अमावस्या की रात आ चुकी थी।
पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था।
आसमान में चाँद का नामोनिशान नहीं था।
सौरभ अपने हाथ में लाल धागा, राधिका की गुड़िया और एक छोटी-सी चाकू जैसी धारदार वस्तु लिए बरगद के पेड़ की ओर बढ़ रहा था।
उसके साथ दीनानाथ बाबा भी थे।
हवा बिल्कुल शांत थी।
पेड़ के पास पहुँचते ही अचानक तापमान गिर गया।
सौरभ की साँस से धुआँ निकलने लगा।
बाबा ने कहा—
“यही जगह है।”
बरगद के तने पर लाल रंग के पुराने निशान बने हुए थे।
सौरभ ने गुड़िया जमीन पर रख दी।
अचानक पीछे से बच्चे की हँसी सुनाई दी।
“तुम आ गए।”
सौरभ पलटा।
राधिका पेड़ के नीचे खड़ी थी।
आज उसके बाल खुले हुए थे।
लाल फ्रॉक हवा में हिल रही थी।
लेकिन उसका चेहरा पहले से ज्यादा डरावना था।
“मुझे आजाद कर दो।”
सौरभ ने पूछा—
“कैसे?”
राधिका ने अपने हाथ की तरफ इशारा किया।
“तुम्हारा खून।”
सौरभ ने अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।
खून की कुछ बूंदें गुड़िया पर गिराईं।
जैसे ही पहली बूंद गिरी, जमीन काँपने लगी।
बरगद के पेड़ से एक भयानक आवाज आई।
धड़ाम!
काली धुंध पूरे पेड़ को घेरने लगी।
बाबा पीछे हट गए।
“यह ठीक नहीं हो रहा!”
राधिका चीखी—
“भैरवनाथ आ गया!”
काली धुंध से एक विशाल आकृति बाहर निकली।
लंबे बाल।
काला चेहरा।
और लाल चमकती आँखें।
वह तांत्रिक की आत्मा थी।
“तुमने मुझे फिर धोखा दिया!”
राधिका काँपते हुए बोली—
“आज मैं तुझसे नहीं डरूँगी।”
भैरवनाथ ने हाथ उठाया।
पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकलकर राधिका के पैरों से लिपट गईं।
सौरभ ने उसे छुड़ाने की कोशिश की।
लेकिन एक अदृश्य ताकत ने उसे पीछे फेंक दिया।
बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
भैरवनाथ ने उनकी ओर देखा।
“बूढ़े… तुम्हारी वजह से ही यह आत्मा अब तक जीवित है।”
बाबा जमीन पर गिर पड़े।
सौरभ ने लाल धागा उठाया।
उसे याद आया कि डायरी में लिखा था—
“जिसे बाँधा गया है, उसे उसी बंधन से मुक्त किया जा सकता है।”
उसने लाल धागा बरगद की जड़ पर बाँध दिया।
भैरवनाथ चीख उठा।
“नहीं!”
सौरभ ने धागे को कसकर खींचा।
राधिका की आँखों से आँसू बहने लगे।
“सौरभ… मुझे याद है।”
“क्या?”
“जिस रात मैं मरी थी… तुम्हारे दादा मुझे बचाना चाहते थे।”
सौरभ स्तब्ध रह गया।
“लेकिन बाबा ने कहा था कि उन्होंने तुम्हें धोखा दिया।”
राधिका ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर?”
“तांत्रिक ने सबको धोखा दिया था।”
भैरवनाथ गरजा—
“चुप!”
राधिका चीख पड़ी।
“मेरे मरने के बाद तुम्हारे दादा ने मुझे बचाने की कोशिश की थी। उन्होंने तांत्रिक को रोकने के लिए अपनी जान दे दी।”
सौरभ की आँखों में आँसू आ गए।
“तो फिर मेरे परिवार का दोष क्या था?”
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
“डर।”
“डर?”
“उन्होंने सच सामने लाने की हिम्मत नहीं की।”
कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।
फिर भैरवनाथ ने सौरभ की ओर झपट्टा मारा।
सौरभ जमीन पर गिर गया।
उसकी हथेली से खून निकल रहा था।
खून की एक बूंद बरगद की जड़ पर गिरी।
अचानक पूरा पेड़ लाल रोशनी से चमक उठा।
राधिका चीखी—
“यही है!”
सौरभ ने पूछा—
“क्या?”
“तुम्हारे खून ने बंधन तोड़ दिया है!”
पेड़ की जड़ें टूटने लगीं।
भैरवनाथ पीछे हटने लगा।
“नहीं!”
राधिका उसके सामने आ गई।
“आज मेरी मौत का हिसाब होगा।”
भैरवनाथ ने उसे पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन राधिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।
दोनों के चारों तरफ काली आग जलने लगी।
कुछ ही क्षणों में भैरवनाथ की चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।
फिर सब शांत हो गया।
राधिका जमीन पर खड़ी थी।
अब उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह एक सामान्य छोटी बच्ची जैसी लग रही थी।
उसने सौरभ को देखा और मुस्कुराई।
“धन्यवाद।”
सौरभ ने पूछा—
“अब तुम चली जाओगी?”
राधिका ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“फिर कभी नहीं आओगी?”
वह मुस्कुराई।
“अगर कोई मुझे याद रखेगा, तो मैं कभी पूरी तरह नहीं जाऊँगी।”
इतना कहकर उसके शरीर से हल्की सफेद रोशनी निकलने लगी।
कुछ ही सेकंड में वह रोशनी आसमान में विलीन हो गई।
बरगद का पेड़ सूखकर गिर पड़ा।
सुबह गाँव वालों ने देखा कि वर्षों से बंद पड़ा मंदिर भी टूट चुका था।
दीनानाथ बाबा ने सबको राधिका की पूरी कहानी बताई।
गाँव वालों ने बरगद के पास उसकी याद में एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया।
कुछ महीनों तक सब ठीक रहा।
सौरभ भी अपनी सामान्य जिंदगी में लौट आया।
लेकिन एक रात…
वह अपने कमरे में सो रहा था।
समय था—
3:03 AM
अचानक उसकी खिड़की पर आवाज हुई।
टक… टक…
सौरभ की आँख खुल गई।
उसने धीरे से खिड़की की तरफ देखा।
बाहर कोई नहीं था।
फिर आवाज आई—
टक… टक… टक…
सौरभ बिस्तर से उठा।
खिड़की के शीशे पर भाप जमने लगी।
धीरे-धीरे उस पर छोटे अक्षर दिखाई देने लगे।
“सौरभ…”
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
फिर एक और शब्द लिखा—
“पीछे देखो।”
सौरभ ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
लाल फ्रॉक।
लंबे बाल।
लेकिन इस बार वह राधिका नहीं थी।
उस बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं राधिका नहीं हूँ।”
सौरभ के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
“तो तुम कौन हो?”
बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।
“मैं उसकी छोटी बहन हूँ।”
सौरभ ने घबराकर पूछा—
“लेकिन राधिका की कोई बहन नहीं थी!”
बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
उसकी आँखें धीरे-धीरे काली होने लगीं।
“अब है।”
कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
अंधेरे में उसकी आवाज गूँजी—
“और मेरी कहानी अभी शुरू हुई है।”
फिर…
टक… टक… टक…
खिड़की पर दस्तक हुई।
सौरभ ने आँखें बंद कर लीं।
जब उसने आँखें खोलीं…
कमरा खाली था।
लेकिन उसकी मेज पर एक नई लाल फ्रॉक रखी थी।
उस फ्रॉक के ऊपर एक कागज पड़ा था।
उस पर लिखा था—
“अगली अमावस्या को मिलना, सौरभ।”
और नीचे एक छोटी-सी मुस्कान बनी थी।
“तुम्हारी नई चुड़ैल।”
End

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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