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कातिल कौन? भाग 1 — पहली लाश

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे शहर के पुराने इलाके में अचानक बिजली चली गई।

 

पूरी गली अंधेरे में डूब गई।

 

उसी समय विवेक मिश्रा अपने घर की बालकनी में खड़ा फोन पर किसी से बात कर रहा था।

 

“मैंने कहा ना, मुझे अब किसी से डर नहीं लगता,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

 

दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

 

विवेक का चेहरा अचानक बदल गया।

 

“तुम… ये कैसे जानते हो?”

 

कुछ सेकंड वह चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“ठीक है। कल सुबह मिलते हैं। लेकिन आज रात मुझे फोन मत करना।”

 

उसने फोन काट दिया।

 

विवेक ने कमरे की खिड़की बंद की और पर्दा खींच दिया।

 

उसे क्या पता था कि अगले कुछ घंटों में उसकी जिंदगी खत्म होने वाली थी।

 

सुबह करीब छह बजे उसकी पड़ोसी सुमन ने पुलिस को फोन किया।

 

“साहब… विवेक जी के घर का दरवाज़ा खुला है। अंदर कुछ गड़बड़ लग रही है।”

 

पुलिस कुछ ही मिनटों में वहाँ पहुँच गई।

 

इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ ने घर के अंदर कदम रखा।

 

विवेक अपने अध्ययन कक्ष में जमीन पर पड़ा था।

 

उसकी मौत हो चुकी थी।

 

कमरे में सामान बिखरा हुआ था, लेकिन चोरी के कोई स्पष्ट निशान नहीं थे।

 

टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

 

उसके पास एक कागज़ पड़ा था।

 

कागज़ पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे—

 

“कातिल तुम्हारे बहुत करीब है।”

 

अर्जुन ने कागज़ को ध्यान से देखा।

 

“फिंगरप्रिंट?”

 

फोरेंसिक अधिकारी ने कहा—

 

“कुछ निशान हैं, लेकिन अभी स्पष्ट नहीं हैं।”

 

अर्जुन ने कमरे का निरीक्षण किया।

 

खिड़की अंदर से बंद थी।

 

मुख्य दरवाज़े पर जबरदस्ती घुसने के निशान नहीं थे।

 

मतलब विवेक ने हत्यारे को खुद अंदर आने दिया था।

 

पुलिस ने विवेक के फोन की जाँच शुरू की।

 

आखिरी कॉल रात 11:32 बजे हुई थी।

 

नंबर सेव नहीं था।

 

अर्जुन ने नंबर पर फोन किया।

 

फोन बंद था।

 

जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि विवेक एक स्थानीय कंपनी में अकाउंटेंट था।

 

उसकी जिंदगी देखने में बिल्कुल सामान्य थी।

 

पत्नी की दो साल पहले मृत्यु हो चुकी थी।

 

उनकी एक बेटी थी—नैना, जो दूसरे शहर में पढ़ती थी।

 

विवेक का छोटा भाई राहुल उसी शहर में रहता था।

 

पुलिस ने राहुल से पूछताछ की।

 

“आपके भाई से आखिरी बार कब बात हुई?”

 

राहुल ने कहा—

 

“कल शाम। करीब आठ बजे।”

 

“किस बारे में?”

 

“कुछ खास नहीं।”

 

अर्जुन ने उसे गौर से देखा।

 

“आप परेशान लग रहे हैं।”

 

राहुल ने नजरें झुका लीं।

 

“भाई से मेरा कुछ समय से झगड़ा चल रहा था।”

 

“किस बात पर?”

 

“पैसों को लेकर।”

 

“कितने पैसे?”

 

राहुल चुप रहा।

 

अर्जुन ने दोबारा पूछा—

 

“कितने?”

 

“दस लाख।”

 

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

 

राहुल ने बताया कि उनके पिता की पुरानी जमीन बेचकर मिले पैसे विवेक के पास थे। राहुल अपना हिस्सा मांग रहा था।

 

“लेकिन मैंने उसे नहीं मारा,” उसने कहा।

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“आप रात में कहाँ थे?”

 

“अपने घर पर।”

 

“कोई गवाह?”

 

“नहीं।”

 

यही बात राहुल को पहला संदिग्ध बना रही थी।

 

लेकिन पुलिस को एक और नाम मिला।

 

सुमन।

 

वही पड़ोसी जिसने पुलिस को फोन किया था।

 

अर्जुन ने उससे पूछा—

 

“आपको कैसे पता चला कि विवेक के घर कुछ हुआ है?”

 

सुमन ने कहा—

 

“सुबह मैंने दरवाज़ा खुला देखा।”

 

“क्या आपने अंदर जाकर देखा?”

 

“नहीं। मैं डर गई थी।”

 

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

 

“लेकिन आपने पुलिस को फोन करने से पहले किसे फोन किया था?”

 

सुमन चौंक गई।

 

“मैंने… किसी को नहीं।”

 

अर्जुन ने अपना फोन उसकी तरफ किया।

 

कॉल रिकॉर्ड में रात 11:47 बजे सुमन की विवेक को कॉल दिखाई दे रही थी।

 

सुमन का चेहरा पीला पड़ गया।

 

“हाँ… मैंने फोन किया था।”

 

“क्यों?”

 

“बस… एक जरूरी बात करनी थी।”

 

“क्या बात?”

 

सुमन चुप रही।

 

अर्जुन ने सख्त आवाज़ में पूछा—

 

“आपने रात में विवेक को क्यों फोन किया था?”

 

सुमन ने आखिरकार कहा—

 

“क्योंकि उसने मुझे धमकी दी थी।”

 

“किस बात की?”

 

“उसने कहा था कि अगर मैंने किसी को सच बता दिया तो वह मुझे बर्बाद कर देगा।”

 

अर्जुन चौंक गया।

 

“कौन सा सच?”

 

सुमन ने जवाब नहीं दिया।

 

इसी बीच पुलिस को विवेक के घर से एक पुरानी डायरी मिली।

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर तीन नाम लिखे थे—

 

राहुल।

 

सुमन।

 

और…

 

नैना।

 

तीनों के सामने एक-एक सवाल लिखा था।

 

राहुल के सामने—

 

“पैसे?”

 

सुमन के सामने—

 

“उस रात का सच?”

 

नैना के सामने—

 

“माँ की मौत?”

 

अर्जुन की नजर वहीं टिक गई।

 

विवेक की पत्नी की मौत दो साल पहले हुई थी।

 

क्या वह हादसा था?

 

या हत्या?

 

अर्जुन ने नैना को तुरंत शहर बुलाया।

 

अगली शाम नैना पुलिस स्टेशन पहुँची।

 

वह शांत थी।

 

बहुत ज्यादा शांत।

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“तुम्हारे पिता की हत्या हुई है।”

 

नैना ने बिना किसी भाव के कहा—

 

“मुझे पता है।”

 

“तुम आखिरी बार उनसे कब मिली थीं?”

 

“तीन दिन पहले।”

 

“क्या तुम्हारा उनसे झगड़ा हुआ था?”

 

“हाँ।”

 

“किस बात पर?”

 

नैना ने कुछ सेकंड उसे देखा।

 

फिर बोली—

 

“मेरी माँ की मौत के बारे में।”

 

अर्जुन आगे झुका।

 

“तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

 

नैना ने धीमी आवाज़ में कहा—

 

“मेरे पिता ने उन्हें नहीं मारा था…”

 

वह कुछ पल रुकी।

 

फिर बोली—

 

“लेकिन वह उन्हें बचा भी सकते थे।”

 

अर्जुन चौंक गया।

 

“क्या मतलब?”

 

नैना ने कहा—

 

“मेरी माँ की मौत कोई हादसा नहीं था। मेरे पिता जानते थे कि उस रात क्या हुआ था।”

 

“और तुमने उनसे सच पूछा?”

 

“हाँ।”

 

“उन्होंने क्या कहा?”

 

नैना की आँखों में आँसू आ गए।

 

“उन्होंने कहा कि अगर मैंने सच जान लिया… तो मैं उस कातिल को पहचान जाऊँगी।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“किस कातिल को?”

 

नैना ने उसकी आँखों में देखा।

 

“मैं नहीं जानती।”

 

उसी समय पुलिस स्टेशन में एक कांस्टेबल दौड़ता हुआ आया।

 

“सर! विवेक के घर से एक और चीज मिली है।”

 

“क्या?”

 

उसने एक छोटा-सा लिफाफा अर्जुन को दिया।

 

लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।

 

तस्वीर में विवेक, उसकी पत्नी और तीन लोग खड़े थे।

 

राहुल।

 

सुमन।

 

और एक तीसरा व्यक्ति…

 

जिसका चेहरा काले मार्कर से मिटा दिया गया था।

 

तस्वीर के पीछे लिखा था—

 

“इन चारों में से एक कातिल है।”

 

अर्जुन ने तस्वीर को पलटा।

 

पीछे एक और लाइन थी—

 

“लेकिन असली कातिल वही है जिस पर कोई शक नहीं करेगा।”

 

अर्जुन ने कमरे में मौजूद तीनों संदिग्धों की तस्वीरें सामने रखीं।

 

राहुल।

 

सुमन।

 

नैना।

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“खेल अभी शुरू हुआ है।”

 

उसे नहीं पता था कि अगले दिन…

 

इस केस में दूसरी लाश मिलने वाली थी।

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