सौरभ ने दीनानाथ बाबा की बात सुनकर पूछा—
“मेरे परिवार को जानता है?”
बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।
बाहर फिर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
सौरभ दरवाजे की तरफ बढ़ा।
बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दरवाजा मत खोलना।”
“लेकिन बाहर कौन है?”
“वही… जिसका नाम लेना भी ठीक नहीं।”
अचानक बाहर से एक बच्चे की आवाज आई—
“सौरभ…”
सौरभ जम गया।
वही छोटी लड़की।
“मुझे पता है तुम अंदर हो।”
फिर हँसी सुनाई दी।
“बाहर आओ।”
बाबा ने कमरे की सारी लाइटें बंद कर दीं।
कुछ देर बाद दस्तक बंद हो गई।
सौरभ ने पूछा—
“बाबा, राधिका को किसने मारा था?”
बाबा ने गहरी साँस ली।
“करीब बीस साल पहले इस गाँव में एक तांत्रिक आया था। उसका नाम भैरवनाथ था।”
“तांत्रिक?”
“हाँ। वह दावा करता था कि वह आत्माओं को बुला सकता है।”
बाबा ने बताया कि राधिका के माता-पिता बहुत गरीब थे। एक रात राधिका अचानक गायब हो गई।
गाँव वालों ने खोज शुरू की।
अगली सुबह वह बरगद के पेड़ के पास मिली।
लेकिन उसके शरीर पर चोट के निशान थे।
गाँव के लोगों ने तांत्रिक पर शक किया।
लेकिन वह उसी रात गाँव छोड़कर चला गया।
“फिर लोग राधिका को चुड़ैल क्यों कहने लगे?”
बाबा ने कहा—
“क्योंकि उसकी आत्मा शांत नहीं हुई।”
“क्या उसने लोगों को नुकसान पहुँचाया?”
“नहीं।”
सौरभ चौंका।
“फिर?”
“वह सिर्फ उन लोगों के सामने आती थी जो उसकी मौत का सच जानते थे।”
सौरभ को कुछ याद आया।
“आप सच जानते हैं?”
बाबा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“क्या हुआ था उस रात?”
बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।
“मैं वहाँ था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“मैंने देखा था कि राधिका को तांत्रिक के पास ले जाया गया था।”
“किसने?”
बाबा ने सौरभ की ओर देखा।
“तुम्हारे दादा ने।”
सौरभ पीछे हट गया।
“मेरे दादा?”
“हाँ।”
सौरभ को विश्वास नहीं हुआ।
“लेकिन क्यों?”
“तुम्हारे दादा चाहते थे कि तांत्रिक तुम्हारे पिता की बीमारी ठीक कर दे।”
“और बदले में?”
“तांत्रिक ने एक मासूम बच्चे की बलि माँगी।”
सौरभ की आँखें फैल गईं।
“नहीं…”
“राधिका को उसी रात वहाँ लाया गया।”
बाबा की आवाज टूट गई।
“लेकिन राधिका की बलि नहीं दी गई। उसने भागने की कोशिश की। तांत्रिक ने उसे पकड़ लिया।”
“फिर?”
“मैं डर गया था। मैं भाग आया।”
कुछ देर बाद सौरभ ने पूछा—
“मेरे दादा?”
बाबा ने कहा—
“वह भी अगले दिन गायब हो गए।”
तभी कमरे के कोने से छोटी लड़की की हँसी सुनाई दी।
दोनों ने उधर देखा।
राधिका खड़ी थी।
वह सौरभ को देख रही थी।
“तुम्हारे दादा ने मुझे मारा नहीं था।”
सौरभ ने धीरे से पूछा—
“तो फिर किसने?”
राधिका ने अपना हाथ उठाया।
उसकी उंगली गाँव के पुराने मंदिर की तरफ थी।
“वहाँ।”
अगले ही पल वह गायब हो गई।
सौरभ और बाबा मंदिर की ओर निकल पड़े।
मंदिर वर्षों से बंद पड़ा था।
दरवाजा खोलते ही अंदर से सड़ी हुई गंध आई।
दीवारों पर पुराने तांत्रिक चिन्ह बने थे।
एक कोने में लकड़ी का संदूक रखा था।
सौरभ ने संदूक खोला।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
उस पर लिखा था—
भैरवनाथ।
सौरभ ने डायरी खोली।
पहले कुछ पन्नों पर अजीब मंत्र और तंत्र की बातें थीं।
फिर एक जगह राधिका का नाम लिखा था।
“यह लड़की मेरी साधना के लिए उपयुक्त है।”
सौरभ के हाथ काँपने लगे।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“लेकिन बलि पूरी नहीं हुई।”
और आखिरी पन्ने पर—
“उसकी आत्मा को बरगद से बाँध दिया गया है।”
सौरभ ने बाबा की तरफ देखा।
“इसका मतलब?”
बाबा ने कहा—
“राधिका की आत्मा उस पेड़ से बंधी है।”
“उसे मुक्त कैसे किया जाए?”
बाबा ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।
उसमें तीन चीजें लिखी थीं—
लाल धागा।
राधिका की गुड़िया।
और उस व्यक्ति का खून जिसने उसे धोखा दिया।
सौरभ समझ गया।
“जिसने उसे धोखा दिया… वह मेरे दादा थे?”
बाबा ने सिर हिलाया।
“लेकिन वे तो मर चुके हैं।”
तभी मंदिर के पीछे से आवाज आई—
“उनका खून अभी भी जिंदा है।”
सौरभ और बाबा ने पीछे देखा।
राधिका वहाँ खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुरानी गुड़िया थी।
वह गुड़िया सौरभ की तरफ बढ़ाते हुए बोली—
“तुम्हारे खून से ही मैं आजाद हो सकती हूँ।”
सौरभ पीछे हट गया।
“मेरा खून?”
राधिका ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे दादा का खून तुम्हारे अंदर है।”
अचानक मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।
टन… टन… टन…
बाबा ने सौरभ को खींच लिया।
“भागो!”
लेकिन मंदिर का दरवाजा बंद हो चुका था।
दीवारों से काली परछाइयाँ निकलने लगीं।
राधिका का चेहरा बदलने लगा।
उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो गईं।
उसने चीखते हुए कहा—
“मुझे आजाद करो!”
सौरभ ने देखा कि उसके पीछे एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।
वह राधिका से भी ज्यादा डरावनी थी।
बाबा चीख पड़े—
“भैरवनाथ!”
वह तांत्रिक की आत्मा थी।
उसने राधिका की गर्दन पकड़ ली।
“तू मेरी साधना अधूरी छोड़कर भागी थी।”
राधिका चीखने लगी।
सौरभ ने मंदिर में पड़ा लोहे का त्रिशूल उठाया और उस काली आकृति की ओर बढ़ा।
“उसे छोड़ दो!”
भैरवनाथ हँसा।
“तुम्हें लगता है तुम मुझे रोक सकते हो?”
उसने हाथ उठाया।
सौरभ हवा में उठ गया।
तभी राधिका ने अपनी पूरी ताकत से तांत्रिक को पीछे धकेल दिया।
“भागो, सौरभ!”
“लेकिन तुम?”
“मैं बाद में आऊँगी।”
मंदिर का दरवाजा अचानक खुल गया।
सौरभ और बाबा बाहर भागे।
पीछे से भयानक चीख सुनाई दी।
मंदिर की दीवारें काँप रही थीं।
सौरभ ने पलटकर देखा।
राधिका दरवाजे पर खड़ी थी।
उसने आखिरी बार कहा—
“कल अमावस्या है।”
“उस रात मेरा फैसला होगा।”
फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
बाबा ने सौरभ की तरफ देखा।
“हमें कल रात बरगद के पेड़ के पास जाना होगा।”
“और अगर नहीं गए?”
बाबा ने डरते हुए कहा—
“तो राधिका कभी आजाद नहीं होगी।”
सौरभ ने पूछा—
“और अगर गए?”
बाबा ने दूर अंधेरे में देखा।
“तो शायद हममें से कोई भी वापस नहीं आएगा।”
उसी रात सौरभ के घर की दीवार पर लाल अक्षरों में तीन शब्द उभर आए—
“अमावस्या का इंतजार।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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