गाँव का ही लड़का। गेहूँ के खेतों में काम करने वाला, लेकिन सपनों में शहर बसाने वाला। पहली बार मैंने उसे मेले में देखा था। वह लाल पगड़ी बाँधे हुए था। आँखें इतनी तेज कि लग रहा था जैसे सूरज उनमें उतर आया हो। उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। बस। उसी मुस्कान ने मेरी जिंदगी बदल दी।
फिर शुरू हुई वह खट्टी-मीठी बातें। नदी किनारे मिलना, खेत की मेड़ पर बैठकर सपने देखना, और रात को चुपके से खिड़की के नीचे आकर गाना—
“सुमित्रा… कहीं देर न हो जाए साजन…”
मैं हँसती—“क्या देर हो जाएगी? मैं तो यहीं हूँ।”
वह गंभीर हो जाता—“पता नहीं। जिंदगी बड़ी चंचल है। कभी-कभी खुशियाँ भी देर कर देती हैं।”
शादी तय हो गई। दोनों घर राजी। तारीख भी तय हो गई—अगले साल फागुन की एक तारीख। लेकिन उससे पहले किशन को शहर जाना पड़ा। मजदूरी के लिए। पिता बीमार थे, कर्ज चढ़ा हुआ था। उसने कहा—“एक साल। सिर्फ एक साल। पैसे जमा करके लौटूँगा। फिर कभी नहीं जाऊँगा।”
मैंने उसकी उँगली पकड़ी थी। “जल्दी आना। कहीं देर न हो जाए साजन।”
वह हँसा था। “देर कैसे होगी? तुम इंतजार करोगी तो मैं हवा से भी तेज दौड़कर आऊँगा।”
वह चला गया।
पहले महीने चिट्ठियाँ आईं। हर चिट्ठी में वही बात—“जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए।”
फिर चिट्ठियाँ कम होने लगीं। कभी-कभी दो-दो महीने बाद आतीं। पैसे भेजता था। घर का कर्ज उतरने लगा। पिताजी की दवाइयाँ चलने लगीं।
तीसरे साल एक चिट्ठी आई जिसमें लिखा था—“यहाँ काम बढ़ गया है। थोड़ा और समय लगेगा। तुम घबराना मत। मैं आ रहा हूँ।”
मैंने जवाब में लिखा—“आ जाना। कहीं देर न हो जाए साजन। मैं थकने लगी हूँ इंतजार करते-करते।”
जवाब नहीं आया।
पाँचवें साल गाँव में अफवाह उड़ी कि किशन ने शहर में किसी और से शादी कर ली है। लोग मेरे घर आने लगे। सहानुभूति दिखाने वाले, ताने देने वाले, और रिश्ते लेकर आने वाले। पिताजी ने कहा—“कब तक बैठेगी? उम्र निकल रही है।”
माँ रोती रहीं।
मैंने सिर्फ इतना कहा—“वह आएगा। उसने वादा किया है।”
सात साल हो गए।
अब घर में सिर्फ मैं और माँ बची हूँ। पिताजी चल बसے۔ भाई शहर में बस गए। गाँव वाले मुझे ‘वह औरत’ कहकर बुलाते हैं जो बावली हो गई है इंतजार में।
हर शाम मैं उसी खिड़की के पास बैठती हूँ जहाँ कभी किशन खड़ा होता था। दीया जलाती हूँ। और वही चिट्ठी पढ़ती हूँ।
आज भी वही कर रही थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।
रात के बारह बज रहे थे। कौन आ सकता है?
मैंने दीया उठाया और दरवाजा खोला।
बाहर एक आदमी खड़ा था। चेहरा दुबला, बाल सफेद मिश्रित, कंधे झुके हुए। हाथ में एक छोटी सी गठरी।
मैंने पहचाना नहीं।
फिर उसने सिर उठाया। आँखें वही थीं—सूरज वाली।
“सुमित्रा…” उसकी आवाज काँप रही थी। “कहीं देर तो नहीं हो गई ना?”
मेरे हाथ से दीया गिर गया। अंधेरा हो गया। लेकिन मैंने उसे देख लिया था।
“किशन…?”
वह अंदर आया। दरवाजा बंद किया। फिर बस खड़ा रहा। जैसे हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।
“बोल… कहाँ रहा इतने साल?” मेरी आवाज में गुस्सा था, दर्द था, और एक अजीब सी राहत भी।
वह बैठ गया फर्श पर। “जेल में।”
सन्नाटा।
“जेल?”
“हाँ। शहर में एक मिल में काम करता था। मालिक ने मजदूरों की मजदूरी मार ली। हमने विरोध किया। झड़प हो गई। एक आदमी मर गया। पुलिस ने हमें पकड़ लिया। मुझे सात साल की सजा हुई। मैंने तुम्हें चिट्ठी लिखी… लेकिन जेल से चिट्ठी नहीं जाने दी उन्होंने। फिर जब छूटा तो सोचा था कि सीधे गाँव आऊँगा। लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। तपेदिक हो गया था। अस्पताल में छह महीने पड़ा रहा। आज ठीक होकर आया हूँ।”
उसने गठरी खोली। अंदर कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थीं—मेरी लिखी हुई। और एक छोटी सी डिब्बी।
“यह तुम्हारे लिए। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने एक चूड़ी रखी। सात चूड़ियाँ हैं। सोचता था कि जब आऊँगा तो खुद पहनाऊँगा।”
मैं रो पड़ी।
“तुमने कहा था कहीं देर न हो जाए… और देर हो गई किशन। मेरे पिताजी नहीं रहे। मेरी जवानी चली गई। गाँव वाले मुझे बावली कहते हैं।”
वह मेरे पास घुटनों के बल आया। “माफ कर देना। मैंने वादा तोड़ा। लेकिन हर रात जेल में वही दोहराता रहा—‘कहीं देर न हो जाए साजन’। तुम्हारा नाम लेकर सोता था। तुम्हारा नाम लेकर उठता था।”
मैंने उसका चेहरा देखा। वह पहले जैसा नहीं था। लेकिन आँखें वैसी ही थीं।
“अब क्या होगा?” मैंने पूछा।
“जो तुम कहोगी। अगर तुम कहो तो मैं लौट जाऊँ। अगर तुम कहो तो यहीं रहूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा—न जवानी, न पैसा, न इज्जत। बस एक अधूरा वादा बचा है।”
मैं उठी। दीया फिर से जलाया। फिर उसकी डिब्बी से एक-एक चूड़ी निकाली। सात चूड़ियाँ। लाल, हरी, पीली… जैसे सात साल के इंतजार के रंग हों।
“पहनाओ,” मैंने कहा।
उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मेरी कलाई पर चूड़ियाँ पहनाईं। एक-एक करके। जब आखिरी चूड़ी पहनाई तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“अब देर नहीं हुई,” मैंने कहा। “तुम आ गए। बस इतना काफी है।”
उस रात हमने बातें कीं। सालों की बातें। जेल की बातें, इंतजार की बातें, डर की बातें। सुबह होते-होते वह मेरे कंधे पर सर रखकर सो गया। मैं जागती रही। उसकी साँसें गिनती रही।
गाँव में सुबह होते ही हलचल मच गई। “किशन लौट आया!”
कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। “अब क्या करेगा? जेल का पाला हुआ।”
माँ ने उसे गले लगा लिया। रोती रहीं।
फिर दिन बीतने लगे।
किशन ने फिर से खेत संभाले। शरीर कमजोर था, लेकिन हिम्मत मजबूत। मैं उसके साथ काम करने लग गई। लोग देखते रहे। बातें बनाते रहे। लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ा।
एक दिन नदी किनारे हम दोनों बैठे थे। वही जगह जहाँ कभी सपने देखते थे।
किशन ने कहा, “सुमित्रा, अब शादी कर लें?”
मैं मुस्कुराई। “सात साल बाद? लोग हँसेंगे।”
“हँसने दो। हमने काफी रो लिया।”
शादी हुई। छोटी सी। सिर्फ माँ, दो-चार रिश्तेदार और पुराने दोस्त। कोई धूमधाम नहीं। बस एक मंडप, एक पुरोहित और दो लोग जो सालों बाद एक-दूसरे के हुए।
रात को जब सब चले गए तो किशन ने मेरा हाथ पकड़ा। “अब कोई देर नहीं रहेगी। न आने में, न जाने में। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारे साथ रहूँगा।”
मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया। “कहीं देर न हो जाए साजन… यह वाक्य अब डराता नहीं। अब तो लगता है कि देर होकर भी सब कुछ समय पर हुआ।”
साल बीतते गए।
हमारे घर में एक बेटी हुई। नाम रखा हमने—आस।
आस बड़ी हुई। खेतों में दौड़ती, नदी में खेलती। किशन उसे बाँहों में लेकर गाता—“मेरी आस… कहीं देर न हो जाए।”
एक शाम किशन बहुत थका हुआ घर लौटा। बुखार था। मैंने सिर पर कपड़ा रखा। दवा दी। रात भर जागती रही।
सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा। “सुमित्रा… लग रहा है इस बार देर हो जाएगी।”
मेरा दिल धड़कने लगा। “मत बोलो ऐसा। तुम ठीक हो जाओगे।”
वह मुस्कुराया। “ठीक हो या न हो… तुमसे मिल लिया। इंतजार खत्म हो गया। अब कोई देर नहीं।”
दो दिन बाद वह चल बसा।
आराम से। जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करके सो गया हो।
गाँव वाले आए। फिर वही सहानुभूति, वही बातें।
मैंने रोया। खूब रोया। लेकिन अंदर कोई खालीपन नहीं था।
अब सालों बीत गए। आस बड़ी हो गई। उसकी शादी हो गई। मैं अकेली रहती हूँ उसी घर में। हर रात दीया जलाती हूँ। खिड़की के पास बैठती हूँ।
और कभी-कभी हवा के साथ वही आवाज आती है “कहीं देर न हो जाए साजन…”
मैं मुस्कुरा देती हूँ।
“नहीं साजन। अब कोई देर नहीं।
तुम आ गए थे।
समय पर आ गए थे।
और मेरा इंतजार… कभी व्यर्थ नहीं गया।”
क्योंकि कुछ मुलाकातें देर से होती हैं।
लेकिन जब होती हैं तो जिंदगी भर के इंतजार को अर्थ दे देती हैं।
और कुछ वाक्य… बस वाक्य नहीं होते।
वे एक पूरा जीवन बन जाते हैं।
“कहीं देर न हो जाए साजन।”
यह वाक्य अब डर नहीं।
यह मेरी साँस है।
यह मेरी याद है।
- यह मेरा किशन है।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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