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बंद कमरे की आवाज़ भाग 2 — कमरे के अंदर कौन था?

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

आरव पूरी ताकत से हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर भागा।

 

उसने दरवाज़े को खींचा।

 

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

 

“खुल जा!”

 

वह बार-बार दरवाज़ा पीटने लगा।

 

पीछे से कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे उसके करीब आ रही थी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

गलियारा खाली था।

 

लेकिन फर्श पर पानी के छोटे-छोटे निशान बन रहे थे।

 

जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसकी तरफ चलकर आ रहा हो।

 

अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

 

“भागोगे कहाँ?”

 

आरव चीख पड़ा और पीछे हट गया।

 

उसी समय मुख्य दरवाज़ा अचानक खुल गया।

 

वह बिना पीछे देखे हवेली से बाहर भागा।

 

गाँव पहुँचकर उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

 

लेकिन उस रात उसे नींद नहीं आई।

 

बार-बार वही आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी—

 

“अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

 

सुबह होते ही आरव ने अपने नाना को सब कुछ बता दिया।

 

नाना बहुत देर तक चुप रहे।

 

फिर उन्होंने संदूक से एक पुरानी डायरी निकाली।

 

डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे।

 

“ये तुम्हारे परनाना की डायरी है,” नाना ने कहा।

 

“उन्होंने उस हवेली में कई साल काम किया था।”

 

आरव ने डायरी खोली।

 

एक पन्ने पर लिखा था—

 

“मीरा उस कमरे में नहीं मरी थी।”

 

आरव की आँखें फैल गईं।

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“उस कमरे में मीरा के अलावा भी कोई था।”

 

आरव ने जल्दी से अगला पन्ना पलटा।

 

वहाँ लिखा था—

 

“ठाकुर साहब ने एक रात मुझे कमरे के बाहर पहरा देने को कहा। उन्होंने कहा कि मीरा पागल हो चुकी है और किसी से बात करती रहती है। रात करीब बारह बजे अंदर से बच्ची के रोने की आवाज़ आई। फिर उसने कहा—’मुझे बचा लो। वो मुझे लेने आ गया है।’”

 

अगली पंक्ति पढ़ते ही आरव का हाथ काँपने लगा।

 

“मैंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। तभी अंदर से ठाकुर साहब की आवाज़ आई—’दरवाज़ा मत खोलना। वो मीरा नहीं है।’”

 

आरव ने डायरी बंद कर दी।

 

“फिर क्या हुआ?”

 

नाना बोले—

 

“आगे पढ़ो।”

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“दरवाज़े के नीचे से खून बाहर आने लगा। लेकिन कमरे में मीरा के अलावा कोई नहीं था। सुबह जब दरवाज़ा खोला गया तो मीरा गायब थी। कमरे की दीवार पर एक निशान बना था—एक काले हाथ का निशान।”

 

आरव ने तुरंत पूछा—

 

“क्या वो निशान अभी भी है?”

 

नाना ने कहा—

 

“शायद।”

 

आरव ने उसी दिन हवेली लौटने का फैसला किया।

 

इस बार उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी गया।

 

कबीर को पूरी कहानी बताने के बाद दोनों हवेली में दाखिल हुए।

 

“अगर कुछ हुआ तो तुरंत भागेंगे,” कबीर ने कहा।

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

दोनों ऊपर पहुँचे।

 

वह काला कमरा अब खुला हुआ था।

 

दरवाज़ा आधा टूटा था।

 

अंदर घना अंधेरा था।

 

कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

 

कमरा देखने में बिल्कुल साधारण था।

 

एक पुराना लकड़ी का पलंग।

 

टूटी हुई अलमारी।

 

दीवार पर कुछ पुराने निशान।

 

और सामने की दीवार पर…

 

काला हाथ।

 

आरव उसके करीब गया।

 

निशान ऐसा था जैसे किसी ने काले रंग से हाथ लगाकर दीवार पर छाप छोड़ी हो।

 

लेकिन जैसे ही उसने हाथ उसके करीब किया…

 

दीवार से आवाज़ आई।

 

“आरव…”

 

कबीर पीछे हट गया।

 

“तूने भी सुना?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

फिर कमरे के कोने से बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

 

दोनों ने उधर देखा।

 

वहाँ एक पुराना लकड़ी का बक्सा पड़ा था।

 

बक्सा अपने आप हिल रहा था।

 

कबीर ने कहा—

 

“इसे मत खोलना।”

 

लेकिन आरव ने बक्से का ढक्कन उठा दिया।

 

अंदर एक पुरानी लाल रंग की गुड़िया थी।

 

उसके साथ एक छोटी-सी चाँदी की पायल और एक कागज़ रखा था।

 

कागज़ पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“मीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला था। किसी और ने खोला था।”

 

अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

 

कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की।

 

दरवाज़ा नहीं खुला।

 

फिर कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

 

एक नहीं…

 

दर्जनों आवाज़ें।

 

“हमें बाहर निकालो…”

 

“बहुत अंधेरा है…”

 

“हमें बचाओ…”

 

“दरवाज़ा खोलो…”

 

आरव ने कान बंद कर लिए।

 

लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।

 

तभी दीवार पर बना काला हाथ धीरे-धीरे हिलने लगा।

 

उसकी उँगलियाँ दीवार से अलग हुईं।

 

कबीर चीख पड़ा।

 

काला निशान दीवार से बाहर निकल रहा था।

 

अब वह एक हाथ जैसा दिख रहा था।

 

फिर दूसरा हाथ।

 

फिर एक सिर।

 

और धीरे-धीरे एक पूरा शरीर दीवार से बाहर आने लगा।

 

वह वही छोटी लड़की थी जिसे आरव ने पिछली बार देखा था।

 

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर आँखें थीं।

 

और उसकी आँखें…

 

पूरी तरह सफेद थीं।

 

उसने आरव को देखकर कहा—

 

“तुम वापस क्यों आए?”

 

आरव काँपते हुए बोला—

 

“मीरा कहाँ है?”

 

लड़की मुस्कुराई।

 

“मीरा तो उस रात ही मर गई थी।”

 

“फिर तुम कौन हो?”

 

उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

 

“जिसे उसने कमरे में बंद किया था।”

 

कबीर ने पूछा—

 

“किसने?”

 

लड़की ने धीरे-धीरे कमरे की दीवार की ओर इशारा किया।

 

“उसके पिता ने।”

 

आरव को डायरी की बात याद आई।

 

लड़की बोली—

 

“मीरा ने मुझे देखा था। उसने मुझे बाहर निकालना चाहा। लेकिन उसके पिता ने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

 

“तुम इंसान थीं?”

 

लड़की की मुस्कान गायब हो गई।

 

“मैं कभी इंसान नहीं थी।”

 

अचानक कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

 

फर्श के नीचे से चीखें आने लगीं।

 

आरव ने देखा कि कमरे के फर्श पर कई पुराने हाथों के निशान उभर रहे थे।

 

लड़की आगे बढ़ी।

 

“मीरा ने मुझे रोकने की कोशिश की थी। इसलिए मैंने उसे अपने साथ ले लिया।”

 

“कहाँ?”

 

लड़की ने फर्श की तरफ देखा।

 

“नीचे।”

 

उसी क्षण फर्श टूट गया।

 

कबीर गिरते-गिरते बचा।

 

नीचे एक गहरी सुरंग दिखाई दी।

 

सुरंग के भीतर से ठंडी हवा आ रही थी।

 

और उसी हवा में एक बच्ची की आवाज़ सुनाई दी—

 

“आरव…”

 

इस बार आवाज़ अलग थी।

 

मासूम।

 

डरी हुई।

 

“आरव… मुझे बचा लो।”

 

आरव ने पहचान लिया।

 

“मीरा!”

 

सफेद आँखों वाली लड़की अचानक चीखने लगी।

 

“उसकी बात मत सुनो!”

 

आरव ने सुरंग की ओर देखा।

 

वहाँ अंधेरे में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

 

उसके हाथ में वही चाँदी की पायल थी।

 

मीरा ने कहा—

 

“मुझे यहाँ से बाहर निकालो।”

 

आरव सुरंग में उतरने लगा।

 

कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तू पागल है? हमें यहाँ से निकलना चाहिए!”

 

आरव ने कहा—

 

“अगर मीरा सच में यहाँ है, तो हमें उसे बचाना होगा।”

 

दोनों सुरंग में उतर गए।

 

पीछे खड़ी सफेद आँखों वाली लड़की उन्हें देखती रही।

 

फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

 

“जब सच जान जाओगे…”

 

“तब तुम खुद बाहर नहीं निकलना चाहोगे।”

 

सुरंग बहुत लंबी थी।

 

कुछ दूर जाने के बाद उन्हें दीवार पर पुराने नाम लिखे मिले।

 

दर्जनों नाम।

 

और सबसे नीचे…

 

मीरा।

 

उसके ठीक नीचे एक और नाम लिखा था।

 

आरव ने टॉर्च पास की।

 

नाम देखकर उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

 

वहाँ लिखा था—

 

आरव।

 

कबीर ने काँपते हुए पूछा—

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

तभी पीछे से सुरंग का रास्ता बंद हो गया।

 

और अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“क्योंकि तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो।”

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

अंधेरे में एक चेहरा दिखाई दिया।

 

वह चेहरा…

 

खुद आरव का था।

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